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अम्बिका खण्ड · अध्याय 5

नैमिष में दीर्घ सत्र

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (skanda.8.5.1)

सनत्कुमार उवाच। तन्नैमिशं समासाद्य ऋषयो दीप्ततेजसः । दिव्यं सत्रं समासन्त महद्वर्षसहस्रिकम्

sanatkumāra uvāca| tannaimiśaṁ samāsādya ṛṣayo dīptatejasaḥ | divyaṁ satraṁ samāsanta mahadvarṣasahasrikam

सनत्कुमार ने कहा — उस नैमिष में पहुँचकर तेजस्वी ऋषियों ने एक हजार वर्षों तक चलने वाला महान् दिव्य सत्र आरम्भ किया।

श्लोक 2 (skanda.8.5.2)

एकाग्रमनसः सर्वे निर्ममा निरहंकृताः । ध्यायन्तो नित्यमीशेशं सदारतनयाग्नयः

ekāgramanasaḥ sarve nirmamā nirahaṁkṛtāḥ | dhyāyanto nityamīśeśaṁ sadāratanayāgnayaḥ

सभी एकाग्रचित्त, ममता और अहंकार से रहित होकर, अपनी पत्नियों, पुत्रों और अग्नियों सहित सदा उस ईशों के भी ईश का ध्यान करते रहे।

श्लोक 3 (skanda.8.5.3)

तन्निष्ठास्तत्पराः सर्वे तद्युक्तास्तदुपाश्रयाः । सर्वक्रियाः प्रकुर्वाणास्तमेव मनसा गताः

tanniṣṭhāstatparāḥ sarve tadyuktāstadupāśrayāḥ | sarvakriyāḥ prakurvāṇāstameva manasā gatāḥ

वे सभी उसी में निष्ठ, उसी में तत्पर, उसी से युक्त और उसी के आश्रित रहते हुए, अपनी समस्त क्रियाएँ करते हुए भी मन से केवल उसी में लीन थे।

श्लोक 4 (skanda.8.5.4)

तेषां तं भावमालक्ष्य मातरिश्वा महातपाः । सर्वप्राणि चरः श्रीमान् सर्वभूतप्रवर्तकः

teṣāṁ taṁ bhāvamālakṣya mātariśvā mahātapāḥ | sarvaprāṇi caraḥ śrīmān sarvabhūtapravartakaḥ

उनके उस भाव को देखकर महातपस्वी मातरिश्वा (वायु), जो सभी प्राणियों में विचरण करने वाले, श्रीमान् और समस्त भूतों के प्रवर्तक हैं,

श्लोक 5 (skanda.8.5.5)

ददौ स रूपी भगवान् दर्शनं सत्रिणां शुभः । तन्ते दृष्ट्वार्चयित्वा च मातरिश्वानमव्यम्

dadau sa rūpī bhagavān darśanaṁ satriṇāṁ śubhaḥ | tante dṛṣṭvārcayitvā ca mātariśvānamavyam

...उस रूपधारी शुभ भगवान् ने सत्रकर्ताओं को दर्शन दिया; उसे देखकर और उस अविनाशी मातरिश्वा की पूजा करके...

श्लोक 6 (skanda.8.5.6)

आसीनमासने पुण्ये ऋषयः संश्रितव्रताः । पप्रच्छुरुद्भवं कृत्स्नं जगतः प्रलयन्तथा

āsīnamāsane puṇye ṛṣayaḥ saṁśritavratāḥ | papracchurudbhavaṁ kṛtsnaṁ jagataḥ pralayantathā

...पवित्र आसन पर विराजमान उनसे व्रतनिष्ठ ऋषियों ने संसार की सम्पूर्ण उत्पत्ति और प्रलय के विषय में पूछा,

श्लोक 7 (skanda.8.5.7)

स्थितिञ्च कृत्स्नां वंशांश्च युगमन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं कृत्स्नं दिव्यमानं तथैव च

sthitiñca kṛtsnāṁ vaṁśāṁśca yugamanvantarāṇi ca | vaṁśānucaritaṁ kṛtsnaṁ divyamānaṁ tathaiva ca

इस सृष्टि की सम्पूर्ण स्थिति, वंश, युग और मन्वन्तर, वंशों का सम्पूर्ण चरित तथा दिव्य कालमान भी।

श्लोक 8 (skanda.8.5.8)

अष्टानां देवयोनीनामुत्पत्तिं प्रलयन्तथा । पितृसर्गं तथा शेषं ब्रह्मणो मानमेव च

aṣṭānāṁ devayonīnāmutpattiṁ pralayantathā | pitṛsargaṁ tathā śeṣaṁ brahmaṇo mānameva ca

आठ प्रकार की देवयोनियों की उत्पत्ति और प्रलय, पितृसृष्टि, तथा ब्रह्मा की सम्पूर्ण आयु का मान भी।

श्लोक 9 (skanda.8.5.9)

चन्द्रादित्यगतिं सर्वां ताराग्रहगतिं तथा । स्थितिं सर्वेश्वराणां च द्वीपधर्ममशेषतः

candrādityagatiṁ sarvāṁ tārāgrahagatiṁ tathā | sthitiṁ sarveśvarāṇāṁ ca dvīpadharmamaśeṣataḥ

चन्द्रमा और सूर्य की सम्पूर्ण गति, तारों और ग्रहों की गति, सभी लोकपालों की स्थिति, तथा द्वीपों के धर्म को भी पूर्णतः [पूछा]।

श्लोक 10 (skanda.8.5.10)

वर्णाश्रमव्यवस्थानं यज्ञानां च प्रवर्तनम् । एतत्सर्वमशेषेण कथयामास स प्रभुः

varṇāśramavyavasthānaṁ yajñānāṁ ca pravartanam | etatsarvamaśeṣeṇa kathayāmāsa sa prabhuḥ

वर्णों और आश्रमों की व्यवस्था तथा यज्ञों के प्रवर्तन के विषय में भी पूछा; उन प्रभु ने यह सब कुछ बिना किसी शेष के कह सुनाया।

श्लोक 11 (skanda.8.5.11)

दिव्यवर्षसहस्रं च तेषां तदभियात्तथा । अथ दिव्येन रूपेण सामवाग् दिङ्निरीक्षणा

divyavarṣasahasraṁ ca teṣāṁ tadabhiyāttathā | atha divyena rūpeṇa sāmavāg diṅnirīkṣaṇā

इस प्रकार उनके लिये एक दिव्य सहस्र वर्ष व्यतीत हो गया; तब दिव्य रूप में साम की वाणी वाली, दिशाओं को निहारने वाली [सरस्वती प्रकट हुईं],

श्लोक 12 (skanda.8.5.12)

यजुर्घ्राणाथर्वशिरा शब्दजिह्वा शुभा सतो । न्यायश्रोत्रा निरुक्तत्वगृक्पादपद गामिनी

yajurghrāṇātharvaśirā śabdajihvā śubhā sato | nyāyaśrotrā niruktatvagṛkpādapada gāminī

यजुर्वेद जिनकी नासिका, अथर्ववेद जिनका मस्तक, ध्वनि जिनकी जिह्वा, सत्य के प्रति शुभ; न्यायशास्त्र जिनके कान, निरुक्त जिनकी त्वचा, ऋग्वेद जिनके चरण-पद्म, इस प्रकार चलती हुई,

श्लोक 13 (skanda.8.5.13)

कालबाहूर्वर्षकरा दिवसाङ्गुलिधारिणी । कलादिभिः पर्वभिश्च मासैः कररुहैस्तथा

kālabāhūrvarṣakarā divasāṅgulidhāriṇī | kalādibhiḥ parvabhiśca māsaiḥ kararuhaistathā

काल जिनकी भुजाएँ, वर्ष जिनके हाथ, दिन जिनकी अँगुलियाँ; कला आदि तथा पर्व और मास जिनके नखों के समान थे।

श्लोक 14 (skanda.8.5.14)

कल्पेन चोरसा दिव्या शिक्षाविद्योन्नतस्तनी । छन्दोविजितमध्या च मीमांसानाभिरेव च

kalpena corasā divyā śikṣāvidyonnatastanī | chandovijitamadhyā ca mīmāṁsānābhireva ca

कल्प (वेदांग) जिनकी दिव्य वक्षस्थली, शिक्षा और विद्या से उन्नत जिनके स्तन; छन्द से पतली कमर वाली, तथा मीमांसा जिनकी नाभि थी।

श्लोक 15 (skanda.8.5.15)

पुराणविस्तीर्णकटिर्धर्मशास्त्रमनोरथा । आश्रमोरुर्वर्णजानुर्यज्ञगुल्फा फलाङ्गुलिः

purāṇavistīrṇakaṭirdharmaśāstramanorathā | āśramorurvarṇajānuryajñagulphā phalāṅguliḥ

पुराण जिनकी विस्तृत कटि, धर्मशास्त्र जिनका मनोरथ; आश्रम जिनकी जाँघें, वर्ण जिनके घुटने, यज्ञ जिनके टखने, और फल जिनकी अँगुलियाँ थे।

श्लोक 16 (skanda.8.5.16)

लोकवेदशरीरा च रोमभिश्छान्दसैः शुभैः । श्रद्धा शुभाचारवस्त्रा योगधर्माभिभाषिणी

lokavedaśarīrā ca romabhiśchāndasaiḥ śubhaiḥ | śraddhā śubhācāravastrā yogadharmābhibhāṣiṇī

लोक और वेद जिनका शरीर था, शुभ छन्द जिनके रोम थे; शुभ आचार ही जिनका वस्त्र था और जो योगधर्म का उपदेश देती थीं।

श्लोक 17 (skanda.8.5.17)

वेदीमध्याद्विनिःसृत्य प्रवृत्ता परमाम्भसा । तस्यान्ते वभृथे प्लुत्य वायुना सह संगताः

vedīmadhyādviniḥsṛtya pravṛttā paramāmbhasā | tasyānte vabhṛthe plutya vāyunā saha saṁgatāḥ

वेदी के मध्य से निकलकर वह उत्तम जल के साथ प्रवाहित हो चली; उस सत्र के अन्त में अवभृथ स्नान में डुबकी लगाकर वे वायुदेव से मिलीं।

श्लोक 18 (skanda.8.5.18)

तामपृच्छन्त कान्वेषा वायुं देवं महाधियम् । उवाच स महातेजा ऋषीन्धर्मानुभावितान्

tāmapṛcchanta kānveṣā vāyuṁ devaṁ mahādhiyam | uvāca sa mahātejā ṛṣīndharmānubhāvitān

उन्होंने महाबुद्धिमान् देव वायु से पूछा — 'यह कौन है?' तब उन महातेजस्वी ने धर्म से पवित्र हुए उन ऋषियों को उत्तर दिया।

श्लोक 19 (skanda.8.5.19)

शुद्धाः स्थ तपसा सर्वे महान्धर्मश्च बः कृतः । यस्मादियं नदी पुण्या ब्रह्मलोकादिहागता

śuddhāḥ stha tapasā sarve mahāndharmaśca baḥ kṛtaḥ | yasmādiyaṁ nadī puṇyā brahmalokādihāgatā

'आप सभी तप से शुद्ध हैं और आपने महान् धर्म का आचरण किया है, जिसके कारण यह पुण्य नदी ब्रह्मलोक से यहाँ आयी है।'

श्लोक 20 (skanda.8.5.20)

इयं सरस्वती नाम ब्रह्मलोकविभूषणा । प्रथमं मर्त्त्यलोकेस्मिन् युष्मत्सिद्ध्यर्थमागता । नास्याः पुण्यतमा लोके त्रिषु लोकेषु विद्यते

iyaṁ sarasvatī nāma brahmalokavibhūṣaṇā | prathamaṁ marttyalokesmin yuṣmatsiddhyarthamāgatā | nāsyāḥ puṇyatamā loke triṣu lokeṣu vidyate

'यह सरस्वती नाम की, ब्रह्मलोक की शोभा है; तुम्हारी सिद्धि के लिये यह पहली बार इस मर्त्यलोक में आयी है। तीनों लोकों में इससे अधिक पवित्र कोई और नहीं है।'

श्लोक 21 (skanda.8.5.21)

ऋषय ऊचुः। कथमेषा महापुण्या प्रवृत्ता ब्रह्मलोकगा । कारणं किञ्च तत्रासीदेतदिच्छाम वेदितुम्

ṛṣaya ūcuḥ| kathameṣā mahāpuṇyā pravṛttā brahmalokagā | kāraṇaṁ kiñca tatrāsīdetadicchāma veditum

ऋषियों ने कहा — 'ब्रह्मलोक में रहने वाली यह अत्यन्त पवित्र नदी यहाँ कैसे प्रवाहित हुई? इसका क्या कारण था? हम यह जानना चाहते हैं।'

श्लोक 22 (skanda.8.5.22)

वायुरुवाच। अत्र वो वर्त्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । ब्रह्मणश्चैव संवादं पुरा यज्ञस्य चैव हि

vāyuruvāca| atra vo varttayiṣyāmi itihāsaṁ purātanam | brahmaṇaścaiva saṁvādaṁ purā yajñasya caiva hi

वायु ने कहा — 'मैं तुम्हें यहाँ एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा — पूर्वकाल में हुए ब्रह्मा और यज्ञ के संवाद को।'

श्लोक 23 (skanda.8.5.23)

यज्ञैरिष्ट्वा पुरा देवो ब्रह्मा दीप्तेन तेजसा । असृजत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च

yajñairiṣṭvā purā devo brahmā dīptena tejasā | asṛjatsarvabhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca

प्राचीन काल में यज्ञों द्वारा यजन करके देव ब्रह्मा ने अपने प्रज्वलित तेज से सभी स्थावर और जंगम भूतों की सृष्टि की।

श्लोक 24 (skanda.8.5.24)

स दृष्ट्वा दीप्तिमान्देवो दीप्त्या परमया युतः । अवेक्षमाणस्ताँल्लोकाँश्चतुर्भिर्मुखपङ्कजैः

sa dṛṣṭvā dīptimāndevo dīptyā paramayā yutaḥ | avekṣamāṇastā~llokā~ścaturbhirmukhapaṅkajaiḥ

वह तेजस्वी देव, परम दीप्ति से युक्त होकर, अपने चार मुखकमलों से उन लोकों को निहारते हुए,

श्लोक 25 (skanda.8.5.25)

देवादीन् मानुषादींश्च दृष्ट्वा दृष्ट्वा महामनाः । अमन्यत न मेन्योस्ति समो लोके न चाधिकः

devādīn mānuṣādīṁśca dṛṣṭvā dṛṣṭvā mahāmanāḥ | amanyata na menyosti samo loke na cādhikaḥ

देवताओं, मनुष्यों आदि को बार-बार देखकर, उन महामति ने सोचा — 'इस लोक में न तो मेरे समान कोई है, न मुझसे बढ़कर।'

श्लोक 26 (skanda.8.5.26)

योहमेताः प्रजाः सर्वाः सप्तलोकप्रतिष्ठिताः । देवमानुषतिर्यक्षु ग्रसामि विसृजामि च

yohametāḥ prajāḥ sarvāḥ saptalokapratiṣṭhitāḥ | devamānuṣatiryakṣu grasāmi visṛjāmi ca

'सातों लोकों में स्थित इन समस्त प्रजाओं को — देवताओं, मनुष्यों और पशु-पक्षियों में — मैं ही ग्रस लेता हूँ और मैं ही फिर से सृजता हूँ।'

श्लोक 27 (skanda.8.5.27)

अहं स्रष्टा हि भूतानां नान्यः कश्चन विद्यते । नियन्ता लोककर्ता च न ममास्ति समः क्वचित्

ahaṁ sraṣṭā hi bhūtānāṁ nānyaḥ kaścana vidyate | niyantā lokakartā ca na mamāsti samaḥ kvacit

'मैं ही समस्त भूतों का स्रष्टा हूँ, अन्य कोई नहीं है। मैं ही नियन्ता और लोक का कर्ता हूँ; मेरे समान कहीं कोई नहीं है।'

श्लोक 28 (skanda.8.5.28)

तस्यैवं मन्यमानस्य यज्ञ आगान्महामनाः । उवाच चैनं दीप्तात्मा मैवं मंस्था महामते

tasyaivaṁ manyamānasya yajña āgānmahāmanāḥ | uvāca cainaṁ dīptātmā maivaṁ maṁsthā mahāmate

इस प्रकार सोच रहे उन ब्रह्मा के पास महामति यज्ञ आये और तेजस्वी आत्मा वाले उन्होंने कहा — 'हे महामते! ऐसा मत सोचिये।'

श्लोक 29 (skanda.8.5.29)

अयं हि तव संमोहो विनाशाय भविष्यति । न युक्तमीदृशन्तेद्य सत्वस्थस्यात्मयोनिनः

ayaṁ hi tava saṁmoho vināśāya bhaviṣyati | na yuktamīdṛśantedya satvasthasyātmayoninaḥ

'आपका यह मोह आपके ही विनाश का कारण बनेगा। हे स्वयंभू! सत्त्वस्थ आपके लिये आज ऐसा सोचना उचित नहीं है।'

श्लोक 30 (skanda.8.5.30)

स्रष्टा त्वञ्चैव नान्योस्ति तथापि न यशस्करम् । अहं धर्त्ता हि भूतानां भुवनस्य तथैब च

sraṣṭā tvañcaiva nānyosti tathāpi na yaśaskaram | ahaṁ dharttā hi bhūtānāṁ bhuvanasya tathaiba ca

'यह सत्य है कि आपके अतिरिक्त अन्य कोई स्रष्टा नहीं है, तथापि इस प्रकार कहना यशस्कर नहीं है। मैं ही समस्त भूतों का तथा भुवन का धारण करने वाला हूँ।'

श्लोक 31 (skanda.8.5.31)

करोमि न च संमोहं यथा त्वं देव कत्थसे । तमुवाच तदा ब्रह्मा न त्वं धारयिता विभो

karomi na ca saṁmohaṁ yathā tvaṁ deva katthase | tamuvāca tadā brahmā na tvaṁ dhārayitā vibho

'हे देव! मैं आपके समान डींग नहीं मारता और न ही मोहग्रस्त होता हूँ।' तब ब्रह्मा ने उससे कहा — 'हे विभो! तुम धारण करने वाले नहीं हो।'

श्लोक 32 (skanda.8.5.32)

अहमेव हि भूतानां धर्त्ता हर्ता तथैव च । मया सृष्टानि भूतानि त्वमेवात्र विमुह्यसे

ahameva hi bhūtānāṁ dharttā hartā tathaiva ca | mayā sṛṣṭāni bhūtāni tvamevātra vimuhyase

'मैं ही समस्त भूतों का धारण करने वाला और संहार करने वाला भी हूँ। समस्त भूत मेरे ही द्वारा सृजे गये हैं; इस विषय में तुम ही मोहग्रस्त हो।'

श्लोक 33 (skanda.8.5.33)

अथागत्तत्र संविग्नो वेदः परमदीप्तिमान् । उवाच चैव तौ वेदो नैत देवमिति प्रभुः

athāgattatra saṁvigno vedaḥ paramadīptimān | uvāca caiva tau vedo naita devamiti prabhuḥ

तब वहाँ अत्यन्त तेजस्वी वेद व्याकुल होकर आये, और प्रभुरूप वेद ने उन दोनों से कहा — 'हे देव! यह उचित नहीं है।'

श्लोक 34 (skanda.8.5.34)

अहं श्रेष्ठो यत्कृतोस्मि न वदाम्यनृतं क्वचित् । शृणुध्वं मम यः कर्त्ता भूतानां युवयोश्च ह

ahaṁ śreṣṭho yatkṛtosmi na vadāmyanṛtaṁ kvacit | śṛṇudhvaṁ mama yaḥ karttā bhūtānāṁ yuvayośca ha

'मैं श्रेष्ठ हूँ, [मुझे] जिन्होंने रचा है; मैं कभी असत्य नहीं बोलता। सुनो मुझसे — भूतों का तथा तुम दोनों का कर्ता कौन है।'

श्लोक 35 (skanda.8.5.35)

परमेशो महादेवो रुद्रः सर्वगतः प्रभुः । येनाहं तव दत्तश्च कृतस्त्वञ्च प्रजापतिः

parameśo mahādevo rudraḥ sarvagataḥ prabhuḥ | yenāhaṁ tava dattaśca kṛtastvañca prajāpatiḥ

'परमेश्वर महादेव रुद्र ही सर्वव्यापी प्रभु हैं, जिनके द्वारा मैं तुम्हें दिया गया और जिन्होंने तुम्हें प्रजापति बनाया है।'

श्लोक 36 (skanda.8.5.36)

यज्ञोयं यत्प्रसूतिश्च अहं यत्रास्मि संस्थितः । सर्वं तस्मात्प्रसूतं वै नान्यः कर्त्तास्ति नः क्वचित्

yajñoyaṁ yatprasūtiśca ahaṁ yatrāsmi saṁsthitaḥ | sarvaṁ tasmātprasūtaṁ vai nānyaḥ karttāsti naḥ kvacit

'यह यज्ञ जिससे उत्पन्न हुआ, तथा मैं भी जिसमें स्थित हूँ — सब कुछ उन्हीं से उत्पन्न हुआ है; हम दोनों का उनके अतिरिक्त अन्य कोई कर्ता नहीं है।'

श्लोक 37 (skanda.8.5.37)

तमेवंवादिनं देवो ब्रह्मा वेदनमभाषत । अहं श्रुतीनां सर्वासां नेता स्रष्टा तथैव च

tamevaṁvādinaṁ devo brahmā vedanamabhāṣata | ahaṁ śrutīnāṁ sarvāsāṁ netā sraṣṭā tathaiva ca

इस प्रकार बोलते हुए उस वेद से देव ब्रह्मा ने कहा — 'मैं ही समस्त श्रुतियों का नेता और स्रष्टा भी हूँ।'

श्लोक 38 (skanda.8.5.38)

मत्प्रसादाद्धि वेदस्त्वं यज्ञश्चायं न संशयः । मूढौ युवामधर्मो वा भवद्भ्यामन्यथा कृतः

matprasādāddhi vedastvaṁ yajñaścāyaṁ na saṁśayaḥ | mūḍhau yuvāmadharmo vā bhavadbhyāmanyathā kṛtaḥ

'मेरी ही कृपा से तुम वेद हो और यह यज्ञ भी — इसमें कोई संशय नहीं है। तुम दोनों मोहग्रस्त हो, और तुम दोनों ने अधर्मपूर्वक अन्यथा आचरण किया है।'

श्लोक 39 (skanda.8.5.39)

प्रायश्चित्तं चरध्वं वः किल्बिषान्मोक्ष्यथस्ततः । एवमुक्ते तदा तेन महाञ्छब्दो बभूव ह

prāyaścittaṁ caradhvaṁ vaḥ kilbiṣānmokṣyathastataḥ | evamukte tadā tena mahāñchabdo babhūva ha

'प्रायश्चित्त करो, तभी तुम अपने पाप से मुक्त हो सकोगे।' उनके ऐसा कहते ही उस समय एक महान् शब्द उत्पन्न हुआ।

श्लोक 40 (skanda.8.5.40)

आदित्यमण्डलाकारमदृश्यत च मण्डलम् । महच्छब्देन महता उपरिष्टाद् वियत्स्थितम्

ādityamaṇḍalākāramadṛśyata ca maṇḍalam | mahacchabdena mahatā upariṣṭād viyatsthitam

सूर्यमण्डल के समान आकार वाला एक मण्डल, महान् शब्द के साथ आकाश में ऊपर स्थित दिखाई दिया।

श्लोक 41 (skanda.8.5.41)

स चापि तस्माद्विभ्रष्टो भूतलं समुपाश्रितः । हिमवत्कुञ्जमासाद्य नानाविहगनादितम्

sa cāpi tasmādvibhraṣṭo bhūtalaṁ samupāśritaḥ | himavatkuñjamāsādya nānāvihaganāditam

वह वहाँ से गिरकर पृथ्वीतल पर आ पहुँचा, और नाना पक्षियों की ध्वनियों से गुँजायमान हिमालय के एक कुञ्ज में पहुँच गया।

श्लोक 42 (skanda.8.5.42)

व्योमगश्च चिरं भूत्वा भूमिगः संबभूव ह । ततो ब्रह्मा दिशः सर्वा निरीक्ष्य मुखपङ्कजैः

vyomagaśca ciraṁ bhūtvā bhūmigaḥ saṁbabhūva ha | tato brahmā diśaḥ sarvā nirīkṣya mukhapaṅkajaiḥ

दीर्घकाल तक आकाश में विचरण करने के पश्चात् वह पृथ्वी पर आ गया। तब ब्रह्मा ने अपने मुखकमलों से सभी दिशाओं का अवलोकन किया,

श्लोक 43 (skanda.8.5.43)

चतुर्भिर्न वियत्स्थं तमपश्यत्स पितामहः । स मुखं पञ्चमं दीप्तमसृजन् मूर्घ्नि संस्थितम्

caturbhirna viyatsthaṁ tamapaśyatsa pitāmahaḥ | sa mukhaṁ pañcamaṁ dīptamasṛjan mūrghni saṁsthitam

उन पितामह ने अपने चारों मुखों से आकाश में स्थित उस [मण्डल] को नहीं देखा; तब उन्होंने अपने मस्तक पर स्थित एक पाँचवाँ तेजस्वी मुख रच लिया।

श्लोक 44 (skanda.8.5.44)

तेनापश्यद्वियत्स्थं तं सूर्यायुतसमप्रभम् । आदित्यमण्डलाकारं शब्दवद् घोरदर्शनम्

tenāpaśyadviyatsthaṁ taṁ sūryāyutasamaprabham | ādityamaṇḍalākāraṁ śabdavad ghoradarśanam

उस [पाँचवें मुख] से उन्होंने आकाश में स्थित, दस हजार सूर्यों के समान तेजस्वी, सूर्यमण्डल के आकार वाले, शब्द करते हुए उस भयंकर [मण्डल] को देखा।

श्लोक 45 (skanda.8.5.45)

तत्सृष्ट्वा पञ्चमं तस्य शिरो वै क्रोधजं महत । संवर्तकाग्निसदृशं ग्रसिष्यत्तमवर्धत

tatsṛṣṭvā pañcamaṁ tasya śiro vai krodhajaṁ mahata | saṁvartakāgnisadṛśaṁ grasiṣyattamavardhata

उस पाँचवें मुख को रचकर, उसका वह विशाल क्रोधजन्य सिर, प्रलयाग्नि के समान, उस [मण्डल] को ग्रसने के लिये बढ़ने लगा।

श्लोक 46 (skanda.8.5.46)

वर्द्धमानं तदा तत्तु वडवामुखसन्निभम् । दीप्तिमच्छब्दवच्चैव देवोसौ दीप्तमण्डलः

varddhamānaṁ tadā tattu vaḍavāmukhasannibham | dīptimacchabdavaccaiva devosau dīptamaṇḍalaḥ

इस प्रकार बढ़ता हुआ वह वडवाग्नि के मुख के समान हो गया, तेजस्वी और शब्दयुक्त; वह देव अब एक प्रज्वलित मण्डलधारी हो चुका था।

श्लोक 47 (skanda.8.5.47)

हस्ताङ्गुष्ठनखेनाशु वामेनावज्ञयैव हि । चकर्त्त तन्महद्घोरं ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः

hastāṅguṣṭhanakhenāśu vāmenāvajñayaiva hi | cakartta tanmahadghoraṁ brahmaṇaḥ pañcamaṁ śiraḥ

तभी [रुद्र ने] अपने बायें हाथ के अँगूठे के नख से, बिना किसी प्रयास के, ब्रह्मा के उस विशाल भयंकर पाँचवें सिर को काट डाला।

श्लोक 48 (skanda.8.5.48)

दीप्तिकृत्तशिराः सोथ दुःखेनोस्रेण चार्दितः । पपात मूढचेता वै योगधर्मविवर्जितः

dīptikṛttaśirāḥ sotha duḥkhenosreṇa cārditaḥ | papāta mūḍhacetā vai yogadharmavivarjitaḥ

उस दीप्तिमान् कटे हुए सिर वाले ब्रह्मा दुःख और ताप से पीड़ित होकर, मोहग्रस्त-चित्त और योगधर्म से रहित होकर गिर पड़े।

श्लोक 49 (skanda.8.5.49)

स विदंष्ट्रो महाहस्ती विशृङ्गो हरगोपतिः । विरश्मिरिव चादित्यः पतितो भूतले बभौ

sa vidaṁṣṭro mahāhastī viśṛṅgo haragopatiḥ | viraśmiriva cādityaḥ patito bhūtale babhau

वह भयंकर सिर — विशाल दाढ़ों और विशाल सूँड़ जैसा, सींगरहित, गौओं के स्वामी हर के समान — तेजहीन सूर्य की भाँति भूतल पर गिरा हुआ प्रतीत हो रहा था।

श्लोक 50 (skanda.8.5.50)

ततः सुप्तोत्थित इव संज्ञां लब्ध्वा महातपाः । मण्डलस्थं महादेवमस्तौषीद्दीनया गिरा

tataḥ suptotthita iva saṁjñāṁ labdhvā mahātapāḥ | maṇḍalasthaṁ mahādevamastauṣīddīnayā girā

तब मानो सोकर उठे हुए की भाँति चेतना पाकर उन महातपस्वी (ब्रह्मा) ने उस मण्डल में स्थित महादेव की दीन वाणी में स्तुति की।

श्लोक 51 (skanda.8.5.51)

ब्रह्मोवाच। नमः सहस्रनेत्राय शतनेत्राय वै नमः । नमो विवृतवक्त्राय शतवक्त्राय वै नमः

brahmovāca| namaḥ sahasranetrāya śatanetrāya vai namaḥ | namo vivṛtavaktrāya śatavaktrāya vai namaḥ

ब्रह्मा ने कहा — सहस्रनेत्र को नमस्कार, शतनेत्र को नमस्कार; प्रकट मुख वाले को नमस्कार, शतमुख वाले को नमस्कार।

श्लोक 52 (skanda.8.5.52)

नमः सहस्रवक्त्राय सर्ववक्त्राय वै नमः । नमः सहस्रपादाय सर्वपादाय वै नमः

namaḥ sahasravaktrāya sarvavaktrāya vai namaḥ | namaḥ sahasrapādāya sarvapādāya vai namaḥ

सहस्रमुख को नमस्कार, सर्वमुख को नमस्कार; सहस्रचरण को नमस्कार, सर्वचरण को नमस्कार।

श्लोक 53 (skanda.8.5.53)

सहस्रपाणये चैव सर्वतःपाणये नमः । नमः सर्वस्य स्रष्ट्रे च द्रष्ट्रे सर्वस्य ते नमः

sahasrapāṇaye caiva sarvataḥpāṇaye namaḥ | namaḥ sarvasya sraṣṭre ca draṣṭre sarvasya te namaḥ

सहस्रहस्त को नमस्कार, सर्वत्र हाथों वाले को नमस्कार; समस्त की सृष्टि करने वाले और समस्त के द्रष्टा — आपको नमस्कार।

श्लोक 54 (skanda.8.5.54)

नम आदित्यवर्णाय शिरसश्छेदनाय च । सृष्टिप्रलयकर्त्रे च स्थितिकर्त्रे तथा नमः

nama ādityavarṇāya śirasaśchedanāya ca | sṛṣṭipralayakartre ca sthitikartre tathā namaḥ

सूर्य के समान वर्ण वाले को तथा शिर काटने वाले को नमस्कार; सृष्टि और प्रलय करने वाले तथा स्थिति करने वाले को भी नमस्कार।

श्लोक 55 (skanda.8.5.55)

नमः सहस्रलिङ्गाय सहस्रचरणाय च । संहारलिङ्गिने चैव जललिङ्गाय वै नमः

namaḥ sahasraliṅgāya sahasracaraṇāya ca | saṁhāraliṅgine caiva jalaliṅgāya vai namaḥ

सहस्रलिङ्ग को तथा सहस्रचरण को नमस्कार; संहार-लिङ्ग वाले को और जल-लिङ्ग वाले को भी नमस्कार।

श्लोक 56 (skanda.8.5.56)

अन्तश्चराय सर्वाय प्रकृतेः पूरणाय च । व्यापिने सर्वसत्त्वानां पुरुषप्रेरकाय च

antaścarāya sarvāya prakṛteḥ pūraṇāya ca | vyāpine sarvasattvānāṁ puruṣaprerakāya ca

समस्त के भीतर विचरने वाले, प्रकृति को परिपूर्ण करने वाले; समस्त प्राणियों में व्यापक और पुरुष को प्रेरित करने वाले को नमस्कार।

श्लोक 57 (skanda.8.5.57)

इन्द्रियार्थविशिष्टाय तथा नियमकारिणे । भूतभव्याय सर्वाय नित्यमध्यवदाय च

indriyārthaviśiṣṭāya tathā niyamakāriṇe | bhūtabhavyāya sarvāya nityamadhyavadāya ca

इन्द्रियों और विषयों से विशिष्ट, तथा नियमों के कारण को; समस्त भूत और भविष्य में सदा समान रहने वाले को नमस्कार।

श्लोक 58 (skanda.8.5.58)

त्वमेव स्रष्टा लोकानां मंत्रदाता तथा विभो । शरणागताय दान्ताय प्रसादं कर्तुमर्हसि

tvameva sraṣṭā lokānāṁ maṁtradātā tathā vibho | śaraṇāgatāya dāntāya prasādaṁ kartumarhasi

हे विभो! आप ही लोकों के स्रष्टा तथा मन्त्रदाता हैं; शरण में आये हुए और संयमी इस मुझ पर कृपा करने योग्य हैं।

श्लोक 59 (skanda.8.5.59)

तस्यैवं स्तुवतः सम्यग्भावेन परमेण ह । स तस्मै देवदेवेशो दिव्यं चक्षुर्ददौ तदा

tasyaivaṁ stuvataḥ samyagbhāvena parameṇa ha | sa tasmai devadeveśo divyaṁ cakṣurdadau tadā

इस प्रकार परम भाव से स्तुति करते हुए उनको, उन देवाधिदेव ने उस समय एक दिव्य दृष्टि प्रदान की।

श्लोक 60 (skanda.8.5.60)

चक्षुषा तेन स तदा ब्रह्मा लोकपितामहः । विमाने सूर्यसंकाशे तेजोराशिमपश्यत

cakṣuṣā tena sa tadā brahmā lokapitāmahaḥ | vimāne sūryasaṁkāśe tejorāśimapaśyata

उस दृष्टि से लोकपितामह ब्रह्मा ने सूर्य के समान तेजस्वी विमान में स्थित एक तेजोराशि को देखा।

श्लोक 61 (skanda.8.5.61)

तस्य मध्यात् ततो वाचं महतीं सम शृण्वत । गंभीरां मधुरा युक्तामर्थ संपन्नलक्षणाम्

tasya madhyāt tato vācaṁ mahatīṁ sama śṛṇvata | gaṁbhīrāṁ madhurā yuktāmartha saṁpannalakṣaṇām

फिर उस [तेजोराशि] के मध्य से उन्होंने एक महती वाणी सुनी — गम्भीर, मधुर, युक्तियुक्त और अर्थ से सम्पन्न लक्षणों वाली।

श्लोक 62 (skanda.8.5.62)

विशदां पुत्रपुत्रेति पूर्वं देवेन चोदिताम् । अंबरात्पुत्र उत्पन्नो यस्तुभ्यं नीललोहितः

viśadāṁ putraputreti pūrvaṁ devena coditām | aṁbarātputra utpanno yastubhyaṁ nīlalohitaḥ

वह वाणी स्पष्ट रूप से बार-बार 'पुत्र, पुत्र' कहती हुई, पहले उसी देव द्वारा प्रेरित थी — 'आकाश से तुम्हारा पुत्र नीललोहित उत्पन्न हुआ है।'

श्लोक 63 (skanda.8.5.63)

यच्च पूर्वं मया प्रोक्तस्त्वं तदा सुतमार्गणे । मदीयो गणपो यस्ते मन्मूर्तिश्च भविष्यति

yacca pūrvaṁ mayā proktastvaṁ tadā sutamārgaṇe | madīyo gaṇapo yaste manmūrtiśca bhaviṣyati

'और जो मैंने पहले पुत्र-याचना के समय तुमसे कहा था कि मेरा जो गणपति है, वह तुम्हारी मन्मूर्ति के समान पुत्र बनेगा —'

श्लोक 64 (skanda.8.5.64)

स प्राप्य परमं ज्ञानं मूढं त्वां विनयिष्यति । तस्येयं फलनिष्पतिः शिरसश्छेदनं तव

sa prāpya paramaṁ jñānaṁ mūḍhaṁ tvāṁ vinayiṣyati | tasyeyaṁ phalaniṣpatiḥ śirasaśchedanaṁ tava

'वह परम ज्ञान प्राप्त करके, हे मूढ़! तुम्हें अनुशासित करेगा। उसी का यह फल है — तुम्हारे सिर का छेदन।'

श्लोक 65 (skanda.8.5.65)

मयैव कारिता तेन निर्वृतश्चाधुना भव । ऊर्ध्वगं ज्ञानरूपं तु शिरोदिव्यं समुत्थितम्

mayaiva kāritā tena nirvṛtaścādhunā bhava | ūrdhvagaṁ jñānarūpaṁ tu śirodivyaṁ samutthitam

'यह मेरे ही द्वारा उससे करवाया गया था; अब सन्तुष्ट हो जाओ। तुम्हारा वह दिव्य सिर ज्ञानरूप होकर ऊर्ध्वगामी हो गया है।'

श्लोक 66 (skanda.8.5.66)

अस्य चैवोत्पथस्थस्य यज्ञस्य तु महामते । शिरश्छेत्स्यत्यसावेव कस्मिंश्चित् कारणान्तरे । स्तवेनानेन तुष्टोस्मि किं ददानि च तेन

asya caivotpathasthasya yajñasya tu mahāmate | śiraśchetsyatyasāveva kasmiṁścit kāraṇāntare | stavenānena tuṣṭosmi kiṁ dadāni ca tena

'हे महामते! यह जो यज्ञ भी मार्ग से भटक गया है, उसका सिर भी वही [तुम्हारा पुत्र] किसी अन्य अवसर पर काटेगा। मैं इस स्तुति से प्रसन्न हूँ; बताओ, मैं तुम्हें और क्या दूँ?'

श्लोक 67 (skanda.8.5.67)

वायुरुवाच। ततः स भगवान् हृष्टः प्रणम्य शुभया गिरा । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लक्ष्यालक्ष्यं तमीश्वरम्

vāyuruvāca| tataḥ sa bhagavān hṛṣṭaḥ praṇamya śubhayā girā | uvāca prāñjalirbhūtvā lakṣyālakṣyaṁ tamīśvaram

वायु ने कहा — तब वे भगवान् (ब्रह्मा) हर्षित होकर, प्रणाम कर, शुभ वाणी में हाथ जोड़कर उस दृश्य-अदृश्य ईश्वर से बोले।

श्लोक 68 (skanda.8.5.68)

भगवन्नैव मे दुःखं दर्शनात्ते प्रबाधते । इच्छामि शिरसो ह्यस्य धारणं सर्वदा त्वया

bhagavannaiva me duḥkhaṁ darśanātte prabādhate | icchāmi śiraso hyasya dhāraṇaṁ sarvadā tvayā

'हे भगवन्! आपके दर्शन से मुझे कोई दुःख नहीं होता। मैं तो यह चाहता हूँ कि यह मेरा सिर सदा आपके ही द्वारा धारण किया जाये।'

श्लोक 69 (skanda.8.5.69)

नाहं स्मरेयमेतच्च शिरसश्छेदनं विभो । भूयश्चाधर्मकार्येभ्यस्त्वयैवेच्छे निवारणम्

nāhaṁ smareyametacca śirasaśchedanaṁ vibho | bhūyaścādharmakāryebhyastvayaivecche nivāraṇam

'हे विभो! मैं इस सिर के छेदन का पुनः स्मरण न करूँ; और भविष्य में अधर्म के कार्यों से भी मैं आप ही से निवारण चाहता हूँ।'

श्लोक 70 (skanda.8.5.70)

तथा च कृत्यमुद्दिश्य पश्येयं त्वा यथासुखम् । विज्ञप्ति ब्रह्मणः श्रुत्वा प्रोवाच भुवनेश्वरः

tathā ca kṛtyamuddiśya paśyeyaṁ tvā yathāsukham | vijñapti brahmaṇaḥ śrutvā provāca bhuvaneśvaraḥ

'और उस प्रयोजन को लक्ष्य करके मैं आपको सदा सुखपूर्वक देखता रहूँ।' ब्रह्मा की इस विनती को सुनकर भुवनेश्वर ने कहा —

श्लोक 71 (skanda.8.5.71)

स एव सुतसंज्ञस्ते मन्मूर्त्तिर्नीललोहितः । शिरश्छेत्स्यति यज्ञस्य विभर्त्स्यति शिरश्च ते

sa eva sutasaṁjñaste manmūrttirnīlalohitaḥ | śiraśchetsyati yajñasya vibhartsyati śiraśca te

'तुम्हारा वही पुत्र-नामधारी नीललोहित, जो मेरी ही मूर्ति है, यज्ञ का सिर काटेगा और तुम्हारे इस सिर को धारण भी करेगा।'

श्लोक 72 (skanda.8.5.72)

इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तत्रैवान्तरधीयत । गते तस्मिन्महादेवे ब्रह्मा लोकपितामहः । सयज्ञः सहवेदश्च स्वं लोकं प्रत्यपद्यत

ityuktvā devadeveśastatraivāntaradhīyata | gate tasminmahādeve brahmā lokapitāmahaḥ | sayajñaḥ sahavedaśca svaṁ lokaṁ pratyapadyata

ऐसा कहकर देवदेवेश वहीं अन्तर्धान हो गये। उन महादेव के चले जाने पर लोकपितामह ब्रह्मा, यज्ञ और वेद सहित अपने लोक को लौट गये।

श्लोक 73 (skanda.8.5.73)

वायुरुवाच। य इमं शृणुयान्मर्त्यो गुह्यं वेदार्थसंमितम् । स देहभेदमासाद्य सायुज्यं ब्रह्मणो व्रजेत्

vāyuruvāca| ya imaṁ śṛṇuyānmartyo guhyaṁ vedārthasaṁmitam | sa dehabhedamāsādya sāyujyaṁ brahmaṇo vrajet

वायु ने कहा — जो मनुष्य वेद के अर्थ से युक्त इस गुह्य आख्यान को सुनता है, वह देह त्यागने पर ब्रह्मा के सायुज्य को प्राप्त होता है।

श्लोक 74 (skanda.8.5.74)

यश्चेमं पठते नित्यं ब्राह्मणानां समीपतः । स सर्वपापनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते

yaścemaṁ paṭhate nityaṁ brāhmaṇānāṁ samīpataḥ | sa sarvapāpanirmukto rudraloke mahīyate

और जो ब्राह्मणों के समीप इसे नित्य पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 75 (skanda.8.5.75)

नापुत्रशिष्ययोगिभ्य इदमाख्यानमैश्वरम् । आख्येयं चापि नाज्ञाय न शठाय न मानिने

nāputraśiṣyayogibhya idamākhyānamaiśvaram | ākhyeyaṁ cāpi nājñāya na śaṭhāya na mānine

यह ईश्वर-सम्बन्धी आख्यान उसे नहीं सुनाना चाहिये जो पुत्रहीन, शिष्यहीन या योगहीन हो; न ही अज्ञानी को, न धूर्त को, न अभिमानी को सुनाना चाहिये।

श्लोक 76 (skanda.8.5.76)

इदं महद्दिव्यमघशासनं पठेत् सदा ब्राह्मणवैद्यसंसदि । कृतावकाशो भवतीह मानवः शरीरभेदे प्रविशेत् पितामहम्

idaṁ mahaddivyamaghaśāsanaṁ paṭhet sadā brāhmaṇavaidyasaṁsadi | kṛtāvakāśo bhavatīha mānavaḥ śarīrabhede praviśet pitāmaham

यह महान् दिव्य पाप-नाशक आख्यान सदा ब्राह्मणों और विद्वानों की सभा में पढ़ना चाहिये; इससे मनुष्य को यहाँ पुण्य का अवसर प्राप्त होता है और देहत्याग पर वह पितामह में प्रवेश करता है।

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