अम्बिका खण्ड · अध्याय 21
नन्दी का शिव-स्तोत्र
श्लोक 1 (skanda.8.21.1)
सनत्कुमार उवाच। निर्गतोऽथ ततो नन्दी जगाम सरितां वराम् । भुवनामिति विख्यातां सर्वलोकहितावहाम्
sanatkumāra uvāca| nirgato'tha tato nandī jagāma saritāṁ varām | bhuvanāmiti vikhyātāṁ sarvalokahitāvahām
सनत्कुमार ने कहा — तब वहाँ से निकलकर नन्दी भुवना नाम से प्रसिद्ध, समस्त लोकों का हित करने वाली उस श्रेष्ठ नदी के पास गए।
श्लोक 2 (skanda.8.21.2)
तां प्रविश्य ततो धीमानेकाग्रो द्युतिमाँस्थितः । स जजाप ततो रुद्रं मृत्योर्भीतः समाहितः
tāṁ praviśya tato dhīmānekāgro dyutimā~sthitaḥ | sa jajāpa tato rudraṁ mṛtyorbhītaḥ samāhitaḥ
उसमें प्रविष्ट होकर वह बुद्धिमान, तेजस्वी एकाग्रचित्त होकर स्थित हुए। मृत्यु से भयभीत होकर उन्होंने समाहितचित्त से रुद्र का जप किया।
श्लोक 3 (skanda.8.21.3)
जपता तेन तत्रैव तत्परेण तदाशिषा । कोटिरेका यदा जप्ता तदा देवस्तुतोष ह
japatā tena tatraiva tatpareṇa tadāśiṣā | koṭirekā yadā japtā tadā devastutoṣa ha
इस प्रकार वहीं तत्पर होकर उस आशीर्वाद के साथ जप करते हुए, जब एक करोड़ जप पूर्ण हुआ, तब देव प्रसन्न हुए।
श्लोक 4 (skanda.8.21.4)
सनत्कुमार उवाच। सोऽवतीर्य ततो भूयः प्रयतात्मा तथैव च । जजाप कोटिमन्यां तु रुद्रमेवानुचिन्तयन्
sanatkumāra uvāca| so'vatīrya tato bhūyaḥ prayatātmā tathaiva ca | jajāpa koṭimanyāṁ tu rudramevānucintayan
सनत्कुमार ने कहा — फिर बाहर निकलकर, संयतचित्त होकर, उन्होंने रुद्र का ही ध्यान करते हुए एक और करोड़ जप किया।
श्लोक 5 (skanda.8.21.5)
द्वितीयायां ततः कोट्यां संवृतायां वृषध्वजः । अभ्याजगाम तं चैव वरदोऽस्मीत्यभाषत
dvitīyāyāṁ tataḥ koṭyāṁ saṁvṛtāyāṁ vṛṣadhvajaḥ | abhyājagāma taṁ caiva varado'smītyabhāṣata
जब दूसरा करोड़ जप पूर्ण हो गया, तब वृषभध्वज शिव उसके पास आए और कहा — मैं वरदाता हूँ।
श्लोक 6 (skanda.8.21.6)
स प्राह भगवन् कोटिं तृतीयामधिकामहम् । जप्तुमिच्छामि देवेश त्वत्प्रसादात्त्वहं विभो
sa prāha bhagavan koṭiṁ tṛtīyāmadhikāmaham | japtumicchāmi deveśa tvatprasādāttvahaṁ vibho
उसने कहा — हे भगवन्, हे देवेश, हे विभो, आपकी कृपा से मैं एक तीसरा करोड़ जप भी और करना चाहता हूँ।
श्लोक 7 (skanda.8.21.7)
एवमस्त्विति भूयोपि भगवान् प्रत्युवाच ह । जगाम स्वं वेश्म देव्या सह महामतिः
evamastviti bhūyopi bhagavān pratyuvāca ha | jagāma svaṁ veśma devyā saha mahāmatiḥ
'ऐसा ही हो' कहकर भगवान ने पुनः उत्तर दिया (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है), और वह महामति देवी सहित अपने भवन को चले गए।
श्लोक 8 (skanda.8.21.8)
ततस्तृतीयां रुद्राणां कोटिमन्यां जजाप ह । युगान्तादित्यसंकाशः ततः समभवद् द्विजः
tatastṛtīyāṁ rudrāṇāṁ koṭimanyāṁ jajāpa ha | yugāntādityasaṁkāśaḥ tataḥ samabhavad dvijaḥ
फिर उसने रुद्रों के नाम का एक और, तीसरा करोड़ जप किया; तब वह ब्राह्मण युगान्त के सूर्य के समान तेजस्वी हो गया।
श्लोक 9 (skanda.8.21.9)
तस्य कोटित्रये व्यास समाप्ते ज्वलनत्विषः । सोमः सह गणैर्देवस्तं देशमुपचक्रमे
tasya koṭitraye vyāsa samāpte jvalanatviṣaḥ | somaḥ saha gaṇairdevastaṁ deśamupacakrame
हे व्यास, अग्नि के समान तेजस्वी उसके तीनों करोड़ जप पूर्ण होने पर, देव सोम अपने गणों सहित उस स्थान पर आए।
श्लोक 10 (skanda.8.21.10)
स तं करेण संगृह्य तद्वृत्तसलिलाच्च ह । संगृह्य ग्रहस्तेन नन्दिनं कालेनाब्रवीत्
sa taṁ kareṇa saṁgṛhya tadvṛttasalilācca ha | saṁgṛhya grahastena nandinaṁ kālenābravīt
उन्होंने उसे हाथ से पकड़कर, उस चारों ओर के जल से भी उठाकर, यथासमय नन्दी से यह कहा। (यह श्लोक मूल पाठ में कुछ अनिश्चित है।)
श्लोक 11 (skanda.8.21.11)
देवदेव उवाच। शैलादे वरदोऽहं ते तपसानेन तोषितः । साधु जप्तं त्वया धीमन् ब्रूहि यत्ते मनोगतम्
devadeva uvāca| śailāde varado'haṁ te tapasānena toṣitaḥ | sādhu japtaṁ tvayā dhīman brūhi yatte manogatam
देवदेव ने कहा — हे शैलादे (शिलाद-पुत्र), मैं इस तप से प्रसन्न होकर तुम्हारा वरदाता हूँ। हे बुद्धिमान, तुमने भलीभाँति जप किया है; जो तुम्हारे मन में है, वह कहो।
श्लोक 12 (skanda.8.21.12)
शैलादिरुवाच। जपेयं कोटिमन्यां वै भूयोपि तव तेजसा । वरमेतं वृणे देव यदि तुष्टोऽसि मे विभो
śailādiruvāca| japeyaṁ koṭimanyāṁ vai bhūyopi tava tejasā | varametaṁ vṛṇe deva yadi tuṣṭo'si me vibho
शैलादि ने कहा — मैं आपके ही तेज से एक और करोड़ जप करना चाहता हूँ। हे देव, हे विभो, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो यही वर मैं माँगता हूँ।
श्लोक 13 (skanda.8.21.13)
भगवानुवाच। शैलादे तव तुष्टोऽस्मि साम्बिकः । यं त्वद्य वृणुषे कामं सर्वं तं प्रददामि ते
bhagavānuvāca| śailāde tava tuṣṭo'smi sāmbikaḥ | yaṁ tvadya vṛṇuṣe kāmaṁ sarvaṁ taṁ pradadāmi te
भगवान ने कहा — हे शैलादे, मैं अम्बिका सहित तुमसे प्रसन्न हूँ (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है)। आज तुम जो भी कामना चुनोगे, वह सब मैं तुम्हें प्रदान करूँगा।
श्लोक 14 (skanda.8.21.14)
ब्रह्मत्वमथ विष्णुत्वमिन्द्रत्वमथवान्यताम् । आदित्यो भव रुद्रौ वा ब्रूहि किं करवाणि ते
brahmatvamatha viṣṇutvamindratvamathavānyatām | ādityo bhava rudrau vā brūhi kiṁ karavāṇi te
ब्रह्मा का पद, या विष्णु का पद, अथवा इन्द्र का पद, या और कुछ; सूर्य बन जाओ, या रुद्रों में से एक — कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?
श्लोक 15 (skanda.8.21.15)
सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तो देवेन शिरसा पादयोर्नतः । तुष्टाव पुरकामांगक्रतुपर्वतनाशनम्
sanatkumāra uvāca| sa evamukto devena śirasā pādayornataḥ | tuṣṭāva purakāmāṁgakratuparvatanāśanam
सनत्कुमार ने कहा — देव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह उनके चरणों में सिर झुकाकर, त्रिपुर, काम के शरीर, यज्ञ और पर्वत (दक्ष के अभिमान) के नाशक की स्तुति करने लगा।
श्लोक 16 (skanda.8.21.16)
नमो देवाधिदेवाय महादेवाय वै नमः । नमः कामांगनाशाय नीलकंठाय वै नमः
namo devādhidevāya mahādevāya vai namaḥ | namaḥ kāmāṁganāśāya nīlakaṁṭhāya vai namaḥ
देवाधिदेव को नमस्कार है, महादेव को नमस्कार है। काम के शरीर के नाशक को नमस्कार है, नीलकण्ठ को नमस्कार है।
श्लोक 17 (skanda.8.21.17)
नमस्तुषितनाशाय त्रैलोक्यदमनाय च । नमः कालाग्रदण्डाय उग्रदण्डाय वै नमः
namastuṣitanāśāya trailokyadamanāya ca | namaḥ kālāgradaṇḍāya ugradaṇḍāya vai namaḥ
तुषित के नाशक को नमस्कार है, त्रैलोक्य के दमनकर्ता को नमस्कार है। काल के अग्रभाग में दण्ड धारण करने वाले को नमस्कार है, उग्र दण्ड वाले को नमस्कार है।
श्लोक 18 (skanda.8.21.18)
सर्वतः पाणिपादाय सर्वतोक्षिमुखाय च । सर्वतः प्रभवे चैव सर्वमावृत्य तिष्ठते
sarvataḥ pāṇipādāya sarvatokṣimukhāya ca | sarvataḥ prabhave caiva sarvamāvṛtya tiṣṭhate
सब ओर हाथ-पैर वाले को, सब ओर नेत्र-मुख वाले को नमस्कार है। सब ओर प्रभावशाली, सबको व्याप्त करके स्थित रहने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 19 (skanda.8.21.19)
नमस्ते रुक्मवर्णाय तथैवातीन्द्रियाय च । नमः कनकलिंगाय सर्वलिंगाय वै नमः
namaste rukmavarṇāya tathaivātīndriyāya ca | namaḥ kanakaliṁgāya sarvaliṁgāya vai namaḥ
स्वर्ण के समान वर्ण वाले, तथा इन्द्रियों से परे रहने वाले आपको नमस्कार है। स्वर्ण-लिंग वाले को नमस्कार है, सर्व-लिंग वाले को नमस्कार है।
श्लोक 20 (skanda.8.21.20)
नमश्चन्द्रार्कवर्णाय योगेशायाजिताय च । पिनाकपाणये चैव शूलमुद्गरपाणये
namaścandrārkavarṇāya yogeśāyājitāya ca | pinākapāṇaye caiva śūlamudgarapāṇaye
चन्द्र-सूर्य के समान वर्ण वाले, योगेश्वर, अजित को नमस्कार है। पिनाक धारण करने वाले तथा शूल-मुद्गर हाथ में लिए हुए को नमस्कार है।
श्लोक 21 (skanda.8.21.21)
निषङ्गिणे खड्गिने च परश्वधधराय च । रथिने चर्मिणे चैव महेशाय च वै नमः
niṣaṅgiṇe khaḍgine ca paraśvadhadharāya ca | rathine carmiṇe caiva maheśāya ca vai namaḥ
तूणीरधारी, खड्गधारी और फरसा धारण करने वाले को नमस्कार है। रथी, ढाल धारण करने वाले और महेश को भी नमस्कार है।
श्लोक 22 (skanda.8.21.22)
नमस्त्रिशूलहस्ताय उग्रदण्डधराय च । नमो गणाधिपतये रुद्राणां पतये नमः
namastriśūlahastāya ugradaṇḍadharāya ca | namo gaṇādhipataye rudrāṇāṁ pataye namaḥ
त्रिशूलधारी हाथ वाले, उग्र दण्ड धारण करने वाले को नमस्कार है। गणों के अधिपति को नमस्कार है, रुद्रों के स्वामी को नमस्कार है।
श्लोक 23 (skanda.8.21.23)
नमः सहस्रनेत्राय शतनेत्राय वै नमः । आदित्यानां पतये वसूनां पतये नमः
namaḥ sahasranetrāya śatanetrāya vai namaḥ | ādityānāṁ pataye vasūnāṁ pataye namaḥ
सहस्रनेत्र को नमस्कार है, शतनेत्र को नमस्कार है। आदित्यों के स्वामी को नमस्कार है, वसुओं के स्वामी को नमस्कार है।
श्लोक 24 (skanda.8.21.24)
नमः पृथिव्याः पतये आकाशपतये नमः । नमः स्वर्लोकपतये उमायाः पतये नमः
namaḥ pṛthivyāḥ pataye ākāśapataye namaḥ | namaḥ svarlokapataye umāyāḥ pataye namaḥ
पृथ्वी के स्वामी को नमस्कार है, आकाश के स्वामी को नमस्कार है। स्वर्गलोक के स्वामी को नमस्कार है, उमा के स्वामी को नमस्कार है।
श्लोक 25 (skanda.8.21.25)
नमो योगाधिगम्याय सर्वयोगप्रदाय च । ध्यानिनां ध्यायमानाय ध्यानिभिः संस्तुताय च
namo yogādhigamyāya sarvayogapradāya ca | dhyānināṁ dhyāyamānāya dhyānibhiḥ saṁstutāya ca
योग से प्राप्त होने वाले को, समस्त योग के दाता को नमस्कार है। ध्यानियों द्वारा ध्यान किए जाने वाले, ध्यानियों द्वारा स्तुति किए जाने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 26 (skanda.8.21.26)
मृत्यवे कालदण्डाय यमाय च महात्मने । देवाधिपतये चैव दिव्यसंहननाय च
mṛtyave kāladaṇḍāya yamāya ca mahātmane | devādhipataye caiva divyasaṁhananāya ca
मृत्यु को, काल के दण्ड को, और महात्मा यम को नमस्कार है। देवों के अधिपति को और दिव्य शरीर-रचना वाले को नमस्कार है।
श्लोक 27 (skanda.8.21.27)
यज्ञाय वसुदानाय स्वर्गदाय जयाय च । सवित्रे सर्वदेवानां धर्मायानेकरूपिणे
yajñāya vasudānāya svargadāya jayāya ca | savitre sarvadevānāṁ dharmāyānekarūpiṇe
यज्ञ को, धन देने वाले को, स्वर्ग देने वाले को और विजय को नमस्कार है। समस्त देवताओं के प्रसविता को, अनेक रूपों वाले धर्म को नमस्कार है।
श्लोक 28 (skanda.8.21.28)
अमृताय वरेण्याय सर्वदेवस्तुताय च । ब्रह्मणश्च शिरोहर्त्रे यज्ञस्य च महात्मनः
amṛtāya vareṇyāya sarvadevastutāya ca | brahmaṇaśca śirohartre yajñasya ca mahātmanaḥ
अमृतस्वरूप को, वरणीय को, समस्त देवताओं द्वारा स्तुत को नमस्कार है। ब्रह्मा के शिर को हरने वाले और महान् यज्ञ के शिर को हरने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 29 (skanda.8.21.29)
त्रिपुरघ्नाय चोग्राय सर्वाशुभहराय च । उमादेहार्धरूपाय ललाटनयनाय च
tripuraghnāya cogrāya sarvāśubhaharāya ca | umādehārdharūpāya lalāṭanayanāya ca
त्रिपुर के नाशक, उग्र, समस्त अशुभ को हरने वाले को नमस्कार है। उमा के शरीर के आधे रूप वाले, ललाट पर नेत्र धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 30 (skanda.8.21.30)
महिषान्धकभर्त्रे च द्रष्ट्रे च परमेष्ठिने । ब्रह्मणे गुरवे चैव ब्रह्मणे जनकाय च
mahiṣāndhakabhartre ca draṣṭre ca parameṣṭhine | brahmaṇe gurave caiva brahmaṇe janakāya ca
महिष और अन्धक के संहारक, द्रष्टा, परमेष्ठी को नमस्कार है। ब्रह्म को, गुरु को, और ब्रह्मा के जनक को नमस्कार है।
श्लोक 31 (skanda.8.21.31)
कुमारगुरवे चैव कुमारवरदाय च । हलिने मुशलघ्नाय महाहासाय वै नमः
kumāragurave caiva kumāravaradāya ca | haline muśalaghnāya mahāhāsāya vai namaḥ
कुमार के गुरु को, कुमार को वरदान देने वाले को नमस्कार है। हल धारण करने वाले, मुसल से नाश करने वाले, महान् हास्य वाले को नमस्कार है।
श्लोक 32 (skanda.8.21.32)
मृत्युपाशाग्रहस्ताय तक्षकब्रह्मसूत्रिणे । सविद्युद्घनवाताय तथैव वृषयायिने
mṛtyupāśāgrahastāya takṣakabrahmasūtriṇe | savidyudghanavātāya tathaiva vṛṣayāyine
मृत्युपाश हाथ में लिए हुए, तक्षक नाग को यज्ञोपवीत के रूप में धारण करने वाले को नमस्कार है। बिजली, मेघ और वायु के साथ रहने वाले, वृषभ पर सवार होने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 33 (skanda.8.21.33)
हिमवद्विन्ध्यवासाय मेरोः पृष्ठनिवासिने । कैलासवासिने चैव धनेश्वरसखाय च
himavadvindhyavāsāya meroḥ pṛṣṭhanivāsine | kailāsavāsine caiva dhaneśvarasakhāya ca
हिमालय और विन्ध्य पर वास करने वाले, मेरु के शिखर पर निवास करने वाले को नमस्कार है। कैलास पर निवास करने वाले, धनेश (कुबेर) के सखा को नमस्कार है।
श्लोक 34 (skanda.8.21.34)
विष्णुदेहार्धदत्ताय तस्यैव वरदाय च । सर्वभूताधियज्ञाय सर्वभूतानुकम्पिने
viṣṇudehārdhadattāya tasyaiva varadāya ca | sarvabhūtādhiyajñāya sarvabhūtānukampine
विष्णु को अपने आधे शरीर के दाता, तथा उन्हीं को वरदान देने वाले को नमस्कार है। समस्त भूतों में यज्ञाधिष्ठाता, समस्त भूतों पर अनुकम्पा करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 35 (skanda.8.21.35)
अन्तर्भूतादिभूताय प्राणिनां जीवदाय च । नमस्ते मन्यमानाय अभिमानाय चैव हि
antarbhūtādibhūtāya prāṇināṁ jīvadāya ca | namaste manyamānāya abhimānāya caiva hi
समस्त भूतों के भीतर आदिभूत स्वरूप में स्थित, प्राणियों को जीवन देने वाले को नमस्कार है। मनन करने वाले तथा अभिमान-स्वरूप आपको भी नमस्कार है।
श्लोक 36 (skanda.8.21.36)
बुध्यमानाय बोध्याय द्रष्ट्रे वै चक्षुषे नमः । नमस्ते स्पर्शयित्रे च तथैव रसनाय च
budhyamānāya bodhyāya draṣṭre vai cakṣuṣe namaḥ | namaste sparśayitre ca tathaiva rasanāya ca
जानने वाले को, जानने योग्य को, द्रष्टा को, चक्षु को नमस्कार है। स्पर्श कराने वाले आपको तथा रसना (स्वाद-इन्द्रिय) को भी नमस्कार है।
श्लोक 37 (skanda.8.21.37)
नमो घ्राणाय घ्रात्रे च श्रोत्रे श्रोत्राय चैव हि । हस्तिने चैव हस्ताय तथा पादाय पादिने
namo ghrāṇāya ghrātre ca śrotre śrotrāya caiva hi | hastine caiva hastāya tathā pādāya pādine
गन्ध को, सूँघने वाले को, श्रोत्र को, सुनने वाले को नमस्कार है। हाथ वाले को और हाथ को, तथा पैर को और पैर वाले को नमस्कार है।
श्लोक 38 (skanda.8.21.38)
नमोस्त्वानन्दकर्त्रे च आनन्दाय च ते नमः । वाचेथ वाग्मिने चैव तन्मात्राय महात्मने
namostvānandakartre ca ānandāya ca te namaḥ | vācetha vāgmine caiva tanmātrāya mahātmane
आनन्द के कर्ता को नमस्कार हो, आनन्द को भी आपको नमस्कार है। वाणी को और वाक्पटु को, तथा सूक्ष्मतत्त्वों को, हे महात्मन्, नमस्कार है।
श्लोक 39 (skanda.8.21.39)
सूक्ष्माय चैव स्थूलाय सत्वाय रजसे नमः । नमश्च तपसे नित्यं क्षेत्रज्ञायाजिताय च
sūkṣmāya caiva sthūlāya satvāya rajase namaḥ | namaśca tapase nityaṁ kṣetrajñāyājitāya ca
सूक्ष्म और स्थूल को, सत्त्व और रज को नमस्कार है। तप को नित्य नमस्कार है, क्षेत्रज्ञ और अजित को नमस्कार है।
श्लोक 40 (skanda.8.21.40)
विष्णवे लोककर्त्रे च प्रजानां पतये नमः । नमः सप्तर्षये चैव तप्यमानाय तापिने
viṣṇave lokakartre ca prajānāṁ pataye namaḥ | namaḥ saptarṣaye caiva tapyamānāya tāpine
विष्णु को, लोकों के कर्ता को, प्रजाओं के स्वामी को नमस्कार है। सप्तर्षि-स्वरूप को तथा तप करने वाले, तपाने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 41 (skanda.8.21.41)
ब्रह्मण्याय च तथा दुर्वाससे नमः । शिल्पिने शिल्पनाथाय विदुषे विश्वकर्मणे
brahmaṇyāya ca tathā durvāsase namaḥ | śilpine śilpanāthāya viduṣe viśvakarmaṇe
ब्रह्म-भक्तों के हितकारी को (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है), तथा दुर्वासा को नमस्कार है। शिल्पी को, शिल्पनाथ को, विद्वान् विश्वकर्मा को नमस्कार है।
श्लोक 42 (skanda.8.21.42)
अत्रये भृगवे चैव वसिष्ठाय नमोऽस्तु ते । भूताय भूतनाथाय पतये नमः
atraye bhṛgave caiva vasiṣṭhāya namo'stu te | bhūtāya bhūtanāthāya pataye namaḥ
अत्रि और भृगु को, तथा वसिष्ठ को आपको नमस्कार हो। भूत-स्वरूप को, भूतनाथ को (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है), स्वामी को नमस्कार है।
श्लोक 43 (skanda.8.21.43)
तिष्ठते द्रवते चैव गायते नृत्यतेपि च । अवश्यायाप्यवध्याय अजरायामराय च
tiṣṭhate dravate caiva gāyate nṛtyatepi ca | avaśyāyāpyavadhyāya ajarāyāmarāya ca
स्थिर रहने वाले, बहने वाले, गाने वाले और नाचने वाले को भी नमस्कार है। ओस-स्वरूप को, अवध्य को, अजर को, अमर को नमस्कार है।
श्लोक 44 (skanda.8.21.44)
अक्षयायाप्ययायैव तथाप्रतिहताय च । अनावेश्याय सर्वेषां दृश्याऽदृश्यस्वरूपिणे
akṣayāyāpyayāyaiva tathāpratihatāya ca | anāveśyāya sarveṣāṁ dṛśyā'dṛśyasvarūpiṇe
अक्षय को, प्रलय-स्वरूप को, तथा जिसे कोई रोक नहीं सकता, उसे नमस्कार है। किसी के भी वश में न आने वाले, दृश्य-अदृश्य स्वरूप वाले को नमस्कार है।
श्लोक 45 (skanda.8.21.45)
सूक्ष्मेभ्यश्चातिसूक्ष्माय सर्वेशाय महात्मने । नमस्ते भगवन् व्यक्त नमस्ते भगवन् शिव
sūkṣmebhyaścātisūkṣmāya sarveśāya mahātmane | namaste bhagavan vyakta namaste bhagavan śiva
सूक्ष्मों से भी अति सूक्ष्म, सबके स्वामी, महात्मा को नमस्कार है। हे भगवन् व्यक्त, आपको नमस्कार है; हे भगवन् शिव, आपको नमस्कार है।
श्लोक 46 (skanda.8.21.46)
नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते लोकभावन । न मे देवाधिपत्येन ब्रह्मत्वेनापि वा पुनः
namaste sarvalokeśa namaste lokabhāvana | na me devādhipatyena brahmatvenāpi vā punaḥ
हे सर्वलोकेश, आपको नमस्कार है; हे लोकभावन, आपको नमस्कार है। मुझे न तो देवताओं के आधिपत्य से, न ब्रह्मा के पद से भी प्रयोजन है —
श्लोक 47 (skanda.8.21.47)
न विष्णुत्वेन देवेश न इन्द्रत्वेन भूतप । इच्छाम्यहं तवेशान गणत्वं नित्यमव्ययम्
na viṣṇutvena deveśa na indratvena bhūtapa | icchāmyahaṁ taveśāna gaṇatvaṁ nityamavyayam
— हे देवेश, न विष्णु के पद से, न हे भूतप, इन्द्र के पद से भी। हे ईशान, मैं तो आपके गणों में नित्य, अविनाशी सदस्यता ही चाहता हूँ।
श्लोक 48 (skanda.8.21.48)
नित्यं त्वां सगणं साम्बं प्रसन्नं सपरिच्छदम् । द्रष्टुमिच्छामि देवेश एष मे दीयतां वरः
nityaṁ tvāṁ sagaṇaṁ sāmbaṁ prasannaṁ saparicchadam | draṣṭumicchāmi deveśa eṣa me dīyatāṁ varaḥ
मैं सदा आपको गणों सहित, अम्बिका सहित, प्रसन्न और परिवार सहित देखना चाहता हूँ। हे देवेश, मुझे यही वर दिया जाए।
श्लोक 49 (skanda.8.21.49)
दत्त्वा गतिं पुरा देव त्वं वैरावर्तनं पुनः । शरणं त्वञ्च मे नाथ नान्यं पश्यामि कर्हिचित्
dattvā gatiṁ purā deva tvaṁ vairāvartanaṁ punaḥ | śaraṇaṁ tvañca me nātha nānyaṁ paśyāmi karhicit
हे देव, पहले भी आपने मुझे गति प्रदान की, और अब पुनः वैर-निवृत्ति (मूल पाठ यहाँ अनिश्चित है)। हे नाथ, आप ही मेरी शरण हैं; मुझे कोई और कभी नहीं दिखता।
श्लोक 50 (skanda.8.21.50)
त्वया त्यक्तस्य चैवाशु विनाशो नात्र संशयः । अन्यां गतिं न पश्यामि योस्यान्यं तेन्तकं शुभम्
tvayā tyaktasya caivāśu vināśo nātra saṁśayaḥ | anyāṁ gatiṁ na paśyāmi yosyānyaṁ tentakaṁ śubham
आपके द्वारा त्यागे गए का शीघ्र विनाश होता है, इसमें संशय नहीं। हे शुभ, आपके सिवा और किसे मैं अपना अन्तिम आश्रय समझूँ, ऐसी अन्य गति मुझे नहीं दिखती।
श्लोक 51 (skanda.8.21.51)
अनुरक्तं च भक्तं च त्वत्परं त्वदुपाश्रयम् । प्रतीच्छ मां सदा देव एष मे दीयतां वरः
anuraktaṁ ca bhaktaṁ ca tvatparaṁ tvadupāśrayam | pratīccha māṁ sadā deva eṣa me dīyatāṁ varaḥ
अनुरक्त, भक्त, आपमें तत्पर और आपकी शरण लेने वाले मुझे सदा स्वीकार कीजिए, हे देव। मुझे यही वर दिया जाए।
श्लोक 52 (skanda.8.21.52)
सनत्कुमार उवाच। य इदं प्रातरुत्थाय पठेदविमना नरः । स देहभेदमासाद्य नन्दीश्वरसमो भवेत्
sanatkumāra uvāca| ya idaṁ prātarutthāya paṭhedavimanā naraḥ | sa dehabhedamāsādya nandīśvarasamo bhavet
सनत्कुमार ने कहा — जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर एकाग्रचित्त होकर इसे पढ़ता है, वह शरीर का त्याग होने पर नन्दीश्वर के समान हो जाता है।
श्लोक 53 (skanda.8.21.53)
यश्चेमं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा द्विजातिषु । सोऽश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोके महीयते
yaścemaṁ śṛṇuyānnityaṁ śrāvayedvā dvijātiṣu | so'śvamedhaphalaṁ prāpya rudraloke mahīyate
जो इसे नित्य सुनता है, अथवा द्विजातियों को सुनाता है, वह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त कर रुद्रलोक में पूजित होता है।
श्लोक 54 (skanda.8.21.54)
श्रुत्वा सकृदपि ह्येतं स्तवं पापप्रणाशनम् । यत्र तत्र मृतो व्यास न दुर्गतिमवाप्नुयात्
śrutvā sakṛdapi hyetaṁ stavaṁ pāpapraṇāśanam | yatra tatra mṛto vyāsa na durgatimavāpnuyāt
हे व्यास, इस पापनाशक स्तोत्र को एक बार भी सुनकर मनुष्य जहाँ कहीं भी मरे, दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 55 (skanda.8.21.55)
योधीत्य नित्यं स्तवमेतमग्र्यं देवं सदाभ्यर्चयते यतात्मा । किं तस्य यज्ञैर्विविधैश्च दानैस्तीर्थैः सुतप्तैश्च तथा तपोभिः
yodhītya nityaṁ stavametamagryaṁ devaṁ sadābhyarcayate yatātmā | kiṁ tasya yajñairvividhaiśca dānaistīrthaiḥ sutaptaiśca tathā tapobhiḥ
जो संयतचित्त होकर इस श्रेष्ठ स्तोत्र का नित्य अध्ययन करके सदा देव की अर्चना करता है, उसे विविध यज्ञों, दानों, तीर्थों और सुतप्त तपस्याओं से क्या प्रयोजन है?