अम्बिका खण्ड · अध्याय 16
शक्ति का जन्म
श्लोक 1 (skanda.8.16.1)
वरान् स लब्ध्वा भगवान् वसिष्ठोऽस्मत्पितामहः । कं पुत्रं जनयामास आत्मनः सदृशद्युतिम्
varān sa labdhvā bhagavān vasiṣṭho'smatpitāmahaḥ | kaṁ putraṁ janayāmāsa ātmanaḥ sadṛśadyutim
व्यास ने पूछा — उन वरों को प्राप्त करके भगवान वसिष्ठ, हमारे पितामह ने, अपने ही समान तेजस्वी कौन-सा पुत्र उत्पन्न किया?
श्लोक 2 (skanda.8.16.2)
सनत्कुमार उवाच। तेनासौ वरदानेन देवदेवस्य शूलिनः । अरुन्धत्यामजनयत्तपोयोगबलान्वितम्
sanatkumāra uvāca| tenāsau varadānena devadevasya śūlinaḥ | arundhatyāmajanayattapoyogabalānvitam
सनत्कुमार ने कहा — उस त्रिशूलधारी देवाधिदेव के वरदान से उन्होंने अरुन्धती के गर्भ से तप और योग के बल से सम्पन्न पुत्र को उत्पन्न किया।
श्लोक 3 (skanda.8.16.3)
ब्रह्मिष्ठं शक्तिनामानं पुत्रं पुत्रशताग्रजम् । तस्य बाल्यात्प्रभृत्येव वासिष्ठस्य महात्मनः
brahmiṣṭhaṁ śaktināmānaṁ putraṁ putraśatāgrajam | tasya bālyātprabhṛtyeva vāsiṣṭhasya mahātmanaḥ
वह पुत्र ब्रह्मनिष्ठ था, जिसका नाम शक्ति था और जो सौ पुत्रों में ज्येष्ठ था। उस महात्मा वासिष्ठ के बाल्यकाल से ही —
श्लोक 4 (skanda.8.16.4)
रभसोपगता भक्तिरभवद् गोवृषध्वजे । स कदाचिदपत्यार्थमाराधयदुमापतिम्
rabhasopagatā bhaktirabhavad govṛṣadhvaje | sa kadācidapatyārthamārādhayadumāpatim
— वृषभ-ध्वज शिव के प्रति उत्कट भक्ति उत्पन्न हो गई थी। एक बार उसने पुत्रप्राप्ति के लिए उमापति की आराधना की।
श्लोक 5 (skanda.8.16.5)
तस्य तुष्टो महादेवो वरदोऽस्मीत्यभाषत । अथ दृष्ट्वा तमीशानमिदमाहानताननः
tasya tuṣṭo mahādevo varado'smītyabhāṣata | atha dṛṣṭvā tamīśānamidamāhānatānanaḥ
उससे प्रसन्न होकर महादेव ने कहा — मैं वर देने वाला हूँ। तब उस ईशान को देखकर उसने सिर झुकाए हुए यह कहा —
श्लोक 6 (skanda.8.16.6)
केन स्तोष्यामि ते देव यस्त्वं सर्वजगत्पतिः । सर्वान् धारयसे लोकानात्मना समयाद्विभो
kena stoṣyāmi te deva yastvaṁ sarvajagatpatiḥ | sarvān dhārayase lokānātmanā samayādvibho
हे देव, आपकी स्तुति किससे करूँ, जो आप समस्त जगत् के स्वामी हैं। हे विभो, आप अपने ही सामर्थ्य और नियम से समस्त लोकों को धारण करते हैं।
श्लोक 7 (skanda.8.16.7)
त्वमेव भोक्ता भोज्यञ्च कर्ता कार्यं तथा क्रिया । उत्पादकस्तथोत्पाद्य उत्पत्तिश्चैव सर्वशः
tvameva bhoktā bhojyañca kartā kāryaṁ tathā kriyā | utpādakastathotpādya utpattiścaiva sarvaśaḥ
आप ही भोक्ता और भोग्य हैं, आप ही कर्ता और कार्य तथा क्रिया हैं। आप ही उत्पादक और उत्पन्न होने वाले हैं, और सब प्रकार से उत्पत्ति भी आप ही हैं।
श्लोक 8 (skanda.8.16.8)
आत्मानं पुत्रनामानं मम तुल्यं गुणैर्विभो । इच्छामि दत्तं देवेश एष मे दीयतां वरः
ātmānaṁ putranāmānaṁ mama tulyaṁ guṇairvibho | icchāmi dattaṁ deveśa eṣa me dīyatāṁ varaḥ
हे विभो, मैं गुणों में अपने ही समान एक पुत्र, मानो अपना ही स्वरूप, चाहता हूँ। हे देवेश, मुझे यह वर दिया जाए।
श्लोक 9 (skanda.8.16.9)
सनत्कुमार उवाच। तमेवंवादिनं देवः प्रहस्य वदतां वरः । उवाच वचसा व्यास दिशः सर्वा विनादयन्
sanatkumāra uvāca| tamevaṁvādinaṁ devaḥ prahasya vadatāṁ varaḥ | uvāca vacasā vyāsa diśaḥ sarvā vinādayan
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहने वाले उस शक्ति से वक्ताओं में श्रेष्ठ देव ने हँसकर, हे व्यास, सभी दिशाओं को गुंजाते हुए वचन से कहा —
श्लोक 10 (skanda.8.16.10)
त्वयाहं याचितः शक्ते स च ते संभविष्यति । त्वत्समः सर्ववेदज्ञस्त्वदीयो मुनिपुङ्गव
tvayāhaṁ yācitaḥ śakte sa ca te saṁbhaviṣyati | tvatsamaḥ sarvavedajñastvadīyo munipuṅgava
हे शक्ति, तुमने मुझसे याचना की है, वह पुत्र तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा — हे मुनिश्रेष्ठ, वह तुम्हारे ही समान, समस्त वेदों का ज्ञाता और तुम्हारा ही अपना होगा।
श्लोक 11 (skanda.8.16.11)
बीजात्मा च तथोद्भूतः स्वयमेवान्तरात्मना । बीजात्मना न भवति परिणामान्तरङ्गतः
bījātmā ca tathodbhūtaḥ svayamevāntarātmanā | bījātmanā na bhavati pariṇāmāntaraṅgataḥ
वह बीज के स्वरूप में ही उत्पन्न होकर भी अपनी अन्तरात्मा से स्वयं ही प्रकट होगा; वह केवल बीज के स्वभाव से नहीं, अपितु आन्तरिक परिणाम को प्राप्त होकर उत्पन्न होगा।
श्लोक 12 (skanda.8.16.12)
एवं स आत्मनात्मा नः संभूतोऽपत्यसंज्ञितः । स्वेनात्मना न भविता परिणामान्तरं गतः
evaṁ sa ātmanātmā naḥ saṁbhūto'patyasaṁjñitaḥ | svenātmanā na bhavitā pariṇāmāntaraṁ gataḥ
इस प्रकार वह हमारे लिए आत्मा से ही उत्पन्न आत्मा, संतान के नाम से प्रसिद्ध होगा; वह केवल अपने ही स्वरूप से नहीं, अपितु आन्तरिक परिणाम को प्राप्त होकर ही उत्पन्न होगा।
श्लोक 13 (skanda.8.16.13)
सनत्कुमार उवाच। एवमुक्त्वा तु तं देवः प्रहस्य च निरीक्ष्य । जगाम सहसा योगी अदृश्यत्वमतिद्युतिः
sanatkumāra uvāca| evamuktvā tu taṁ devaḥ prahasya ca nirīkṣya | jagāma sahasā yogī adṛśyatvamatidyutiḥ
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहकर और हँसकर उसकी ओर देखकर वह अत्यन्त तेजस्वी योगी देव सहसा अदृश्य हो गए।
श्लोक 14 (skanda.8.16.14)
तस्मिन् गते महादेवे शक्तिस्तव पितामहः । वचस्तत् परिनिश्चित्य एवमेवेत्यमन्यत
tasmin gate mahādeve śaktistava pitāmahaḥ | vacastat pariniścitya evamevetyamanyata
महादेव के चले जाने पर तुम्हारे पितामह शक्ति ने उस वचन का भलीभाँति निश्चय करके यही माना कि ऐसा ही होगा।
श्लोक 15 (skanda.8.16.15)
अथ काले ऽतिमहति समतीते शुभप्रदे । तपसा भावितश्चापि महताग्निसमप्रभः
atha kāle 'timahati samatīte śubhaprade | tapasā bhāvitaścāpi mahatāgnisamaprabhaḥ
इसके पश्चात् अत्यन्त दीर्घ और शुभप्रद काल बीत जाने पर, तप से पवित्र हुआ वह महान अग्नि के समान तेजस्वी —
श्लोक 16 (skanda.8.16.16)
अदृश्यन्त्यां महाप्रज्ञ आदधे गर्भमुत्तमम् । तस्यामापन्नसत्वायां राजा कल्माषपादऋषिम् भक्षयामास संरब्धो रक्षसा हृतचेतनः
adṛśyantyāṁ mahāprajña ādadhe garbhamuttamam | tasyāmāpannasatvāyāṁ rājā kalmāṣapādaṛṣim bhakṣayāmāsa saṁrabdho rakṣasā hṛtacetanaḥ
— उस महाप्राज्ञ ने अदृश्यन्ती में एक उत्तम गर्भ स्थापित किया। जब वह गर्भवती हुई, तब राजा कल्माषपाद, राक्षस द्वारा जिसका चित्त हर लिया गया था, क्रुद्ध होकर उस ऋषि को खा गया।