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अम्बिका खण्ड · अध्याय 29

वाराणसी-तीर्थमाहात्म्य

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (skanda.8.29.1)

व्यास उवाच। एवं कालेन संप्राप्य वाराणस्यां निकेतनम् । जगतः पितरौ देवौ चक्रतुः किमतः परम्

vyāsa uvāca| evaṁ kālena saṁprāpya vārāṇasyāṁ niketanam | jagataḥ pitarau devau cakratuḥ kimataḥ param

व्यास ने कहा — इस प्रकार समय पाकर वाराणसी में निवास प्राप्त करके जगत् के माता-पिता उन दोनों देवों ने आगे क्या किया?

श्लोक 2 (skanda.8.29.2)

सनत्कुमार उवाच। ततः स भगवान् देवो देवीं हिमवतः सुताम् । उवाच देवि पश्याम उद्यानं यदि रोचते

sanatkumāra uvāca| tataḥ sa bhagavān devo devīṁ himavataḥ sutām | uvāca devi paśyāma udyānaṁ yadi rocate

सनत्कुमार ने कहा — तब भगवान् देव ने हिमवान की पुत्री देवी से कहा — हे देवि, यदि रुचे तो चलो, उद्यान देखें।

श्लोक 3 (skanda.8.29.3)

देव्युवाच। एवं भवतु देवेश यथात्थ त्वं वृषध्वज । न हि मेन्यत्र गन्तव्यमुद्यानात् परतो हर

devyuvāca| evaṁ bhavatu deveśa yathāttha tvaṁ vṛṣadhvaja | na hi menyatra gantavyamudyānāt parato hara

देवी ने कहा — हे देवेश, हे वृषध्वज, जैसा आप कहते हैं, वैसा ही हो। हे हर, इस उद्यान के अतिरिक्त मुझे अन्यत्र जाने की इच्छा नहीं है।

श्लोक 4 (skanda.8.29.4)

सनत्कुमार उवाच। सह देव्या ततो व्यास वाराणस्यां वृषध्वजः । दिव्योद्यानदिदृक्षार्थं विचचार समन्ततः

sanatkumāra uvāca| saha devyā tato vyāsa vārāṇasyāṁ vṛṣadhvajaḥ | divyodyānadidṛkṣārthaṁ vicacāra samantataḥ

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, फिर देवी सहित वृषभध्वज दिव्य उद्यान देखने के लिए वाराणसी में सर्वत्र विचरण करने लगे।

श्लोक 5 (skanda.8.29.5)

पूर्वस्मिन् स दिशो भागे देव्या देवः पिनाकधृक् । उद्यानं दर्शयामास नानाकुसुमशोभितम्

pūrvasmin sa diśo bhāge devyā devaḥ pinākadhṛk | udyānaṁ darśayāmāsa nānākusumaśobhitam

पूर्व दिशा के भाग में उस त्रिशूलधारी देव ने देवी को नाना पुष्पों से सुशोभित एक उद्यान दिखाया,

श्लोक 6 (skanda.8.29.6)

चंपकाशोकपुन्नागप्रियंगूचूतसंकुलम् । बिल्वार्जुनकदम्बैश्च न्यग्रोधोदुम्बरैरपि

caṁpakāśokapunnāgapriyaṁgūcūtasaṁkulam | bilvārjunakadambaiśca nyagrodhodumbarairapi

जो चम्पा, अशोक, पुन्नाग, प्रियंगु और आम्र के वृक्षों से भरा हुआ था, तथा बिल्व, अर्जुन, कदम्ब, वट और गूलर के वृक्षों से भी युक्त था —

श्लोक 7 (skanda.8.29.7)

गन्धवद्भिश्च कुसुमैर्जातीकेसरकेतकैः । रम्यैः सुरभिपुष्पैश्च षट्पदव्रातसेवितैः

gandhavadbhiśca kusumairjātīkesaraketakaiḥ | ramyaiḥ surabhipuṣpaiśca ṣaṭpadavrātasevitaiḥ

— सुगन्धित पुष्पों, चमेली, केसर और केतकी से, तथा मनोहर सुगन्धित फूलों से युक्त, जो भ्रमरों के समूह से सेवित थे।

श्लोक 8 (skanda.8.29.8)

संयुक्तं सर्वतः श्रीमद्वनं वैभ्राजसन्निभम् । स तदुद्यानमासाद्य देवीमाह जगत्पतिः

saṁyuktaṁ sarvataḥ śrīmadvanaṁ vaibhrājasannibham | sa tadudyānamāsādya devīmāha jagatpatiḥ

वह श्रीसम्पन्न वन सब ओर से वैभ्राज के समान था। उस उद्यान में पहुँचकर जगत्पति ने देवी से कहा —

श्लोक 9 (skanda.8.29.9)

अस्मिन् देशे पुरा देवि तिष्ठतो मम शोभने । ऊर्ध्वं गोलोकसंस्थानाद् गवां वत्सैः स्वयंभुवैः

asmin deśe purā devi tiṣṭhato mama śobhane | ūrdhvaṁ golokasaṁsthānād gavāṁ vatsaiḥ svayaṁbhuvaiḥ

हे शोभने देवि, इस स्थान पर पूर्वकाल में जब मैं खड़ा था, तब ऊपर गोलोक-स्थान से स्वयंभू गौओं के बछड़ों द्वारा —

श्लोक 10 (skanda.8.29.10)

पीयमान पयोवेगात् फेनं मूर्ध्नि समापतत । ततो मयोर्ध्वतो दृष्टा गावस्ताः सोमपार्श्वतः

pīyamāna payovegāt phenaṁ mūrdhni samāpatata | tato mayordhvato dṛṣṭā gāvastāḥ somapārśvataḥ

— दूध पीते समय उसके वेग से फेन मेरे सिर पर आ गिरा। तब मैंने, सोम ने, ऊपर देखकर उन गौओं को अपने पास देखा।

श्लोक 11 (skanda.8.29.11)

ततस्ताः प्रेक्षितास्तत्र मया गावस्तदाभवन् । तेजसा दह्यमानास्तु नैकवर्ण्णा भृशार्दिताः

tatastāḥ prekṣitāstatra mayā gāvastadābhavan | tejasā dahyamānāstu naikavarṇṇā bhṛśārditāḥ

तब मेरे द्वारा वहाँ देखी गई वे गौएँ मेरे तेज से जलती हुई, अनेक वर्णों वाली, अत्यन्त पीड़ित हो गईं।

श्लोक 12 (skanda.8.29.12)

गावः पूर्वमिमा देवि आसन् कपिलवर्णजाः । नैकवर्णास्तदाभूवन् यदा संप्रेक्षिता मया

gāvaḥ pūrvamimā devi āsan kapilavarṇajāḥ | naikavarṇāstadābhūvan yadā saṁprekṣitā mayā

हे देवि, ये गौएँ पहले कपिल वर्ण की थीं; जब मेरे द्वारा देखी गईं, तब ये अनेक वर्णों की हो गईं।

श्लोक 13 (skanda.8.29.13)

तासां शरण्यतां यात्वा ताभिर्मामेव शैलेजे । आश्रितः सोम आगत्य स्रवन्तीभिः समन्ततः

tāsāṁ śaraṇyatāṁ yātvā tābhirmāmeva śaileje | āśritaḥ soma āgatya sravantībhiḥ samantataḥ

हे शैलजे, उनके लिए शरण बनकर, उनके द्वारा मैं सोम ही आश्रय रूप में सब ओर से बहती हुई उनके साथ आया।

श्लोक 14 (skanda.8.29.14)

अर्दिताभिस्तदा गोभिर्ब्रह्मा मामब्रवीत्ततः । प्रसादं कुरु देवेश सौरभ्यस्तेजसा तव

arditābhistadā gobhirbrahmā māmabravīttataḥ | prasādaṁ kuru deveśa saurabhyastejasā tava

तब उन पीड़ित गौओं को देखकर ब्रह्मा ने मुझसे कहा — हे देवेश, अपने तेज से सुरभि की सन्तानों पर कृपा करो —

श्लोक 15 (skanda.8.29.15)

न नश्यन्ति यथा सद्यस्तथा सर्वसुरार्चित । ततोहमास्थितो देवि स्थानेस्मिन् स्वयमेव तु

na naśyanti yathā sadyastathā sarvasurārcita | tatohamāsthito devi sthānesmin svayameva tu

— जिससे वे तुरन्त नष्ट न हों, हे सर्वसुरार्चित। तब से, हे देवि, मैं स्वयं ही इस स्थान पर स्थित रहा —

श्लोक 16 (skanda.8.29.16)

गोप्रेक्ष इति विख्यातः संस्तुतः सर्वदेवतैः । गोप्रेक्षेश्वरमागत्य दृष्ट्वाभ्यर्च्य च मानवः

goprekṣa iti vikhyātaḥ saṁstutaḥ sarvadevataiḥ | goprekṣeśvaramāgatya dṛṣṭvābhyarcya ca mānavaḥ

— और समस्त देवताओं द्वारा स्तुत, 'गोप्रेक्ष' नाम से विख्यात हुआ। जो मनुष्य गोप्रेक्षेश्वर के पास आकर उन्हें देखता और पूजता है —

श्लोक 17 (skanda.8.29.17)

न दुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते । ततस्ता दह्यमानास्तु प्रसन्ने कपिला मयि

na durgatimavāpnoti kalmaṣaiśca vimucyate | tatastā dahyamānāstu prasanne kapilā mayi

— वह दुर्गति को नहीं प्राप्त होता और पापों से मुक्त हो जाता है। फिर वे जलती हुई गौएँ, जब मैं कपिल वर्ण होकर प्रसन्न हुआ —

श्लोक 18 (skanda.8.29.18)

ह्रदेस्मिन् धेनवोभ्येत्य शान्तास्ता विबभुस्तदा । कपिलाह्रद इत्येवं तदाप्रभृति कथ्यते

hradesmin dhenavobhyetya śāntāstā vibabhustadā | kapilāhrada ityevaṁ tadāprabhṛti kathyate

— इस ह्रद में आकर शान्त होकर सुशोभित हुईं। तभी से यह 'कपिलाह्रद' कहा जाता है।

श्लोक 19 (skanda.8.29.19)

अत्रापि स्वयमेवाहं वृषध्वज इति श्रुतः । सान्निध्यं कृतवान् देवि स चायं दृश्यतां स्थितः

atrāpi svayamevāhaṁ vṛṣadhvaja iti śrutaḥ | sānnidhyaṁ kṛtavān devi sa cāyaṁ dṛśyatāṁ sthitaḥ

यहाँ भी मैंने स्वयं ही 'वृषध्वज' नाम से प्रसिद्ध होकर सान्निध्य किया है। हे देवि, वह यह मूर्ति यहाँ स्थित देखी जा सकती है।

श्लोक 20 (skanda.8.29.20)

कपिलाह्रदतीर्थेस्मिन् स्नात्वा नान्यमना नरः । वृषध्वजमिमं दृष्ट्वा सर्वयज्ञफलं लभेत्

kapilāhradatīrthesmin snātvā nānyamanā naraḥ | vṛṣadhvajamimaṁ dṛṣṭvā sarvayajñaphalaṁ labhet

इस कपिलाह्रद तीर्थ में स्नान करके, एकाग्रचित्त होकर, इस वृषध्वज को देखकर मनुष्य समस्त यज्ञों का फल पाता है।

श्लोक 21 (skanda.8.29.21)

सलोकतां मृतश्चापि अर्चयित्वा तु मामिह । लभते देहभेदे तु गणत्वं चातिदुर्लभम्

salokatāṁ mṛtaścāpi arcayitvā tu māmiha | labhate dehabhede tu gaṇatvaṁ cātidurlabham

यहाँ मेरी पूजा करके, मरने के बाद वह मेरे लोक में सह-निवास पाता है, और शरीर छूटने पर अत्यन्त दुर्लभ गणपद भी प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (skanda.8.29.22)

अस्मिन्नपि प्रदेशे तु ता गावो ब्रह्मणा स्वयम् । शान्त्यर्थं सर्वलोकानां सर्वा दुग्धाः पयोमृतम्

asminnapi pradeśe tu tā gāvo brahmaṇā svayam | śāntyarthaṁ sarvalokānāṁ sarvā dugdhāḥ payomṛtam

इसी स्थान में समस्त लोकों की शान्ति के लिए ब्रह्मा ने स्वयं ही उन सभी गौओं को दुहकर अमृतमय दूध निकाला।

श्लोक 23 (skanda.8.29.23)

तासां क्षीरेण संजातं ह्रदमेतन्मनोहरम् । भद्रदोहमिति ख्यातं पुण्यं देवह्रदं शुभम्

tāsāṁ kṣīreṇa saṁjātaṁ hradametanmanoharam | bhadradohamiti khyātaṁ puṇyaṁ devahradaṁ śubham

उनके दूध से यह मनोहर ह्रद उत्पन्न हुआ, जो 'भद्रदोह' नाम से विख्यात, पुण्य, शुभ देव-ह्रद है।

श्लोक 24 (skanda.8.29.24)

सर्वैर्देवैरहं देवि अस्मिन्देशे प्रसादितः । गच्छोपशममीशेति उपशान्तशिवस्ततः

sarvairdevairahaṁ devi asmindeśe prasāditaḥ | gacchopaśamamīśeti upaśāntaśivastataḥ

हे देवि, इस स्थान में समस्त देवताओं ने मुझे प्रसन्न किया — 'हे ईश, शान्त हो जाइए' — तब से मैं 'उपशान्तशिव' कहलाया।

श्लोक 25 (skanda.8.29.25)

स्थितो भूत्वाहमत्रस्थः पुण्यमस्यापि दर्शनम् । दृष्ट्वैनं प्रयतो मर्त्यः स्वर्गलोकमवाप्नुयात्

sthito bhūtvāhamatrasthaḥ puṇyamasyāpi darśanam | dṛṣṭvainaṁ prayato martyaḥ svargalokamavāpnuyāt

मैं यहाँ स्थित होकर विराजमान हूँ; इसका दर्शन भी पुण्यदायक है। इसे देखकर संयतचित्त मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है।

श्लोक 26 (skanda.8.29.26)

अत्राहं ब्रह्मणानीय स्थापितः परमेष्ठिना । ब्रह्मणश्चापि संगृह्य विष्णुना स्थापितः पुनः

atrāhaṁ brahmaṇānīya sthāpitaḥ parameṣṭhinā | brahmaṇaścāpi saṁgṛhya viṣṇunā sthāpitaḥ punaḥ

यहाँ मुझे ब्रह्मा परमेष्ठी लाकर स्थापित किया, और फिर ब्रह्मा से लेकर विष्णु ने पुनः स्थापित किया।

श्लोक 27 (skanda.8.29.27)

ब्रह्मणा स ततो विष्णुः प्रोक्तः संविग्नचेतसा । मयानीतमिदं लिङ्गं कस्मात् स्थापितवानसि

brahmaṇā sa tato viṣṇuḥ proktaḥ saṁvignacetasā | mayānītamidaṁ liṅgaṁ kasmāt sthāpitavānasi

तब ब्रह्मा ने व्याकुलचित्त होकर विष्णु से कहा — मेरे द्वारा लाया गया यह लिंग तुमने क्यों स्थापित कर दिया?

श्लोक 28 (skanda.8.29.28)

तमुवाच पुनर्विष्णुर्ब्रह्माणं कुपिताननम् । रुद्रदेवे ममात्यन्तं परा भक्तिर्महत्तरा

tamuvāca punarviṣṇurbrahmāṇaṁ kupitānanam | rudradeve mamātyantaṁ parā bhaktirmahattarā

विष्णु ने क्रुद्धमुख उस ब्रह्मा से फिर कहा — रुद्रदेव में मेरी अत्यन्त, परम, महान भक्ति है —

श्लोक 29 (skanda.8.29.29)

मयैष स्थापितस्तेन नाम्ना तव भविष्यति । हिरण्यगर्भ इत्येवं ततोत्राहं समास्थितः

mayaiṣa sthāpitastena nāmnā tava bhaviṣyati | hiraṇyagarbha ityevaṁ tatotrāhaṁ samāsthitaḥ

— इसीलिए मैंने इसे स्थापित किया है, और यह तुम्हारे ही नाम से जाना जाएगा — 'हिरण्यगर्भ'। तभी से मैं यहाँ स्थित हूँ।

श्लोक 30 (skanda.8.29.30)

दृष्ट्वैनमपि देवेशे मम लोकं व्रजेन्नरः । पुनरेव ततो ब्रह्मा मम लिङ्गमिदं शुभे

dṛṣṭvainamapi deveśe mama lokaṁ vrajennaraḥ | punareva tato brahmā mama liṅgamidaṁ śubhe

इसे देखकर भी मनुष्य मेरे लोक को जाता है। फिर हे शुभे, ब्रह्मा ने पुनः मेरा यह लिंग —

श्लोक 31 (skanda.8.29.31)

स्थापयामास विधिवद् भक्त्या परमया युतः । स्वलीनेश्वर इत्येवमत्राहं स्वयमास्थितः

sthāpayāmāsa vidhivad bhaktyā paramayā yutaḥ | svalīneśvara ityevamatrāhaṁ svayamāsthitaḥ

— परम भक्ति से युक्त होकर विधिपूर्वक स्थापित किया। इस प्रकार यहाँ मैं स्वयं 'स्वलीनेश्वर' के रूप में स्थित हूँ।

श्लोक 32 (skanda.8.29.32)

स्वस्मिन् परतरे लीनः प्रधाने मम कारणे । तस्मात् स्वलीनमित्येवं गुह्यं क्षेत्रं मम स्मृतम्

svasmin paratare līnaḥ pradhāne mama kāraṇe | tasmāt svalīnamityevaṁ guhyaṁ kṣetraṁ mama smṛtam

अपने ही परम स्वरूप में, अपने कारण प्रधान में लीन होने के कारण यह मेरा गुह्य क्षेत्र 'स्वलीन' कहा जाता है।

श्लोक 33 (skanda.8.29.33)

प्राणानिह नरस्त्यक्त्वा न पुनर्जायते क्वचित् । आनन्त्या सा गतिस्तस्य योगिनां चैव सा स्मृता

prāṇāniha narastyaktvā na punarjāyate kvacit | ānantyā sā gatistasya yogināṁ caiva sā smṛtā

यहाँ प्राण त्यागने वाला मनुष्य फिर कहीं जन्म नहीं लेता। वह अनन्त गति उसकी होती है, जो योगियों की भी स्मृत गति है।

श्लोक 34 (skanda.8.29.34)

अस्मिन्नपि मया देशे दैत्यो दैवतकण्टकः । व्याघ्ररूपं समास्थाय निहतो दर्पितो बली

asminnapi mayā deśe daityo daivatakaṇṭakaḥ | vyāghrarūpaṁ samāsthāya nihato darpito balī

इसी स्थान में देवताओं का कण्टक, व्याघ्ररूपधारी, अभिमानी और बलवान दैत्य भी मेरे द्वारा मारा गया था।

श्लोक 35 (skanda.8.29.35)

व्याघ्रेश्वरस्ततः ख्यातो नित्यमत्राहमास्थितः । न पुनर्दुर्गतिं यायत् दृष्ट्वा चेमं महेश्वरम्

vyāghreśvarastataḥ khyāto nityamatrāhamāsthitaḥ | na punardurgatiṁ yāyat dṛṣṭvā cemaṁ maheśvaram

तब से मैं 'व्याघ्रेश्वर' नाम से विख्यात होकर यहाँ नित्य स्थित हूँ। इस महेश्वर को देखकर मनुष्य फिर दुर्गति को नहीं जाता।

श्लोक 36 (skanda.8.29.36)

उत्पलो विदलश्चैव यौ दैत्यौ ब्रह्मणा पुरा । स्त्रीवध्यौ दर्पितौ सृष्टौ त्वयैव निहतौ शुभे

utpalo vidalaścaiva yau daityau brahmaṇā purā | strīvadhyau darpitau sṛṣṭau tvayaiva nihatau śubhe

उत्पल और विदल नामक जो दो दैत्य पूर्वकाल में ब्रह्मा द्वारा, स्त्री के अतिरिक्त अवध्य, अभिमानी बनाकर सृजे गए थे, हे शुभे, वे तुम्हारे ही द्वारा मारे गए।

श्लोक 37 (skanda.8.29.37)

सावज्ञं गेन्दुकेनात्र तस्येदं चिह्नमास्थितम् । आदावत्राहमागत्य आस्थितो गणपैः सह

sāvajñaṁ gendukenātra tasyedaṁ cihnamāsthitam | ādāvatrāhamāgatya āsthito gaṇapaiḥ saha

यहाँ अवज्ञापूर्वक गेंद से (उन्हें मारने) का यह चिह्न विद्यमान है। सबसे पहले मैं यहाँ आकर गणों सहित स्थित हुआ।

श्लोक 38 (skanda.8.29.38)

ज्येष्ठं स्थानमिदं तस्मादेतन्मे पुण्यदर्शनम् । दृष्ट्वेदं मम लिङ्गन्तु ज्येष्ठस्थानसमाश्रितम्

jyeṣṭhaṁ sthānamidaṁ tasmādetanme puṇyadarśanam | dṛṣṭvedaṁ mama liṅgantu jyeṣṭhasthānasamāśritam

इसलिए यह मेरा 'ज्येष्ठ' स्थान है, और इसका दर्शन पुण्यकारक है। ज्येष्ठस्थान में स्थित मेरे इस लिंग को देखकर —

श्लोक 39 (skanda.8.29.39)

न शोचति पुनर्मर्त्यः संसिद्धो मृत्युजन्मनी । समन्ताद्देवतैस्सर्वैर्लिङ्गानि स्थापितानि ह

na śocati punarmartyaḥ saṁsiddho mṛtyujanmanī | samantāddevataissarvairliṅgāni sthāpitāni ha

— सिद्धि पाया हुआ मनुष्य फिर मृत्यु और जन्म पर शोक नहीं करता। यहाँ सब ओर समस्त देवताओं द्वारा लिंग स्थापित किए गए हैं।

श्लोक 40 (skanda.8.29.40)

दृष्टवा तु नियतं मर्त्यो देहभेदे गणो भवेत् । मया त्विह समागत्य स्वयमेव यतः स्थितम्

dṛṣṭavā tu niyataṁ martyo dehabhede gaṇo bhavet | mayā tviha samāgatya svayameva yataḥ sthitam

उन्हें देखकर संयमी मनुष्य शरीर छूटने पर गण बन जाता है। और चूँकि मैं स्वयं यहाँ आकर स्थित हुआ —

श्लोक 41 (skanda.8.29.41)

न च मुक्तं मया यस्मादविमुक्तमिदं ततः । क्षेत्रं वाराणसी पुण्या मुक्तिदं संभविष्यति

na ca muktaṁ mayā yasmādavimuktamidaṁ tataḥ | kṣetraṁ vārāṇasī puṇyā muktidaṁ saṁbhaviṣyati

— और कभी इसे छोड़ा नहीं, इसीलिए यह 'अविमुक्त' कहलाया। यह पुण्य वाराणसी क्षेत्र मुक्ति देने वाला होगा।

श्लोक 42 (skanda.8.29.42)

अविमुक्तेश्वरं मां वै योत्र द्रक्ष्यति मानवः । गाणपत्या गतिस्तस्य यत्र तत्र मृतस्य ह

avimukteśvaraṁ māṁ vai yotra drakṣyati mānavaḥ | gāṇapatyā gatistasya yatra tatra mṛtasya ha

जो भी मनुष्य यहाँ मुझे 'अविमुक्तेश्वर' रूप में देखेगा, वह चाहे जहाँ भी मरे, उसकी गति गाणपत्य पद ही होगी।

श्लोक 43 (skanda.8.29.43)

प्राणानिह तु संन्यस्य यास्यते मुक्तिमुत्तमाम् । पित्रा ते गिरिराजेन पुरा हिमवता स्वयम्

prāṇāniha tu saṁnyasya yāsyate muktimuttamām | pitrā te girirājena purā himavatā svayam

और यहाँ प्राण त्यागकर वह परम मुक्ति को प्राप्त होगा। तुम्हारे पिता, गिरिराज हिमवान ने भी पहले स्वयं —

श्लोक 44 (skanda.8.29.44)

मम प्रियमिदं स्थानं ज्ञात्वा लिङ्गः प्रतिष्ठितम् । शैलेश्वरमितिख्यातं दृश्यतामिदमास्थितम्

mama priyamidaṁ sthānaṁ jñātvā liṅgaḥ pratiṣṭhitam | śaileśvaramitikhyātaṁ dṛśyatāmidamāsthitam

— इस स्थान को मुझे प्रिय जानकर एक लिंग प्रतिष्ठित किया, जो 'शैलेश्वर' नाम से विख्यात होकर यहाँ स्थित देखा जा सकता है।

श्लोक 45 (skanda.8.29.45)

दृष्ट्वेदं मनुजो देवि न दुर्गतिमनुव्रजेत् । नदी वाराणसी चेयं पुण्या पापप्रमोचनी

dṛṣṭvedaṁ manujo devi na durgatimanuvrajet | nadī vārāṇasī ceyaṁ puṇyā pāpapramocanī

हे देवि, इसे देखकर मनुष्य दुर्गति को नहीं जाता। और यह वाराणसी नदी भी पवित्र और पापनाशक है।

श्लोक 46 (skanda.8.29.46)

क्षेत्रमेतदलंकृत्य जाह्नव्या सह संगता । स्थापितं संगमे चास्मिन् ब्रह्मणा लिङ्गमुत्तमम्

kṣetrametadalaṁkṛtya jāhnavyā saha saṁgatā | sthāpitaṁ saṁgame cāsmin brahmaṇā liṅgamuttamam

इस क्षेत्र को अलंकृत करके यह गंगा से मिलती है, और इस संगम पर ब्रह्मा ने एक उत्तम लिंग स्थापित किया।

श्लोक 47 (skanda.8.29.47)

संगमेश्वर इत्येवं ख्यातं जगति दृश्यताम् । संगमे देवनद्योस्तु यः स्नात्वा मनुजः शुचिः

saṁgameśvara ityevaṁ khyātaṁ jagati dṛśyatām | saṁgame devanadyostu yaḥ snātvā manujaḥ śuciḥ

यह 'संगमेश्वर' नाम से विख्यात होकर जगत् में दर्शनीय है। दोनों दिव्य नदियों के संगम में जो शुद्ध मनुष्य स्नान करके —

श्लोक 48 (skanda.8.29.48)

अर्चयेत् संगमेशानं तस्य जन्मभयं कुतः । इदमन्यद् बृहत् क्षेत्रं निवासं योगिनां परम्

arcayet saṁgameśānaṁ tasya janmabhayaṁ kutaḥ | idamanyad bṛhat kṣetraṁ nivāsaṁ yogināṁ param

— संगमेश की पूजा करता है, उसे जन्म का भय कहाँ रहता है? यह एक और महान क्षेत्र है, योगियों का सर्वोत्तम निवास —

श्लोक 49 (skanda.8.29.49)

क्षेत्रमध्ये च यत्राहं स्वयं भूत्वा समास्थितः । मध्यमेश्वर इत्येवं ख्यातं सर्वसुरासुरैः

kṣetramadhye ca yatrāhaṁ svayaṁ bhūtvā samāsthitaḥ | madhyameśvara ityevaṁ khyātaṁ sarvasurāsuraiḥ

— क्षेत्र के मध्य में, जहाँ मैं स्वयं होकर स्थित हुआ, वह 'मध्यमेश्वर' नाम से समस्त सुर-असुरों में विख्यात है।

श्लोक 50 (skanda.8.29.50)

सिद्धानां स्थानमेतद्धि मदीयव्रतचारिणाम् । योगिनां मोक्षलिप्सूनां जन्ममृत्युजितात्मनाम्

siddhānāṁ sthānametaddhi madīyavratacāriṇām | yogināṁ mokṣalipsūnāṁ janmamṛtyujitātmanām

यह मेरे व्रत का पालन करने वाले सिद्धों का, तथा मोक्ष की इच्छा करने वाले, जन्म-मृत्यु को जीत लेने वाले योगियों का स्थान है।

श्लोक 51 (skanda.8.29.51)

दृष्ट्वेदं मध्यमेशानं जन्म प्रति न शोचति । स्थापितं लिङ्गमेतच्च शुक्रेण तव सूनुना

dṛṣṭvedaṁ madhyameśānaṁ janma prati na śocati | sthāpitaṁ liṅgametacca śukreṇa tava sūnunā

इस मध्यमेशान को देखकर मनुष्य जन्म के प्रति शोक नहीं करता। और यह लिंग तुम्हारे पुत्र शुक्र ने स्थापित किया है —

श्लोक 52 (skanda.8.29.52)

नाम्ना शुक्रेश्वरमिति सर्वसिद्धामरार्चितम् । दृष्ट्वेदं मानवः सद्यो मुक्तः स्यात् सर्वकिल्बिषैः

nāmnā śukreśvaramiti sarvasiddhāmarārcitam | dṛṣṭvedaṁ mānavaḥ sadyo muktaḥ syāt sarvakilbiṣaiḥ

— 'शुक्रेश्वर' नाम से, जो समस्त सिद्धों और देवताओं द्वारा पूजित है। इसे देखकर मनुष्य तुरन्त समस्त पापों से मुक्त हो जाता है —

श्लोक 53 (skanda.8.29.53)

मृतश्च न पुनर्जन्म संसारे तु लभेन्नरः । पुरा जम्बुकरूपेण असुरा देवकण्टकाः

mṛtaśca na punarjanma saṁsāre tu labhennaraḥ | purā jambukarūpeṇa asurā devakaṇṭakāḥ

— और मरने पर मनुष्य फिर संसार में जन्म नहीं पाता। पूर्वकाल में गीदड़ के रूप में देवताओं का कण्टक एक असुर —

श्लोक 54 (skanda.8.29.54)

ते ब्रह्मणो वरं लब्ध्वा गोमायुवधशंकिताः । निहताः हिमवत्पुत्रि जम्बुकेशस्ततो ह्यहम्

te brahmaṇo varaṁ labdhvā gomāyuvadhaśaṁkitāḥ | nihatāḥ himavatputri jambukeśastato hyaham

— ब्रह्मा से यह वर पाकर कि गीदड़ के अतिरिक्त उसका वध कोई नहीं कर सकता, हे हिमवत्पुत्रि, वह मेरे द्वारा मारा गया; तभी से मैं 'जम्बुकेश' हूँ।

श्लोक 55 (skanda.8.29.55)

अभवं जगति ख्यातः सुरासुरनमस्कृतः । दृष्ट्वैनमपि देवेशं सर्वकामानवाप्नुयात्

abhavaṁ jagati khyātaḥ surāsuranamaskṛtaḥ | dṛṣṭvainamapi deveśaṁ sarvakāmānavāpnuyāt

मैं जगत् में विख्यात होकर सुर-असुरों द्वारा नमस्कृत हुआ। इस देवेश को देखकर भी मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 56 (skanda.8.29.56)

ग्रहैः शुक्रपुरोगैश्च एतानि स्थापितानि हि । पश्य लिङ्गानि पुण्यानि सर्वकामदुघानि मे

grahaiḥ śukrapurogaiśca etāni sthāpitāni hi | paśya liṅgāni puṇyāni sarvakāmadughāni me

शुक्र आदि ग्रहों द्वारा ये सब स्थापित किए गए हैं। मेरे इन पुण्य, सर्वकामनापूरक लिंगों को देखो।

श्लोक 57 (skanda.8.29.57)

इत्थमेतानि पुण्यानि मन्निवासानि पार्वति । कथितानि तव क्षेत्रे गुह्य चान्यदिदं शृणु

itthametāni puṇyāni mannivāsāni pārvati | kathitāni tava kṣetre guhya cānyadidaṁ śṛṇu

हे पार्वति, इस प्रकार तुम्हारे इस क्षेत्र में मेरे ये पुण्य निवास बताए गए। अब यह एक और गुह्य बात सुनो।

श्लोक 58 (skanda.8.29.58)

क्रोशं क्रोशं चतुर्दिक्षु क्षेत्रमेतत्प्रकीर्तितम् । चारु अंगि मृत्युकालेमृतप्रदम्

krośaṁ krośaṁ caturdikṣu kṣetrametatprakīrtitam | cāru aṁgi mṛtyukālemṛtapradam

यह क्षेत्र चारों दिशाओं में एक-एक क्रोश तक फैला हुआ बताया गया है (यहाँ पाठ का कुछ अंश खण्डित है); हे सुन्दरांगी, यह मृत्यु के समय अमृतत्व प्रदान करने वाला है।

श्लोक 59 (skanda.8.29.59)

स्थाने केदारे च व्यवस्थितम् । गणत्वं लभ्यते दृष्टवा क्षेत्रेस्मिन् मोक्षमाप्यते

sthāne kedāre ca vyavasthitam | gaṇatvaṁ labhyate dṛṣṭavā kṣetresmin mokṣamāpyate

(इससे पूर्व अधिकांश श्लोक मूल पाठ में खण्डित है) — केदार में स्थित। इस क्षेत्र में देखने मात्र से गणपद प्राप्त होता है, और मोक्ष भी प्राप्त होता है।

श्लोक 60 (skanda.8.29.60)

गाणपत्यपदात्तस्मात् यतः स्यान्मुक्तिरुत्तमा । ततो महालयात्तस्मात् केदारान्मध्यमादपि

gāṇapatyapadāttasmāt yataḥ syānmuktiruttamā | tato mahālayāttasmāt kedārānmadhyamādapi

उस गाणपत्य पद से भी, जहाँ से उत्तम मुक्ति होती है, बढ़कर, फिर महालय से, केदार से और मध्यम से भी बढ़कर —

श्लोक 61 (skanda.8.29.61)

स्मृतं पुण्यतमं क्षेत्रमविमुक्तमिदं शुभे । केदारमध्यमे स्थाने स्थानं चैव महालयम्

smṛtaṁ puṇyatamaṁ kṣetramavimuktamidaṁ śubhe | kedāramadhyame sthāne sthānaṁ caiva mahālayam

— हे शुभे, यह अविमुक्त क्षेत्र सर्वाधिक पुण्यमय माना गया है — केदार और मध्यम स्थान से, तथा महालय स्थान से भी अधिक।

श्लोक 62 (skanda.8.29.62)

मम पुण्यानि भूर्लोके तेभ्यः श्रेष्ठतमं त्विदम् । यदा मृष्टानि लोकानि ततः क्षेत्रमिदं शुभम्

mama puṇyāni bhūrloke tebhyaḥ śreṣṭhatamaṁ tvidam | yadā mṛṣṭāni lokāni tataḥ kṣetramidaṁ śubham

भूलोक में मेरे जो पुण्यस्थान हैं, उन सबमें यह श्रेष्ठतम है। जब समस्त लोक मिट जाएँगे, तब भी यह शुभ क्षेत्र बना रहेगा।

श्लोक 63 (skanda.8.29.63)

कदाचिन्न मया मुक्तमविमुक्तं ततोभवत् । अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं मम दृष्ट्वेह मानवः

kadācinna mayā muktamavimuktaṁ tatobhavat | avimukteśvaraṁ liṅgaṁ mama dṛṣṭveha mānavaḥ

यह मेरे द्वारा कभी नहीं छोड़ा गया, इसीलिए यह 'अविमुक्त' हुआ। यहाँ मेरे इस अविमुक्तेश्वर लिंग को देखकर मनुष्य —

श्लोक 64 (skanda.8.29.64)

सद्यः पापविनिर्मुक्तः पशुपाशैर्विमुच्यते । शैलेशं संगमेशं च स्वलीनं मध्यमेश्वरम्

sadyaḥ pāpavinirmuktaḥ paśupāśairvimucyate | śaileśaṁ saṁgameśaṁ ca svalīnaṁ madhyameśvaram

— तुरन्त पापों से मुक्त होकर सांसारिक बन्धनों से भी मुक्त हो जाता है। शैलेश, संगमेश, स्वलीन और मध्यमेश्वर —

श्लोक 65 (skanda.8.29.65)

हिरण्यगर्भमीशानं गोप्रेक्षं सवृषध्वजम् । उपशान्तशिवं चैव ज्येष्ठस्थाननिवासिनम्

hiraṇyagarbhamīśānaṁ goprekṣaṁ savṛṣadhvajam | upaśāntaśivaṁ caiva jyeṣṭhasthānanivāsinam

— हिरण्यगर्भ ईशान, वृषध्वज सहित गोप्रेक्ष, उपशान्तशिव, तथा ज्येष्ठस्थान-निवासी को —

श्लोक 66 (skanda.8.29.66)

शुक्रेश्वरं च विख्यातं व्याघ्रेशं जम्बुकेश्वरम् । दृष्टवा न जायते मर्त्यः संसारे दुःखसागरे

śukreśvaraṁ ca vikhyātaṁ vyāghreśaṁ jambukeśvaram | dṛṣṭavā na jāyate martyaḥ saṁsāre duḥkhasāgare

— और प्रसिद्ध शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश, जम्बुकेश्वर को — इन सबको देखकर मनुष्य फिर दुःखसागर संसार में जन्म नहीं लेता।

श्लोक 67 (skanda.8.29.67)

सनत्कुमार उवाच। एवमुक्त्वा महादेवो दिशः सर्वा व्यलोकयत् । विलोक्य संस्थिते पश्चाद् देवदेवे महेश्वरे

sanatkumāra uvāca| evamuktvā mahādevo diśaḥ sarvā vyalokayat | vilokya saṁsthite paścād devadeve maheśvare

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहकर महादेव ने सब दिशाओं की ओर देखा। इस प्रकार देखकर, देवदेव महेश्वर के वहाँ स्थिर होने पर —

श्लोक 68 (skanda.8.29.68)

अकस्मादभवत् सर्वं तत् क्षेत्रं ज्वलितं यथा । सविद्युत्स्तनिताघोष सूर्यायुतशतोदितम्

akasmādabhavat sarvaṁ tat kṣetraṁ jvalitaṁ yathā | savidyutstanitāghoṣa sūryāyutaśatoditam

— अकस्मात् वह सम्पूर्ण क्षेत्र मानो प्रज्वलित हो उठा, बिजली और गर्जन की ध्वनि के साथ, मानो लाखों सूर्य एक साथ उदय हुए हों।

श्लोक 69 (skanda.8.29.69)

तेजोभिरेकतः पूर्णं वह्निभास्करयोरिव । ततः पाशुपताः सिद्धा भस्माभ्यंगसितप्रभाः

tejobhirekataḥ pūrṇaṁ vahnibhāskarayoriva | tataḥ pāśupatāḥ siddhā bhasmābhyaṁgasitaprabhāḥ

वह अग्नि और सूर्य के तेज के समान एकत्रित तेज से परिपूर्ण हो गया। तब भस्म-लेपन से श्वेत-कान्ति वाले पाशुपत सिद्ध —

श्लोक 70 (skanda.8.29.70)

योगीश्वरा महात्मानस्तथा वैतानिकव्रताः । अव्यक्तलिङ्गिनश्चैव शिवयोगोज्ज्वलप्रभाः

yogīśvarā mahātmānastathā vaitānikavratāḥ | avyaktaliṅginaścaiva śivayogojjvalaprabhāḥ

— योगेश्वर महात्मा, वैतानिक व्रत वाले, अव्यक्त-लिंगधारी, शिवयोग से उज्ज्वल तेजवाले —

श्लोक 71 (skanda.8.29.71)

बहवः सहसोपेत्य नमश्चक्रुर्महेश्वरम् । पुनर्निरीक्ष्य देवेशं ध्यानयोगञ्च कृत्स्नशः

bahavaḥ sahasopetya namaścakrurmaheśvaram | punarnirīkṣya deveśaṁ dhyānayogañca kṛtsnaśaḥ

— अनेक लोग अचानक आकर महेश्वर को नमस्कार करने लगे। पुनः देवेश की ओर देखकर पूर्णतः ध्यानयोग में लीन होकर —

श्लोक 72 (skanda.8.29.72)

तस्थुरात्मानमाधाय लीयमाना इवेश्वरे । स्थितानां स तथा तेषां देवदेव उमापतिः

tasthurātmānamādhāya līyamānā iveśvare | sthitānāṁ sa tathā teṣāṁ devadeva umāpatiḥ

— वे स्वयं को समाहित करके, मानो ईश्वर में लीन होते हुए, खड़े हो गए। उन इस प्रकार स्थित लोगों को देवदेव उमापति ने —

श्लोक 73 (skanda.8.29.73)

सञ्चिन्त्य परमां मूर्तिं बभूव पुरुषः प्रभुः । षड्विंश ईश्वरोव्यक्तः सूर्यायुतसमप्रभः

sañcintya paramāṁ mūrtiṁ babhūva puruṣaḥ prabhuḥ | ṣaḍviṁśa īśvarovyaktaḥ sūryāyutasamaprabhaḥ

— अपने परम स्वरूप का चिन्तन करके, वे प्रभु पुरुष बन गए — छब्बीसवें तत्त्व, अव्यक्त ईश्वर, दस हजार सूर्यों के समान तेजस्वी।

श्लोक 74 (skanda.8.29.74)

कृत्स्नं जगदिवैकस्थं कर्तुं मत्त इवास्थितः । तस्य तां परमां मूर्तिमास्थितस्य जगत्प्रभोः

kṛtsnaṁ jagadivaikasthaṁ kartuṁ matta ivāsthitaḥ | tasya tāṁ paramāṁ mūrtimāsthitasya jagatprabhoḥ

वे मानो सम्पूर्ण जगत् को एक स्थान पर समेट देने के लिए मत्त-से खड़े हो गए। उन जगत्प्रभु द्वारा धारण किए गए उस परम रूप को —

श्लोक 75 (skanda.8.29.75)

न शशाक वपुर्द्रष्टुं हृष्टरोमा गिरीन्द्रजा । ततस्तं हृष्टमात्मानं बुद्ध्वा सा प्रकृतिस्थितम्

na śaśāka vapurdraṣṭuṁ hṛṣṭaromā girīndrajā | tatastaṁ hṛṣṭamātmānaṁ buddhvā sā prakṛtisthitam

— रोमांचित गिरिराजपुत्री देवी देख नहीं सकीं। तब उन्हें प्रसन्न और अपने स्वाभाविक रूप में स्थित जानकर, प्रकृति-रूप वे —

श्लोक 76 (skanda.8.29.76)

प्रकृतेर्मूर्त्तिमास्थाय योगेन परमात्मिकाम् । न शशाक वपुर्द्रष्टुं पुरुषस्य परात्मनः

prakṛtermūrttimāsthāya yogena paramātmikām | na śaśāka vapurdraṣṭuṁ puruṣasya parātmanaḥ

— योग से प्रकृति के परम स्वरूप को धारण करके भी वे उस परमात्मा पुरुष के स्वरूप को नहीं देख सकीं।

श्लोक 77 (skanda.8.29.77)

ततस्ते लयमाधाय योगिनः पुरुषस्य तु । विविशुर्हृदयं सर्वे दग्धसंसारबीजिनः

tataste layamādhāya yoginaḥ puruṣasya tu | viviśurhṛdayaṁ sarve dagdhasaṁsārabījinaḥ

तब वे योगीजन, संसार के बीज को जलाकर, लय को प्राप्त होकर उस पुरुष के हृदय में सब प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 78 (skanda.8.29.78)

अनुगृह्य ततः सर्वान् तान् सिद्धान् यतिपुङ्गवान् । नीललोहितमूर्तिस्थं पुनश्चक्रे वपुः शुभम्

anugṛhya tataḥ sarvān tān siddhān yatipuṅgavān | nīlalohitamūrtisthaṁ punaścakre vapuḥ śubham

फिर उन समस्त सिद्ध यतिश्रेष्ठों पर अनुग्रह करके उन्होंने नीललोहित रूप में स्थित अपना शुभ शरीर फिर से धारण कर लिया।

श्लोक 79 (skanda.8.29.79)

तद् दृष्ट्वा शैलजा प्राह हृष्टसर्वतनूरुहा । स्तुन्वन्ती चरणौ गत्वा क इमे भगवन्निति

tad dṛṣṭvā śailajā prāha hṛṣṭasarvatanūruhā | stunvantī caraṇau gatvā ka ime bhagavanniti

इसे देखकर, समस्त शरीर के रोमांचित पर्वतसुता ने स्तुति करते हुए उनके चरणों में जाकर पूछा — हे भगवन्, ये कौन थे?

श्लोक 80 (skanda.8.29.80)

तामुवाच सुरश्रेष्ठस्तदा देवीं गिरीन्द्रजाम् । मदीयं व्रतमाश्रित्य भक्तिमद्भिर्द्विजोत्तमैः

tāmuvāca suraśreṣṭhastadā devīṁ girīndrajām | madīyaṁ vratamāśritya bhaktimadbhirdvijottamaiḥ

तब देवश्रेष्ठ ने उस गिरिराजपुत्री देवी से कहा — मेरे व्रत का आश्रय लेने वाले भक्तिमान श्रेष्ठ द्विजों द्वारा —

श्लोक 81 (skanda.8.29.81)

यैर्यैर्योग इहाभ्यस्तस्तेषामेकेन जन्मना । क्षेत्रस्यास्य प्रभावेण भक्त्या च मम भावनात्

yairyairyoga ihābhyastasteṣāmekena janmanā | kṣetrasyāsya prabhāveṇa bhaktyā ca mama bhāvanāt

— जिन-जिनके द्वारा यहाँ योग का अभ्यास किया गया है, उनके लिए एक ही जन्म में, इस क्षेत्र के प्रभाव से और भक्ति से मेरे ध्यान द्वारा —

श्लोक 82 (skanda.8.29.82)

अनुग्रहो मया ह्येवं क्रियते मुक्तिदः सदा । तस्मादिदं महत् क्षेत्रं ब्रह्माद्यैः सेव्यते मम

anugraho mayā hyevaṁ kriyate muktidaḥ sadā | tasmādidaṁ mahat kṣetraṁ brahmādyaiḥ sevyate mama

— मेरे द्वारा सदा मुक्तिदायक अनुग्रह किया जाता है। इसीलिए मेरा यह महान क्षेत्र ब्रह्मा आदि देवों द्वारा सेवित है —

श्लोक 83 (skanda.8.29.83)

श्रुतिमद्भिश्च विप्रेन्द्रैः संसिद्धैश्च तपस्विभिः । प्रतिमासमथाष्टम्यां प्रतिमासं चतुर्दशीम्

śrutimadbhiśca viprendraiḥ saṁsiddhaiśca tapasvibhiḥ | pratimāsamathāṣṭamyāṁ pratimāsaṁ caturdaśīm

— और वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा सिद्ध तपस्वियों द्वारा, प्रतिमास अष्टमी और प्रतिमास चतुर्दशी को —

श्लोक 84 (skanda.8.29.84)

उभयोः पक्षयोर्देवि वाराणस्यां ममास्पदे । शशिभानूपरागे च कार्तिक्यान्तु विशेषतः

ubhayoḥ pakṣayordevi vārāṇasyāṁ mamāspade | śaśibhānūparāge ca kārtikyāntu viśeṣataḥ

— हे देवि, दोनों पक्षों में, वाराणसी में मेरे इस स्थान पर, तथा चन्द्र-सूर्यग्रहण के अवसर पर, और विशेषतः कार्तिक पूर्णिमा को —

श्लोक 85 (skanda.8.29.85)

सर्वपर्वसु पुण्येषु विषुवेष्वयनेषु च । पृथिव्यां सर्वं तीर्थानि वाराणस्यां तु जाह्नवी

sarvaparvasu puṇyeṣu viṣuveṣvayaneṣu ca | pṛthivyāṁ sarvaṁ tīrthāni vārāṇasyāṁ tu jāhnavī

— समस्त पुण्य पर्वों पर, विषुव और अयन के अवसरों पर — पृथ्वी के समस्त तीर्थ, वाराणसी में गंगा —

श्लोक 86 (skanda.8.29.86)

उत्तरप्रवहां पुण्यां मम मौलिविनिर्गताम् । पितुस्ते गिरिराजाच्च स्रुतां हिमवतः शुभाम्

uttarapravahāṁ puṇyāṁ mama maulivinirgatām | pituste girirājācca srutāṁ himavataḥ śubhām

— जो उत्तर की ओर बहने वाली, पवित्र, मेरे मुकुट से निकली हुई, तुम्हारे पिता गिरिराज हिमवान से प्रवाहित हुई है —

श्लोक 87 (skanda.8.29.87)

भजन्ति सर्वतोभ्येत्य ताञ्छृणुष्व वरानने । सन्निहित्या कुरुक्षेत्रं सार्धं तीर्थशतैस्तथा

bhajanti sarvatobhyetya tāñchṛṇuṣva varānane | sannihityā kurukṣetraṁ sārdhaṁ tīrthaśataistathā

— सब ओर से आकर उसकी सेवा करते हैं; हे वरानने, उन्हें सुनो — सन्निहित्या, कुरुक्षेत्र, तथा सैकड़ों अन्य तीर्थों सहित —

श्लोक 88 (skanda.8.29.88)

पुष्करं नैमिशं चैव प्रयागं च पृथूदकम् । सन्ध्या सप्तरिचञ्चैव सर्वा नद्यः सरांसि च

puṣkaraṁ naimiśaṁ caiva prayāgaṁ ca pṛthūdakam | sandhyā saptaricañcaiva sarvā nadyaḥ sarāṁsi ca

— पुष्कर, नैमिष, प्रयाग, पृथूदक, सन्ध्या, सप्तर्षि, तथा समस्त नदियाँ और सरोवर —

श्लोक 89 (skanda.8.29.89)

समुद्राः सप्त चैवात्र देवतीर्थानि कृत्स्नशः । भागीरथीं समेष्यन्ति सर्वपर्वसु काशिगाम्

samudrāḥ sapta caivātra devatīrthāni kṛtsnaśaḥ | bhāgīrathīṁ sameṣyanti sarvaparvasu kāśigām

— सातों समुद्र, तथा समस्त देवतीर्थ भी, हर पुण्य पर्व पर काशी में स्थित गंगा में एकत्रित होते हैं।

श्लोक 90 (skanda.8.29.90)

अविमुक्तेश्वरं मां च काशीस्थमचलात्मजे । पृथिव्यां यानि पुण्यानि मह्यमायतनानि च

avimukteśvaraṁ māṁ ca kāśīsthamacalātmaje | pṛthivyāṁ yāni puṇyāni mahyamāyatanāni ca

हे अचलात्मजे, काशी में स्थित मुझ अविमुक्तेश्वर में, पृथ्वी पर स्थित मेरे जितने भी पुण्य मन्दिर हैं —

श्लोक 91 (skanda.8.29.91)

प्रविशन्ति सदाभ्येत्य पुण्यां पर्वसु पर्वसु । केदारे चैव यल्लिङ्गं यच्च लिङ्गं महालये

praviśanti sadābhyetya puṇyāṁ parvasu parvasu | kedāre caiva yalliṅgaṁ yacca liṅgaṁ mahālaye

— वे सब हर पर्व पर आकर इस पवित्र स्थान में प्रविष्ट होते हैं। केदार में जो लिंग है, और महालय में जो लिंग है —

श्लोक 92 (skanda.8.29.92)

मध्यमेश्वरसंस्थं च तथा पशुपतीश्वरम् । शंकुकर्णेश्वरं चैव गोकर्णेशौ तथा ह्युभौ

madhyameśvarasaṁsthaṁ ca tathā paśupatīśvaram | śaṁkukarṇeśvaraṁ caiva gokarṇeśau tathā hyubhau

— और मध्यमेश्वर में स्थित, तथा पशुपतीश्वर में, शंकुकर्णेश्वर में, और गोकर्णेश के दोनों स्थानों में —

श्लोक 93 (skanda.8.29.93)

द्रिमिचण्डेश्वरं चैव भद्रेश्वरमथेश्वरम् । स्थानेश्वरमथैकाम्रं कालेश्वरमजेश्वरम्

drimicaṇḍeśvaraṁ caiva bhadreśvaramatheśvaram | sthāneśvaramathaikāmraṁ kāleśvaramajeśvaram

— द्रिमिचण्डेश्वर, भद्रेश्वर, ईश्वर, स्थानेश्वर, एकाम्र, कालेश्वर, अजेश्वर —

श्लोक 94 (skanda.8.29.94)

भैरवेश्वरमीशानं तथा कारोहणस्थितम् । यानि चान्यानि पुण्यानि स्थानानि मम भूतले

bhairaveśvaramīśānaṁ tathā kārohaṇasthitam | yāni cānyāni puṇyāni sthānāni mama bhūtale

— भैरवेश्वर, ईशान, तथा कारोहण में स्थित, और भूतल पर मेरे जो भी अन्य पुण्यस्थान हैं —

श्लोक 95 (skanda.8.29.95)

तानि सर्वाण्यशेषेण काशिपुर्यां विशन्ति माम् । सर्वपर्वसु पुण्येषु गुह्यं चैतदुदाहृतम्

tāni sarvāṇyaśeṣeṇa kāśipuryāṁ viśanti mām | sarvaparvasu puṇyeṣu guhyaṁ caitadudāhṛtam

— वे सब बिना किसी अपवाद के काशीपुरी में मुझमें प्रविष्ट होते हैं, समस्त पुण्य पर्वों पर। यह गुह्य रहस्य कहा गया है।

श्लोक 96 (skanda.8.29.96)

तेनेह लभ्यते जन्तोर्विपन्नस्यामृतं पदम् । स्नातस्य चैव गङ्गायां दृष्टेन च मया शुभे

teneha labhyate jantorvipannasyāmṛtaṁ padam | snātasya caiva gaṅgāyāṁ dṛṣṭena ca mayā śubhe

इसी कारण यहाँ मरने वाले प्राणी को अमृत पद प्राप्त होता है — जो गंगा में स्नान करके, हे शुभे, मेरा दर्शन कर चुका हो —

श्लोक 97 (skanda.8.29.97)

सर्वयज्ञफलैस्तुल्यमिष्टैः शतसहस्रशः । सद्य एव समाप्नोति किन्न्वतः परमुत्तमम्

sarvayajñaphalaistulyamiṣṭaiḥ śatasahasraśaḥ | sadya eva samāpnoti kinnvataḥ paramuttamam

— वह लाखों बार किए गए यज्ञों के फल के तुल्य फल तुरन्त ही पा लेता है। इससे बढ़कर उत्तम और क्या हो सकता है?

श्लोक 98 (skanda.8.29.98)

सर्वातयनमुख्यानां दिवि भूमौ गिरिष्वपि । नातः परतरं देवि बुध्यस्वास्तीति कृत्स्नशः

sarvātayanamukhyānāṁ divi bhūmau giriṣvapi | nātaḥ parataraṁ devi budhyasvāstīti kṛtsnaśaḥ

स्वर्ग, पृथ्वी और पर्वतों पर स्थित समस्त प्रमुख तीर्थस्थानों में, हे देवि, जान लो कि इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है।

श्लोक 99 (skanda.8.29.99)

ब्रह्मार्कवैश्वानरशक्रचन्द्रैर्जलेश वित्ताधिपवायुभिश्च । गन्धर्वयक्षोरगसिद्धसंघैः सार्धं सदा सेवितमेतदग्र्यम्

brahmārkavaiśvānaraśakracandrairjaleśa vittādhipavāyubhiśca | gandharvayakṣoragasiddhasaṁghaiḥ sārdhaṁ sadā sevitametadagryam

यह श्रेष्ठ स्थान ब्रह्मा, सूर्य, अग्नि, इन्द्र, चन्द्रमा, वरुण, कुबेर और वायु द्वारा, तथा गन्धर्व, यक्ष, नाग और सिद्धगणों के साथ सदा सेवित है।

श्लोक 100 (skanda.8.29.100)

स्थानं ममेदं हिमशैलपुत्रि गुह्यं सदा क्षेत्रमिदं सुपुण्यम् । विशोकसंसिद्धिफलप्रदं हि प्रबुद्धतत्त्वा यतयो भजन्ति

sthānaṁ mamedaṁ himaśailaputri guhyaṁ sadā kṣetramidaṁ supuṇyam | viśokasaṁsiddhiphalapradaṁ hi prabuddhatattvā yatayo bhajanti

हे हिमशैलपुत्रि, मेरा यह स्थान सदा गुह्य है, यह सुपुण्य क्षेत्र है; यह शोकरहित सिद्धि का फल देता है, इसीलिए तत्त्वज्ञानी यति इसका सेवन करते हैं।

श्लोक 101 (skanda.8.29.101)

क्षेत्रेस्मिन्निवसन्ति ये सुकृतिनो भक्ताः सदा मां नराः पश्यन्तोन्वहमादरेण शुचयः स्नाताः सदा मत्पराः । ते मर्त्या भयपापदुःखरहिताः संशुद्धकर्मक्रियाः भित्त्वा संभवबन्धजालगहनं विन्दन्ति मोक्षं परम्

kṣetresminnivasanti ye sukṛtino bhaktāḥ sadā māṁ narāḥ paśyantonvahamādareṇa śucayaḥ snātāḥ sadā matparāḥ | te martyā bhayapāpaduḥkharahitāḥ saṁśuddhakarmakriyāḥ bhittvā saṁbhavabandhajālagahanaṁ vindanti mokṣaṁ param

इस क्षेत्र में जो सुकृती भक्त निवास करते हैं, जो प्रतिदिन आदरपूर्वक, शुद्ध होकर, स्नान करके, सदा मुझमें तत्पर रहकर मुझे देखते हैं — वे मनुष्य भय, पाप और दुःख से रहित, शुद्ध कर्मों वाले होकर, जन्म-बन्धन के सघन जाल को भेदकर परम मोक्ष प्राप्त करते हैं।

श्लोक 102 (skanda.8.29.102)

एवमेतत् सुरैःकीर्ण नानाद्रुमलताकुलम् । जाह्नव्यालंकृतं पुण्यं क्षेत्रं गुह्यतमं मम

evametat suraiḥkīrṇa nānādrumalatākulam | jāhnavyālaṁkṛtaṁ puṇyaṁ kṣetraṁ guhyatamaṁ mama

इस प्रकार यह देवताओं से भरा हुआ, विविध वृक्ष-लताओं से युक्त, गंगा से अलंकृत, पुण्यमय क्षेत्र मेरा सबसे गुह्यतम स्थान है।

श्लोक 103 (skanda.8.29.103)

भागीरथीमिहासाद्य वाराणस्यां ममास्पदे । अश्वमेधशतं प्राप्य ब्रह्मलोकं स गच्छति

bhāgīrathīmihāsādya vārāṇasyāṁ mamāspade | aśvamedhaśataṁ prāpya brahmalokaṁ sa gacchati

यहाँ वाराणसी में मेरे इस स्थान पर गंगा को प्राप्त करके, सौ अश्वमेध यज्ञों का फल पाकर वह ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 104 (skanda.8.29.104)

नातः पुण्यतमं देवि नातो गुह्यतमं क्वचित् । नातः शुभतरं किंचिन्नातः प्रियतरं मम

nātaḥ puṇyatamaṁ devi nāto guhyatamaṁ kvacit | nātaḥ śubhataraṁ kiṁcinnātaḥ priyataraṁ mama

हे देवि, इससे बढ़कर पुण्यमय कुछ नहीं है, इससे बढ़कर गुह्य कहीं कुछ नहीं है; इससे बढ़कर शुभ कुछ नहीं है, इससे बढ़कर मुझे प्रिय कुछ नहीं है।

श्लोक 105 (skanda.8.29.105)

क्षेत्रं ममेदं सुरसिद्धजुष्टं संप्राप्य मर्त्यः सुकृतप्रभावात् । ख्यातो भवेत् सर्वसुरासुराणां मृतश्च यायात् परमं पदं तत्

kṣetraṁ mamedaṁ surasiddhajuṣṭaṁ saṁprāpya martyaḥ sukṛtaprabhāvāt | khyāto bhavet sarvasurāsurāṇāṁ mṛtaśca yāyāt paramaṁ padaṁ tat

देवताओं और सिद्धों से सेवित मेरे इस क्षेत्र को प्राप्त करके मनुष्य अपने पुण्य के प्रभाव से समस्त सुर-असुरों में विख्यात हो जाता है, और मरकर उस परम पद को प्राप्त होता है।

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30