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अम्बिका खण्ड · अध्याय 20

नन्दि-तपःप्रवेश

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (skanda.8.20.1)

व्यास उवाच। उमाहरौ तु देवेशौ चक्रतुर्यत्तु संगतौ । तन्मे सर्वमशेषेण कथयस्व महामुने

vyāsa uvāca| umāharau tu deveśau cakraturyattu saṁgatau | tanme sarvamaśeṣeṇa kathayasva mahāmune

व्यास ने कहा — देवेश उमा और हर ने संगत होकर जो कुछ किया, वह सब मुझे सम्पूर्णतः बताइए, हे महामुने।

श्लोक 2 (skanda.8.20.2)

सनत्कुमार उवाच। उमाहरौ तु संगम्य परस्परमनिन्दितौ

sanatkumāra uvāca| umāharau tu saṁgamya parasparamaninditau

सनत्कुमार ने कहा — उमा और हर, वे दोनों निर्दोष, परस्पर मिलकर... (आगे का भाग मूल पाठ में खण्डित है)

श्लोक 3 (skanda.8.20.3)

शिलादस्यात्मजं विप्रं शक्तिवारणम्

śilādasyātmajaṁ vipraṁ śaktivāraṇam

शिलाद के पुत्र, उस ब्राह्मण, बल के निवारक को... (मूल पाठ यहाँ दोनों ओर से अत्यन्त खण्डित है, केवल यह अंश शेष है)

श्लोक 4 (skanda.8.20.4)

स चाप्ययोनिजः पुत्र आराध्य च महेश्वरम् । रुद्रेण समतां लब्ध्वा महागणपतिर्बभौ

sa cāpyayonijaḥ putra ārādhya ca maheśvaram | rudreṇa samatāṁ labdhvā mahāgaṇapatirbabhau

वह भी योनि से उत्पन्न न होने वाला पुत्र था, जिसने महेश्वर की आराधना करके रुद्र के साथ समानता प्राप्त की और महागणपति के रूप में विख्यात हुआ।

श्लोक 5 (skanda.8.20.5)

व्यास उवाच। कथं नन्दी समुत्पन्नः कथं चाराध्य शंकरम् । समत्वमन्वगाच्छम्भोः प्रतीहारत्वमेव च

vyāsa uvāca| kathaṁ nandī samutpannaḥ kathaṁ cārādhya śaṁkaram | samatvamanvagācchambhoḥ pratīhāratvameva ca

व्यास ने कहा — नन्दी किस प्रकार उत्पन्न हुए, और शंकर की आराधना करके किस प्रकार शम्भु के साथ समानता तथा उनके द्वारपाल का पद प्राप्त किया?

श्लोक 6 (skanda.8.20.6)

सनत्कुमार उवाच। अभूदृषिः सुधर्मात्मा शिलादो नाम वीर्यवान् । तस्याभूत् शीलवृत्तित्वं शिलादस्तेन सोऽभवत्

sanatkumāra uvāca| abhūdṛṣiḥ sudharmātmā śilādo nāma vīryavān | tasyābhūt śīlavṛttitvaṁ śilādastena so'bhavat

सनत्कुमार ने कहा — शिलाद नामक एक सुधर्मात्मा, वीर्यवान ऋषि थे। उनमें शील और सदाचार का ऐसा गुण था कि इसी कारण उनका नाम शिलाद पड़ा।

श्लोक 7 (skanda.8.20.7)

अपश्यल्लम्बमानांस्तान् गतीर्यान् स पितॄन् द्विजः । विच्छिन्नसंततिर्घोरं निरयं वै प्रपेदुषः

apaśyallambamānāṁstān gatīryān sa pitṝn dvijaḥ | vicchinnasaṁtatirghoraṁ nirayaṁ vai prapeduṣaḥ

उस ब्राह्मण ने अपने पितरों को लटकते हुए देखा, जो सन्तान-परम्परा टूट जाने के कारण भयंकर नरक को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 8 (skanda.8.20.8)

तैरुक्तोऽपत्यकामो वै तं देवं लोकमव्ययम् । आराधय महादेवं सुतार्थं द्विजसत्तम

tairukto'patyakāmo vai taṁ devaṁ lokamavyayam | ārādhaya mahādevaṁ sutārthaṁ dvijasattama

उन्होंने उससे कहा — हे द्विजसत्तम, सन्तान की कामना करते हुए तुम पुत्र के लिए उस अविनाशी लोकपालक महादेव की आराधना करो।

श्लोक 9 (skanda.8.20.9)

योऽयमुत्तारणे शक्तः स ते पुत्रं प्रदास्यति । तेषां वाक्यं ततः श्रुत्वा जगाम शरणं शिवम्

yo'yamuttāraṇe śaktaḥ sa te putraṁ pradāsyati | teṣāṁ vākyaṁ tataḥ śrutvā jagāma śaraṇaṁ śivam

जो हमें (इस दशा से) पार करने में समर्थ है, वही तुम्हें पुत्र प्रदान करेगा। उनके इस वचन को सुनकर वह शिव की शरण में गया।

श्लोक 10 (skanda.8.20.10)

तस्य वर्षसहस्रेण तप्यमानस्य शूलधृक् । शर्वः सोमो गणवृतो वरदोऽस्मीत्यभाषत

tasya varṣasahasreṇa tapyamānasya śūladhṛk | śarvaḥ somo gaṇavṛto varado'smītyabhāṣata

जब वह एक हजार वर्षों तक तप करता रहा, तब त्रिशूलधारी शर्व, सोम के रूप में, गणों से घिरे हुए, बोले — मैं वर देने वाला हूँ।

श्लोक 11 (skanda.8.20.11)

सोमं स दृष्ट्वा देवेशं प्रणतः पादयोर्विभोः । हर्षगद्गदया वाचा तुष्टाव विबुधेश्वरम्

somaṁ sa dṛṣṭvā deveśaṁ praṇataḥ pādayorvibhoḥ | harṣagadgadayā vācā tuṣṭāva vibudheśvaram

देवेश सोम को देखकर वह उस विभु के चरणों में झुक गया, और हर्ष से गद्गद वाणी में उस विबुधेश्वर की स्तुति करने लगा।

श्लोक 12 (skanda.8.20.12)

शिलाद उवाच। नमः परमदेवाय महेशाय महात्मने । स्रष्ट्रे सर्वसुरेशानां ब्रह्मणः पतये नमः

śilāda uvāca| namaḥ paramadevāya maheśāya mahātmane | sraṣṭre sarvasureśānāṁ brahmaṇaḥ pataye namaḥ

शिलाद ने कहा — परमदेव, महात्मा महेश को नमस्कार है। समस्त सुरेशों के स्रष्टा, ब्रह्मा के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.8.20.13)

नमः कामांगनाशाय योगसंभवहेतवे । नमः पर्वतवासाय ध्यानगम्याय ते नमः

namaḥ kāmāṁganāśāya yogasaṁbhavahetave | namaḥ parvatavāsāya dhyānagamyāya te namaḥ

काम के शरीर का नाश करने वाले, योग के उद्भव के कारण को नमस्कार है। पर्वतवासी, ध्यान से प्राप्त होने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 14 (skanda.8.20.14)

ऋषीणां पतये नित्यं देवानां पतये नमः । लोकानां पतये चैव योगिनां पतये नमः

ṛṣīṇāṁ pataye nityaṁ devānāṁ pataye namaḥ | lokānāṁ pataye caiva yogināṁ pataye namaḥ

ऋषियों के नित्य स्वामी, देवताओं के स्वामी को नमस्कार है। लोकों के स्वामी और योगियों के स्वामी को भी नमस्कार है।

श्लोक 15 (skanda.8.20.15)

प्रधानाय नमो नित्यं सर्गिणे । वरदाय च भक्तानां नमः सर्वगताय च

pradhānāya namo nityaṁ sargiṇe | varadāya ca bhaktānāṁ namaḥ sarvagatāya ca

प्रधान (मूलप्रकृति) को, सृष्टिकर्ता को नित्य नमस्कार है (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है)। भक्तों को वरदान देने वाले और सर्वव्यापी आपको नमस्कार है।

श्लोक 16 (skanda.8.20.16)

तन्मात्रेन्द्रियभूतानां विकाराय गुणैः सह । पतये चैव नमस्ते प्रभविष्णवे

tanmātrendriyabhūtānāṁ vikārāya guṇaiḥ saha | pataye caiva namaste prabhaviṣṇave

सूक्ष्मतत्त्वों, इन्द्रियों और महाभूतों के गुणसहित विकार-स्वरूप को नमस्कार है (मूल पाठ का कुछ अंश यहाँ खण्डित है)। हे प्रभविष्णु, आप स्वामी को भी नमस्कार है।

श्लोक 17 (skanda.8.20.17)

जगतः पतये चैव जगत्स्रष्ट्रे नमः सदा । प्रकृतेः पतये नित्यं पुरुषात्परगामिने

jagataḥ pataye caiva jagatsraṣṭre namaḥ sadā | prakṛteḥ pataye nityaṁ puruṣātparagāmine

जगत् के स्वामी और जगत् के स्रष्टा को सदा नमस्कार है। प्रकृति के नित्य स्वामी, पुरुष से भी परे जाने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 18 (skanda.8.20.18)

ईश्वराय नमो नित्यं योगगम्याय । संसारोत्पत्तिनाशाय सर्वकामप्रदाय च

īśvarāya namo nityaṁ yogagamyāya | saṁsārotpattināśāya sarvakāmapradāya ca

ईश्वर को, योग से प्राप्त होने वाले को नित्य नमस्कार है (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है)। संसार की उत्पत्ति और नाश के कारण, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 19 (skanda.8.20.19)

शरण्याय नमो नित्यं नमो भस्मांगरूपिणे । नमस्ते योग्रहस्ताय तेजसां पतये नमः

śaraṇyāya namo nityaṁ namo bhasmāṁgarūpiṇe | namaste yograhastāya tejasāṁ pataye namaḥ

शरण देने योग्य को नित्य नमस्कार है, भस्म से अंगयुक्त स्वरूप वाले को नमस्कार है। योग-सम्पन्न हस्त वाले आपको नमस्कार है (यहाँ कुछ अंश खण्डित है), तेजों के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 20 (skanda.8.20.20)

सूर्यानिलहुताशाम्बुचन्द्राकाशधराय च । स्थिताय सर्वदा नित्यं नमस्त्रैलोक्यवेधसे

sūryānilahutāśāmbucandrākāśadharāya ca | sthitāya sarvadā nityaṁ namastrailokyavedhase

सूर्य, वायु, अग्नि, जल, चन्द्रमा और आकाश के रूप को धारण करने वाले को नमस्कार है। सदा-सर्वदा स्थित, त्रैलोक्य के विधाता को नमस्कार है।

श्लोक 21 (skanda.8.20.21)

स्तोतस्यान्यांगतो देव विश्रामस्तव हंक्ष्यते । यस्माद्धेतुस्त्वमेवास्य जगतः स्थितिनाशयोः

stotasyānyāṁgato deva viśrāmastava haṁkṣyate | yasmāddhetustvamevāsya jagataḥ sthitināśayoḥ

हे देव, स्तुति करने वाले को आपके द्वारा विश्राम प्राप्त होगा (यह पंक्ति मूल पाठ में अनिश्चित है), क्योंकि इस जगत् की स्थिति और नाश दोनों के कारण आप ही हैं।

श्लोक 22 (skanda.8.20.22)

अशरण्यस्य देवेश त्वत्तश्च शरणार्थिनः । प्रसादं परमालक्ष्य वरदो भव विश्वधृक्

aśaraṇyasya deveśa tvattaśca śaraṇārthinaḥ | prasādaṁ paramālakṣya varado bhava viśvadhṛk

हे देवेश, जिसका कोई शरण नहीं और जो आपसे ही शरण चाहता है, उसकी प्रार्थना पर कृपा करके, हे विश्वधर, वरदाता बनिए।

श्लोक 23 (skanda.8.20.23)

सनत्कुमार उवाच। यः स्तोत्रमेतदमलं पठति द्विजन्मा प्रातः शुचिर्नियमवान् पुरतो द्विजानाम् । तं ब्रह्मराक्षसपिशाचसभूतयक्षा हिंसन्ति नो द्विपदपन्नग पूताः

sanatkumāra uvāca| yaḥ stotrametadamalaṁ paṭhati dvijanmā prātaḥ śucirniyamavān purato dvijānām | taṁ brahmarākṣasapiśācasabhūtayakṣā hiṁsanti no dvipadapannaga pūtāḥ

सनत्कुमार ने कहा — जो द्विज, शुद्ध और नियमवान होकर प्रातःकाल ब्राह्मणों के समक्ष इस निर्मल स्तोत्र को पढ़ता है, उसे ब्रह्मराक्षस, पिशाच, भूत और यक्ष नहीं सताते, और न ही मनुष्य, न सर्प (मूल पाठ यहाँ आंशिक रूप से खण्डित है) — वे सब पवित्र हो जाते हैं।

श्लोक 24 (skanda.8.20.24)

ततः स भगवान् देवः स्तूयमानः सहोमया । उवाच वरदोऽस्मीति ब्रूहि यत्ते मनोगतम्

tataḥ sa bhagavān devaḥ stūyamānaḥ sahomayā | uvāca varado'smīti brūhi yatte manogatam

तब वे भगवान् देव, उमा सहित स्तुति किए जाते हुए, बोले — मैं वरदाता हूँ, जो तुम्हारे मन में है, वह कहो।

श्लोक 25 (skanda.8.20.25)

तमेवंवादिनं देवं शिलादोऽभ्यर्चयत् तदा । उवाच चेदं देवेशं स वाचा सज्जमानया

tamevaṁvādinaṁ devaṁ śilādo'bhyarcayat tadā | uvāca cedaṁ deveśaṁ sa vācā sajjamānayā

इस प्रकार कहने वाले उन देव की शिलाद ने तब पूजा की, और गद्गद वाणी से देवेश से यह कहा —

श्लोक 26 (skanda.8.20.26)

भगवन् यदि तुष्टोऽसि यदि देयो वरश्च मे । इच्छाम्यात्मसमं पुत्रं मृत्युहीनमयोनिजम्

bhagavan yadi tuṣṭo'si yadi deyo varaśca me | icchāmyātmasamaṁ putraṁ mṛtyuhīnamayonijam

हे भगवन्, यदि आप प्रसन्न हैं, और यदि मुझे वर देना है, तो मैं अपने ही समान, मृत्युरहित, अयोनिज पुत्र चाहता हूँ।

श्लोक 27 (skanda.8.20.27)

एवमुक्त्वा ततो देवः प्रीयमाणस्त्रिलोचनः । एवमस्त्विति तं प्रोच्य तत्रैवान्तरधीयत

evamuktvā tato devaḥ prīyamāṇastrilocanaḥ | evamastviti taṁ procya tatraivāntaradhīyata

इस प्रकार कहे जाने पर प्रसन्न त्रिलोचन देव ने 'ऐसा ही हो' कहकर उससे कहा, और वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 28 (skanda.8.20.28)

गते तस्मिन्महेष्वासे ऋषिः परमपूजितः । स्वमाश्रममुपागम्य ऋषिभ्योऽकथयत्ततः

gate tasminmaheṣvāse ṛṣiḥ paramapūjitaḥ | svamāśramamupāgamya ṛṣibhyo'kathayattataḥ

उस महान् धनुर्धर के चले जाने पर वह अत्यन्त पूजित ऋषि अपने आश्रम में लौटकर ऋषियों को यह बात बताने लगे।

श्लोक 29 (skanda.8.20.29)

सर्वकामानलप्रख्यः कुमारः प्रत्यभाषत । स तं दृष्ट्वा तथोद्भूतं कुमारं दीप्ततेजसम्

sarvakāmānalaprakhyaḥ kumāraḥ pratyabhāṣata | sa taṁ dṛṣṭvā tathodbhūtaṁ kumāraṁ dīptatejasam

(इससे पूर्व एक पूर्ण श्लोक मूल पाठ में सर्वथा खण्डित है।) समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला, अग्नि के समान तेजस्वी वह कुमार बोल उठा। उसने इस प्रकार प्रकट हुए, दीप्तिमान तेज वाले उस कुमार को देखकर —

श्लोक 30 (skanda.8.20.30)

राक्षसोऽयमिति ज्ञात्वा भयान्नोपससार तम् । कुमारोऽपि तथोद्भूतः पितरं दीप्ततेजसम्

rākṣaso'yamiti jñātvā bhayānnopasasāra tam | kumāro'pi tathodbhūtaḥ pitaraṁ dīptatejasam

— उसे राक्षस समझकर वह भय से उसके पास नहीं गया। इस प्रकार प्रकट हुआ वह कुमार भी अपने तेजस्वी पिता के पास —

श्लोक 31 (skanda.8.20.31)

उपासर्पत दीनात्मा तात तातेति चाब्रवीत् । स तातेत्युच्यमानोऽपि यदा तन्नाभ्यनन्दत । अथ वायुस्तदाकाशे निनादं प्राह सुस्वरम्

upāsarpata dīnātmā tāta tāteti cābravīt | sa tātetyucyamāno'pi yadā tannābhyanandata | atha vāyustadākāśe ninādaṁ prāha susvaram

— व्याकुल होकर पास आया और 'पिता, पिता' कहने लगा। जब 'पिता' कहे जाने पर भी उसने उसे स्वीकार नहीं किया, तब वायु ने आकाश में मधुर स्वर से यह वचन कहा।

श्लोक 32 (skanda.8.20.32)

वायुरुवाच। सालंकायन पुत्रस्ते योऽसौ देवेन शंभुना । अयोनिजः पुरा दत्तः स एष प्रतिनन्दय

vāyuruvāca| sālaṁkāyana putraste yo'sau devena śaṁbhunā | ayonijaḥ purā dattaḥ sa eṣa pratinandaya

वायु ने कहा — हे आलंकायन-कुलोत्पन्न, यह वही तुम्हारा पुत्र है, जो देव शम्भु द्वारा पूर्वकाल में अयोनिज रूप से दिया गया था; इसका स्वागत करो।

श्लोक 33 (skanda.8.20.33)

यस्मान्नन्दिकरस्तेऽयं सदैव द्विजसत्तम । तस्मान्नन्दीति नाम्ना यं भविष्यति सुतस्तव

yasmānnandikaraste'yaṁ sadaiva dvijasattama | tasmānnandīti nāmnā yaṁ bhaviṣyati sutastava

हे द्विजसत्तम, चूँकि यह सदा ही तुम्हारे लिए आनन्द लाने वाला होगा, इसलिए तुम्हारा यह पुत्र नन्दी नाम से जाना जाएगा।

श्लोक 34 (skanda.8.20.34)

सनत्कुमार उवाच। ततः स वायुवचनान्नन्दिनं परिसष्वजे । गृहीत्वा स्वाश्रमं तेन चानयद् दृष्टिवर्धनम्

sanatkumāra uvāca| tataḥ sa vāyuvacanānnandinaṁ parisaṣvaje | gṛhītvā svāśramaṁ tena cānayad dṛṣṭivardhanam

सनत्कुमार ने कहा — तब वायु के वचन से उसने नन्दी का आलिंगन किया, और दृष्टि को आनन्दित करने वाले उस पुत्र को लेकर अपने आश्रम में ले आया।

श्लोक 35 (skanda.8.20.35)

चूडानामव्रतादीनि कर्माण्यस्य चकार सः । कृत्वा चाध्यापयामास वेदान् साङ्गानशेषतः

cūḍānāmavratādīni karmāṇyasya cakāra saḥ | kṛtvā cādhyāpayāmāsa vedān sāṅgānaśeṣataḥ

उसने उसके चूड़ाकरण आदि व्रत-कर्म सम्पन्न कराए, और फिर उसे समस्त अंगों सहित वेदों का अध्ययन कराया।

श्लोक 36 (skanda.8.20.36)

आयुर्वेदं च गान्धर्वं धर्मशास्त्रं सलक्षणम् । हस्तिनां चरितं चैव नवनिध्योश्च लम्भनम्

āyurvedaṁ ca gāndharvaṁ dharmaśāstraṁ salakṣaṇam | hastināṁ caritaṁ caiva navanidhyośca lambhanam

आयुर्वेद, गान्धर्वशास्त्र (संगीत), लक्षणों सहित धर्मशास्त्र, गजचिकित्सा तथा नवनिधियों को प्राप्त करने की विद्या भी उसे सिखाई।

श्लोक 37 (skanda.8.20.37)

शिल्पानि चैव सर्वाणि निमित्तज्ञानमेव च । भूतग्रामचिकित्सां च मातॄणां चरितं च यत्

śilpāni caiva sarvāṇi nimittajñānameva ca | bhūtagrāmacikitsāṁ ca mātṝṇāṁ caritaṁ ca yat

समस्त शिल्पविद्याएँ, शकुन-ज्ञान, भूतगण की चिकित्सा और मातृगण के आचार को भी उसने सिखाया।

श्लोक 38 (skanda.8.20.38)

भुजगानां च सर्वेषां यच्च किञ्चिद् विचेष्टितम् । यच्च शास्त्रसमूहानामष्टौ व्याकरणानि च

bhujagānāṁ ca sarveṣāṁ yacca kiñcid viceṣṭitam | yacca śāstrasamūhānāmaṣṭau vyākaraṇāni ca

समस्त सर्पों की जो कुछ भी चेष्टाएँ हैं, तथा शास्त्रों के समूह में आठों व्याकरण भी उसने सिखाए।

श्लोक 39 (skanda.8.20.39)

तथा चैव पुराणानि इतिहासमशेषतः । पंचस्थानानि यानि स्युर्ज्योतिर्गणविचारणे

tathā caiva purāṇāni itihāsamaśeṣataḥ | paṁcasthānāni yāni syurjyotirgaṇavicāraṇe

इसी प्रकार पुराणों और सम्पूर्ण इतिहास को, तथा ज्योतिष-गणना के जो पाँच स्थान हैं, उन्हें भी उसने सिखाया।

श्लोक 40 (skanda.8.20.40)

मातृभूतग्रहं तन्त्रं योगिनां मतमुत्तमम् । अब्दैरधीतवान् सर्वं व्यास षट्पंचभिस्ततः

mātṛbhūtagrahaṁ tantraṁ yogināṁ matamuttamam | abdairadhītavān sarvaṁ vyāsa ṣaṭpaṁcabhistataḥ

मातृका, भूत और ग्रहों के तन्त्र को, तथा योगियों के उत्तम मत को भी उसने सिखाया। हे व्यास, इस प्रकार उसने ग्यारह वर्षों में यह सब पढ़ लिया।

श्लोक 41 (skanda.8.20.41)

दक्षः शुचिरदीनात्मा प्रियवागनसूयकः । सर्वलोकप्रियो नित्यं नानानयननन्दनः

dakṣaḥ śuciradīnātmā priyavāganasūyakaḥ | sarvalokapriyo nityaṁ nānānayananandanaḥ

वह कुशल, पवित्र, अदीन-हृदय, मधुरभाषी और ईर्ष्यारहित था; वह सदा सबके लिए प्रिय था और अनेक नेत्रों को आनन्दित करने वाला था।

श्लोक 42 (skanda.8.20.42)

तस्याथ सप्तमे वर्षे ऋषिदेवौ तपोधनौ । आश्रमं समनुप्राप्तौ शिलादस्याहतौजसौ

tasyātha saptame varṣe ṛṣidevau tapodhanau | āśramaṁ samanuprāptau śilādasyāhataujasau

उसके सातवें वर्ष में तपोधन ऋषिदेव, अक्षत तेज वाले वे दोनों, शिलाद के आश्रम में आ पहुँचे।

श्लोक 43 (skanda.8.20.43)

तावभ्यर्च्य यथान्यायं शिलादः सुमहातपाः । सुखासीनौ समानम्य आसने परमार्चितौ

tāvabhyarcya yathānyāyaṁ śilādaḥ sumahātapāḥ | sukhāsīnau samānamya āsane paramārcitau

शिलाद ने उन दोनों को विधिपूर्वक पूजा, और सुखपूर्वक आसन पर बिठाकर उनका परम सत्कार किया।

श्लोक 44 (skanda.8.20.44)

मित्रावरुणनामानौ तपोयोगबलान्वितौ । अभिज्ञौ सर्वभूतानां त्रिलोके सचराचरे

mitrāvaruṇanāmānau tapoyogabalānvitau | abhijñau sarvabhūtānāṁ triloke sacarācare

वे मित्र और वरुण नामक थे, तप और योग के बल से सम्पन्न, तथा तीनों लोकों के चराचर समस्त प्राणियों के ज्ञाता थे।

श्लोक 45 (skanda.8.20.45)

ताभ्यां समर्थितः सोऽपि निषसाद वरासने

tābhyāṁ samarthitaḥ so'pi niṣasāda varāsane

उनके आग्रह से वह भी उत्तम आसन पर बैठ गया। (आगे इस श्लोक का दूसरा पाद मूल पाठ में खण्डित है।)

श्लोक 46 (skanda.8.20.46)

उवाच गुणवान् सम्यक् कुलवंशविवर्धनः । तमाहूय च संतुष्टः पुत्रं नन्दिनमच्युतः

uvāca guṇavān samyak kulavaṁśavivardhanaḥ | tamāhūya ca saṁtuṣṭaḥ putraṁ nandinamacyutaḥ

कुलवंश को बढ़ाने वाले उस गुणवान् ने भलीभाँति कहा; और उस अच्युत शिलाद ने प्रसन्न होकर अपने पुत्र नन्दी को बुलाया।

श्लोक 47 (skanda.8.20.47)

तयोः पादेषु शिरसा पातयत्तमनिन्दितम् । तौ तु तस्याशिषं दिव्यौ प्रयुक्तावथ नित्यताम् गुरुशुश्रूषणे भावं लोकांश्चैव तथाक्षयान्

tayoḥ pādeṣu śirasā pātayattamaninditam | tau tu tasyāśiṣaṁ divyau prayuktāvatha nityatām guruśuśrūṣaṇe bhāvaṁ lokāṁścaiva tathākṣayān

— और उस निर्दोष पुत्र को उन दोनों के चरणों में सिर झुकवाया। तब उन दोनों दिव्य पुरुषों ने उसे आशीर्वाद दिया — गुरु-सेवा में नित्य भाव और अक्षय लोकों का भी।

श्लोक 48 (skanda.8.20.48)

सनत्कुमार उवाच। शिलादस्तावथालंब्य आशिषं देवयोस्तदा । विसृज्य नन्दिनं भीतः सोऽपृच्छदृषिसत्तमौ

sanatkumāra uvāca| śilādastāvathālaṁbya āśiṣaṁ devayostadā | visṛjya nandinaṁ bhītaḥ so'pṛcchadṛṣisattamau

सनत्कुमार ने कहा — तब उन दोनों देवों का आशीर्वाद ग्रहण करके शिलाद ने नन्दी को विदा किया, और भयभीत होकर उन दोनों श्रेष्ठ ऋषियों से पूछा —

श्लोक 49 (skanda.8.20.49)

शिलाद उवाच। किमर्थं मम पुत्रस्य दीर्घमायुरुभावपि । प्रयुक्तवन्तौ धन्यस्य न आशिषं मुनिसत्तमौ

śilāda uvāca| kimarthaṁ mama putrasya dīrghamāyurubhāvapi | prayuktavantau dhanyasya na āśiṣaṁ munisattamau

शिलाद ने कहा — हे मुनिसत्तमो, तुम दोनों ने मेरे धन्य पुत्र को दीर्घायु का आशीर्वाद क्यों नहीं दिया?

श्लोक 50 (skanda.8.20.50)

मित्रावरुणावूचतुः। तवैष तनयस्तात स्वल्पायुः सर्वसंमतः । इतोन्यद्वर्षमेकं वै जीवितं धारयिष्यति

mitrāvaruṇāvūcatuḥ| tavaiṣa tanayastāta svalpāyuḥ sarvasaṁmataḥ | itonyadvarṣamekaṁ vai jīvitaṁ dhārayiṣyati

मित्र और वरुण ने कहा — हे तात, तुम्हारा यह पुत्र, यद्यपि सबका सम्मानित है, अल्पायु है। इससे आगे यह केवल एक वर्ष और जीवित रहेगा।

श्लोक 51 (skanda.8.20.51)

सनत्कुमार उवाच। ततः स शोकसंतप्तोऽपत्यव्यसनदुःखितः । विसृज्य ऋषिशार्दूलावेकाकी विललाप च

sanatkumāra uvāca| tataḥ sa śokasaṁtapto'patyavyasanaduḥkhitaḥ | visṛjya ṛṣiśārdūlāvekākī vilalāpa ca

सनत्कुमार ने कहा — तब वह पुत्र की आपत्ति से शोकसंतप्त और दुःखी होकर, उन दोनों श्रेष्ठ ऋषियों को विदा करके अकेला विलाप करने लगा।

श्लोक 52 (skanda.8.20.52)

तस्य शोकाद्विलपतः स्वरं श्रुत्वा सुतः शुभम् । नन्द्यागात्तं तथापश्यत्पितरं दुःखितं भृशम्

tasya śokādvilapataḥ svaraṁ śrutvā sutaḥ śubham | nandyāgāttaṁ tathāpaśyatpitaraṁ duḥkhitaṁ bhṛśam

उसके शोक से विलाप करते हुए स्वर को सुनकर वह शुभ पुत्र नन्दी वहाँ आया, और अपने अत्यन्त दुःखी पिता को उस दशा में देखा।

श्लोक 53 (skanda.8.20.53)

नन्द्युवाच। केन त्वं तात दुःखेन दूयमानः प्ररोदिषि । दुःखं ते कुत उत्पन्नं ज्ञातुमिच्छाम्यहं पितः

nandyuvāca| kena tvaṁ tāta duḥkhena dūyamānaḥ prarodiṣi | duḥkhaṁ te kuta utpannaṁ jñātumicchāmyahaṁ pitaḥ

नन्दी ने कहा — हे तात, किस दुःख से पीड़ित होकर आप रो रहे हैं? हे पिता, आपका यह दुःख कहाँ से उत्पन्न हुआ, मैं यह जानना चाहता हूँ।

श्लोक 54 (skanda.8.20.54)

शिलाद उवाच। पुत्र त्वं किमु वर्षेण जीवितं संप्रहास्यसि । ऊचतुस्तावृषी इत्येवं ततो मां विशत्

śilāda uvāca| putra tvaṁ kimu varṣeṇa jīvitaṁ saṁprahāsyasi | ūcatustāvṛṣī ityevaṁ tato māṁ viśat

शिलाद ने कहा — हे पुत्र, क्या तुम एक वर्ष में ही अपना जीवन त्याग दोगे? उन दोनों ऋषियों ने ऐसा ही कहा; तभी से यह (दुःख) मुझमें समा गया है (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है)।

श्लोक 55 (skanda.8.20.55)

नन्द्युवाच। सत्यं देवऋषी तात न तावनृतमूचतुः । तथापि तन्न मृत्युर्मे प्रभविष्यति मा शुचः

nandyuvāca| satyaṁ devaṛṣī tāta na tāvanṛtamūcatuḥ | tathāpi tanna mṛtyurme prabhaviṣyati mā śucaḥ

नन्दी ने कहा — हे तात, वे दोनों देव-ऋषि सत्य ही बोले हैं, उन्होंने असत्य नहीं कहा। फिर भी मुझ पर मृत्यु का प्रभाव नहीं होगा; शोक मत कीजिए।

श्लोक 56 (skanda.8.20.56)

शिलाद उवाच। किं तपः किं परिज्ञानं को योगः कः श्रमश्च ते । येन त्वं दारुणं मृत्युं वञ्चयिष्यसि पुत्रक

śilāda uvāca| kiṁ tapaḥ kiṁ parijñānaṁ ko yogaḥ kaḥ śramaśca te | yena tvaṁ dāruṇaṁ mṛtyuṁ vañcayiṣyasi putraka

शिलाद ने कहा — हे पुत्रक, ऐसा कौन-सा तप, कौन-सा ज्ञान, कौन-सा योग, कौन-सा परिश्रम तुम्हारे पास है, जिससे तुम भयंकर मृत्यु को छल सकोगे?

श्लोक 57 (skanda.8.20.57)

नन्द्युवाच। न तात तपसा मृत्युं वंचयिष्ये न विद्यया । महादेवप्रसादेन मृत्युं जेष्यामि नान्यथा

nandyuvāca| na tāta tapasā mṛtyuṁ vaṁcayiṣye na vidyayā | mahādevaprasādena mṛtyuṁ jeṣyāmi nānyathā

नन्दी ने कहा — हे तात, मैं न तो तप से और न विद्या से मृत्यु को छलूँगा। महादेव की कृपा से ही मैं मृत्यु पर विजय पाऊँगा, अन्यथा नहीं।

श्लोक 58 (skanda.8.20.58)

द्रक्ष्यामि शंकरं देवं ततो मृत्युर्न मे भवेत् । नष्टे मृत्यौ त्वया सार्धं चिरं वत्स्यामि निर्वृतः

drakṣyāmi śaṁkaraṁ devaṁ tato mṛtyurna me bhavet | naṣṭe mṛtyau tvayā sārdhaṁ ciraṁ vatsyāmi nirvṛtaḥ

मैं देव शंकर का दर्शन करूँगा, तब मुझ पर मृत्यु का प्रभाव नहीं रहेगा। मृत्यु के नष्ट हो जाने पर मैं आपके साथ चिरकाल तक शान्तिपूर्वक निवास करूँगा।

श्लोक 59 (skanda.8.20.59)

शिलाद उवाच। मया वर्षसहस्रेण तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । महादेवः पुरा दृष्टो लब्धस्त्वं मे यतः सुतः । कथं द्रष्टा महादेवमेतदिच्छामि वेदितुम्

śilāda uvāca| mayā varṣasahasreṇa tapastaptvā suduścaram | mahādevaḥ purā dṛṣṭo labdhastvaṁ me yataḥ sutaḥ | kathaṁ draṣṭā mahādevametadicchāmi veditum

शिलाद ने कहा — मैंने एक हजार वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तप करके ही पूर्वकाल में महादेव का दर्शन किया था, जिससे मुझे तुम पुत्र के रूप में प्राप्त हुए। तुम महादेव का दर्शन कैसे करोगे? यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 60 (skanda.8.20.60)

नन्द्युवाच। न चापि तपसा देवो दृश्यते नापि विद्यया । मनसा देवो दृश्यते परमेश्वरः

nandyuvāca| na cāpi tapasā devo dṛśyate nāpi vidyayā | manasā devo dṛśyate parameśvaraḥ

नन्दी ने कहा — देव न तो तप से देखे जाते हैं, न ही विद्या से (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है)। मन से ही वे परमेश्वर देखे जाते हैं।

श्लोक 61 (skanda.8.20.61)

अहमेतद्विजानामि येन द्रक्ष्यामि शंकरम् । त्वया विसृष्टो गत्वाहमचिरेण त्रिलोचनम्

ahametadvijānāmi yena drakṣyāmi śaṁkaram | tvayā visṛṣṭo gatvāhamacireṇa trilocanam

मैं इस उपाय को जानता हूँ, जिससे मैं शंकर का दर्शन करूँगा। आपके द्वारा भेजे जाकर मैं शीघ्र ही उस त्रिलोचन के पास जाऊँगा।

श्लोक 62 (skanda.8.20.62)

द्रष्टा तात न सन्देहो विसृजाशु ततस्तु माम् । अचिरेणैव कालेन मृत्युदुःखविवर्जितम्

draṣṭā tāta na sandeho visṛjāśu tatastu mām | acireṇaiva kālena mṛtyuduḥkhavivarjitam

हे तात, मैं उनका दर्शन अवश्य करूँगा, इसमें संशय नहीं; अतः मुझे शीघ्र ही विदा कीजिए। अल्प ही समय में मृत्यु के दुःख से रहित —

श्लोक 63 (skanda.8.20.63)

द्रक्ष्यसे मां कृतार्थं च तस्मान्मां त्वं विसर्जय । तिष्ठन्तं वा शयानं वा धावन्तं पतितं तथा

drakṣyase māṁ kṛtārthaṁ ca tasmānmāṁ tvaṁ visarjaya | tiṣṭhantaṁ vā śayānaṁ vā dhāvantaṁ patitaṁ tathā

— आप मुझे कृतार्थ देखेंगे; अतः मुझे विदा कीजिए। खड़े हुए को, सोए हुए को, दौड़ते हुए को, अथवा गिरे हुए को भी —

श्लोक 64 (skanda.8.20.64)

न प्रतीक्षेत मां मृत्युरिति बुद्ध्वा शमं व्रज । यदि मृत्युसहस्राणि यमकोटिशतानि च

na pratīkṣeta māṁ mṛtyuriti buddhvā śamaṁ vraja | yadi mṛtyusahasrāṇi yamakoṭiśatāni ca

— मृत्यु कभी मेरी प्रतीक्षा नहीं करेगी, ऐसा जानकर आप शान्ति को प्राप्त हों। चाहे सहस्रों मृत्युएँ और करोड़ों-अरबों यम भी —

श्लोक 65 (skanda.8.20.65)

अभिद्रवन्ति संतप्ता दण्डपाशोद्यतायुधाः । व्यथां तथापि ते कर्तुं न समर्थाः कदाचन

abhidravanti saṁtaptā daṇḍapāśodyatāyudhāḥ | vyathāṁ tathāpi te kartuṁ na samarthāḥ kadācana

— क्रोधित होकर दण्ड और पाश जैसे शस्त्र उठाए मुझ पर आक्रमण करें, फिर भी वे कभी मुझे व्यथित करने में समर्थ नहीं होंगे।

श्लोक 66 (skanda.8.20.66)

न ममैते करिष्यन्ति व्यथां लोम्ना तथैव हि । अवतीर्य जलं दिव्यं भावं शुद्धं समाश्रितः

na mamaite kariṣyanti vyathāṁ lomnā tathaiva hi | avatīrya jalaṁ divyaṁ bhāvaṁ śuddhaṁ samāśritaḥ

वे मेरे एक रोम को भी व्यथित नहीं कर सकेंगे; क्योंकि दिव्य जल में उतरकर, शुद्ध भाव का आश्रय लेकर —

श्लोक 67 (skanda.8.20.67)

अभ्यस्य रौद्रमध्यायं ततो द्रक्ष्यामि शङ्करम् । जपतश्चाभियुक्तस्य रुद्रभावयुतस्य च न मृत्युकालबहवः करिष्यन्ति मम व्यथाम्

abhyasya raudramadhyāyaṁ tato drakṣyāmi śaṅkaram | japataścābhiyuktasya rudrabhāvayutasya ca na mṛtyukālabahavaḥ kariṣyanti mama vyathām

— और रौद्र अध्याय का अभ्यास करके मैं शंकर का दर्शन करूँगा। जो जप में तत्पर होकर रुद्र-भाव से युक्त हो, उसे मृत्यु के अनेक रूप और काल भी व्यथित नहीं कर सकते।

श्लोक 68 (skanda.8.20.68)

सनत्कुमार उवाच। तमेवं वादिनं मत्वा ब्रुवाणं शुद्धया धिया । व्यसर्जयन्नदीनात्मा धृत्या पुत्रं महातपाः

sanatkumāra uvāca| tamevaṁ vādinaṁ matvā bruvāṇaṁ śuddhayā dhiyā | vyasarjayannadīnātmā dhṛtyā putraṁ mahātapāḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार शुद्ध बुद्धि से बोलते हुए उसे जानकर, उस महातपस्वी ने अदीन-हृदय होकर धैर्यपूर्वक अपने पुत्र को विदा किया।

श्लोक 69 (skanda.8.20.69)

अभिवन्द्य पितुः पादौ शिरसा स महायशाः । प्रदक्षिणं समावृत्य संप्रतस्थे विनिश्चितः

abhivandya pituḥ pādau śirasā sa mahāyaśāḥ | pradakṣiṇaṁ samāvṛtya saṁpratasthe viniścitaḥ

उस महायशस्वी ने पिता के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया, और उनकी प्रदक्षिणा करके दृढ़ निश्चय से प्रस्थान किया।

श्लोक 70 (skanda.8.20.70)

अभिवन्द्य ऋषीन् सर्वान् स दिदृक्षुरुदारधीः । मुनिर्देवमनाश्चैव प्रणतार्तिहरं शिवम्

abhivandya ṛṣīn sarvān sa didṛkṣurudāradhīḥ | munirdevamanāścaiva praṇatārtiharaṁ śivam

उदार बुद्धि वाला वह मुनि, समस्त ऋषियों को प्रणाम करके, दर्शन की इच्छा से, प्रणतजनों के दुःख को हरने वाले शिव में मन लगाए हुए —

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