अम्बिका खण्ड · अध्याय 182
पाशुपतयोगवर्णन-नवम
श्लोक 1 (skanda.8.182.1)
व्यास उवाच । भगवन् सर्वयोगीश सर्वामरनमस्कृत । अहो ज्ञानं त्वयाख्यातमज्ञानविनिवर्तनम्
vyāsa uvāca | bhagavan sarvayogīśa sarvāmaranamaskṛta | aho jñānaṁ tvayākhyātamajñānavinivartanam
व्यास ने कहा - हे भगवन्! सर्वयोगीश्वर! सर्वदेवताओं द्वारा नमस्कृत! अहो, आपने जो ज्ञान बताया, वह अज्ञान का निवारण करनेवाला है!
श्लोक 2 (skanda.8.182.2)
अद्याहं गतसन्देहो महादेवं परं प्रति । शङ्करात् प्रकृतिर्जाता ब्रह्मविष्णू तदात्मकौ
adyāhaṁ gatasandeho mahādevaṁ paraṁ prati | śaṅkarāt prakṛtirjātā brahmaviṣṇū tadātmakau
आज मैं महादेव परमात्मा के विषय में सन्देहरहित हो गया; शंकर से प्रकृति उत्पन्न हुई, और ब्रह्मा-विष्णु उसी के स्वरूप हैं।
श्लोक 3 (skanda.8.182.3)
ज्ञात्वा षडविंशमीशानं मुच्यते बन्धनादिति । सर्वयोगपथात् पूर्वमुक्त्वा सकलसंहिताम्
jñātvā ṣaḍaviṁśamīśānaṁ mucyate bandhanāditi | sarvayogapathāt pūrvamuktvā sakalasaṁhitām
षड्विंशक ईशान को जानकर मनुष्य बन्धन से मुक्त हो जाता है - इस प्रकार सम्पूर्ण योगमार्ग की सम्पूर्ण संहिता कहकर,
श्लोक 4 (skanda.8.182.4)
निष्कलं सकलं ज्ञानं कोन्य एवं प्रभाषते । श्रवणादस्य विप्रेन्द्र देहं मुक्तमबोधिषम्
niṣkalaṁ sakalaṁ jñānaṁ konya evaṁ prabhāṣate | śravaṇādasya viprendra dehaṁ muktamabodhiṣam
निष्कल-सकल ज्ञान - और कौन इस प्रकार कह सकता है? इसे सुनने मात्र से, हे विप्रेन्द्र! मैंने अपने शरीर को मुक्त हुआ, जागृत अनुभव किया।
श्लोक 5 (skanda.8.182.5)
त्वत्प्रसादादहं तात प्राप्तज्ञानो गताशुभः । विसन्देहो भवं शान्तः प्रष्टव्यं किञ्चिदस्ति मे
tvatprasādādahaṁ tāta prāptajñāno gatāśubhaḥ | visandeho bhavaṁ śāntaḥ praṣṭavyaṁ kiñcidasti me
आपकी कृपा से, हे तात! मैंने ज्ञान प्राप्त किया, अशुभ दूर हो गया; सन्देहरहित, संसार के विषय में शान्त - फिर भी मुझे कुछ पूछना शेष है।
श्लोक 6 (skanda.8.182.6)
तत्त्वां विज्ञापयामीदं निष्ठामाख्यातुमर्हसि । एवं विज्ञानसंपन्नः प्राप्तयोगो मुनिर्मुने
tattvāṁ vijñāpayāmīdaṁ niṣṭhāmākhyātumarhasi | evaṁ vijñānasaṁpannaḥ prāptayogo munirmune
वह मैं आपको निवेदन करता हूँ, आप उसकी परिणति बताने योग्य हैं। इस प्रकार विज्ञानसम्पन्न, योगप्राप्त मुनि, हे मुने!
श्लोक 7 (skanda.8.182.7)
विनाक्लेशं तनुं त्यक्त्वा योगी योगबलान्वितः । कथमाप्नोति तद् ब्रह्म निष्कलं परमेश्वरम्
vinākleśaṁ tanuṁ tyaktvā yogī yogabalānvitaḥ | kathamāpnoti tad brahma niṣkalaṁ parameśvaram
बिना क्लेश के देह त्यागकर, योगबल से युक्त योगी, कैसे उस निष्कल ब्रह्म, परमेश्वर को प्राप्त करता है?
श्लोक 8 (skanda.8.182.8)
ईश्वराधानसंप्राप्तेरुपायं मोक्षलम्भनम् । कथयस्व मुनिश्रेष्ठ प्रष्टव्यं नान्यदस्ति मे
īśvarādhānasaṁprāpterupāyaṁ mokṣalambhanam | kathayasva muniśreṣṭha praṣṭavyaṁ nānyadasti me
ईश्वर के साथ संयोग की प्राप्ति के उपाय को, मोक्ष प्राप्ति को, हे मुनिश्रेष्ठ! बताइये; मुझे और कुछ नहीं पूछना है।
श्लोक 9 (skanda.8.182.9)
एवमुक्तः स शिष्येण व्यासेन सुमहात्मना । कथयामास विप्रेन्द्रः शिवसिद्धान्तनिश्चयम्
evamuktaḥ sa śiṣyeṇa vyāsena sumahātmanā | kathayāmāsa viprendraḥ śivasiddhāntaniścayam
इस प्रकार महात्मा शिष्य व्यास द्वारा कहे जाने पर, वे विप्रेन्द्र शिवसिद्धान्त के निश्चय को कहने लगे।
श्लोक 10 (skanda.8.182.10)
सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास परं ज्ञानमीश्वराधानकारणम् । स्वेच्छया येन मुच्यन्ते योगिनो ज्ञानतत्पराः
sanatkumāra uvāca | śṛṇu vyāsa paraṁ jñānamīśvarādhānakāraṇam | svecchayā yena mucyante yogino jñānatatparāḥ
सनत्कुमार ने कहा - सुनो, हे व्यास! परम ज्ञान, ईश्वर के साथ संयोग का कारण, जिससे ज्ञानपरायण योगी इच्छानुसार मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.8.182.11)
त्रिधोत्क्रान्तिमिमां ज्ञात्वा मुहुरभ्यस्य चैव हि । स्वदेहं रिपुवत् त्वक्त्वा षड्विंशे लयमाप्नुयात्
tridhotkrāntimimāṁ jñātvā muhurabhyasya caiva hi | svadehaṁ ripuvat tvaktvā ṣaḍviṁśe layamāpnuyāt
इस त्रिविध उत्क्रान्ति (देहत्याग की विधि) को जानकर, बार-बार अभ्यास करके, अपने शरीर को शत्रु के समान त्यागकर, षड्विंशक में लय प्राप्त करता है।
श्लोक 12 (skanda.8.182.12)
या नाड्यो वाय्ववष्टब्धाः संवरन्ति शरीरिणम् । शतं तासां शतानां तु कर्णिकामध्यमाश्रितम्
yā nāḍyo vāyvavaṣṭabdhāḥ saṁvaranti śarīriṇam | śataṁ tāsāṁ śatānāṁ tu karṇikāmadhyamāśritam
वायु से युक्त जो नाड़ियाँ शरीरधारी को घेरे रहती हैं, उनकी सौ-सौ, कर्णिका के मध्य में आश्रित हैं;
श्लोक 13 (skanda.8.182.13)
तमाश्रित्या स्थिता नाड्यो नाभ्यां पादेष्वधोगताः । शिरोबद्धाः स्मृता भूयस्ता एव करमास्थिताः
tamāśrityā sthitā nāḍyo nābhyāṁ pādeṣvadhogatāḥ | śirobaddhāḥ smṛtā bhūyastā eva karamāsthitāḥ
उसका आश्रय लेकर स्थित नाड़ियाँ नाभि और पैरों में नीचे जाती हैं; और मस्तक से बद्ध कही गयी अन्य वे ही हाथों में स्थित हैं;
श्लोक 14 (skanda.8.182.14)
करमाश्रित्य ता भूयः कर्णिकां पुनराश्रिताः । द्विसप्ततिसहस्राणि नाडोनामपरा मुने
karamāśritya tā bhūyaḥ karṇikāṁ punarāśritāḥ | dvisaptatisahasrāṇi nāḍonāmaparā mune
हाथों का आश्रय लेकर वे पुनः कर्णिका में आश्रित हैं; इनके अतिरिक्त बहत्तर हजार अन्य नाड़ियाँ हैं, हे मुने!
श्लोक 15 (skanda.8.182.15)
तासामेकैकशो भेदाः सूक्ष्मसूक्ष्मतराः स्मृताः । तासु सञ्चरते प्राणः कर्णिकाव्योमसंभवः
tāsāmekaikaśo bhedāḥ sūkṣmasūkṣmatarāḥ smṛtāḥ | tāsu sañcarate prāṇaḥ karṇikāvyomasaṁbhavaḥ
उनके एक-एक के भेद सूक्ष्म-सूक्ष्मतर माने गये हैं; उनमें कर्णिका-आकाश से उत्पन्न प्राण संचरण करता है।
श्लोक 16 (skanda.8.182.16)
तत्रात्मा सूक्ष्मसंलक्ष्यः प्रागुक्तस्तिष्ठति द्विज । या प्रभा दुर्दृशा तस्य तां भजेद् योगविन्मुनिः
tatrātmā sūkṣmasaṁlakṣyaḥ prāguktastiṣṭhati dvija | yā prabhā durdṛśā tasya tāṁ bhajed yogavinmuniḥ
वहाँ आत्मा, सूक्ष्म, पहले वर्णित, स्थित रहता है, हे द्विज! उसकी जो दुर्दृश्य प्रभा है, उसका योगविद् मुनि सेवन करे।
श्लोक 17 (skanda.8.182.17)
तत्तेजः सर्वनाडीषु विभक्तं सर्वदेहिनाम् । तेन नाड्यो बहिः स्पर्शान्मनः कुर्वन्ति विस्तृतम्
tattejaḥ sarvanāḍīṣu vibhaktaṁ sarvadehinām | tena nāḍyo bahiḥ sparśānmanaḥ kurvanti vistṛtam
वह तेज समस्त देहधारियों की सभी नाड़ियों में विभक्त है; उसी से नाड़ियाँ बाह्य स्पर्श से मन को विस्तृत करती हैं।
श्लोक 18 (skanda.8.182.18)
तत्तेजश्चक्षुषा हृत्वा सर्वनाडीसमाश्रितम् । मन एकगतं कुर्यात् तच्चात्मनि नियोजयेत्
tattejaścakṣuṣā hṛtvā sarvanāḍīsamāśritam | mana ekagataṁ kuryāt taccātmani niyojayet
उस तेज को नेत्रों से हरण करके, जो सभी नाड़ियों में आश्रित है, मन को एकाग्र करे और उसे आत्मा में योजित करे।
श्लोक 19 (skanda.8.182.19)
वायुर्धनञ्जयो नाम्ना यो हृदि स्फुरते सदा । त्रीणि तस्य मुखान्याहुः शिरो नाभि र्हृदेव च
vāyurdhanañjayo nāmnā yo hṛdi sphurate sadā | trīṇi tasya mukhānyāhuḥ śiro nābhi rhṛdeva ca
धनञ्जय नामक वायु, जो हृदय में सदा स्फुरित होता है, उसके तीन मुख कहे गये हैं - मस्तक, नाभि, और हृदय ही।
श्लोक 20 (skanda.8.182.20)
येन्ये प्राणा नवाख्याता वायवः कीर्तिता मया । धनञ्जयस्य सर्वे ते वशगास्तन्निबन्धनाः
yenye prāṇā navākhyātā vāyavaḥ kīrtitā mayā | dhanañjayasya sarve te vaśagāstannibandhanāḥ
मेरे द्वारा कहे गये जो अन्य नौ प्राण नामक वायु हैं, वे सभी धनञ्जय के वशवर्ती हैं, उससे बद्ध।
श्लोक 21 (skanda.8.182.21)
तद्वशादुत्क्रमन्त्येते तस्मिँतिष्ठन्ति संस्थिताः । नाभीबन्धनमासाद्य नाडीनां वक्त्रमास्थितम्
tadvaśādutkramantyete tasmi~tiṣṭhanti saṁsthitāḥ | nābhībandhanamāsādya nāḍīnāṁ vaktramāsthitam
उसी की इच्छा से ये ऊपर उठते हैं, उसी में स्थित रहते हैं; नाभिबन्धन को प्राप्त करके नाड़ियों के मुख में स्थित होते हैं।
श्लोक 22 (skanda.8.182.22)
द्वितीयं कर्णिकायान्तु तृतीयं तालुसंस्थितम् । क्षुरिका परशुः शूलं त्रिविधोत्क्रान्तिरुच्यते
dvitīyaṁ karṇikāyāntu tṛtīyaṁ tālusaṁsthitam | kṣurikā paraśuḥ śūlaṁ trividhotkrāntirucyate
दूसरी (उत्क्रान्ति) कर्णिका में है, तीसरी तालु में स्थित; क्षुरिका, परशु, शूल - यह त्रिविध उत्क्रान्ति कही जाती है।
श्लोक 23 (skanda.8.182.23)
शूलं हृदि क्षुरं नाभ्यां तालौ परशुरास्थितः । तालुके हृदि वा बद्ध त्रयं नाभ्यां प्रतिष्ठितम्
śūlaṁ hṛdi kṣuraṁ nābhyāṁ tālau paraśurāsthitaḥ | tāluke hṛdi vā baddha trayaṁ nābhyāṁ pratiṣṭhitam
शूल हृदय में, क्षुर नाभि में, तालु में परशु स्थित है; तालु में या हृदय में बद्ध, त्रय नाभि में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 24 (skanda.8.182.24)
तालौ वियोजितं सर्वं प्राणमेव विमुञ्चति । आक्षिप्तं त्रितयं नाभ्यां कर्णिकायां वियोजितम्
tālau viyojitaṁ sarvaṁ prāṇameva vimuñcati | ākṣiptaṁ tritayaṁ nābhyāṁ karṇikāyāṁ viyojitam
तालु में वियोजित होकर, सब कुछ प्राण को ही मुक्त कर देता है; नाभि में आकृष्ट, कर्णिका में वियोजित त्रितय को,
श्लोक 25 (skanda.8.182.25)
स्थितम् आत्मनि संयोज्य विक्षिपेदूर्ध्वतो मनः । प्रयोगादस्य विप्रेन्द्र मुच्यते तत्क्षणान्मुनिः
sthitam ātmani saṁyojya vikṣipedūrdhvato manaḥ | prayogādasya viprendra mucyate tatkṣaṇānmuniḥ
आत्मा में संयोजित करके स्थित उसे, मन को ऊपर की ओर फेंक दे; इसके प्रयोग से, हे विप्रेन्द्र! मुनि उसी क्षण मुक्त हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.8.182.26)
स्वच्छन्दतनुसंत्याग एष ते परिकीर्तितः । धर्माधर्मनिबद्धैस्तु कर्मभिः प्रागनुष्ठितैः
svacchandatanusaṁtyāga eṣa te parikīrtitaḥ | dharmādharmanibaddhaistu karmabhiḥ prāganuṣṭhitaiḥ
यह तुम्हें स्वेच्छया देहत्याग बताया गया; परन्तु पूर्वकृत, धर्म-अधर्म से बद्ध कर्मों से,
श्लोक 27 (skanda.8.182.27)
यथा जीवो न बद्ध्येत योगिनस्तदिदं शृणु । बाह्यःशरीरजश्चैव मृत्युर्द्विविध उच्यते
yathā jīvo na baddhyeta yoginastadidaṁ śṛṇu | bāhyaḥśarīrajaścaiva mṛtyurdvividha ucyate
जिस प्रकार जीव न बँधे, योगियों का वह उपाय सुनो। मृत्यु द्विविध कही जाती है - बाह्य और शरीरजन्य।
श्लोक 28 (skanda.8.182.28)
विषशस्त्राग्नियोगैस्तु सर्पदंष्ट्रिमरुज्जलैः । बाह्यो मृत्युरिति ख्यातः शारीरं तु निबोध मे
viṣaśastrāgniyogaistu sarpadaṁṣṭrimarujjalaiḥ | bāhyo mṛtyuriti khyātaḥ śārīraṁ tu nibodha me
विष, शस्त्र, अग्नि के प्रयोग से, सर्प, दंष्ट्रीजीव, रोग और जल से - यह बाह्य मृत्यु कही गयी है; अब शारीर मृत्यु को मुझसे जानो।
श्लोक 29 (skanda.8.182.29)
रोगजः कालजो वापि मृत्युराभ्यन्तरो भवेत् । कालजो जरया प्रोक्तो रोगजो व्यधिसंक्षयात्
rogajaḥ kālajo vāpi mṛtyurābhyantaro bhavet | kālajo jarayā prokto rogajo vyadhisaṁkṣayāt
आभ्यन्तर मृत्यु रोगजन्य अथवा कालजन्य हो सकती है; कालजन्य को जरा कहा गया है, रोगजन्य व्याधि के क्षय से होती है।
श्लोक 30 (skanda.8.182.30)
दुर्लभो मृत्युरन्योयं योगसंधानजो मुने । योगोपायकृतो यश्च यश्च कालक्षयागतः
durlabho mṛtyuranyoyaṁ yogasaṁdhānajo mune | yogopāyakṛto yaśca yaśca kālakṣayāgataḥ
इनसे भिन्न एक अन्य दुर्लभ मृत्यु है, योगसंधानजन्य, हे मुने! जो योग के उपाय से की जाती है, और जो कालक्षय से आती है।
श्लोक 31 (skanda.8.182.31)
तयोर्भेदविकारे तु शृणु व्यास समासतः । कालक्षयाद् भवत्येको द्वितीयो मनसेप्सितः
tayorbhedavikāre tu śṛṇu vyāsa samāsataḥ | kālakṣayād bhavatyeko dvitīyo manasepsitaḥ
इन दोनों के भेद-विकार को, हे व्यास! संक्षेप में सुनो - एक कालक्षय से होती है, दूसरी मन से इच्छित होती है।
श्लोक 32 (skanda.8.182.32)
योयमाघोषजः शब्दः श्रूयते श्रोत्रसन्धितः । स पूर्वं लीयते कूर्मे तेन वह्निस्त्यजेत् प्रभाम्
yoyamāghoṣajaḥ śabdaḥ śrūyate śrotrasandhitaḥ | sa pūrvaṁ līyate kūrme tena vahnistyajet prabhām
जो आघोषजन्य शब्द कानों से जुड़कर सुना जाता है, वह पहले कूर्म वायु में लीन हो जाता है, उससे अग्नि अपनी प्रभा त्याग देती है।
श्लोक 33 (skanda.8.182.33)
निष्प्रभः स ततो वह्निः शब्दयोगाद्वियुज्यते । शब्दस्पर्शगुणातीतो रूपयोगं विमुञ्चति
niṣprabhaḥ sa tato vahniḥ śabdayogādviyujyate | śabdasparśaguṇātīto rūpayogaṁ vimuñcati
प्रभारहित हुई वह अग्नि तब शब्द के योग से वियुक्त हो जाती है; शब्द-स्पर्श गुणों से अतीत होकर वह रूप के योग को भी छोड़ देती है।
श्लोक 34 (skanda.8.182.34)
एवमग्नौ प्रणष्टे तु सर्व एवानिलास्ततः । एकतो योगमिच्छन्तो मर्माणि विनिकृन्तते
evamagnau praṇaṣṭe tu sarva evānilāstataḥ | ekato yogamicchanto marmāṇi vinikṛntate
इस प्रकार अग्नि के नष्ट हो जाने पर, फिर सभी वायु, एक साथ योग की इच्छा करते हुए, मर्मस्थानों को काट देते हैं।
श्लोक 35 (skanda.8.182.35)
कूर्मारो देवदत्तश्च कृकरो नाग एव च । उदानेनाशु संयुज्य कर्णिकायां विशन्ति हि
kūrmāro devadattaśca kṛkaro nāga eva ca | udānenāśu saṁyujya karṇikāyāṁ viśanti hi
कूर्मार, देवदत्त, कृकर, और नाग भी - उदान से शीघ्र संयुक्त होकर कर्णिका में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 36 (skanda.8.182.36)
तत ऊर्ध्वो भवेच्छ्वासो मनोजीवविनिर्गमः । ततो ज्योतिर्यदक्षिभ्यां तत्सोमं विशति द्रुतम्
tata ūrdhvo bhavecchvāso manojīvavinirgamaḥ | tato jyotiryadakṣibhyāṁ tatsomaṁ viśati drutam
तब श्वास ऊर्ध्वगामी हो जाता है, मन और जीव का निर्गमन; तब नेत्रों के मध्य जो ज्योति है, वह शीघ्र सोम में प्रवेश कर जाती है।
श्लोक 37 (skanda.8.182.37)
इन्द्रियाणि मनो यान्ति मनः प्राणविनिर्गमम् । तेषु सर्वेषु लीनेषु प्राणान् वायुर्निपीडयेत्
indriyāṇi mano yānti manaḥ prāṇavinirgamam | teṣu sarveṣu līneṣu prāṇān vāyurnipīḍayet
इन्द्रियाँ मन में जाती हैं, मन प्राण के निर्गमन में जाता है; इन सबके लीन हो जाने पर, वायु प्राणों को दबाता है।
श्लोक 38 (skanda.8.182.38)
पीड्यमानास्ततः सर्वे ते भवन्त्येकतोनिलाः । स्वं स्वं त्यक्त्वा ततः स्थानं यच्च कर्म यदात्मकम्
pīḍyamānāstataḥ sarve te bhavantyekatonilāḥ | svaṁ svaṁ tyaktvā tataḥ sthānaṁ yacca karma yadātmakam
तब दबाये गये वे सभी एक वायु बन जाते हैं; तब अपने-अपने स्थान और अपने-अपने कर्मस्वरूप को त्यागकर,
श्लोक 39 (skanda.8.182.39)
एकस्था वायवः सर्वे पूरयन्ति धनञ्जयम् । शेषस्तत्र हि कूर्मारो जीवं त्यक्त्वा स तिष्ठति
ekasthā vāyavaḥ sarve pūrayanti dhanañjayam | śeṣastatra hi kūrmāro jīvaṁ tyaktvā sa tiṣṭhati
सभी वायु एक होकर धनञ्जय को भर देते हैं; वहाँ शेष कूर्मार, जीव को त्यागकर, स्थित रहता है।
श्लोक 40 (skanda.8.182.40)
मनोबुद्धिरहङ्कारश्चेतो जीवस्तथैव च । निष्क्रमन्ति ततो देहात्त्वरितं वायुनेरिताः
manobuddhirahaṅkāraśceto jīvastathaiva ca | niṣkramanti tato dehāttvaritaṁ vāyuneritāḥ
मन, बुद्धि, अहंकार, चेतना, तथा जीव भी - ये तब शरीर से त्वरित होकर, वायु से प्रेरित होकर निकल जाते हैं।
श्लोक 41 (skanda.8.182.41)
प्रागुपात्तस्ततोस्यान्यो देहः सूक्ष्मो विजायते । स तत्र सन्धितो जीवो भूयो मूढश्च तिष्ठति
prāgupāttastatosyānyo dehaḥ sūkṣmo vijāyate | sa tatra sandhito jīvo bhūyo mūḍhaśca tiṣṭhati
तब पूर्वकृत कर्मों से उसका एक अन्य सूक्ष्म शरीर उत्पन्न होता है; वहाँ संधित वह जीव पुनः मोहग्रस्त रहता है।
श्लोक 42 (skanda.8.182.42)
एवं कालकृता ह्येषा सर्वभूतगणस्थितिः । विना योगं न जीयेत सूक्ष्मं माहेश्वरं पदम्
evaṁ kālakṛtā hyeṣā sarvabhūtagaṇasthitiḥ | vinā yogaṁ na jīyeta sūkṣmaṁ māheśvaraṁ padam
इस प्रकार यह सम्पूर्ण भूतसमूह की स्थिति काल द्वारा की गयी है; योग के बिना उस सूक्ष्म माहेश्वर पद को नहीं पाया जा सकता।
श्लोक 43 (skanda.8.182.43)
उपविष्टः प्रसुप्तो वा उत्क्रान्त्यभ्यस्तसंयमः । स्वेच्छया मुच्यते व्यास ज्ञात्वा तन्तुः महेश्वरम्
upaviṣṭaḥ prasupto vā utkrāntyabhyastasaṁyamaḥ | svecchayā mucyate vyāsa jñātvā tantuḥ maheśvaram
बैठा हुआ हो या सोया हुआ, उत्क्रान्ति के अभ्यास में संयत, उस सूत्र (सम्बन्धसूत्र) को, महेश्वर को जानकर, हे व्यास! इच्छानुसार मुक्त हो जाता है।
श्लोक 44 (skanda.8.182.44)
क्षुरिकां परशुं वाथ शूलं वा धारयेन्मुनिः । ततः सर्वेस्य लीयन्ते विकाराः करणैः सह
kṣurikāṁ paraśuṁ vātha śūlaṁ vā dhārayenmuniḥ | tataḥ sarvesya līyante vikārāḥ karaṇaiḥ saha
क्षुरिका, परशु, अथवा शूल को मुनि धारण करे; तब इन्द्रियों सहित सभी विकार लीन हो जाते हैं।
श्लोक 45 (skanda.8.182.45)
वीक्षते चेश्वरं ब्रह्म षड्विंशं स्वतनुस्थितम् । मनस्तीव्रं जडं जन्तोः प्रयच्छति विपद्यतः
vīkṣate ceśvaraṁ brahma ṣaḍviṁśaṁ svatanusthitam | manastīvraṁ jaḍaṁ jantoḥ prayacchati vipadyataḥ
वह अपने ही शरीर में स्थित षड्विंशक ईश्वर ब्रह्म को देखता है; तीव्र मन, मरणासन्न प्राणी को जड़ता प्रदान करता है।
श्लोक 46 (skanda.8.182.46)
स रुजा मोहमापन्नो ज्ञानवस्तु न विन्दति । अनेन कर्मणा विप्र सर्वरुक्परिवर्जितः
sa rujā mohamāpanno jñānavastu na vindati | anena karmaṇā vipra sarvarukparivarjitaḥ
वह रोग से मोहग्रस्त होकर ज्ञानतत्त्व को नहीं पाता; परन्तु इस साधना से, हे विप्र! समस्त रोगों से रहित होकर,
श्लोक 47 (skanda.8.182.47)
सुखमारोहति ब्रह्म हर्म्यपृष्ठं तलादिव । पदार्थं पञ्च विज्ञाय दुःखान्तपरिनिष्ठितः
sukhamārohati brahma harmyapṛṣṭhaṁ talādiva | padārthaṁ pañca vijñāya duḥkhāntapariniṣṭhitaḥ
सुखपूर्वक ब्रह्म पर आरोहण करता है, जैसे भूतल से भवन की छत पर; पाँच पदार्थों को जानकर, दुःख के अन्त पर स्थित।
श्लोक 48 (skanda.8.182.48)
पञ्चभिर्ब्रह्मभिः पूतो भस्मसा दीक्षितो द्विजः । शङ्करैकमना योगी ज्ञानमेतदवाप्नुते
pañcabhirbrahmabhiḥ pūto bhasmasā dīkṣito dvijaḥ | śaṅkaraikamanā yogī jñānametadavāpnute
पाँच ब्रह्ममन्त्रों से पवित्र, भस्म से दीक्षित द्विज, शंकर में एकाग्रचित्त योगी, इस ज्ञान को प्राप्त करता है।
श्लोक 49 (skanda.8.182.49)
माहेश्वरमिमं योगं निष्कलं मुक्तिकारणम् । यत्नादपि न विन्दन्ति व्रतमप्राप्य शांकरम्
māheśvaramimaṁ yogaṁ niṣkalaṁ muktikāraṇam | yatnādapi na vindanti vratamaprāpya śāṁkaram
इस माहेश्वर योग को, निष्कल, मुक्ति के कारण को, प्रयत्न करने पर भी शांकर व्रत को प्राप्त किये बिना नहीं पाते।
श्लोक 50 (skanda.8.182.50)
स त्वं व्यास महाबुद्धे चरन् पाशुपतं व्रतम् । महादेवपरो भूत्वा ज्ञानमेतदवाप्नुहि
sa tvaṁ vyāsa mahābuddhe caran pāśupataṁ vratam | mahādevaparo bhūtvā jñānametadavāpnuhi
वह तुम, हे व्यास महाबुद्धे! पाशुपत व्रत का आचरण करते हुए, महादेवपरायण होकर इस ज्ञान को प्राप्त करो।
श्लोक 51 (skanda.8.182.51)
नैवमेतत् परं ब्रह्म अन्ये विन्दन्ति योगिनः । महादेवं प्रपन्ना ये तान्मुक्त्वा शिवयोगिनः
naivametat paraṁ brahma anye vindanti yoginaḥ | mahādevaṁ prapannā ye tānmuktvā śivayoginaḥ
अन्य योगीजन इस परम ब्रह्म को इस प्रकार नहीं पाते; महादेव की शरण में गये शिवयोगियों को छोड़कर।
श्लोक 52 (skanda.8.182.52)
एष मोक्षविधिः कृत्स्नः सर्वप्रत्ययवजितः । निष्कलः कथितो व्यास परो यस्मान्न विद्यते
eṣa mokṣavidhiḥ kṛtsnaḥ sarvapratyayavajitaḥ | niṣkalaḥ kathito vyāsa paro yasmānna vidyate
यह सम्पूर्ण मोक्षविधि, समस्त प्रत्ययों से रहित, निष्कल, तुम्हें कही गयी, हे व्यास! इससे परे कुछ नहीं है।
श्लोक 53 (skanda.8.182.53)
एवं पाशुपता विप्रा निष्कलं तं महेश्वरम् । योगादाविश्य मुच्यन्ते पुनर्जन्मविवर्जिताः
evaṁ pāśupatā viprā niṣkalaṁ taṁ maheśvaram | yogādāviśya mucyante punarjanmavivarjitāḥ
इस प्रकार पाशुपत विप्रगण उस निष्कल महेश्वर में योग द्वारा प्रवेश करके मुक्त हो जाते हैं, पुनर्जन्म से सर्वथा रहित।
श्लोक 54 (skanda.8.182.54)
सकलस्यास्पदं दिव्यं ब्रह्मलोकात् परे स्थितम । महादेवस्य वक्ष्यामि तद्भक्ता यत्र यान्ति ते
sakalasyāspadaṁ divyaṁ brahmalokāt pare sthitama | mahādevasya vakṣyāmi tadbhaktā yatra yānti te
सकल (साकार रूप) का दिव्य स्थान, ब्रह्मलोक से भी परे स्थित, महादेव का, मैं तुम्हें बताऊँगा - जहाँ उनके भक्त जाते हैं।