अम्बिका खण्ड · अध्याय 27
ईश्वरार्चन-विधि
श्लोक 1 (skanda.8.27.1)
सनत्कुमार उवाच। अथ तस्मिन् सुखासीनौ शैलजावृषभध्वजौ । आसने काञ्चने दिव्ये नानारत्नोपशोभिते
sanatkumāra uvāca| atha tasmin sukhāsīnau śailajāvṛṣabhadhvajau | āsane kāñcane divye nānāratnopaśobhite
सनत्कुमार ने कहा — फिर पर्वतपुत्री और वृषभध्वज दोनों, नाना रत्नों से सुशोभित उस दिव्य स्वर्णासन पर सुखपूर्वक बैठे —
श्लोक 2 (skanda.8.27.2)
अथाचलसुता देवी सुखासीना विभावरी । सर्वलोकपतिं प्राह गिरीन्द्रतनया पतिम्
athācalasutā devī sukhāsīnā vibhāvarī | sarvalokapatiṁ prāha girīndratanayā patim
— फिर पर्वतसुता, तेजस्विनी देवी, सुखपूर्वक बैठी हुई, गिरिराज-पुत्री ने समस्त लोकों के स्वामी अपने पति से कहा —
श्लोक 3 (skanda.8.27.3)
भगवन् देवतारिघ्न चन्द्रावयवभूषण । कथयैतन्मम विभो यत्त्वां पृच्छामि मानद
bhagavan devatārighna candrāvayavabhūṣaṇa | kathayaitanmama vibho yattvāṁ pṛcchāmi mānada
हे भगवन्, हे देवशत्रुसंहारक, हे चन्द्रकला से विभूषित, हे विभो, हे मानद, मैं जो आपसे पूछती हूँ, वह मुझे बताइए।
श्लोक 4 (skanda.8.27.4)
किं फलं तव देवेश लभन्ते भक्तवत्सल । भक्ता ये फलमुद्दिश्य कुर्वते तन्न किञ्चन
kiṁ phalaṁ tava deveśa labhante bhaktavatsala | bhaktā ye phalamuddiśya kurvate tanna kiñcana
हे भक्तवत्सल देवेश, आपके भक्त, जो फल की आकांक्षा से आपकी आराधना करते हैं, वे आखिर कौन-सा फल प्राप्त करते हैं?
श्लोक 5 (skanda.8.27.5)
सनत्कुमार उवाच। स एवमुमया प्रोक्तः शूलपाणिर्वृषध्वजः । अवोचत् सर्वमव्यग्रो देवदेवः शुभाशुभम्
sanatkumāra uvāca| sa evamumayā proktaḥ śūlapāṇirvṛṣadhvajaḥ | avocat sarvamavyagro devadevaḥ śubhāśubham
सनत्कुमार ने कहा — उमा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर त्रिशूलधारी वृषभध्वज देवदेव ने स्वस्थचित्त होकर शुभ और अशुभ दोनों का वर्णन किया।
श्लोक 6 (skanda.8.27.6)
व्यास उवाच। किन्तत् स भगवान् देवः प्रीयमाणो महातपाः । प्रणयात् स तथा देव्या पृष्टो कथयदव्ययः
vyāsa uvāca| kintat sa bhagavān devaḥ prīyamāṇo mahātapāḥ | praṇayāt sa tathā devyā pṛṣṭo kathayadavyayaḥ
व्यास ने कहा — वह क्या था, जो प्रसन्न होकर उन महातपस्वी अविनाशी भगवान् देव ने देवी द्वारा स्नेहपूर्वक पूछे जाने पर बताया?
श्लोक 7 (skanda.8.27.7)
सनत्कुमार उवाच। मयाप्येतत् पुरा व्यास पृष्टो नन्दीश्वरः प्रभुः । यथोक्तवान् मयि ब्रह्मन् तथा तत्कथयामि ते
sanatkumāra uvāca| mayāpyetat purā vyāsa pṛṣṭo nandīśvaraḥ prabhuḥ | yathoktavān mayi brahman tathā tatkathayāmi te
सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, मैंने भी पहले प्रभु नन्दीश्वर से यह पूछा था; हे ब्रह्मन्, जैसा उन्होंने मुझसे कहा था, वैसा ही मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 8 (skanda.8.27.8)
गणेशान पतिं शूरं सूर्यायुतसमप्रभम् । अपृच्छमहमव्यग्रो नन्दीश्वरमतिद्युतिम्
gaṇeśāna patiṁ śūraṁ sūryāyutasamaprabham | apṛcchamahamavyagro nandīśvaramatidyutim
मैंने शान्तचित्त होकर गणेशों के शूरवीर स्वामी, दस हजार सूर्यों के समान तेजस्वी, अत्यन्त द्युतिमान नन्दीश्वर से पूछा —
श्लोक 9 (skanda.8.27.9)
ईशेन यत् पुरा देव्याः कथितं गणसत्तम । तन्मे ब्रूहि यथातत्त्वं परं कौतूहलं हि मे
īśena yat purā devyāḥ kathitaṁ gaṇasattama | tanme brūhi yathātattvaṁ paraṁ kautūhalaṁ hi me
— हे गणश्रेष्ठ, पूर्वकाल में ईश ने देवी से जो कुछ कहा था, वह मुझे यथार्थ बताइए; मुझे अत्यन्त कौतूहल है।
श्लोक 10 (skanda.8.27.10)
नन्द्युवाच। श्रूयतामभिधास्यामि पृच्छतस्ते महामुने । देवदेवेन पार्वत्या यत् पुराभिहितं हि तत्
nandyuvāca| śrūyatāmabhidhāsyāmi pṛcchataste mahāmune | devadevena pārvatyā yat purābhihitaṁ hi tat
नन्दी ने कहा — हे महामुने, सुनिए, आपके पूछने पर मैं वही बताता हूँ, जो देवदेव ने पूर्वकाल में पार्वती से कहा था।
श्लोक 11 (skanda.8.27.11)
देवदेव उवाच। श्रूयतामभिधास्यामि यन्मां पृच्छसि सुव्रते । हिताय देवि भक्तानां पृष्टस्तत् कथयामि ते
devadeva uvāca| śrūyatāmabhidhāsyāmi yanmāṁ pṛcchasi suvrate | hitāya devi bhaktānāṁ pṛṣṭastat kathayāmi te
देवदेव ने कहा — हे सुव्रते, सुनो, तुम जो मुझसे पूछती हो, वह मैं बताता हूँ। हे देवि, भक्तों के हित के लिए, पूछे जाने पर, यह मैं तुम्हें कहता हूँ।
श्लोक 12 (skanda.8.27.12)
प्रसादं यस्तु मे देवि शुभ्रं कुर्यादनिन्दिते । विदधाम्यर्जुनं तस्य गृहं शिवपुरेक्षयम्
prasādaṁ yastu me devi śubhraṁ kuryādanindite | vidadhāmyarjunaṁ tasya gṛhaṁ śivapurekṣayam
हे अनिन्दिते, जो मुझ पर शुभ प्रसाद (सेवा) करता है, उसे मैं शिवपुरी में एक उज्ज्वल, अक्षय भवन प्रदान करता हूँ।
श्लोक 13 (skanda.8.27.13)
विधानेन यथोक्तेन लिङ्गं मे स्थापयेच्च यः । मया सहासौ चरति नित्यमष्टगुणान्वितः
vidhānena yathoktena liṅgaṁ me sthāpayecca yaḥ | mayā sahāsau carati nityamaṣṭaguṇānvitaḥ
जो विधिपूर्वक मेरा लिंग स्थापित करता है, वह मेरे साथ ही सदा आठ गुणों से सम्पन्न होकर विचरण करता है।
श्लोक 14 (skanda.8.27.14)
काञ्चनं त्रुटिमात्रं वा यो दद्याद् बहु वा मम । तस्य हैमवते शृङ्गे ददामि गृहमुत्तमम्
kāñcanaṁ truṭimātraṁ vā yo dadyād bahu vā mama | tasya haimavate śṛṅge dadāmi gṛhamuttamam
जो मुझे थोड़ा-सा भी स्वर्ण या अधिक स्वर्ण देता है, उसे मैं हिमालय के शिखर पर उत्तम भवन प्रदान करता हूँ।
श्लोक 15 (skanda.8.27.15)
यो मे गां वा हिरण्यं वा दद्यादविमनाः प्रिये । लोकान् ददाम्यहं तस्मै सर्वकामसमन्वितान्
yo me gāṁ vā hiraṇyaṁ vā dadyādavimanāḥ priye | lokān dadāmyahaṁ tasmai sarvakāmasamanvitān
हे प्रिये, जो अविचलित मन से मुझे गौ या स्वर्ण देता है, उसे मैं सभी कामनाओं से युक्त लोक प्रदान करता हूँ।
श्लोक 16 (skanda.8.27.16)
वृषभं यः प्रयच्छेन्मे श्वेतं नीलमथापि वा । स कुलानामुभयतस्तारयेदेकविंशतिम्
vṛṣabhaṁ yaḥ prayacchenme śvetaṁ nīlamathāpi vā | sa kulānāmubhayatastārayedekaviṁśatim
जो मुझे श्वेत या नीले वर्ण का वृषभ देता है, वह दोनों कुलों (मातृ और पितृ) की इक्कीस पीढ़ियों को तार देता है।
श्लोक 17 (skanda.8.27.17)
गोचर्मद्वयसां वापि यो मे दद्याद्वसुन्धराम् । स मे पुरं समासाद्य गणेशैः सह मोदते
gocarmadvayasāṁ vāpi yo me dadyādvasundharām | sa me puraṁ samāsādya gaṇeśaiḥ saha modate
जो मुझे दो गोचर्म के बराबर भी भूमि देता है, वह मेरे नगर को प्राप्त कर गणेश्वरों के साथ आनन्दित होता है।
श्लोक 18 (skanda.8.27.18)
यो मे पुण्यफलं दद्यादात्मना पूर्वमर्जितम् । सोनन्त फलमाप्नोति मोदते च त्रिविष्टपे
yo me puṇyaphalaṁ dadyādātmanā pūrvamarjitam | sonanta phalamāpnoti modate ca triviṣṭape
जो मुझे अपने पूर्वार्जित पुण्य का फल अर्पित करता है, वह अनन्त फल पाकर स्वर्ग में आनन्दित होता है।
श्लोक 19 (skanda.8.27.19)
योनुयानं चतुर्दश्यां कृष्णायां कुरुते मम । रथेन वृषयुक्तेन मम लोके स मोदते
yonuyānaṁ caturdaśyāṁ kṛṣṇāyāṁ kurute mama | rathena vṛṣayuktena mama loke sa modate
जो कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को वृषभयुक्त रथ से मेरा अनुयान (शोभायात्रा) करता है, वह मेरे लोक में आनन्दित होता है।
श्लोक 20 (skanda.8.27.20)
महिमानोपचारैश्च यो मां जप्यैश्च पूजयेत् । ददामि ब्रह्मणो लोके वासं तस्य सुपूजितम्
mahimānopacāraiśca yo māṁ japyaiśca pūjayet | dadāmi brahmaṇo loke vāsaṁ tasya supūjitam
जो मुझे महिमापूर्ण उपचारों और जप से पूजता है, उसे मैं ब्रह्मलोक में अत्यन्त पूजित निवास प्रदान करता हूँ।
श्लोक 21 (skanda.8.27.21)
मनसा चिन्तयेद् यश्च पूजयेयमहं हरम् । अशक्तो नास्ति च द्रव्यं यस्य नित्यं सुमध्यमे
manasā cintayed yaśca pūjayeyamahaṁ haram | aśakto nāsti ca dravyaṁ yasya nityaṁ sumadhyame
हे सुमध्यमे, जो असमर्थ होकर भी और साधन न होते हुए भी सदा मन से यह चिन्तन करता है — 'मैं हर की पूजा करूँ' —
श्लोक 22 (skanda.8.27.22)
स तया श्रद्धया पूतो विमुक्तः सर्वपातकैः । मम लोकमवाप्नोति भिन्ने देहे न संशयः
sa tayā śraddhayā pūto vimuktaḥ sarvapātakaiḥ | mama lokamavāpnoti bhinne dehe na saṁśayaḥ
— वह उस श्रद्धा से पवित्र होकर, समस्त पापों से मुक्त होकर, शरीर छूटने पर मेरे लोक को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 23 (skanda.8.27.23)
स्नातो यः पूर्वसंध्यायां सदा मामभिगच्छति । स मित्रं यक्षराजस्य यक्षो भवति वीर्यवान्
snāto yaḥ pūrvasaṁdhyāyāṁ sadā māmabhigacchati | sa mitraṁ yakṣarājasya yakṣo bhavati vīryavān
जो प्रातःसंध्या में स्नान करके सदा मेरे पास आता है, वह यक्षराज का मित्र, पराक्रमी यक्ष बन जाता है।
श्लोक 24 (skanda.8.27.24)
संमार्जनं पंचशतं सहस्रमुपलेपनम् । गन्धाश्च दशसाहस्रा अनन्तं चार्चनं स्मृतम्
saṁmārjanaṁ paṁcaśataṁ sahasramupalepanam | gandhāśca daśasāhasrā anantaṁ cārcanaṁ smṛtam
झाड़ू लगाना पाँच सौ के तुल्य, गोबर से लीपना एक हजार के तुल्य, गन्ध चढ़ाना दस हजार के तुल्य, तथा पूजन अनन्त फलदायी माना गया है।
श्लोक 25 (skanda.8.27.25)
अभ्यङ्गोष्टशतं चैव स्नपनं त्रिशतं भवेत् । गन्धोदकं पंचशतं पञ्चगव्यं तथैव च
abhyaṅgoṣṭaśataṁ caiva snapanaṁ triśataṁ bhavet | gandhodakaṁ paṁcaśataṁ pañcagavyaṁ tathaiva ca
तेल-मर्दन आठ सौ के तुल्य, स्नपन तीन सौ के तुल्य, गन्धोदक पाँच सौ के तुल्य, और पंचगव्य भी उतना ही —
श्लोक 26 (skanda.8.27.26)
क्षीरं पञ्चगुणं देवि तस्माद् भूयश्च कापिलम् । तस्माच्च सर्पिषा स्नानं भूयः पंचगुणं तथा
kṣīraṁ pañcaguṇaṁ devi tasmād bhūyaśca kāpilam | tasmācca sarpiṣā snānaṁ bhūyaḥ paṁcaguṇaṁ tathā
— हे देवि, दूध उससे पाँच गुना, तथा कपिला गाय का दूध उससे भी अधिक। और घृत से स्नान उससे भी पाँच गुना फलदायी है।
श्लोक 27 (skanda.8.27.27)
क्षमामि देवि चास्याहमपराधान् बहूनपि । भस्माभिषेकमानन्त्यं गुह्यं चैव मम प्रिये
kṣamāmi devi cāsyāhamaparādhān bahūnapi | bhasmābhiṣekamānantyaṁ guhyaṁ caiva mama priye
हे देवि, इस प्रकार करने वाले के मैं बहुत-से अपराध भी क्षमा कर देता हूँ। हे प्रिये, भस्म-अभिषेक अनन्त फलदायी और मेरा अत्यन्त गुह्य रहस्य है।
श्लोक 28 (skanda.8.27.28)
अगुरुर्दशसाहस्रं षट्साहस्रं तु चन्दनम् । चतुर्दशसहस्राणि धूपः कालागरोः स्मृतः
agururdaśasāhasraṁ ṣaṭsāhasraṁ tu candanam | caturdaśasahasrāṇi dhūpaḥ kālāgaroḥ smṛtaḥ
अगुरु दस हजार के तुल्य, चन्दन छह हजार के तुल्य, तथा काले अगर की धूप चौदह हजार के तुल्य मानी गई है।
श्लोक 29 (skanda.8.27.29)
अक्षयास्तण्डुलयवाः शालयो द्विशताः स्मृताः । आनन्त्यो गुग्गुलुश्चैव सहाज्येन सुधूपितः
akṣayāstaṇḍulayavāḥ śālayo dviśatāḥ smṛtāḥ | ānantyo gugguluścaiva sahājyena sudhūpitaḥ
चावल और जौ अक्षय फलदायी हैं, धान दो सौ के तुल्य माना गया है; तथा घृतसहित गुग्गुल की धूप अनन्त फलदायी है।
श्लोक 30 (skanda.8.27.30)
द्वे सहस्रे पलानां तु महिषाक्षस्य यो दहेत् । देवि संवत्सरं पूर्णं समे नन्दिसमो भवेत्
dve sahasre palānāṁ tu mahiṣākṣasya yo dahet | devi saṁvatsaraṁ pūrṇaṁ same nandisamo bhavet
हे देवि, जो एक पूर्ण वर्ष तक मेरे पर्व पर दो हजार पल परिमाण गुग्गुल आदि जलाता है, वह नन्दी के समान हो जाता है।
श्लोक 31 (skanda.8.27.31)
दक्षिणायान्तु यो मूर्तौ पायसं सघृतं शुभे । निवेदयेद्वर्षमेकं स च नन्दिसमो भवेत्
dakṣiṇāyāntu yo mūrtau pāyasaṁ saghṛtaṁ śubhe | nivedayedvarṣamekaṁ sa ca nandisamo bhavet
हे शुभे, जो दक्षिणायन में मेरी मूर्ति पर घृतयुक्त खीर एक वर्ष तक अर्पित करता है, वह भी नन्दी के समान हो जाता है।
श्लोक 32 (skanda.8.27.32)
चरवो दशसाहस्रा यावकश्च चतुर्गुणः । शेषाश्च चरवः सर्वे यावकार्धेन संमिताः
caravo daśasāhasrā yāvakaśca caturguṇaḥ | śeṣāśca caravaḥ sarve yāvakārdhena saṁmitāḥ
चरु (हवन-सामग्री) दस हजार के तुल्य, यावक (जौ का हविष्य) उससे चौगुना; तथा शेष सभी चरु यावक के आधे के बराबर माने गए हैं।
श्लोक 33 (skanda.8.27.33)
घृतपात्रमसंख्येयमिह प्रेत्य च शाश्वतम् । प्रीणाति च पितॄन् सर्वान विमाने चैव मोदते
ghṛtapātramasaṁkhyeyamiha pretya ca śāśvatam | prīṇāti ca pitṝn sarvāna vimāne caiva modate
घृत का पात्र देने वाला यहाँ असंख्य और परलोक में शाश्वत फल पाता है; वह समस्त पितरों को तृप्त करता है और विमान में आनन्दित होता है।
श्लोक 34 (skanda.8.27.34)
छत्रं पताकानिचयं शोभयित्वा ददाति यः । सोपि संदीप्यते भूयो रविवत्तेजसा दिवि
chatraṁ patākānicayaṁ śobhayitvā dadāti yaḥ | sopi saṁdīpyate bhūyo ravivattejasā divi
जो छत्र और ध्वजाओं का समूह सुशोभित करके देता है, वह भी स्वर्ग में सूर्य के समान तेज से देदीप्यमान होता है।
श्लोक 35 (skanda.8.27.35)
उभौ पक्षौ त्रयोदश्यामष्टम्यां चोपवासिकः । उपतिष्ठेत मां भक्त्या सोपहारमनिन्दिते
ubhau pakṣau trayodaśyāmaṣṭamyāṁ copavāsikaḥ | upatiṣṭheta māṁ bhaktyā sopahāramanindite
हे अनिन्दिते, जो दोनों पक्षों की त्रयोदशी और अष्टमी को उपवास करके भक्तिपूर्वक उपहार सहित मेरी उपासना करता है —
श्लोक 36 (skanda.8.27.36)
ददाम्यस्य स्वकं लोकं तुष्टोहं देवि शाश्वतम् । रक्तपीतकवासोभिः पुष्पैश्च विविधैरपि । पूजितोहं सदा भक्त्या पुत्रत्वे कल्पयामि तम्
dadāmyasya svakaṁ lokaṁ tuṣṭohaṁ devi śāśvatam | raktapītakavāsobhiḥ puṣpaiśca vividhairapi | pūjitohaṁ sadā bhaktyā putratve kalpayāmi tam
— हे देवि, प्रसन्न होकर मैं उसे अपना शाश्वत लोक देता हूँ। लाल-पीले वस्त्रों और विविध पुष्पों से सदा भक्तिपूर्वक पूजित होकर मैं उसे पुत्रवत् मान लेता हूँ।
श्लोक 37 (skanda.8.27.37)
एकरात्रं च यो मर्त्यो दीपं धारयति स्थितः । सर्वयज्ञफलं तस्य ददाम श्रियमेव च
ekarātraṁ ca yo martyo dīpaṁ dhārayati sthitaḥ | sarvayajñaphalaṁ tasya dadāma śriyameva ca
और जो मनुष्य एक रात्रि दीपक जलाए हुए स्थित रहता है, उसे मैं सभी यज्ञों का फल तथा श्री भी प्रदान करता हूँ।
श्लोक 38 (skanda.8.27.38)
मयैव मोहिताः सर्वे लोकाः सजडपण्डिताः । न मां पश्यन्ति रागान्धास्तमसा बहुलीकृताः
mayaiva mohitāḥ sarve lokāḥ sajaḍapaṇḍitāḥ | na māṁ paśyanti rāgāndhāstamasā bahulīkṛtāḥ
समस्त लोग, मूर्ख और पण्डित दोनों, मेरे ही द्वारा मोहित हैं; राग से अन्धे और अन्धकार से आवृत होकर वे मुझे नहीं देख पाते।
श्लोक 39 (skanda.8.27.39)
ध्यानिनो योगयुक्ता ये सत्यधर्मपरायणाः । एकाग्रमनसो दान्तास्ते मां पश्यन्ति नित्यदा
dhyānino yogayuktā ye satyadharmaparāyaṇāḥ | ekāgramanaso dāntāste māṁ paśyanti nityadā
जो ध्यानी, योगयुक्त, सत्य और धर्म में तत्पर, एकाग्रचित्त और जितेन्द्रिय हैं, वे ही मुझे सदा देखते हैं।
श्लोक 40 (skanda.8.27.40)
ये मे भक्ताः सदा चैव सांख्ययोगविशारदाः । सर्वं पश्यन्ति मयि च मां च सर्वत्र योगतः
ye me bhaktāḥ sadā caiva sāṁkhyayogaviśāradāḥ | sarvaṁ paśyanti mayi ca māṁ ca sarvatra yogataḥ
जो सदा मेरे भक्त हैं और सांख्य-योग में निपुण हैं, वे योग के द्वारा सब कुछ मुझमें और मुझे सर्वत्र देखते हैं।
श्लोक 41 (skanda.8.27.41)
त्रींल्लोकान् समतिक्रम्य ब्रह्मलोकं तथैव च । गच्छन्ति मम ते लोकं तमो भित्वा सुदुर्भिदम्
trīṁllokān samatikramya brahmalokaṁ tathaiva ca | gacchanti mama te lokaṁ tamo bhitvā sudurbhidam
वे तीनों लोकों को तथा ब्रह्मलोक को भी लाँघकर, अत्यन्त दुर्भेद्य अन्धकार को भेदकर मेरे लोक को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 42 (skanda.8.27.42)
न शक्योस्म्यतपोयुक्तैर्द्रष्टुं मुनिगणैरपि । ध्यानिनो नित्ययुक्ताश्च देवि पश्यन्ति मां बुधाः
na śakyosmyatapoyuktairdraṣṭuṁ munigaṇairapi | dhyānino nityayuktāśca devi paśyanti māṁ budhāḥ
बिना तप वाले मुनिगणों द्वारा भी मैं देखा नहीं जा सकता। हे देवि, केवल ध्यानी और नित्ययुक्त बुद्धिमान ही मुझे देखते हैं।
श्लोक 43 (skanda.8.27.43)
एतानि चैव सर्वाणि कृत्वा कर्माणि सुन्दरि । मनसा सुप्रशान्तेन करुणचेतसा
etāni caiva sarvāṇi kṛtvā karmāṇi sundari | manasā supraśāntena karuṇacetasā
हे सुन्दरि, ये सब कर्म अत्यन्त प्रशान्त मन और करुणायुक्त चित्त से करके —
श्लोक 44 (skanda.8.27.44)
काञ्चनं भूमिगोदानं विप्रे च प्रतिपादयन् । रुद्रो मे प्रीयतु इति ह्यतुलं फलमश्नुते
kāñcanaṁ bhūmigodānaṁ vipre ca pratipādayan | rudro me prīyatu iti hyatulaṁ phalamaśnute
— और स्वर्ण, भूमि तथा गौ का दान ब्राह्मण को देते हुए, 'रुद्र मुझ पर प्रसन्न हों' — ऐसा सोचकर वह अतुल फल पाता है।
श्लोक 45 (skanda.8.27.45)
यानि लोकेषु तीर्थानि देवतायतनानि च । पादयोस्तानि सुश्रोणि सदा सन्निहितानि मे
yāni lokeṣu tīrthāni devatāyatanāni ca | pādayostāni suśroṇi sadā sannihitāni me
हे सुश्रोणि, लोकों में जो भी तीर्थ और देवमन्दिर हैं, वे सब सदा मेरे चरणों में ही विद्यमान हैं।
श्लोक 46 (skanda.8.27.46)
ब्राह्मणानां तथा चैव करे दक्षिणतः स्थिताः । यो मां सर्वगतं चैव सर्वं च मयि पश्यति
brāhmaṇānāṁ tathā caiva kare dakṣiṇataḥ sthitāḥ | yo māṁ sarvagataṁ caiva sarvaṁ ca mayi paśyati
और वे ही ब्राह्मणों के दाहिने हाथ में भी स्थित रहते हैं। जो मुझे सर्वव्यापी और सब कुछ मुझमें ही देखता है —
श्लोक 47 (skanda.8.27.47)
मय्यर्पितमना नित्यं तथा मद्भावभावितः । ममैव स प्रभावेन सर्वपापैः प्रमुच्यते
mayyarpitamanā nityaṁ tathā madbhāvabhāvitaḥ | mamaiva sa prabhāvena sarvapāpaiḥ pramucyate
— जिसका मन सदा मुझमें अर्पित है और जो मेरे ही भाव से भावित है, वह मेरे ही प्रभाव से समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 48 (skanda.8.27.48)
सर्वथा वर्तमानोपि देवि यो मां स्मरेत्सदा । कल्मषेण न युज्येत नरः कर्ता कदाचन
sarvathā vartamānopi devi yo māṁ smaretsadā | kalmaṣeṇa na yujyeta naraḥ kartā kadācana
हे देवि, चाहे मनुष्य किसी भी प्रकार क्यों न रहे, यदि वह सदा मेरा स्मरण करता है, तो वह कर्ता होते हुए भी कभी पाप से युक्त नहीं होता।
श्लोक 49 (skanda.8.27.49)
सर्वावस्थोपि पापात्मा ज्ञाननिद्रेण चेतसा । योभ्यर्चयति मां नित्यं स ममात्मसमो भवेत्
sarvāvasthopi pāpātmā jñānanidreṇa cetasā | yobhyarcayati māṁ nityaṁ sa mamātmasamo bhavet
कैसी भी अवस्था में हो, पापात्मा भी, यदि ज्ञान से जागृत चित्त से मेरी नित्य अर्चना करता है, तो वह मेरे ही समान हो जाता है।
श्लोक 50 (skanda.8.27.50)
षडङ्गेन च योगेन यो मामभ्यर्चयेत्सदा । प्रविशेत स मां क्षिप्रमत्र नास्ति विचारणा
ṣaḍaṅgena ca yogena yo māmabhyarcayetsadā | praviśeta sa māṁ kṣipramatra nāsti vicāraṇā
जो षडंग योग से सदा मेरी अर्चना करता है, वह शीघ्र ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 51 (skanda.8.27.51)
योप्यसज्जनरतो वियोनिजः पातकैरपि समन्वितस्सदा । सोपि मद्गतमना मदर्पणो याति देवि गतिमप्रतर्किताम्
yopyasajjanarato viyonijaḥ pātakairapi samanvitassadā | sopi madgatamanā madarpaṇo yāti devi gatimapratarkitām
हे देवि, जो दुर्जनों में रत, नीच योनि में उत्पन्न, सदा पापों से युक्त भी है, वह भी यदि मुझमें मन लगाकर, मुझे अर्पित होकर रहता है, तो अकल्पनीय गति को प्राप्त होता है।