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अम्बिका खण्ड · अध्याय 28

ईश्वर-पूजा

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (skanda.8.28.1)

सनत्कुमार उवाच। ततो व्यास पुनर्देवी पतिं व्रतपतिं शुभा । अपृच्छद् व्रतसंबद्धं फलं फलशतार्चिता

sanatkumāra uvāca| tato vyāsa punardevī patiṁ vratapatiṁ śubhā | apṛcchad vratasaṁbaddhaṁ phalaṁ phalaśatārcitā

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, फिर सैकड़ों फलों से पूजित उस शुभा देवी ने पुनः अपने पति, व्रतों के स्वामी से व्रतों से सम्बद्ध फल के विषय में पूछा।

श्लोक 2 (skanda.8.28.2)

व्रतानां फलमल्पं वा महद् वा यत् त्रिलोकप । व्रतं भवति यादृग् वा तत् प्रब्रूहि महेश्वर

vratānāṁ phalamalpaṁ vā mahad vā yat trilokapa | vrataṁ bhavati yādṛg vā tat prabrūhi maheśvara

हे त्रिलोकपति, व्रतों का फल चाहे थोड़ा हो या बड़ा, और व्रत जिस प्रकार का होता है, हे महेश्वर, वह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (skanda.8.28.3)

देवदेव उवाच। महाफलं यद् भवति यच्चाप्यल्पफलं शुभे । व्रतं यादृक् च यत् प्रोक्तं तच्छृणु त्वमनिन्दिते

devadeva uvāca| mahāphalaṁ yad bhavati yaccāpyalpaphalaṁ śubhe | vrataṁ yādṛk ca yat proktaṁ tacchṛṇu tvamanindite

देवदेव ने कहा — हे शुभे, हे अनिन्दिते, जो व्रत महाफलदायी है और जो अल्पफलदायी है, और जैसा भी व्रत बताया गया है, उसे सुनो।

श्लोक 4 (skanda.8.28.4)

चतुर्दश्यां तथाष्टम्यामुभयोः पक्षयोः शुचिः । संवत्सरमभुञ्जानः शान्तो दान्तो जितेन्द्रियः

caturdaśyāṁ tathāṣṭamyāmubhayoḥ pakṣayoḥ śuciḥ | saṁvatsaramabhuñjānaḥ śānto dānto jitendriyaḥ

दोनों पक्षों की चतुर्दशी और अष्टमी को शुद्ध होकर, एक वर्ष तक न खाकर, शान्त, संयत और जितेन्द्रिय रहने वाला —

श्लोक 5 (skanda.8.28.5)

सत्रयाजिफलं यच्च सत्यवागृतुगामिनाम् । तच्चैव फलमाप्नोति यमञ्चैव न पश्यति

satrayājiphalaṁ yacca satyavāgṛtugāminām | taccaiva phalamāpnoti yamañcaiva na paśyati

— सत्रयाग करने वालों, सत्यवादियों और ऋतुगामियों का जो फल है, वही फल पाता है, और यम को भी नहीं देखता।

श्लोक 6 (skanda.8.28.6)

शय्यासनस्थः स्त्रीमध्ये रतिरक्तः सुखे रतः । स तप्यत्यानखाग्रेभ्यो नित्यं यो मां समाश्रितः

śayyāsanasthaḥ strīmadhye ratiraktaḥ sukhe rataḥ | sa tapyatyānakhāgrebhyo nityaṁ yo māṁ samāśritaḥ

शय्या और आसन पर स्त्रियों के बीच रहने वाला, रति में रक्त और सुख में लीन भी, यदि वह मेरा नित्य आश्रित है, तो वह नखाग्र तक तप करता है।

श्लोक 7 (skanda.8.28.7)

मद्भक्तस्तपसा युक्तो मामेव प्रतिपद्यते । लोकास्तस्याक्षया देवि यद्यपि स्यात् स पापकृत्

madbhaktastapasā yukto māmeva pratipadyate | lokāstasyākṣayā devi yadyapi syāt sa pāpakṛt

तप से युक्त मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त होता है। हे देवि, यदि वह पापकर्ता भी हो, तब भी उसके लोक अक्षय होते हैं।

श्लोक 8 (skanda.8.28.8)

पृथिवीभाजने भुंक्ते नित्यं पर्वसु यो नरः । स त्रिरात्रफलं देवि अहोरात्रेण विन्दति

pṛthivībhājane bhuṁkte nityaṁ parvasu yo naraḥ | sa trirātraphalaṁ devi ahorātreṇa vindati

जो मनुष्य पर्वों पर नित्य मिट्टी के पात्र में भोजन करता है, हे देवि, वह एक ही दिन-रात में त्रिरात्र-व्रत का फल पाता है।

श्लोक 9 (skanda.8.28.9)

संवत्सरं तु यो भुंक्ते नित्यमेव ह्यतन्द्रितः । निवेद्य पितृदेवेभ्यः पृथिव्यामेकराड् भवेत्

saṁvatsaraṁ tu yo bhuṁkte nityameva hyatandritaḥ | nivedya pitṛdevebhyaḥ pṛthivyāmekarāḍ bhavet

और जो अथक होकर एक वर्ष तक नित्य ही पितरों और देवताओं को अर्पित करके भोजन करता है, वह पृथ्वी पर एकराट् (एकमात्र सम्राट्) बनता है।

श्लोक 10 (skanda.8.28.10)

नवमीमष्टमीं चैव पौर्णमासीं त्रयोदशीम् । यो भुंक्ते देवि नैतेषु सुपर्वसु नरः समाम्

navamīmaṣṭamīṁ caiva paurṇamāsīṁ trayodaśīm | yo bhuṁkte devi naiteṣu suparvasu naraḥ samām

हे देवि, जो मनुष्य पूरे वर्ष इन शुभ पर्वों — नवमी, अष्टमी, पूर्णिमा और त्रयोदशी — में भोजन नहीं करता —

श्लोक 11 (skanda.8.28.11)

गाणपत्यं स लभते निस्सपत्नमनिन्दिते । भूतानां दयितश्चैव दिव्यं रूपं बिभर्ति च

gāṇapatyaṁ sa labhate nissapatnamanindite | bhūtānāṁ dayitaścaiva divyaṁ rūpaṁ bibharti ca

— हे अनिन्दिते, वह निष्कण्टक गाणपत्य पद प्राप्त करता है, और समस्त प्राणियों का प्रिय होकर दिव्य रूप धारण करता है।

श्लोक 12 (skanda.8.28.12)

श्रीवत्सं यश्च पिष्टेन दद्याद् हेमफलं शुभम् । किरेत् कृष्णतिलांश्चात्र तण्डुलाक्षतमेव च

śrīvatsaṁ yaśca piṣṭena dadyād hemaphalaṁ śubham | kiret kṛṣṇatilāṁścātra taṇḍulākṣatameva ca

जो आटे से श्रीवत्स और शुभ स्वर्णफल बनाकर अर्पित करता है, और यहाँ काले तिल तथा अक्षत चावल बिखेरता है —

श्लोक 13 (skanda.8.28.13)

फलैश्च विविधाकारैर्यथालब्धै रसान्वितैः । स वै वर्षसहस्राणि द्विषष्टि दिवि मोदते

phalaiśca vividhākārairyathālabdhai rasānvitaiḥ | sa vai varṣasahasrāṇi dviṣaṣṭi divi modate

— और यथाप्राप्त, रसयुक्त, विविध आकार के फलों से भी अर्पण करता है, वह बासठ हजार वर्षों तक स्वर्ग में आनन्दित होता है।

श्लोक 14 (skanda.8.28.14)

दिव्यरूपधरः श्रीमान् देवतैस्सह नित्यशः । हिरिवेरमयीं यो मे दद्यात् प्रतिकृतिं स्वकाम्

divyarūpadharaḥ śrīmān devataissaha nityaśaḥ | hiriveramayīṁ yo me dadyāt pratikṛtiṁ svakām

वह दिव्यरूपधारी, श्रीमान होकर सदा देवताओं के साथ रहता है। जो मुझे चन्दन-काष्ठ से बनी अपनी प्रतिकृति देता है —

श्लोक 15 (skanda.8.28.15)

सर्वगन्धरसैर्युक्तां निर्यासैश्च सुसंस्कृताम् । भक्ष्यभोज्यैश्च विविधैः कृष्णपक्षे चतुर्दशीम्

sarvagandharasairyuktāṁ niryāsaiśca susaṁskṛtām | bhakṣyabhojyaiśca vividhaiḥ kṛṣṇapakṣe caturdaśīm

— समस्त गन्ध-रसों से युक्त, सुगन्धित निर्यासों से सुसंस्कृत, तथा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को विविध खाद्य-भोज्य पदार्थों सहित —

श्लोक 16 (skanda.8.28.16)

पूर्वदक्षिणयोश्चात्र पश्चिमोत्तरयोस्तथा । पार्श्वेषु हरितालञ्च कृष्णागरुमनःशिलाम् चन्दनं चैव दद्याद्वै यथासंख्येन पूजितम्

pūrvadakṣiṇayoścātra paścimottarayostathā | pārśveṣu haritālañca kṛṣṇāgarumanaḥśilām candanaṁ caiva dadyādvai yathāsaṁkhyena pūjitam

— और पूर्व-दक्षिण तथा पश्चिम-उत्तर दिशाओं में क्रमशः पूजित हरताल, काला अगर, मैनशिल तथा चन्दन अर्पित करता है —

श्लोक 17 (skanda.8.28.17)

तस्य पुण्यफलं देवि शृणु यन्मत्तकाशिनि

tasya puṇyaphalaṁ devi śṛṇu yanmattakāśini

— हे मत्तकाशिनि, उसका जो पुण्यफल है, वह सुनो।

श्लोक 18 (skanda.8.28.18)

सर्वव्याधिविनिर्मुक्तस्तथा निष्कल्मषश्च ह । वर्षकोटिशतान्यष्टौ दिवि भुक्त्वा महत्सुखम् इह लोके सुखी जातो मामेव प्रतिपद्यते

sarvavyādhivinirmuktastathā niṣkalmaṣaśca ha | varṣakoṭiśatānyaṣṭau divi bhuktvā mahatsukham iha loke sukhī jāto māmeva pratipadyate

वह समस्त व्याधियों से मुक्त और निष्पाप होकर, स्वर्ग में आठ सौ करोड़ वर्षों तक महान सुख भोगकर, इस लोक में सुखी जन्म पाकर मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 19 (skanda.8.28.19)

रत्नावलिं तु यो दद्याद् ब्राह्मणः क्षत्रियोथ विट् । शूद्रः स्त्री वा स मे लोके मत्सौख्यं प्राप्नुते परम्

ratnāvaliṁ tu yo dadyād brāhmaṇaḥ kṣatriyotha viṭ | śūdraḥ strī vā sa me loke matsaukhyaṁ prāpnute param

जो भी रत्नमाला अर्पित करता है — चाहे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या स्त्री — वह मेरे लोक में मेरे साथ परम सुख प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (skanda.8.28.20)

सिद्धार्थकाँश्चाघोरेण दैवे पित्र्येथ वा पुनः । त्रिंशद्वर्षसहस्राणि तर्पयेत् स पितॄनपि ऋषींश्च सर्वदेवांश्च रूपञ्चाप्नोति पुष्कलम्

siddhārthakā~ścāghoreṇa daive pitryetha vā punaḥ | triṁśadvarṣasahasrāṇi tarpayet sa pitṝnapi ṛṣīṁśca sarvadevāṁśca rūpañcāpnoti puṣkalam

अघोर मन्त्र से देव या पितृकार्य में सफेद सरसों अर्पित करके वह तीस हजार वर्षों तक पितरों, ऋषियों और समस्त देवताओं को तृप्त करता है, और सुन्दर रूप प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.8.28.21)

मन्वन्तरञ्च गोलोके गोकन्याभिः स पूज्यते । सर्वे देवास्तथा विष्णुर्ब्रह्मा ऋषय एव च

manvantarañca goloke gokanyābhiḥ sa pūjyate | sarve devāstathā viṣṇurbrahmā ṛṣaya eva ca

वह एक मन्वन्तर तक गोलोक में गोकन्याओं द्वारा पूजित होता है; और समस्त देवता, विष्णु, ब्रह्मा तथा ऋषिगण भी —

श्लोक 22 (skanda.8.28.22)

कुर्वन्त्यर्घ्ये हि सान्निध्यं तेभ्यस्तद्धि विनिःसृतम् । गुह्यमेतत् परं देवि यो वेत्ति स महातपाः

kurvantyarghye hi sānnidhyaṁ tebhyastaddhi viniḥsṛtam | guhyametat paraṁ devi yo vetti sa mahātapāḥ

— उसके अर्घ्य में सन्निहित रहते हैं, क्योंकि वह उन्हीं से प्रवाहित हुआ है। हे देवि, यह परम गुह्य रहस्य है; जो इसे जानता है, वह महातपस्वी है।

श्लोक 23 (skanda.8.28.23)

तस्य प्रभावाज्जायेत धनवान् प्रियदर्शनः । प्रज्ञारूपगुणैर्युक्तः संवत्सरशतायुषः

tasya prabhāvājjāyeta dhanavān priyadarśanaḥ | prajñārūpaguṇairyuktaḥ saṁvatsaraśatāyuṣaḥ

इसके प्रभाव से वह धनवान, प्रियदर्शन, प्रज्ञा-रूप-गुणों से युक्त, सौ वर्ष की आयु वाला जन्म लेता है।

श्लोक 24 (skanda.8.28.24)

क्षीरेण यो मां सततं स्नापयेत त्रिरुद्यतः । अपराधसहस्रन्तु क्षमे तस्याहमन्तशः

kṣīreṇa yo māṁ satataṁ snāpayeta trirudyataḥ | aparādhasahasrantu kṣame tasyāhamantaśaḥ

जो नियमपूर्वक तत्पर होकर मुझे तीन बार दूध से स्नान कराता है, उसके सहस्र अपराधों को भी मैं अन्ततः क्षमा कर देता हूँ।

श्लोक 25 (skanda.8.28.25)

यश्च तत् स्नपनं पश्येत् स तत्पापैः प्रमुच्यते । मानसस्य च जप्यस्य सहस्रस्य फलं लभेत्

yaśca tat snapanaṁ paśyet sa tatpāpaiḥ pramucyate | mānasasya ca japyasya sahasrasya phalaṁ labhet

और जो उस स्नपन को देखता है, वह भी पापों से मुक्त हो जाता है, और सहस्र मानसिक जप का फल पाता है।

श्लोक 26 (skanda.8.28.26)

संवत्सरं तु यः कुर्यात् क्षीरेण स्नपनं शुचिः । गाणपत्यं स लभते बल्लभत्वं च नित्यशः

saṁvatsaraṁ tu yaḥ kuryāt kṣīreṇa snapanaṁ śuciḥ | gāṇapatyaṁ sa labhate ballabhatvaṁ ca nityaśaḥ

जो शुद्ध होकर एक वर्ष तक दूध से स्नपन करता है, वह गाणपत्य पद तथा सदा प्रियत्व प्राप्त करता है।

श्लोक 27 (skanda.8.28.27)

सर्पिषा यो ममाभ्यङ्गं करोत्यविमना नरः । द्विसाहस्रस्य जाप्यस्य मानसस्य फलं लभेत्

sarpiṣā yo mamābhyaṅgaṁ karotyavimanā naraḥ | dvisāhasrasya jāpyasya mānasasya phalaṁ labhet

जो अविचलित मन से घृत द्वारा मेरा अभ्यंग करता है, वह दो सहस्र मानसिक जप का फल पाता है।

श्लोक 28 (skanda.8.28.28)

अभिगम्यश्च देवानां स भवेच्च नरोत्तमः । निष्काणां च सुवर्णस्य सहस्रस्य फलं लभेत्

abhigamyaśca devānāṁ sa bhavecca narottamaḥ | niṣkāṇāṁ ca suvarṇasya sahasrasya phalaṁ labhet

वह देवताओं द्वारा भी आदरणीय, नरश्रेष्ठ बनता है, और सहस्र स्वर्ण मुद्राओं के दान का फल पाता है।

श्लोक 29 (skanda.8.28.29)

संमार्जनं च यः कुर्यात् संवत्सरमनुव्रतः । वितरामि शुभं लोकं नित्यं तस्य ध्रुवं शिवम्

saṁmārjanaṁ ca yaḥ kuryāt saṁvatsaramanuvrataḥ | vitarāmi śubhaṁ lokaṁ nityaṁ tasya dhruvaṁ śivam

जो एक वर्ष तक व्रतपूर्वक झाड़ू लगाता है, उसे मैं नित्य, ध्रुव, शिव (मंगलमय) लोक प्रदान करता हूँ।

श्लोक 30 (skanda.8.28.30)

सर्वलोकक्षये तस्य न क्षयो भवतीश्वरि । लिङ्गपूजां तु यः कुर्यान्मम देवि दृढव्रतः

sarvalokakṣaye tasya na kṣayo bhavatīśvari | liṅgapūjāṁ tu yaḥ kuryānmama devi dṛḍhavrataḥ

हे ईश्वरि, समस्त लोकों के क्षय होने पर भी उसका क्षय नहीं होता। हे देवि, जो दृढ़व्रती होकर मेरे लिंग की पूजा करता है —

श्लोक 31 (skanda.8.28.31)

शतं वर्षसहस्राणि दिव्यानि दिवि मोदते । चतुर्ण्णां पुष्पजातीनां गन्धमाघ्राति शङ्करः

śataṁ varṣasahasrāṇi divyāni divi modate | caturṇṇāṁ puṣpajātīnāṁ gandhamāghrāti śaṅkaraḥ

— वह स्वर्ग में एक लाख दिव्य वर्षों तक आनन्दित होता है। शंकर चार प्रकार के पुष्पों की सुगन्ध ग्रहण करते हैं —

श्लोक 32 (skanda.8.28.32)

अर्कस्य करवीरस्य बिल्वस्य च बकस्य च । सुवर्णनिष्कं पुष्पे तु सर्वस्मिन् देवि कथ्यते

arkasya karavīrasya bilvasya ca bakasya ca | suvarṇaniṣkaṁ puṣpe tu sarvasmin devi kathyate

— अर्क, करवीर, बिल्व और बक के। हे देवि, इनमें से प्रत्येक पुष्प के लिए स्वर्ण-निष्क का फल बताया गया है।

श्लोक 33 (skanda.8.28.33)

सहस्रे त्वर्कपुष्पाणां दत्ते यत कथ्यते फलम् । एकस्मिन् करवीरस्य दत्ते पुष्पे हि तत् फलम्

sahasre tvarkapuṣpāṇāṁ datte yata kathyate phalam | ekasmin karavīrasya datte puṣpe hi tat phalam

जो फल एक सहस्र अर्क पुष्प अर्पित करने से बताया गया है, वही फल एक करवीर पुष्प अर्पित करने से मिल जाता है।

श्लोक 34 (skanda.8.28.34)

करवीरसहस्रस्य भवेद्दत्तस्य यत् फलम् । तदेकस्य तु पद्मस्य दत्तस्य फलमुच्यते

karavīrasahasrasya bhaveddattasya yat phalam | tadekasya tu padmasya dattasya phalamucyate

जो फल एक सहस्र करवीर पुष्प अर्पित करने से होता है, वही फल एक कमल अर्पित करने से कहा गया है।

श्लोक 35 (skanda.8.28.35)

पद्मानां च सहस्रस्य मम दत्तस्य यत् फलम् । तत्फलं लभते पत्रे दत्ते बिल्वस्य शोभने

padmānāṁ ca sahasrasya mama dattasya yat phalam | tatphalaṁ labhate patre datte bilvasya śobhane

हे शोभने, मुझे सहस्र कमल अर्पित करने का जो फल है, वही फल एक बिल्वपत्र अर्पित करने से मिलता है।

श्लोक 36 (skanda.8.28.36)

बिल्वपत्रसहस्रं तु दत्ते मे यत् फलं स्मृतम् । बकपुष्पे तदेकस्मिन् मम दत्ते लभेत्फलम्

bilvapatrasahasraṁ tu datte me yat phalaṁ smṛtam | bakapuṣpe tadekasmin mama datte labhetphalam

मुझे सहस्र बिल्वपत्र अर्पित करने का जो फल स्मरण किया गया है, वही फल एक बक-पुष्प अर्पित करने से मिलता है।

श्लोक 37 (skanda.8.28.37)

बकपुष्पसहस्रस्य मम दत्तस्य यत् फलम् । पुष्पे दत्ते तदेकस्मिन् लभेद्धत्तूरकस्य तु

bakapuṣpasahasrasya mama dattasya yat phalam | puṣpe datte tadekasmin labheddhattūrakasya tu

मुझे सहस्र बक-पुष्प अर्पित करने का जो फल है, वही फल एक धतूरे के पुष्प अर्पित करने से मिलता है।

श्लोक 38 (skanda.8.28.38)

निर्माल्यं यो हि मे नित्यं शिरसा धारयिष्यति । अशुचिर्भिन्नमर्यादो नरः पापसमन्वितः स्वैरी चैव तथा मुक्तो नियमैश्च बहिष्कृतः नरके स पतेद् घोरे तिर्यग्योनौ च संभवेत्

nirmālyaṁ yo hi me nityaṁ śirasā dhārayiṣyati | aśucirbhinnamaryādo naraḥ pāpasamanvitaḥ svairī caiva tathā mukto niyamaiśca bahiṣkṛtaḥ narake sa pated ghore tiryagyonau ca saṁbhavet

जो अशुद्ध, मर्यादाभंग करने वाला, पापयुक्त, स्वच्छन्दाचारी, संयमरहित और नियमों से बहिष्कृत मनुष्य मेरे निर्माल्य (चढ़ाए हुए फूल) को नित्य सिर पर धारण करता है, वह घोर नरक में गिरता है और पशुयोनि में जन्म लेता है।

श्लोक 39 (skanda.8.28.39)

ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत् । तस्य पापमहं शीघ्रं नाशयामि महाव्रते

brahmacārī śucirbhūtvā nirmālyaṁ yastu dhārayet | tasya pāpamahaṁ śīghraṁ nāśayāmi mahāvrate

किन्तु हे महाव्रते, जो ब्रह्मचारी, शुद्ध होकर निर्माल्य धारण करता है, उसके पाप को मैं शीघ्र नष्ट कर देता हूँ।

श्लोक 40 (skanda.8.28.40)

दीपमालां तु यः कुर्यात् कार्त्तिके मासि वै मम । अवसाने च दीपानां ब्राह्मणाँस्तर्पयेच्छुचिः गाणपत्यं स लभते दीप्यते च रविर्यथा

dīpamālāṁ tu yaḥ kuryāt kārttike māsi vai mama | avasāne ca dīpānāṁ brāhmaṇā~starpayecchuciḥ gāṇapatyaṁ sa labhate dīpyate ca raviryathā

जो कार्तिक मास में मेरे लिए दीपमाला बनाता है, और दीप-दान के अन्त में शुद्ध होकर ब्राह्मणों को तृप्त करता है, वह गाणपत्य पद पाता है और सूर्य के समान देदीप्यमान होता है।

श्लोक 41 (skanda.8.28.41)

दद्यात् कृष्णतिलाँश्चैव सहः सिद्धार्थकाँश्च ह । यो मे देवि सदा मूर्ध्नि स मे नन्दिसमो भवेत् ये हि सिद्धार्थकाः प्रोक्तास्तथा कृष्णतिलाश्च ये

dadyāt kṛṣṇatilā~ścaiva sahaḥ siddhārthakā~śca ha | yo me devi sadā mūrdhni sa me nandisamo bhavet ye hi siddhārthakāḥ proktāstathā kṛṣṇatilāśca ye

हे देवि, जो मेरे मस्तक पर सदा काले तिल और सफेद सरसों अर्पित करता है, वह मेरे लिए नन्दी के समान हो जाता है। ये जो सफेद सरसों और काले तिल बताए गए हैं —

श्लोक 42 (skanda.8.28.42)

सर्वे ते त्वन्मया देवि गुह्यमेतन्मयेरितम्

sarve te tvanmayā devi guhyametanmayeritam

— वे सब, हे देवि, मेरे द्वारा ही तुम्हें बताए गए हैं; यह गुह्य रहस्य मैंने कहा है। (आगे का पाद मूल पाठ में अपठनीय है।)

श्लोक 43 (skanda.8.28.43)

चित्रो नाम गणो मह्यं तेन सार्धं स मोदते

citro nāma gaṇo mahyaṁ tena sārdhaṁ sa modate

(इससे पूर्व पाद मूल पाठ में सर्वथा खण्डित है) — मेरा एक 'चित्र' नामक गण है; उसके साथ वह आनन्दित होता है।

श्लोक 44 (skanda.8.28.44)

सर्वसंप्रलये चैव प्राप्ते त्रैलोक्यसंक्षये । त्यक्त्वा सर्वाणि दुःखानि मामेव प्रतिपद्यते

sarvasaṁpralaye caiva prāpte trailokyasaṁkṣaye | tyaktvā sarvāṇi duḥkhāni māmeva pratipadyate

और सर्वप्रलय होने पर, त्रैलोक्य के संक्षय के समय, समस्त दुःखों को त्यागकर वह मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 45 (skanda.8.28.45)

न तुष्याम्यर्चितोर्चायां तथा देवि नगात्मजे । लिङ्गेर्चिते यथात्यर्थं परितुष्यामि पार्वति

na tuṣyāmyarcitorcāyāṁ tathā devi nagātmaje | liṅgercite yathātyarthaṁ parituṣyāmi pārvati

हे देवि, हे नगात्मजे, मैं मूर्ति में पूजित होने से उतना प्रसन्न नहीं होता, जितना हे पार्वति, लिंग की पूजा होने पर अत्यन्त प्रसन्न होता हूँ।

श्लोक 46 (skanda.8.28.46)

सर्वेन्द्रियप्रसक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः । स प्रयाति दिवं देवि लिङ्गं योर्चयतीह मे

sarvendriyaprasakto vā yukto vā sarvapātakaiḥ | sa prayāti divaṁ devi liṅgaṁ yorcayatīha me

चाहे वह समस्त इन्द्रियों में आसक्त हो या समस्त पापों से युक्त हो, हे देवि, जो यहाँ मेरे लिंग की पूजा करता है, वह स्वर्ग को जाता है।

श्लोक 47 (skanda.8.28.47)

त्यक्त्वा सर्वाणि पापानि निर्द्वन्द्वो दग्धकिल्बिषः । मदाशीर्मन्नमस्कारो मामेव प्रतिपद्यते

tyaktvā sarvāṇi pāpāni nirdvandvo dagdhakilbiṣaḥ | madāśīrmannamaskāro māmeva pratipadyate

समस्त पापों को त्यागकर, द्वन्द्वरहित, कल्मषदग्ध होकर, मेरे आशीर्वाद से युक्त और मुझे नमस्कार करते हुए वह मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 48 (skanda.8.28.48)

सनत्कुमार उवाच। ततो भगवती भूयः पतिं सर्वजगत्पतिम् । अपृच्छत् पुष्प्यमाणास्या केन त्वं देव तुष्यसे

sanatkumāra uvāca| tato bhagavatī bhūyaḥ patiṁ sarvajagatpatim | apṛcchat puṣpyamāṇāsyā kena tvaṁ deva tuṣyase

सनत्कुमार ने कहा — फिर भगवती ने पुनः अपने पति, समस्त जगत् के स्वामी से, मुख पर मुस्कान लिए हुए पूछा — हे देव, आप किससे प्रसन्न होते हैं?

श्लोक 49 (skanda.8.28.49)

ततः प्रहस्यमानास्यः सर्वलोकेश्वरेश्वरः । प्रोवाच भगवान् वाक्यं लोकानां हितकाम्यया

tataḥ prahasyamānāsyaḥ sarvalokeśvareśvaraḥ | provāca bhagavān vākyaṁ lokānāṁ hitakāmyayā

तब मुस्कुराते हुए मुख वाले उन सर्वलोकेश्वरेश्वर भगवान् ने लोकों के हित की कामना से यह वचन कहा।

श्लोक 50 (skanda.8.28.50)

देवदेव उवाच। शृणु देवि यथातत्त्वं येन यान्ति शुभां गतिम् । त्रैलोक्ये जन्तवः सर्वे मद्भक्ता ये शुभानने

devadeva uvāca| śṛṇu devi yathātattvaṁ yena yānti śubhāṁ gatim | trailokye jantavaḥ sarve madbhaktā ye śubhānane

देवदेव ने कहा — हे शुभानने, सत्य सुनो, जिससे त्रैलोक्य में मेरे समस्त भक्त प्राणी शुभ गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 51 (skanda.8.28.51)

यत्तत् परतरं गुह्यं तत् सर्वं मयि तिष्ठति । यो हि तत्त्वेन तद् वेद संसारात् स विमुच्यते

yattat parataraṁ guhyaṁ tat sarvaṁ mayi tiṣṭhati | yo hi tattvena tad veda saṁsārāt sa vimucyate

जो कुछ भी परम गुह्य है, वह सब मुझमें ही स्थित है। जो इसे तत्त्वतः जानता है, वह संसार से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 52 (skanda.8.28.52)

न च प्रकाशयेद् गुह्यं नाम मे कीर्तयेन्नरः । सदा सर्वसहेत्येवं प्रातः प्राञ्जलिरुत्थितः

na ca prakāśayed guhyaṁ nāma me kīrtayennaraḥ | sadā sarvasahetyevaṁ prātaḥ prāñjalirutthitaḥ

गुह्य रहस्य को प्रकट नहीं करना चाहिए, किन्तु मनुष्य को प्रातःकाल उठकर हाथ जोड़कर 'सदा सर्वसह' कहते हुए मेरे नाम का कीर्तन करना चाहिए।

श्लोक 53 (skanda.8.28.53)

तस्माच्च कीर्तनात् पापं सर्वमेव विनिर्दहेत् । यशः कीर्त्तिं च संप्राप्य रुद्रलोके महीयते

tasmācca kīrtanāt pāpaṁ sarvameva vinirdahet | yaśaḥ kīrttiṁ ca saṁprāpya rudraloke mahīyate

उस कीर्तन से वह समस्त पाप को जला डालता है, और यश-कीर्ति पाकर रुद्रलोक में पूजित होता है।

श्लोक 54 (skanda.8.28.54)

सर्वमाल्यानि यो दद्यान् मम मूर्तिषु नित्यशः । मंत्रेण विधिवच्चैव तस्य पुण्यफलं महत्

sarvamālyāni yo dadyān mama mūrtiṣu nityaśaḥ | maṁtreṇa vidhivaccaiva tasya puṇyaphalaṁ mahat

जो मेरी मूर्तियों में नित्य विधिपूर्वक मन्त्र सहित समस्त मालाएँ अर्पित करता है, उसका पुण्यफल महान होता है।

श्लोक 55 (skanda.8.28.55)

सर्वगाय सुरेशाय सर्वदेवमयाय च । नमो भगवते चैव गुह्यागुह्याय वै सदा

sarvagāya sureśāya sarvadevamayāya ca | namo bhagavate caiva guhyāguhyāya vai sadā

[मन्त्र:] सर्वगामी को, देवेश्वर को, समस्त देवस्वरूप को नमस्कार है। भगवान् को, सदा गुह्य और प्रकट दोनों रूप वाले को नमस्कार है।

श्लोक 56 (skanda.8.28.56)

सोमाय भूतनाथाय भावनाय भवाय च । सर्वगुह्याय वै स्वाहा देवगुह्यमयाय च

somāya bhūtanāthāya bhāvanāya bhavāya ca | sarvaguhyāya vai svāhā devaguhyamayāya ca

सोम को, भूतनाथ को, भावन को और भव को नमस्कार है। सर्वगुह्य को स्वाहा है, देवगुह्यस्वरूप को भी स्वाहा है।

श्लोक 57 (skanda.8.28.57)

सर्वगुह्यमयो मंत्रः स्वाहा सोमाय चैव हि । कटंकटाय वै स्वाहा स्वाहा देवाय शुष्मिणे

sarvaguhyamayo maṁtraḥ svāhā somāya caiva hi | kaṭaṁkaṭāya vai svāhā svāhā devāya śuṣmiṇe

यह सर्वगुह्यमय मन्त्र है — सोम को स्वाहा; कटंकट को स्वाहा; तेजस्वी देव को स्वाहा।

श्लोक 58 (skanda.8.28.58)

पुष्पाण्येतेन मन्त्रेण यो मे नित्यं निवेदयेत् । सहस्रं तेन जाप्यस्य मानसस्य कृतं भवेत्

puṣpāṇyetena mantreṇa yo me nityaṁ nivedayet | sahasraṁ tena jāpyasya mānasasya kṛtaṁ bhavet

जो इस मन्त्र से मुझे नित्य पुष्प अर्पित करता है, उसके द्वारा सहस्र मानसिक जप सम्पन्न हो जाता है।

श्लोक 59 (skanda.8.28.59)

अथाञ्जलिममावास्यां सुसम्पूर्णां समाहितः । तिलानां चैव कृष्णानां सर्षपाणां च पार्वति अर्चयित्वा यथान्यायं यथालाभं प्रयच्छति

athāñjalimamāvāsyāṁ susampūrṇāṁ samāhitaḥ | tilānāṁ caiva kṛṣṇānāṁ sarṣapāṇāṁ ca pārvati arcayitvā yathānyāyaṁ yathālābhaṁ prayacchati

हे पार्वति, फिर जो समाहितचित्त होकर अमावास्या को विधिपूर्वक पूजा करके, यथाशक्ति काले तिल और सरसों की भरी हुई अंजलि अर्पित करता है —

श्लोक 60 (skanda.8.28.60)

इदं च वचनं कुर्यात् सूर्येति व ममेति च । सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोकं व्रजेन्नरः

idaṁ ca vacanaṁ kuryāt sūryeti va mameti ca | sarvapāpavinirmuktaḥ svargalokaṁ vrajennaraḥ

— और यह वचन कहता है, 'सूर्य के लिए' अथवा 'मेरे लिए' — वह मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 61 (skanda.8.28.61)

अर्चयित्वा च मां देवि ब्राहाणान्न च तर्पयेत् । न तत्फलमवाप्नोति नाहं तुष्यामि तस्य वै

arcayitvā ca māṁ devi brāhāṇānna ca tarpayet | na tatphalamavāpnoti nāhaṁ tuṣyāmi tasya vai

किन्तु हे देवि, जो मेरी पूजा करके ब्राह्मणों को तृप्त नहीं करता, वह वह फल नहीं पाता, और मैं भी उससे प्रसन्न नहीं होता।

श्लोक 62 (skanda.8.28.62)

अर्चयित्वा द्विजान्मां च यो मे नामानि कीर्तयेत् । चतुर्दश्यामथाष्टम्यां पक्षयोरुभयोरपि सोपि देवि प्रमुच्येत वियोनिं न स गच्छति

arcayitvā dvijānmāṁ ca yo me nāmāni kīrtayet | caturdaśyāmathāṣṭamyāṁ pakṣayorubhayorapi sopi devi pramucyeta viyoniṁ na sa gacchati

जो द्विजों की और मेरी पूजा करके दोनों पक्षों की चतुर्दशी और अष्टमी को मेरे नामों का कीर्तन करता है, हे देवि, वह भी मुक्त हो जाता है और नीच योनि को नहीं जाता।

श्लोक 63 (skanda.8.28.63)

वामदेव सुदेवेति हर गुप्तेति वा पुनः । उमापते नीलकण्ठ शान्त श्रीकण्ठ गोपते

vāmadeva sudeveti hara gupteti vā punaḥ | umāpate nīlakaṇṭha śānta śrīkaṇṭha gopate

वामदेव, सुदेव, हर, गुप्त; उमापति, नीलकण्ठ, शान्त, श्रीकण्ठ, गोपति —

श्लोक 64 (skanda.8.28.64)

शर्व भीम पशुपते शङ्करोग्र भवेति च । महादेवेति चाप्यन्यन्नाम गुह्यं प्रकीर्तयन्

śarva bhīma paśupate śaṅkarogra bhaveti ca | mahādeveti cāpyanyannāma guhyaṁ prakīrtayan

— शर्व, भीम, पशुपति, शंकर, उग्र, भव, और महादेव, तथा अन्य भी गुह्य नामों का कीर्तन करते हुए —

श्लोक 65 (skanda.8.28.65)

सर्वपापैः प्रमुच्येत दिवि देवैश्च पूज्यते । एतेषामेकमपि यः कथयेद्वा पठेत वा

sarvapāpaiḥ pramucyeta divi devaiśca pūjyate | eteṣāmekamapi yaḥ kathayedvā paṭheta vā

— वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और स्वर्ग में देवताओं द्वारा पूजित होता है। इनमें से एक का भी जो कथन या पाठ करता है —

श्लोक 66 (skanda.8.28.66)

स देहपद्धतिं भित्त्वा मामेव प्रतिपद्यते । एवं सर्व प्रणामे च यन्मया परिकीर्तितम्

sa dehapaddhatiṁ bhittvā māmeva pratipadyate | evaṁ sarva praṇāme ca yanmayā parikīrtitam

— वह देह-क्रम को भेदकर मुझे ही प्राप्त होता है। इस प्रकार सभी प्रणाम-विधियों के विषय में मैंने यह बताया है।

श्लोक 67 (skanda.8.28.67)

अमावास्यान्तु यो नित्यं सघृतं गुग्गुलं दहेत् । क्षीरेण चैव संमिश्रं गुह्यमेतन्मम प्रियम्

amāvāsyāntu yo nityaṁ saghṛtaṁ guggulaṁ dahet | kṣīreṇa caiva saṁmiśraṁ guhyametanmama priyam

जो अमावास्या को नित्य घृतयुक्त गुग्गुल को दूध में मिलाकर जलाता है, यह मुझे प्रिय गुह्य रहस्य है।

श्लोक 68 (skanda.8.28.68)

सोच्युतं स्थानमाप्नोति मत्प्रसादान्न संशयः । इदं च परमं गुह्यं यो मे देवि निवेदयेत्

socyutaṁ sthānamāpnoti matprasādānna saṁśayaḥ | idaṁ ca paramaṁ guhyaṁ yo me devi nivedayet

वह मेरी कृपा से अच्युत स्थान पाता है, इसमें संशय नहीं। और हे देवि, यह भी परम गुह्य है, जो मुझे अर्पित करता है —

श्लोक 69 (skanda.8.28.69)

अर्कपत्रयुतं पूर्णं घृतेन मधुना सह । निवेद्य विधिवद् भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते

arkapatrayutaṁ pūrṇaṁ ghṛtena madhunā saha | nivedya vidhivad bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate

— अर्कपत्र सहित पूर्ण, घृत और मधु से युक्त पात्र, विधिपूर्वक भक्तिसहित अर्पित करके वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 70 (skanda.8.28.70)

इमानि च महाभागे यो मे नामानि कीर्तयेत् । श्मशाननिलयो नग्नो भस्मशायी यतव्रतः

imāni ca mahābhāge yo me nāmāni kīrtayet | śmaśānanilayo nagno bhasmaśāyī yatavrataḥ

हे महाभागे, जो मेरे इन नामों का कीर्तन करता है — 'श्मशाननिलय, नग्न, भस्मशायी, यतव्रत' —

श्लोक 71 (skanda.8.28.71)

वामदेवः प्रशान्तश्च स्तब्धशेपस्त्रिलोचनः । असव्यप्रियः सव्यो बहुरूपोन्तकान्तकृत्

vāmadevaḥ praśāntaśca stabdhaśepastrilocanaḥ | asavyapriyaḥ savyo bahurūpontakāntakṛt

— 'वामदेव, प्रशान्त, स्तब्धशेप, त्रिलोचन, असव्यप्रिय, सव्य, बहुरूप, अन्तकों के भी अन्तकर्ता' —

श्लोक 72 (skanda.8.28.72)

पुराणः पुरुहूतश्च मृत्योर्मृत्युर्जितेन्द्रियः । अनिन्द्रियोतीन्द्रियश्च सर्वभूतहृदि स्थितः

purāṇaḥ puruhūtaśca mṛtyormṛtyurjitendriyaḥ | anindriyotīndriyaśca sarvabhūtahṛdi sthitaḥ

— 'पुराण, पुरुहूत, मृत्यु के भी मृत्यु, जितेन्द्रिय, इन्द्रियरहित, इन्द्रियातीत, समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित' —

श्लोक 73 (skanda.8.28.73)

संसारचक्री योगात्मा कापाली दिण्डिरेव च । महादेव महादेव महादेवेति चैव हि

saṁsāracakrī yogātmā kāpālī diṇḍireva ca | mahādeva mahādeva mahādeveti caiva hi

— 'संसारचक्री, योगात्मा, कापाली, दिण्डि, महादेव, महादेव, महादेव' —

श्लोक 74 (skanda.8.28.74)

जपेदेतन्नियमवान् शृणुयाद्वापि नित्यशः । स देहभेदमासाद्य योगात्मा गणपो भवेत्

japedetanniyamavān śṛṇuyādvāpi nityaśaḥ | sa dehabhedamāsādya yogātmā gaṇapo bhavet

— जो नियमपूर्वक इनका नित्य जप करता है या सुनता है, वह शरीर छूटने पर योगात्मा गणपति बन जाता है। (आगे मूल पाठ में एक श्लोक सर्वथा खण्डित है।)

श्लोक 75 (skanda.8.28.75)

नाशुभाय न पापाय नानृतायाव्रताय च । श्रावयेद् भक्तिमान् पुण्यान्नापेताय कदाचन

nāśubhāya na pāpāya nānṛtāyāvratāya ca | śrāvayed bhaktimān puṇyānnāpetāya kadācana

भक्तिमान पुरुष को यह पुण्यकथा किसी अशुभ, पापी, असत्यवादी, अव्रती अथवा पुण्यहीन व्यक्ति को कभी नहीं सुनानी चाहिए।

श्लोक 76 (skanda.8.28.76)

धन्यं यशस्यमायुष्यं शान्तिवृद्धिकरं शुभम् । पूतं पवित्रं परमं मङ्गलानां च मङ्गलम् । श्रोतव्यं न च सर्वेण तथा देयं न कस्यचित्

dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ śāntivṛddhikaraṁ śubham | pūtaṁ pavitraṁ paramaṁ maṅgalānāṁ ca maṅgalam | śrotavyaṁ na ca sarveṇa tathā deyaṁ na kasyacit

यह धन्य, यशकारी, आयुवर्धक, शान्ति और वृद्धि करने वाला, शुभ, पूत, पवित्र, परम और मंगलों का भी मंगल है। यह न तो सबके सुनने योग्य है, और न ही किसी को भी दिया जाने योग्य है।

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