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अम्बिका खण्ड · अध्याय 26

वाराणसी-शून्यकरण

अध्याय 25अध्याय-सूचीअध्याय 27

श्लोक 1 (skanda.8.26.1)

सनत्कुमार उवाच। एवं नन्दीश्वरो व्यास उत्पन्नोनुचरश्च ह । अभवद् देवदेवस्य सेनापत्येभिषेचितः

sanatkumāra uvāca| evaṁ nandīśvaro vyāsa utpannonucaraśca ha | abhavad devadevasya senāpatyebhiṣecitaḥ

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, इस प्रकार नन्दीश्वर उत्पन्न होकर अनुचर बने, और देवदेव के सेनापति पद पर अभिषिक्त हुए।

श्लोक 2 (skanda.8.26.2)

व्यास उवाच। देव्या सहाथ भगवानासीनस्तत्र कामदः । अकरोत् किं महादेव एतदिच्छामि वेदितुम्

vyāsa uvāca| devyā sahātha bhagavānāsīnastatra kāmadaḥ | akarot kiṁ mahādeva etadicchāmi veditum

व्यास ने कहा — फिर देवी के साथ वहाँ बैठे हुए भगवान कामद महादेव ने क्या किया? यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.8.26.3)

सनत्कुमार उवाच। भगवान् हिमवच्छृङ्गे शर्वो देव्याः प्रियेप्सया । गणेशैर्विविधाकारैर्हासं सञ्जनयन्मुहुः

sanatkumāra uvāca| bhagavān himavacchṛṅge śarvo devyāḥ priyepsayā | gaṇeśairvividhākārairhāsaṁ sañjanayanmuhuḥ

सनत्कुमार ने कहा — हिमालय के शिखर पर भगवान शर्व, देवी को प्रसन्न करने की इच्छा से, विविध रूपधारी गणेशों के साथ बार-बार हास्य उत्पन्न करते हुए —

श्लोक 4 (skanda.8.26.4)

देवीं बालेन्दुतिलको रामयञ्च रराम च । महानुभावैः सर्वज्ञैः कामरूपधरैः शुभैः

devīṁ bālendutilako rāmayañca rarāma ca | mahānubhāvaiḥ sarvajñaiḥ kāmarūpadharaiḥ śubhaiḥ

— बालचन्द्र के तिलक वाले वे देवी को रमाते हुए स्वयं भी उन महाप्रभावशाली, सर्वज्ञ, इच्छानुसार रूपधारी, शुभ गणों के साथ रमण करने लगे।

श्लोक 5 (skanda.8.26.5)

अथ देव्याससादैका मातरं परमेश्वरी । आसीनां काञ्चने शुभ्रे स्वादासने परमार्चिते

atha devyāsasādaikā mātaraṁ parameśvarī | āsīnāṁ kāñcane śubhre svādāsane paramārcite

फिर वह परमेश्वरी देवी अकेली अपनी माता के पास गईं, जो उज्ज्वल स्वर्णमय, अत्यन्त पूजित, सुखद आसन पर बैठी थीं।

श्लोक 6 (skanda.8.26.6)

साथ दृष्टवा सतीं देवीमागतां शुभरूपिणीम् । आसनेन महार्हेण सम्भावय दनिन्दिताम्

sātha dṛṣṭavā satīṁ devīmāgatāṁ śubharūpiṇīm | āsanena mahārheṇa sambhāvaya daninditām

उन्होंने आई हुई शुभरूपिणी सती देवी को देखकर, उस निर्दोष देवी का अत्यन्त योग्य आसन से सत्कार किया।

श्लोक 7 (skanda.8.26.7)

आसीनां तां च सोवाच मेना हिमवतः प्रिया । चिरस्यागमनं ह्यद्य तव पुत्रि शुभेक्षणे

āsīnāṁ tāṁ ca sovāca menā himavataḥ priyā | cirasyāgamanaṁ hyadya tava putri śubhekṣaṇe

हिमवान की प्रिय मेना ने उस बैठी हुई से कहा — हे पुत्रि, हे शुभनयने, आज तो बहुत दिनों बाद तुम्हारा आगमन हुआ है।

श्लोक 8 (skanda.8.26.8)

दरिद्रक्रीडनैस्तेद्य भर्ता क्रीडति संगतः । ये दरिद्रा भवन्ति स्म तथैव च निराश्रयाः उमे त एवं क्रीडन्ति यथा तव पतिः शुभे

daridrakrīḍanaistedya bhartā krīḍati saṁgataḥ | ye daridrā bhavanti sma tathaiva ca nirāśrayāḥ ume ta evaṁ krīḍanti yathā tava patiḥ śubhe

आज तुम्हारे पति दरिद्र खेलने वालों के साथ मिलकर खेल रहे हैं। हे उमा, जो दरिद्र और आश्रयहीन होते हैं, वे ही ऐसे खेलते हैं, जैसे हे शुभे, तुम्हारे पति खेलते हैं।

श्लोक 9 (skanda.8.26.9)

सनत्कुमार उवाच। सैवमुक्ता तु मात्राथ नातिहृष्टमना भवत् । महत्या क्षमया युक्ता न किञ्चित्तामुवाच ह

sanatkumāra uvāca| saivamuktā tu mātrātha nātihṛṣṭamanā bhavat | mahatyā kṣamayā yuktā na kiñcittāmuvāca ha

सनत्कुमार ने कहा — माता के इस प्रकार कहने पर वे अधिक प्रसन्नचित्त नहीं हुईं, फिर भी महान क्षमा से युक्त होकर उन्होंने माता से कुछ नहीं कहा।

श्लोक 10 (skanda.8.26.10)

विसृष्टा सा तदा मात्रा गत्वा देवमुवाच ह । भगवन्देवदेवेश नेह वत्स्यामि भूधरे । अन्यं वृणु ममावासं भुवनेश महाद्युते

visṛṣṭā sā tadā mātrā gatvā devamuvāca ha | bhagavandevadeveśa neha vatsyāmi bhūdhare | anyaṁ vṛṇu mamāvāsaṁ bhuvaneśa mahādyute

माता से विदा होकर वे देव के पास जाकर बोलीं — हे भगवन्, हे देवदेवेश, मैं यहाँ इस पर्वत पर नहीं रहूँगी। हे भुवनेश, हे महाद्युते, मेरे लिए कोई अन्य निवास चुनिए।

श्लोक 11 (skanda.8.26.11)

देवदेव उवाच। सदा त्वमुच्यमाना वै मया वासार्थमीश्वरि । अन्यत्र रोचितवती नावासं देवि कर्हिचित्

devadeva uvāca| sadā tvamucyamānā vai mayā vāsārthamīśvari | anyatra rocitavatī nāvāsaṁ devi karhicit

देवदेव ने कहा — हे ईश्वरि, यद्यपि मैंने सदा तुमसे निवास के विषय में कहा, फिर भी हे देवि, तुमने पहले कभी अन्यत्र निवास की इच्छा नहीं की।

श्लोक 12 (skanda.8.26.12)

इदानीं स्वयमेव त्वं वासमन्यत्र शोभने । कस्मान्मृगयसे देवि ब्रूहि तन्मे शुचिस्मिते

idānīṁ svayameva tvaṁ vāsamanyatra śobhane | kasmānmṛgayase devi brūhi tanme śucismite

अब हे शोभने, हे देवि, तुम स्वयं ही किस कारण अन्यत्र निवास ढूँढ़ रही हो? हे शुचिस्मिते, वह मुझे बताओ।

श्लोक 13 (skanda.8.26.13)

देव्युवाच। गृहं गताहं देवेश पितुरद्य महात्मनः । दृष्टा च मे तत्र माता विजने लोकभावनी

devyuvāca| gṛhaṁ gatāhaṁ deveśa pituradya mahātmanaḥ | dṛṣṭā ca me tatra mātā vijane lokabhāvanī

देवी ने कहा — हे देवेश, आज मैं अपने महात्मा पिता के घर गई थी। वहाँ मैंने एकान्त में लोकों का पालन करने वाली अपनी माता को देखा।

श्लोक 14 (skanda.8.26.14)

आसनादिभिरभ्यर्च्य सा मामेवमभाषत । उमे तव सदा भर्ता दरिद्रक्रीडनैः शुभे

āsanādibhirabhyarcya sā māmevamabhāṣata | ume tava sadā bhartā daridrakrīḍanaiḥ śubhe

आसन आदि से मेरा सत्कार करके उन्होंने मुझसे यह कहा — हे उमा, हे शुभे, तुम्हारे पति सदा दरिद्रों के साथ खेलते हैं —

श्लोक 15 (skanda.8.26.15)

क्रीडते न हि देवानां क्रीडा भवति तादृशी । यत्किल त्वं महादेव गणैस्तैर्विविधैः शुभैः रमसे तदनिष्टं हि मम मातुर्वृषध्वज

krīḍate na hi devānāṁ krīḍā bhavati tādṛśī | yatkila tvaṁ mahādeva gaṇaistairvividhaiḥ śubhaiḥ ramase tadaniṣṭaṁ hi mama māturvṛṣadhvaja

— देवताओं की ऐसी क्रीड़ा नहीं होती। हे वृषभध्वज, आप जो उन विविध शुभ गणों के साथ रमण करते हैं, वह मेरी माता को अप्रिय है।

श्लोक 16 (skanda.8.26.16)

सनत्कुमार उवाच। ततो देवः प्रहस्याह देवीं हासयितुं प्रभुः । एवमेतन्न सन्देहः कस्मान्मन्युरभूत्तव

sanatkumāra uvāca| tato devaḥ prahasyāha devīṁ hāsayituṁ prabhuḥ | evametanna sandehaḥ kasmānmanyurabhūttava

सनत्कुमार ने कहा — तब प्रभु देव ने हँसकर, देवी को हँसाने के लिए, कहा — यह सत्य है, इसमें संदेह नहीं; किन्तु तुम्हें इस बात पर क्रोध क्यों हुआ?

श्लोक 17 (skanda.8.26.17)

कृत्तिवासा ह्यवासा वा श्मशाननिलयश्च ह । अनिकेतो ह्यरण्येषु पर्वतानां गुहासु च

kṛttivāsā hyavāsā vā śmaśānanilayaśca ha | aniketo hyaraṇyeṣu parvatānāṁ guhāsu ca

मैं चर्मवस्त्रधारी और घररहित हूँ, श्मशान में निवास करता हूँ, और वनों तथा पर्वतों की गुफाओं में बिना घर के रहता हूँ।

श्लोक 18 (skanda.8.26.18)

विचरामि गणैर्नग्नैर्वृतोम्भोजविलोचने । मा क्रुधो देवि मातुस्त्वं तथ्यं मातावदत्तव नहि मातृसमो बन्धुर्जन्तूनामस्ति शोभने

vicarāmi gaṇairnagnairvṛtombhojavilocane | mā krudho devi mātustvaṁ tathyaṁ mātāvadattava nahi mātṛsamo bandhurjantūnāmasti śobhane

हे कमलनयने, मैं नग्न गणों से घिरा हुआ विचरण करता हूँ। हे देवि, माता पर क्रोध मत करो; तुम्हारी माता ने सत्य ही कहा है। हे शोभने, प्राणियों के लिए माता के समान बन्धु कोई नहीं है।

श्लोक 19 (skanda.8.26.19)

देव्युवाच। न मेस्ति बन्धुभिः किञ्चित्कृत्यं सुरवरेश्वर । तथा कुरु महादेव यथान्यत्र वसामहे

devyuvāca| na mesti bandhubhiḥ kiñcitkṛtyaṁ suravareśvara | tathā kuru mahādeva yathānyatra vasāmahe

देवी ने कहा — हे सुरवरेश्वर, मुझे बन्धुओं से कोई प्रयोजन नहीं है। हे महादेव, ऐसा करो कि हम अन्यत्र निवास करें।

श्लोक 20 (skanda.8.26.20)

सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तो देवेशो देव्या देवेश्वरः प्रभुः । पार्श्वस्थं गणपं प्राह निकुम्भं नाम विश्रुतम्

sanatkumāra uvāca| sa evamukto deveśo devyā deveśvaraḥ prabhuḥ | pārśvasthaṁ gaṇapaṁ prāha nikumbhaṁ nāma viśrutam

सनत्कुमार ने कहा — देवी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उस देवेश्वर प्रभु ने पास खड़े निकुम्भ नामक प्रसिद्ध गणपति से कहा —

श्लोक 21 (skanda.8.26.21)

गणेश्वर निकुम्भ त्वं गत्वा वाराणसीं शुभाम् । शून्या कुरु महाबाहो उपायेनैव मा बलात्

gaṇeśvara nikumbha tvaṁ gatvā vārāṇasīṁ śubhām | śūnyā kuru mahābāho upāyenaiva mā balāt

हे गणेश्वर निकुम्भ, तुम शुभ वाराणसी नगरी में जाकर, हे महाबाहो, उपाय से ही उसे शून्य कर दो, बल से नहीं।

श्लोक 22 (skanda.8.26.22)

तत्र राजा निवसति दिवोदासः प्रतापवान् । धार्मिको मम भक्तश्च महायोगी महाबलः

tatra rājā nivasati divodāsaḥ pratāpavān | dhārmiko mama bhaktaśca mahāyogī mahābalaḥ

वहाँ प्रतापी राजा दिवोदास निवास करता है, जो धार्मिक, मेरा भक्त, महायोगी और महाबली है।

श्लोक 23 (skanda.8.26.23)

सर्वं तथा गतः कुर्या यथा स्मै नापराध्यसे । तस्यैव चापराधेन शून्यां वाराणसीं कुरु

sarvaṁ tathā gataḥ kuryā yathā smai nāparādhyase | tasyaiva cāparādhena śūnyāṁ vārāṇasīṁ kuru

वहाँ जाकर तुम ऐसा करना कि उसका अपराधी न बनो, अपितु उसके ही अपराध से वाराणसी को शून्य करना।

श्लोक 24 (skanda.8.26.24)

सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तस्तेजस्वी निकुम्भो गणसत्तम । उवाच देवं प्रणतः प्राञ्जलिर्हषिताननः

sanatkumāra uvāca| sa evamuktastejasvī nikumbho gaṇasattama | uvāca devaṁ praṇataḥ prāñjalirhaṣitānanaḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वह तेजस्वी गणश्रेष्ठ निकुम्भ प्रसन्नमुख होकर, हाथ जोड़े, देव को प्रणाम करके बोला —

श्लोक 25 (skanda.8.26.25)

तथा करिष्ये देवेश यथा स हि नराधिपः । भविष्यत्यपराधीश त्वं च तुष्टो भविष्यसि शून्या वाराणसी चैव भविष्यति न संशयः

tathā kariṣye deveśa yathā sa hi narādhipaḥ | bhaviṣyatyaparādhīśa tvaṁ ca tuṣṭo bhaviṣyasi śūnyā vārāṇasī caiva bhaviṣyati na saṁśayaḥ

हे देवेश, मैं वैसा ही करूँगा, जिससे वह राजा अपराधी बने, आप प्रसन्न हों, और वाराणसी अवश्य शून्य हो जाए, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 26 (skanda.8.26.26)

सनत्कुमार उवाच। एवमुक्त्वा निकुम्भोसौ प्रणम्य शिरसा हरम् । जगाम पुण्यां लोकेषु पुरीं वाराणसीं प्रभुः

sanatkumāra uvāca| evamuktvā nikumbhosau praṇamya śirasā haram | jagāma puṇyāṁ lokeṣu purīṁ vārāṇasīṁ prabhuḥ

सनत्कुमार ने कहा — ऐसा कहकर वह प्रभु निकुम्भ, हर को सिर झुकाकर प्रणाम करके, लोकों में पुण्यनगरी वाराणसी को चल पड़ा।

श्लोक 27 (skanda.8.26.27)

तत्रासौ दर्शनं स्वप्ने नापिताय ददौ गणः । मंडूकाक्षाय रूपं च स्वं तस्यादर्शयत्तदा

tatrāsau darśanaṁ svapne nāpitāya dadau gaṇaḥ | maṁḍūkākṣāya rūpaṁ ca svaṁ tasyādarśayattadā

वहाँ उस गण ने स्वप्न में मण्डूकाक्ष नामक नाई को दर्शन दिया, और उसे अपना स्वरूप दिखाया।

श्लोक 28 (skanda.8.26.28)

निकुम्भउवाच। मण्डूकाक्ष निकुम्भोहं गणपः शोकनाशनः । तवानुग्रहकृत् प्राप्तो यद् ब्रवीमि कुरुष्व तत्

nikumbhauvāca| maṇḍūkākṣa nikumbhohaṁ gaṇapaḥ śokanāśanaḥ | tavānugrahakṛt prāpto yad bravīmi kuruṣva tat

निकुम्भ ने कहा — हे मण्डूकाक्ष, मैं शोकनाशक गणपति निकुम्भ हूँ। तुम पर अनुग्रह करने आया हूँ; जो मैं कहूँ, वह करो।

श्लोक 29 (skanda.8.26.29)

दिवोदासगृहद्वारि कुरुष्व त्वं ममालयम् । स्थापयस्व च तत्रार्चा मद्रूपसदृशीं शुभाम्

divodāsagṛhadvāri kuruṣva tvaṁ mamālayam | sthāpayasva ca tatrārcā madrūpasadṛśīṁ śubhām

दिवोदास के घर के द्वार पर तुम मेरा निवास बनाओ, और वहाँ मेरे स्वरूप के समान एक शुभ मूर्ति स्थापित करो।

श्लोक 30 (skanda.8.26.30)

वित्तं च ते प्रदास्यामि पुत्रान् सौभाग्यमेव च । प्रियत्वं चैव सर्वत्र गतिं चानुत्तमां पुनः

vittaṁ ca te pradāsyāmi putrān saubhāgyameva ca | priyatvaṁ caiva sarvatra gatiṁ cānuttamāṁ punaḥ

मैं तुम्हें धन, पुत्र और सौभाग्य दूँगा, तथा सर्वत्र प्रियता और अनुपम गति भी दूँगा।

श्लोक 31 (skanda.8.26.31)

सनत्कुमार उवाच। एवमुक्तो निकुम्भेन नापितो नृपतिं तदा । गत्वावदद् दिवोदासमिन्द्रवैवस्वतोपमम्

sanatkumāra uvāca| evamukto nikumbhena nāpito nṛpatiṁ tadā | gatvāvadad divodāsamindravaivasvatopamam

सनत्कुमार ने कहा — निकुम्भ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह नाई तब इन्द्र और यम के समान राजा दिवोदास के पास जाकर बोला —

श्लोक 32 (skanda.8.26.32)

नापित उवाच। स्वामिन् तव गृहद्वारि करिष्ये गणपालयम् । स्थापयिष्ये गणेशञ्च तन्मेनुज्ञातुमर्हसि

nāpita uvāca| svāmin tava gṛhadvāri kariṣye gaṇapālayam | sthāpayiṣye gaṇeśañca tanmenujñātumarhasi

नाई ने कहा — हे स्वामिन्, आपके घर के द्वार पर मैं एक गणपति का निवास बनाऊँगा और गणेश की स्थापना करूँगा; इसकी अनुमति दीजिए।

श्लोक 33 (skanda.8.26.33)

तथेति सोप्यनुज्ञातश्चक्रे तत्र तदालयम् । प्रत्यस्थापयदर्चाञ्च यादृशं दृष्टवानसौ

tatheti sopyanujñātaścakre tatra tadālayam | pratyasthāpayadarcāñca yādṛśaṁ dṛṣṭavānasau

'ऐसा ही हो' — इस प्रकार अनुमति पाकर उसने वहाँ वह निवास बनाया, और जैसा स्वप्न में देखा था, वैसी ही मूर्ति स्थापित की।

श्लोक 34 (skanda.8.26.34)

तस्य पूजां च महतीं प्रावर्त्तयत शोभनाम् । गणेशस्य महासत्वः स च तां प्रत्यगृह्णत

tasya pūjāṁ ca mahatīṁ prāvarttayata śobhanām | gaṇeśasya mahāsatvaḥ sa ca tāṁ pratyagṛhṇata

उसने उसकी महान और सुन्दर पूजा प्रचलित की, और वह महासत्त्व गणेश उसे स्वीकार करने लगा।

श्लोक 35 (skanda.8.26.35)

सनत्कुमार उवाच। स तस्मै कर्मणा तेन वित्तं यद्यत्समीहितम् । पशूँश्चैव हि पुत्रांश्च सौभाग्यं चाददत् प्रभुः

sanatkumāra uvāca| sa tasmai karmaṇā tena vittaṁ yadyatsamīhitam | paśū~ścaiva hi putrāṁśca saubhāgyaṁ cādadat prabhuḥ

सनत्कुमार ने कहा — उस कर्म से उस प्रभु ने उसे जो-जो वांछित धन, पशु, पुत्र और सौभाग्य था, वह सब दिया।

श्लोक 36 (skanda.8.26.36)

तस्य तां वृद्धिमतुलां नापितस्याभिवीक्ष्य तु । आरिराधयिषुर्लोकस्तस्य पूजां चकार ह

tasya tāṁ vṛddhimatulāṁ nāpitasyābhivīkṣya tu | ārirādhayiṣurlokastasya pūjāṁ cakāra ha

उस नाई की उस अतुल वृद्धि को देखकर, लोग भी उसे प्रसन्न करने की इच्छा से उसकी पूजा करने लगे।

श्लोक 37 (skanda.8.26.37)

चक्रु र्यात्रास्तथा केचिदुपवासान् तथापरे । होमं जप्यं तथैवान्ये पूजां चान्ये वरार्थिनः

cakru ryātrāstathā kecidupavāsān tathāpare | homaṁ japyaṁ tathaivānye pūjāṁ cānye varārthinaḥ

कुछ ने यात्राएँ कीं, कुछ ने उपवास किए; कुछ ने होम और जप किया, तथा वरार्थी अन्य लोगों ने पूजा की।

श्लोक 38 (skanda.8.26.38)

उपहाराँस्तथैवान्ये गीतं नृत्तं तथापरे । तेभ्यस्तथाभ्युपेतेभ्यो निकुम्भः स महायशाः ददौ सर्वानभिप्रायान् ये ये तेषामभीप्सिताः

upahārā~stathaivānye gītaṁ nṛttaṁ tathāpare | tebhyastathābhyupetebhyo nikumbhaḥ sa mahāyaśāḥ dadau sarvānabhiprāyān ye ye teṣāmabhīpsitāḥ

कुछ ने उपहार दिए, कुछ ने गीत और नृत्य किया। उन सबको, जो उसके पास इस प्रकार आए, उस महायशस्वी निकुम्भ ने उनकी सभी अभीष्ट कामनाएँ पूर्ण कर दीं।

श्लोक 39 (skanda.8.26.39)

एवं तं कामदं ज्ञात्वा दिवोदासो नृपस्तदा । उवाच महिषीं व्यास कदाचित् पुत्रलिप्सया । देवि सर्वानभिप्रायान् जनेभ्योयं प्रयच्छति

evaṁ taṁ kāmadaṁ jñātvā divodāso nṛpastadā | uvāca mahiṣīṁ vyāsa kadācit putralipsayā | devi sarvānabhiprāyān janebhyoyaṁ prayacchati

हे व्यास, इस प्रकार उसे कामनाओं का दाता जानकर, राजा दिवोदास ने एक बार पुत्रप्राप्ति की इच्छा से रानी से कहा — हे देवि, यह लोगों की सभी कामनाएँ पूर्ण करता है।

श्लोक 40 (skanda.8.26.40)

गणेश्वरं त्वमप्येनमपत्यार्थं प्रसादय । सैवमुक्ता तदा गत्वा गणेशं प्राप्य शोभना

gaṇeśvaraṁ tvamapyenamapatyārthaṁ prasādaya | saivamuktā tadā gatvā gaṇeśaṁ prāpya śobhanā

तुम भी संतान के लिए इस गणेश्वर को प्रसन्न करो। इस प्रकार कहे जाने पर वह सुन्दरी रानी गणेश के पास गई,

श्लोक 41 (skanda.8.26.41)

उवाच भगवन् देव अनपत्याहमीश्वर । उपवासं करिष्यामि तव देवाभिराधने

uvāca bhagavan deva anapatyāhamīśvara | upavāsaṁ kariṣyāmi tava devābhirādhane

और बोली — हे भगवन्, हे देव, हे ईश्वर, मैं संतानहीन हूँ। आपकी आराधना के लिए मैं उपवास करूँगी।

श्लोक 42 (skanda.8.26.42)

तावन्न भोक्ष्ये यावन्मे वरो दत्तस्त्वया प्रभो । जाते च पुत्रे दास्यामि शतानां दशतीर्दश

tāvanna bhokṣye yāvanme varo dattastvayā prabho | jāte ca putre dāsyāmi śatānāṁ daśatīrdaśa

हे प्रभो, जब तक आप मुझे वर नहीं देंगे, मैं भोजन नहीं करूँगी। पुत्र होने पर मैं एक सहस्र —

श्लोक 43 (skanda.8.26.43)

त्वामुद्दिश्य द्विजातिभ्यो गोधेनूनां गणेश्वर । तथा घटसहस्स्रेण दध्नश्चैव घृतस्य च । क्षीरस्य पंचगव्यस्य करिष्ये स्नपनं च ते

tvāmuddiśya dvijātibhyo godhenūnāṁ gaṇeśvara | tathā ghaṭasahassreṇa dadhnaścaiva ghṛtasya ca | kṣīrasya paṁcagavyasya kariṣye snapanaṁ ca te

— हे गणेश्वर, आपके निमित्त द्विजों को धेनुएँ दान दूँगी, तथा सहस्र घड़ों दही, घी, दूध और पंचगव्य से आपका स्नपन करूँगी।

श्लोक 44 (skanda.8.26.44)

ब्राह्मणानां सहस्राणां शतं चापि सुपूजितम् । पुरस्ताद् भोजयिष्ये ते पुत्रे जाते न संशयः

brāhmaṇānāṁ sahasrāṇāṁ śataṁ cāpi supūjitam | purastād bhojayiṣye te putre jāte na saṁśayaḥ

पुत्र होने पर मैं एक लाख भलीभाँति पूजित ब्राह्मणों को आपके समक्ष भोजन कराऊँगी, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 45 (skanda.8.26.45)

बहून् दास्यति राजा च ग्रामान् दासीस्तथैव च । सदा सत्रञ्च पूजां च करिष्यति तव प्रभो

bahūn dāsyati rājā ca grāmān dāsīstathaiva ca | sadā satrañca pūjāṁ ca kariṣyati tava prabho

राजा भी बहुत-से गाँव और दासियाँ देंगे, और हे प्रभो, वे सदा आपके लिए सत्र और पूजा करते रहेंगे।

श्लोक 46 (skanda.8.26.46)

सनत्कुमार उवाच। सा तमुक्त्वा तथा व्यास तस्थौ नियममास्थिता । सोपवासा तदा पूजां महतीं तस्य कुर्वती

sanatkumāra uvāca| sā tamuktvā tathā vyāsa tasthau niyamamāsthitā | sopavāsā tadā pūjāṁ mahatīṁ tasya kurvatī

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, उससे इस प्रकार कहकर वह व्रत में स्थिर हुई, उपवास करती हुई उसकी महान पूजा करने लगी।

श्लोक 47 (skanda.8.26.47)

तां तथा तिष्ठतीं देवः प्रोवाच स गणेश्वरः । उत्तिष्ठ नास्ति ते पुत्रो मा खेदं त्वं वृथा कृथाः

tāṁ tathā tiṣṭhatīṁ devaḥ provāca sa gaṇeśvaraḥ | uttiṣṭha nāsti te putro mā khedaṁ tvaṁ vṛthā kṛthāḥ

इस प्रकार स्थित उससे उस गणेश्वर देव ने कहा — उठो, तुम्हें पुत्र नहीं होगा; व्यर्थ खेद मत करो।

श्लोक 48 (skanda.8.26.48)

एवं तेन गणेशेन निकुम्भेन महात्मना । असकृत् प्रोच्यमाना सा नियमाद् विरराम ह

evaṁ tena gaṇeśena nikumbhena mahātmanā | asakṛt procyamānā sā niyamād virarāma ha

इस प्रकार उस महात्मा गणेश निकुम्भ द्वारा बार-बार कहे जाने पर वह अपने व्रत से विरत हो गई।

श्लोक 49 (skanda.8.26.49)

ततो नराधिपं देवी प्रोवाच विमना तदा । आर्यपुत्र न मे पुत्रं गणपोसौ प्रयच्छति । ब्रवीति नास्ति ते पुत्रो मा वृथा नियमं कृथाः

tato narādhipaṁ devī provāca vimanā tadā | āryaputra na me putraṁ gaṇaposau prayacchati | bravīti nāsti te putro mā vṛthā niyamaṁ kṛthāḥ

तब खिन्नमन होकर उस देवी ने राजा से कहा — हे आर्यपुत्र, वह गणपति मुझे पुत्र नहीं देता। वह कहता है — तुम्हें पुत्र नहीं होगा, व्यर्थ ही व्रत मत करो।

श्लोक 50 (skanda.8.26.50)

सनत्कुमार उवाच। एवं महिष्या स प्रोक्तः स्वयमेव नराधिपः । सदा सनियमस्तस्थौ गणेशस्याग्रतो नृपः

sanatkumāra uvāca| evaṁ mahiṣyā sa proktaḥ svayameva narādhipaḥ | sadā saniyamastasthau gaṇeśasyāgrato nṛpaḥ

सनत्कुमार ने कहा — रानी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राजा स्वयं ही व्रत लेकर गणेश के सामने सदा के लिए स्थित हो गया।

श्लोक 51 (skanda.8.26.51)

तमप्युवाच नृपतिं निकुम्भो नियमस्थितम् । मा स्था वृथेह नृपते न ते पुत्रं ददाम्यहम्

tamapyuvāca nṛpatiṁ nikumbho niyamasthitam | mā sthā vṛtheha nṛpate na te putraṁ dadāmyaham

व्रत में स्थित उस राजा से भी निकुम्भ ने कहा — हे नृपते, यहाँ व्यर्थ मत रहो; मैं तुम्हें पुत्र नहीं दूँगा।

श्लोक 52 (skanda.8.26.52)

एवमुक्तः स राजेन्द्रो निकुम्भेन महाबलः । क्रोधरक्तेक्षणः प्राह तमुत्थाय गणेश्वरम्

evamuktaḥ sa rājendro nikumbhena mahābalaḥ | krodharaktekṣaṇaḥ prāha tamutthāya gaṇeśvaram

निकुम्भ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह महाबली राजेन्द्र, क्रोध से लाल नेत्रों वाला होकर, उठकर उस गणेश्वर से बोला —

श्लोक 53 (skanda.8.26.53)

राजोवाच। गणो वा त्वं पिशाचो वा भूतो वा राक्षसोपि वा । कृतघ्नस्त्वं न सन्देहो न त्वं पूजामिहार्हसि

rājovāca| gaṇo vā tvaṁ piśāco vā bhūto vā rākṣasopi vā | kṛtaghnastvaṁ na sandeho na tvaṁ pūjāmihārhasi

राजा ने कहा — चाहे तुम गण हो, पिशाच हो, भूत हो अथवा राक्षस भी हो, तुम कृतघ्न हो, इसमें संदेह नहीं; तुम यहाँ पूजा के योग्य नहीं हो।

श्लोक 54 (skanda.8.26.54)

मम चैव गृहद्वारि पौरैश्चैव समर्चितः । विषये मम वासी च न च पुत्रं प्रयच्छसि

mama caiva gṛhadvāri pauraiścaiva samarcitaḥ | viṣaye mama vāsī ca na ca putraṁ prayacchasi

तुम मेरे ही घर के द्वार पर, नगरवासियों द्वारा सत्कृत होकर, मेरे ही राज्य में रहते हुए भी, मुझे पुत्र नहीं देते।

श्लोक 55 (skanda.8.26.55)

पूजार्हो न भवाँस्तस्मान्मत्तो दण्डं त्वमर्हसि । नृशंसश्चावलिप्तश्च निष्ठुरो मत्सरान्वितः

pūjārho na bhavā~stasmānmatto daṇḍaṁ tvamarhasi | nṛśaṁsaścāvaliptaśca niṣṭhuro matsarānvitaḥ

अतः तुम पूजा के योग्य नहीं हो, तुम मुझसे दण्ड के ही योग्य हो — क्रूर, अभिमानी, निष्ठुर और मत्सरयुक्त हो।

श्लोक 56 (skanda.8.26.56)

सनत्कुमार उवाच। ततोस्य भेदयामास निलयं गजयूथपैः । स्थण्डिलं च बभञ्जाशु ददाहार्चां च सुप्रभाम्

sanatkumāra uvāca| tatosya bhedayāmāsa nilayaṁ gajayūthapaiḥ | sthaṇḍilaṁ ca babhañjāśu dadāhārcāṁ ca suprabhām

सनत्कुमार ने कहा — फिर उसने हाथियों के यूथ से उसका निवास तुड़वा दिया, तुरन्त वेदी को तोड़ डाला, और उस तेजस्वी मूर्ति को जला दिया।

श्लोक 57 (skanda.8.26.57)

निकुम्भोपि कृतार्थः सन्नाकाशे संस्थितः प्रभुः । उवाच तं दिवोदासं प्रदहन्निव तेजसा

nikumbhopi kṛtārthaḥ sannākāśe saṁsthitaḥ prabhuḥ | uvāca taṁ divodāsaṁ pradahanniva tejasā

निकुम्भ भी, अपना कार्य सिद्ध होने पर, आकाश में स्थित होकर, मानो अपने तेज से जलाते हुए, उस दिवोदास से बोला —

श्लोक 58 (skanda.8.26.58)

यथेष्टं संप्रयच्छन्ति देवा वरमभीप्सितम् । न दत्तो यद्यसौ कोपः कस्तत्र भवतोभवत्

yatheṣṭaṁ saṁprayacchanti devā varamabhīpsitam | na datto yadyasau kopaḥ kastatra bhavatobhavat

देवता इच्छानुसार ही वांछित वर देते हैं; यदि वह नहीं दिया गया, तो उसमें आपको क्रोध क्यों हुआ?

श्लोक 59 (skanda.8.26.59)

यस्मान्ममालयो भग्नस्त्वया निरपकारिणः । तस्माद् वर्षसहस्रं ते पुरी शून्या भविष्यति

yasmānmamālayo bhagnastvayā nirapakāriṇaḥ | tasmād varṣasahasraṁ te purī śūnyā bhaviṣyati

चूँकि तुमने बिना अपराध किए हुए मेरे निवास को तोड़ दिया, अतः तुम्हारी नगरी एक हजार वर्षों तक शून्य रहेगी।

श्लोक 60 (skanda.8.26.60)

सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्त्वा राजानं निकुम्भः परमात्मवान् । देवेशाय निवेद्यैवं तस्थौ पार्श्वगतः प्रभोः

sanatkumāra uvāca| sa evamuktvā rājānaṁ nikumbhaḥ paramātmavān | deveśāya nivedyaivaṁ tasthau pārśvagataḥ prabhoḥ

सनत्कुमार ने कहा — राजा से इस प्रकार कहकर वह परम आत्मवान् निकुम्भ देवेश को यह निवेदन करके प्रभु के पास ही रहने लगा।

श्लोक 61 (skanda.8.26.61)

राजापि तस्य वाक्येन तथ्येनार्थेन चैव हि । व्रीडा परां समासाद्य गृहानभ्यगमत् तदा

rājāpi tasya vākyena tathyenārthena caiva hi | vrīḍā parāṁ samāsādya gṛhānabhyagamat tadā

राजा भी उसके सत्य और अर्थपूर्ण वचन से अत्यन्त लज्जित होकर तब अपने घर लौट गया।

श्लोक 62 (skanda.8.26.62)

अथ सा तेन शापेन पुरी वाराणसी तदा । शून्या समभवत् क्षिप्रं विशुद्धा मृगसेविता

atha sā tena śāpena purī vārāṇasī tadā | śūnyā samabhavat kṣipraṁ viśuddhā mṛgasevitā

फिर उस शाप से वाराणसी नगरी शीघ्र ही शून्य, विशुद्ध और मृगों द्वारा सेवित हो गई।

श्लोक 63 (skanda.8.26.63)

तां तु शून्यां स विज्ञाय देव्या सह पिनाकधृक् । सगणो नन्दिना सार्धमाजगाम महाद्युतिः

tāṁ tu śūnyāṁ sa vijñāya devyā saha pinākadhṛk | sagaṇo nandinā sārdhamājagāma mahādyutiḥ

उसे शून्य जानकर, वह महातेजस्वी पिनाकधारी देवी सहित, गणों सहित, नन्दी सहित वहाँ आए।

श्लोक 64 (skanda.8.26.64)

स तत्र मानसं दिव्यं विमानं सूर्यवर्चसम् । अनौपम्यगुणं देवो मनसैव विनिर्ममे

sa tatra mānasaṁ divyaṁ vimānaṁ sūryavarcasam | anaupamyaguṇaṁ devo manasaiva vinirmame

वहाँ उस देव ने मन से ही एक दिव्य, मानस विमान रचा, जो सूर्य के समान तेजस्वी और अनुपम गुणों वाला था।

श्लोक 65 (skanda.8.26.65)

सनत्कुमार उवाच। न मे प्रभवति प्रज्ञा कृत्स्नशस्तन्निरूपणे । एतावच्छक्यते वक्तुमनौपम्यगुणं हि तत्

sanatkumāra uvāca| na me prabhavati prajñā kṛtsnaśastannirūpaṇe | etāvacchakyate vaktumanaupamyaguṇaṁ hi tat

सनत्कुमार ने कहा — उसका सम्पूर्ण वर्णन करने में मेरी बुद्धि समर्थ नहीं है; इतना ही कहा जा सकता है कि वह सचमुच अनुपम गुणों वाला था।

श्लोक 66 (skanda.8.26.66)

देवोद्यानानि रम्याणि नन्दनाद्यानि यानि तु । तेभ्यः श्रेष्ठतमं श्रीमदुद्यानमसृजत् प्रभुः

devodyānāni ramyāṇi nandanādyāni yāni tu | tebhyaḥ śreṣṭhatamaṁ śrīmadudyānamasṛjat prabhuḥ

देवताओं के जो भी रमणीय उद्यान हैं, नन्दन आदि, उनसे भी श्रेष्ठतम, श्रीसम्पन्न उद्यान उस प्रभु ने वहाँ रचा।

श्लोक 67 (skanda.8.26.67)

तस्मिन् विमाने गिरिराजपुत्री सर्वर्द्धियुक्ते वचसामगम्ये । रेमे नवेन्दीवरफुल्लनेत्रा देवी न सस्मार वचः स्वमातुः

tasmin vimāne girirājaputrī sarvarddhiyukte vacasāmagamye | reme navendīvaraphullanetrā devī na sasmāra vacaḥ svamātuḥ

समस्त ऐश्वर्य से युक्त, वाणी से भी अगम्य उस विमान में, नवीन नील कमल के समान खिले नेत्रों वाली गिरिराजपुत्री देवी रमण करने लगीं, और अपनी माता के वचन को स्मरण नहीं किया।

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