अम्बिका खण्ड · अध्याय 19
वैर-निवर्तन
श्लोक 1 (skanda.8.19.1)
सनत्कुमार उवाच। एवं तव पिता व्यास रक्षःसत्रं समाहरत् । समापयित्वा च पुनस्तपस्तपति सत्वरम्
sanatkumāra uvāca| evaṁ tava pitā vyāsa rakṣaḥsatraṁ samāharat | samāpayitvā ca punastapastapati satvaram
सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, इस प्रकार तुम्हारे पिता ने राक्षससत्र सम्पन्न किया, और उसे पूर्ण करके पुनः तत्परता से तप करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.8.19.2)
तमागत्य वसिष्ठस्तु तपसा भास्करद्युतिम् । उवाच प्रीतिसंपन्नमिदमर्थवदव्ययः
tamāgatya vasiṣṭhastu tapasā bhāskaradyutim | uvāca prītisaṁpannamidamarthavadavyayaḥ
तब अविनाशी वसिष्ठ उनके पास आए, जो तप से सूर्य के समान तेजस्वी हो गए थे, और स्नेहपूर्वक उनसे यह अर्थपूर्ण वचन कहा।
श्लोक 3 (skanda.8.19.3)
वसिष्ठ उवाच। पितरः पुत्रकामा वै तपस्तप्त्वातिदुश्चरम् । पुत्रमुत्पादयंति स्म तपोज्ञानसमन्वितम्
vasiṣṭha uvāca| pitaraḥ putrakāmā vai tapastaptvātiduścaram | putramutpādayaṁti sma tapojñānasamanvitam
वसिष्ठ ने कहा — पुत्र की कामना करने वाले पितर अत्यन्त दुष्कर तप करके ही तप और ज्ञान से सम्पन्न पुत्र उत्पन्न करते हैं।
श्लोक 4 (skanda.8.19.4)
यत्नतः संततिश्चैव ज्ञानवाँस्तपसान्वितः । करिष्यति गतिं दैवीमिति वेदविदो विदुः
yatnataḥ saṁtatiścaiva jñānavā~stapasānvitaḥ | kariṣyati gatiṁ daivīmiti vedavido viduḥ
प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न की गई सन्तान, यदि वह ज्ञानवान और तपसम्पन्न हो, तो पितरों को दिव्य गति प्रदान करती है — ऐसा वेद के ज्ञाता जानते हैं।
श्लोक 5 (skanda.8.19.5)
सद्यस्तपोन्वितश्चैव ज्ञानवान् यशसान्वितः । पुत्रः पुत्रवतां श्रेष्ठो विहीनः प्रजया विभो
sadyastaponvitaścaiva jñānavān yaśasānvitaḥ | putraḥ putravatāṁ śreṣṭho vihīnaḥ prajayā vibho
जो पुत्र तप, ज्ञान और यश से युक्त हो, वह पुत्रवानों में श्रेष्ठ माना जाता है। हे विभो, तुम अभी सन्तान से रहित हो।
श्लोक 6 (skanda.8.19.6)
तस्मात् पितॄणामानृण्यं गच्छ व्रतवतां वर । सुतमुत्पादय क्षिप्रं सममेव च भावन
tasmāt pitṝṇāmānṛṇyaṁ gaccha vratavatāṁ vara | sutamutpādaya kṣipraṁ samameva ca bhāvana
अतः हे व्रतियों में श्रेष्ठ, जाओ और पितरों के ऋण से मुक्त हो जाओ। हे विचारशील, शीघ्र ही एक पुत्र उत्पन्न करो।
श्लोक 7 (skanda.8.19.7)
सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तस्तेजस्वी वसिष्ठेन महात्मना । मैनाकं पर्वतं प्राप्य तपस्तेपे सुदुस्तरम्
sanatkumāra uvāca| sa evamuktastejasvī vasiṣṭhena mahātmanā | mainākaṁ parvataṁ prāpya tapastepe sudustaram
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार महात्मा वसिष्ठ द्वारा कहे जाने पर वह तेजस्वी मैनाक पर्वत पर जाकर अत्यन्त दुष्कर तप करने लगा।
श्लोक 8 (skanda.8.19.8)
तस्य कालेन महता तपसा तारितस्य तु । उमापतिर्वरं प्रादात् स च वव्रे वरं सुतम्
tasya kālena mahatā tapasā tāritasya tu | umāpatirvaraṁ prādāt sa ca vavre varaṁ sutam
दीर्घकाल तक तप से पार होने पर उमापति ने उसे वर दिया, और उसने पुत्र का वर माँगा।
श्लोक 9 (skanda.8.19.9)
स लब्ध्वा वरमागत्यान्वेषयत् पुत्रकारणात् । क्षेत्रं सुपरिशुद्धं च स्वपुत्रो यत्र सम्भवेत्
sa labdhvā varamāgatyānveṣayat putrakāraṇāt | kṣetraṁ supariśuddhaṁ ca svaputro yatra sambhavet
वह वर पाकर लौट आया और पुत्र-प्राप्ति के लिए ऐसे परिशुद्ध क्षेत्र की खोज करने लगा, जहाँ उसका पुत्र उत्पन्न हो सके।
श्लोक 10 (skanda.8.19.10)
स भ्रमन् दाशराजस्य दुहितृत्वमुपागताम् । पितृकन्यां ततः कालीमपश्यद्दिव्यरूपिणीम्
sa bhraman dāśarājasya duhitṛtvamupāgatām | pitṛkanyāṁ tataḥ kālīmapaśyaddivyarūpiṇīm
भ्रमण करते हुए उसने दाशराज (मल्लाहों के राजा) की पुत्री बनी हुई, दिव्यरूपिणी काली को देखा, जो अपने वास्तविक पिता की कन्या थी।
श्लोक 11 (skanda.8.19.11)
मत्स्यगर्भसमुत्पन्नां मत्स्यबीजोद्भवां पुरा । अद्रिकामप्सरःश्रेष्ठां ब्रह्मतेजोमयीं शुभाम्
matsyagarbhasamutpannāṁ matsyabījodbhavāṁ purā | adrikāmapsaraḥśreṣṭhāṁ brahmatejomayīṁ śubhām
वह पूर्वकाल में मत्स्य के गर्भ से उत्पन्न, मत्स्य के बीज से जन्मी थी — वस्तुतः अद्रिका नामक श्रेष्ठ अप्सरा, जो ब्रह्मतेज से युक्त और शुभ थी।
श्लोक 12 (skanda.8.19.12)
तस्यां स जनयामास वरं दत्त्वा महातपाः । भवन्तं तपसां योनिं श्रौतस्मार्तप्रवर्तकम्
tasyāṁ sa janayāmāsa varaṁ dattvā mahātapāḥ | bhavantaṁ tapasāṁ yoniṁ śrautasmārtapravartakam
उस महातपस्वी ने उसे वर देकर उसमें आपको उत्पन्न किया — आप जो तपस्याओं के आदि स्रोत और श्रुति-स्मृति के प्रवर्तक हैं।
श्लोक 13 (skanda.8.19.13)
तव पुत्रोऽभवच्चापि शुको वेदविदां वरः । तस्य पुत्राश्च चत्वारः कन्या चैका सुमध्यमा
tava putro'bhavaccāpi śuko vedavidāṁ varaḥ | tasya putrāśca catvāraḥ kanyā caikā sumadhyamā
आपका पुत्र शुक हुआ, जो वेद के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ था। उसके चार पुत्र और एक सुन्दर पतली कमर वाली कन्या हुई।
श्लोक 14 (skanda.8.19.14)
व्यास उवाच। तादृग् वैरं परं ब्रह्मन् विश्वामित्रवसिष्ठयोः । कथं चापि गतं भूय एतदिच्छामि वेदितुम्
vyāsa uvāca| tādṛg vairaṁ paraṁ brahman viśvāmitravasiṣṭhayoḥ | kathaṁ cāpi gataṁ bhūya etadicchāmi veditum
व्यास ने कहा — हे ब्रह्मन्, विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच वह इतना बड़ा वैर आखिर किस प्रकार उत्पन्न हुआ था? मैं यह जानना चाहता हूँ।
श्लोक 15 (skanda.8.19.15)
सनत्कुमार उवाच। पराशरे तु गर्भस्थे रिपुत्वं गाधिजे गते । सरस्वत्यां कुरुक्षेत्रे वसतोः स्वाश्रमे तयोः
sanatkumāra uvāca| parāśare tu garbhasthe riputvaṁ gādhije gate | sarasvatyāṁ kurukṣetre vasatoḥ svāśrame tayoḥ
सनत्कुमार ने कहा — जब पराशर गर्भ में ही थे, तभी गाधिपुत्र के प्रति शत्रुता उत्पन्न हो गई थी, जब वे दोनों कुरुक्षेत्र में सरस्वती के तट पर अपने-अपने आश्रम में रहते थे।
श्लोक 16 (skanda.8.19.16)
तत्र वैरमनुस्मृत्य विश्वामित्रेण धीमता । नियतस्य वसिष्ठस्य हतं पुत्रशतं रुषा
tatra vairamanusmṛtya viśvāmitreṇa dhīmatā | niyatasya vasiṣṭhasya hataṁ putraśataṁ ruṣā
वहाँ उस पूर्ववैर का स्मरण करके बुद्धिमान विश्वामित्र ने क्रोधवश संयमी वसिष्ठ के सौ पुत्रों का वध कर दिया।
श्लोक 17 (skanda.8.19.17)
मुनिरप्याह तत्रासौ विश्वामित्रः प्रतापवान्
munirapyāha tatrāsau viśvāmitraḥ pratāpavān
वहाँ उस प्रतापी मुनि विश्वामित्र ने भी यह कहा —
श्लोक 18 (skanda.8.19.18)
सरस्वतीमथैकान्ते वसिष्ठम् । स्रोतसा महता क्षिप्रं स्नायमानमिहानय
sarasvatīmathaikānte vasiṣṭham | srotasā mahatā kṣipraṁ snāyamānamihānaya
— सरस्वती से एकान्त में कहा (मध्य में मूल पाठ का कुछ अंश खण्डित है) — स्नान करते हुए वसिष्ठ को अपने महान प्रवाह से शीघ्र यहाँ ले आओ।
श्लोक 19 (skanda.8.19.19)
सैवमुक्ता तु तं गत्वा वसिष्ठं प्राह दुःखिता । यदुक्तवाँस्तु गाधेयः स चोवाच महानदीम्
saivamuktā tu taṁ gatvā vasiṣṭhaṁ prāha duḥkhitā | yaduktavā~stu gādheyaḥ sa covāca mahānadīm
इस प्रकार आज्ञप्त होकर वह दुःखी नदी वसिष्ठ के पास जाकर गाधिपुत्र द्वारा कहे गए वचन को सुनाने लगी; तब वसिष्ठ ने उस महानदी से कहा —
श्लोक 20 (skanda.8.19.20)
एवं कुरु महाभागे मां नयस्व यथेप्सितम् । मा ते क्रूरः स गाधेयः शापं दद्यात् सुदुस्तरम्
evaṁ kuru mahābhāge māṁ nayasva yathepsitam | mā te krūraḥ sa gādheyaḥ śāpaṁ dadyāt sudustaram
हे महाभागे, वैसा ही करो, मुझे उसकी इच्छानुसार ले चलो, जिससे वह क्रूर गाधिपुत्र तुम्हें दुर्निवार शाप न दे दे।
श्लोक 21 (skanda.8.19.21)
सनत्कुमार उवाच। गाधेयस्य ततः सा तु जुह्वतोऽथ दिवाकरे । मध्यं प्राप्तेनयच्चैव वसिष्ठं स्रोतसा शुभा
sanatkumāra uvāca| gādheyasya tataḥ sā tu juhvato'tha divākare | madhyaṁ prāptenayaccaiva vasiṣṭhaṁ srotasā śubhā
सनत्कुमार ने कहा — तब जब गाधिपुत्र सूर्य को आहुति दे रहे थे, तब उस शुभ नदी ने अपने प्रवाह से वसिष्ठ को बहाकर उनके बीच में पहुँचा दिया।
श्लोक 22 (skanda.8.19.22)
स तं दृष्ट्वा हृतं व्यास स्रोतसा मुनिसत्तमम् । उवाच छद्मना सोऽस्मद्वेगेनापहृतस्त्वया
sa taṁ dṛṣṭvā hṛtaṁ vyāsa srotasā munisattamam | uvāca chadmanā so'smadvegenāpahṛtastvayā
हे व्यास, उस सर्वश्रेष्ठ मुनि को प्रवाह से बहता हुआ देखकर उसने कहा — तुमने कपटपूर्वक मेरे ही वेग से इसे बहा दिया है।
श्लोक 23 (skanda.8.19.23)
तस्मात्त्वं कर्मणानेन सातृक्तोया भविष्यसि । विश्वामित्रेण सा शप्ता नदी लोकसुखप्रदा
tasmāttvaṁ karmaṇānena sātṛktoyā bhaviṣyasi | viśvāmitreṇa sā śaptā nadī lokasukhapradā
अतः इस कृत्य के कारण तुम रक्तमिश्रित जल वाली हो जाओगी। इस प्रकार लोकसुखप्रदा उस नदी को विश्वामित्र ने शाप दिया।
श्लोक 24 (skanda.8.19.24)
अवहद्रुधिरं घोरं मासं मेदस्तथैव च । ततो विश्वामित्रस्तु गत्वा देवानामधिपं तदा
avahadrudhiraṁ ghoraṁ māsaṁ medastathaiva ca | tato viśvāmitrastu gatvā devānāmadhipaṁ tadā
वह भयंकर रक्त, मांस और मेद को बहाने लगी। तब विश्वामित्र देवताओं के अधिपति इन्द्र के पास गए।
श्लोक 25 (skanda.8.19.25)
उवाच वज्रं मे देहि शरीरं चैव कौशिकः । दुर्वृत्तं हि हनिष्यामि वसिष्ठं ब्राह्मणाधमम्
uvāca vajraṁ me dehi śarīraṁ caiva kauśikaḥ | durvṛttaṁ hi haniṣyāmi vasiṣṭhaṁ brāhmaṇādhamam
कौशिक ने कहा — मुझे अपना वज्र और अपना शरीर (शक्ति) दो; मैं उस दुराचारी, नीच ब्राह्मण वसिष्ठ का वध कर दूँगा।
श्लोक 26 (skanda.8.19.26)
पुत्राः शक्र मया तस्य निहताः पापचेतसः । तान् हत्वापि न मे शान्तिर्भवित्री चैव देवप
putrāḥ śakra mayā tasya nihatāḥ pāpacetasaḥ | tān hatvāpi na me śāntirbhavitrī caiva devapa
हे शक्र, उसके पुत्रों को मैंने पापचित्त होकर मार डाला है, फिर भी उन्हें मारकर भी मुझे शान्ति नहीं मिली है, हे देवपति।
श्लोक 27 (skanda.8.19.27)
शक्र उवाच। ब्रह्मज्ञानौ वसिष्ठश्च तव चात्मनि सत्तम । निर्वेशे सोममेतेषां नो मुक्तं भव वेदितुम्
śakra uvāca| brahmajñānau vasiṣṭhaśca tava cātmani sattama | nirveśe somameteṣāṁ no muktaṁ bhava veditum
शक्र ने कहा — हे सत्तम, वसिष्ठ और तुम दोनों ही आत्मस्वरूप में ब्रह्मज्ञानी हो। इनके प्रतिशोध के विषय में मुझे मुक्त समझो — इतना ही जान लो। (यह श्लोक मूल पाठ में अशुद्ध/अनिश्चित है।)
श्लोक 28 (skanda.8.19.28)
ततः समभिक्रुद्धोऽसौ गाधेयः शक्रमोजसा । योगात् प्रच्यावयामास शरीरात् कालनन्दन
tataḥ samabhikruddho'sau gādheyaḥ śakramojasā | yogāt pracyāvayāmāsa śarīrāt kālanandana
हे कालीनन्दन, तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस गाधिपुत्र ने अपने योगबल से शक्र को उसके शरीर से बाहर निकाल दिया।
श्लोक 29 (skanda.8.19.29)
स तच्छरीरमाविश्य वृत्रशत्रोः प्रतापवान् । वज्रोद्यतकरो भूत्वा छिद्रान्वेष्यवतिष्ठत
sa taccharīramāviśya vṛtraśatroḥ pratāpavān | vajrodyatakaro bhūtvā chidrānveṣyavatiṣṭhata
वह प्रतापी विश्वामित्र वृत्रशत्रु (इन्द्र) के उस शरीर में प्रविष्ट होकर, हाथ में वज्र उठाए, छिद्र (अवसर) की खोज में खड़ा रहा।
श्लोक 30 (skanda.8.19.30)
ज्वलंतं स तमग्निं तु वज्रेण शतपर्वणा । चिच्छेद सप्तधा कृत्वा मुनीनामेव पश्यताम्
jvalaṁtaṁ sa tamagniṁ tu vajreṇa śataparvaṇā | ciccheda saptadhā kṛtvā munīnāmeva paśyatām
उसने उस प्रज्वलित अग्नि को शतपर्व वज्र से, मुनियों के देखते-देखते ही, सात भागों में काट डाला।
श्लोक 31 (skanda.8.19.31)
खण्डान्यथ समानीय क्षिप्रमेव मुनिः स्वयम् । संधाय स्वशरीरं वै सक्रोधो वाक्यमब्रवीत्
khaṇḍānyatha samānīya kṣiprameva muniḥ svayam | saṁdhāya svaśarīraṁ vai sakrodho vākyamabravīt
फिर उस मुनि ने स्वयं शीघ्र ही उन खण्डों को एकत्र करके अपने शरीर में जोड़ लिया, और क्रोधपूर्वक यह वचन कहा —
श्लोक 32 (skanda.8.19.32)
तिष्ठ कौशिक मेदानीं मया दृष्टो गमिष्यसि
tiṣṭha kauśika medānīṁ mayā dṛṣṭo gamiṣyasi
'हे कौशिक, ठहरो! अब मेरे द्वारा देखे जाने पर तुम...' (आगे का भाग मूल पाठ में सर्वथा खण्डित है।)
श्लोक 33 (skanda.8.19.33)
दिवाकराद् वै कबन्धाः पेतुः शतसहस्रशः
divākarād vai kabandhāḥ petuḥ śatasahasraśaḥ
सूर्यमण्डल से लाखों की संख्या में मुण्डहीन धड़ (कबन्ध) गिरने लगे।
श्लोक 34 (skanda.8.19.34)
अशून्यं रुधिरं चैव गगनाच्च पपात ह । ववुश्चात्यशुभा वाता विमानान्यपतन् दिवः
aśūnyaṁ rudhiraṁ caiva gaganācca papāta ha | vavuścātyaśubhā vātā vimānānyapatan divaḥ
आकाश से निरन्तर रक्त की वर्षा होने लगी, अत्यन्त अशुभ वायु बहने लगी, और स्वर्ग से विमान गिरने लगे।
श्लोक 35 (skanda.8.19.35)
नेयुर्वेदाश्च विप्राणां नागाश्चाकाशगास्तथा । एवमादीँस्तदोत्पातान् विविधाँल्लोकनाशनान्
neyurvedāśca viprāṇāṁ nāgāścākāśagāstathā | evamādī~stadotpātān vividhā~llokanāśanān
ब्राह्मणों से वेद अन्तर्धान हो गए, और आकाशचारी नाग भी लुप्त हो गए। इस प्रकार के अनेक लोकविनाशकारी उत्पात उस समय हुए।
श्लोक 36 (skanda.8.19.36)
दृष्ट्वा देवाः समुनयस्तमाहुर्गाधिनन्दनम् । वसिष्ठश्च महातेजास्त्वं च गाधेय धार्मिक
dṛṣṭvā devāḥ samunayastamāhurgādhinandanam | vasiṣṭhaśca mahātejāstvaṁ ca gādheya dhārmika
इन्हें देखकर देवताओं और मुनियों ने गाधिनन्दन से कहा — महातेजस्वी वसिष्ठ और हे धार्मिक गाधिपुत्र, तुम दोनों —
श्लोक 37 (skanda.8.19.37)
अमरौ जरया त्यक्तौ तपोयोगबलान्वितौ । युवयोर्हि क्षयं नास्ति क्षयं च न करिष्यथः
amarau jarayā tyaktau tapoyogabalānvitau | yuvayorhi kṣayaṁ nāsti kṣayaṁ ca na kariṣyathaḥ
— अमर हो, वृद्धावस्था से रहित हो, तप और योग के बल से सम्पन्न हो। तुम दोनों का न तो क्षय है, और न ही तुम किसी और का विनाश कर पाओगे।
श्लोक 38 (skanda.8.19.38)
देवानां सर्वलोकानां युध्यमानौ परस्परम् । मत्तयोर्गजयोर्यद्वदरण्ये युध्यमानयोः
devānāṁ sarvalokānāṁ yudhyamānau parasparam | mattayorgajayoryadvadaraṇye yudhyamānayoḥ
देवताओं और समस्त लोकों के लिए तुम दोनों का परस्पर युद्ध वैसा ही है, जैसे वन में दो मतवाले हाथियों का आपस में युद्ध होता है —
श्लोक 39 (skanda.8.19.39)
वीरुधां भूरुहां चैव संमर्देन क्षयो महान् । तथा वैरेण युवयोः प्रवृत्तेन महात्मनोः
vīrudhāṁ bhūruhāṁ caiva saṁmardena kṣayo mahān | tathā vaireṇa yuvayoḥ pravṛttena mahātmanoḥ
— जैसे उनके परस्पर टकराने से लताओं और वृक्षों का बड़ा विनाश हो जाता है, वैसे ही तुम दोनों महात्माओं के बीच चल रहे इस वैर से भी —
श्लोक 40 (skanda.8.19.40)
लोकानामनयो व्यक्तं भविष्यति न संशयः । तस्माद्विनाशं लोकानामृषिभिः सह
lokānāmanayo vyaktaṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ | tasmādvināśaṁ lokānāmṛṣibhiḥ saha
— लोकों का स्पष्ट अनर्थ होगा, इसमें संशय नहीं। अतः ऋषियों सहित लोकों के विनाश को (मूल में यहाँ पाठ आंशिक रूप से खण्डित है) —
श्लोक 41 (skanda.8.19.41)
युवयोरस्तु सख्यं च क्षयो वैरस्य चाथ वै । स एवमुक्तो गाधेयो मुनिभिर्दैवतैः सह
yuvayorastu sakhyaṁ ca kṣayo vairasya cātha vai | sa evamukto gādheyo munibhirdaivataiḥ saha
— तुम दोनों में मित्रता हो, और इस वैर का अन्त हो। मुनियों और देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर गाधिपुत्र —
श्लोक 42 (skanda.8.19.42)
एवमस्त्विति तान्प्राह विस्मितस्तेजसा तदा । ततो वसिष्ठमप्येवमूचुः सर्वे दिवौकसः
evamastviti tānprāha vismitastejasā tadā | tato vasiṣṭhamapyevamūcuḥ sarve divaukasaḥ
— उस तेज से विस्मित होकर उनसे 'ऐसा ही हो' कहा। तब सभी देवताओं ने वसिष्ठ से भी इसी प्रकार कहा।
श्लोक 43 (skanda.8.19.43)
असावपि तथैवेति तेन सख्यं चकार ह । ततःप्रभृति सर्वं वै जगत् स्थावरजङ्गमम् ससुखं प्रीतिसंयुक्तं मुमुदे विगतज्वरम्
asāvapi tathaiveti tena sakhyaṁ cakāra ha | tataḥprabhṛti sarvaṁ vai jagat sthāvarajaṅgamam sasukhaṁ prītisaṁyuktaṁ mumude vigatajvaram
उन्होंने भी 'वैसा ही हो' कहकर उनसे मित्रता कर ली। उस समय से समस्त चराचर जगत् सुखी, प्रेमयुक्त और संतापरहित होकर आनन्दित हुआ। (इसके आगे मूल पाठ में और भी कुछ श्लोक सर्वथा खण्डित हैं।)
श्लोक 44 (skanda.8.19.44)
सनत्कुमार उवाच। अथ तीर्थप्रसंगेन मुनिभिः समुपागतैः । अनुग्रहः कृतस्तस्या येन स्वच्छजलाभवत्
sanatkumāra uvāca| atha tīrthaprasaṁgena munibhiḥ samupāgataiḥ | anugrahaḥ kṛtastasyā yena svacchajalābhavat
सनत्कुमार ने कहा — फिर तीर्थयात्रा के प्रसंग में वहाँ आए हुए मुनियों ने उस नदी पर अनुग्रह किया, जिससे वह पुनः स्वच्छ जल वाली हो गई।
श्लोक 45 (skanda.8.19.45)
महतस्तपसः शक्ताः कालेन महता तदा । वसिष्ठस्य तु तां क्षान्तिं ज्ञात्वा स ऋषिपुङ्गवः
mahatastapasaḥ śaktāḥ kālena mahatā tadā | vasiṣṭhasya tu tāṁ kṣāntiṁ jñātvā sa ṛṣipuṅgavaḥ
दीर्घकाल तक महान तप में समर्थ रहकर, वसिष्ठ की उस क्षमाशीलता को जानकर, वह श्रेष्ठ ऋषि —
श्लोक 46 (skanda.8.19.46)
विश्वामित्रो महातेजा वसिष्ठे वैरमत्यजत् । एवं तौ वैरमन्योन्यं जहतुर्मुनिसत्तमौ
viśvāmitro mahātejā vasiṣṭhe vairamatyajat | evaṁ tau vairamanyonyaṁ jahaturmunisattamau
— वह महातेजस्वी विश्वामित्र वसिष्ठ के प्रति वैर त्याग बैठा। इस प्रकार उन दोनों श्रेष्ठ मुनियों ने परस्पर वैर का त्याग किया।
श्लोक 47 (skanda.8.19.47)
सनत्कुमार उवाच। य इदं शृणुयाद्विप्रो ब्राह्मणाञ्छ्रावयीत वा । सुदुस्तराणि दुर्गाणि तरत्यश्रान्तपौरुषः
sanatkumāra uvāca| ya idaṁ śṛṇuyādvipro brāhmaṇāñchrāvayīta vā | sudustarāṇi durgāṇi taratyaśrāntapauruṣaḥ
सनत्कुमार ने कहा — जो ब्राह्मण इस कथा को सुनता है, अथवा ब्राह्मणों को सुनाता है, वह बिना थके अपने पुरुषार्थ से अत्यन्त दुर्गम संकटों को भी पार कर जाता है।
श्लोक 48 (skanda.8.19.48)
त्रिपौरुषौदार्यविहारसत्वैः समुन्नतश्चोज्ज्वलचारुवेषः । भवेच्च सर्वामरराजतुल्यस्त्रिविष्टपे क्रीडति चेच्छया स्वयम्
tripauruṣaudāryavihārasatvaiḥ samunnataścojjvalacāruveṣaḥ | bhavecca sarvāmararājatulyastriviṣṭape krīḍati cecchayā svayam
वह तीन पीढ़ियों की उदारता, विहार और सत्त्व से सम्पन्न, उन्नत और उज्ज्वल सुन्दर वेष वाला होता है, तथा समस्त देवराज के समान होकर स्वेच्छा से स्वर्ग में विचरण करता है।
श्लोक 49 (skanda.8.19.49)
एवं तदभवद् व्यास विश्वामित्रवसिष्ठयोः । वैरं समाप्तं लोकानां हितार्थं पुनरेव च
evaṁ tadabhavad vyāsa viśvāmitravasiṣṭhayoḥ | vairaṁ samāptaṁ lokānāṁ hitārthaṁ punareva ca
हे व्यास, इस प्रकार विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच का वह वैर लोकों के हित के लिए ही पुनः समाप्त हो गया।