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अम्बिका खण्ड · अध्याय 15

वसिष्ठ का वरदान

अध्याय 14अध्याय-सूचीअध्याय 16

श्लोक 1 (skanda.8.15.1)

सनत्कुमार उवाच। प्रविष्टे भवनं देवे सूपविष्टे वरासने । सवह्निर्मन्मथः क्रूरो देवं वेद्धुमना भवत्

sanatkumāra uvāca| praviṣṭe bhavanaṁ deve sūpaviṣṭe varāsane | savahnirmanmathaḥ krūro devaṁ veddhumanā bhavat

सनत्कुमार ने कहा — जब देव (शिव) भवन में प्रवेश करके उत्तम आसन पर सुखपूर्वक विराजमान हुए, तब क्रूर मन्मथ अग्नि के साथ देव को बाण से बींधने का मन बना बैठा।

श्लोक 2 (skanda.8.15.2)

तमनाचारसंयुक्तं दुरात्मानं कुलाधमम् । लोकान् सर्वान् तापयानं सर्वेष्वकरुणात्मकम्

tamanācārasaṁyuktaṁ durātmānaṁ kulādhamam | lokān sarvān tāpayānaṁ sarveṣvakaruṇātmakam

वह अनाचार से युक्त, दुरात्मा, कुलाधम, समस्त लोकों को संतप्त करने वाला तथा सबके प्रति निर्दय था।

श्लोक 3 (skanda.8.15.3)

ऋषीणां विघ्नकर्तारं नियमानां व्रतैः सह । चक्राह्वयस्य रूपेण रत्या सह समागतम्

ṛṣīṇāṁ vighnakartāraṁ niyamānāṁ vrataiḥ saha | cakrāhvayasya rūpeṇa ratyā saha samāgatam

ऋषियों के नियमों और व्रतों में विघ्न डालने वाला वह चक्रवाक के रूप में रति के साथ वहाँ आया था।

श्लोक 4 (skanda.8.15.4)

अथाततायिनं व्यास वेद्धुकामं सुरेश्वरम् । नयनेन तृतीयेन सावज्ञं तमवैक्षत

athātatāyinaṁ vyāsa veddhukāmaṁ sureśvaram | nayanena tṛtīyena sāvajñaṁ tamavaikṣata

हे व्यास! तब देवेश्वर ने उस आततायी को, जो उन्हें बींधना चाहता था, अपने तीसरे नेत्र से तिरस्कारपूर्वक देखा।

श्लोक 5 (skanda.8.15.5)

ततोस्य नेत्रजो वह्निर्ज्वालामालासहस्रवान् । संवृत्य रतिभर्तारमदहत् सपरिच्छदम्

tatosya netrajo vahnirjvālāmālāsahasravān | saṁvṛtya ratibhartāramadahat saparicchadam

तत्पश्चात् उनके नेत्र से उत्पन्न सहस्रों ज्वालामालाओं वाली अग्नि ने रति के पति को उसके परिवार सहित घेरकर भस्म कर दिया।

श्लोक 6 (skanda.8.15.6)

स दह्यमानः करुणमार्त्तोक्रोशत विस्वरम् । प्रसादयँश्च तं देवं पपात स महीतले

sa dahyamānaḥ karuṇamārttokrośata visvaram | prasādaya~śca taṁ devaṁ papāta sa mahītale

जलते हुए वह अत्यन्त पीड़ित होकर करुण स्वर में विलाप करने लगा, और उस देव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हुए वह भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 7 (skanda.8.15.7)

आशु सोग्निपरीताङ्गो मन्मथो लोकतापनः । पपात भस्मसाच्चैव क्षणेन समपद्यत

āśu sogniparītāṅgo manmatho lokatāpanaḥ | papāta bhasmasāccaiva kṣaṇena samapadyata

शीघ्र ही अग्नि से आवृत्त होकर लोकों को संतप्त करने वाला मन्मथ गिर पड़ा और क्षणभर में सर्वथा भस्म हो गया।

श्लोक 8 (skanda.8.15.8)

पत्नी तु करुणं तस्य विललाप सुदुःखिता । देवं देवीञ्च रुदती अयाचत् करुणायती

patnī tu karuṇaṁ tasya vilalāpa suduḥkhitā | devaṁ devīñca rudatī ayācat karuṇāyatī

उसकी पत्नी अत्यन्त दुखी होकर करुण विलाप करने लगी, और रोती हुई करुणा से भरकर देव तथा देवी से प्रार्थना करने लगी।

श्लोक 9 (skanda.8.15.9)

तस्यास्तत् क्रन्दनं श्रुत्वा देवौ तौ करुणात्मकौ । ऊचतुस्तां समालोक्य समाश्वास्य च दुःखिताम्

tasyāstat krandanaṁ śrutvā devau tau karuṇātmakau | ūcatustāṁ samālokya samāśvāsya ca duḥkhitām

उसका वह विलाप सुनकर करुणामय उन दोनों देवताओं ने दुखिया को देखा और सांत्वना देकर उससे कहा।

श्लोक 10 (skanda.8.15.10)

दग्ध एष ध्रुवं भद्रे नास्योत्पत्तिरिहेष्यते । अशरीरोपि ते काले कार्यं सर्वं करिष्यति

dagdha eṣa dhruvaṁ bhadre nāsyotpattiriheṣyate | aśarīropi te kāle kāryaṁ sarvaṁ kariṣyati

हे भद्रे! यह निश्चय ही दग्ध हो चुका है, अब इसका पुनर्जन्म यहाँ नहीं होगा; तथापि यह अशरीर रहकर भी समय आने पर तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध करेगा।

श्लोक 11 (skanda.8.15.11)

यदा तु विष्णुर्भविता वसुदेवसुतः शुभे । तदा तस्य सुतो ह्येष पतिस्ते भविता रते

yadā tu viṣṇurbhavitā vasudevasutaḥ śubhe | tadā tasya suto hyeṣa patiste bhavitā rate

हे शुभे! जब विष्णु वसुदेव के पुत्र के रूप में अवतरित होंगे, तब यही उनका पुत्र बनेगा और हे रति, वही तुम्हारा पति होगा।

श्लोक 12 (skanda.8.15.12)

सनत्कुमार उवाच। ततः सा तं वरं लब्ध्वा कामपत्नी शुभानना । जगामेष्टं तदा देशं प्रीतियुक्ता गतक्लमा

sanatkumāra uvāca| tataḥ sā taṁ varaṁ labdhvā kāmapatnī śubhānanā | jagāmeṣṭaṁ tadā deśaṁ prītiyuktā gataklamā

सनत्कुमार ने कहा — तत्पश्चात् वह सुमुखी कामपत्नी उस वर को पाकर, प्रसन्नचित्त और थकानरहित होकर अपने इच्छित स्थान को चली गई।

श्लोक 13 (skanda.8.15.13)

सनत्कुमार उवाच। एवं दग्ध्वा स कामं तु शङ्करो मूढचेतसम् । प्रोवाच हिमवत्पुत्रीं भक्त्या मुनिवरस्य ह

sanatkumāra uvāca| evaṁ dagdhvā sa kāmaṁ tu śaṅkaro mūḍhacetasam | provāca himavatputrīṁ bhaktyā munivarasya ha

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार मोहग्रस्त काम को भस्म करके शंकर ने प्रेमपूर्वक हिमवत्पुत्री (पार्वती) से श्रेष्ठ मुनि के विषय में कहा।

श्लोक 14 (skanda.8.15.14)

वसिष्ठो नाम विप्रेन्द्रो मां कृत्वा हृदि तप्यते । तस्याहं वरदानाय प्रयास्यामि महाव्रते

vasiṣṭho nāma viprendro māṁ kṛtvā hṛdi tapyate | tasyāhaṁ varadānāya prayāsyāmi mahāvrate

हे महाव्रते! वसिष्ठ नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझे हृदय में धारण करके तप कर रहा है; मैं उसे वर देने के लिए जाऊँगा।

श्लोक 15 (skanda.8.15.15)

एवमुक्त्वा स देवीं तु भक्त्या प्रीत्या तदा विभुः । जगाम तपतोभ्यासं वसिष्ठस्य मुनेर्विभुः

evamuktvā sa devīṁ tu bhaktyā prītyā tadā vibhuḥ | jagāma tapatobhyāsaṁ vasiṣṭhasya munervibhuḥ

देवी से इस प्रकार प्रेम और स्नेहपूर्वक कहकर वे प्रभु तपस्या करते हुए मुनि वसिष्ठ के समीप गए।

श्लोक 16 (skanda.8.15.16)

ततो मुनिवरश्रेष्ठं वरिष्ठं तपतां वरम् । वसिष्ठमृषिशार्दूलं तप्यमानं परन्तपः

tato munivaraśreṣṭhaṁ variṣṭhaṁ tapatāṁ varam | vasiṣṭhamṛṣiśārdūlaṁ tapyamānaṁ parantapaḥ

तब उन शत्रुतापन (शिव) ने मुनियों में श्रेष्ठ, तपस्वियों में वरिष्ठ, ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ को तपस्या में लीन देखा।

श्लोक 17 (skanda.8.15.17)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु ज्वलमानमिवानलम् । उवाच भगवान् गत्वा ब्रूहि किन्ते ददान्यहम्

pūrṇe varṣasahasre tu jvalamānamivānalam | uvāca bhagavān gatvā brūhi kinte dadānyaham

सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर अग्नि के समान प्रज्वलित उस मुनि के पास जाकर भगवान् ने कहा — कहो, मैं तुम्हें क्या दूँ?

श्लोक 18 (skanda.8.15.18)

ददामि दिव्यं चक्षुस्ते पश्य मां सगणं द्विज । दृष्टवा तु स तमीशानं प्रणम्य शिरसा प्रभुम् । शिरस्यञ्जलिमाधाय तुष्टाव हृषिताननः

dadāmi divyaṁ cakṣuste paśya māṁ sagaṇaṁ dvija | dṛṣṭavā tu sa tamīśānaṁ praṇamya śirasā prabhum | śirasyañjalimādhāya tuṣṭāva hṛṣitānanaḥ

मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ, हे द्विज, मुझे अपने गणों सहित देखो — यह सुनकर उन ईशान प्रभु को देखकर, सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए और शिर पर अंजलि जोड़कर, हर्षित मुख से वसिष्ठ ने उनकी स्तुति की।

श्लोक 19 (skanda.8.15.19)

वसिष्ठ उवाच। नमः कनकलिङ्गाय वेदलिङ्गाय वै नमः । नमः सहस्रलिङ्गाय वह्निलिङ्गाय वै नमः

vasiṣṭha uvāca| namaḥ kanakaliṅgāya vedaliṅgāya vai namaḥ | namaḥ sahasraliṅgāya vahniliṅgāya vai namaḥ

वसिष्ठ ने कहा — कनकलिंग को नमस्कार है, वेदलिंग को भी नमस्कार है; सहस्रलिंग को नमस्कार है, वह्निलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 20 (skanda.8.15.20)

नमः पुराणलिङ्गाय श्रुतिलिङ्गाय वै नमः । नमः परमलिङ्गाय ब्रह्मलिङ्गाय वै नमः

namaḥ purāṇaliṅgāya śrutiliṅgāya vai namaḥ | namaḥ paramaliṅgāya brahmaliṅgāya vai namaḥ

पुराणलिंग को नमस्कार है, श्रुतिलिंग को भी नमस्कार है; परमलिंग को नमस्कार है, ब्रह्मलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 21 (skanda.8.15.21)

नमस्त्रैलोक्यलिङ्गाय दाहलिङ्गाय वै नमः । नमः पर्वतलिङ्गाय स्थितिलिङ्गाय वै नमः

namastrailokyaliṅgāya dāhaliṅgāya vai namaḥ | namaḥ parvataliṅgāya sthitiliṅgāya vai namaḥ

त्रैलोक्यलिंग को नमस्कार है, दाहलिंग को भी नमस्कार है; पर्वतलिंग को नमस्कार है, स्थितिलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 22 (skanda.8.15.22)

नमो रहस्यलिङ्गाय सप्तद्वीपाध्वलिङ्गिने । नमः सर्वार्थलिङ्गाय सर्वलोकाङ्गलिङ्गिने

namo rahasyaliṅgāya saptadvīpādhvaliṅgine | namaḥ sarvārthaliṅgāya sarvalokāṅgaliṅgine

रहस्यलिंग को नमस्कार है, सप्तद्वीपमार्गलिंग को नमस्कार है; सर्वार्थलिंग को नमस्कार है, सर्वलोकांगलिंग को नमस्कार है।

श्लोक 23 (skanda.8.15.23)

नमोस्त्वव्यक्तलिङ्गाय बुद्धिलिङ्गाय वै नमः । नमोहङ्कारलिङ्गाय भूतलिङ्गाय वै नमः

namostvavyaktaliṅgāya buddhiliṅgāya vai namaḥ | namohaṅkāraliṅgāya bhūtaliṅgāya vai namaḥ

अव्यक्तलिंग को नमस्कार है, बुद्धिलिंग को भी नमस्कार है; अहंकारलिंग को नमस्कार है, भूतलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 24 (skanda.8.15.24)

नम इन्द्रियलिङ्गाय नमस्तन्मात्रलिङ्गिने । नमः पुरुषलिङ्गाय भावलिङ्गाय वै नमः

nama indriyaliṅgāya namastanmātraliṅgine | namaḥ puruṣaliṅgāya bhāvaliṅgāya vai namaḥ

इन्द्रियलिंग को नमस्कार है, तन्मात्रलिंग को नमस्कार है; पुरुषलिंग को नमस्कार है, भावलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 25 (skanda.8.15.25)

नमः सत्वोर्ध्वलिङ्गाय तमोलिङ्गाय वै नमः । नमो रजोर्ध्वलिङ्गाय सत्त्वलिङ्गाय वै नमः

namaḥ satvordhvaliṅgāya tamoliṅgāya vai namaḥ | namo rajordhvaliṅgāya sattvaliṅgāya vai namaḥ

सत्वोर्ध्वलिंग को नमस्कार है, तमोलिंग को भी नमस्कार है; रजोर्ध्वलिंग को नमस्कार है, सत्त्वलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 26 (skanda.8.15.26)

नमो गगनलिङ्गाय तेजोलिङ्गाय वै नमः । नमो वामूर्ध्वलिङ्गाय शब्दलिङ्गाय वै नमः

namo gaganaliṅgāya tejoliṅgāya vai namaḥ | namo vāmūrdhvaliṅgāya śabdaliṅgāya vai namaḥ

गगनलिंग को नमस्कार है, तेजोलिंग को भी नमस्कार है; वामोर्ध्वलिंग को नमस्कार है, शब्दलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 27 (skanda.8.15.27)

नम ऋक्स्तुतलिङ्गाय यजुर्लिङ्गाय वै नमः । नमोऽथर्वलिङ्गाय सामलिङ्गाय वै नमः

nama ṛkstutaliṅgāya yajurliṅgāya vai namaḥ | namo'tharvaliṅgāya sāmaliṅgāya vai namaḥ

ऋग्वेद में स्तुत लिंग को नमस्कार है, यजुर्लिंग को भी नमस्कार है; अथर्वलिंग को नमस्कार है, सामलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 28 (skanda.8.15.28)

नमो यज्ञाङ्गलिङ्गाय यज्ञलिङ्गाय वै नमः । नमोऽनन्तलिङ्गाय वेदानुगतलिङ्गिने

namo yajñāṅgaliṅgāya yajñaliṅgāya vai namaḥ | namo'nantaliṅgāya vedānugataliṅgine

यज्ञांगलिंग को नमस्कार है, यज्ञलिंग को भी नमस्कार है; अनन्तलिंग को नमस्कार है, वेदानुगतलिंग को भी नमस्कार है।

श्लोक 29 (skanda.8.15.29)

दिश नः परमं योगमपत्यं मत्समं तथा । ब्रह्म चैवाक्षयं देव शमञ्चैव परं विभो । अक्षयत्वं च वंशस्य धर्मे च मतिमक्षयाम्

diśa naḥ paramaṁ yogamapatyaṁ matsamaṁ tathā | brahma caivākṣayaṁ deva śamañcaiva paraṁ vibho | akṣayatvaṁ ca vaṁśasya dharme ca matimakṣayām

हमें परम योग तथा अपने ही समान पुत्र प्रदान कीजिए; हे विभो, अक्षय ब्रह्मज्ञान तथा परम शान्ति भी दीजिए; और हमारे वंश की अक्षयता तथा धर्म में अक्षय बुद्धि भी दीजिए।

श्लोक 30 (skanda.8.15.30)

सनत्कुमार उवाच। एवं स भगवान् व्यास वसिष्ठेनामितात्मना । स्तूयमानस्तुतोषाथ तुष्टश्चेदं तमब्रवीत्

sanatkumāra uvāca| evaṁ sa bhagavān vyāsa vasiṣṭhenāmitātmanā | stūyamānastutoṣātha tuṣṭaścedaṁ tamabravīt

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास! इस प्रकार अमितात्मा वसिष्ठ द्वारा स्तुति किए जाने पर वे भगवान् प्रसन्न हुए और संतुष्ट होकर उनसे यह बोले।

श्लोक 31 (skanda.8.15.31)

भगवानुवाच। तुष्टस्तेहं ददाम्येतत् तव सर्वं मनोगतम् । योगं च परमं सूक्ष्ममक्षयं सर्वकामिकम्

bhagavānuvāca| tuṣṭastehaṁ dadāmyetat tava sarvaṁ manogatam | yogaṁ ca paramaṁ sūkṣmamakṣayaṁ sarvakāmikam

भगवान् ने कहा — मैं तुमसे प्रसन्न होकर तुम्हारे मन में जो कुछ है, वह सब प्रदान करता हूँ, तथा परम सूक्ष्म, अक्षय और सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाला योग भी देता हूँ।

श्लोक 32 (skanda.8.15.32)

पुत्रञ्च त्वत्समं दिव्यं तपोयोगबलान्वितम् । ज्ञानानि च ऋषिश्रेष्ठ प्रतिभास्यन्ति चैव ते

putrañca tvatsamaṁ divyaṁ tapoyogabalānvitam | jñānāni ca ṛṣiśreṣṭha pratibhāsyanti caiva te

और हे ऋषिश्रेष्ठ, तुम्हारे समान तपोयोगबल से सम्पन्न दिव्य पुत्र तथा ज्ञान भी तुम्हें प्रकट होंगे।

श्लोक 33 (skanda.8.15.33)

दमः शमस्तथा कीर्तिस्तुष्टिरक्रोध एव च । नित्यं तव भविष्यन्ति अमरत्वं च सर्वशः

damaḥ śamastathā kīrtistuṣṭirakrodha eva ca | nityaṁ tava bhaviṣyanti amaratvaṁ ca sarvaśaḥ

दम, शम, कीर्ति, संतोष तथा अक्रोध सदैव तुम्हारे पास रहेंगे, और सब प्रकार से अमरत्व भी।

श्लोक 34 (skanda.8.15.34)

अवश्यत्वमसह्यत्वमक्षयत्वञ्च सर्वदा । वंशस्य चाक्षतिर्विप्र धर्मे च मतिरव्यया । ब्रूहि चान्यानपि वरान् ददामि ऋषिसत्तम

avaśyatvamasahyatvamakṣayatvañca sarvadā | vaṁśasya cākṣatirvipra dharme ca matiravyayā | brūhi cānyānapi varān dadāmi ṛṣisattama

अवश्यता, असह्यता तथा सदा अक्षयत्व भी तुम्हें प्राप्त होगा; हे विप्र, तुम्हारे वंश का क्षय नहीं होगा और धर्म में तुम्हारी बुद्धि अटल रहेगी। हे ऋषिसत्तम, अन्य वर भी माँगो, मैं वे भी प्रदान करूँगा।

श्लोक 35 (skanda.8.15.35)

वसिष्ठ उवाच। भगवन् विदितं सर्वं भूतं यद्वर्तनं विभो । भविष्यं येन जानीयां तन्मे देव विधीयताम्

vasiṣṭha uvāca| bhagavan viditaṁ sarvaṁ bhūtaṁ yadvartanaṁ vibho | bhaviṣyaṁ yena jānīyāṁ tanme deva vidhīyatām

वसिष्ठ ने कहा — हे भगवन्, हे विभो, जो कुछ भूतकाल में हुआ, वह सब मुझे ज्ञात है; हे देव, अब मुझे वह प्रदान कीजिए जिससे मैं भविष्य को भी जान सकूँ।

श्लोक 36 (skanda.8.15.36)

देव उवाच। भविष्यं स्वेच्छया कुर्यामिति ज्ञातुं न शक्यते । तदपि मत्प्रसादेन ज्ञास्यसि निर्वृतो भव

deva uvāca| bhaviṣyaṁ svecchayā kuryāmiti jñātuṁ na śakyate | tadapi matprasādena jñāsyasi nirvṛto bhava

देव ने कहा — भविष्य में स्वेच्छा से क्या होगा, यह जानना संभव नहीं है; तथापि मेरी कृपा से तुम उसे जान सकोगे, निश्चिन्त रहो।

श्लोक 37 (skanda.8.15.37)

वसिष्ठ उवाच। भगवन् विदितं सर्वं भविष्यं देवसत्तम । तस्यापि तत्तथा देव यथा वा मन्यसे प्रभो

vasiṣṭha uvāca| bhagavan viditaṁ sarvaṁ bhaviṣyaṁ devasattama | tasyāpi tattathā deva yathā vā manyase prabho

वसिष्ठ ने कहा — हे भगवन्, हे देवसत्तम, भविष्य भी मुझे ज्ञात हो जाए; हे देव, हे प्रभो, वह वैसे ही हो जैसा आप उचित समझें।

श्लोक 38 (skanda.8.15.38)

देवदेव उवाच। भविष्यं नान्यथा कुर्यादिति मे निश्चिता मतिः । कथं कुर्यात्तदन्यथा

devadeva uvāca| bhaviṣyaṁ nānyathā kuryāditi me niścitā matiḥ | kathaṁ kuryāttadanyathā

देवदेव ने कहा — मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि भविष्य अन्यथा नहीं होगा; वह अन्यथा कैसे हो सकता है?

श्लोक 39 (skanda.8.15.39)

तथा तन्नात्र सन्देहो विहितं यद्यथा मया । तस्मात्तेनुग्रहं कर्ता भूयः पुत्रस्तवाव्यय

tathā tannātra sandeho vihitaṁ yadyathā mayā | tasmāttenugrahaṁ kartā bhūyaḥ putrastavāvyaya

और इसमें कोई संदेह नहीं कि मैंने जैसा विधान किया है, वह वैसा ही होगा; अतः हे अव्यय, मैं तुम्हारे पुत्र के माध्यम से पुनः अनुग्रह करूँगा।

श्लोक 40 (skanda.8.15.40)

सनत्कुमार उवाच। एवमुक्त्वा ततो देवः कपर्दी नीललोहितः । पश्यतस्तस्य विप्रर्षेः क्षणादन्तरधीयत

sanatkumāra uvāca| evamuktvā tato devaḥ kapardī nīlalohitaḥ | paśyatastasya viprarṣeḥ kṣaṇādantaradhīyata

सनत्कुमार ने कहा — ऐसा कहकर कपर्दी, नीललोहित देव उस ब्रह्मर्षि के देखते-देखते क्षणभर में अन्तर्धान हो गए।

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