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अम्बिका खण्ड · अध्याय 25

नन्दिकेश्वर-महाभाग्य

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

श्लोक 1 (skanda.8.25.1)

सनत्कुमार उवाच। ततस्तत्रागतान्देवो देवताधिपतिर्भवः । मरुतः प्राह संपूज्य कन्यार्थं सदसत्पतिः

sanatkumāra uvāca| tatastatrāgatāndevo devatādhipatirbhavaḥ | marutaḥ prāha saṁpūjya kanyārthaṁ sadasatpatiḥ

सनत्कुमार ने कहा — तब देवताओं के अधिपति भव देव ने वहाँ आए हुए मरुद्गणों का सत्कार करके, कन्या के विषय में उन सभा के स्वामी से कहा —

श्लोक 2 (skanda.8.25.2)

मरुतो ये महावेगा महासत्वा महौजसः । आमन्त्र्य नाम्ना तानीशः सशक्रः सपितामहः

maruto ye mahāvegā mahāsatvā mahaujasaḥ | āmantrya nāmnā tānīśaḥ saśakraḥ sapitāmahaḥ

जो मरुद्गण महान वेग, महान सत्त्व और महान ओज वाले थे, उन्हें शक्र और पितामह सहित ईश्वर ने नाम लेकर सम्बोधित किया —

श्लोक 3 (skanda.8.25.3)

युष्माकं सुयशां कन्यां सत्सां दिव्यरूपिणीम् । दातुमर्हथ संपूज्य स्नुषा सा नौ भविष्यति

yuṣmākaṁ suyaśāṁ kanyāṁ satsāṁ divyarūpiṇīm | dātumarhatha saṁpūjya snuṣā sā nau bhaviṣyati

आपकी सुयशा नामक कन्या, जो सती और दिव्यरूपिणी है, आप सत्कारपूर्वक हमें दें; वह हमारी पुत्रवधू होगी।

श्लोक 4 (skanda.8.25.4)

मरुत ऊचुः। त्वमस्माकं च तस्याश्च सर्वस्य जगतस्तथा । प्रभविष्णुस्त्रिलोकेश न नो याचितुमर्हसि

maruta ūcuḥ| tvamasmākaṁ ca tasyāśca sarvasya jagatastathā | prabhaviṣṇustrilokeśa na no yācitumarhasi

मरुतों ने कहा — हे त्रिलोकेश, आप हमारे, उसके और समस्त जगत् के स्वामी हैं; आपको हमसे याचना करना उचित नहीं है।

श्लोक 5 (skanda.8.25.5)

त्वयैव देया ग्राह्या च त्वन्नो गतिरनुत्तमा । मा नः परानिवेशान याचनेन विभावय

tvayaiva deyā grāhyā ca tvanno gatiranuttamā | mā naḥ parāniveśāna yācanena vibhāvaya

आपके द्वारा ही वह दी और ग्रहण की जानी चाहिए; आप ही हमारी सर्वोत्तम गति हैं। याचना करके हमें परायों के समान मत मानिए।

श्लोक 6 (skanda.8.25.6)

पिता नः कश्यपः श्रीमान् मरीचिश्च पितामहः । पितामहपिता ब्रह्मा तस्यापि त्वं पिता महान् स त्वं पितामहोस्माकं न परान् कर्त्तुमर्हसि

pitā naḥ kaśyapaḥ śrīmān marīciśca pitāmahaḥ | pitāmahapitā brahmā tasyāpi tvaṁ pitā mahān sa tvaṁ pitāmahosmākaṁ na parān karttumarhasi

हमारे पिता श्रीमान कश्यप हैं, पितामह मरीचि हैं; उन पितामह के पिता ब्रह्मा हैं, और उनके भी आप महान पिता हैं। इस प्रकार आप हमारे पितामह हैं; हमें पराया मानना आपको उचित नहीं है।

श्लोक 7 (skanda.8.25.7)

ईश्वर उवाच। अस्माकं न परा यूयं सत्यं वः परिभाषितम् । किन्तु लोकहितार्थाय मुनिदेवैः प्रभाषितम् अदत्ता न गृहीतव्या कन्या धर्मः सनातनः

īśvara uvāca| asmākaṁ na parā yūyaṁ satyaṁ vaḥ paribhāṣitam | kintu lokahitārthāya munidevaiḥ prabhāṣitam adattā na gṛhītavyā kanyā dharmaḥ sanātanaḥ

ईश्वर ने कहा — तुम हमारे लिए पराए नहीं हो, यह तुम्हारा कहना सत्य है। किन्तु लोकहित के लिए मुनियों और देवताओं ने यह घोषित किया है — बिना दी हुई कन्या ग्रहण नहीं करनी चाहिए, यही सनातन धर्म है।

श्लोक 8 (skanda.8.25.8)

सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तो देवेशो मरुद्भिर्देवसत्तमैः । सुयशां मरुतां कन्यामानयामास तत्क्षणात्

sanatkumāra uvāca| sa evamukto deveśo marudbhirdevasattamaiḥ | suyaśāṁ marutāṁ kanyāmānayāmāsa tatkṣaṇāt

सनत्कुमार ने कहा — देवश्रेष्ठ मरुद्गणों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उस देवेश ने मरुतों की कन्या सुयशा को उसी क्षण मंगवा लिया।

श्लोक 9 (skanda.8.25.9)

स्वयं होतास्य तत्रासीद् ब्रह्मा लोकपितामहः । कश्यपश्च तथोद्गाता अत्रिः साम स्वयं जगौ

svayaṁ hotāsya tatrāsīd brahmā lokapitāmahaḥ | kaśyapaśca tathodgātā atriḥ sāma svayaṁ jagau

वहाँ लोकपितामह ब्रह्मा स्वयं होता बने, कश्यप उद्गाता हुए, और अत्रि ने स्वयं सामगान गाया।

श्लोक 10 (skanda.8.25.10)

अथर्वाङ्गिरसौ देवौ ब्रह्मत्वमपि चक्रतुः । नारदः पर्वतश्चैव चित्रसेनश्च गायनः

atharvāṅgirasau devau brahmatvamapi cakratuḥ | nāradaḥ parvataścaiva citrasenaśca gāyanaḥ

अथर्वा और अंगिरा, इन दोनों देवों ने ब्रह्मा के कार्य को भी सम्पन्न किया। नारद, पर्वत, और गायक चित्रसेन —

श्लोक 11 (skanda.8.25.11)

विश्वावसुरुचिश्चैव हाहा हूहूस्तथैव च । तथा शालिशिरा यश्च विश्रुतो गण्डमण्डकः

viśvāvasuruciścaiva hāhā hūhūstathaiva ca | tathā śāliśirā yaśca viśruto gaṇḍamaṇḍakaḥ

विश्वावसु, रुचि, हाहा और हूहू, तथा शालिशिरा और प्रसिद्ध गण्डमण्डक —

श्लोक 12 (skanda.8.25.12)

ईतिश्चैवेन्द्रवाहश्च यज्ञवाहोथ दक्षिणः । एते चान्ये च गन्धर्वा जगुर्मधुरकण्ठिनः

ītiścaivendravāhaśca yajñavāhotha dakṣiṇaḥ | ete cānye ca gandharvā jagurmadhurakaṇṭhinaḥ

ईति, इन्द्रवाह, यज्ञवाह और दक्षिण — इन्होंने तथा अन्य मधुरकण्ठ गन्धर्वों ने गान किया।

श्लोक 13 (skanda.8.25.13)

उर्वशी चैव रम्भा च घृताची पूर्वचित्त्यपि । तिलोत्तमा च विश्वाची अन्याश्चाप्सरसस्तथा

urvaśī caiva rambhā ca ghṛtācī pūrvacittyapi | tilottamā ca viśvācī anyāścāpsarasastathā

उर्वशी, रम्भा, घृताची, पूर्वचित्ति, तिलोत्तमा, विश्वाची और अन्य अप्सराएँ भी —

श्लोक 14 (skanda.8.25.14)

अनृत्यन्त महाभागा नृत्तं सुरमनोहरम्

anṛtyanta mahābhāgā nṛttaṁ suramanoharam

— उन महाभाग्यशालिनियों ने देवताओं का मन हरने वाला नृत्य किया। (आगे इस श्लोक का शेष भाग मूल पाठ में खण्डित है।)

श्लोक 15 (skanda.8.25.15)

सनत्कुमार उवाच। स एवमभवद् व्यास विवाहस्तस्य धीमतः । नन्दिनो गणमुख्यस्य अनौपम्यो ह्यनिन्दितः

sanatkumāra uvāca| sa evamabhavad vyāsa vivāhastasya dhīmataḥ | nandino gaṇamukhyasya anaupamyo hyaninditaḥ

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, इस प्रकार गणमुख्य उस बुद्धिमान नन्दी का यह अनुपम, निर्दोष विवाह सम्पन्न हुआ। (मूल पाठ में इससे पूर्व एक श्लोक सर्वथा खण्डित है।)

श्लोक 16 (skanda.8.25.16)

ततः स तु कृतोद्वाहो नन्दी गत्वा महामनाः । पादौ ववन्दे देवस्य देव्या ब्रह्मण एव च शिलादस्य च लोकेशः श्रिया परममया युतः

tataḥ sa tu kṛtodvāho nandī gatvā mahāmanāḥ | pādau vavande devasya devyā brahmaṇa eva ca śilādasya ca lokeśaḥ śriyā paramamayā yutaḥ

फिर विवाह सम्पन्न होने पर वह महामना नन्दी जाकर देव, देवी और ब्रह्मा के चरणों में नमन करने लगा; और परम श्री से युक्त वह लोकेश शिलाद के भी चरणों में नमन करने लगा।

श्लोक 17 (skanda.8.25.17)

देवदेव उवाच। वरं वृणीष्व पुत्र त्वं स्नुषा चेयं तव प्रिया । वरान् ददामि ते वत्स मनसा यानभीप्ससे

devadeva uvāca| varaṁ vṛṇīṣva putra tvaṁ snuṣā ceyaṁ tava priyā | varān dadāmi te vatsa manasā yānabhīpsase

देवदेव ने कहा — हे पुत्र, वर माँगो; यह तुम्हारी प्रिय पुत्रवधू है। हे वत्स, तुम्हारा मन जो चाहे, वे वर मैं तुम्हें देता हूँ।

श्लोक 18 (skanda.8.25.18)

नन्द्युवाच। भगवन् यदि तुष्टोसि त्वयि भक्तिर्दृढास्तु मे । सदा च तुष्टो भव मे साम्बः सहगणेश्वरः

nandyuvāca| bhagavan yadi tuṣṭosi tvayi bhaktirdṛḍhāstu me | sadā ca tuṣṭo bhava me sāmbaḥ sahagaṇeśvaraḥ

नन्दी ने कहा — हे भगवन्, यदि आप प्रसन्न हैं, तो आपमें मेरी भक्ति दृढ़ हो, और अम्बिका तथा गणेश्वरों सहित आप सदा मुझसे प्रसन्न रहें।

श्लोक 19 (skanda.8.25.19)

पितरञ्चैव मे देव उत्पादकमिमं प्रभो । अनुग्रहेण युक्तेन योक्तुमर्हसि कामद

pitarañcaiva me deva utpādakamimaṁ prabho | anugraheṇa yuktena yoktumarhasi kāmada

हे देव, हे प्रभो, हे कामद, मुझे उत्पन्न करने वाले मेरे इस पिता को भी उचित अनुग्रह से युक्त कीजिए।

श्लोक 20 (skanda.8.25.20)

देवदेव उवाच। सदाहं तव नन्दीश सुतुष्टः सगणेश्वरः । पार्वत्या सहितो धीमन्निदञ्च शृणु मे वचः

devadeva uvāca| sadāhaṁ tava nandīśa sutuṣṭaḥ sagaṇeśvaraḥ | pārvatyā sahito dhīmannidañca śṛṇu me vacaḥ

देवदेव ने कहा — हे नन्दीश, गणेश्वरों और पार्वती सहित मैं सदा तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। हे बुद्धिमान, अब मेरा यह वचन सुनो।

श्लोक 21 (skanda.8.25.21)

सदेष्टश्च वरिष्टश्च परमैश्वर्यसंयुतः । महायोगी महेष्वासो महाबलपराक्रमः

sadeṣṭaśca variṣṭaśca paramaiśvaryasaṁyutaḥ | mahāyogī maheṣvāso mahābalaparākramaḥ

तुम सदा प्रिय, सर्वश्रेष्ठ, परम ऐश्वर्य से सम्पन्न, महायोगी, महाधनुर्धर, महाबल और पराक्रम वाले बनो।

श्लोक 22 (skanda.8.25.22)

अजय्यश्चैव जेता च पूज्येज्यश्च सदा भव । अहं यत्र भवांस्तत्र यत्र त्वं तत्र चाप्यहम्

ajayyaścaiva jetā ca pūjyejyaśca sadā bhava | ahaṁ yatra bhavāṁstatra yatra tvaṁ tatra cāpyaham

अजेय और विजेता, पूज्य और यज्य सदा बनो। मैं जहाँ हूँ, वहाँ तुम भी हो; और तुम जहाँ हो, वहाँ मैं भी हूँ।

श्लोक 23 (skanda.8.25.23)

यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु । अयञ्च ते पिता पुत्र परमैश्वर्यसंयुतः

yastvāṁ dveṣṭi sa māṁ dveṣṭi yastvāmanu sa māmanu | ayañca te pitā putra paramaiśvaryasaṁyutaḥ

जो तुमसे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है; जो तुम्हारा अनुसरण करता है, वह मेरा अनुसरण करता है। हे पुत्र, तुम्हारा यह पिता भी परम ऐश्वर्य से सम्पन्न होगा।

श्लोक 24 (skanda.8.25.24)

भविष्यति गणाध्यक्षो महागणपतिर्मम । विमानं चास्य वैभ्राजं कामगं सर्वकाञ्चनम्

bhaviṣyati gaṇādhyakṣo mahāgaṇapatirmama | vimānaṁ cāsya vaibhrājaṁ kāmagaṁ sarvakāñcanam

— मेरा गणाध्यक्ष, महागणपति बनेगा। उसे मैं इच्छानुसार चलने वाला, सर्वस्वर्णमय वैभ्राज नामक विमान —

श्लोक 25 (skanda.8.25.25)

उपेतं भवनैर्दिव्यैः प्रयच्छामि जनावृतम् । तेनायं सर्वलोकेषु चरिष्यति यथेप्सितम्

upetaṁ bhavanairdivyaiḥ prayacchāmi janāvṛtam | tenāyaṁ sarvalokeṣu cariṣyati yathepsitam

— दिव्य भवनों से युक्त और जनों से भरा हुआ प्रदान करता हूँ। उसके द्वारा वह समस्त लोकों में इच्छानुसार विचरण करेगा।

श्लोक 26 (skanda.8.25.26)

स्थानं श्रीपर्वते चास्य भविष्यति सुपूजितम् । भृगौ तस्मिँश्च यः प्राणाँस्त्यक्ष्यते वै सुधार्मिकः स कामचारी वैभ्राजे गणपोस्य भविष्यति

sthānaṁ śrīparvate cāsya bhaviṣyati supūjitam | bhṛgau tasmi~śca yaḥ prāṇā~styakṣyate vai sudhārmikaḥ sa kāmacārī vaibhrāje gaṇaposya bhaviṣyati

श्रीपर्वत पर उसका अत्यन्त पूजित स्थान होगा। उस पर्वत के गिरिशिखर से जो सुधार्मिक पुरुष अपने प्राण त्यागेगा, वह वैभ्राज में इच्छानुसार विचरण करने वाला उसका गण बनेगा।

श्लोक 27 (skanda.8.25.27)

सनत्कुमार उवाच। ततो देवी महाभागा शैलादेर्वरयद्वरम् । सोब्रवीत्त्वयि भक्तिर्मे सदैवानपगा भवेत्

sanatkumāra uvāca| tato devī mahābhāgā śailādervarayadvaram | sobravīttvayi bhaktirme sadaivānapagā bhavet

सनत्कुमार ने कहा — फिर महाभाग्यशालिनी देवी ने शिलाद को भी वर दिया। उन्होंने कहा — आपमें मेरी भक्ति सदा अटूट रहे।

श्लोक 28 (skanda.8.25.28)

ततो मरुत्सुता चैव उभाभ्यामभि चोदिता । वरान् वृणु यथेष्टं वै ताविदं प्रत्युवाच ह

tato marutsutā caiva ubhābhyāmabhi coditā | varān vṛṇu yatheṣṭaṁ vai tāvidaṁ pratyuvāca ha

फिर मरुतों की पुत्री को भी उन दोनों ने प्रेरित किया — 'इच्छानुसार वर माँगो।' उसने उनसे यह उत्तर दिया —

श्लोक 29 (skanda.8.25.29)

युवयोरस्तु भक्तिर्मे तथा भर्त्तरि चैव हि । नित्यं चानपगा स्यान्मे धर्मे च मतिरुत्तमा एतमिच्छामि देवेशौ वरं वरसहस्रदौ

yuvayorastu bhaktirme tathā bharttari caiva hi | nityaṁ cānapagā syānme dharme ca matiruttamā etamicchāmi deveśau varaṁ varasahasradau

— आप दोनों में मेरी भक्ति हो, और अपने पति में भी। वह सदा अटूट रहे, और धर्म में मेरी उत्तम बुद्धि रहे। हे सहस्रों वर देने वाले देवेशो, यही वर मैं चाहती हूँ।

श्लोक 30 (skanda.8.25.30)

सनत्कुमार उवाच। ततस्तावेवमेतत्ते भवितेति शुचिस्मिते । ऊचतुर्मुदितौ देवौ स्नुषान्तां वरवर्णिनीम्

sanatkumāra uvāca| tatastāvevametatte bhaviteti śucismite | ūcaturmuditau devau snuṣāntāṁ varavarṇinīm

सनत्कुमार ने कहा — तब उन दोनों प्रसन्न देवों ने पवित्र-हास्य वाली, वरवर्णिनी उस पुत्रवधू से कहा — 'ऐसा ही होगा।'

श्लोक 31 (skanda.8.25.31)

नारायणं समालोक्य ब्रह्माणं च तथा हरः । अद्यप्रभृति नन्दीशो युवाभ्यामादृतः सदा

nārāyaṇaṁ samālokya brahmāṇaṁ ca tathā haraḥ | adyaprabhṛti nandīśo yuvābhyāmādṛtaḥ sadā

नारायण और ब्रह्मा की ओर देखकर हर ने कहा — आज से नन्दीश आप दोनों के द्वारा सदा आदर पाने वाला होगा।

श्लोक 32 (skanda.8.25.32)

प्रभुत्वेन हि देवानां प्रतीहारत्वमेष्यति । युवयोर्मयि या भक्तिस्तथा स्नेहोथ नन्दिनि

prabhutvena hi devānāṁ pratīhāratvameṣyati | yuvayormayi yā bhaktistathā snehotha nandini

वह देवताओं के प्रभुत्व से द्वारपाल का पद प्राप्त करेगा। मुझमें तुम दोनों की जो भक्ति है, वही स्नेह नन्दी में भी हो। (इससे आगे मूल पाठ का एक श्लोक सर्वथा खण्डित है।)

श्लोक 33 (skanda.8.25.33)

एवं भवतु देवेश नात्र कार्या विचारणा । गणाश्चास्य ततोभ्येत्य सर्वे देवप्रियेप्सया

evaṁ bhavatu deveśa nātra kāryā vicāraṇā | gaṇāścāsya tatobhyetya sarve devapriyepsayā

'हे देवेश, ऐसा ही हो, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है।' फिर देव को प्रसन्न करने की इच्छा से उसके सभी गण वहाँ आकर —

श्लोक 34 (skanda.8.25.34)

वरं ददुर्महासत्वाः स वव्रे काञ्चनप्रभः । युष्मासु मम भक्तिश्च ऐश्वर्यञ्चापि संमतम् वंद्याश्च यूयं सर्वे मे प्रियो युष्माकमेव च

varaṁ dadurmahāsatvāḥ sa vavre kāñcanaprabhaḥ | yuṣmāsu mama bhaktiśca aiśvaryañcāpi saṁmatam vaṁdyāśca yūyaṁ sarve me priyo yuṣmākameva ca

— उन महाबली गणों ने उसे वर दिया, और स्वर्णप्रभ नन्दी ने माँगा — तुम सबमें मेरी भक्ति हो, और ऐश्वर्य भी स्वीकृत हो; तुम सब मेरे लिए वन्दनीय बनो, और मैं भी तुम्हारा प्रिय बनूँ।

श्लोक 35 (skanda.8.25.35)

गणा ऊचुः। भवान् यन्ता ऽनुमन्ता च गतिरागतिरेव च । अस्माकमीशः सर्वेषां देवानामपि चेश्वरः

gaṇā ūcuḥ| bhavān yantā 'numantā ca gatirāgatireva ca | asmākamīśaḥ sarveṣāṁ devānāmapi ceśvaraḥ

गणों ने कहा — आप ही हमारे नियन्ता, अनुमोदक, गति और आगति हैं। आप हम सबके स्वामी हैं, और देवताओं के भी स्वामी हैं।

श्लोक 36 (skanda.8.25.36)

कुष्माण्डानां वरिष्ठश्च रुद्राणां त्वं महाबलः । ईतीनां द्वारपालश्च प्रमथानां तथैव च

kuṣmāṇḍānāṁ variṣṭhaśca rudrāṇāṁ tvaṁ mahābalaḥ | ītīnāṁ dvārapālaśca pramathānāṁ tathaiva ca

आप कुष्माण्डों में श्रेष्ठ, रुद्रों में महाबली, ईतियों के द्वारपाल और प्रमथों के भी द्वारपाल हैं।

श्लोक 37 (skanda.8.25.37)

महाबलो महायोगी सेनानीस्त्वं हि नो मतः । त्वं भूतो भूतनेता च नायकोथ विनायकः

mahābalo mahāyogī senānīstvaṁ hi no mataḥ | tvaṁ bhūto bhūtanetā ca nāyakotha vināyakaḥ

महाबली, महायोगी, आप ही हमारे सेनापति माने गए हैं। आप भूत हैं, भूतों के नेता हैं, नायक और विनायक हैं।

श्लोक 38 (skanda.8.25.38)

ग्रहाणामधिपश्चैव रुद्रदण्डधरस्तथा । त्वमग्रयोधी शत्रुघ्नस्त्वं वीरस्त्वं दिवस्पतिः

grahāṇāmadhipaścaiva rudradaṇḍadharastathā | tvamagrayodhī śatrughnastvaṁ vīrastvaṁ divaspatiḥ

आप ग्रहों के अधिपति और रुद्र के दण्ड को धारण करने वाले हैं। आप अग्रयोद्धा, शत्रुनाशक, वीर और स्वर्ग के स्वामी हैं।

श्लोक 39 (skanda.8.25.39)

महानुभावस्त्वञ्चैव क्षीरोदनिलयश्च ह । जप्येश्वरनिकेतश्च जप्येश्वरविभावितः

mahānubhāvastvañcaiva kṣīrodanilayaśca ha | japyeśvaraniketaśca japyeśvaravibhāvitaḥ

आप महाप्रभावशाली और क्षीरसागर में निवास करने वाले हैं। आपका निवास जप्येश्वर में है, और आप जप्येश्वर में ही प्रकट हुए।

श्लोक 40 (skanda.8.25.40)

भावनः सर्वभूतानां वरदो वरदाचितः । अस्माकं वरदश्चैव भव भूतेश्वर प्रभो

bhāvanaḥ sarvabhūtānāṁ varado varadācitaḥ | asmākaṁ varadaścaiva bhava bhūteśvara prabho

आप समस्त प्राणियों के पालक, वरदाता और वरदाताओं द्वारा पूजित हैं। हे भूतेश्वर, हे प्रभो, हमें भी वर देने वाले बनिए।

श्लोक 41 (skanda.8.25.41)

सनत्कुमार उवाच। स एवं गणपैः सर्वैः स्तुतो नन्दीश्वरः प्रभुः । उवाच प्रणतः सर्वान् ब्रूत किं करवाणि वः

sanatkumāra uvāca| sa evaṁ gaṇapaiḥ sarvaiḥ stuto nandīśvaraḥ prabhuḥ | uvāca praṇataḥ sarvān brūta kiṁ karavāṇi vaḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार समस्त गणपतियों द्वारा स्तुत उस प्रभु नन्दीश्वर ने झुककर सबसे कहा — बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?

श्लोक 42 (skanda.8.25.42)

त एवमुक्ता गणपाः सर्व एव महाबलाः । ऊचुस्तं दिव्यभावज्ञा देवदेवस्य सन्निधौ

ta evamuktā gaṇapāḥ sarva eva mahābalāḥ | ūcustaṁ divyabhāvajñā devadevasya sannidhau

इस प्रकार पूछे जाने पर वे सभी महाबली, दिव्य भाव को जानने वाले गणपति देवदेव की उपस्थिति में उनसे बोले —

श्लोक 43 (skanda.8.25.43)

त्वमस्माकं गणाध्यक्षः कृतो देवेन शंभुना । अस्माभिश्चाभिषिक्तस्त्वं नायको धर्मदायकः

tvamasmākaṁ gaṇādhyakṣaḥ kṛto devena śaṁbhunā | asmābhiścābhiṣiktastvaṁ nāyako dharmadāyakaḥ

आप देव शम्भु द्वारा हमारे गणाध्यक्ष बनाए गए हैं, और हमारे द्वारा अभिषिक्त, हमारे नायक और धर्मदाता हैं।

श्लोक 44 (skanda.8.25.44)

स त्वं शिवश्च सौम्यश्च गुणवानगुणेष्वपि । क्षमाशौचदमोपेतो भव नः प्रियकृत् सदा

sa tvaṁ śivaśca saumyaśca guṇavānaguṇeṣvapi | kṣamāśaucadamopeto bhava naḥ priyakṛt sadā

अतः आप शिव, सौम्य, गुणहीनों में भी गुणवान, क्षमा-शौच-दम से युक्त होकर सदा हमारे लिए प्रियकारी बनें।

श्लोक 45 (skanda.8.25.45)

सनत्कुमार उवाच। एवमुक्तस्तदा सर्वान् प्रणम्य बहुमानतः । शिरस्यञ्जलिमाधाय गणपानस्तुवत्तदा

sanatkumāra uvāca| evamuktastadā sarvān praṇamya bahumānataḥ | śirasyañjalimādhāya gaṇapānastuvattadā

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर उन्होंने सबको बहुमानपूर्वक प्रणाम किया, और सिर पर अंजलि रखकर गणपतियों की स्तुति की।

श्लोक 46 (skanda.8.25.46)

नन्द्युवाच। नमो वः सर्वभूतेभ्यो नमो योगिभ्य एव च । नमश्चाप्यनिकेतेभ्यो योगीशेभ्यो नमो नमः

nandyuvāca| namo vaḥ sarvabhūtebhyo namo yogibhya eva ca | namaścāpyaniketebhyo yogīśebhyo namo namaḥ

नन्दी ने कहा — तुम सब भूतों को नमस्कार है, योगियों को भी नमस्कार है। घररहितों को भी नमस्कार है, और योगीश्वरों को नमस्कार-नमस्कार है।

श्लोक 47 (skanda.8.25.47)

नमः कामचरेभ्यश्च नम उग्रेभ्य एव च । मृत्युभ्यश्च यमेभ्यश्च कालेभ्यश्च नमो नमः

namaḥ kāmacarebhyaśca nama ugrebhya eva ca | mṛtyubhyaśca yamebhyaśca kālebhyaśca namo namaḥ

इच्छानुसार विचरने वालों को नमस्कार है, उग्रों को भी नमस्कार है। मृत्युओं, यमों और कालों को नमस्कार-नमस्कार है।

श्लोक 48 (skanda.8.25.48)

नमः काञ्चनमालेभ्यः सर्वधर्मभ्य एव च । नमो वो वधःकृद्भ्यश्च अवध्येभ्यस्तथैव च

namaḥ kāñcanamālebhyaḥ sarvadharmabhya eva ca | namo vo vadhaḥkṛdbhyaśca avadhyebhyastathaiva ca

स्वर्णमाला वालों को नमस्कार है, समस्त धर्मों को भी नमस्कार है। हे संहारकर्ताओं, तुम्हें नमस्कार है, और अवध्यों को भी नमस्कार है।

श्लोक 49 (skanda.8.25.49)

नमः परमयोगिभ्यो जटिभ्यश्च नमो नमः । नमो वो दृश्यरूपेभ्यो विकृतेभ्यस्तथैव च

namaḥ paramayogibhyo jaṭibhyaśca namo namaḥ | namo vo dṛśyarūpebhyo vikṛtebhyastathaiva ca

परम योगियों को नमस्कार है, जटाधारियों को नमस्कार-नमस्कार है। हे दृश्यरूप वालों, तुम्हें नमस्कार है, और विकृतरूप वालों को भी नमस्कार है।

श्लोक 50 (skanda.8.25.50)

नमो वल्कलत्रासोभ्यः कृत्तिवासोभ्य एव च । नमः श्वेताम्बरस्रग्भ्यश्चित्रस्रग्भ्यो नमो नमः

namo valkalatrāsobhyaḥ kṛttivāsobhya eva ca | namaḥ śvetāmbarasragbhyaścitrasragbhyo namo namaḥ

वल्कल पहनने वालों को नमस्कार है, चर्मवस्त्रधारियों को भी नमस्कार है। श्वेतमाला वालों को नमस्कार है, विचित्र माला वालों को नमस्कार-नमस्कार है।

श्लोक 51 (skanda.8.25.51)

धावद्भ्यश्च द्रवद्भ्यश्च संस्थितेभ्यो नमो नमः । नमो मुनिभ्यो गायद्भ्यो जपद्भ्यश्च नमो नमः

dhāvadbhyaśca dravadbhyaśca saṁsthitebhyo namo namaḥ | namo munibhyo gāyadbhyo japadbhyaśca namo namaḥ

दौड़ने वालों, बहने वालों और स्थिर रहने वालों को नमस्कार-नमस्कार है। गाने वाले और जप करने वाले मुनियों को नमस्कार-नमस्कार है।

श्लोक 52 (skanda.8.25.52)

नमः शरभरूपेभ्यः शतरूपेभ्य एव च । नमः पर्वतरूपेभ्यो व्याघ्ररूपेभ्य एव च

namaḥ śarabharūpebhyaḥ śatarūpebhya eva ca | namaḥ parvatarūpebhyo vyāghrarūpebhya eva ca

शरभरूप वालों को नमस्कार है, शतरूप वालों को भी नमस्कार है। पर्वतरूप वालों को नमस्कार है, व्याघ्ररूप वालों को भी नमस्कार है।

श्लोक 53 (skanda.8.25.53)

नमो मार्जाररूपेभ्यः काकोलूकेभ्य एव च । नमो दैवतरूपेभ्यः पवनेभ्यस्तथैव च

namo mārjārarūpebhyaḥ kākolūkebhya eva ca | namo daivatarūpebhyaḥ pavanebhyastathaiva ca

बिल्लीरूप वालों को नमस्कार है, कौवे और उल्लू रूप वालों को भी नमस्कार है। देवतारूप वालों को नमस्कार है, वायुरूप वालों को भी नमस्कार है।

श्लोक 54 (skanda.8.25.54)

नमोग्निभ्यस्तथाद्भ्यश्च वरुणेभ्यस्तथैव च । नमो धनेशरूपेभ्यः सर्वरूपेभ्य एव च

namognibhyastathādbhyaśca varuṇebhyastathaiva ca | namo dhaneśarūpebhyaḥ sarvarūpebhya eva ca

अग्नियों को नमस्कार है, जलों को भी, वरुणों को भी। धनेशरूप वालों को नमस्कार है, समस्त रूपों वालों को भी नमस्कार है।

श्लोक 55 (skanda.8.25.55)

नमश्चोदरवक्त्रेभ्यः सर्ववक्त्रेभ्य एव च । नमो वामनरूपेभ्यः कामरूपेभ्य एव च

namaścodaravaktrebhyaḥ sarvavaktrebhya eva ca | namo vāmanarūpebhyaḥ kāmarūpebhya eva ca

उदर में मुख वालों को नमस्कार है, सर्वत्र मुख वालों को भी नमस्कार है। वामनरूप वालों को नमस्कार है, इच्छानुसार रूप धारण करने वालों को भी नमस्कार है।

श्लोक 56 (skanda.8.25.56)

देवासुरमनुष्याणामाप्यायिभ्यो नमो नमः । नमो वः सर्वदेवानां नमो वः सर्वतः शुभाः

devāsuramanuṣyāṇāmāpyāyibhyo namo namaḥ | namo vaḥ sarvadevānāṁ namo vaḥ sarvataḥ śubhāḥ

देवों, असुरों और मनुष्यों को तृप्त करने वालों को नमस्कार-नमस्कार है। हे समस्त देवताओं, तुम्हें नमस्कार है; हे सर्वत्र शुभ, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 57 (skanda.8.25.57)

ग्रहेभ्यश्च नमो वोस्तु मोक्षेभ्यश्च नमस्तथा । शुभेभ्यश्च नमो वोस्तु अशुभेभ्यस्तथैव च मम सौम्या शिवाश्चैव भवन्तु गणनायकाः

grahebhyaśca namo vostu mokṣebhyaśca namastathā | śubhebhyaśca namo vostu aśubhebhyastathaiva ca mama saumyā śivāścaiva bhavantu gaṇanāyakāḥ

ग्रहों को नमस्कार हो, मोक्षों को भी नमस्कार हो। शुभों को नमस्कार हो, अशुभों को भी नमस्कार हो। मेरे गणनायक सदा सौम्य और शिव (मंगलमय) हों।

श्लोक 58 (skanda.8.25.58)

इति स्तुता गणपतयो महाबलाः शुभैर्वचोभिः सुरशत्रुनाशनाः । दिशन्तु मे सुखमतुलं सुखप्रदा बलञ्च वीर्यं स्थिरताञ्च संयुगे

iti stutā gaṇapatayo mahābalāḥ śubhairvacobhiḥ suraśatrunāśanāḥ | diśantu me sukhamatulaṁ sukhapradā balañca vīryaṁ sthiratāñca saṁyuge

इस प्रकार शुभ वचनों से स्तुत, देवशत्रुओं के नाशक, महाबली गणपति मुझे अतुल सुख, बल, वीर्य और युद्ध में स्थिरता प्रदान करें, वे सुखप्रद हैं।

श्लोक 59 (skanda.8.25.59)

तपोक्षयं स्थानमथातुलां गतिं यशस्तथा बहु धर्मनित्यताम् । दिशन्तु सर्वं मनसेप्सितञ्च मे सुरेश्वराः पुष्टिमनुत्तमां तथा

tapokṣayaṁ sthānamathātulāṁ gatiṁ yaśastathā bahu dharmanityatām | diśantu sarvaṁ manasepsitañca me sureśvarāḥ puṣṭimanuttamāṁ tathā

वे देवेश्वर मुझे अक्षय तप, स्थान, अनुपम गति, महान यश, धर्म में नित्यता, तथा जो कुछ भी मैं मन से चाहूँ, वह सब, और अनुपम पुष्टि भी प्रदान करें।

श्लोक 60 (skanda.8.25.60)

सनत्कुमार उवाच। इमौ नन्दिगणेन्द्राणां स्तवौ योध्येति नित्यशः । सोश्वमेधावभृथवान् सर्वपापैः प्रमुच्यते

sanatkumāra uvāca| imau nandigaṇendrāṇāṁ stavau yodhyeti nityaśaḥ | sośvamedhāvabhṛthavān sarvapāpaiḥ pramucyate

सनत्कुमार ने कहा — जो नन्दी और गणेन्द्रों के इन दोनों स्तोत्रों का नित्य अध्ययन करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान के फल को पाकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 61 (skanda.8.25.61)

सन्ध्यायामपरस्यान्तु जपन् पापं दिवाकृतम् । पूर्वस्याँ च जपँश्चापि सर्वं रात्रिकृतं क्षिपेत्

sandhyāyāmaparasyāntu japan pāpaṁ divākṛtam | pūrvasyā~ ca japa~ścāpi sarvaṁ rātrikṛtaṁ kṣipet

सायं संध्या में जप करने से दिन में किए गए पाप का नाश होता है, और प्रातः संध्या में जप करने से रात्रि में किए गए समस्त पाप का नाश होता है।

श्लोक 62 (skanda.8.25.62)

सनत्कुमार उवाच। ततस्ते गणपाः सर्वे संस्तुतास्तेन धीमता । विसृष्टाश्च तदा जग्मुः प्रणिपत्य वृषध्वजम्

sanatkumāra uvāca| tataste gaṇapāḥ sarve saṁstutāstena dhīmatā | visṛṣṭāśca tadā jagmuḥ praṇipatya vṛṣadhvajam

सनत्कुमार ने कहा — फिर उस बुद्धिमान द्वारा स्तुत वे सभी गणपति वृषभध्वज को प्रणाम करके, विदा होकर चले गए।

श्लोक 63 (skanda.8.25.63)

देवाश्च सर्वलोकाश्च ततो देवः स्वयं भवः । सृष्ट्वा नन्दीश्वरगृहं प्रदाय च महामनाः

devāśca sarvalokāśca tato devaḥ svayaṁ bhavaḥ | sṛṣṭvā nandīśvaragṛhaṁ pradāya ca mahāmanāḥ

देवगण और समस्त लोकवासी भी विदा हुए। फिर स्वयं देव भव ने, उस महामना ने, नन्दीश्वर के लिए एक भवन रचकर उसे प्रदान किया,

श्लोक 64 (skanda.8.25.64)

ईप्सितं सह देव्या वै जगाम स्थानमव्ययम् । य इदं नन्दिनो जन्म वरदानं तथैव च

īpsitaṁ saha devyā vai jagāma sthānamavyayam | ya idaṁ nandino janma varadānaṁ tathaiva ca

और देवी सहित अपने वांछित अविनाशी स्थान को चले गए। जो कोई नन्दी के इस जन्म और वरदान की कथा —

श्लोक 65 (skanda.8.25.65)

अभिषेकं विवाहश्च पठेद् वा श्रावयीत वा । ब्राह्मणः स मृतो याति नन्दीश्वरसलोकताम्

abhiṣekaṁ vivāhaśca paṭhed vā śrāvayīta vā | brāhmaṇaḥ sa mṛto yāti nandīśvarasalokatām

— उनके अभिषेक और विवाह को पढ़े या सुनाए, वह ब्राह्मण मरणोपरान्त नन्दीश्वर के लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 66 (skanda.8.25.66)

यो नियतस्तु पठेत् प्रयतात्मा सर्वमिदं प्रणतो भवभक्त्या । सोपि गतः परलोकविचारी नन्दिसमोनुचरो हि

yo niyatastu paṭhet prayatātmā sarvamidaṁ praṇato bhavabhaktyā | sopi gataḥ paralokavicārī nandisamonucaro hi

जो संयतचित्त होकर, भवभक्ति से नत होकर, यह सब नित्य पढ़ता है, वह भी परलोक का विचारशील होकर, नन्दी के समान अनुचर बनता है। (आगे इस श्लोक का अंश मूल पाठ में खण्डित है।)

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