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अम्बिका खण्ड · अध्याय 23

गणपाह्वान

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (skanda.8.23.1)

सनत्कुमार उवाच। भगवान् देवदेवेशः सर्वभूतपतिर्हरः । देवीमुवाच वागीश उमां गिरिवरात्मजाम्

sanatkumāra uvāca| bhagavān devadeveśaḥ sarvabhūtapatirharaḥ | devīmuvāca vāgīśa umāṁ girivarātmajām

सनत्कुमार ने कहा — समस्त भूतों के स्वामी, वाणी के अधीश्वर, भगवान् देवदेवेश हर ने पर्वतराज-पुत्री देवी उमा से कहा —

श्लोक 2 (skanda.8.23.2)

देवि नन्दीश्वरं देवमभिषेक्ष्यामि भूतपम् । गणानावाहयिष्यामि किं वा त्वं मन्यसेऽव्यये

devi nandīśvaraṁ devamabhiṣekṣyāmi bhūtapam | gaṇānāvāhayiṣyāmi kiṁ vā tvaṁ manyase'vyaye

हे देवि, मैं देव नन्दीश्वर को भूतगणों का स्वामी बनाकर उनका अभिषेक करूँगा, और गणों का आह्वान करूँगा। हे अव्यये, तुम्हारा क्या विचार है?

श्लोक 3 (skanda.8.23.3)

देव्युवाच। सप्तलोकाधिपत्यं च गणेशानां तथैव च । सर्वमर्हति देवेश नन्दी पुत्रो ममाग्रजः

devyuvāca| saptalokādhipatyaṁ ca gaṇeśānāṁ tathaiva ca | sarvamarhati deveśa nandī putro mamāgrajaḥ

देवी ने कहा — हे देवेश, मेरा ज्येष्ठ पुत्र नन्दी सातों लोकों के आधिपत्य तथा गणेशत्व, इन सबका अधिकारी है।

श्लोक 4 (skanda.8.23.4)

सनत्कुमार उवाच। ततः स भगवान् देवः सुरशत्रुनिषूदनः । प्राङ्मुखः स गणेशानामाह्वानमकरोत्तदा

sanatkumāra uvāca| tataḥ sa bhagavān devaḥ suraśatruniṣūdanaḥ | prāṅmukhaḥ sa gaṇeśānāmāhvānamakarottadā

सनत्कुमार ने कहा — तब देवताओं के शत्रुओं के संहारक उन भगवान् देव ने पूर्वाभिमुख होकर गणेशों का आह्वान किया।

श्लोक 5 (skanda.8.23.5)

ततस्सहस्रशस्तत्र गणाध्यक्षा मुदा युताः । संप्राप्ताः सर्वलोकेशास्तत्क्षणाच्च महामुने

tatassahasraśastatra gaṇādhyakṣā mudā yutāḥ | saṁprāptāḥ sarvalokeśāstatkṣaṇācca mahāmune

हे महामुने, तब वहाँ हजारों की संख्या में गणाध्यक्ष, प्रसन्नतापूर्वक, उसी क्षण समस्त लोकेश्वर आ पहुँचे।

श्लोक 6 (skanda.8.23.6)

संप्राप्ताः सर्वलोकेशा ये रुद्राः स्वर्गवासिनः । अन्ये रुद्रवरा व्यास येषां संख्या न विद्यते

saṁprāptāḥ sarvalokeśā ye rudrāḥ svargavāsinaḥ | anye rudravarā vyāsa yeṣāṁ saṁkhyā na vidyate

वहाँ स्वर्गवासी रुद्र, समस्त लोकों के स्वामी आए। हे व्यास, अन्य श्रेष्ठ रुद्र भी आए, जिनकी गणना नहीं हो सकती।

श्लोक 7 (skanda.8.23.7)

ब्रह्माण्डावरणा ये च अहिर्बुध्न्यादयो मुने । कपालांशिविशोकाश्च शतनेत्राः शताननाः

brahmāṇḍāvaraṇā ye ca ahirbudhnyādayo mune | kapālāṁśiviśokāśca śatanetrāḥ śatānanāḥ

हे मुने, ब्रह्माण्ड को आवृत करने वाले अहिर्बुध्न्य आदि, कपालांशि, विशोक, शतनेत्र और शताननवाले भी आए।

श्लोक 8 (skanda.8.23.8)

अनन्तरुद्रा ये चान्ये शतवक्त्राः शतोदराः । सर्वतः पाणिपादाश्च सर्वदिक्षु समाश्रिताः

anantarudrā ye cānye śatavaktrāḥ śatodarāḥ | sarvataḥ pāṇipādāśca sarvadikṣu samāśritāḥ

अनन्त रुद्र, अन्य शतमुख और शतोदर, सब ओर हाथ-पैर वाले, सब दिशाओं में स्थित —

श्लोक 9 (skanda.8.23.9)

अणिमादिगुणैर्युक्ता ब्रह्मसंभूतिहेतवः । संप्राप्ताः सर्वलोकेशास्ताञ्छृणुष्व महामुने

aṇimādiguṇairyuktā brahmasaṁbhūtihetavaḥ | saṁprāptāḥ sarvalokeśāstāñchṛṇuṣva mahāmune

— अणिमादि सिद्धियों से युक्त, ब्रह्मा की उत्पत्ति के हेतु, समस्त लोकेश्वर आ पहुँचे; हे महामुने, उन्हें सुनो।

श्लोक 10 (skanda.8.23.10)

ततः करालवदनो भृकुटीभूषिताननः । शंखहाराम्बुगौरश्च दंष्ट्री स्रग्वी त्रिलोचनः

tataḥ karālavadano bhṛkuṭībhūṣitānanaḥ | śaṁkhahārāmbugauraśca daṁṣṭrī sragvī trilocanaḥ

तब भयंकर मुख वाला, भ्रूभंगि से सुशोभित मुख वाला, शंख-हार-जल के समान गौर वर्ण वाला, दाढ़ों वाला, माला पहने त्रिनेत्र —

श्लोक 11 (skanda.8.23.11)

जटासहस्रोर्ध्वशिखो ज्वालाकेशो महाहनुः । अग्न्यंगारकनेत्रश्च भुजगाबद्धमेखलः

jaṭāsahasrordhvaśikho jvālākeśo mahāhanuḥ | agnyaṁgārakanetraśca bhujagābaddhamekhalaḥ

— सहस्र जटाओं की ऊर्ध्व शिखा वाला, अग्निशिखा-केश वाला, महाहनु वाला, अंगारे के समान नेत्रों वाला, सर्पों से बँधी मेखला वाला —

श्लोक 12 (skanda.8.23.12)

विद्युज्जिह्वो महाकायस्तथा चैवोर्ध्वमेहनः । सर्पयज्ञोपवीती च परश्वधधरस्तथा

vidyujjihvo mahākāyastathā caivordhvamehanaḥ | sarpayajñopavītī ca paraśvadhadharastathā

— बिजली के समान जिह्वा वाला, महाकाय, ऊर्ध्वरेता, सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाला, फरसा धारण करने वाला —

श्लोक 13 (skanda.8.23.13)

भुजगाबद्धमौञ्जिश्च भुजगैरेव कङ्कणैः । निनादान् संसृजानश्च अशनीपातसन्निभान्

bhujagābaddhamauñjiśca bhujagaireva kaṅkaṇaiḥ | ninādān saṁsṛjānaśca aśanīpātasannibhān

— सर्पों से बँधी मौंजी वाला, सर्पों के ही कंकण वाला, वज्रपात के समान गर्जना करने वाला —

श्लोक 14 (skanda.8.23.14)

डिण्डिरित्येव विख्यातो गणपः समदृश्यत । आत्मनः सदृशानाञ्च कोटिभिर्दशभिर्वृतः

ḍiṇḍirityeva vikhyāto gaṇapaḥ samadṛśyata | ātmanaḥ sadṛśānāñca koṭibhirdaśabhirvṛtaḥ

— वह डिण्डि नाम से विख्यात गणपति दिखाई दिया, अपने ही समान दस करोड़ गणों से घिरा हुआ।

श्लोक 15 (skanda.8.23.15)

गणपानां सुरेशानां योगिनां दीप्ततेजसाम् । ततोपरो महाकेशो महाकायोर्ध्वमेहनः

gaṇapānāṁ sureśānāṁ yogināṁ dīptatejasām | tatoparo mahākeśo mahākāyordhvamehanaḥ

वे गणपति, देवेश्वर और योगी, तेज से देदीप्यमान थे। फिर एक अन्य, महाकेश, महाकाय, ऊर्ध्वरेता —

श्लोक 16 (skanda.8.23.16)

त्र्यक्षोनलशतप्रख्यः अशनीपातनर्दनः । नृत्यन् गायँश्च चित्राणि कुर्वन्नाट्यान्यनेकशः

tryakṣonalaśataprakhyaḥ aśanīpātanardanaḥ | nṛtyan gāya~śca citrāṇi kurvannāṭyānyanekaśaḥ

— त्रिनेत्र, सौ अग्नियों के समान तेजस्वी, वज्रपात के समान गर्जने वाला, नृत्य करता, गाता, अनेक विचित्र नाट्य करता हुआ —

श्लोक 17 (skanda.8.23.17)

ज्वलद्दंष्ट्रो महाहासो बृहत्स्कन्धः पिनाकधृक् । कोटिभिर्दशभिस्सार्धं द्विगुणाभिर्महात्मनाम्

jvaladdaṁṣṭro mahāhāso bṛhatskandhaḥ pinākadhṛk | koṭibhirdaśabhissārdhaṁ dviguṇābhirmahātmanām

— प्रज्वलित दाढ़ों वाला, महाहास्य वाला, विशाल कन्धों वाला, पिनाकधारी, बीस करोड़ महात्माओं सहित —

श्लोक 18 (skanda.8.23.18)

गणानां चित्ररूपाणां युगपत् संप्रदृश्यत । सिंहास्यगजकेशास्यैद्वींपिशार्दूलकाननैः सोषाढिर्नाम गणपो व्यास तत्र समागतः

gaṇānāṁ citrarūpāṇāṁ yugapat saṁpradṛśyata | siṁhāsyagajakeśāsyaidvīṁpiśārdūlakānanaiḥ soṣāḍhirnāma gaṇapo vyāsa tatra samāgataḥ

— विचित्र रूप वाले गणों सहित एक साथ प्रकट हुआ; सिंहमुख, गजमुख, द्वीपि और शार्दूलमुख गणों सहित सोषाढि नामक गणपति भी वहाँ आया, हे व्यास।

श्लोक 19 (skanda.8.23.19)

सनत्कुमार उवाच। अथान्यो व्यास संप्राप्तो युगान्तादित्यसंप्रभः । शतयोजनबाहुश्च दिग्वासाश्चोर्ध्वमेहनः

sanatkumāra uvāca| athānyo vyāsa saṁprāpto yugāntādityasaṁprabhaḥ | śatayojanabāhuśca digvāsāścordhvamehanaḥ

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, फिर युगान्त के सूर्य के समान तेजस्वी, सौ योजन लम्बी भुजाओं वाला, दिशाओं को वस्त्र मानने वाला (नग्न), ऊर्ध्वरेता एक और आया।

श्लोक 20 (skanda.8.23.20)

अतिदीर्घोतिमेढ्रश्च लम्बभ्रूः स्थूलनासिकः । वृत्तास्यश्च महाक्षश्च भृकुटीसंहताननः

atidīrghotimeḍhraśca lambabhrūḥ sthūlanāsikaḥ | vṛttāsyaśca mahākṣaśca bhṛkuṭīsaṁhatānanaḥ

अत्यन्त दीर्घ अंगों वाला, लटकी भौंहों वाला, स्थूल नासिका वाला, गोल मुख वाला, बड़े नेत्रों वाला, भ्रूभंग से संकुचित मुख वाला —

श्लोक 21 (skanda.8.23.21)

पंचयोजनविस्तीर्णो दीर्घो वै तावदेव च । दंष्ट्राश्चतस्रो वक्त्रेण बिभ्रच्छंखेन्दुपाण्डराः

paṁcayojanavistīrṇo dīrgho vai tāvadeva ca | daṁṣṭrāścatasro vaktreṇa bibhracchaṁkhendupāṇḍarāḥ

— पाँच योजन चौड़ा और उतना ही लम्बा, मुख में चार दाढ़ें धारण किए हुए, शंख और चन्द्रमा के समान श्वेत।

श्लोक 22 (skanda.8.23.22)

पंचाग्निकोर्ध्वकर्णश्च पाशहस्तो मनोजवः । वृतः कोटिशतेनैव सदृशानामदृश्यत

paṁcāgnikordhvakarṇaśca pāśahasto manojavaḥ | vṛtaḥ koṭiśatenaiva sadṛśānāmadṛśyata

पंचाग्नि तप करने वाला, ऊँचे कानों वाला, पाशधारी, मन के समान वेगवान, अपने समान सौ करोड़ से घिरा हुआ दिखाई दिया।

श्लोक 23 (skanda.8.23.23)

भारभूतीति विख्यातो महायोगबलान्वितः । गणपो देवदेवस्य समीपं सोऽभ्यगच्छत

bhārabhūtīti vikhyāto mahāyogabalānvitaḥ | gaṇapo devadevasya samīpaṁ so'bhyagacchata

भारभूति नाम से विख्यात, महायोगबल से सम्पन्न वह गणपति देवदेव के समीप गया।

श्लोक 24 (skanda.8.23.24)

ततः कुन्देन्दुशंखाभं हिमराश्यम्बुसन्निभम् । मृणालस्फटिकाभं च भस्मकक्षावलम्बनम्

tataḥ kundenduśaṁkhābhaṁ himarāśyambusannibham | mṛṇālasphaṭikābhaṁ ca bhasmakakṣāvalambanam

फिर कुन्दपुष्प, चन्द्रमा और शंख के समान कान्ति वाला, हिमराशि और जल के समान, कमलनाल तथा स्फटिक के समान, भस्म की करधनी धारण किए हुए —

श्लोक 25 (skanda.8.23.25)

गृहीत्वा चाशनीहासं त्रिपादं चीरवाससम् । शतोदरं त्रिशिरसं त्रिनेत्रं चोर्ध्वमूर्धजम्

gṛhītvā cāśanīhāsaṁ tripādaṁ cīravāsasam | śatodaraṁ triśirasaṁ trinetraṁ cordhvamūrdhajam

— वज्र के समान हास्य लिए हुए, तीन पैरों वाला, वल्कल वस्त्र धारण किए, शत उदर, तीन सिर, तीन नेत्र और ऊर्ध्व केश वाला —

श्लोक 26 (skanda.8.23.26)

ज्वालामालोग्रकेशञ्च व्याघ्रचर्माजिनाम्बरम् । वायुवेगं महाहासं भुजगाबद्धमेखलम्

jvālāmālograkeśañca vyāghracarmājināmbaram | vāyuvegaṁ mahāhāsaṁ bhujagābaddhamekhalam

— ज्वाला की माला जैसे भयंकर केश वाला, व्याघ्रचर्म और मृगचर्म पहने हुए, वायु के समान वेगवान, महाहास्य वाला, सर्पों से बँधी मेखला वाला —

श्लोक 27 (skanda.8.23.27)

महोरगकृतापीडं शंकुकर्णोर्ध्वमेहनम् । भस्मप्रहरणं चैव महादंष्ट्रं महाहनुम्

mahoragakṛtāpīḍaṁ śaṁkukarṇordhvamehanam | bhasmapraharaṇaṁ caiva mahādaṁṣṭraṁ mahāhanum

— बड़े सर्प का मुकुट धारण किए, कानों में शंकु और ऊर्ध्वरेता, भस्म को ही अस्त्र बनाने वाला, बड़ी दाढ़ों और बड़े जबड़े वाला —

श्लोक 28 (skanda.8.23.28)

महागणपतिं वीरं ज्वर इत्येव विश्रुतम् । कोटीशतवृतं तञ्च गणपं सोन्वपश्यत

mahāgaṇapatiṁ vīraṁ jvara ityeva viśrutam | koṭīśatavṛtaṁ tañca gaṇapaṁ sonvapaśyata

उसने ज्वर नाम से विख्यात, सौ करोड़ से घिरे उस वीर महागणपति को देखा।

श्लोक 29 (skanda.8.23.29)

ततोपरः सौम्यरूपो भस्मदिग्धाङ्ग एव च । त्रिशूलपाणिदिग्वासा महायोगबलान्वितः

tatoparaḥ saumyarūpo bhasmadigdhāṅga eva ca | triśūlapāṇidigvāsā mahāyogabalānvitaḥ

फिर एक और, सौम्य रूप वाला, भस्म से लिप्तांग, त्रिशूलधारी, दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाला, महायोगबल से सम्पन्न —

श्लोक 30 (skanda.8.23.30)

बहुवेषधरश्चैव ध्यानयोगपरायणः । सोमवर्ण इति ख्यातः कोटीशतवृतः प्रभुः

bahuveṣadharaścaiva dhyānayogaparāyaṇaḥ | somavarṇa iti khyātaḥ koṭīśatavṛtaḥ prabhuḥ

— अनेक वेष धारण करने वाला, ध्यानयोगपरायण; सोमवर्ण नाम से विख्यात, सौ करोड़ से घिरा हुआ वह प्रभु।

श्लोक 31 (skanda.8.23.31)

तादृशानां गणाध्यक्षो देवेनाहूत आगतः । सहस्रज्वालभस्मांगो महानेत्रोर्ध्वमेहनः

tādṛśānāṁ gaṇādhyakṣo devenāhūta āgataḥ | sahasrajvālabhasmāṁgo mahānetrordhvamehanaḥ

ऐसे गणों का अध्यक्ष, देव द्वारा आहूत होकर आया — सहस्र ज्वालाओं के समान भस्म-अंग, महानेत्र, ऊर्ध्वरेता।

श्लोक 32 (skanda.8.23.32)

अथापरो महाकायः शूलपाणिर्महाबलः । युगान्तानलसंकाशः स्थिरः स्थिरयशोबलः

athāparo mahākāyaḥ śūlapāṇirmahābalaḥ | yugāntānalasaṁkāśaḥ sthiraḥ sthirayaśobalaḥ

फिर एक और, महाकाय, त्रिशूलपाणि, महाबली; युगान्त-अग्नि के समान, स्थिर, स्थिर यश और बल वाला —

श्लोक 33 (skanda.8.23.33)

चन्द्रमौलिर्महाकेशश्चतुर्बाहुर्विलोहितः । एकपादैर्महाकायैस्त्र्यक्षैस्तैः शूलपाणिभिः

candramaulirmahākeśaścaturbāhurvilohitaḥ | ekapādairmahākāyaistryakṣaistaiḥ śūlapāṇibhiḥ

— चन्द्रमौलि, महाकेश, चतुर्भुज, अत्यन्त रक्तवर्ण; उन एकपाद, महाकाय, त्रिनेत्र, शूलपाणि गणों सहित —

श्लोक 34 (skanda.8.23.34)

वृतः कोटीशतेनैव स्थाणुस्तत्राभवत् ततः । स महापार्षदो रुद्रः सर्वासुरनिबर्हणः

vṛtaḥ koṭīśatenaiva sthāṇustatrābhavat tataḥ | sa mahāpārṣado rudraḥ sarvāsuranibarhaṇaḥ

— सौ करोड़ से घिरा हुआ स्थाणु वहाँ प्रकट हुआ; वह महान पार्षद रुद्र, समस्त असुरों का संहारक था।

श्लोक 35 (skanda.8.23.35)

ततोपरः पट्टसेनो ह्रस्वपादोदरः शुचिः । सहस्रबाहुचरणः सहस्राक्षः प्रतापवान्

tatoparaḥ paṭṭaseno hrasvapādodaraḥ śuciḥ | sahasrabāhucaraṇaḥ sahasrākṣaḥ pratāpavān

फिर एक और, पट्टसेन, छोटे पैर और पेट वाला, शुद्ध; सहस्र भुजाओं और चरणों वाला, सहस्र नेत्रों वाला, प्रतापी —

श्लोक 36 (skanda.8.23.36)

करालदशनश्चैव कृष्णसर्पाम्बरच्छदः । त्र्यक्षश्चन्द्रकृतापीडः कण्ठमालाविभूषितः

karāladaśanaścaiva kṛṣṇasarpāmbaracchadaḥ | tryakṣaścandrakṛtāpīḍaḥ kaṇṭhamālāvibhūṣitaḥ

— भयंकर दाँतों वाला, काले सर्पों का वस्त्र ओढ़े हुए; त्रिनेत्र, चन्द्रमा का मुकुट धारण किए, कण्ठमाला से सुशोभित —

श्लोक 37 (skanda.8.23.37)

उग्रसेन इति ख्यातः कोटीशतवृतः स च । आगात्समीपं देवस्य आहूतः स्वयमीश्वरः

ugrasena iti khyātaḥ koṭīśatavṛtaḥ sa ca | āgātsamīpaṁ devasya āhūtaḥ svayamīśvaraḥ

उग्रसेन नाम से विख्यात वह, सौ करोड़ से घिरा हुआ, स्वयं ईश्वर होते हुए भी आहूत होकर देव के समीप आया।

श्लोक 38 (skanda.8.23.38)

ततोपरः समावेदे देवं चन्द्रार्धधारिणम् । चतुर्वक्त्रो महातेजाश्चतुर्विंशेक्षणः प्रभुः

tatoparaḥ samāvede devaṁ candrārdhadhāriṇam | caturvaktro mahātejāścaturviṁśekṣaṇaḥ prabhuḥ

फिर एक और ने अर्धचन्द्रधारी देव से अपना परिचय दिया — चतुर्मुख, महातेजस्वी, चौबीस नेत्रों वाला वह प्रभु।

श्लोक 39 (skanda.8.23.39)

सहस्रबाहुर्ज्वालास्यो महानेत्रोर्ध्वमेहनः । करालदशनश्चैव शंकुकर्णो महानखः

sahasrabāhurjvālāsyo mahānetrordhvamehanaḥ | karāladaśanaścaiva śaṁkukarṇo mahānakhaḥ

सहस्रभुज, ज्वालामुख, महानेत्र, ऊर्ध्वरेता; भयंकर दाँत, शंकु के समान कान, बड़े नखों वाला —

श्लोक 40 (skanda.8.23.40)

असिपाणिर्महातेजाः शतपादश्शतोदरः । विद्युत्केशोतिहासश्च तथैवोभयतो गतिः

asipāṇirmahātejāḥ śatapādaśśatodaraḥ | vidyutkeśotihāsaśca tathaivobhayato gatiḥ

खड्गधारी, महातेजस्वी, सौ पैरों और सौ उदर वाला; बिजली के समान केश, महाहास्य, दोनों दिशाओं में गति करने वाला —

श्लोक 41 (skanda.8.23.41)

अजैकपादिति ख्यातो वृतः कोटिशतेन सः । काञ्चनोपलवृक्षाढ्यः समेघ इव पर्वतः

ajaikapāditi khyāto vṛtaḥ koṭiśatena saḥ | kāñcanopalavṛkṣāḍhyaḥ samegha iva parvataḥ

वह अजैकपाद नाम से विख्यात, सौ करोड़ से घिरा हुआ, स्वर्ण-प्रस्तरों और वृक्षों से सम्पन्न, बादलों से घिरे पर्वत के समान था।

श्लोक 42 (skanda.8.23.42)

सनत्कुमार उवाच। आगात्ततोपरो व्यास गणपः सुमहाबलः । सर्वतो वदनो धीमान् सर्वतः पाणिपादभृत्

sanatkumāra uvāca| āgāttatoparo vyāsa gaṇapaḥ sumahābalaḥ | sarvato vadano dhīmān sarvataḥ pāṇipādabhṛt

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, फिर एक अत्यन्त बलवान गणपति आया — बुद्धिमान, सब ओर मुख वाला, सब ओर हाथ-पैर धारण करने वाला।

श्लोक 43 (skanda.8.23.43)

ह्रस्वबाहूरुपादश्च अशनिं धारयञ्छुभम् । शतैर्वृतश्च कोटीनामष्टाभिश्चात्मनः समैः

hrasvabāhūrupādaśca aśaniṁ dhārayañchubham | śatairvṛtaśca koṭīnāmaṣṭābhiścātmanaḥ samaiḥ

छोटी भुजा, जाँघ और पैर वाला, शुभ वज्र धारण किए हुए; अपने ही समान आठ सौ करोड़ गणों से घिरा हुआ।

श्लोक 44 (skanda.8.23.44)

निकुम्भ इति विख्यातः शतपादोदराननः । आगात्ततोपरश्चापि विद्युत्केशो महाबलः

nikumbha iti vikhyātaḥ śatapādodarānanaḥ | āgāttatoparaścāpi vidyutkeśo mahābalaḥ

निकुम्भ नाम से विख्यात, सौ पैर, उदर और मुख वाला। फिर उसके बाद बिजली के समान केश वाला महाबली भी आया।

श्लोक 45 (skanda.8.23.45)

चन्द्रमालाधरो घोरः प्रहसन् प्रविचालयन् । दण्डधारी महावक्त्रः शंखकुन्देन्दुसप्रभः

candramālādharo ghoraḥ prahasan pravicālayan | daṇḍadhārī mahāvaktraḥ śaṁkhakundendusaprabhaḥ

चन्द्रमाला धारण किए, भयंकर, हँसता, कँपाता हुआ; दण्डधारी, विशाल मुख, शंख-कुन्द-चन्द्र के समान कान्तिमान।

श्लोक 46 (skanda.8.23.46)

गणकोटीशतवृतः परमम्परतापनः । ततोपरः सहस्रेण कोटीनां गणपो वृतः

gaṇakoṭīśatavṛtaḥ paramamparatāpanaḥ | tatoparaḥ sahasreṇa koṭīnāṁ gaṇapo vṛtaḥ

सौ करोड़ गणों से घिरा, शत्रुओं का परम संतापक। फिर एक और, हजार करोड़ से घिरा हुआ गणपति आया।

श्लोक 47 (skanda.8.23.47)

सूर्यमालास्रजं बिभ्रदाजगाम महातपाः । स सूर्याप्यायनो नाम देवस्य परमप्रियः

sūryamālāsrajaṁ bibhradājagāma mahātapāḥ | sa sūryāpyāyano nāma devasya paramapriyaḥ

— सूर्यों की माला धारण किए हुए वह महातपस्वी आया; वह सूर्याप्यायन नामक देव को अत्यन्त प्रिय था।

श्लोक 48 (skanda.8.23.48)

धनुष्पाणिर्महातेजा विश्रुतः स महाद्युतिः । तथान्यः सर्पमालश्च चक्राभरण एव च

dhanuṣpāṇirmahātejā viśrutaḥ sa mahādyutiḥ | tathānyaḥ sarpamālaśca cakrābharaṇa eva ca

धनुर्धारी, महातेजस्वी, प्रख्यात, महाद्युति वाला। इसी प्रकार एक अन्य, सर्पों की माला और चक्र के आभूषण वाला।

श्लोक 49 (skanda.8.23.49)

चक्रायुधो महातेजा ह्रस्वपादकटीकरः । स नाम्ना विश्रुतो लोके ग्रहाप्यायन इत्युत

cakrāyudho mahātejā hrasvapādakaṭīkaraḥ | sa nāmnā viśruto loke grahāpyāyana ityuta

चक्रायुध, महातेजस्वी, छोटे पैर, कटि और हाथ वाला; वह लोक में 'ग्रहाप्यायन' नाम से विख्यात था।

श्लोक 50 (skanda.8.23.50)

गणकोटिशतैः षड्भिर्वृतस्समनुधावत । शंकुकर्णोभ्ययाच्चैव गणकोट्या महाबलः

gaṇakoṭiśataiḥ ṣaḍbhirvṛtassamanudhāvata | śaṁkukarṇobhyayāccaiva gaṇakoṭyā mahābalaḥ

छह सौ करोड़ गणों से घिरा हुआ वह दौड़ता आया। शंकुकर्ण भी एक करोड़ गणों के साथ महाबली आया।

श्लोक 51 (skanda.8.23.51)

नन्दिकश्चापि दशभिः पिङ्गाक्षोष्टाभिरेव च । विनायकश्चतुःषष्ट्या कुष्माण्डो नाम विश्रुतः

nandikaścāpi daśabhiḥ piṅgākṣoṣṭābhireva ca | vināyakaścatuḥṣaṣṭyā kuṣmāṇḍo nāma viśrutaḥ

नन्दिक दस करोड़ गणों सहित, पिंगाक्ष आठ सहित, विनायक चौंसठ सहित, तथा कुष्माण्ड नाम से विख्यात —

श्लोक 52 (skanda.8.23.52)

हिरण्यवर्णः षड्भिश्च एकपादस्तथैव च । धूम्रकेशो द्वादशभिः पताकी दशभिस्तथा

hiraṇyavarṇaḥ ṣaḍbhiśca ekapādastathaiva ca | dhūmrakeśo dvādaśabhiḥ patākī daśabhistathā

हिरण्यवर्ण छह सहित, इसी प्रकार एकपाद; धूम्रकेश बारह सहित, पताकी दस सहित —

श्लोक 53 (skanda.8.23.53)

सहस्रघंटोष्टादशभिस्तपः पंचभिरेव च । सहस्रशीर्षः षड्भिश्च भवः कोटिसमावृतः

sahasraghaṁṭoṣṭādaśabhistapaḥ paṁcabhireva ca | sahasraśīrṣaḥ ṣaḍbhiśca bhavaḥ koṭisamāvṛtaḥ

सहस्रघण्ट अठारह सहित, तप पाँच सहित; सहस्रशीर्ष छह सहित, तथा भव एक करोड़ से घिरा हुआ —

श्लोक 54 (skanda.8.23.54)

वरो दशभिरभ्यागात् कुम्भकर्णस्तथाष्टभिः । विष्वक्सेनः सहस्रेण अनदस्तु शतेन वै

varo daśabhirabhyāgāt kumbhakarṇastathāṣṭabhiḥ | viṣvaksenaḥ sahasreṇa anadastu śatena vai

वर दस सहित आया, कुम्भकर्ण आठ सहित; विष्वक्सेन एक हजार सहित, अनद सौ सहित —

श्लोक 55 (skanda.8.23.55)

आवेशनस्तथाष्टाभिः सप्तभिश्च प्रवर्तनः । महारवः सहस्रेण गणानां गणपो वृतः

āveśanastathāṣṭābhiḥ saptabhiśca pravartanaḥ | mahāravaḥ sahasreṇa gaṇānāṁ gaṇapo vṛtaḥ

आवेशन आठ सहित, प्रवर्तन सात सहित; महारव, गणों का वह गणपति, एक हजार करोड़ से घिरा हुआ —

श्लोक 56 (skanda.8.23.56)

चतुर्मुखो द्वादशभिस्तथा बाहुप्रहारकः । महाकालः शतेनैव तथाग्निशिखरो गणः

caturmukho dvādaśabhistathā bāhuprahārakaḥ | mahākālaḥ śatenaiva tathāgniśikharo gaṇaḥ

चतुर्मुख बारह सहित, इसी प्रकार बाहुप्रहारक; महाकाल सौ सहित, तथा अग्निशिखर गण —

श्लोक 57 (skanda.8.23.57)

आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव धनावहः । सन्नाभश्च शतेनैव कुक्कुटोष्टाभिरेव च

ādityamūrdhā koṭyā ca tathā caiva dhanāvahaḥ | sannābhaśca śatenaiva kukkuṭoṣṭābhireva ca

आदित्यमूर्धा एक करोड़ सहित, इसी प्रकार धनावह; सन्नाभ सौ सहित, तथा कुक्कुट आठ सहित —

श्लोक 58 (skanda.8.23.58)

कुन्दश्च पञ्चदशभिस्तथा संकोटकोपरः । अमोघभूतिः कोट्या च तथा चैवाघभूतिकः

kundaśca pañcadaśabhistathā saṁkoṭakoparaḥ | amoghabhūtiḥ koṭyā ca tathā caivāghabhūtikaḥ

कुन्द पन्द्रह सहित, इसी प्रकार एक अन्य संकोटक; अमोघभूति एक करोड़ सहित, इसी प्रकार अघभूतिक —

श्लोक 59 (skanda.8.23.59)

एकपादोपरः षष्ट्या तथा सप्तभिरारणः । महाबलश्च नवभिरपस्मारश्च विश्रुतः

ekapādoparaḥ ṣaṣṭyā tathā saptabhirāraṇaḥ | mahābalaśca navabhirapasmāraśca viśrutaḥ

एक अन्य एकपाद साठ सहित, इसी प्रकार आरण सात सहित; महाबल नौ सहित, तथा प्रसिद्ध अपस्मार —

श्लोक 60 (skanda.8.23.60)

नीलो नवत्या देवेशः पूर्णभद्रस्तथैव च । निर्ऋतिश्चैव सप्तत्या कोटीनामभ्यगात् सह

nīlo navatyā deveśaḥ pūrṇabhadrastathaiva ca | nirṛtiścaiva saptatyā koṭīnāmabhyagāt saha

नील देवेश नब्बे सहित, इसी प्रकार पूर्णभद्र; और निर्ऋति भी सत्तर करोड़ सहित साथ आए।

श्लोक 61 (skanda.8.23.61)

कोटीकोटीसहस्राणां शतैर्विंशतिर्भिवृताः । ईतयस्तत्र चाजग्मुर्महायोगबलान्विताः

koṭīkoṭīsahasrāṇāṁ śatairviṁśatirbhivṛtāḥ | ītayastatra cājagmurmahāyogabalānvitāḥ

करोड़ों करोड़ों और सहस्रों के सैकड़ों बीस गुने से घिरे, महायोगबल से सम्पन्न ईतिगण भी वहाँ आए।

श्लोक 62 (skanda.8.23.62)

भूताः कोटिसहस्रेण प्रमथाः कोटिभिस्त्रिभिः । वीरभद्रश्चतुःषष्ट्या वृषभश्च महाबलः

bhūtāḥ koṭisahasreṇa pramathāḥ koṭibhistribhiḥ | vīrabhadraścatuḥṣaṣṭyā vṛṣabhaśca mahābalaḥ

भूतगण एक हजार करोड़ सहित, प्रमथगण तीन करोड़ सहित; वीरभद्र चौंसठ सहित, तथा महाबली वृषभ —

श्लोक 63 (skanda.8.23.63)

मेघः सौदामिनीमालो नवत्या संवृतोऽभ्यगात् । प्रभाकरश्च विंशत्या विट्पतिश्च महाबलः

meghaḥ saudāminīmālo navatyā saṁvṛto'bhyagāt | prabhākaraśca viṁśatyā viṭpatiśca mahābalaḥ

मेघ, बिजली की माला वाला, नब्बे से घिरा हुआ आया; प्रभाकर बीस सहित, और महाबली विट्पति —

श्लोक 64 (skanda.8.23.64)

गिरिको मेघनादश्च उदरो मणिरेव च । काष्ठकर्णश्च दिव्यात्मा विश्वरूपश्च विश्रुतः

giriko meghanādaśca udaro maṇireva ca | kāṣṭhakarṇaśca divyātmā viśvarūpaśca viśrutaḥ

गिरिक, मेघनाद, उदर, मणि; काष्ठकर्ण दिव्यात्मा, तथा प्रसिद्ध विश्वरूप —

श्लोक 65 (skanda.8.23.65)

शतमन्युस्तथा चैव पञ्चाक्षश्चैव वीर्यवान् । तालकेतुश्च षंडश्च कपाली गजनाशनः

śatamanyustathā caiva pañcākṣaścaiva vīryavān | tālaketuśca ṣaṁḍaśca kapālī gajanāśanaḥ

शतमन्यु, तथा बलवान पंचाक्ष; तालकेतु, षण्ड, कपाली, गजनाशन —

श्लोक 66 (skanda.8.23.66)

संवर्तकस्तथा चैत्रस्त्रैलोक्यदहनस्तथा । लोकान्तकश्च दीप्तात्मा हेमकुण्डल एव च

saṁvartakastathā caitrastrailokyadahanastathā | lokāntakaśca dīptātmā hemakuṇḍala eva ca

संवर्तक, चैत्र, त्रैलोक्यदहन; लोकान्तक, दीप्तात्मा, तथा हेमकुण्डल —

श्लोक 67 (skanda.8.23.67)

मृत्युश्चैव यमश्चैव कालो विषहरस्तथा । शतमायो महामायः सर्वत्राशरणस्तथा

mṛtyuścaiva yamaścaiva kālo viṣaharastathā | śatamāyo mahāmāyaḥ sarvatrāśaraṇastathā

मृत्यु, यम, काल, विषहर; शतमाय, महामाय, तथा सर्वत्राशरण —

श्लोक 68 (skanda.8.23.68)

एकशृङ्गश्च विख्यातस्तथा भृङ्गिरिटिश्च यः । एते चान्ये च गणपा गुह्या ये च महाबलाः

ekaśṛṅgaśca vikhyātastathā bhṛṅgiriṭiśca yaḥ | ete cānye ca gaṇapā guhyā ye ca mahābalāḥ

प्रसिद्ध एकशृंग, तथा भृंगिरिटि — ये और भी अन्य गणपति, जो गुह्य और महाबली थे,

श्लोक 69 (skanda.8.23.69)

तत्राजग्मुर्मुदा युक्ताः सर्वे चित्रास्त्रयोधिनः । गायन्तश्च द्रवन्तश्च नृत्यन्तश्च महाबलाः

tatrājagmurmudā yuktāḥ sarve citrāstrayodhinaḥ | gāyantaśca dravantaśca nṛtyantaśca mahābalāḥ

वे सब वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आए, विचित्र अस्त्रों से युद्ध करने वाले, गाते, दौड़ते और नाचते हुए वे महाबली।

श्लोक 70 (skanda.8.23.70)

मुखाडम्बरवाद्यानि वादयन्तस्तथैव च । रथैर्नागैर्हयैश्चैव ययुर्मर्कटवाहनाः

mukhāḍambaravādyāni vādayantastathaiva ca | rathairnāgairhayaiścaiva yayurmarkaṭavāhanāḥ

और मुख से ही आडम्बर-वाद्य बजाते हुए। कुछ रथों से, हाथियों से, घोड़ों से गए, कुछ बन्दरों की सवारी करते हुए।

श्लोक 71 (skanda.8.23.71)

व्याघ्रसिंहविडालैश्च सर्पैः पक्षिभिरेव च । श्वापदैश्च तथानेकैरल्पैश्च विविधैः शुभैः

vyāghrasiṁhaviḍālaiśca sarpaiḥ pakṣibhireva ca | śvāpadaiśca tathānekairalpaiśca vividhaiḥ śubhaiḥ

कुछ व्याघ्र, सिंह, बिल्ली, सर्प और पक्षियों पर सवार होकर, तथा अनेक अन्य हिंस्र पशुओं और विविध छोटे-बड़े शुभ प्राणियों पर।

श्लोक 72 (skanda.8.23.72)

विमानेषु तथारूढा मानुषेषु तथापरे । पुष्पकेन विमानेन तथा मत्तद्विपेन च

vimāneṣu tathārūḍhā mānuṣeṣu tathāpare | puṣpakena vimānena tathā mattadvipena ca

कुछ विमानों पर आरूढ़ थे, कुछ मानव-वाहनों पर; कुछ पुष्पक विमान से, कुछ मदमस्त हाथी से।

श्लोक 73 (skanda.8.23.73)

छन्दं कृत्वा तथा शं किन्नरोरगचारणैः । उत्तमायुधयुक्तेन हंसयुक्तेन चापरे

chandaṁ kṛtvā tathā śaṁ kinnaroragacāraṇaiḥ | uttamāyudhayuktena haṁsayuktena cāpare

किन्नर, नाग और चारणों के साथ मंगलगान करते हुए (यह पंक्ति मूल में अनिश्चित है); कुछ उत्तम शस्त्रों से युक्त, कुछ हंसों से जुते रथ पर।

श्लोक 74 (skanda.8.23.74)

नानाविमानमारूढाः कोटिशस्तत्र चापरे । भेरीशृंगमृदंङ्गैश्च पणवानकगोमुखैः

nānāvimānamārūḍhāḥ koṭiśastatra cāpare | bherīśṛṁgamṛdaṁṅgaiśca paṇavānakagomukhaiḥ

वहाँ करोड़ों की संख्या में अन्य लोग नाना विमानों पर आरूढ़ थे — भेरी, शृंग, मृदंग, पणव, आनक और गोमुख वाद्यों के साथ।

श्लोक 75 (skanda.8.23.75)

वादित्रैर्विविधैश्चैव पटहैरेकपुष्करैः । भेरीकर्करसन्नादैराडम्बरकडिण्डिमैः

vāditrairvividhaiścaiva paṭahairekapuṣkaraiḥ | bherīkarkarasannādairāḍambarakaḍiṇḍimaiḥ

— विविध वाद्ययन्त्रों, ढोलों और एकपुष्करों के साथ, भेरी और कर्करी की गर्जना के साथ, आडम्बर और डिण्डिमों के साथ।

श्लोक 76 (skanda.8.23.76)

मड्डूकैर्वेणुवीणाभिर्विवृषैस्तुणवैरपि । दर्दरैस्तलघातैश्च कच्छपै पणवैरपि

maḍḍūkairveṇuvīṇābhirvivṛṣaistuṇavairapi | dardaraistalaghātaiśca kacchapai paṇavairapi

— मड्डूक, वेणु-वीणा, अन्य ढोल और तुणव वाद्यों के साथ, दर्दर, ताली और कच्छप तथा पणव वाद्यों के साथ भी।

श्लोक 77 (skanda.8.23.77)

वाद्यमानैर्महायोगा आजग्मुर्देवसंसदम् । हंसजालेन दिव्येन पद्मयोनिः पितामहः

vādyamānairmahāyogā ājagmurdevasaṁsadam | haṁsajālena divyena padmayoniḥ pitāmahaḥ

इस प्रकार वाद्य बजाते हुए वे महायोगी देवसभा में आए। कमलयोनि पितामह ब्रह्मा दिव्य हंसों के समूह के साथ —

श्लोक 78 (skanda.8.23.78)

मुनिभिर्योगसंसिद्धैर्वृतः सर्वैः समन्ततः । ऋग्वेदो दक्षिणे भागे दिव्यकुंडलभूषितः

munibhiryogasaṁsiddhairvṛtaḥ sarvaiḥ samantataḥ | ṛgvedo dakṣiṇe bhāge divyakuṁḍalabhūṣitaḥ

— योगसिद्ध मुनियों से सब ओर से घिरे हुए आए। ऋग्वेद, दक्षिण भाग में, दिव्य कुण्डलों से सुशोभित होकर —

श्लोक 79 (skanda.8.23.79)

पश्चिमे सामवेदश्च नानारूपधरः शुभः । अथर्वा चोत्तरे चैव वह्निनेत्रधरः प्रभुः

paścime sāmavedaśca nānārūpadharaḥ śubhaḥ | atharvā cottare caiva vahninetradharaḥ prabhuḥ

— पश्चिम में सामवेद, नाना रूप धारण किए हुए शुभ; और उत्तर में अथर्ववेद, अग्नि-नेत्र धारण किए हुए वह प्रभु —

श्लोक 80 (skanda.8.23.80)

यजुर्वेदस्तु पूर्वेण विद्युद्रूपधरस्तथा । इतिहासपुराणानि नानारूपधराणि च

yajurvedastu pūrveṇa vidyudrūpadharastathā | itihāsapurāṇāni nānārūpadharāṇi ca

— और पूर्व में यजुर्वेद, बिजली का रूप धारण किए हुए; तथा इतिहास और पुराण भी नाना रूप धारण किए हुए —

श्लोक 81 (skanda.8.23.81)

अग्रतो दीपयानेन तेपि तत्र प्रजग्मिरे । शिवभक्तो महायोगी गरुडस्थो जनार्दनः

agrato dīpayānena tepi tatra prajagmire | śivabhakto mahāyogī garuḍastho janārdanaḥ

— वे सब भी प्रकाशयान से आगे-आगे वहाँ गए। शिवभक्त, महायोगी जनार्दन गरुड़ पर आरूढ़ होकर —

श्लोक 82 (skanda.8.23.82)

सर्वैः स्वीयैः परिवृतस्तत्रागात् पार्षदैः सह । वृत आत्मसमैर्दिव्यैर्विष्णुरूपधरैः शुभैः

sarvaiḥ svīyaiḥ parivṛtastatrāgāt pārṣadaiḥ saha | vṛta ātmasamairdivyairviṣṇurūpadharaiḥ śubhaiḥ

— अपने समस्त पार्षदों से घिरा हुआ, अपने ही समान दिव्य और शुभ विष्णुरूपधारियों से घिरा हुआ, वहाँ आया।

श्लोक 83 (skanda.8.23.83)

दृष्ट्वा नारायणं प्राप्तं महादेवोब्रवीदिदम । वाचा गंभीरया शंभुस्तदेवं लोकभावनम्

dṛṣṭvā nārāyaṇaṁ prāptaṁ mahādevobravīdidama | vācā gaṁbhīrayā śaṁbhustadevaṁ lokabhāvanam

नारायण को आया देखकर लोकभावन महादेव शम्भु ने गम्भीर वाणी में यह कहा —

श्लोक 84 (skanda.8.23.84)

शृणु विष्णो वचो मह्यं तद्वक्ष्यामि जनार्दन । अभिषेकं प्रयच्छस्व नन्दिनि मम सुप्रिये

śṛṇu viṣṇo vaco mahyaṁ tadvakṣyāmi janārdana | abhiṣekaṁ prayacchasva nandini mama supriye

— हे विष्णु, मेरा वचन सुनो; हे जनार्दन, मैं वह कहूँगा। मेरे अत्यन्त प्रिय नन्दी का अभिषेक कर दो।

श्लोक 85 (skanda.8.23.85)

प्रहस्य शंकरं देवो भूयो नारायणोब्रवीत् । यथा वदसि देवेश करिष्येहं वृषध्वज

prahasya śaṁkaraṁ devo bhūyo nārāyaṇobravīt | yathā vadasi deveśa kariṣyehaṁ vṛṣadhvaja

देव नारायण ने हँसकर शंकर से पुनः कहा — हे देवेश, हे वृषध्वज, जैसा आप कहते हैं, वैसा ही मैं करूँगा।

श्लोक 86 (skanda.8.23.86)

देवानामपि देवस्त्वं पुमान् त्वं न संशयः । शक्र ऐरावतारूढ आजगाम तदन्तिकम्

devānāmapi devastvaṁ pumān tvaṁ na saṁśayaḥ | śakra airāvatārūḍha ājagāma tadantikam

'आप देवताओं के भी देव हैं, आप ही परम पुरुष हैं (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है), इसमें संशय नहीं।' तब ऐरावत पर आरूढ़ शक्र उस स्थान के निकट आए।

श्लोक 87 (skanda.8.23.87)

वसुभिर्मातरश्चैव यमवरुणवित्तपैः । पृथग्विमानसंस्थैश्च छादयित्वा नभस्तलम्

vasubhirmātaraścaiva yamavaruṇavittapaiḥ | pṛthagvimānasaṁsthaiśca chādayitvā nabhastalam

वसुओं, मातृगणों, यम, वरुण और कुबेर के साथ, अलग-अलग विमानों पर स्थित होकर, आकाश को आच्छादित करते हुए —

श्लोक 88 (skanda.8.23.88)

प्रलयान्ते च सृष्टौ तु यादवासन संज्ञया । ब्रह्मादिरूपं यातेमा संप्राप्ता गणरूपिणः

pralayānte ca sṛṣṭau tu yādavāsana saṁjñayā | brahmādirūpaṁ yātemā saṁprāptā gaṇarūpiṇaḥ

— जो प्रलय के अन्त में और सृष्टि के समय संज्ञामात्र से विद्यमान रहते हैं, वे ब्रह्मा आदि रूपों को प्राप्त होकर गणों के रूप में वहाँ आ पहुँचे। (यह श्लोक मूल पाठ में अनिश्चित है।)

श्लोक 89 (skanda.8.23.89)

ते विश्वकर्माणममित्रहासां विश्वेशमेकाक्षरमव्ययञ्च । सहस्रनेत्रप्रतिमातिभास्वराः प्रणेमुरुच्चैरपि चाभिनेदुः

te viśvakarmāṇamamitrahāsāṁ viśveśamekākṣaramavyayañca | sahasranetrapratimātibhāsvarāḥ praṇemuruccairapi cābhineduḥ

सहस्रनेत्र (इन्द्र) के समान अत्यन्त देदीप्यमान वे सब विश्वकर्मा, शत्रुओं के हास्य-नाशक, विश्वेश्वर, एकाक्षर, अव्यय शिव को प्रणाम करके ऊँचे स्वर से जय-जयकार करने लगे।

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