अम्बिका खण्ड · अध्याय 4
षट्कुलों की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.8.4.1)
सनत्कुमार उवाच। प्राजापत्यं ततो लब्ध्वा प्रजाः स्रष्टुं प्रचक्रमे । प्रजास्ताः सृज्यमानाश्च न विवर्धन्ति तस्य ह
sanatkumāra uvāca| prājāpatyaṁ tato labdhvā prajāḥ sraṣṭuṁ pracakrame | prajāstāḥ sṛjyamānāśca na vivardhanti tasya ha
सनत्कुमार ने कहा — प्रजापति पद पाकर ब्रह्मा ने प्रजाओं की सृष्टि करना आरम्भ किया, किन्तु उत्पन्न की गई वे प्रजाएँ बढ़ नहीं रही थीं।
श्लोक 2 (skanda.8.4.2)
स कुर्वाणस्तथा सृष्टिं शक्तिहीनः पितामहः । सृष्ट्यर्थं भूय एवाथ तपश्चर्तुं प्रचक्रमे
sa kurvāṇastathā sṛṣṭiṁ śaktihīnaḥ pitāmahaḥ | sṛṣṭyarthaṁ bhūya evātha tapaścartuṁ pracakrame
इस प्रकार सृष्टि करते हुए भी शक्तिहीन पितामह ने सृष्टि की सिद्धि के लिये पुनः तपस्या करना आरम्भ किया।
श्लोक 3 (skanda.8.4.3)
सृष्टिहेतोस्तपस्तस्य ज्ञात्वा त्रिभुवनेश्वरः । तेजसा जगदाविश्य आजगाम तदन्तिकम्
sṛṣṭihetostapastasya jñātvā tribhuvaneśvaraḥ | tejasā jagadāviśya ājagāma tadantikam
उसके सृष्टि हेतु किये गये तप को जानकर त्रिभुवनेश्वर अपने तेज से जगत् में व्याप्त होकर उसके समीप आ गये।
श्लोक 4 (skanda.8.4.4)
स्रष्टा तस्य जगन्नाथो दर्शयत्स्वतनौ जगत् । महायोगबलैश्वर्यो ज्ञानसिद्धगणावृतः
sraṣṭā tasya jagannātho darśayatsvatanau jagat | mahāyogabalaiśvaryo jñānasiddhagaṇāvṛtaḥ
उस सृष्टिकर्ता जगन्नाथ ने महायोग के बल-ऐश्वर्य से युक्त तथा ज्ञानसिद्ध गणों से घिरे हुए अपने ही शरीर में सम्पूर्ण जगत् दिखा दिया।
श्लोक 5 (skanda.8.4.5)
स्वयमागत्य देवेशो महाभूतपतिर्हरः । व्याप्येव हि जगत् कृत्स्नं परमेण स्वतेजसा
svayamāgatya deveśo mahābhūtapatirharaḥ | vyāpyeva hi jagat kṛtsnaṁ parameṇa svatejasā
देवताओं के स्वामी, महाभूतों के अधिपति हर स्वयं वहाँ पधारकर अपने परम तेज से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर गये।
श्लोक 6 (skanda.8.4.6)
शम्भुः प्राह वरं वत्स याचस्वेति पितामहम् । तं ब्रह्मा लोकसृष्ट्यर्थं पुत्रत्वे मनसा वरीत्
śambhuḥ prāha varaṁ vatsa yācasveti pitāmaham | taṁ brahmā lokasṛṣṭyarthaṁ putratve manasā varīt
शम्भु ने कहा — 'हे वत्स! वर माँगो।' तब ब्रह्मा ने लोकों की सृष्टि के लिये मन ही मन उन्हें पुत्र रूप में वरण कर लिया।
श्लोक 7 (skanda.8.4.7)
स ज्ञात्वा तस्य संकल्पं ब्रह्मणः परमेश्वरः । मूढोयमिति सञ्चिन्त्य प्रोवाच वरदः स्वयम्
sa jñātvā tasya saṁkalpaṁ brahmaṇaḥ parameśvaraḥ | mūḍhoyamiti sañcintya provāca varadaḥ svayam
ब्रह्मा के उस संकल्प को जानकर परमेश्वर ने 'यह मोहग्रस्त है' ऐसा सोचकर स्वयं वरदाता होते हुए भी यह कहा।
श्लोक 8 (skanda.8.4.8)
आगतं पितरं मा त्वं यस्मात् पुत्रं समीहसे । मन्मूर्त्तिस्तनयस्तस्माद् भविष्यति ममाज्ञया
āgataṁ pitaraṁ mā tvaṁ yasmāt putraṁ samīhase | manmūrttistanayastasmād bhaviṣyati mamājñayā
'चूँकि तुम पिता के समान आये हुए मुझसे पुत्र की कामना कर रहे हो, इसलिए यह याचना मुझसे साक्षात् मत करो — मेरी ही आज्ञा से मेरी मूर्ति ही तुम्हारा पुत्र बनेगी।'
श्लोक 9 (skanda.8.4.9)
स च ते पुत्रतां यात्वा मदीयो गणनायकः । रुद्रो विग्रहवान् भूत्वा मूढं त्वां विनयिष्यति
sa ca te putratāṁ yātvā madīyo gaṇanāyakaḥ | rudro vigrahavān bhūtvā mūḍhaṁ tvāṁ vinayiṣyati
'वह तुम्हारा पुत्र बनकर मेरा ही गणनायक होगा और शरीरधारी रुद्र के रूप में हे मूढ़! तुम्हें अनुशासित करेगा।'
श्लोक 10 (skanda.8.4.10)
सर्वविद्याधिपत्यं च योगानां चैव सर्वशः । बलस्याधिपतित्वं च अस्त्राणां च प्रयोक्तृता
sarvavidyādhipatyaṁ ca yogānāṁ caiva sarvaśaḥ | balasyādhipatitvaṁ ca astrāṇāṁ ca prayoktṛtā
'सभी विद्याओं तथा योगों पर पूर्ण आधिपत्य, बल का आधिपत्य, और अस्त्रों के प्रयोग की सामर्थ्य [मैं उसे प्रदान करता हूँ]।'
श्लोक 11 (skanda.8.4.11)
मया दत्तानि तस्याशु उपस्थास्यन्ति सर्वशः । धनुः पिनाकः शूलं च खङ्गः परशुरेव च
mayā dattāni tasyāśu upasthāsyanti sarvaśaḥ | dhanuḥ pinākaḥ śūlaṁ ca khaṅgaḥ paraśureva ca
'मेरे द्वारा दिये गये ये सभी शीघ्र ही उसकी सेवा में उपस्थित होंगे — धनुष पिनाक, त्रिशूल, खड्ग और परशु।'
श्लोक 12 (skanda.8.4.12)
कमण्डलुस्तथा दण्ड अस्त्रं पाशुपतं तथा । संवर्त्तकाशनिश्चैव चक्रं च प्रतिसर्गिकम्
kamaṇḍalustathā daṇḍa astraṁ pāśupataṁ tathā | saṁvarttakāśaniścaiva cakraṁ ca pratisargikam
'कमण्डलु, दण्ड, पाशुपत अस्त्र, संवर्तक वज्र के समान अस्त्र, तथा प्रतिसर्गिक नामक चक्र भी [उसे प्राप्त होंगे]।'
श्लोक 13 (skanda.8.4.13)
एवं सर्वद्धिसंपन्नः सुतस्ते स भविष्यति । एवमुक्त्वा गते तस्मिन्नन्तर्धानं महात्मनि
evaṁ sarvaddhisaṁpannaḥ sutaste sa bhaviṣyati | evamuktvā gate tasminnantardhānaṁ mahātmani
'इस प्रकार तुम्हारा पुत्र समस्त ऋद्धियों से सम्पन्न होगा।' ऐसा कहकर वह महात्मा वहीं से अन्तर्धान हो गये।
श्लोक 14 (skanda.8.4.14)
ब्रह्मा चक्रे तदा चेष्टिं पुत्रकामः प्रजापतिः । स जुह्वञ्छ्रमसंयुक्तः प्रतिघातसमन्वितः
brahmā cakre tadā ceṣṭiṁ putrakāmaḥ prajāpatiḥ | sa juhvañchramasaṁyuktaḥ pratighātasamanvitaḥ
तब पुत्र की कामना करते हुए प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ-अनुष्ठान किया; वे श्रम से युक्त होकर तथा किसी प्रतिघात के साथ हवन कर रहे थे।
श्लोक 15 (skanda.8.4.15)
समिद्युक्तेन हस्तेन ललाटं प्रममार्ज ह । समित्संयोगजस्तस्य स्वेदबिन्दुर्ललाटजः
samidyuktena hastena lalāṭaṁ pramamārja ha | samitsaṁyogajastasya svedabindurlalāṭajaḥ
समिधा से युक्त हाथ से उन्होंने अपना ललाट पोंछा; उस स्पर्श से उत्पन्न पसीने की बूँद उनके ललाट पर बन गयी।
श्लोक 16 (skanda.8.4.16)
पपात ज्वलने तस्मिन् द्विगुणं तस्य तेजसा । तद्धि माहेश्वरं तेजः सन्धितं ब्रह्मणि स्रुतम्
papāta jvalane tasmin dviguṇaṁ tasya tejasā | taddhi māheśvaraṁ tejaḥ sandhitaṁ brahmaṇi srutam
वह उस अग्नि में गिरी, अपने तेज से दुगुनी होकर; क्योंकि वह वस्तुतः माहेश्वर तेज ही था, जो ब्रह्मा में संधित होकर प्रवाहित हुआ था।
श्लोक 17 (skanda.8.4.17)
प्रेरितं देवदेवेन निपपात हविर्भुजि । क्षणे तस्मिन्महेशेन स्मृत्वा तं वरमुत्तमम्
preritaṁ devadevena nipapāta havirbhuji | kṣaṇe tasminmaheśena smṛtvā taṁ varamuttamam
देवताओं के देव द्वारा प्रेरित होकर वह हविर्भोजी अग्नि में गिर पड़ी; उसी क्षण महेश ने अपने उस उत्तम वरदान का स्मरण करते हुए,
श्लोक 18 (skanda.8.4.18)
प्रेषितो गणपो रुद्रः सद्य एवाभवत् तदा । तच्च संस्वेदजं तेजः पूर्वं ज्वलनयोजितम्
preṣito gaṇapo rudraḥ sadya evābhavat tadā | tacca saṁsvedajaṁ tejaḥ pūrvaṁ jvalanayojitam
...रुद्र को गणपति के रूप में भेजा; वे उसी क्षण वहाँ उत्पन्न हो गये। वह पसीने से उत्पन्न तथा पहले अग्नि से प्रज्वलित हुआ तेज,
श्लोक 19 (skanda.8.4.19)
भूत्वा लोहितमाश्वेव पुनर्नीलमभूत्तदा । नीललोहित इत्वेव तेनासावभवत् प्रभुः
bhūtvā lohitamāśveva punarnīlamabhūttadā | nīlalohita itveva tenāsāvabhavat prabhuḥ
शीघ्र ही लाल होकर पुनः नीला हो गया; इस प्रकार वे प्रभु 'नीललोहित' (नीला-लाल) कहलाये।
श्लोक 20 (skanda.8.4.20)
त्र्यक्षो दशभुजः श्रीमान् ब्रह्माणं छादयन्निव । शर्वाद्यैर्न्नामभिर्ब्रह्मा तनूभिश्च जलादिभिः
tryakṣo daśabhujaḥ śrīmān brahmāṇaṁ chādayanniva | śarvādyairnnāmabhirbrahmā tanūbhiśca jalādibhiḥ
त्रिनेत्र, दशभुजा, तेजस्वी, मानो ब्रह्मा को भी आच्छादित करते हुए; ब्रह्मा ने उन्हें शर्व आदि नामों तथा जल आदि तत्त्वों से बने शरीर प्रदान किये।
श्लोक 21 (skanda.8.4.21)
स्तुत्वा तं सर्वगं देवं नीललोहितमव्ययम् । ज्ञात्वा सर्वसृजं पश्चान्महाभूतप्रतिष्ठतम्
stutvā taṁ sarvagaṁ devaṁ nīlalohitamavyayam | jñātvā sarvasṛjaṁ paścānmahābhūtapratiṣṭhatam
उस सर्वव्यापी, अव्यय नीललोहित देव की स्तुति करके तथा उन्हें आगे चलकर महाभूतों में प्रतिष्ठित सर्वस्रष्टा जानकर,
श्लोक 22 (skanda.8.4.22)
असृजद्विविधास्त्वन्याः प्रजाः स जगति प्रभुः । सोपि योगं समास्थाय ऐश्वर्येण समन्वितः
asṛjadvividhāstvanyāḥ prajāḥ sa jagati prabhuḥ | sopi yogaṁ samāsthāya aiśvaryeṇa samanvitaḥ
...उस प्रभु ने जगत् में नाना प्रकार की अन्य प्रजाओं की सृष्टि की; वे स्वयं भी ऐश्वर्य से युक्त होकर योग का आश्रय लेने लगे।
श्लोक 23 (skanda.8.4.23)
लोकान्सर्वान्समाविश्य धारयामास सर्वदा । ब्रह्मणोपि ततः पुत्रा दक्षधर्मादयः शुभाः
lokānsarvānsamāviśya dhārayāmāsa sarvadā | brahmaṇopi tataḥ putrā dakṣadharmādayaḥ śubhāḥ
समस्त लोकों में व्याप्त होकर वे सदैव उन्हें धारण करते रहे। ब्रह्मा से भी तब दक्ष, धर्म आदि शुभ पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 24 (skanda.8.4.24)
असृज्यन्त प्रजास्सर्वा देवमानुषसंकुलाः । अथ कालेन महता कल्पेतीते पुनः पुनः
asṛjyanta prajāssarvā devamānuṣasaṁkulāḥ | atha kālena mahatā kalpetīte punaḥ punaḥ
देवताओं और मनुष्यों से भरी हुई समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुईं। फिर महाकाल बीतने पर बार-बार कल्प समाप्त होते रहे,
श्लोक 25 (skanda.8.4.25)
प्रजा धारयतो योगादस्मिन्कल्प उपस्थिते । प्रतिष्ठितायां वार्तायां प्रवृत्ते सृष्टिसर्जने
prajā dhārayato yogādasminkalpa upasthite | pratiṣṭhitāyāṁ vārtāyāṁ pravṛtte sṛṣṭisarjane
...योग से प्रजाओं को धारण करते हुए, जब यह वर्तमान कल्प आया और लोक-व्यवस्था पुनः स्थापित हो गई तथा प्राणियों की सृष्टि चल रही थी,
श्लोक 26 (skanda.8.4.26)
प्रजासु च विवृद्धासु प्रयागे यजतश्च ह । ब्रह्मणः षट्कुलीयास्ते ऋषयः शंसितव्रताः
prajāsu ca vivṛddhāsu prayāge yajataśca ha | brahmaṇaḥ ṣaṭkulīyāste ṛṣayaḥ śaṁsitavratāḥ
...प्रजाओं की अत्यधिक वृद्धि हो जाने पर, जब ब्रह्मा प्रयाग में यज्ञ कर रहे थे, उनके षट्कुलीय, शंसित-व्रत ऋषि वहाँ आये।
श्लोक 27 (skanda.8.4.27)
मरीचयोत्रयश्चैव वसिष्ठाः क्रतवस्तथा । भृगवोङ्गिरसश्चैव तपसा दग्धकिल्बिषाः
marīcayotrayaścaiva vasiṣṭhāḥ kratavastathā | bhṛgavoṅgirasaścaiva tapasā dagdhakilbiṣāḥ
मरीचि और अत्रि, वसिष्ठ और क्रतु, तथा भृगु और अंगिरा — जिनके पाप तपस्या से भस्म हो चुके थे —
श्लोक 28 (skanda.8.4.28)
ऊचुर्ब्रह्माणमभ्येत्य सहिताः कर्मणोन्तरे । भगवन्नन्धकारेण महता स्मः समावृताः
ūcurbrahmāṇamabhyetya sahitāḥ karmaṇontare | bhagavannandhakāreṇa mahatā smaḥ samāvṛtāḥ
...यज्ञ के मध्य में ब्रह्मा के पास एकत्र होकर बोले — 'हे भगवन्! हम एक महान् अन्धकार से घिरे हुए हैं।'
श्लोक 29 (skanda.8.4.29)
खिन्ना विवदमानाश्च न च पश्याम यत्परम् । एतन्नः संशयं देव चिरं हृदि समास्थितम्
khinnā vivadamānāśca na ca paśyāma yatparam | etannaḥ saṁśayaṁ deva ciraṁ hṛdi samāsthitam
'खिन्न और परस्पर विवाद करते हुए हम उस परम तत्त्व को नहीं देख पा रहे हैं। हमारा यह संशय बहुत समय से हृदय में बना हुआ है।'
श्लोक 30 (skanda.8.4.30)
त्वं हि वेत्थ यथातत्त्वं कारणं परमं हि नः । किं परं सर्वभूतानां बलीयाँश्चापि सर्वतः
tvaṁ hi vettha yathātattvaṁ kāraṇaṁ paramaṁ hi naḥ | kiṁ paraṁ sarvabhūtānāṁ balīyā~ścāpi sarvataḥ
'आप ही यथार्थ रूप में हमारे परम कारण को जानते हैं — सम्पूर्ण भूतों में सर्वोपरि और सबसे बलवान् कौन है?'
श्लोक 31 (skanda.8.4.31)
केन चाधिष्ठितं विश्वं को नित्यः कश्च शाश्वतः । कः स्रष्टा सर्वभूतानां प्रकृतेश्च प्रवर्तकः
kena cādhiṣṭhitaṁ viśvaṁ ko nityaḥ kaśca śāśvataḥ | kaḥ sraṣṭā sarvabhūtānāṁ prakṛteśca pravartakaḥ
'यह विश्व किसके अधीन है? नित्य कौन है और शाश्वत कौन है? समस्त भूतों का स्रष्टा तथा प्रकृति का प्रवर्तक कौन है?'
श्लोक 32 (skanda.8.4.32)
कोस्मान् सर्वेषु कार्येषु प्रयुनक्ति महामनाः । कस्य भूतानि वश्यानि कः सर्वविनियोजकः
kosmān sarveṣu kāryeṣu prayunakti mahāmanāḥ | kasya bhūtāni vaśyāni kaḥ sarvaviniyojakaḥ
'महान् बुद्धि वाला वह कौन है जो हमें समस्त कार्यों में प्रवृत्त करता है? किसके अधीन सब प्राणी हैं, और सबका नियोजक कौन है?'
श्लोक 33 (skanda.8.4.33)
कथं पश्येम तञ्चैव एतन्नः शंस सर्वशः । एवमुक्तस्ततो ब्रह्मा सर्वेषामेव सन्निधौ
kathaṁ paśyema tañcaiva etannaḥ śaṁsa sarvaśaḥ | evamuktastato brahmā sarveṣāmeva sannidhau
'हम उसे कैसे देख सकते हैं? यह हमें पूर्णतः बताइये।' इस प्रकार पूछे जाने पर ब्रह्मा ने उन सबके समक्ष —
श्लोक 34 (skanda.8.4.34)
देवानां च ऋषीणां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । यक्षाणामसुराणां च ये च भूत प्रवर्त्तकाः
devānāṁ ca ṛṣīṇāṁ ca gandharvoragarakṣasām | yakṣāṇāmasurāṇāṁ ca ye ca bhūta pravarttakāḥ
देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों, नागों और राक्षसों, यक्षों और असुरों, तथा प्राणियों के जो भी अन्य प्रवर्तक थे, उन सबके समक्ष —
श्लोक 35 (skanda.8.4.35)
राक्षसानां सपिशाचानां ये चान्ये तत्समीपगाः । उत्थाय प्राञ्जलिः प्राह रुद्रेति त्रिःप्लुतं वचः
rākṣasānāṁ sapiśācānāṁ ye cānye tatsamīpagāḥ | utthāya prāñjaliḥ prāha rudreti triḥplutaṁ vacaḥ
राक्षसों और पिशाचों तथा जो भी अन्य वहाँ समीप उपस्थित थे — उन सबके सम्मुख ब्रह्मा खड़े होकर हाथ जोड़कर तीन बार दीर्घ स्वर में 'रुद्र' शब्द का उच्चारण किया।
श्लोक 36 (skanda.8.4.36)
स चापि तपसा शक्यो द्रष्टुं नान्येन केनचित् । सः स्रष्टा सर्वभूतानां बलवांश्चापि स स्मृतः
sa cāpi tapasā śakyo draṣṭuṁ nānyena kenacit | saḥ sraṣṭā sarvabhūtānāṁ balavāṁścāpi sa smṛtaḥ
'वे तपस्या से ही प्राप्त किये जा सकते हैं, अन्य किसी उपाय से नहीं; वे ही समस्त भूतों के स्रष्टा तथा बलवानों में श्रेष्ठ माने जाते हैं।'
श्लोक 37 (skanda.8.4.37)
तस्य वश्यानि भूतानि तेनेदं धार्यते जगत् । सर्वे ते नमश्चक्रुर्महात्मने
tasya vaśyāni bhūtāni tenedaṁ dhāryate jagat | sarve te namaścakrurmahātmane
'सभी प्राणी उनके अधीन हैं; उन्हीं के द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।' — और उन सब ने उस महात्मा को नमस्कार किया।
श्लोक 38 (skanda.8.4.38)
ऋषय ऊचुः। किं तन्महत्तपो देव येन दृश्येत स प्रभुः । तन्नो वदस्व देवेश वरदं चाभिधत्स्व नः
ṛṣaya ūcuḥ| kiṁ tanmahattapo deva yena dṛśyeta sa prabhuḥ | tanno vadasva deveśa varadaṁ cābhidhatsva naḥ
ऋषियों ने कहा — 'हे देव! वह कौन-सा महान् तप है, जिससे उन प्रभु का दर्शन हो सके? हे देवेश! यह हमें बताइये और वह वरदान दीजिये।'
श्लोक 39 (skanda.8.4.39)
पितामह उवाच। सत्रं महत्समासध्वं वाङ्मनोदोषवर्जिताः । देशं च वः प्रवक्ष्यामि यस्मिन्देशे चरिष्यथ
pitāmaha uvāca| satraṁ mahatsamāsadhvaṁ vāṅmanodoṣavarjitāḥ | deśaṁ ca vaḥ pravakṣyāmi yasmindeśe cariṣyatha
पितामह ने कहा — 'वाणी और मन के दोषों से रहित होकर महान् सत्र आरम्भ करो। जिस स्थान में तुम इसे सम्पन्न करोगे, वह स्थान मैं तुम्हें बताता हूँ।'
श्लोक 40 (skanda.8.4.40)
सनत्कुमार उवाच। ततो मनोमयं चक्रं स सृष्ट्वा तानुवाच ह । क्षिप्तमेतन्मया चक्रमनुव्रजत मा चिरम्
sanatkumāra uvāca| tato manomayaṁ cakraṁ sa sṛṣṭvā tānuvāca ha | kṣiptametanmayā cakramanuvrajata mā ciram
सनत्कुमार ने कहा — तब उन्होंने मनोमय चक्र की रचना कर उनसे कहा — 'मैंने इस चक्र को चला दिया है; बिना विलम्ब किये इसका अनुसरण करो।'
श्लोक 41 (skanda.8.4.41)
यत्रास्य नेमिः शीर्येत स देशस्तपसः शुभः । ततो मुमोच तच्चक्रं ते च तत्समनुव्रजन्
yatrāsya nemiḥ śīryeta sa deśastapasaḥ śubhaḥ | tato mumoca taccakraṁ te ca tatsamanuvrajan
'जहाँ इसकी नेमि (धार) टूट जाये, वही स्थान तपस्या के लिये शुभ होगा।' तब उन्होंने उस चक्र को छोड़ दिया, और वे उसके पीछे-पीछे चल पड़े।
श्लोक 42 (skanda.8.4.42)
तस्य वै व्रजतः क्षिप्रं यत्र नेमिरशीर्यत । नैमिशन्तत् स्मृतं नाम्ना पुण्यं सर्वत्र पूजितम्
tasya vai vrajataḥ kṣipraṁ yatra nemiraśīryata | naimiśantat smṛtaṁ nāmnā puṇyaṁ sarvatra pūjitam
जब वह चक्र तीव्र गति से चला, तो जहाँ उसकी नेमि टूटी, वह स्थान 'नैमिष' नाम से प्रसिद्ध हुआ — सर्वत्र पूजित एक पुण्य स्थल।
श्लोक 43 (skanda.8.4.43)
तत्पूजितन्देवमनुष्यसिद्धै रक्षोभिरुग्रैरुरगैश्च दिव्यैः । यक्षैः सगन्धर्वपिशाचसंघैः सर्वाप्सरोभिश्च दितेः सुतैश्च
tatpūjitandevamanuṣyasiddhai rakṣobhirugrairuragaiśca divyaiḥ | yakṣaiḥ sagandharvapiśācasaṁghaiḥ sarvāpsarobhiśca diteḥ sutaiśca
उस पूजित स्थान की देवता, मनुष्य, सिद्ध, उग्र राक्षस और दिव्य नाग; यक्ष, गन्धर्व और पिशाचगण, समस्त अप्सराएँ और दिति के पुत्र (दैत्य) —
श्लोक 44 (skanda.8.4.44)
विप्रैश्च दान्तैः शमयोगयुक्तैस्तीर्थैश्च सर्वैरपि चावनीध्रैः । गन्धर्वविद्याधरचारणंश्च साध्यैश्च विश्वैः पितृभिः स्तुतञ्च
vipraiśca dāntaiḥ śamayogayuktaistīrthaiśca sarvairapi cāvanīdhraiḥ | gandharvavidyādharacāraṇaṁśca sādhyaiśca viśvaiḥ pitṛbhiḥ stutañca
...शमयोगयुक्त संयमी ब्राह्मणों, समस्त तीर्थों और पर्वतों, गन्धर्वों, विद्याधरों, चारणों, साध्यों और विश्वेदेवों ने — तथा पितरों ने भी — उसकी स्तुति की।