अम्बिका खण्ड · अध्याय 2
सनत्कुमार की प्रतिज्ञा
श्लोक 1 (skanda.8.2.1)
सनत्कुमार उवाच । प्रपद्ये देवमीशानं सर्वज्ञमपराजितम् । महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम्
sanatkumāra uvāca | prapadye devamīśānaṁ sarvajñamaparājitam | mahādevaṁ mahātmānaṁ viśvasya jagataḥ patim
सनत्कुमार ने कहा — मैं उन ईशान देव की शरण में जाता हूँ, जो सर्वज्ञ हैं, अपराजित हैं, महादेव हैं, महात्मा हैं और समस्त विश्व-जगत् के स्वामी हैं।
श्लोक 2 (skanda.8.2.2)
शक्तिरप्रतिघा यस्य ऐश्वर्यञ्चैव सर्वशः । स्वामित्वञ्च विभुत्वञ्च स्वकृतानि प्रचक्षते
śaktirapratighā yasya aiśvaryañcaiva sarvaśaḥ | svāmitvañca vibhutvañca svakṛtāni pracakṣate
जिनकी शक्ति अप्रतिहत है और जिनका ऐश्वर्य सर्वत्र है, उनके स्वामित्व और विभुत्व को शास्त्र उन्हीं का स्वयं का किया हुआ बताते हैं।
श्लोक 3 (skanda.8.2.3)
तस्मै देवाय सोमाय प्रणम्य प्रयतः शुचिः । पुराणाख्यानजिज्ञासोर्वक्ष्ये स्कन्दोद्भवं शुभम्
tasmai devāya somāya praṇamya prayataḥ śuciḥ | purāṇākhyānajijñāsorvakṣye skandodbhavaṁ śubham
उन सोम (उमासहित शिव) देव को विनम्र और शुद्ध होकर प्रणाम करके, पुराण की कथा जानने के इच्छुक के लिए मैं स्कन्द के शुभ जन्म का वर्णन करूँगा।
श्लोक 4 (skanda.8.2.4)
देहावतारो देवस्य रुद्रस्य परमात्मनः । प्राजापत्याभिषेकश्च हरणं शिरसस्तथा
dehāvatāro devasya rudrasya paramātmanaḥ | prājāpatyābhiṣekaśca haraṇaṁ śirasastathā
परमात्मा भगवान् रुद्र का देहावतार, उनका प्राजापत्य अभिषेक, तथा दक्ष-यज्ञ में शिर के हरण की कथा भी मैं कहूँगा।
श्लोक 5 (skanda.8.2.5)
दर्शनं षट्कुलीयानां चक्रस्य च विसर्जनम् । नैमिशस्योद्भवश्चैव सत्रस्य च समापनम्
darśanaṁ ṣaṭkulīyānāṁ cakrasya ca visarjanam | naimiśasyodbhavaścaiva satrasya ca samāpanam
षट्कुलीय (छह कुलों) के दर्शन, यज्ञ-चक्र के विसर्जन, नैमिष के उद्भव तथा सत्र की समाप्ति का भी वर्णन होगा।
श्लोक 6 (skanda.8.2.6)
ब्रह्मणश्चागमस्तत्र तपसश्चरणन्तथा । शर्वस्य दर्शनञ्चैव देव्याश्चैव समुद्भवः
brahmaṇaścāgamastatra tapasaścaraṇantathā | śarvasya darśanañcaiva devyāścaiva samudbhavaḥ
वहाँ ब्रह्मा का आगमन, उनका तपश्चरण, शर्व (शिव) का दर्शन तथा देवी की उत्पत्ति भी बताई जाएगी।
श्लोक 7 (skanda.8.2.7)
सत्या विवादश्च तथा दक्षशापस्तथैव च । सेनायाश्च समुत्पत्तिर्यथा देव्याः स्वयंवरः
satyā vivādaśca tathā dakṣaśāpastathaiva ca | senāyāśca samutpattiryathā devyāḥ svayaṁvaraḥ
सती का विवाद, दक्ष का शाप, सेना की उत्पत्ति तथा देवी के स्वयंवर का भी वर्णन होगा।
श्लोक 8 (skanda.8.2.8)
देवानां वरदानञ्च वसिष्ठस्य च धीमतः । पराशरस्य चोत्पत्तिर्व्यासस्य च महात्मनः
devānāṁ varadānañca vasiṣṭhasya ca dhīmataḥ | parāśarasya cotpattirvyāsasya ca mahātmanaḥ
देवताओं को वरदान, बुद्धिमान वसिष्ठ की, पराशर की और महात्मा व्यास की उत्पत्ति भी कही जाएगी।
श्लोक 9 (skanda.8.2.9)
वसिष्ठकौशिकाभ्याञ्च वैरोद्भवसमापनम् । वाराणस्याश्च शून्यत्वं क्षेत्रमाहात्म्यवर्णनम्
vasiṣṭhakauśikābhyāñca vairodbhavasamāpanam | vārāṇasyāśca śūnyatvaṁ kṣetramāhātmyavarṇanam
वसिष्ठ और कौशिक (विश्वामित्र) के बीच वैर के उद्भव और समापन का, वाराणसी की शून्यता का तथा उस क्षेत्र की महिमा का भी वर्णन होगा।
श्लोक 10 (skanda.8.2.10)
रुद्रस्य चात्र सान्निध्यं नन्दिनश्चाप्यनुग्रहः । गणानां दर्शनञ्चैव कथनञ्चाप्यशेषतः
rudrasya cātra sānnidhyaṁ nandinaścāpyanugrahaḥ | gaṇānāṁ darśanañcaiva kathanañcāpyaśeṣataḥ
वहाँ रुद्र की सन्निधि, नन्दी के अनुग्रह, गणों के दर्शन तथा उनका सम्पूर्ण वर्णन भी कहा जाएगा।
श्लोक 11 (skanda.8.2.11)
कालीव्याहरणञ्चैव तपश्चरणमेव च । सोमनन्दिसमुत्पत्तिर्वरदानं तथैव च
kālīvyāharaṇañcaiva tapaścaraṇameva ca | somanandisamutpattirvaradānaṁ tathaiva ca
काली के आह्वान, तपश्चरण, सोम और नन्दी की उत्पत्ति तथा वरदान का भी वर्णन होगा।
श्लोक 12 (skanda.8.2.12)
गौरीत्वं पुत्रलम्भश्च देव्या उत्पत्तिरेव च । कौशिक्या भूतमातृत्वं सिंहस्य रथता तथा
gaurītvaṁ putralambhaśca devyā utpattireva ca | kauśikyā bhūtamātṛtvaṁ siṁhasya rathatā tathā
गौरी होने का, पुत्र-प्राप्ति का, देवी की उत्पत्ति का, कौशिकी के भूतमातृत्व का तथा सिंह के वाहन बनने का भी वर्णन होगा।
श्लोक 13 (skanda.8.2.13)
गौर्याश्च निलयो विन्ध्ये विन्ध्यसूर्यसमागमः । अगस्त्यस्य च माहात्म्यं वधः सुन्दनिसुन्दयोः
gauryāśca nilayo vindhye vindhyasūryasamāgamaḥ | agastyasya ca māhātmyaṁ vadhaḥ sundanisundayoḥ
गौरी का विन्ध्य में निवास, विन्ध्य और सूर्य के समागम, अगस्त्य की महिमा तथा सुन्द-निसुन्द के वध का भी वर्णन होगा।
श्लोक 14 (skanda.8.2.14)
निशुम्भशुम्भनिर्णाशो महिषस्य वधस्तया । अभिषेकश्च कौशिक्याः सर्वदेवैः प्रकीर्तितः
niśumbhaśumbhanirṇāśo mahiṣasya vadhastayā | abhiṣekaśca kauśikyāḥ sarvadevaiḥ prakīrtitaḥ
निशुम्भ-शुम्भ के विनाश, महिष के वध, तथा कौशिकी के उस अभिषेक का वर्णन होगा, जिसकी सभी देवताओं ने प्रशंसा की।
श्लोक 15 (skanda.8.2.15)
देवानां च तदा हर्षाद्वरदानमथापि च । अन्धकस्य तथोत्पत्तिः पृथिव्याश्चैव बन्धनम्
devānāṁ ca tadā harṣādvaradānamathāpi ca | andhakasya tathotpattiḥ pṛthivyāścaiva bandhanam
उस समय हर्षित देवताओं द्वारा वरदान दिए जाने का, तथा अन्धक की उत्पत्ति और पृथ्वी के बन्धन का भी वर्णन होगा।
श्लोक 16 (skanda.8.2.16)
हिरण्याक्षवधश्चैव हिरण्यकशिपोस्तथा । बलशंशमनं चैव देव्याः समय एव च
hiraṇyākṣavadhaścaiva hiraṇyakaśipostathā | balaśaṁśamanaṁ caiva devyāḥ samaya eva ca
हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु के वध का, बल के शमन का तथा देवी की प्रतिज्ञा (समय) का भी वर्णन होगा।
श्लोक 17 (skanda.8.2.17)
देवानां गमनं चैवं अग्नेर्दूतत्वमेव च । देवानां वरदानं च शुक्रस्य च विसर्जनम्
devānāṁ gamanaṁ caivaṁ agnerdūtatvameva ca | devānāṁ varadānaṁ ca śukrasya ca visarjanam
देवताओं के गमन का, अग्नि के दूतत्व का, देवताओं को वरदान दिए जाने का तथा शुक्राचार्य के विसर्जन का भी वर्णन होगा।
श्लोक 18 (skanda.8.2.18)
दूतस्य च तथोत्पत्तिर्देव्याश्चान्धकदर्शनम् । शैलादिदैन्यसम्मर्द्दो देव्याश्च शतरूपता
dūtasya ca tathotpattirdevyāścāndhakadarśanam | śailādidainyasammarddo devyāśca śatarūpatā
दूत की उत्पत्ति का, देवी के अन्धक-दर्शन का, शैलराज आदि की व्याकुलता का तथा देवी के शतरूपत्व का भी वर्णन होगा।
श्लोक 19 (skanda.8.2.19)
आर्यावरप्रदानं च शैवादिस्तव एव च । देवस्यागमनं चैव वृत्तस्य कथनं तथा
āryāvarapradānaṁ ca śaivādistava eva ca | devasyāgamanaṁ caiva vṛttasya kathanaṁ tathā
आर्या द्वारा वरदान दिए जाने का, शैव स्तव का, देव के आगमन का तथा घटित वृत्तान्त के कथन का भी वर्णन होगा।
श्लोक 20 (skanda.8.2.20)
पतिव्रतायाश्चाख्यानं गुरुशुश्रषणस्य च । आख्यानं पञ्चचूडायास्तैजसश्चाप्यधृष्यता
pativratāyāścākhyānaṁ guruśuśraṣaṇasya ca | ākhyānaṁ pañcacūḍāyāstaijasaścāpyadhṛṣyatā
पतिव्रता के आख्यान का, गुरुशुश्रूषा के आख्यान का, पञ्चचूडा के आख्यान का तथा तेजस्वी की अधृष्यता (अजेयता) का भी वर्णन होगा।
श्लोक 21 (skanda.8.2.21)
दूतस्यागमनं चैव संवादोथ विसर्जनम् । अन्धकासुरसंवादो मन्दरागमनं तथा
dūtasyāgamanaṁ caiva saṁvādotha visarjanam | andhakāsurasaṁvādo mandarāgamanaṁ tathā
दूत के आगमन, संवाद और तत्पश्चात् विसर्जन का, अन्धकासुर के संवाद तथा मन्दराचल-आगमन का भी वर्णन होगा।
श्लोक 22 (skanda.8.2.22)
गणानामागमश्चैव संख्यानश्रवणं तथा । विग्रहश्चान्धकस्याथ युद्धेन महता तथा
gaṇānāmāgamaścaiva saṁkhyānaśravaṇaṁ tathā | vigrahaścāndhakasyātha yuddhena mahatā tathā
गणों के आगमन, उनकी संख्या के श्रवण, तथा अन्धक के विग्रह एवं उस महान् युद्ध का भी वर्णन होगा।
श्लोक 23 (skanda.8.2.23)
शरीरार्धप्रदानं च अशोकसुतसंग्रहः । भस्मसोमोद्भवश्चैव श्मशानवसतिस्तथा
śarīrārdhapradānaṁ ca aśokasutasaṁgrahaḥ | bhasmasomodbhavaścaiva śmaśānavasatistathā
अपने शरीर का आधा भाग देने का, अशोक-सुत के संग्रह का, भस्म और सोम की उत्पत्ति का तथा श्मशान-निवास का भी वर्णन होगा।
श्लोक 24 (skanda.8.2.24)
उत्पत्तिर्यक्षराजस्य कुबेरस्य च धीमतः । निग्रहो भुजगेन्द्राणां शिखरस्य च पातनम्
utpattiryakṣarājasya kuberasya ca dhīmataḥ | nigraho bhujagendrāṇāṁ śikharasya ca pātanam
यक्षराज बुद्धिमान् कुबेर की उत्पत्ति का, भुजंगेन्द्रों के निग्रह का तथा शिखर के पतन का भी वर्णन होगा।
श्लोक 25 (skanda.8.2.25)
त्रैलोक्यस्य सशक्रस्य वशीकरणमेव च । देवसेनाप्रदानं च सेनापत्याभिषेचनम्
trailokyasya saśakrasya vaśīkaraṇameva ca | devasenāpradānaṁ ca senāpatyābhiṣecanam
इन्द्र सहित त्रैलोक्य के वशीकरण का, देवसेना के प्रदान का तथा सेनापति-अभिषेक का भी वर्णन होगा।
श्लोक 26 (skanda.8.2.26)
नारदाख्यागमश्चैव तारकप्रेषितस्य ह । वधश्च तारकस्योग्रो यात्रा भद्रवटस्य च
nāradākhyāgamaścaiva tārakapreṣitasya ha | vadhaśca tārakasyogro yātrā bhadravaṭasya ca
तारक द्वारा भेजे गए नारद नामक (दूत) के आगमन का, तारक के भीषण वध का तथा भद्रवट की यात्रा का भी वर्णन होगा।
श्लोक 27 (skanda.8.2.27)
महिषस्य वधश्चैव क्रौञ्चस्य च निबर्हणम् । शक्तेरुद्धरणं चैव तारकस्य वधः शुभः
mahiṣasya vadhaścaiva krauñcasya ca nibarhaṇam | śakteruddharaṇaṁ caiva tārakasya vadhaḥ śubhaḥ
महिष के वध का, क्रौञ्च के विनाश का, शक्ति के उद्धरण का तथा तारक के शुभ वध का भी वर्णन होगा।
श्लोक 28 (skanda.8.2.28)
देवासुरभयोत्पत्तिस्त्रैपुरं युद्धमेव च । प्रह्लादविग्रहश्चैव कृतघ्नाख्यानमेव च । महाभाग्यं ब्राह्मणानां विस्तरेण प्रकीर्त्यते
devāsurabhayotpattistraipuraṁ yuddhameva ca | prahlādavigrahaścaiva kṛtaghnākhyānameva ca | mahābhāgyaṁ brāhmaṇānāṁ vistareṇa prakīrtyate
देव-असुरों में भय की उत्पत्ति का, त्रिपुर-युद्ध का, प्रह्लाद के विग्रह का तथा कृतघ्न के आख्यान का वर्णन होगा, और ब्राह्मणों के महाभाग्य का विस्तारपूर्वक कीर्तन किया जाएगा।
श्लोक 29 (skanda.8.2.29)
एतज्ज्ञात्वा यथावद्धि कुमारानुचरो भवेत् । बलवान्मतिसम्पन्नः पुत्रं चाप्नोति संमतम्
etajjñātvā yathāvaddhi kumārānucaro bhavet | balavānmatisampannaḥ putraṁ cāpnoti saṁmatam
इसे यथावत् जानकर मनुष्य कुमार का अनुचर बन जाता है, बलवान् और बुद्धिसम्पन्न होता है तथा सम्मत (उत्तम) पुत्र प्राप्त करता है।