अम्बिका खण्ड · अध्याय 183
शिवलोकवर्णनम् एवं पुराणोपसंहारः
श्लोक 1 (skanda.8.183.1)
सनत्कुमार उवाच । सत्यस्य महतश्चैव जनस्य तपसस्तथा । भव्यभूतभवानां च सप्तानामूर्घ्वतः स्थितः
sanatkumāra uvāca | satyasya mahataścaiva janasya tapasastathā | bhavyabhūtabhavānāṁ ca saptānāmūrghvataḥ sthitaḥ
सनत्कुमार ने कहा - सत्य, महत्, जन, और तप, तथा भव्य, भूत, और भव - इन सात लोकों के ऊपर,
श्लोक 2 (skanda.8.183.2)
लोको भगवतः शम्भोर्यत्रास्ते सकलः शिवः । नासौ तर्कविनिर्देश्यो लोकास्तस्मिन् प्रतिष्ठिताः
loko bhagavataḥ śambhoryatrāste sakalaḥ śivaḥ | nāsau tarkavinirdeśyo lokāstasmin pratiṣṭhitāḥ
भगवान् शम्भु का वह लोक है, जहाँ सकल शिव निवास करते हैं; उसे मात्र तर्क से नहीं दिखाया जा सकता - सभी लोक उसी में प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 3 (skanda.8.183.3)
ऊर्ध्वं तिर्यगधस्ताच्च लोकास्तद्विनिबन्धनाः । ब्रह्माण्डं सकलं तस्मिञ्छिवलोके प्रतिष्ठितम्
ūrdhvaṁ tiryagadhastācca lokāstadvinibandhanāḥ | brahmāṇḍaṁ sakalaṁ tasmiñchivaloke pratiṣṭhitam
ऊपर, चारों ओर, और नीचे, सभी लोक उससे बद्ध हैं; सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उस शिवलोक के भीतर ही स्थित है।
श्लोक 4 (skanda.8.183.4)
नासौ नश्यति संहारे ध्रुवः स्थाणुः सुरालयः । यत्राहं सनकाद्याश्च ब्रह्मा चैव पितामहः
nāsau naśyati saṁhāre dhruvaḥ sthāṇuḥ surālayaḥ | yatrāhaṁ sanakādyāśca brahmā caiva pitāmahaḥ
वह प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होता; नित्य, स्थिर, देवताओं का वह निवास है - जहाँ मैं, और सनक आदि, और पितामह ब्रह्मा भी,
श्लोक 5 (skanda.8.183.5)
बालखिल्यपुरोगाश्च सिद्धाश्च कपिलादयः । शिवयोगपरिप्राप्त्या सत्वादिगुणवर्जिताः
bālakhilyapurogāśca siddhāśca kapilādayaḥ | śivayogapariprāptyā satvādiguṇavarjitāḥ
तथा बालखिल्य आदि, और कपिल आदि सिद्धगण, योग से शिव के साथ संयोग प्राप्त कर, सत्त्व आदि गुणों से मुक्त होकर,
श्लोक 6 (skanda.8.183.6)
तिष्ठामो निर्वृता व्यास सेवमानास्तमीश्वरम् । परमाणुरसावीशो भावगम्यो मनीषिणाम्
tiṣṭhāmo nirvṛtā vyāsa sevamānāstamīśvaram | paramāṇurasāvīśo bhāvagamyo manīṣiṇām
शान्तभाव से, हे व्यास! उस ईश्वर की सेवा करते हुए निवास करते हैं। वे प्रभु अणु-स्वरूप हैं, बुद्धिमानों द्वारा केवल भाव से ही प्राप्य हैं।
श्लोक 7 (skanda.8.183.7)
परमैश्वर्यसंयुक्तस्तत्रास्ते विग्रहेश्वरः । क्षमा सत्यं धृतिश्चैव तपो वैराग्यमेव च
paramaiśvaryasaṁyuktastatrāste vigraheśvaraḥ | kṣamā satyaṁ dhṛtiścaiva tapo vairāgyameva ca
परम ऐश्वर्य से युक्त, सकल रूप वाले प्रभु वहाँ निवास करते हैं; क्षमा, सत्य, धृति, तप, तथा वैराग्य भी,
श्लोक 8 (skanda.8.183.8)
स्रष्टृत्वं ज्ञानवैराग्यादात्मबोधो महेशता । नित्यमेतानि तिष्ठन्ति तस्मिन्देवे महेश्वरे
sraṣṭṛtvaṁ jñānavairāgyādātmabodho maheśatā | nityametāni tiṣṭhanti tasmindeve maheśvare
ज्ञान और वैराग्य से उत्पन्न सृष्टि-शक्ति, आत्मज्ञान, और माहेश्वर्य पद - ये सब उस माहेश्वर देव में सदा विद्यमान रहते हैं।
श्लोक 9 (skanda.8.183.9)
योगवह्निरसावात्मा ब्रह्मसृक्परमेश्वरः । साकल्यान्मूर्त्तिमास्थाय करोति जगतः स्थितिम्
yogavahnirasāvātmā brahmasṛkparameśvaraḥ | sākalyānmūrttimāsthāya karoti jagataḥ sthitim
वे स्वयं, योगाग्नि-स्वरूप, ब्रह्म के मूल, परमेश्वर, अपनी सकलता से देहरूप धारण कर, संसार की व्यवस्था बनाये रखते हैं।
श्लोक 10 (skanda.8.183.10)
अष्टमं ध्रुवमध्येयमक्षरं मुक्तिकारणम् । मायाधाम तदीशस्य जगत्संहारहेतुमत्
aṣṭamaṁ dhruvamadhyeyamakṣaraṁ muktikāraṇam | māyādhāma tadīśasya jagatsaṁhārahetumat
वह आठवाँ, स्थिर, ध्येय, अविनाशी तत्त्व, मोक्ष का कारण - उन्हीं प्रभु की माया का वह स्थान, संसार के विलय का कारण -
श्लोक 11 (skanda.8.183.11)
ऊर्ध्वतो ब्रह्मलोकस्य योजनानां महात्मनः । विंशतीनान्तु कोटीनां पुरं स्थाणोः समास्थितम्
ūrdhvato brahmalokasya yojanānāṁ mahātmanaḥ | viṁśatīnāntu koṭīnāṁ puraṁ sthāṇoḥ samāsthitam
ब्रह्मलोक के ऊपर, उस महात्मा से बीस करोड़ योजन की दूरी पर, स्थाणु की वह नगरी स्थित है।
श्लोक 12 (skanda.8.183.12)
एतावानूर्ध्वसञ्चारो गत्यन्तश्च ततः स्मृतः । असंख्याताः पुरे तस्मिन्नित्याः सूक्ष्मास्तथाव्ययाः
etāvānūrdhvasañcāro gatyantaśca tataḥ smṛtaḥ | asaṁkhyātāḥ pure tasminnityāḥ sūkṣmāstathāvyayāḥ
इतनी ही ऊर्ध्वगमन की सीमा स्मरण की जाती है, और उससे आगे की गति की सीमा भी; उस नगरी में अनगिनत, नित्य, सूक्ष्म, तथा अविनाशी भी
श्लोक 13 (skanda.8.183.13)
ज्ञानाधिकारधर्मिण्यः शैवीप्रकृतयः स्थिताः । याभ्यो जज्ञे महेशानौ ब्रह्मविष्णू प्रजापती
jñānādhikāradharmiṇyaḥ śaivīprakṛtayaḥ sthitāḥ | yābhyo jajñe maheśānau brahmaviṣṇū prajāpatī
शैव प्रकृतियाँ प्रतिष्ठित हैं, जो ज्ञान पर अधिकार के गुण से युक्त हैं, जिनसे ब्रह्मा और विष्णु - दोनों महान् प्रजापति उत्पन्न हुए।
श्लोक 14 (skanda.8.183.14)
ताभ्यां प्रकृतिभूताभ्यां स्रष्टृत्वं परमं ददौ । अक्षयो विमलः सूक्ष्मो निष्कलः सकलोपि च
tābhyāṁ prakṛtibhūtābhyāṁ sraṣṭṛtvaṁ paramaṁ dadau | akṣayo vimalaḥ sūkṣmo niṣkalaḥ sakalopi ca
प्रकृति के विकाररूप बने उन दोनों को, उन्होंने सृष्टि की परम शक्ति दी - अविनाशी, निर्मल, सूक्ष्म, निराकार, और साकार भी,
श्लोक 15 (skanda.8.183.15)
स्थिरे मूर्ते परे दिव्ये परमाणुपदे स्थितः । मनसः प्राक्तमस्यादौ तत्तेजःसंप्रकाशनम्
sthire mūrte pare divye paramāṇupade sthitaḥ | manasaḥ prāktamasyādau tattejaḥsaṁprakāśanam
स्थिर, देहधारी, परम, दिव्य, आदि परमाणु-अवस्था में प्रतिष्ठित - मन से पहले, इस सृष्टि के आरम्भ में ही, उस तेज का प्राकट्य हुआ,
श्लोक 16 (skanda.8.183.16)
यदासीद्धैममण्डन्तु लौकिकं त्वापवर्गिकम् । महत्तत् सर्वतो नित्यमीश्वरात्तदभूत्तदा
yadāsīddhaimamaṇḍantu laukikaṁ tvāpavargikam | mahattat sarvato nityamīśvarāttadabhūttadā
जब वह स्वर्णिम अण्ड था, लौकिक भी और मोक्षकारी भी; वह महान् तत्त्व, सदा, हर ओर से, तब प्रभु से ही उत्पन्न हुआ।
श्लोक 17 (skanda.8.183.17)
तस्माद्बीजस्य निर्भेदः क्षेत्रज्ञः स विभुः स्मृतः । प्रकृतिर्वैष्णवी प्रोक्ता सा च तस्माद्विनिर्गता
tasmādbījasya nirbhedaḥ kṣetrajñaḥ sa vibhuḥ smṛtaḥ | prakṛtirvaiṣṇavī proktā sā ca tasmādvinirgatā
उससे अखण्ड बीज - वे क्षेत्रज्ञ, सर्वव्यापी कहे जाते हैं; और वैष्णवी नामक प्रकृति उसी स्रोत से प्रकट हुई,
श्लोक 18 (skanda.8.183.18)
सुरासुरादिसृष्ट्यर्थं ब्रह्मत्वं पुनरास्थिता । अण्डस्य भेदतः पद्मब्रह्मणः शंकरात्मनः । ब्रह्मलोकपुरस्ताच्च पुरं तेजोमयं महत्
surāsurādisṛṣṭyarthaṁ brahmatvaṁ punarāsthitā | aṇḍasya bhedataḥ padmabrahmaṇaḥ śaṁkarātmanaḥ | brahmalokapurastācca puraṁ tejomayaṁ mahat
देवों, असुरों आदि की सृष्टि के प्रयोजन से, पुनः ब्रह्मा की अवस्था में प्रतिष्ठित होकर; उस कमल-अण्ड के विदीर्ण होने से, ब्रह्म-स्वरूप, शंकर-स्वरूप - ब्रह्मलोक-रूपी नगरी से परे, वह महान्, तेजोमय नगरी थी।
श्लोक 19 (skanda.8.183.19)
यत् स्थानं विग्रहेशस्य ईश्वरस्य परात्मनः । नाम्ना शिवपुरं व्यास गतिरीश्वरयोगिनाम्
yat sthānaṁ vigraheśasya īśvarasya parātmanaḥ | nāmnā śivapuraṁ vyāsa gatirīśvarayoginām
सकल रूप वाले ईश्वर, परमात्मा का वह निवास - नाम से शिवपुर, हे व्यास! भगवद्भक्त योगियों का वह गन्तव्य है।
श्लोक 20 (skanda.8.183.20)
शतं शतसहस्राणां योजनानां तदुच्यते । महीमण्डलसंस्थानं तन्मध्ये विस्तृतं स्मृतम्
śataṁ śatasahasrāṇāṁ yojanānāṁ taducyate | mahīmaṇḍalasaṁsthānaṁ tanmadhye vistṛtaṁ smṛtam
वह सौ लाख योजन की कही जाती है; पृथ्वी के मण्डल पर फैला उसका विस्तार, उसके भीतर विशाल कहा जाता है।
श्लोक 21 (skanda.8.183.21)
स्फुरदादित्यरूपेण वह्नेरधिकतेजसा । महता हैमजातेन प्राकारेण सुवेष्टितम्
sphuradādityarūpeṇa vahneradhikatejasā | mahatā haimajātena prākāreṇa suveṣṭitam
सूर्य के समान चमकती, अग्नि से भी अधिक तेजस्वी, वह स्वर्णमय विशाल प्राचीर से भलीभाँति घिरी हुई है,
श्लोक 22 (skanda.8.183.22)
चतुर्भिर्हेमजैर्द्वारैर्मणिमुक्ताविभूषितैः । शोभितं तत्पुरं रम्यं शुशुभे सिद्धसेवितम्
caturbhirhemajairdvārairmaṇimuktāvibhūṣitaiḥ | śobhitaṁ tatpuraṁ ramyaṁ śuśubhe siddhasevitam
स्वर्णमय चार द्वारों से सुशोभित, रत्नों और मोतियों से अलंकृत; वह आनन्ददायी नगरी, इस प्रकार सुसज्जित, सिद्धों द्वारा सेवित, सुशोभित होती थी।
श्लोक 23 (skanda.8.183.23)
जरामृत्युश्रमव्याधिकोपमोहमदादयः । न क्रमन्त्यशुभास्तस्मिन् भावाः शिवपुरे मुने
jarāmṛtyuśramavyādhikopamohamadādayaḥ | na kramantyaśubhāstasmin bhāvāḥ śivapure mune
जरा, मृत्यु, थकान, रोग, क्रोध, मोह, तथा मद आदि - ये अमंगल भाव उस शिवपुर में प्रवेश नहीं करते, हे मुने!
श्लोक 24 (skanda.8.183.24)
शतं शतसहस्राणां योजनानां यथादिशम् । तत् पुरं वृषभाङ्कस्य सर्वव्यापि समृद्धिमत्
śataṁ śatasahasrāṇāṁ yojanānāṁ yathādiśam | tat puraṁ vṛṣabhāṅkasya sarvavyāpi samṛddhimat
वह हर दिशा में सौ लाख योजन की है; वृषभध्वज की वह नगरी सर्वव्यापी, सम्पन्नता से परिपूर्ण है।
श्लोक 25 (skanda.8.183.25)
दिव्या मारकती भूमिः स्पर्शमात्रसुखावहा । वैदूर्यमणिकल्पानि बालार्कसदृशानि च
divyā mārakatī bhūmiḥ sparśamātrasukhāvahā | vaidūryamaṇikalpāni bālārkasadṛśāni ca
उसकी दिव्य भूमि पन्ना (मरकत) की है, जो स्पर्शमात्र से सुख देती है; वैडूर्य के समान कमल-सरोवर हैं, और कुछ नवोदित सूर्य के समान,
श्लोक 26 (skanda.8.183.26)
क्वचिद्रक्तानि पद्मानि क्वचिच्छ्वेतानि रेजिरे । महाह्रदप्रमाणानि नालैर्वैदूर्यसन्निभैः
kvacidraktāni padmāni kvacicchvetāni rejire | mahāhradapramāṇāni nālairvaidūryasannibhaiḥ
तथा यत्र-तत्र लाल कमल, यत्र-तत्र श्वेत कमल, महासरोवरों के आकार के, वैडूर्य के समान डण्ठलों वाले सुशोभित थे,
श्लोक 27 (skanda.8.183.27)
गन्धवन्ति महार्हाणि विन्यस्तानि महीतले । इन्द्रनीलनिकाशानि महामणिनिभानि च
gandhavanti mahārhāṇi vinyastāni mahītale | indranīlanikāśāni mahāmaṇinibhāni ca
सुगन्धित, अत्यन्त बहुमूल्य, भूमि पर स्थित - कुछ नीलम के समान, और कुछ महारत्नों के समान,
श्लोक 28 (skanda.8.183.28)
कचित् कृष्णार्धरक्तानि दिव्यगन्धवहानि च । तत्र उत्पलानि समन्ततः
kacit kṛṣṇārdharaktāni divyagandhavahāni ca | tatra utpalāni samantataḥ
और कुछ श्याम, लालिमायुक्त, दिव्य सुगन्ध बिखेरते हुए; वहाँ नीलकमल भी चारों ओर थे।
श्लोक 29 (skanda.8.183.29)
प्रवहन्ति महानद्यो यास्तस्मिन्नमृतोदकम् । पुरे भगवतः शम्भोः पाराशर्य निबोध ताः
pravahanti mahānadyo yāstasminnamṛtodakam | pure bhagavataḥ śambhoḥ pārāśarya nibodha tāḥ
महानदियाँ बहती हैं, जिनका जल उस स्थान में अमृततुल्य है; अब सुनो, हे पराशरनन्दन! भगवान् शम्भु की उस नगरी की उन नदियों के विषय में -
श्लोक 30 (skanda.8.183.30)
वरदा च वरेण्या च वरेशा वरवर्णिनी । वाराही वारिभद्रा च वरा चैव महापगाः
varadā ca vareṇyā ca vareśā varavarṇinī | vārāhī vāribhadrā ca varā caiva mahāpagāḥ
वरदा, वरेण्या, वरेशा, वरवर्णिनी, वाराही, वरिभद्रा, और वरा भी - ये महानदियाँ,
श्लोक 31 (skanda.8.183.31)
नानाकुसुमसंमिश्रं ता वहन्ति जलामृतम् । न देवा न मुनीन्द्राश्च नासुराः पितरो न च
nānākusumasaṁmiśraṁ tā vahanti jalāmṛtam | na devā na munīndrāśca nāsurāḥ pitaro na ca
अनेक फूलों से मिश्रित, उस अमृततुल्य जल को धारण करती हैं। न देवता, न श्रेष्ठ मुनि, न असुर, न पितर,
श्लोक 32 (skanda.8.183.32)
न चैवान्ये समर्थाः स्युर्ज्ञातुं तत्पुरमद्भुतम् । अन्तर्मनसि बुद्धा ये सर्वतो भक्तिभाविताः । शिवैकमनसो व्यास तस्मिन्मोदन्ति ते नराः
na caivānye samarthāḥ syurjñātuṁ tatpuramadbhutam | antarmanasi buddhā ye sarvato bhaktibhāvitāḥ | śivaikamanaso vyāsa tasminmodanti te narāḥ
और न ही अन्य कोई, उस अद्भुत नगरी को जान पाते हैं; केवल वे मनुष्य, जिनका अन्तर्मन जागृत है, भक्ति से परिपूर्ण, शिव में एकनिष्ठ, हे व्यास! वहाँ आनन्दित होते हैं।
श्लोक 33 (skanda.8.183.33)
तस्य मध्ये पुरेन्द्रस्य सूर्यज्वलनवर्चसः । मेरुशृङ्गप्रतीकाशो दिग्भद्रस्तपनप्रभः
tasya madhye purendrasya sūryajvalanavarcasaḥ | meruśṛṅgapratīkāśo digbhadrastapanaprabhaḥ
उस श्रेष्ठ नगरी के मध्य में, प्रज्वलित सूर्य के तेज वाला, मेरु शिखर के समान, सब दिशाओं में मंगलमय, सूर्य के समान दीप्तिमान,
श्लोक 34 (skanda.8.183.34)
प्रासादो लक्षपादस्तु कामगः कनकामयः । अनिरीक्ष्यैर्महारत्नैः समन्तात् परिशोभितम्
prāsādo lakṣapādastu kāmagaḥ kanakāmayaḥ | anirīkṣyairmahāratnaiḥ samantāt pariśobhitam
वह प्रासाद है, प्रत्येक दिशा में सौ हजार का, इच्छानुसार गतिशील, स्वर्ण-निर्मित, चारों ओर चमकते महारत्नों से अलंकृत,
श्लोक 35 (skanda.8.183.35)
वैदूर्यैर्व्योमसंकाशैः स्फाटिकैश्चन्द्रसप्रभैः । प्रवालैरर्कसंकाशैरिन्द्रनीलमयैः परैः
vaidūryairvyomasaṁkāśaiḥ sphāṭikaiścandrasaprabhaiḥ | pravālairarkasaṁkāśairindranīlamayaiḥ paraiḥ
आकाश के समान वैडूर्यों से, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल स्फटिकों से, सूर्य के समान प्रवालों से, और नीलम-जड़ित अन्य रत्नों से,
श्लोक 36 (skanda.8.183.36)
शशिरश्मिप्रकाशाभिः क्वचिदर्कांशुरूपिभिः । शोभितं तत्पताकाभिर्विरराज सुखानिलम्
śaśiraśmiprakāśābhiḥ kvacidarkāṁśurūpibhiḥ | śobhitaṁ tatpatākābhirvirarāja sukhānilam
चन्द्रकिरणों के समान उज्ज्वल ध्वजाओं से, और कुछ सूर्यकिरणों के रूप में अलंकृत, वह सुखद वायु के साथ सुशोभित होता था।
श्लोक 37 (skanda.8.183.37)
सर्वर्तुकुसुमैश्चित्रैरिच्छारत्नफलैरपि । शुशुभे तत्पुरं कीर्णं पादपैर्गिरिसन्निभैः
sarvartukusumaiścitrairicchāratnaphalairapi | śuśubhe tatpuraṁ kīrṇaṁ pādapairgirisannibhaiḥ
सभी ऋतुओं के अद्भुत फूलों से, और कल्पवृक्ष के फलों से भी अलंकृत, वह नगरी पर्वत-सदृश वृक्षों से भरी सुशोभित थी।
श्लोक 38 (skanda.8.183.38)
महीध्राणां यथा मेरुस्सर्वेषां प्रवरो महान् । तथैव तत्पुरं रेजे सर्वलोकोपरि स्थितम्
mahīdhrāṇāṁ yathā merussarveṣāṁ pravaro mahān | tathaiva tatpuraṁ reje sarvalokopari sthitam
जैसे मेरु सभी पर्वतों में सबसे महान् और श्रेष्ठ है, वैसे ही वह नगरी सभी लोकों से ऊपर स्थित सुशोभित थी।
श्लोक 39 (skanda.8.183.39)
तत्र विश्वेश्वरः साक्षान्महाभूतपतिर्हरः । सदास्ते सहितः पत्न्या षड्विंशः परमेश्वरः
tatra viśveśvaraḥ sākṣānmahābhūtapatirharaḥ | sadāste sahitaḥ patnyā ṣaḍviṁśaḥ parameśvaraḥ
वहाँ विश्वेश्वर स्वयं, साक्षात्, महाभूतों के स्वामी, हर, सदा अपनी अर्धांगिनी सहित निवास करते हैं - षड्विंश, परमेश्वर।
श्लोक 40 (skanda.8.183.40)
लक्ष्मीर्मेधा धृतिश्चैव ह्रीः श्रीः किर्त्तिः सरस्वती । उमया सहितास्तत्र मोदन्ते लोकमातरः
lakṣmīrmedhā dhṛtiścaiva hrīḥ śrīḥ kirttiḥ sarasvatī | umayā sahitāstatra modante lokamātaraḥ
लक्ष्मी, मेधा, धृति, तथा ह्री, श्री, कीर्ति, और सरस्वती भी - जगत् की माताएँ, उमा के साथ वहाँ आनन्दित होती हैं।
श्लोक 41 (skanda.8.183.41)
शिवभावर्पितात्मानो ये नरा रुद्रतत्पराः । यत्र तत्र मृता वत्स तेषां तत्रास्पदं स्मृतम
śivabhāvarpitātmāno ye narā rudratatparāḥ | yatra tatra mṛtā vatsa teṣāṁ tatrāspadaṁ smṛtama
जिन पुरुषों की आत्मा शिवभाव में समर्पित है, रुद्र में तत्पर, वे जहाँ कहीं भी मरें, हे पुत्र! उनके लिए वहाँ निवास कहा गया है।
श्लोक 42 (skanda.8.183.42)
ये च माहेश्वरा व्यास तिष्ठन्ते शङ्करालये । मुनयः शङ्करं भक्तास्तान् शृणुष्व समाहितः
ye ca māheśvarā vyāsa tiṣṭhante śaṅkarālaye | munayaḥ śaṅkaraṁ bhaktāstān śṛṇuṣva samāhitaḥ
और, हे व्यास! सावधानी से उन माहेश्वर मुनियों के विषय में सुनो, जो शंकर के भक्त हैं, शंकर के निवास में रहते हैं -
श्लोक 43 (skanda.8.183.43)
अहं सनन्दनश्चैव सनकः ससनातनः । ऋभुर्ब्रह्मा सुरज्येष्ठो नरनारायणावपि
ahaṁ sanandanaścaiva sanakaḥ sasanātanaḥ | ṛbhurbrahmā surajyeṣṭho naranārāyaṇāvapi
मैं स्वयं, और सनन्दन, और सनक, सनातन सहित, ऋभु, देवताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मा, और नर-नारायण भी,
श्लोक 44 (skanda.8.183.44)
शिष्यः सिद्धः पञ्चशिखस्तथा । मुनिर्हयशिरा यश्च यज्ञवल्कादयस्तथा
śiṣyaḥ siddhaḥ pañcaśikhastathā | munirhayaśirā yaśca yajñavalkādayastathā
[स्रोत में गुरु का नाम लुप्त है] और उनका शिष्य, सिद्ध पञ्चशिख, तथा मुनि हयशिरा, और याज्ञवल्क्य आदि भी,
श्लोक 45 (skanda.8.183.45)
त्र्यक्षाः शङ्करवर्ष्माणः परमैश्वर्यसंयुताः । तिष्ठन्तीश्वरमूलस्था गुणातीता मुमुक्षवः
tryakṣāḥ śaṅkaravarṣmāṇaḥ paramaiśvaryasaṁyutāḥ | tiṣṭhantīśvaramūlasthā guṇātītā mumukṣavaḥ
त्रिनेत्र, शंकर के ही देहरूप, परम ऐश्वर्य से युक्त, प्रभु में जड़मूल, गुणातीत, मोक्षाभिलाषी होकर स्थित रहते हैं।
श्लोक 46 (skanda.8.183.46)
उत्पन्ने जगतो नाशे महाप्रलयसंज्ञके । ईश्वरं ते समाविश्य प्राप्नुवन्त्यपवर्गिकम्
utpanne jagato nāśe mahāpralayasaṁjñake | īśvaraṁ te samāviśya prāpnuvantyapavargikam
जब संसार का विनाश होता है, जिसे महाप्रलय कहा जाता है, तब प्रभु में प्रवेश कर, वे अपुनरावृत्ति की अवस्था को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 47 (skanda.8.183.47)
यैश्च दृष्टानि विप्रेन्द्र शिवलिङ्गानि तानि तु । केदारो मध्यमश्चैव गिरीशश्च महालये
yaiśca dṛṣṭāni viprendra śivaliṅgāni tāni tu | kedāro madhyamaścaiva girīśaśca mahālaye
और जिन शिवलिंगों का उन्होंने दर्शन किया, हे विप्रश्रेष्ठ! केदार, मध्यम, और महालय में गिरीश,
श्लोक 48 (skanda.8.183.48)
चतुःशृङ्गेश्वरो देवः श्रीगिरौ च महेश्वरः । कारोहणो च देवेशो गङ्गाद्वारे च शङ्करः । भद्रेशश्च महादेवः शंकुकर्णेश्वरस्तथा
catuḥśṛṅgeśvaro devaḥ śrīgirau ca maheśvaraḥ | kārohaṇo ca deveśo gaṅgādvāre ca śaṅkaraḥ | bhadreśaśca mahādevaḥ śaṁkukarṇeśvarastathā
चतुःशृंगेश्वर देव, और श्रीगिरि में महेश्वर, और करोहण के देवेश्वर, गंगाद्वार में शंकर, तथा भद्रेश, महादेव, और शंकुकर्णेश्वर भी,
श्लोक 49 (skanda.8.183.49)
महाकालेश्वरश्चैव गोकर्णे च तथा ह्युभौ । अविमुक्तेश्वरश्चैव यानि चान्यानि भूतले
mahākāleśvaraścaiva gokarṇe ca tathā hyubhau | avimukteśvaraścaiva yāni cānyāni bhūtale
और महाकालेश्वर, और गोकर्ण में दोनों, तथा अविमुक्तेश्वर भी, और पृथ्वी पर जो अन्य भी हैं -
श्लोक 50 (skanda.8.183.50)
तेपि यान्ति मृता व्यास तत्पुरं गिरिजापतेः । योगः पाशुपतो यश्च मया ते परिकीर्त्तितः
tepi yānti mṛtā vyāsa tatpuraṁ girijāpateḥ | yogaḥ pāśupato yaśca mayā te parikīrttitaḥ
वे भी, हे व्यास! मरणोपरान्त, गिरिजापति की उस नगरी को जाते हैं; और यह पाशुपत योग, जो मेरे द्वारा तुम्हें कहा गया,
श्लोक 51 (skanda.8.183.51)
व्रतं पाशुपतं प्राप्य सोपि तत्र प्रवर्तते । भक्तिर्येषां भवे नित्यं कृतार्थास्ते नरोत्तमाः
vrataṁ pāśupataṁ prāpya sopi tatra pravartate | bhaktiryeṣāṁ bhave nityaṁ kṛtārthāste narottamāḥ
पाशुपत व्रत प्राप्त कर, वह भी वहाँ फलित होता है; जिनकी भव में निरन्तर भक्ति है - वे श्रेष्ठ पुरुष कृतार्थ होते हैं।
श्लोक 52 (skanda.8.183.52)
मृताः शिवपुरे व्यास त्र्यक्षाः पट्टिशपाणयः । नन्दीशस्कन्दसंकाशा योगैश्वर्यबलान्विताः
mṛtāḥ śivapure vyāsa tryakṣāḥ paṭṭiśapāṇayaḥ | nandīśaskandasaṁkāśā yogaiśvaryabalānvitāḥ
शिवपुर में मरणकर, हे व्यास! त्रिनेत्र, हाथों में शूल लिये, नन्दीश और स्कन्द के समान, योगैश्वर्य और शक्ति से युक्त होकर,
श्लोक 53 (skanda.8.183.53)
रुद्रा भवन्ति ते व्यास सदा शंकरपार्श्वगाः । एष ते कथितः सर्वो योगो माहेश्वरः परः
rudrā bhavanti te vyāsa sadā śaṁkarapārśvagāḥ | eṣa te kathitaḥ sarvo yogo māheśvaraḥ paraḥ
वे रुद्र बन जाते हैं, हे व्यास! सदा शंकर के समीप रहते हुए। यह वह सम्पूर्ण परम माहेश्वर योग है, जो तुम्हें कहा गया।
श्लोक 54 (skanda.8.183.54)
सकलं निष्कलं चैव ज्ञात्वैवं परमीश्वरम् । सर्वबन्धविनिर्मुक्तः परं मोक्षमवाप्स्यसि
sakalaṁ niṣkalaṁ caiva jñātvaivaṁ paramīśvaram | sarvabandhavinirmuktaḥ paraṁ mokṣamavāpsyasi
इस प्रकार इस परमेश्वर को, साकार और निराकार दोनों रूपों में जानकर, समस्त बन्धन से मुक्त होकर, तुम परम मोक्ष प्राप्त करोगे,
श्लोक 55 (skanda.8.183.55)
भविष्यसि च योगात्मा ज्ञानस्यास्य प्रभावतः । जगात्स्थितिकरो योगी स्मार्त्तधर्मप्रवर्तकः
bhaviṣyasi ca yogātmā jñānasyāsya prabhāvataḥ | jagātsthitikaro yogī smārttadharmapravartakaḥ
और इस ज्ञान के प्रभाव से, तुम स्वयं योगस्वरूप बन जाओगे - संसार को धारण करने वाला योगी, स्मार्त धर्म का प्रवर्तक।
श्लोक 56 (skanda.8.183.56)
ज्ञानशक्त्या स्मृ ब्रह्माण्डोद्भकारणे । स्थितिधर्मनिबोधार्थं पुराणानि करिष्यसि
jñānaśaktyā smṛ brahmāṇḍodbhakāraṇe | sthitidharmanibodhārthaṁ purāṇāni kariṣyasi
ज्ञान के प्रभाव से [यहाँ स्रोत में कुछ अंश लुप्त है] सृष्टि के आरम्भ के विषय में, धर्म की व्यवस्था प्रकट करने के लिए, तुम पुराणों की रचना करोगे।
श्लोक 57 (skanda.8.183.57)
यज्ञधर्मप्रचारार्थ वेदं स्वायम्भुवस्मृतम् । विज्ञानात् त्वमनुस्मृत्य चतुर्धा विकरिष्यसि
yajñadharmapracārārtha vedaṁ svāyambhuvasmṛtam | vijñānāt tvamanusmṛtya caturdhā vikariṣyasi
यज्ञ-धर्म के प्रचार के लिए, स्वायम्भुव नाम से स्मृत वेद को, अपनी बुद्धि से स्मरण कर, तुम चार भागों में विभक्त करोगे।
श्लोक 58 (skanda.8.183.58)
मन्वन्तरमिदं कृत्स्नं वैवस्वतमनिन्दितम् । लोकस्थितिकरा धर्मा वेदस्मृतिपुरोगमाः
manvantaramidaṁ kṛtsnaṁ vaivasvatamaninditam | lokasthitikarā dharmā vedasmṛtipurogamāḥ
वैवस्वत मन्वन्तर के इस सम्पूर्ण, निर्दोष काल में - वेद और स्मृतियों के प्रधान, संसार को धारण करने वाले धर्म,
श्लोक 59 (skanda.8.183.59)
त्वत्कृताः प्रचरिष्यन्ति तीर्थकृत् त्वं भविष्यसि । भस्मव्रतं च संप्राप्य पशुपाशविमोचनम्
tvatkṛtāḥ pracariṣyanti tīrthakṛt tvaṁ bhaviṣyasi | bhasmavrataṁ ca saṁprāpya paśupāśavimocanam
तुम्हारे द्वारा रचित होकर फैलेंगे; तुम तीर्थों के निर्माता बनोगे। और, भस्म-व्रत प्राप्त कर, पाशव बन्धन से मुक्त होकर,
श्लोक 60 (skanda.8.183.60)
शांकरज्ञानसंपन्न ईश्वरे लयमाप्स्यसि । एवमुक्तः स विप्रेन्द्रो हृष्टसर्वतनूरुहः
śāṁkarajñānasaṁpanna īśvare layamāpsyasi | evamuktaḥ sa viprendro hṛṣṭasarvatanūruhaḥ
शैव ज्ञान से युक्त होकर, तुम प्रभु में लय प्राप्त करोगे। इस प्रकार सम्बोधित, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, शरीर के रोम-रोम में हर्ष से रोमांचित होकर,
श्लोक 61 (skanda.8.183.61)
उपसद्य मुनीन्द्रं तं भस्मसंस्कारमाप्तवान् । तत्क्षणाच्चास्य योगोसौ प्रादुर्भूतो महामुनेः
upasadya munīndraṁ taṁ bhasmasaṁskāramāptavān | tatkṣaṇāccāsya yogosau prādurbhūto mahāmuneḥ
उन मुनिश्रेष्ठ के समीप जाकर, भस्म का संस्कार प्राप्त किया; और उसी क्षण, वह योग उस महामुनि में उत्पन्न हो गया।
श्लोक 62 (skanda.8.183.62)
अभिवाद्य गुरुं व्यासो ब्रह्मसूनुं महौजसम् । शर्वायतनवीक्षार्थं विचचार महीतले
abhivādya guruṁ vyāso brahmasūnuṁ mahaujasam | śarvāyatanavīkṣārthaṁ vicacāra mahītale
अपने गुरु को प्रणाम कर, महातेजस्वी ब्रह्मपुत्र व्यास, शर्व के निवासों को देखने के लिए पृथ्वी पर विचरण करने लगे।
श्लोक 63 (skanda.8.183.63)
वायुरुवाच एवं सनत्कुमारस्तु पृष्टो व्यासेन धीमता । मुनीन्द्रः कथयामास पुराणं स्कन्दसंभवम्
vāyuruvāca evaṁ sanatkumārastu pṛṣṭo vyāsena dhīmatā | munīndraḥ kathayāmāsa purāṇaṁ skandasaṁbhavam
वायु ने कहा - इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यास द्वारा पूछे जाने पर, उन मुनिश्रेष्ठ सनत्कुमार ने स्कन्द की उत्पत्ति से सम्बद्ध यह पुराण कहा,
श्लोक 64 (skanda.8.183.64)
सर्वागमसमायुक्तं मन्वन्तरजगत्स्थितिम् । शिवयोगोद्भवं ध्यानं सर्वज्ञानार्णवं महत्
sarvāgamasamāyuktaṁ manvantarajagatsthitim | śivayogodbhavaṁ dhyānaṁ sarvajñānārṇavaṁ mahat
जो समस्त शास्त्रों से युक्त है, कालों के अनुसार संसार-व्यवस्था का, शिवयोग से उत्पन्न ध्यान का, समस्त ज्ञान का महासागर है।
श्लोक 65 (skanda.8.183.65)
तस्माद्यूयमपि ज्ञात्वा व्रतं पाशुपतं द्विजाः । अभ्यस्य शांकरं योगमीश्वरे लयमाप्नुत
tasmādyūyamapi jñātvā vrataṁ pāśupataṁ dvijāḥ | abhyasya śāṁkaraṁ yogamīśvare layamāpnuta
अतः तुम भी, इसे समझकर, हे द्विज! पाशुपत व्रत का, और शैव योग का अभ्यास कर, प्रभु में लय प्राप्त करो।
श्लोक 66 (skanda.8.183.66)
इममागममन्विष्य व्यासोसौ मुनिपुङ्गवः । वेदार्थस्मृतिसंबद्धा विद्याश्चके महामुनिः
imamāgamamanviṣya vyāsosau munipuṅgavaḥ | vedārthasmṛtisaṁbaddhā vidyāścake mahāmuniḥ
इस शास्त्र की खोज कर, वे मुनिश्रेष्ठ व्यास, वेद और स्मृतियों के अर्थ से सम्बद्ध शास्त्रों की रचना करने लगे, वे महामुनि।
श्लोक 67 (skanda.8.183.67)
अतो विनिर्गता धर्मा योगविद्यास्तथैव च । पुराणं प्रथमं प्राहुराद्यं नन्दीश्वरो द्विजाः
ato vinirgatā dharmā yogavidyāstathaiva ca | purāṇaṁ prathamaṁ prāhurādyaṁ nandīśvaro dvijāḥ
इससे धर्म उत्पन्न हुए, और योग के शास्त्र भी; इसे वे सबसे प्रथम पुराण कहते हैं, आदि, हे ब्राह्मणो!
श्लोक 68 (skanda.8.183.68)
ख्यातो य इमं वेत्ति तत्त्वतः । त्रिवर्गः प्राप्यते तेन मुक्तिरेतेन जायते
khyāto ya imaṁ vetti tattvataḥ | trivargaḥ prāpyate tena muktiretena jāyate
प्रसिद्ध, जो इसे सत्यरूप में जानता है, उसके द्वारा त्रिविध जीवन-लक्ष्य प्राप्त होता है, और इससे मोक्ष उत्पन्न होता है।
श्लोक 69 (skanda.8.183.69)
आयुः प्रवर्द्धतेनेन सर्वमेतेन लभ्यते । कृत्स्नस्य जगतो विप्रा आदिकर्ता यथा हरः
āyuḥ pravarddhatenena sarvametena labhyate | kṛtsnasya jagato viprā ādikartā yathā haraḥ
इससे आयु बढ़ती है, इससे सब कुछ प्राप्त होता है; जैसे हर सम्पूर्ण संसार के आदि रचयिता हैं, हे ब्राह्मणो!
श्लोक 70 (skanda.8.183.70)
तथा सर्वपुराणानां पुराणोयं परः स्मृतः । अधीतो यैरयं विप्रैस्तत्प
tathā sarvapurāṇānāṁ purāṇoyaṁ paraḥ smṛtaḥ | adhīto yairayaṁ vipraistatpa
वैसे ही यह पुराण समस्त पुराणों में श्रेष्ठ माना जाता है। जिन ब्राह्मणों ने इसका अध्ययन किया है, वे [यहाँ स्रोत में कुछ अंश लुप्त है] ...
श्लोक 71 (skanda.8.183.71)
सायुज्यं शृणुयाद्विभोः
sāyujyaṁ śṛṇuyādvibhoḥ
...[इस श्लोक का आरम्भ लुप्त है] ...प्रभु के साथ संयोग के विषय में सुनना चाहिए।
श्लोक 72 (skanda.8.183.72)
सेवनाद्योगसंसिद्धिं मोक्षं च परमं लभेत् । आद्यं पुण्यमुमापतेर्द्विजवृषाः स्तोत्रानुवादं परं देव्याश्चापि महाप्रभावकथनं सर्वागमैरंन्वितम् । स्कन्दस्योद्भवविक्रमै प्नुयुः
sevanādyogasaṁsiddhiṁ mokṣaṁ ca paramaṁ labhet | ādyaṁ puṇyamumāpaterdvijavṛṣāḥ stotrānuvādaṁ paraṁ devyāścāpi mahāprabhāvakathanaṁ sarvāgamairaṁnvitam | skandasyodbhavavikramai pnuyuḥ
भक्तिपूर्वक सेवा से वे योग की सिद्धि और परम मोक्ष प्राप्त करते हैं। उमापति की यह आदि, पवित्र, परम स्तुति, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! और देवी की महती शक्ति का वृत्तान्त भी, समस्त शास्त्रों से युक्त - स्कन्द की उत्पत्ति और पराक्रम की कथा [यहाँ स्रोत में कुछ अंश लुप्त है] ...वे प्राप्त करते हैं [इस श्लोक का शेष भाग लुप्त है]।
श्लोक 73 (skanda.8.183.73)
नागेन्द्रैरसुरेन्द्रयक्षविबुधैः सिद्धैर्द्विजेन्द्रैरपि शम्भावर्पितसर्वभावहृदयैर्यैयैरयं सेवितः । सर्वे ते ज्वलदर्कवह्निवपुषस्त्र्यक्षाः शशाङ्कत्विषः देवास्यानुचरा बभुर्गणवरा
nāgendrairasurendrayakṣavibudhaiḥ siddhairdvijendrairapi śambhāvarpitasarvabhāvahṛdayairyaiyairayaṁ sevitaḥ | sarve te jvaladarkavahnivapuṣastryakṣāḥ śaśāṅkatviṣaḥ devāsyānucarā babhurgaṇavarā
नागेन्द्रों, असुरेन्द्रों, यक्षों, विद्वानों, सिद्धों, तथा द्विजश्रेष्ठों द्वारा भी सेवित, जिनका हृदय पूर्णतः शम्भु को समर्पित है - वे सब, सूर्य और अग्नि के समान देदीप्यमान शरीर वाले, त्रिनेत्र, चन्द्रमा के समान कान्तिवाले, उस देव के अनुचर, श्रेष्ठ गण बन गये... [इस श्लोक का शेष भाग, और आगे का पाठ, लुप्त है]।