अम्बिका खण्ड · अध्याय 3
ब्रह्मा का प्राजापत्य अभिषेक
श्लोक 1 (skanda.8.3.1)
सनत्कुमार उवाच । शृणुष्वेमां कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशनीम् । कथ्यमानां मया चित्रां बह्वर्थां श्रुतिसंमिताम् । यां श्रुत्वा पापकर्मापि गच्छेच्च परमां गतिम्
sanatkumāra uvāca | śṛṇuṣvemāṁ kathāṁ divyāṁ sarvapāpapraṇāśanīm | kathyamānāṁ mayā citrāṁ bahvarthāṁ śrutisaṁmitām | yāṁ śrutvā pāpakarmāpi gacchecca paramāṁ gatim
सनत्कुमार ने कहा — इस दिव्य, सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली, अद्भुत, बहुअर्थयुक्त तथा श्रुति के अनुरूप कथा को सुनिए, जिसे मैं कह रहा हूँ, जिसे सुनकर पापकर्म करने वाला भी परम गति को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.8.3.2)
न नास्तिकाश्रद्दधाने शठे चापि कथंचन । इमां कथामनुब्रूयात्तथा चासूयके नरे
na nāstikāśraddadhāne śaṭhe cāpi kathaṁcana | imāṁ kathāmanubrūyāttathā cāsūyake nare
यह कथा नास्तिक, अश्रद्धालु, धूर्त तथा असूयायुक्त (द्वेषी) मनुष्य को किसी भी प्रकार से नहीं कहनी चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.8.3.3)
इदं पुत्राय शिष्याय धार्मिकायानसूयवे । कथनीयं महाब्रह्मन्देवभक्ताय वा भवेत्
idaṁ putrāya śiṣyāya dhārmikāyānasūyave | kathanīyaṁ mahābrahmandevabhaktāya vā bhavet
हे महाब्रह्मन्! यह कथा पुत्र को, शिष्य को, धार्मिक और असूयारहित व्यक्ति को, अथवा देवभक्त को कहनी चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.8.3.4)
कथनीयं सदा ब्रह्मन् देवभक्ताय वा भवेत् । कुमारभक्ताय तथा श्रद्दधानाय चैव हि
kathanīyaṁ sadā brahman devabhaktāya vā bhavet | kumārabhaktāya tathā śraddadhānāya caiva hi
हे ब्रह्मन्! यह सदा देवभक्त को, तथा कुमार-भक्त एवं श्रद्धावान् व्यक्ति को भी कहनी चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.8.3.5)
सदा वाच्यमिदं गुह्यं यतीनां भावितात्मनाम् । ततः प्रोवाच तत्सर्वं प्रपन्नेनान्तरात्मना
sadā vācyamidaṁ guhyaṁ yatīnāṁ bhāvitātmanām | tataḥ provāca tatsarvaṁ prapannenāntarātmanā
यह गोपनीय कथा सदा शुद्ध-अन्तःकरण वाले यतियों को कहनी चाहिए। तत्पश्चात् उन्होंने शरणागत अन्तरात्मा से वह सब कुछ कहा।
श्लोक 6 (skanda.8.3.6)
पुरा ब्रह्मा प्रजा त्वष्टुरण्डेऽस्मिन् संप्रसूयत । सोऽज्ञानात् पितरं ब्रह्मा न वेद तमसावृतः
purā brahmā prajā tvaṣṭuraṇḍe'smin saṁprasūyata | so'jñānāt pitaraṁ brahmā na veda tamasāvṛtaḥ
प्राचीन काल में ब्रह्मा एक प्रजा (सृष्ट प्राणी) के रूप में इस त्वष्टा के अण्डे में उत्पन्न हुए। अज्ञानवश तम से आवृत उन ब्रह्मा ने अपने पिता को नहीं जाना।
श्लोक 7 (skanda.8.3.7)
अहमेक इति ज्ञात्वा सर्व्वांल्लोकानवैक्षत । न चापश्यत तत्रान्यं तपोयोगबलान्वितः
ahameka iti jñātvā sarvvāṁllokānavaikṣata | na cāpaśyata tatrānyaṁ tapoyogabalānvitaḥ
'मैं ही अकेला हूँ' — ऐसा समझकर उन्होंने समस्त लोकों को देखा, परन्तु तप और योगबल से सम्पन्न होते हुए भी उन्हें वहाँ कोई अन्य दिखाई नहीं दिया।
श्लोक 8 (skanda.8.3.8)
पुत्रपुत्रेति चाप्युक्तो ब्रह्मा शर्वेण धीमता । प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा तमेव शरणं गतः
putraputreti cāpyukto brahmā śarveṇa dhīmatā | praṇataḥ prāñjalirbhūtvā tameva śaraṇaṁ gataḥ
जब बुद्धिमान् शर्व (शिव) ने ब्रह्मा को 'पुत्र, पुत्र' कहकर सम्बोधित किया, तब वे नतमस्तक होकर हाथ जोड़े हुए उन्हीं की शरण में गए।
श्लोक 9 (skanda.8.3.9)
स दत्त्वा ब्रह्मणे शम्भुः स्रष्टृत्वं ज्ञानसंहितम् । विभुत्वं चैव लोकानामन्तर्दधे परमेश्वरः
sa dattvā brahmaṇe śambhuḥ sraṣṭṛtvaṁ jñānasaṁhitam | vibhutvaṁ caiva lokānāmantardadhe parameśvaraḥ
शम्भु ने ब्रह्मा को ज्ञानसहित सृष्टिकर्तृत्व और लोकों का विभुत्व (आधिपत्य) प्रदान करके, वे परमेश्वर अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 10 (skanda.8.3.10)
तदेषोपनिषत् प्रोक्ता मया व्यास सनातनी । यां श्रुत्वा योगिनो ध्यानात् प्रपद्यन्ते महेश्वरम्
tadeṣopaniṣat proktā mayā vyāsa sanātanī | yāṁ śrutvā yogino dhyānāt prapadyante maheśvaram
इस प्रकार, हे व्यास! मैंने यह सनातन उपनिषद् कही है, जिसे सुनकर योगीजन ध्यान से महेश्वर को प्राप्त हो जाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.8.3.11)
यो ब्रह्माणं विदधे पुत्रमग्रे ज्ञानञ्च यः प्रहिणोति स्म तस्मै । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्
yo brahmāṇaṁ vidadhe putramagre jñānañca yaḥ prahiṇoti sma tasmai | tamātmasthaṁ ye'nupaśyanti dhīrāsteṣāṁ śāntiḥ śāśvatī netareṣām
जिसने पहले ब्रह्मा को पुत्र रूप में रचा और उन्हें ज्ञान प्रदान किया, उस आत्मस्थ परमेश्वर को जो धीर पुरुष देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य को नहीं।
श्लोक 12 (skanda.8.3.12)
स व्यास पितरं दृष्ट्वा दीप्त्या परमया युतम् । पुत्रकामः प्रजाहेतोस्तपस्तीव्रं चचार ह
sa vyāsa pitaraṁ dṛṣṭvā dīptyā paramayā yutam | putrakāmaḥ prajāhetostapastīvraṁ cacāra ha
हे व्यास! अपने पिता को परम तेज से युक्त देखकर, ब्रह्मा ने प्रजा के लिए पुत्र की कामना से तीव्र तपस्या की।
श्लोक 13 (skanda.8.3.13)
तस्योग्रयोगतपसा युक्तस्य सुमहात्मनः । अचिरेणैव कालेन पिता संप्रतुतोष ह
tasyograyogatapasā yuktasya sumahātmanaḥ | acireṇaiva kālena pitā saṁpratutoṣa ha
उग्र योग-तप से युक्त उस महात्मा से पिता (शम्भु) अल्प काल में ही अत्यन्त प्रसन्न हो गए।
श्लोक 14 (skanda.8.3.14)
दर्शनं चागमत्तस्य वरदोऽस्मीत्युवाच च । स तुष्टाव नतो भूत्वा कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्
darśanaṁ cāgamattasya varado'smītyuvāca ca | sa tuṣṭāva nato bhūtvā kṛtvā śirasi cāñjalim
उनका दर्शन ब्रह्मा को प्राप्त हुआ, और उन्होंने कहा — 'मैं वरदाता हूँ।' तब ब्रह्मा ने नतमस्तक होकर, सिर पर अंजलि बाँधकर उनकी स्तुति की।
श्लोक 15 (skanda.8.3.15)
नमः परमदेवाय देवानामपि वेधसे । स्रष्ट्रे वै लोकतन्त्राय ब्रह्मणः पतये नमः
namaḥ paramadevāya devānāmapi vedhase | sraṣṭre vai lokatantrāya brahmaṇaḥ pataye namaḥ
उन परमदेव को नमस्कार है, जो देवताओं के भी विधाता हैं; लोकतन्त्र के स्रष्टा तथा ब्रह्मा के स्वामी को नमस्कार है।
श्लोक 16 (skanda.8.3.16)
एकस्मै शक्तियुक्ताय आसक्तिरहिताय च । अनन्तायाप्रमेयाय इन्द्रियाविषयाय च
ekasmai śaktiyuktāya āsaktirahitāya ca | anantāyāprameyāya indriyāviṣayāya ca
उस एक, शक्तियुक्त, आसक्तिरहित, अनन्त, अप्रमेय और इन्द्रियों के विषय से परे उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 17 (skanda.8.3.17)
व्यापिने व्याप्तपूर्वाय अधिष्ठात्रे प्रचोदिने । कृतप्रचोदनायैव तत्त्वविन्यासकारिणे
vyāpine vyāptapūrvāya adhiṣṭhātre pracodine | kṛtapracodanāyaiva tattvavinyāsakāriṇe
व्यापक, पूर्व से ही व्याप्त, अधिष्ठाता, प्रेरक, स्वयं प्रेरित तथा तत्त्वों की रचना करने वाले उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 18 (skanda.8.3.18)
प्रधानचोदकायैव गुणानां शक्तिदाय च । दृष्टिदाय च सर्वेषां स्वयं वै दर्शनाय च
pradhānacodakāyaiva guṇānāṁ śaktidāya ca | dṛṣṭidāya ca sarveṣāṁ svayaṁ vai darśanāya ca
प्रधान (प्रकृति) के प्रेरक, गुणों को शक्ति देने वाले, सबको दृष्टि देने वाले तथा स्वयं दर्शन के विषय बनने वाले उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 19 (skanda.8.3.19)
विषयग्राहिणे चैव नियमस्य च कारिणे । मनसः करणानां च कर्त्रे वै निगमस्य च
viṣayagrāhiṇe caiva niyamasya ca kāriṇe | manasaḥ karaṇānāṁ ca kartre vai nigamasya ca
विषयों को ग्रहण करने वाले, नियम के कर्ता, मन तथा इन्द्रियों के तथा निगम (वेद) के भी कर्ता उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 20 (skanda.8.3.20)
भूतानां गुणकर्त्रे च शक्तिदाय तथैव च । कर्त्रे ह्यण्डस्य मह्यञ्च अचिन्त्यायाग्रजाय च
bhūtānāṁ guṇakartre ca śaktidāya tathaiva ca | kartre hyaṇḍasya mahyañca acintyāyāgrajāya ca
प्राणियों के गुणों के कर्ता, शक्ति के दाता, अण्ड तथा पृथ्वी के कर्ता, अचिन्त्य और अग्रज उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 21 (skanda.8.3.21)
अप्रमेय पितर्नित्यं प्रीतो नो दिश शक्वरीम् । अप्रमेयगुणैश्वर्यशक्तयेव्याहताय वै
aprameya pitarnityaṁ prīto no diśa śakvarīm | aprameyaguṇaiśvaryaśaktayevyāhatāya vai
हे अप्रमेय, नित्य पिता! प्रसन्न होकर हमें बल प्रदान कीजिए — जिनकी अप्रमेय गुण, ऐश्वर्य और शक्ति कहीं भी बाधित नहीं होती, उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 22 (skanda.8.3.22)
तस्यैवं स्तुवतो व्यास देवदेवो महेश्वरः । तुष्टोऽब्रवीत् स्वयं पुत्रं ब्रह्माणं प्रणतं तदा
tasyaivaṁ stuvato vyāsa devadevo maheśvaraḥ | tuṣṭo'bravīt svayaṁ putraṁ brahmāṇaṁ praṇataṁ tadā
हे व्यास! इस प्रकार स्तुति करने पर देवाधिदेव महेश्वर प्रसन्न होकर तब स्वयं अपने नतमस्तक पुत्र ब्रह्मा से बोले।
श्लोक 23 (skanda.8.3.23)
यस्मात्ते विदितं वत्स सूक्ष्ममेतन्महाद्युते । तस्माद् ब्रह्मेति लोकेषु नाम्ना ख्यातिं गमिष्यसि
yasmātte viditaṁ vatsa sūkṣmametanmahādyute | tasmād brahmeti lokeṣu nāmnā khyātiṁ gamiṣyasi
हे महाद्युते वत्स! चूँकि तुमने इस सूक्ष्म तत्त्व को जान लिया है, इसलिए लोकों में तुम 'ब्रह्मा' नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त होगे।
श्लोक 24 (skanda.8.3.24)
यस्माच्चाहं पितेत्युक्तस्त्वया बुद्धिमतां वर । तस्मात् पितामहत्वं ते लोके ख्यातिं गमिष्यति
yasmāccāhaṁ pitetyuktastvayā buddhimatāṁ vara | tasmāt pitāmahatvaṁ te loke khyātiṁ gamiṣyati
हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! और चूँकि तुमने मुझे 'पिता' कहा है, इसलिए लोक में तुम्हारा पितामहत्व प्रसिद्ध होगा।
श्लोक 25 (skanda.8.3.25)
प्रजार्थं यच्च ते तप्तं तप उग्रं सुदुश्चरम् । तस्मात्प्रजापतित्वं ते ददामि प्रयतात्मने
prajārthaṁ yacca te taptaṁ tapa ugraṁ suduścaram | tasmātprajāpatitvaṁ te dadāmi prayatātmane
और प्रजा के लिए तुमने जो उग्र एवं अत्यन्त दुष्कर तप किया है, इसलिए हे प्रयतात्मा! मैं तुम्हें प्रजापतित्व प्रदान करता हूँ।
श्लोक 26 (skanda.8.3.26)
एवमुक्त्वा स देवेशो सृजन्मूर्त्तिमतीः स्त्रियः । यास्ताः प्रकृतयस्त्वष्टौ विकारा इन्द्रियैः सह
evamuktvā sa deveśo sṛjanmūrttimatīḥ striyaḥ | yāstāḥ prakṛtayastvaṣṭau vikārā indriyaiḥ saha
ऐसा कहकर उन देवेश ने मूर्तिमती स्त्रियों की सृष्टि की — वे आठ प्रकृतियाँ, अपने विकारों और इन्द्रियों सहित।
श्लोक 27 (skanda.8.3.27)
भावाश्च सर्वे ते देवमुपतस्थुः स्वरूपिणः । तानुवाच ततो देवः पतिं युक्तः स्वतेजसा
bhāvāśca sarve te devamupatasthuḥ svarūpiṇaḥ | tānuvāca tato devaḥ patiṁ yuktaḥ svatejasā
वे सभी भाव अपने-अपने स्वरूप में उन देव के समीप उपस्थित हुए। तब अपने तेज से युक्त देव ने उनसे उनके स्वामी के विषय में कहा।
श्लोक 28 (skanda.8.3.28)
एतमद्याभिषेकेण सम्पादयत मा चिरम् । ताभिः स्वं स्वं समादाय भावं दिव्यमतर्कितम्
etamadyābhiṣekeṇa sampādayata mā ciram | tābhiḥ svaṁ svaṁ samādāya bhāvaṁ divyamatarkitam
'इस अभिषेक द्वारा आज इसे बिना विलम्ब सिद्ध करो' — उन शक्तियों ने अपना-अपना अतर्कित दिव्य भाव लेकर उसे अर्पित किया।
श्लोक 29 (skanda.8.3.29)
अभिषिक्तो बभूवेह प्रजापतिरतिद्युतिः । तत्रेमं योगिनः सूक्ष्मं दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा
abhiṣikto babhūveha prajāpatiratidyutiḥ | tatremaṁ yoginaḥ sūkṣmaṁ dṛṣṭvā divyena cakṣuṣā
इस प्रकार यहाँ अत्यन्त तेजस्वी प्रजापति (ब्रह्मा) अभिषिक्त हुए। वहाँ योगिजनों ने दिव्य नेत्र से उनके सूक्ष्म स्वरूप को देखकर...
श्लोक 30 (skanda.8.3.30)
पुराणं योगतत्त्वज्ञा गायन्ति त्रिगुणान्वितम् । रुद्रः स्रष्टा हि सर्वेषां भूतानां तव च प्रभो
purāṇaṁ yogatattvajñā gāyanti triguṇānvitam | rudraḥ sraṣṭā hi sarveṣāṁ bhūtānāṁ tava ca prabho
...योगतत्त्ववेत्ता उन त्रिगुणयुक्त पुराण पुरुष का गायन करते हैं — 'हे प्रभो! रुद्र ही समस्त प्राणियों के तथा आपके भी स्रष्टा हैं।'
श्लोक 31 (skanda.8.3.31)
अस्माभिश्च भवान् सार्द्धं जगतः संप्रवर्त्तकः । स देवस्तोषितः सम्यक् परमैश्वर्ययोगधृक् । ब्रह्माणमग्रजं पुत्रं प्राजापत्येऽभ्यषेचयत्
asmābhiśca bhavān sārddhaṁ jagataḥ saṁpravarttakaḥ | sa devastoṣitaḥ samyak paramaiśvaryayogadhṛk | brahmāṇamagrajaṁ putraṁ prājāpatye'bhyaṣecayat
'और आप हमारे साथ मिलकर जगत् के प्रवर्तक हैं' — परम ऐश्वर्य और योग को धारण करने वाले उन देव ने सम्यक् रूप से प्रसन्न होकर अपने ज्येष्ठ पुत्र ब्रह्मा को प्राजापत्य पद पर अभिषिक्त किया।
श्लोक 32 (skanda.8.3.32)
यः कृत्वा बहुविधमार्गयोगयुक्तं तन्वाख्यं जगदिदमादराद्युयोज । तं देवं परममनन्तयोगयुक्तं मायाभिः त्रिभुवनबन्धुमप्रमादम्
yaḥ kṛtvā bahuvidhamārgayogayuktaṁ tanvākhyaṁ jagadidamādarādyuyoja | taṁ devaṁ paramamanantayogayuktaṁ māyābhiḥ tribhuvanabandhumapramādam
जिसने योग के अनेक मार्गों से युक्त इस 'तनु' नामक जगत् की रचना करके आदरपूर्वक इसे संयोजित किया, उन परम, अनन्त योग से युक्त, अपनी मायाशक्तियों से त्रिभुवन के बन्धु तथा अप्रमाद (सतत जागरूक) उन देव को...
श्लोक 33 (skanda.8.3.33)
सर्वेषां मनसि सदावतिष्ठमानं पश्यन्तं शुभमशुभं च भूतनाथम् । तं देवं प्रणतगतिं प्रणम्य भक्त्या नित्यं वै शरणमुपैमि सूक्ष्मसूक्ष्मम्
sarveṣāṁ manasi sadāvatiṣṭhamānaṁ paśyantaṁ śubhamaśubhaṁ ca bhūtanātham | taṁ devaṁ praṇatagatiṁ praṇamya bhaktyā nityaṁ vai śaraṇamupaimi sūkṣmasūkṣmam
...जो सदा समस्त प्राणियों के मन में स्थित रहकर शुभ और अशुभ को देखते हैं, वे भूतनाथ हैं — शरणागतों की गति उन देव को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके मैं सदा उस सूक्ष्मतम की शरण में जाता हूँ।