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अम्बिका खण्ड · अध्याय 18

राक्षससत्र

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (skanda.8.18.1)

सनत्कुमार उवाच। ततः स राजा स्वं राज्यमुत्सृज्य सह भार्यया । वनं विवेश तत्राभूत् पुरुषादो महाबलः

sanatkumāra uvāca| tataḥ sa rājā svaṁ rājyamutsṛjya saha bhāryayā | vanaṁ viveśa tatrābhūt puruṣādo mahābalaḥ

सनत्कुमार ने कहा — तब वह राजा अपने राज्य को त्यागकर पत्नी सहित वन में प्रविष्ट हुआ। वहाँ वह महाबली नरभक्षी बन गया।

श्लोक 2 (skanda.8.18.2)

सोऽभक्षयत तत्राग्रे शक्तिमेव महामुनिम् । ततो भ्रातृशतं तस्य वसिष्ठस्यैव पश्यतः

so'bhakṣayata tatrāgre śaktimeva mahāmunim | tato bhrātṛśataṁ tasya vasiṣṭhasyaiva paśyataḥ

वहाँ उसने सबसे पहले महामुनि शक्ति को ही खा लिया, और फिर वसिष्ठ के देखते-देखते ही उसके सौ भाइयों को भी।

श्लोक 3 (skanda.8.18.3)

ततः पुत्रवधं घोरं दृष्ट्वा ब्रह्मसुतः प्रभुः । नोत्ससर्ज ततः क्रोधं वसिष्ठः कौशिकं प्रति

tataḥ putravadhaṁ ghoraṁ dṛṣṭvā brahmasutaḥ prabhuḥ | notsasarja tataḥ krodhaṁ vasiṣṭhaḥ kauśikaṁ prati

तब पुत्रों के उस भयंकर वध को देखकर भी उन ब्रह्मपुत्र प्रभु वसिष्ठ ने कौशिक (विश्वामित्र) के प्रति क्रोध नहीं किया।

श्लोक 4 (skanda.8.18.4)

पुत्रशोकेन महता भृशमेवान्वतप्यत । स बद्ध्वा महतीं कण्ठे शिलां ब्रह्मसुतः प्रभुः

putraśokena mahatā bhṛśamevānvatapyata | sa baddhvā mahatīṁ kaṇṭhe śilāṁ brahmasutaḥ prabhuḥ

वह अत्यन्त पुत्रशोक से गहरे संतप्त हुए। उन ब्रह्मपुत्र प्रभु ने अपने कण्ठ में एक बड़ी शिला बाँधकर —

श्लोक 5 (skanda.8.18.5)

नद्यामात्मानमसृजच्छतरात्रं वसंस्तया । इति तां प्राहुर्मुनयः शंसितव्रताः

nadyāmātmānamasṛjacchatarātraṁ vasaṁstayā | iti tāṁ prāhurmunayaḥ śaṁsitavratāḥ

— स्वयं को नदी में डाल दिया, उसके साथ सौ रात्रियाँ रहते हुए। इसी कारण उसे व्रतसम्पन्न मुनियों ने ऐसा नाम दिया। (मूल में इसके बीच का कुछ अंश खण्डित होने से लुप्त है।)

श्लोक 6 (skanda.8.18.6)

पुनः पाशैर्दृढं बद्ध्वा अन्यस्यामसृजद्वशी । तस्यां विपाशः संवृत्तो विपाशा साभवत्ततः

punaḥ pāśairdṛḍhaṁ baddhvā anyasyāmasṛjadvaśī | tasyāṁ vipāśaḥ saṁvṛtto vipāśā sābhavattataḥ

पुनः रस्सियों से दृढ़तापूर्वक बँधकर उस संयमी ने स्वयं को दूसरी नदी में डाल दिया। उसमें वे बन्धनों से मुक्त (विपाश) हो गए, और तभी से वह नदी विपाशा कहलाई।

श्लोक 7 (skanda.8.18.7)

ततो वापीं समागम्य निराहारो जितेन्द्रियः । वायुभक्षस्तदा तस्थौ स्वदेहं परितापयन्

tato vāpīṁ samāgamya nirāhāro jitendriyaḥ | vāyubhakṣastadā tasthau svadehaṁ paritāpayan

फिर वे एक जलाशय पर पहुँचकर, निराहार और जितेन्द्रिय होकर, केवल वायु का भक्षण करते हुए अपनी देह को तपाते हुए वहाँ ठहर गए।

श्लोक 8 (skanda.8.18.8)

अथ शुश्राव गच्छन्तं ध्वनिमेकस्य सुस्वरम् । अधीयानस्य तत्रासौ ध्यानमेवान्वपद्यत

atha śuśrāva gacchantaṁ dhvanimekasya susvaram | adhīyānasya tatrāsau dhyānamevānvapadyata

तब जाते हुए उन्होंने किसी के वेद पढ़ने का मधुर स्वर सुना, और उस स्वर में वे ध्यानमग्न हो गए।

श्लोक 9 (skanda.8.18.9)

अथैनं चारुसर्वाङ्गी पीनोन्नतपयोधरा । उपतस्थेऽग्रतः पत्नी शक्तेर्दीनाननेक्षणा

athainaṁ cārusarvāṅgī pīnonnatapayodharā | upatasthe'grataḥ patnī śakterdīnānanekṣaṇā

तब शक्ति की पत्नी, जो सर्वांगसुन्दरी और पूर्ण उन्नत स्तनों वाली थी, दुःखी मुख और नेत्रों के साथ उनके सामने आकर खड़ी हो गई।

श्लोक 10 (skanda.8.18.10)

तामुवाच कुतस्त्वं वै कस्यैवं श्रूयते ध्वनिः । सोवाच दीनया वाचा वदतां शुश्रुवं तदा

tāmuvāca kutastvaṁ vai kasyaivaṁ śrūyate dhvaniḥ | sovāca dīnayā vācā vadatāṁ śuśruvaṁ tadā

उन्होंने उससे कहा — तुम कहाँ से आई हो, और यह किसका स्वर इस प्रकार सुनाई देता है? उसने दीन वाणी में कहा — मैंने तब पाठ करने वाले का स्वर सुना।

श्लोक 11 (skanda.8.18.11)

अदृश्यन्त्युवाच। यदैव सुतदुःखेन निर्गतोऽस्याश्रमाद्गुरो । तदाप्रभृत्येव चाहं भगवन्तमनुव्रता

adṛśyantyuvāca| yadaiva sutaduḥkhena nirgato'syāśramādguro | tadāprabhṛtyeva cāhaṁ bhagavantamanuvratā

अदृश्यन्ती ने कहा — हे गुरो, जब से आप पुत्रशोक से आश्रम से निकले हैं, तभी से मैं भगवान् (उनके स्मरण) का अनुसरण करती रही हूँ।

श्लोक 12 (skanda.8.18.12)

अधीयानस्य चैवायं ध्वनिः पौत्रस्य ते विभो । उदरस्थस्य श्रुतो मे मा दुःखं दुःसहं कृथाः

adhīyānasya caivāyaṁ dhvaniḥ pautrasya te vibho | udarasthasya śruto me mā duḥkhaṁ duḥsahaṁ kṛthāḥ

हे विभो, यह ध्वनि तो गर्भस्थ आपके पौत्र के पाठ करने की ही है, जो मैंने सुनी है। आप असह्य दुःख न करें।

श्लोक 13 (skanda.8.18.13)

सनत्कुमार उवाच। इदानीमस्ति मे वत्स जीविताशेति सोऽब्रवीत्

sanatkumāra uvāca| idānīmasti me vatsa jīvitāśeti so'bravīt

सनत्कुमार ने कहा — (इससे पूर्व मूल पाठ का एक पाद यहाँ खण्डित है) ...'अब मुझे जीवन की आशा है, हे वत्से' — ऐसा उन्होंने कहा।

श्लोक 14 (skanda.8.18.14)

उवाच चैनं दुष्टात्मन् दहेयं त्वां सबान्धवम्

uvāca cainaṁ duṣṭātman daheyaṁ tvāṁ sabāndhavam

(इससे पूर्व एक पाद यहाँ खण्डित है) ...और उससे कहा — हे दुष्टात्मन्, मैं तुम्हें तुम्हारे बन्धुओं सहित भस्म कर सकता हूँ।

श्लोक 15 (skanda.8.18.15)

दग्धेन च त्वया किं मे गच्छ मुक्तोऽसि दुर्मते

dagdhena ca tvayā kiṁ me gaccha mukto'si durmate

(इससे पूर्व एक पाद यहाँ खण्डित है) ...'परन्तु तुम्हें भस्म करने से मुझे क्या लाभ? जाओ, हे दुर्मते, तुम मुक्त हो।'

श्लोक 16 (skanda.8.18.16)

ततः स मुक्तो दीनात्मा राक्षसः क्रूरकर्मकृत् । प्रणम्य सहसा भीतो जगाम कौशिकान्तिकम्

tataḥ sa mukto dīnātmā rākṣasaḥ krūrakarmakṛt | praṇamya sahasā bhīto jagāma kauśikāntikam

तब वह दीन-हृदय, क्रूरकर्मा राक्षस मुक्त होकर प्रणाम करके और भयभीत होकर तुरन्त कौशिक (विश्वामित्र) के पास चला गया।

श्लोक 17 (skanda.8.18.17)

निशाचरे गते राजा प्रणम्य शिरसा मुनिम् । प्रसादयामास तदा स चोवाचेदमर्थवत्

niśācare gate rājā praṇamya śirasā munim | prasādayāmāsa tadā sa covācedamarthavat

राक्षस के चले जाने पर राजा ने मुनि को सिर झुकाकर प्रणाम किया और उन्हें प्रसन्न किया; तब मुनि ने यह अर्थपूर्ण वचन कहा —

श्लोक 18 (skanda.8.18.18)

न दोषस्तव राजेन्द्र रक्षसाधिष्ठितस्य वै । कृतास्तेन कृताः पुत्रा निमित्तं तत्र राक्षसः

na doṣastava rājendra rakṣasādhiṣṭhitasya vai | kṛtāstena kṛtāḥ putrā nimittaṁ tatra rākṣasaḥ

हे राजेन्द्र, तुम पर दोष नहीं है, क्योंकि तुम राक्षस से आविष्ट थे। जो कुछ हुआ वह उसी के द्वारा किया गया; मेरे पुत्र तो केवल निमित्त थे, राक्षस ही वहाँ वास्तविक कारण था।

श्लोक 19 (skanda.8.18.19)

प्रशाधि राज्यं राजेन्द्र पितृपैतामहं प्रियम् । ब्रूहि किं वा प्रियं तेऽद्य करोमि नरपुंगव

praśādhi rājyaṁ rājendra pitṛpaitāmahaṁ priyam | brūhi kiṁ vā priyaṁ te'dya karomi narapuṁgava

हे राजेन्द्र, अपने पिता-पितामह के प्रिय राज्य का शासन करो। हे नरश्रेष्ठ, कहो, आज तुम्हारे लिए मैं क्या प्रिय कार्य करूँ?

श्लोक 20 (skanda.8.18.20)

राजोवाच। इच्छामि भगवन् पुत्रं त्वयोत्पादितमच्युत । देव्यामस्यां महासत्व तत्कुरुष्व मम प्रियम्

rājovāca| icchāmi bhagavan putraṁ tvayotpāditamacyuta | devyāmasyāṁ mahāsatva tatkuruṣva mama priyam

राजा ने कहा — हे भगवन्, हे अच्युत, हे महासत्त्व, मैं इस रानी में आपके द्वारा उत्पन्न पुत्र चाहता हूँ। यही मेरा प्रिय कार्य कीजिए।

श्लोक 21 (skanda.8.18.21)

सनत्कुमार उवाच। एवमस्त्वित्यथोक्त्वासौ तस्य पत्न्यां महाव्रत । पुत्रं च लोष्टकं नाम जनयामास विश्रुतम्

sanatkumāra uvāca| evamastvityathoktvāsau tasya patnyāṁ mahāvrata | putraṁ ca loṣṭakaṁ nāma janayāmāsa viśrutam

सनत्कुमार ने कहा — हे महाव्रत, 'ऐसा ही हो' कहकर उन्होंने उस राजा की पत्नी में लोष्टक नामक प्रसिद्ध पुत्र को उत्पन्न किया।

श्लोक 22 (skanda.8.18.22)

तं लोष्टकं ततो राज्ये स्वपुत्रमभिषिच्य सः । जगाम वनमेवाथ सभार्यस्तपसि स्थितः

taṁ loṣṭakaṁ tato rājye svaputramabhiṣicya saḥ | jagāma vanamevātha sabhāryastapasi sthitaḥ

फिर उस लोष्टक को अपने पुत्र के रूप में राज्य पर अभिषिक्त करके वह पत्नी सहित वन में चला गया और तप में स्थित हो गया।

श्लोक 23 (skanda.8.18.23)

वसिष्ठस्यापि कालेन शक्तेः पुत्रः प्रतापवान् । अदृश्यन्त्यां भवत्पुत्रो नाम्ना स हि पराशरः

vasiṣṭhasyāpi kālena śakteḥ putraḥ pratāpavān | adṛśyantyāṁ bhavatputro nāmnā sa hi parāśaraḥ

कालान्तर में वसिष्ठ के पुत्र शक्ति का भी एक प्रतापी पुत्र अदृश्यन्ती से उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पराशर था।

श्लोक 24 (skanda.8.18.24)

वसिष्ठं तु तदा धीमान् तातमेवाभ्यमन्यत । तात तातेति च मुहुर्व्याजहार पिता गुरुः

vasiṣṭhaṁ tu tadā dhīmān tātamevābhyamanyata | tāta tāteti ca muhurvyājahāra pitā guruḥ

वह बुद्धिमान बालक वसिष्ठ को ही अपना पिता मानता था, और बार-बार 'पिता, पिता' कहकर उन्हें पुकारता था, क्योंकि वे ही उसके पिता और गुरु थे।

श्लोक 25 (skanda.8.18.25)

ततः कदाचिद्विज्ञाय भक्षितं रक्षसाशुचिम् । पितरं तपसा मन्त्रैरजरक्षकृतौ तदा

tataḥ kadācidvijñāya bhakṣitaṁ rakṣasāśucim | pitaraṁ tapasā mantrairajarakṣakṛtau tadā

फिर एक बार यह जानकर कि उसके पिता को किसी अपवित्र राक्षस ने खा लिया था, उसने तब तप और मन्त्रों के द्वारा राक्षसों के विनाश का संकल्प किया।

श्लोक 26 (skanda.8.18.26)

ततः कोट्यः सपंचाशद्रक्षसां क्रूरकर्मणाम् । जुहावाग्नौ महातेजास्ततो ब्रह्माभ्यगाद्द्रुतम्

tataḥ koṭyaḥ sapaṁcāśadrakṣasāṁ krūrakarmaṇām | juhāvāgnau mahātejāstato brahmābhyagāddrutam

तब उस महातेजस्वी ने क्रूरकर्मा राक्षसों की पचास करोड़ संख्या को अग्नि में हवन कर दिया; इस पर ब्रह्मा शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 27 (skanda.8.18.27)

सुतमभ्येत्य संपूज्य वसिष्ठसहितः प्रभुः । ऋषिभिर्दैवतैश्चैव इदमाह पराशरम्

sutamabhyetya saṁpūjya vasiṣṭhasahitaḥ prabhuḥ | ṛṣibhirdaivataiścaiva idamāha parāśaram

वसिष्ठ, ऋषियों और देवताओं के साथ प्रभु ब्रह्मा उस पुत्र के पास आकर, उसका सत्कार करके, पराशर से यह बोले —

श्लोक 28 (skanda.8.18.28)

ब्रह्मोवाच। देवतास्तर्पयन्ति स्म यज्ञैर्मन्त्रपुरःसरैः । अष्टमं स्थानमेतद्धि देवानां मा त्वमीदृशम्

brahmovāca| devatāstarpayanti sma yajñairmantrapuraḥsaraiḥ | aṣṭamaṁ sthānametaddhi devānāṁ mā tvamīdṛśam

ब्रह्मा ने कहा — देवता मन्त्रपूर्वक किए गए यज्ञों से ही तृप्त होते हैं। यह देवताओं का आठवाँ स्थान है; तुम ऐसा मत करो।

श्लोक 29 (skanda.8.18.29)

पराशर उवाच। सह देवैरहं सर्वान् लोकान् धक्ष्यामि पावकैः । दग्ध्वाऽन्यान् प्रथयिष्यामि तत्रालोकान्न संशयः

parāśara uvāca| saha devairahaṁ sarvān lokān dhakṣyāmi pāvakaiḥ | dagdhvā'nyān prathayiṣyāmi tatrālokānna saṁśayaḥ

पराशर ने कहा — मैं देवताओं सहित समस्त लोकों को अग्नियों से भस्म कर दूँगा; उन्हें जलाकर मैं वहाँ अन्य लोकों की रचना करूँगा, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 30 (skanda.8.18.30)

सनत्कुमार उवाच। तस्यैवं गर्वितं वाक्यं श्रुत्वा देवः पितामहः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा सान्त्वयंस्तमिदं वचः

sanatkumāra uvāca| tasyaivaṁ garvitaṁ vākyaṁ śrutvā devaḥ pitāmahaḥ | uvāca ślakṣṇayā vācā sāntvayaṁstamidaṁ vacaḥ

सनत्कुमार ने कहा — उसके इस गर्वयुक्त वचन को सुनकर देव पितामह ब्रह्मा ने कोमल वाणी से उसे समझाते हुए यह वचन कहा —

श्लोक 31 (skanda.8.18.31)

पितामह उवाच। कृतमेतन्न सन्देहो यथा ब्रूषे महामुने । क्षन्तव्यं सर्वमेतत्तु अस्मत्प्रियचिकीर्षया

pitāmaha uvāca| kṛtametanna sandeho yathā brūṣe mahāmune | kṣantavyaṁ sarvametattu asmatpriyacikīrṣayā

पितामह ने कहा — हे महामुने, यह कार्य सम्पन्न हो चुका है, इसमें संशय नहीं, जैसा तुम कहते हो। परन्तु हमें प्रसन्न करने की इच्छा से यह सब अब क्षमा कर देना चाहिए।

श्लोक 32 (skanda.8.18.32)

यैस्ते पिता महाभाग भक्षितः सहसोदरः । त एवाग्नौ तु होतव्या विश्वामित्रस्य पश्यतः

yaiste pitā mahābhāga bhakṣitaḥ sahasodaraḥ | ta evāgnau tu hotavyā viśvāmitrasya paśyataḥ

हे महाभाग, जिनके द्वारा तुम्हारे पिता को उनके भाइयों सहित खाया गया था, उन्हें ही अग्नि में, विश्वामित्र के देखते हुए, हवन किया जाए — इतना ही पर्याप्त है।

श्लोक 33 (skanda.8.18.33)

अन्येषां स्वस्ति सर्वत्र देवानां सह राक्षसैः । तस्य संकल्पसंतुष्टो मन्यं द्यतमुदाहरत्

anyeṣāṁ svasti sarvatra devānāṁ saha rākṣasaiḥ | tasya saṁkalpasaṁtuṣṭo manyaṁ dyatamudāharat

शेष रहे राक्षसों और देवताओं का सर्वत्र कल्याण हो। उसके संकल्प से संतुष्ट होकर उन्होंने यह अभिप्राय व्यक्त किया —

श्लोक 34 (skanda.8.18.34)

वसिष्ठस्य महाभाग त्वं निवारय पौत्रकम् । देवाः प्राञ्जलयः सर्वे प्रणेमुस्ते महामुनिम्

vasiṣṭhasya mahābhāga tvaṁ nivāraya pautrakam | devāḥ prāñjalayaḥ sarve praṇemuste mahāmunim

हे महाभाग वसिष्ठ, तुम अपने पौत्र को शान्त करो। तब सभी देवताओं ने हाथ जोड़कर उस महामुनि को प्रणाम किया।

श्लोक 35 (skanda.8.18.35)

ऋषयश्चैव स क्रुद्धस्तपोयोगबलान्वितः । विहाय तपसो योगाद्धोष्ये दीप्ते विभावसौ

ṛṣayaścaiva sa kruddhastapoyogabalānvitaḥ | vihāya tapaso yogāddhoṣye dīpte vibhāvasau

ऋषियों ने भी प्रणाम किया। तप और योग के बल से सम्पन्न वह क्रुद्ध पराशर तब अपने तप और योग के बल से उस प्रज्वलित अग्नि में और आहुति देना छोड़कर शान्त हो गया।

श्लोक 36 (skanda.8.18.36)

सनत्कुमार उवाच। ततो देवाः सगन्धर्वाः पितामहपुरस्सराः । प्रभावं तस्य ते ज्ञात्वा पराशरमपूजयन्

sanatkumāra uvāca| tato devāḥ sagandharvāḥ pitāmahapurassarāḥ | prabhāvaṁ tasya te jñātvā parāśaramapūjayan

सनत्कुमार ने कहा — तब पितामह के आगे-आगे चलने वाले गन्धर्वों सहित देवताओं ने उस पराशर के प्रभाव को जानकर उसका सम्मान किया।

श्लोक 37 (skanda.8.18.37)

हतेषु च ततस्तेषु रक्षस्सु सुदुरात्मसु । संजहार ततः सत्रं ब्रह्मणोऽनुमते सदा

hateṣu ca tatasteṣu rakṣassu sudurātmasu | saṁjahāra tataḥ satraṁ brahmaṇo'numate sadā

इस प्रकार उन अत्यन्त दुरात्मा राक्षसों के मारे जाने पर उसने ब्रह्मा की अनुमति से ही उस सत्र (यज्ञ) को समाप्त कर दिया।

श्लोक 38 (skanda.8.18.38)

सनत्कुमार उवाच। य इदं श्राद्धकाले वा दैवे कर्मणि वा द्विजान् । श्रावयेत शुचिर्भूत्वा न तं हिंसन्ति राक्षसाः

sanatkumāra uvāca| ya idaṁ śrāddhakāle vā daive karmaṇi vā dvijān | śrāvayeta śucirbhūtvā na taṁ hiṁsanti rākṣasāḥ

सनत्कुमार ने कहा — जो शुद्ध होकर श्राद्धकाल में अथवा किसी दैविक कर्म में इस कथा को ब्राह्मणों को सुनाता है, उसे राक्षस पीड़ा नहीं पहुँचाते।

श्लोक 39 (skanda.8.18.39)

पराशरस्येदमदीनसंभवं विशुद्धवाक्कर्मविधानसंभवम् । निशम्य रीयुः कुलसिद्धिसंभवम्

parāśarasyedamadīnasaṁbhavaṁ viśuddhavākkarmavidhānasaṁbhavam | niśamya rīyuḥ kulasiddhisaṁbhavam

पराशर की यह अदीन उत्पत्ति की कथा, जो शुद्ध वाणी और कर्म के विधान से उत्पन्न हुई है — इसे सुनकर (मूल पाठ का मध्य भाग यहाँ खण्डित है) ...वे कुल की सिद्धि से उत्पन्न उस फल को प्राप्त हुए।

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19