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अम्बिका खण्ड · अध्याय 6

नर का जन्म

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (skanda.8.6.1)

सनत्कुमार उवाच। ततः स भगवान्देवः कपर्दी नीललोहितः । आज्ञया परमेशस्य जग्राह ब्रह्मणः शिरः

sanatkumāra uvāca| tataḥ sa bhagavāndevaḥ kapardī nīlalohitaḥ | ājñayā parameśasya jagrāha brahmaṇaḥ śiraḥ

सनत्कुमार ने कहा — तत्पश्चात् जटाधारी, नीललोहित भगवान् देव ने परमेश्वर की आज्ञा से ब्रह्मा के मस्तक (कपाल) को ग्रहण किया।

श्लोक 2 (skanda.8.6.2)

तद् गृहीत्वा शिरो दीप्तं रूपं विकृतमास्थितः । योगक्रीडां समास्थाय भैक्षाय प्रचचार ह

tad gṛhītvā śiro dīptaṁ rūpaṁ vikṛtamāsthitaḥ | yogakrīḍāṁ samāsthāya bhaikṣāya pracacāra ha

उस दीप्तिमान् मस्तक को लेकर उसने विकृत रूप धारण कर लिया और योग-क्रीड़ा में प्रवृत्त होकर भिक्षा के लिए विचरण करने लगा।

श्लोक 3 (skanda.8.6.3)

स देववेश्मनि तथा भिक्षार्थमगमद् द्विजाः । न चास्य कश्चित्तां भिक्षामनुरूपामदाद्विभोः

sa devaveśmani tathā bhikṣārthamagamad dvijāḥ | na cāsya kaścittāṁ bhikṣāmanurūpāmadādvibhoḥ

हे द्विजो! वह उसी प्रकार भिक्षा के लिए देवताओं के भवनों में गया, किन्तु उस विभु के योग्य भिक्षा किसी ने भी उसे नहीं दी।

श्लोक 4 (skanda.8.6.4)

अथ संचक्रमे देवो वेश्म विष्णोर्महात्मनः । तस्यातिष्ठत् स द्वारि भिक्षामुच्चारयन् शुभाम्

atha saṁcakrame devo veśma viṣṇormahātmanaḥ | tasyātiṣṭhat sa dvāri bhikṣāmuccārayan śubhām

तदनन्तर वह देव महात्मा विष्णु के भवन की ओर गया और उनके द्वार पर खड़े होकर शुभ भिक्षा-वचन उच्चारण करने लगा।

श्लोक 5 (skanda.8.6.5)

स दृष्ट्वा तत्रस्थं तं विष्णुर्वै योगचक्षुषा । शिवलीलां समाज्ञाय रक्तधारामपातयत्

sa dṛṣṭvā tatrasthaṁ taṁ viṣṇurvai yogacakṣuṣā | śivalīlāṁ samājñāya raktadhārāmapātayat

विष्णु ने अपने योग-दृष्टि से वहाँ खड़े हुए उसे देखा और यह शिव की लीला जानकर रक्त की धारा गिरायी।

श्लोक 6 (skanda.8.6.6)

पपात सा च विस्तीर्णा योजनार्द्ध शतं तदा । तया पतन्त्या विप्रेन्द्रा बहून्यब्दानि धारया

papāta sā ca vistīrṇā yojanārddha śataṁ tadā | tayā patantyā viprendrā bahūnyabdāni dhārayā

वह धारा उस समय फैलकर पचास योजन विस्तृत होकर गिरी; हे विप्रेन्द्रो! उस गिरती हुई धारा से अनेक वर्षों तक वह प्रवाहित होती रही।

श्लोक 7 (skanda.8.6.7)

पितामहकपालस्य नार्धमप्यभिपूरितम् । तमुवाच ततो देवः प्रहस्य वचनं शुभम्

pitāmahakapālasya nārdhamapyabhipūritam | tamuvāca tato devaḥ prahasya vacanaṁ śubham

फिर भी पितामह के कपाल का आधा भाग भी नहीं भर सका। तब देव (विष्णु) ने मुस्कराते हुए उससे यह शुभ वचन कहा।

श्लोक 8 (skanda.8.6.8)

सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते सकृदग्निश्च जायते । सकृद्राजानो ब्रुवते सकृद् भिक्षा प्रदीयते

sakṛtkanyāḥ pradīyante sakṛdagniśca jāyate | sakṛdrājāno bruvate sakṛd bhikṣā pradīyate

कन्याएँ एक ही बार दी जाती हैं, अग्नि भी एक ही बार प्रज्वलित होती है, राजा भी एक ही बार वचन देते हैं, और भिक्षा भी एक ही बार दी जाती है।

श्लोक 9 (skanda.8.6.9)

तुष्टोस्मि तव दानेन युक्तेनानेन मानद । वरं वृणीष्व देवेश वरदोस्मि तवाद्य वै

tuṣṭosmi tava dānena yuktenānena mānada | varaṁ vṛṇīṣva deveśa varadosmi tavādya vai

हे मानद! तुम्हारे इस उचित दान से मैं संतुष्ट हूँ। हे देवेश! वर माँगो, आज मैं निश्चय ही तुम्हें वर देने वाला हूँ।

श्लोक 10 (skanda.8.6.10)

विष्णुरुवाच। एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं देवताधिपम् । पश्यामि शंकरं दीप्तं कपर्दिनम्

viṣṇuruvāca| eṣa eva varaḥ ślāghyo yadahaṁ devatādhipam | paśyāmi śaṁkaraṁ dīptaṁ kapardinam

विष्णु ने कहा — यही मेरे लिए प्रशंसनीय वर है कि मैं देवताओं के अधिपति, जटाधारी, तेजोमय शंकर का दर्शन करूँ।

श्लोक 11 (skanda.8.6.11)

देवश्छायां ततो वीक्ष्य कपालस्थे तदा रसे । ससर्ज पुरुषं दिव्यं विष्णोः सदृशमूर्जितम्

devaśchāyāṁ tato vīkṣya kapālasthe tadā rase | sasarja puruṣaṁ divyaṁ viṣṇoḥ sadṛśamūrjitam

तब उस देव ने कपाल में स्थित रस (तरल) में विष्णु की छाया देखकर विष्णु के समान एक दिव्य और महाबली पुरुष की सृष्टि की।

श्लोक 12 (skanda.8.6.12)

तमाह चाक्षयश्चासि अजरोमर एव च । युद्धेषु चाप्रतिद्वन्द्वो सखा विष्णोरनन्तरः

tamāha cākṣayaścāsi ajaromara eva ca | yuddheṣu cāpratidvandvo sakhā viṣṇoranantaraḥ

उसने उससे कहा — तुम अक्षय हो, अजर और अमर भी हो; युद्धों में तुम्हारा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं होगा, और तुम विष्णु के घनिष्ठ सखा बनोगे।

श्लोक 13 (skanda.8.6.13)

देवकार्यकरः श्रीमान्महासेनपरं वचः । नारासु जन्म यस्मात्ते वियुद्धे हो भवान्वचः । नरस्तस्माद्धि नाम्ना त्वं प्रियश्चास्य भविष्यसि

devakāryakaraḥ śrīmānmahāsenaparaṁ vacaḥ | nārāsu janma yasmātte viyuddhe ho bhavānvacaḥ | narastasmāddhi nāmnā tvaṁ priyaścāsya bhaviṣyasi

तुम देवताओं के कार्य को करने वाले श्रीमान् होगे। चूँकि तुम्हारा जन्म जल (नारा) में हुआ है, इसलिए तुम्हारा नाम "नर" होगा और तुम विष्णु के प्रिय बनोगे।

श्लोक 14 (skanda.8.6.14)

वायुरुवाच। तं तदा श्वास्य विक्षिप्य नरं विष्णोरनन्तरम् । अगमद् ब्रह्मसदनं तौ चाप्याविशतुर्गृहम्

vāyuruvāca| taṁ tadā śvāsya vikṣipya naraṁ viṣṇoranantaram | agamad brahmasadanaṁ tau cāpyāviśaturgṛham

वायु ने कहा — तब विष्णु के अनुचर नर को श्वास देकर (जीवन देकर) मुक्त करने के बाद, वह (रुद्र) ब्रह्मलोक चला गया, और वे दोनों (विष्णु और नर) अपने भवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 15 (skanda.8.6.15)

य इदं नरजन्मेह शृणुयाद्वा पठेत वा । स कीर्त्या परया युक्तो विष्णुलोके महीयते

ya idaṁ narajanmeha śṛṇuyādvā paṭheta vā | sa kīrtyā parayā yukto viṣṇuloke mahīyate

जो कोई इस नर-जन्म की कथा को सुनता है अथवा पढ़ता है, वह परम कीर्ति से युक्त होकर विष्णुलोक में सम्मानित होता है।

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