अम्बिका खण्ड · अध्याय 22
नन्दीश्वर-वरप्रदान
श्लोक 1 (skanda.8.22.1)
सनत्कुमार उवाच। ततस्तु देवदेवेशो भक्त्या परमया युतम् । अश्रुपूर्णेक्षणं दीनं पादयोः शिरसा नतम्
sanatkumāra uvāca| tatastu devadeveśo bhaktyā paramayā yutam | aśrupūrṇekṣaṇaṁ dīnaṁ pādayoḥ śirasā natam
सनत्कुमार ने कहा — तब देवदेवेश ने परम भक्ति से युक्त, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले, दीन और अपने चरणों में सिर झुकाए हुए उस नन्दी को —
श्लोक 2 (skanda.8.22.2)
कराभ्यां सुसुखाभ्यां तं संगृह्य परमात्तिहा । उत्थाप्य नयने सोमः अश्रुपूर्णे ममार्ज ह
karābhyāṁ susukhābhyāṁ taṁ saṁgṛhya paramāttihā | utthāpya nayane somaḥ aśrupūrṇe mamārja ha
— परम दुःखहर्ता सोम ने अपने दोनों सुखद हाथों से पकड़कर उठाया, और उसके अश्रुपूर्ण नेत्रों को पोंछा।
श्लोक 3 (skanda.8.22.3)
उवाच चैनं तुष्टात्मा वचसाप्याययन्निव । निरीक्ष्य गणपान् सर्वान् देव्या सह तदा प्रभुः
uvāca cainaṁ tuṣṭātmā vacasāpyāyayanniva | nirīkṣya gaṇapān sarvān devyā saha tadā prabhuḥ
प्रभु ने प्रसन्नचित्त होकर, देवी सहित समस्त गणनायकों को देखते हुए, मानो वचन से उसे पुनर्जीवित करते हुए यह कहा —
श्लोक 4 (skanda.8.22.4)
देवदेव उवाच। जाने भक्तिं तव मयि जाने चार्तिं तवानघ । तस्य सर्वस्य शैलादे उदर्कं सन्निशामय
devadeva uvāca| jāne bhaktiṁ tava mayi jāne cārtiṁ tavānagha | tasya sarvasya śailāde udarkaṁ sanniśāmaya
देवदेव ने कहा — हे निष्पाप, मैं तुम्हारी मुझमें भक्ति जानता हूँ, और तुम्हारे कष्ट को भी जानता हूँ। हे शैलादे, अब इन सबका परिणाम सुनो।
श्लोक 5 (skanda.8.22.5)
अमरो जरया त्यक्तो नित्यं दुःखविवर्जितः । अक्षयश्चाव्ययश्चैव सपिता ससुहृज्जनः
amaro jarayā tyakto nityaṁ duḥkhavivarjitaḥ | akṣayaścāvyayaścaiva sapitā sasuhṛjjanaḥ
तुम अमर, वृद्धावस्था से रहित, नित्य दुःखरहित, अक्षय और अविनाशी होगे, अपने पिता और सुहृदजनों सहित।
श्लोक 6 (skanda.8.22.6)
ममेष्टो गणपश्चैव मद्वीर्यो मत्पराक्रमः । इष्टो मम सदा चैव मम पार्श्वगतस्सदा
mameṣṭo gaṇapaścaiva madvīryo matparākramaḥ | iṣṭo mama sadā caiva mama pārśvagatassadā
तुम मेरे प्रिय गणपति होगे, मेरे ही वीर्य और मेरे ही पराक्रम वाले। तुम सदा मुझे प्रिय रहोगे, और सदा मेरे पास ही रहोगे।
श्लोक 7 (skanda.8.22.7)
मद्रूपश्चैव भविता महायोगबलान्वितः । ऋद्धिमच्चैव ते द्वीपं क्षीरोदममृताकरम्
madrūpaścaiva bhavitā mahāyogabalānvitaḥ | ṛddhimaccaiva te dvīpaṁ kṣīrodamamṛtākaram
तुम मेरे ही रूप वाले होगे, महायोगबल से सम्पन्न। तुम्हारा द्वीप भी ऐश्वर्यशाली होगा — क्षीरसागर, अमृत का स्रोत।
श्लोक 8 (skanda.8.22.8)
संवासं च प्रयच्छामि तत्र रंस्यसि सर्वदा । कुशेशयमयीं मालामवमुच्यात्मनस्ततः
saṁvāsaṁ ca prayacchāmi tatra raṁsyasi sarvadā | kuśeśayamayīṁ mālāmavamucyātmanastataḥ
मैं तुम्हें वहाँ निवास प्रदान करता हूँ; तुम वहाँ सदा रमण करोगे। फिर उन्होंने अपने से एक कमल की माला उतारकर —
श्लोक 9 (skanda.8.22.9)
आबबन्ध महातेजा नन्दिने दिव्यरूपिणीम् । स तया मालया नन्दी बभौ कण्ठावसक्तया
ābabandha mahātejā nandine divyarūpiṇīm | sa tayā mālayā nandī babhau kaṇṭhāvasaktayā
— उस महातेजस्वी ने वह दिव्यरूपिणी माला नन्दी को पहना दी। नन्दी उस कण्ठ में पड़ी माला से सुशोभित हो उठे,
श्लोक 10 (skanda.8.22.10)
त्र्यक्षो दशभुजः श्रीमान् द्वितीय इव शङ्करः । ततो हस्ते समादाय हस्तेन भगवान् हरः
tryakṣo daśabhujaḥ śrīmān dvitīya iva śaṅkaraḥ | tato haste samādāya hastena bhagavān haraḥ
त्रिनेत्र, दशभुजा, श्रीमान्, मानो द्वितीय शंकर के समान। फिर भगवान् हर ने अपने हाथ से उनका हाथ पकड़कर —
श्लोक 11 (skanda.8.22.11)
उवाच ब्रूहि किं तेऽद्य ददानि वरमुत्तमम् । आश्रमश्चायमत्यर्थं तपसा तव भावितः
uvāca brūhi kiṁ te'dya dadāni varamuttamam | āśramaścāyamatyarthaṁ tapasā tava bhāvitaḥ
— कहा — बताओ, आज मैं तुम्हें कौन-सा उत्तम वर दूँ? तुम्हारे तप से यह आश्रम भी अत्यन्त पवित्र हो गया है।
श्लोक 12 (skanda.8.22.12)
जप्येश्वर इति ख्यातो मम गुह्यो भविष्यति । समन्ताद् योजनं क्षेत्रं दिव्यं देवगणैर्वृतम्
japyeśvara iti khyāto mama guhyo bhaviṣyati | samantād yojanaṁ kṣetraṁ divyaṁ devagaṇairvṛtam
यह मेरा गुह्य स्थान 'जप्येश्वर' नाम से विख्यात होगा — देवगणों से घिरा हुआ, चारों ओर एक योजन का दिव्य क्षेत्र।
श्लोक 13 (skanda.8.22.13)
सिद्धचारणसंकीर्णमप्सरोगणसेवितम् । सिद्धिक्षेत्रं परं गुह्यं भविष्यति न संशयः
siddhacāraṇasaṁkīrṇamapsarogaṇasevitam | siddhikṣetraṁ paraṁ guhyaṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ
सिद्धों और चारणों से भरा हुआ, अप्सरागणों से सेवित यह परम गुह्य सिद्धिक्षेत्र बनेगा, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 14 (skanda.8.22.14)
कर्मणा मनसा वाचा यत्किञ्चित् कुरुते नरः । शुभं वाप्यशुभं वात्र सर्वं भवितृ तच्छुभम्
karmaṇā manasā vācā yatkiñcit kurute naraḥ | śubhaṁ vāpyaśubhaṁ vātra sarvaṁ bhavitṛ tacchubham
मनुष्य यहाँ कर्म, मन और वाणी से जो कुछ भी करेगा, चाहे शुभ हो या अशुभ, वह सब शुभ ही हो जाएगा।
श्लोक 15 (skanda.8.22.15)
जप्यमानः स तुल्यो वै रुद्राणां तु भविष्यति । यत्र तत्र मृता मर्त्या यास्यन्ति त्वत्सलोकताम्
japyamānaḥ sa tulyo vai rudrāṇāṁ tu bhaviṣyati | yatra tatra mṛtā martyā yāsyanti tvatsalokatām
यहाँ जप करने वाला रुद्रों के समान हो जाएगा। मरणशील प्राणी जहाँ कहीं भी यहाँ मरेंगे, वे तुम्हारे लोक को प्राप्त होंगे।
श्लोक 16 (skanda.8.22.16)
ततो जटाप्लुतं वारि गृहीत्वा हारनिर्मलम् । उक्त्वा नदी भवस्वेति विससर्ज महातपाः
tato jaṭāplutaṁ vāri gṛhītvā hāranirmalam | uktvā nadī bhavasveti visasarja mahātapāḥ
फिर उस महातपस्वी ने अपनी जटाओं में भीगे हुए, हार के समान निर्मल जल को लेकर 'नदी बन जाओ' कहकर उसे छोड़ दिया।
श्लोक 17 (skanda.8.22.17)
सा ततो दिव्यतोया च पुण्या मणिजला शुभा । हंसकारण्डवाकीर्णा चक्रवाकोपशोभिता
sā tato divyatoyā ca puṇyā maṇijalā śubhā | haṁsakāraṇḍavākīrṇā cakravākopaśobhitā
वह जल दिव्य, पवित्र, मणि के समान जल वाला, शुभ, हंसों और कारण्डवों से भरा हुआ, चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित —
श्लोक 18 (skanda.8.22.18)
पद्मोत्पलवनोपेता प्रावर्तत महानदी । स्त्रीरूपधारिणी चैव प्राञ्जलिः शिरसानता
padmotpalavanopetā prāvartata mahānadī | strīrūpadhāriṇī caiva prāñjaliḥ śirasānatā
— कमल और उत्पल के वनों से युक्त होकर एक महानदी के रूप में प्रवाहित हुआ, और स्त्री का रूप धारण करके, हाथ जोड़े, सिर झुकाए —
श्लोक 19 (skanda.8.22.19)
पद्मोत्पलदलाभाक्षी तदा देवमुपस्थिता । तामुवाच ततो देवो नदीं स्वयमुपस्थिताम्
padmotpaladalābhākṣī tadā devamupasthitā | tāmuvāca tato devo nadīṁ svayamupasthitām
— कमल और उत्पल की पंखुड़ियों जैसे नेत्रों वाली वह देव के समक्ष उपस्थित हुई। तब देव ने स्वयं उपस्थित हुई उस नदी से कहा —
श्लोक 20 (skanda.8.22.20)
यस्माज्जटोदकाद् देवि प्रवृत्ता त्वं शुभानने । तस्माज्जटोदा नाम्ना त्वं भविष्यसि सरिद्वरा
yasmājjaṭodakād devi pravṛttā tvaṁ śubhānane | tasmājjaṭodā nāmnā tvaṁ bhaviṣyasi saridvarā
हे शुभानने देवी, चूँकि तुम मेरी जटाओं के जल से उत्पन्न हुई हो, इसलिए तुम 'जटोदा' नाम से श्रेष्ठ नदी होगी।
श्लोक 21 (skanda.8.22.21)
त्वयि स्नानं तु यः कुर्याच्छुचिः प्रयतमानसः । सोऽश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोके महीयते
tvayi snānaṁ tu yaḥ kuryācchuciḥ prayatamānasaḥ | so'śvamedhaphalaṁ prāpya rudraloke mahīyate
जो शुद्ध और संयतचित्त होकर तुममें स्नान करेगा, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त कर रुद्रलोक में पूजित होगा।
श्लोक 22 (skanda.8.22.22)
सनत्कुमार उवाच। ततो देव्या नन्दीश्वरमतिप्रभम् । पुत्रस्तेऽयमिति प्रोच्य पादयोस्तं व्यनामयत्
sanatkumāra uvāca| tato devyā nandīśvaramatiprabham | putraste'yamiti procya pādayostaṁ vyanāmayat
सनत्कुमार ने कहा — फिर देवी के द्वारा (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है) अत्यन्त तेजस्वी नन्दीश्वर को — 'यह तुम्हारा पुत्र है' — ऐसा कहकर देवी के चरणों में झुका दिया।
श्लोक 23 (skanda.8.22.23)
सा तमाघ्राय शिरसि पाणिभ्यां परिमार्जती । पुत्रप्रेम्णाभ्यषिञ्चत्तं स्रोतोभिः स्तनजैस्त्रिभिः
sā tamāghrāya śirasi pāṇibhyāṁ parimārjatī | putrapremṇābhyaṣiñcattaṁ srotobhiḥ stanajaistribhiḥ
उसके सिर को सूँघकर और अपने दोनों हाथों से पोंछते हुए, उन्होंने पुत्र-स्नेह से उसे अपने स्तनों से बहती तीन धाराओं से अभिषिक्त किया।
श्लोक 24 (skanda.8.22.24)
पयसा शंखगौरेण देवी देवं निरीक्षती । तानि स्रोतांसि त्रीण्यस्याः स्रुतान्योघवती नदी
payasā śaṁkhagaureṇa devī devaṁ nirīkṣatī | tāni srotāṁsi trīṇyasyāḥ srutānyoghavatī nadī
शंख के समान श्वेत दूध से देवी उस देव को निहारती हुई (उसे अभिषिक्त करती रहीं); उनकी वे तीनों धाराएँ बहकर एक महाप्रवाहवाली नदी बन गईं।
श्लोक 25 (skanda.8.22.25)
नदीं त्रिस्रोतसीं पुण्यां ततस्तामवदद्धरः । त्रिस्रोतसां नदीं दृष्ट्वा वृषं परमहर्षितः
nadīṁ trisrotasīṁ puṇyāṁ tatastāmavadaddharaḥ | trisrotasāṁ nadīṁ dṛṣṭvā vṛṣaṁ paramaharṣitaḥ
तब हर ने उस पवित्र नदी को 'त्रिस्रोतसी' कहा। त्रिस्रोतसी नदी को देखकर वह वृषभ (नन्दी) अत्यन्त हर्षित हुआ,
श्लोक 26 (skanda.8.22.26)
ननर्द नादात् तस्माच्च सरिदन्या ततोऽभवत् । यस्माद् वृषभनादेन प्रवृत्ता सा महानदी
nanarda nādāt tasmācca saridanyā tato'bhavat | yasmād vṛṣabhanādena pravṛttā sā mahānadī
— जोर से गर्जना की, और उस गर्जना से एक अन्य नदी उत्पन्न हो गई। चूँकि वह महानदी वृषभ-गर्जना से प्रवृत्त हुई थी —
श्लोक 27 (skanda.8.22.27)
तस्माड्ढित्किरिकान्तां वै उवाच वृषभध्वजः । जाम्बूनदमयं चित्रं स्वं देवः परमाद्भुतम्
tasmāḍḍhitkirikāntāṁ vai uvāca vṛṣabhadhvajaḥ | jāmbūnadamayaṁ citraṁ svaṁ devaḥ paramādbhutam
— इसलिए वृषभध्वज ने उसे उस गर्जना-सूचक नाम से पुकारा (यह श्लोक मूल पाठ में अनिश्चित है)। तब देव ने अपना जाम्बूनद स्वर्ण से बना अद्भुत आभूषण उसे अर्पित किया।
श्लोक 28 (skanda.8.22.28)
मुकुटञ्चाबबन्धास्य कुण्डले चामृतोद्भवे । तं तथाभ्यर्चितं व्योम्नि दृष्टवा मेघः प्रभाकरः
mukuṭañcābabandhāsya kuṇḍale cāmṛtodbhave | taṁ tathābhyarcitaṁ vyomni dṛṣṭavā meghaḥ prabhākaraḥ
उन्होंने उसके लिए एक मुकुट और अमृत से उत्पन्न दो कुण्डल बाँध दिए। आकाश में इस प्रकार सुसज्जित उसे देखकर तेजस्वी मेघ —
श्लोक 29 (skanda.8.22.29)
देवोपवाह्यः सिषिवे सनादः सतडिद्गुणः । तस्याभिषिक्तस्य तदा प्रवृत्ते स्रोतसी भृशम्
devopavāhyaḥ siṣive sanādaḥ sataḍidguṇaḥ | tasyābhiṣiktasya tadā pravṛtte srotasī bhṛśam
— वह देव का वाहन, गर्जनायुक्त और विद्युत्-गुणयुक्त, उसके साथ जुड़ गया। उस अभिषिक्त नन्दी से तब दो धाराएँ अत्यधिक प्रवाहित हुईं।
श्लोक 30 (skanda.8.22.30)
यस्माच्च कुण्डलात् स्वर्णात् नद्येका संप्रवर्तत । स्वर्णोदकेति नाम्ना तां महादेवोऽभ्यभाषत
yasmācca kuṇḍalāt svarṇāt nadyekā saṁpravartata | svarṇodaketi nāmnā tāṁ mahādevo'bhyabhāṣata
और उस स्वर्ण कुण्डल से एक नदी प्रवाहित हुई; महादेव ने उसे 'स्वर्णोदका' नाम से पुकारा।
श्लोक 31 (skanda.8.22.31)
जम्बूनदमया द्यस्माद् द्वितीया मुकुटाच्छुभात् । प्रावर्तत नदी पुण्या प्राह जाम्बूनदीति ताम्
jambūnadamayā dyasmād dvitīyā mukuṭācchubhāt | prāvartata nadī puṇyā prāha jāmbūnadīti tām
और चूँकि जाम्बूनद स्वर्ण से बने शुभ मुकुट से एक दूसरी पवित्र नदी प्रवाहित हुई, उन्होंने उसे 'जाम्बूनदी' कहा।
श्लोक 32 (skanda.8.22.32)
एतत्पञ्चनदं नाम जप्येश्वरसमीपगम् । व्याख्यातं फलमेतासां जटोदया महात्मना
etatpañcanadaṁ nāma japyeśvarasamīpagam | vyākhyātaṁ phalametāsāṁ jaṭodayā mahātmanā
जप्येश्वर के समीप बहने वाला यह 'पंचनद' नाम से प्रसिद्ध हुआ। जटोदा से लेकर इन नदियों का फल उस महात्मा ने बता दिया है।
श्लोक 33 (skanda.8.22.33)
तच्च पञ्चनदं दिव्यं देवं जप्येश्वरं च तम् । त्रिरात्रोपोषितो गत्वा स्नात्वाभ्यर्च्य च शूलिनम्
tacca pañcanadaṁ divyaṁ devaṁ japyeśvaraṁ ca tam | trirātropoṣito gatvā snātvābhyarcya ca śūlinam
तीन रात्रि उपवास करके उस दिव्य पंचनद और उस देव जप्येश्वर के पास जाकर, स्नान करके त्रिशूलधारी की पूजा करके —
श्लोक 34 (skanda.8.22.34)
ब्राह्मणाँस्तर्पयित्वा च यत्र तत्र मृतो नरः । नन्दीश्वरस्यानुचरः क्षीरोदनिलयो भवेत्
brāhmaṇā~starpayitvā ca yatra tatra mṛto naraḥ | nandīśvarasyānucaraḥ kṣīrodanilayo bhavet
— और ब्राह्मणों को तृप्त करके, मनुष्य जहाँ कहीं भी मरे, वह नन्दीश्वर का अनुचर होकर क्षीरसागर में निवास करने वाला बनता है।
श्लोक 35 (skanda.8.22.35)
यस्तु जप्येश्वरे प्राणान् परित्यजति दुस्त्यजान् । नियमेनान्यथा वापि स मे गणपतिर्भवेत्
yastu japyeśvare prāṇān parityajati dustyajān | niyamenānyathā vāpi sa me gaṇapatirbhavet
किन्तु जो जप्येश्वर में अपने त्यागने में कठिन प्राणों को त्याग देता है, चाहे नियमपूर्वक हो या अन्यथा, वह मेरा गणपति हो जाता है।
श्लोक 36 (skanda.8.22.36)
नन्दीश्वरसमो नित्यं शाश्वतो ह्यक्षयोऽव्ययः । मम पार्श्वेऽप्यनुचरः प्रियः सन्मत एव च
nandīśvarasamo nityaṁ śāśvato hyakṣayo'vyayaḥ | mama pārśve'pyanucaraḥ priyaḥ sanmata eva ca
वह सदा नन्दीश्वर के समान, शाश्वत, अक्षय, अविनाशी होता है — मेरे पास ही रहने वाला, प्रिय और सम्मानित अनुचर।
श्लोक 37 (skanda.8.22.37)
जप्येश्वरं पंचनदं च तद्वै यो मानवोऽभ्येत्य जहाति देहम् । स मे सदा स्याद् गणपो वरिष्ठस्त्वष्ट्रा समः कान्तवपुश्च नित्यम्
japyeśvaraṁ paṁcanadaṁ ca tadvai yo mānavo'bhyetya jahāti deham | sa me sadā syād gaṇapo variṣṭhastvaṣṭrā samaḥ kāntavapuśca nityam
जो मनुष्य जप्येश्वर और पंचनद में आकर अपना शरीर त्याग देता है, वह सदा मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ गणपति होगा, त्वष्टा के समान और सदा सुन्दर शरीर वाला।