अम्बिका खण्ड · अध्याय 17
कल्माषपाद-शाप
श्लोक 1 (skanda.8.17.1)
व्यास उवाच। कस्मात् स राजा तमृषिं चखाद तपसान्वितम् । रक्षसा स किमर्थ च हृतचेता भवन्नृपः
vyāsa uvāca| kasmāt sa rājā tamṛṣiṁ cakhāda tapasānvitam | rakṣasā sa kimartha ca hṛtacetā bhavannṛpaḥ
व्यास ने कहा — वह राजा तपस्वी ऋषि को क्यों खा गया, और किस कारण से वह राजा राक्षस द्वारा हृतचित्त हुआ?
श्लोक 2 (skanda.8.17.2)
वसिष्ठयाज्यो राजासीन्नाम्ना मित्रसहः प्रभुः । सौदासस्तस्य पुत्रोऽभूदिन्द्रचन्द्रसमद्युतिः
vasiṣṭhayājyo rājāsīnnāmnā mitrasahaḥ prabhuḥ | saudāsastasya putro'bhūdindracandrasamadyutiḥ
वसिष्ठ जिनके पुरोहित थे, ऐसा एक प्रभावशाली राजा था जिसका नाम मित्रसह था। उसका पुत्र सौदास इन्द्र और चन्द्रमा के समान तेजस्वी था।
श्लोक 3 (skanda.8.17.3)
समागम्याब्रवीच्छक्तिश्चरिष्ये दीक्षितो व्रतम् । ततो मे निशि राजेन्द्र सदैव पिशिताशनम्
samāgamyābravīcchaktiścariṣye dīkṣito vratam | tato me niśi rājendra sadaiva piśitāśanam
शक्ति ने आकर कहा — मैं दीक्षित होकर एक व्रत का पालन करूँगा। हे राजेन्द्र, तब मेरे लिए प्रतिरात्रि मांस-भोजन दिया जाए।
श्लोक 4 (skanda.8.17.4)
इहागतस्य यच्छ त्वं शुचि सर्वगुणान्वितम् । सुप्रभाहारसंयुक्तमेकस्यैकान्त एव च
ihāgatasya yaccha tvaṁ śuci sarvaguṇānvitam | suprabhāhārasaṁyuktamekasyaikānta eva ca
मुझ यहाँ आए हुए को तुम शुद्ध, सब गुणों से युक्त, उत्तम आहार से सम्पन्न भोजन एकांत में, केवल मेरे लिए ही दो।
श्लोक 5 (skanda.8.17.5)
एवमस्त्विति तेनोक्ते जगाम स महामनाः । अथास्यान्तर्हितं रक्षो नृपतेरभवत्तदा
evamastviti tenokte jagāma sa mahāmanāḥ | athāsyāntarhitaṁ rakṣo nṛpaterabhavattadā
राजा के 'ऐसा ही हो' कहने पर वह महामना वहाँ से चला गया। तब राजा के भीतर गुप्त रूप से एक राक्षस प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 6 (skanda.8.17.6)
सूदान्नाज्ञापयत्तेन तस्यार्थे मुनिसत्तम । गते च दिवसे तात संस्मृत्याथ यतात्मवान् सूदमाहूय प्रोवाच आर्तवत् स नराधिपः
sūdānnājñāpayattena tasyārthe munisattama | gate ca divase tāta saṁsmṛtyātha yatātmavān sūdamāhūya provāca ārtavat sa narādhipaḥ
राजा ने उस मुनिश्रेष्ठ के लिए रसोइए को भोजन बनाने की आज्ञा दी। हे तात, दिन बीत जाने पर उस संयमी राजा ने स्मरण करके रसोइए को बुलाकर व्याकुल होकर कहा —
श्लोक 7 (skanda.8.17.7)
सौदास उवाच। मया मृतवसो प्रातर्गुरुपुत्रस्य धीमतः । पिशितं संप्रतिज्ञातं भोजनं निशि संस्कृतम्
saudāsa uvāca| mayā mṛtavaso prātarguruputrasya dhīmataḥ | piśitaṁ saṁpratijñātaṁ bhojanaṁ niśi saṁskṛtam
सौदास ने कहा — हे मृतवसु, मैंने प्रातःकाल ही गुरुपुत्र बुद्धिमान शक्ति को रात्रि में तैयार किया हुआ मांस-भोजन देने की प्रतिज्ञा की है।
श्लोक 8 (skanda.8.17.8)
तत्कुरुष्व यथाक्षिप्रं कालो नोपरमेद्यथा । स एवमुक्तः प्रोवाच सूदो मृतवसुस्तदा
tatkuruṣva yathākṣipraṁ kālo noparamedyathā | sa evamuktaḥ provāca sūdo mṛtavasustadā
अतः तुम शीघ्रता से वह तैयार करो, जिससे समय न बीत जाए। इस प्रकार कहे जाने पर रसोइया मृतवसु ने कहा —
श्लोक 9 (skanda.8.17.9)
राजंस्त्वया त्वनाख्यातं प्रागेव नरपुङ्गव । सांप्रतं नास्ति पिशितं स्तोकमप्यभिकांक्षितम्
rājaṁstvayā tvanākhyātaṁ prāgeva narapuṅgava | sāṁprataṁ nāsti piśitaṁ stokamapyabhikāṁkṣitam
हे राजन्, हे नरश्रेष्ठ, आपने यह मुझे पहले नहीं बताया था। इस समय थोड़ा-सा भी वांछित मांस उपलब्ध नहीं है।
श्लोक 10 (skanda.8.17.10)
पिशितस्यैव चाल्पस्य बहूनां चैव भूभुजाम् । अमृतस्य प्रदानाच्च न किंचिदवशिष्यते
piśitasyaiva cālpasya bahūnāṁ caiva bhūbhujām | amṛtasya pradānācca na kiṁcidavaśiṣyate
जो थोड़ा-सा मांस था, वह भी बहुत-से राजाओं में और अन्न के वितरण में समाप्त हो गया, कुछ भी शेष नहीं रहा।
श्लोक 11 (skanda.8.17.11)
राजोवाच। जाने सर्वोपयोगं च जाने चादुष्कृतं तव । जाने स्तोकं च पिशितं कार्यं चेदं तथाविधम् मृग्यतां पिशितं क्षिप्रं लुब्धकं यत्र मन्यसे
rājovāca| jāne sarvopayogaṁ ca jāne cāduṣkṛtaṁ tava | jāne stokaṁ ca piśitaṁ kāryaṁ cedaṁ tathāvidham mṛgyatāṁ piśitaṁ kṣipraṁ lubdhakaṁ yatra manyase
राजा ने कहा — मैं सारी बात जानता हूँ, और यह भी जानता हूँ कि इसमें तुम्हारा दोष नहीं है। मैं जानता हूँ कि मांस थोड़ा है, फिर भी यह कार्य वैसे ही करना है। जिस व्याध के पास तुम उचित समझो, वहाँ से शीघ्र मांस ढूँढ़ा जाए।
श्लोक 12 (skanda.8.17.12)
सनत्कुमार उवाच। पिशितं मृगयन् यत्नान्नाप्यविन्दत कर्हिचित् । यदा न लब्धवान् मांसं तदोवाच नराधिपम् मृगयन् सारखिन्नोऽस्मि शाधि किं करवाणि ते
sanatkumāra uvāca| piśitaṁ mṛgayan yatnānnāpyavindata karhicit | yadā na labdhavān māṁsaṁ tadovāca narādhipam mṛgayan sārakhinno'smi śādhi kiṁ karavāṇi te
सनत्कुमार ने कहा — प्रयत्नपूर्वक मांस ढूँढ़ते हुए भी उसे कहीं वह नहीं मिला। जब उसे मांस नहीं मिला, तब उसने राजा से कहा — ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं अत्यन्त थक गया हूँ, आज्ञा दीजिए, मैं आपके लिए क्या करूँ?
श्लोक 13 (skanda.8.17.13)
सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तः सूदेन तस्मिन् काले नराधिपः । नोवाच किंचित्तं सूदं विमनाः स बभूव ह
sanatkumāra uvāca| sa evamuktaḥ sūdena tasmin kāle narādhipaḥ | novāca kiṁcittaṁ sūdaṁ vimanāḥ sa babhūva ha
सनत्कुमार ने कहा — रसोइए के इस प्रकार कहने पर उस समय राजा ने उससे कुछ भी नहीं कहा और खिन्न-मन हो गया।
श्लोक 14 (skanda.8.17.14)
इदमन्तरमासाद्य विश्वामित्रसमीरितः । राक्षसो रुधिरो नाम संविवेश नराधिपम्
idamantaramāsādya viśvāmitrasamīritaḥ | rākṣaso rudhiro nāma saṁviveśa narādhipam
इस अवसर को पाकर, विश्वामित्र द्वारा प्रेरित रुधिर नामक राक्षस राजा में प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 15 (skanda.8.17.15)
राक्षसेन तदाविष्टो रुधिरेण दुरात्मना । उवाच सूदं शनकैः कर्णमूले महाद्युतिः
rākṣasena tadāviṣṭo rudhireṇa durātmanā | uvāca sūdaṁ śanakaiḥ karṇamūle mahādyutiḥ
उस दुरात्मा राक्षस रुधिर से आविष्ट होकर उस महातेजस्वी राजा ने रसोइए के कान में धीरे से कहा —
श्लोक 16 (skanda.8.17.16)
गच्छ यत्किंचिदानीय मांसं मानुष्यकं ततः । गार्दभं वाप्यथौष्ट्रं वा शीघ्रं संस्कर्तुमर्हसि
gaccha yatkiṁcidānīya māṁsaṁ mānuṣyakaṁ tataḥ | gārdabhaṁ vāpyathauṣṭraṁ vā śīghraṁ saṁskartumarhasi
जाओ, और किसी प्रकार मनुष्य का मांस लाकर, अथवा गधे या ऊँट का ही, उसे शीघ्र पकाना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.8.17.17)
किमसौ ज्ञास्यते रात्रौ त्वया भूयश्च संस्कृतम् । रसवद् गन्धवच्चैव क्षिप्रमेव समानय
kimasau jñāsyate rātrau tvayā bhūyaśca saṁskṛtam | rasavad gandhavaccaiva kṣiprameva samānaya
रात्रि में तुम्हारे द्वारा फिर से पकाया गया वह उसे कैसे ज्ञात होगा? स्वादिष्ट और सुगन्धित बनाकर शीघ्र ही ले आओ।
श्लोक 18 (skanda.8.17.18)
सनत्कुमार उवाच। एवमुक्तस्तु तेनाथ मानुषं मांसमाददे । राजापकारिणो व्यास सूदो शिष्टस्य कस्यचित्
sanatkumāra uvāca| evamuktastu tenātha mānuṣaṁ māṁsamādade | rājāpakāriṇo vyāsa sūdo śiṣṭasya kasyacit
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार आदेश पाकर रसोइए ने तब राजा के किसी अपराधी दण्डित पुरुष का मांस ले लिया, हे व्यास।
श्लोक 19 (skanda.8.17.19)
अथार्धरात्रसमये भास्कराकारवर्चसम् । राजानलसमप्रख्यमपश्यन्मुनिसत्तमम्
athārdharātrasamaye bhāskarākāravarcasam | rājānalasamaprakhyamapaśyanmunisattamam
तब आधी रात के समय राजा ने सूर्य के समान कान्तिमान, अग्नि के समान तेजस्वी उस मुनिश्रेष्ठ को देखा।
श्लोक 20 (skanda.8.17.20)
स तमर्घ्येण पाद्येन आसनाग्रवरेण च । अर्चयित्वा तु विधिवदन्नमस्योपपादयत्
sa tamarghyeṇa pādyena āsanāgravareṇa ca | arcayitvā tu vidhivadannamasyopapādayat
अर्घ्य, पाद्य और श्रेष्ठ आसन से उनकी विधिपूर्वक पूजा करके उसने उन्हें भोजन अर्पित किया।
श्लोक 21 (skanda.8.17.21)
स तदन्नं समानीतं समालभ्य महातपाः । चुकोप क्षोभितं चापि पार्थिवं प्रहसन्निव
sa tadannaṁ samānītaṁ samālabhya mahātapāḥ | cukopa kṣobhitaṁ cāpi pārthivaṁ prahasanniva
वह महातपस्वी लाए गए उस अन्न का स्पर्श करके क्रुद्ध हो गया और मानो हँसते हुए क्षुब्ध होकर राजा से बोला।
श्लोक 22 (skanda.8.17.22)
शक्तिरुवाच। पार्थिवाधम विप्राणां भोजनं राक्षसोचितम् । न दीयते विधिज्ञेन त्वं तु मामवमन्यसे
śaktiruvāca| pārthivādhama viprāṇāṁ bhojanaṁ rākṣasocitam | na dīyate vidhijñena tvaṁ tu māmavamanyase
शक्ति ने कहा — हे नराधम, विधि जानने वाला पुरुष ब्राह्मणों को राक्षस के योग्य भोजन नहीं देता। तुमने मेरा अपमान किया है।
श्लोक 23 (skanda.8.17.23)
यस्मात्त्वं राक्षसमिदं मह्यं दित्ससि भोजनम् । तस्मात्त्वं कर्मणानेन पुरुषादो भविष्यसि
yasmāttvaṁ rākṣasamidaṁ mahyaṁ ditsasi bhojanam | tasmāttvaṁ karmaṇānena puruṣādo bhaviṣyasi
चूँकि तुमने मुझे यह राक्षस योग्य भोजन देना चाहा, अतः इस कर्म के कारण तुम स्वयं मनुष्यभक्षी (नरभक्षी) बन जाओगे।
श्लोक 24 (skanda.8.17.24)
सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तस्तेजस्वी राजा संचिन्त्य तत्तदा । उवाच क्रोधरक्ताक्षो राक्षसाविष्टचेतनः
sanatkumāra uvāca| sa evamuktastejasvī rājā saṁcintya tattadā | uvāca krodharaktākṣo rākṣasāviṣṭacetanaḥ
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वह तेजस्वी राजा उस बात पर विचार करके, क्रोध से लाल आँखों वाला, राक्षस से आविष्ट-चित्त होकर बोला —
श्लोक 25 (skanda.8.17.25)
पुरुषादो भवेत्येवं मामवोचद् भवान् यतः । अतस्त्वां भक्षयिष्यामि भ्रातृभिः सहितं द्विज
puruṣādo bhavetyevaṁ māmavocad bhavān yataḥ | atastvāṁ bhakṣayiṣyāmi bhrātṛbhiḥ sahitaṁ dvija
चूँकि आपने मुझसे कहा कि मैं नरभक्षी बनूँगा, अतः हे द्विज, मैं आपको आपके भाइयों सहित खा जाऊँगा।
श्लोक 26 (skanda.8.17.26)
भक्षयित्वा विशुद्ध्यर्थं मुक्तशापस्ततः परम् । चरिष्यामि तपः शुद्धं संयम्येन्द्रियसंयुतम् पित्रा तवाभ्यनुज्ञातः स्वर्गे वत्स्ये यथेप्सितम्
bhakṣayitvā viśuddhyarthaṁ muktaśāpastataḥ param | cariṣyāmi tapaḥ śuddhaṁ saṁyamyendriyasaṁyutam pitrā tavābhyanujñātaḥ svarge vatsye yathepsitam
खा लेने के पश्चात्, शुद्धि के लिए और शाप से मुक्त होकर, मैं इन्द्रियों को संयत करके शुद्ध तप का आचरण करूँगा। तुम्हारे पिता की अनुमति पाकर मैं इच्छानुसार स्वर्ग में निवास करूँगा।