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अम्बिका खण्ड · अध्याय 7

कपाल की स्थापना

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (skanda.8.7.1)

वायुरुवाच। ब्रह्मलोकं समासाद्य भगवान् सर्वलोकपः । भक्ष भैक्षमिति प्रोच्य द्वारे समवतिष्ठत

vāyuruvāca| brahmalokaṁ samāsādya bhagavān sarvalokapaḥ | bhakṣa bhaikṣamiti procya dvāre samavatiṣṭhata

वायु ने कहा — समस्त लोकों के पालक भगवान् ब्रह्मलोक में पहुँचकर "भिक्षा दो, भिक्षा दो" ऐसा कहते हुए द्वार पर खड़े हो गये।

श्लोक 2 (skanda.8.7.2)

तं दृष्ट्वा विकृतं ब्रह्मा कपालकरभूषणम् । ज्ञात्वा योगेन महता तुष्टाव भुवनेश्वरम्

taṁ dṛṣṭvā vikṛtaṁ brahmā kapālakarabhūṣaṇam | jñātvā yogena mahatā tuṣṭāva bhuvaneśvaram

उस विकृत रूप वाले, हाथ में कपाल धारण किये हुए को देखकर ब्रह्मा ने महान् योग से उन्हें पहचान लिया और भुवनेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 3 (skanda.8.7.3)

तस्य तुष्टस्तदा देवो वरदोस्मीत्यभाषत । वृणीष्व वरमव्यग्रो यत्ते मनसि वर्तते

tasya tuṣṭastadā devo varadosmītyabhāṣata | vṛṇīṣva varamavyagro yatte manasi vartate

तब उस देव ने प्रसन्न होकर कहा — "मैं वरदाता हूँ; निश्चिन्त होकर वह वर माँगो जो तुम्हारे मन में है।"

श्लोक 4 (skanda.8.7.4)

ब्रह्मोवाच। इच्छामि देवदेवेश त्वया चिह्नमिदं कृतम् । येन चिह्ने न लोकोयं चिह्नितः स्याज्जगत्पते

brahmovāca| icchāmi devadeveśa tvayā cihnamidaṁ kṛtam | yena cihne na lokoyaṁ cihnitaḥ syājjagatpate

ब्रह्मा ने कहा — हे देवाधिदेव! मैं चाहता हूँ कि आप यह चिह्न बनायें, जिस चिह्न से यह सम्पूर्ण जगत् चिह्नित हो जाये, हे जगत्पते!

श्लोक 5 (skanda.8.7.5)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भगवान् वदतां वरः । सर्वं प्रतिज्ञाय तदा ब्रह्मन्नोमिति व्याजहार सः

tasya tadvacanaṁ śrutvā bhagavān vadatāṁ varaḥ | sarvaṁ pratijñāya tadā brahmannomiti vyājahāra saḥ

उसका वह वचन सुनकर वक्ताओं में श्रेष्ठ भगवान् ने सब कुछ स्वीकार करते हुए "ॐ" ऐसा उच्चारण किया, हे ब्रह्मन्!

श्लोक 6 (skanda.8.7.6)

तस्यैवं ध्यानमात्रेण वागियं दिव्यरूपिणी । निःसृता वदनाद्देवी प्रह्वा समवतिष्ठत

tasyaivaṁ dhyānamātreṇa vāgiyaṁ divyarūpiṇī | niḥsṛtā vadanāddevī prahvā samavatiṣṭhata

उसके इस मात्र ध्यान (उच्चारण) से यह दिव्यरूपिणी वाणी, देवी के रूप में उसके मुख से निकलकर विनम्रतापूर्वक खड़ी हो गयी।

श्लोक 7 (skanda.8.7.7)

तामुवाच ततो देवः वाचा संजीवयन्निव । यस्मात् त्वमक्षरो भूत्वा मम वाचो विनिःसृता

tāmuvāca tato devaḥ vācā saṁjīvayanniva | yasmāt tvamakṣaro bhūtvā mama vāco viniḥsṛtā

तब देव ने मानो वाणी से उसे पुनर्जीवित करते हुए उससे कहा — "चूँकि तुम अक्षर बनकर मेरी वाणी से प्रकट हुई हो..."

श्लोक 8 (skanda.8.7.8)

सर्वविद्याधिदेवी त्वं तस्माद्देवि भविष्यसि । यस्माद् ब्रह्मरसं वेदं मुखं मम समाश्रिता

sarvavidyādhidevī tvaṁ tasmāddevi bhaviṣyasi | yasmād brahmarasaṁ vedaṁ mukhaṁ mama samāśritā

"...इसलिए हे देवि! तुम समस्त विद्याओं की अधिष्ठात्री देवी बनोगी, क्योंकि तुमने ब्रह्मरस रूप वेद बनकर मेरे मुख का आश्रय लिया है।"

श्लोक 9 (skanda.8.7.9)

तस्मात् सरस्वतीत्येवं लोके ख्यातिं गमिष्यसि । इमं लोकं रसाम्भोभिर्भावयित्वा च सुप्रभे

tasmāt sarasvatītyevaṁ loke khyātiṁ gamiṣyasi | imaṁ lokaṁ rasāmbhobhirbhāvayitvā ca suprabhe

"इसलिए तुम संसार में 'सरस्वती' इस नाम से विख्यात होगी; और हे सुप्रभे! इस लोक को अपने रसमय जल से पोषित करके..."

श्लोक 10 (skanda.8.7.10)

सर्वलोकान् तारयिता पुनस्त्वं नात्र संशयः । यज्ञभागं च ते देवा दास्यंति सपितामहाः

sarvalokān tārayitā punastvaṁ nātra saṁśayaḥ | yajñabhāgaṁ ca te devā dāsyaṁti sapitāmahāḥ

"...तुम पुनः समस्त लोकों का उद्धार करने वाली बनोगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। और देवगण पितामह सहित तुम्हें यज्ञ का भाग देंगे।"

श्लोक 11 (skanda.8.7.11)

इत्येव ब्रह्मणश्चेदं कपालममितौजसः । इमं लोकमनुप्राप्य देशे प्रेष्ठेवतिष्ठत

ityeva brahmaṇaścedaṁ kapālamamitaujasaḥ | imaṁ lokamanuprāpya deśe preṣṭhevatiṣṭhata

इस प्रकार अपार तेजस्वी ब्रह्मा का वह कपाल इस लोक में पहुँचकर एक प्रिय स्थान में स्थिर हो गया।

श्लोक 12 (skanda.8.7.12)

तत्र तच्च महद्दिव्यं कपालं देवताधिपः । स्थापयामास दीप्तार्चिः कुशानामग्रतः प्रभुः

tatra tacca mahaddivyaṁ kapālaṁ devatādhipaḥ | sthāpayāmāsa dīptārciḥ kuśānāmagrataḥ prabhuḥ

वहाँ उस महान् दिव्य कपाल को देवताओं के स्वामी, तेजस्वी प्रभु ने कुशाओं के अग्रभाग के समक्ष स्थापित किया।

श्लोक 13 (skanda.8.7.13)

स्थापितं तदथो दृष्ट्वा गणाः सर्वे महात्मनः । व्यनदन् सुमहानादं नादयन्तो दिशो दश

sthāpitaṁ tadatho dṛṣṭvā gaṇāḥ sarve mahātmanaḥ | vyanadan sumahānādaṁ nādayanto diśo daśa

उसे स्थापित हुआ देखकर महात्मा के समस्त गणों ने महानाद करते हुए दसों दिशाओं को गुँजा दिया।

श्लोक 14 (skanda.8.7.14)

सरित्प्रख्ये विदीर्यते । तेन शब्देन घोरेण असुरो देवकण्टकः

saritprakhye vidīryate | tena śabdena ghoreṇa asuro devakaṇṭakaḥ

वह ध्वनि नदी के समान गूँजती हुई फैल गयी; उस भयंकर शब्द से देवताओं के लिए कंटकस्वरूप वह असुर विचलित हो उठा।

श्लोक 15 (skanda.8.7.15)

हालाहल इति ख्यातस्तं देशं सोभ्यगच्छत । अमृष्यमाणः क्रोधान्धो दुरात्मा यज्ञशासकः

hālāhala iti khyātastaṁ deśaṁ sobhyagacchata | amṛṣyamāṇaḥ krodhāndho durātmā yajñaśāsakaḥ

'हालाहल' नामक वह दुरात्मा असुर, जो यज्ञों में विघ्न डालता था, क्रोध से अंधा होकर तथा असहिष्णु होकर उस स्थान की ओर चला गया।

श्लोक 16 (skanda.8.7.16)

ब्रह्मदत्तवरश्चैव अवध्यः सर्वजन्तुभिः । महिषश्छन्नरूपाणामसुराणां शतैर्वृतः

brahmadattavaraścaiva avadhyaḥ sarvajantubhiḥ | mahiṣaśchannarūpāṇāmasurāṇāṁ śatairvṛtaḥ

वह ब्रह्मा से वरदान प्राप्त, समस्त प्राणियों के लिए अवध्य, महिष रूपधारी असुर, छद्मरूपधारी असुरों की सैकड़ों सेना से घिरा हुआ था।

श्लोक 17 (skanda.8.7.17)

तमापतन्तं सक्रोधं महिषं देवकण्टकम् । संप्रेक्ष्याह गणाध्यक्षो गणान्सर्वान् पिनाकिनः

tamāpatantaṁ sakrodhaṁ mahiṣaṁ devakaṇṭakam | saṁprekṣyāha gaṇādhyakṣo gaṇānsarvān pinākinaḥ

उस क्रोधपूर्वक आक्रमण करते हुए, देवताओं के लिए कंटकस्वरूप महिष को देखकर गणों के अध्यक्ष ने पिनाकी के समस्त गणों से कहा।

श्लोक 18 (skanda.8.7.18)

यो ह्ययं गणपा दुष्टस्त्रैलोक्ये सुरकण्टकः । आयाति रुषितो युष्मान् तस्मादेनं निहिंसत

yo hyayaṁ gaṇapā duṣṭastrailokye surakaṇṭakaḥ | āyāti ruṣito yuṣmān tasmādenaṁ nihiṁsata

"हे गणो! यह दुष्ट, तीनों लोकों में देवताओं के लिए कंटकस्वरूप, क्रुद्ध होकर तुम्हारी ओर आ रहा है; अतः इसका वध कर डालो।"

श्लोक 19 (skanda.8.7.19)

ततस्ते गणपाः सर्वे समायातं सुरद्विषम् । भित्त्वा शूलेन संक्रुद्धा विगतासुं प्रचक्रिरे

tataste gaṇapāḥ sarve samāyātaṁ suradviṣam | bhittvā śūlena saṁkruddhā vigatāsuṁ pracakrire

तब वे समस्त गणपति क्रुद्ध होकर उस आते हुए देवद्वेषी को त्रिशूल से बींधकर प्राणहीन कर डाले।

श्लोक 20 (skanda.8.7.20)

हते तस्मिन् तदा देवो दिशः सर्वानवैक्षत । ताभ्यः पिशाचवृत्तास्याः पिशाच्यश्च महाबलाः

hate tasmin tadā devo diśaḥ sarvānavaikṣata | tābhyaḥ piśācavṛttāsyāḥ piśācyaśca mahābalāḥ

उसके मारे जाने पर तब देव ने सभी दिशाओं की ओर देखा; उन दिशाओं से पिशाचवत् मुखवाली महाबली पिशाचिनियाँ प्रकट हुईं।

श्लोक 21 (skanda.8.7.21)

अभ्यगच्छत तं देवं ताभ्यस्तं विनिवेदयन् । स ताभिरुपयुक्तश्च सर्वशः

abhyagacchata taṁ devaṁ tābhyastaṁ vinivedayan | sa tābhirupayuktaśca sarvaśaḥ

वे पिशाचिनियाँ उस देव के पास आयीं, और उसने उन्हें (महिष का शरीर) अर्पित कर दिया; वह उनके द्वारा सर्वथा भक्षित हो गया।

श्लोक 22 (skanda.8.7.22)

तमेवाप्यथवावासं देवादिष्टं प्रपेदिरे । भक्षयन्ति स्म तं नित्यं सिद्धासिद्धा यतस्ततः

tamevāpyathavāvāsaṁ devādiṣṭaṁ prapedire | bhakṣayanti sma taṁ nityaṁ siddhāsiddhā yatastataḥ

उन्होंने उस देव द्वारा नियत उसी स्थान को अपना निवास बना लिया; वहाँ सिद्ध और असिद्ध सभी उसे नित्य ही भक्षण करते हैं।

श्लोक 23 (skanda.8.7.23)

कपालमातरः प्रोक्तास्तस्माद्देवेन धीमता । कपालं स्थापितं यस्मात्तस्मिन्देशे पिनाकिना

kapālamātaraḥ proktāstasmāddevena dhīmatā | kapālaṁ sthāpitaṁ yasmāttasmindeśe pinākinā

इसलिए उस बुद्धिमान् देव ने उन्हें 'कपालमाताएँ' कहा, क्योंकि उसी स्थान में पिनाकी ने कपाल की स्थापना की थी।

श्लोक 24 (skanda.8.7.24)

महाकपालं तत्तस्मात् त्रिषु लोकेषु गद्यते । स्थापितस्य कपालस्य यथा तदभवत्तदा

mahākapālaṁ tattasmāt triṣu lokeṣu gadyate | sthāpitasya kapālasya yathā tadabhavattadā

इसलिए तीनों लोकों में वह 'महाकपाल' के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जैसा कि कपाल की स्थापना के समय हुआ था।

श्लोक 25 (skanda.8.7.25)

ख्यातं शिवतडागं तत्सर्वपापप्रमोचनम् । आगत्याथ ततो ब्रह्मा देवतानां गणैर्वृतः

khyātaṁ śivataḍāgaṁ tatsarvapāpapramocanam | āgatyātha tato brahmā devatānāṁ gaṇairvṛtaḥ

वह शिवतड़ाग नाम से विख्यात सरोवर सर्वपापनाशक है। तत्पश्चात् ब्रह्मा देवगणों से घिरे हुए वहाँ आये।

श्लोक 26 (skanda.8.7.26)

कपर्दिनमुपामंत्र्य तं देशं सोन्वगृह्णत । अर्द्धयोजनविस्तीर्णं क्षेत्रमन्यत् समंततः । भविष्यति न संदेहः सिद्धक्षेत्रं महात्मनः

kapardinamupāmaṁtrya taṁ deśaṁ sonvagṛhṇata | arddhayojanavistīrṇaṁ kṣetramanyat samaṁtataḥ | bhaviṣyati na saṁdehaḥ siddhakṣetraṁ mahātmanaḥ

कपर्दी (रुद्र) को संबोधित करके ब्रह्मा ने उस स्थान को अनुगृहीत किया; इसके चारों ओर आधा योजन विस्तृत अन्य क्षेत्र भी निःसंदेह उस महात्मा का सिद्धक्षेत्र होगा।

श्लोक 27 (skanda.8.7.27)

श्मेति हि प्रोच्यते पापं क्षयं शानं विदुर्बुधाः । ध्यानेन नियमैश्चैव श्मशानं तेन संज्ञितम्

śmeti hi procyate pāpaṁ kṣayaṁ śānaṁ vidurbudhāḥ | dhyānena niyamaiścaiva śmaśānaṁ tena saṁjñitam

'श' शब्द से पाप कहा जाता है और विद्वान् जन 'शान' शब्द से उसके क्षय (नाश) को जानते हैं; ध्यान तथा नियमों के द्वारा उसी कारण उसे 'श्मशान' कहा गया।

श्लोक 28 (skanda.8.7.28)

गुह्य देवाधिदेवस्य परं प्रियमनुत्तमम् । एवं तत्र नरः पापं सर्वमेव प्रहास्यति

guhya devādhidevasya paraṁ priyamanuttamam | evaṁ tatra naraḥ pāpaṁ sarvameva prahāsyati

यह देवाधिदेव का परम प्रिय एवं सर्वोत्तम गुह्य स्थान है; इस प्रकार वहाँ मनुष्य अपने समस्त पाप को त्याग देता है।

श्लोक 29 (skanda.8.7.29)

त्रिरात्रोपोषितश्चैव अर्चयित्वा वृषध्वजम् । राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं कृत्स्नमवाप्स्यति

trirātropoṣitaścaiva arcayitvā vṛṣadhvajam | rājasūyāśvamedhābhyāṁ phalaṁ kṛtsnamavāpsyati

तीन रात्रि उपवास करके वृषध्वज की पूजा करने वाला व्यक्ति राजसूय और अश्वमेध दोनों यज्ञों का सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 30 (skanda.8.7.30)

यश्च प्राणान् प्रियाँस्तत्र परित्यक्ष्यति मानवः । स गुह्यगणदेवानां समतां समवाप्स्यति

yaśca prāṇān priyā~statra parityakṣyati mānavaḥ | sa guhyagaṇadevānāṁ samatāṁ samavāpsyati

और जो मनुष्य वहाँ अपने प्रिय प्राणों का त्याग करता है, वह गुह्यगणदेवताओं की समता को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 31 (skanda.8.7.31)

वायुरुवाच। ततः स तत्र संस्थाप्य देवस्यार्चाद्वयं शुभम् । सुरेश्वरश्चकाराशु रुद्रस्यायतनं शुभम्

vāyuruvāca| tataḥ sa tatra saṁsthāpya devasyārcādvayaṁ śubham | sureśvaraścakārāśu rudrasyāyatanaṁ śubham

वायु ने कहा — तदनन्तर वहाँ देव की शुभ अर्चा-द्वय की स्थापना करके सुरेश्वर ने शीघ्र ही रुद्र का शुभ आयतन (मन्दिर) बनवाया।

श्लोक 32 (skanda.8.7.32)

तत्राभिगमनादेव कृत्वा पापस्य संक्षयम् । रुद्रलोकमवाप्नोति स प्राहैवं पितामहः

tatrābhigamanādeva kṛtvā pāpasya saṁkṣayam | rudralokamavāpnoti sa prāhaivaṁ pitāmahaḥ

वहाँ जाने मात्र से ही पाप का सम्पूर्ण क्षय होकर मनुष्य रुद्रलोक को प्राप्त कर लेता है — ऐसा पितामह ने कहा।

श्लोक 33 (skanda.8.7.33)

यत्र चापि शिरस्तस्य चिच्छेद भुवनेश्वरः । तत्र सोभवन्नाम्ना देशः पुण्यतमः शुभः

yatra cāpi śirastasya ciccheda bhuvaneśvaraḥ | tatra sobhavannāmnā deśaḥ puṇyatamaḥ śubhaḥ

और जहाँ भुवनेश्वर ने उसका सिर काटा था, वहाँ वह अत्यन्त पुण्यमय एवं शुभ स्थान उसी नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 34 (skanda.8.7.34)

ततो देवः सह गणैः रूपं विकृतमास्थितः । पश्यतां सर्वदेवानामन्तर्द्धानमगात् प्रभुः

tato devaḥ saha gaṇaiḥ rūpaṁ vikṛtamāsthitaḥ | paśyatāṁ sarvadevānāmantarddhānamagāt prabhuḥ

तत्पश्चात् विकृत रूप धारण किये हुए वे देव अपने गणों सहित समस्त देवताओं के देखते-देखते अन्तर्धान हो गये।

श्लोक 35 (skanda.8.7.35)

एतच्च देवनाथेन कपालस्थानमव्ययम् । सर्वतीर्थाभिषेकस्य फलेन समयोजि यत्

etacca devanāthena kapālasthānamavyayam | sarvatīrthābhiṣekasya phalena samayoji yat

और इस देवनाथ द्वारा यह अविनाशी कपाल-स्थान समस्त तीर्थों में स्नान करने के फल से युक्त किया गया।

श्लोक 36 (skanda.8.7.36)

तदद्यापि महद्दिव्यं सरस्तत्र प्रदृश्यते । महाकपालं विप्रेन्द्राः स्वर्गस्तत्राक्षयः स्मृतः

tadadyāpi mahaddivyaṁ sarastatra pradṛśyate | mahākapālaṁ viprendrāḥ svargastatrākṣayaḥ smṛtaḥ

हे विप्रेन्द्रो! वह महान् दिव्य सरोवर आज भी वहाँ दिखायी देता है; उसे 'महाकपाल' कहते हैं, और वहाँ अक्षय स्वर्ग माना गया है।

श्लोक 37 (skanda.8.7.37)

इदं शुभं दिव्यमघौघशासनं महाह्रदं सेन्द्रसुरासुरार्चितम् । महाकपालप्रकृतोपवर्णनं सुरेशलोकादिविगाहने हितम्

idaṁ śubhaṁ divyamaghaughaśāsanaṁ mahāhradaṁ sendrasurāsurārcitam | mahākapālaprakṛtopavarṇanaṁ sureśalokādivigāhane hitam

यह शुभ, दिव्य, पापसमूह का नाशक महाह्रद, इन्द्र सहित देवों और असुरों द्वारा पूजित है; महाकपाल के इस स्वरूप-वर्णन को सुरेश्वर-लोक आदि में प्रवेश के लिए हितकारी माना गया है।

श्लोक 38 (skanda.8.7.38)

तपोधनैः सिद्धगणैश्च संस्तुतं दिविष्टतुल्यं द्विजराजमण्डलम् । पठेन्नरो यः शृणुयाच्च सर्वदा त्रिविष्टपं गच्छति सोभिनन्दितः

tapodhanaiḥ siddhagaṇaiśca saṁstutaṁ diviṣṭatulyaṁ dvijarājamaṇḍalam | paṭhennaro yaḥ śṛṇuyācca sarvadā triviṣṭapaṁ gacchati sobhinanditaḥ

तपोधन मुनियों और सिद्धगणों द्वारा स्तुत, स्वर्ग के समान यह द्विजराजमण्डल (श्रेष्ठ ब्राह्मणों/चन्द्रमा का मण्डल) — जो मनुष्य इसे सदा पढ़ता या सुनता है, वह सम्मानित होकर स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।

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