अम्बिका खण्ड · अध्याय 30
जैगीषव्य-कुबेर-पंचचूडा-वरप्रदान
श्लोक 1 (skanda.8.30.1)
सनत्कुमार उवाच। उद्यानानि ततो देवः स्थानानि च तथात्मनः । आख्याय हिमवत्पुत्र्या विचचार तदा पुनः
sanatkumāra uvāca| udyānāni tato devaḥ sthānāni ca tathātmanaḥ | ākhyāya himavatputryā vicacāra tadā punaḥ
सनत्कुमार ने कहा — तब देव ने हिमवान की पुत्री को अपने उद्यानों और स्थानों के विषय में बताकर फिर विचरण किया।
श्लोक 2 (skanda.8.30.2)
सोपश्यत तदा विप्रं तप्यमानं परं तपः । पुत्रं शतशलाकस्य जैगीषव्यं तपोधनम्
sopaśyata tadā vipraṁ tapyamānaṁ paraṁ tapaḥ | putraṁ śataśalākasya jaigīṣavyaṁ tapodhanam
उन्होंने तब शतशलाक के पुत्र, तपोधन जैगीषव्य नामक ब्राह्मण को परम तप करते हुए देखा।
श्लोक 3 (skanda.8.30.3)
स लिङ्गं देवदेवस्य प्रतिष्ठाप्यार्चयन् सदा । भस्मशायी भस्मदिग्धो नृत्तगीतैरतोषयत्
sa liṅgaṁ devadevasya pratiṣṭhāpyārcayan sadā | bhasmaśāyī bhasmadigdho nṛttagītairatoṣayat
वह देवदेव के लिंग की स्थापना करके सदा पूजा करता रहा, भस्म पर शयन करता, भस्म से लिप्त, नृत्य-गीत से उन्हें प्रसन्न करता।
श्लोक 4 (skanda.8.30.4)
जप्येन वृषनादैश्च तपसा भावितः शुचिः । तमेवं वर्तमानं तु भक्त्या परमया युतम्
japyena vṛṣanādaiśca tapasā bhāvitaḥ śuciḥ | tamevaṁ vartamānaṁ tu bhaktyā paramayā yutam
जप और वृषभ-गर्जना से, तप से पवित्र होकर, इस प्रकार परम भक्ति से युक्त होकर वर्तमान रहने वाले उसे —
श्लोक 5 (skanda.8.30.5)
भगवान् सहसाभ्येत्य इदं वचनमब्रवीत् । जैगीषव्य महाबुद्धे पश्य मां दिव्यचक्षुषा
bhagavān sahasābhyetya idaṁ vacanamabravīt | jaigīṣavya mahābuddhe paśya māṁ divyacakṣuṣā
— भगवान् ने अचानक आकर यह वचन कहा — हे महाबुद्धि जैगीषव्य, दिव्य नेत्र से मुझे देखो।
श्लोक 6 (skanda.8.30.6)
तुष्टोस्मि वरदश्चास्मि ब्रूहि यत्ते मनोगतम् । स एवमुक्तो देवेन सोमं दृष्ट्वा त्रिलोचनम् प्रणम्य शिरसा पादाववदत् परया मुदा
tuṣṭosmi varadaścāsmi brūhi yatte manogatam | sa evamukto devena somaṁ dṛṣṭvā trilocanam praṇamya śirasā pādāvavadat parayā mudā
मैं प्रसन्न हूँ, वरदाता हूँ; जो तुम्हारे मन में है, वह कहो। देव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उसने त्रिनेत्र सोम को देखकर, चरणों में सिर झुकाकर, परम हर्ष से यह कहा —
श्लोक 7 (skanda.8.30.7)
जैगीषव्य उवाच। नमः सर्वार्थसिद्धाय योगसिद्धाय वै नमः । नमः पिनाकहस्ताय हिमवन्निलयाय च
jaigīṣavya uvāca| namaḥ sarvārthasiddhāya yogasiddhāya vai namaḥ | namaḥ pinākahastāya himavannilayāya ca
जैगीषव्य ने कहा — समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाले को नमस्कार है, योगसिद्ध को नमस्कार है। पिनाकधारी और हिमालयनिवासी को नमस्कार है।
श्लोक 8 (skanda.8.30.8)
नमः पवनवेगाय ध्येयाय ध्यानिभिः सदा । नमः सोमाय हेम्ने च हेममालाधराय च
namaḥ pavanavegāya dhyeyāya dhyānibhiḥ sadā | namaḥ somāya hemne ca hemamālādharāya ca
वायु के समान वेगवान, ध्यानियों द्वारा सदा ध्यान किए जाने वाले को नमस्कार है। सोम को, स्वर्ण को, स्वर्णमाला धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 9 (skanda.8.30.9)
नमो गणाधिपतये नमः शान्तेन्द्रियाय च । योगसाहाय्यकर्त्रे च सहसोपशमाय च
namo gaṇādhipataye namaḥ śāntendriyāya ca | yogasāhāyyakartre ca sahasopaśamāya ca
गणों के अधिपति को नमस्कार है, शान्त इन्द्रियों वाले को नमस्कार है। योग में सहायक और सद्यः शान्ति देने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 10 (skanda.8.30.10)
नमो मृत्युहरायैव नमः शोकहराय च । नमः सिद्धिप्रदात्रे च सिद्धसिद्धिप्रदाय च
namo mṛtyuharāyaiva namaḥ śokaharāya ca | namaḥ siddhipradātre ca siddhasiddhipradāya ca
मृत्यु के हरने वाले को नमस्कार है, शोक के हरने वाले को नमस्कार है। सिद्धि देने वाले और सिद्धों को भी सिद्धि देने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 11 (skanda.8.30.11)
धारिणे सर्वलोकानां सर्वलोकेश्वराय च । नमो दशार्धवर्णाय संसारापनुदाय च
dhāriṇe sarvalokānāṁ sarvalokeśvarāya ca | namo daśārdhavarṇāya saṁsārāpanudāya ca
समस्त लोकों को धारण करने वाले, सर्वलोकेश्वर को नमस्कार है। पंचाक्षर-मन्त्र स्वरूप और संसार को दूर करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 12 (skanda.8.30.12)
नमः संसारपाराय अपारपरमाय च । स्वयं मन्त्रे च मनसे दुर्विज्ञेयाय वै नमः
namaḥ saṁsārapārāya apāraparamāya ca | svayaṁ mantre ca manase durvijñeyāya vai namaḥ
संसार के पार जाने वाले, अपार से भी परे रहने वाले को नमस्कार है। स्वयं मन्त्र, मन-स्वरूप, दुर्विज्ञेय को नमस्कार है।
श्लोक 13 (skanda.8.30.13)
नमः कालकलाज्ञाय सकलाया कलाय च । नमस्तत्त्वाधिवासाय प्रेताधिपतये नमः
namaḥ kālakalājñāya sakalāyā kalāya ca | namastattvādhivāsāya pretādhipataye namaḥ
काल की कला को जानने वाले, सकल और कला-स्वरूप को नमस्कार है। तत्त्वों में निवास करने वाले, प्रेतों के अधिपति को नमस्कार है।
श्लोक 14 (skanda.8.30.14)
नमः क्रोधविहीनाय क्रोधाधिपतये नमः । नमः श्रमाय श्रमिणे श्रमापनयनाय च
namaḥ krodhavihīnāya krodhādhipataye namaḥ | namaḥ śramāya śramiṇe śramāpanayanāya ca
क्रोधरहित, क्रोध के अधिपति को नमस्कार है। श्रम, श्रम करने वाले और श्रम को दूर करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 15 (skanda.8.30.15)
नमो ज्ञानरसज्ञाय ज्ञानिने ज्ञानहारिणे । सक्ताय चैव तपसि ऐश्वर्यनिरताय च
namo jñānarasajñāya jñānine jñānahāriṇe | saktāya caiva tapasi aiśvaryaniratāya ca
ज्ञान के रस को जानने वाले, ज्ञानी, ज्ञान का हरण करने वाले को नमस्कार है। तप में आसक्त और ऐश्वर्य में लीन को नमस्कार है।
श्लोक 16 (skanda.8.30.16)
नमो ज्ञानानुबन्धाय अज्ञानविनिवर्तिने । नमः सर्वानुभावाय भावानुगतचेतसे
namo jñānānubandhāya ajñānavinivartine | namaḥ sarvānubhāvāya bhāvānugatacetase
ज्ञान से बद्ध, अज्ञान को दूर करने वाले को नमस्कार है। सर्वप्रभाव वाले, भाव के अनुगामी चित्त वाले को नमस्कार है।
श्लोक 17 (skanda.8.30.17)
नमः शमदमाध्वाय मृत्युदूतापहारिणे । नमः शैलादिनाथाय शैलादिगणपाय च
namaḥ śamadamādhvāya mṛtyudūtāpahāriṇe | namaḥ śailādināthāya śailādigaṇapāya ca
शम-दम के मार्गस्वरूप, मृत्यु के दूतों को हरने वाले को नमस्कार है। शिलादि के नाथ और शिलादि के गणपति को नमस्कार है।
श्लोक 18 (skanda.8.30.18)
नमो योगरहस्याय योगदाय नमो नमः । मह्यं सर्वात्मना कामान् प्रयच्छ भगवन् प्रभो
namo yogarahasyāya yogadāya namo namaḥ | mahyaṁ sarvātmanā kāmān prayaccha bhagavan prabho
योग के रहस्य को नमस्कार है, योग देने वाले को नमस्कार-नमस्कार है। हे भगवन्, हे प्रभो, मुझे पूर्ण रूप से कामनाएँ प्रदान कीजिए।
श्लोक 19 (skanda.8.30.19)
सनत्कुमार उवाच। स एवं स्तूयमानश्च भक्त्या परमयापि च । तुष्टस्तुतोष भूयोस्य इदं चैनमुवाच ह
sanatkumāra uvāca| sa evaṁ stūyamānaśca bhaktyā paramayāpi ca | tuṣṭastutoṣa bhūyosya idaṁ cainamuvāca ha
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार परम भक्ति से स्तुत, पहले से ही प्रसन्न वे और अधिक प्रसन्न हुए, और उससे यह कहा —
श्लोक 20 (skanda.8.30.20)
देवदेव उवाच। अजरश्चामरश्चैव सर्वशोकविवर्जितः । महायोगी महावीर्यो योगैश्वर्यसमन्वितः
devadeva uvāca| ajaraścāmaraścaiva sarvaśokavivarjitaḥ | mahāyogī mahāvīryo yogaiśvaryasamanvitaḥ
देवदेव ने कहा — तुम अजर, अमर, समस्त शोक से रहित, महायोगी, महावीर्य, योग-ऐश्वर्य से सम्पन्न होगे —
श्लोक 21 (skanda.8.30.21)
प्रभावाच्चास्य गुह्यस्य क्षेत्रस्य मम शाश्वतम् । योगेष्टगुणमैश्वर्यं प्राप्स्यसे परमं महत्
prabhāvāccāsya guhyasya kṣetrasya mama śāśvatam | yogeṣṭaguṇamaiśvaryaṁ prāpsyase paramaṁ mahat
— और इस मेरे गुह्य, शाश्वत क्षेत्र के प्रभाव से तुम योग में वांछित गुणों वाला परम महान ऐश्वर्य प्राप्त करोगे।
श्लोक 22 (skanda.8.30.22)
भविष्यसि द्विजश्रेष्ठ योगाचार्यश्च विश्रुतः । यश्चेदं त्वत्कृतं लिङ्गं नियमेनार्चयिष्यति
bhaviṣyasi dvijaśreṣṭha yogācāryaśca viśrutaḥ | yaścedaṁ tvatkṛtaṁ liṅgaṁ niyamenārcayiṣyati
हे द्विजश्रेष्ठ, तुम प्रसिद्ध योगाचार्य बनोगे। और जो भी तुम्हारे द्वारा स्थापित इस लिंग की नियमपूर्वक पूजा करेगा —
श्लोक 23 (skanda.8.30.23)
योनयः सप्त गत्वा तु योगेशत्वमवाप्स्यति । जैगीषव्य गुहाञ्चेमां प्राप्य यो योक्ष्यते द्विजः
yonayaḥ sapta gatvā tu yogeśatvamavāpsyati | jaigīṣavya guhāñcemāṁ prāpya yo yokṣyate dvijaḥ
— सात योनियों तक जाकर योगेश्वरत्व प्राप्त करेगा। हे जैगीषव्य, जो भी द्विज इस गुफा को पाकर योगाभ्यास करेगा —
श्लोक 24 (skanda.8.30.24)
सप्तरात्रं स युक्तात्मा सर्वपापैः प्रमुच्यते । मासेन पूर्वां जातिं च पूर्वाधीतं च वेत्स्यति
saptarātraṁ sa yuktātmā sarvapāpaiḥ pramucyate | māsena pūrvāṁ jātiṁ ca pūrvādhītaṁ ca vetsyati
— सात रात्रि तक साधना करता हुआ वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। एक मास में वह अपने पूर्वजन्म और पूर्वाध्ययन को जान लेता है।
श्लोक 25 (skanda.8.30.25)
एकरात्रं गतिं शुद्धां द्वाभ्यां तारयते पितॄन् । त्रिरात्रेण व्यतीताँश्च परान् सप्त च तारयेत् अतो भूयश्च किं तेद्य जैगीषव्य ददान्यहम्
ekarātraṁ gatiṁ śuddhāṁ dvābhyāṁ tārayate pitṝn | trirātreṇa vyatītā~śca parān sapta ca tārayet ato bhūyaśca kiṁ tedya jaigīṣavya dadānyaham
एक रात्रि से वह शुद्ध गति प्राप्त करता है, दो रात्रि से पितरों को तारता है; तीन रात्रि से बीते हुए सात पूर्वजों को भी तार देता है। हे जैगीषव्य, इससे भी अधिक आज मैं तुम्हें और क्या दूँ?
श्लोक 26 (skanda.8.30.26)
जैगीषव्य उवाच। भगवन् देवदेवेश इच्छेयं मे मनोगता । अतोहं नान्यदिच्छामि योगाक्षय्यात् परं हि तम्
jaigīṣavya uvāca| bhagavan devadeveśa iccheyaṁ me manogatā | atohaṁ nānyadicchāmi yogākṣayyāt paraṁ hi tam
जैगीषव्य ने कहा — हे भगवन्, हे देवदेवेश, यही मेरे मन की इच्छा है; इससे अधिक मुझे उस अक्षय योग से परे कुछ भी नहीं चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.8.30.27)
त्वयि भक्तिश्च नित्यं स्यात् सोमे सगणपेश्वरे । अनुत्सेकं तथा क्षान्तिं शमं दममथापि च
tvayi bhaktiśca nityaṁ syāt some sagaṇapeśvare | anutsekaṁ tathā kṣāntiṁ śamaṁ damamathāpi ca
गणपेश्वर सहित सोम आप में मेरी नित्य भक्ति हो, तथा अभिमानहीनता, क्षमा, शम और दम भी हो।
श्लोक 28 (skanda.8.30.28)
न चाप्यभिभवं कुर्यान्न च तेजोवमाननाम् । एतान्वरानहं देव सदेच्छामि महाद्युते
na cāpyabhibhavaṁ kuryānna ca tejovamānanām | etānvarānahaṁ deva sadecchāmi mahādyute
मैं न किसी का तिरस्कार करूँ और न किसी तेजस्वी का अपमान करूँ। हे महाद्युते देव, मैं सदा यही वर चाहता हूँ।
श्लोक 29 (skanda.8.30.29)
देवदेव उवाच। एते तव भविष्यन्ति अजय्यत्वं च योगिभिः । इच्छतो दर्शनं चैव भविष्यति च ते मम
devadeva uvāca| ete tava bhaviṣyanti ajayyatvaṁ ca yogibhiḥ | icchato darśanaṁ caiva bhaviṣyati ca te mama
देवदेव ने कहा — ये सब तुम्हें प्राप्त होंगे, और योगियों के लिए भी तुम अजेय होगे। जब भी तुम चाहोगे, मेरा दर्शन भी तुम्हें प्राप्त होगा।
श्लोक 30 (skanda.8.30.30)
सनत्कुमार उवाच। ततः स भगवान् देवः पाराशर्योमया सह । सनन्दी सगणश्चैव भक्तानुग्रहलिप्सया
sanatkumāra uvāca| tataḥ sa bhagavān devaḥ pārāśaryomayā saha | sanandī sagaṇaścaiva bhaktānugrahalipsayā
सनत्कुमार ने कहा — हे पाराशर्य (व्यास), फिर वे भगवान् देव उमा सहित, नन्दी सहित, गणों सहित, भक्त पर अनुग्रह करने की इच्छा से —
श्लोक 31 (skanda.8.30.31)
तप्यतो यक्षराजस्य कृत्वा हृदि महेश्वरम् । वरदानाय देवेशो जगाम पुरतस्तदा
tapyato yakṣarājasya kṛtvā hṛdi maheśvaram | varadānāya deveśo jagāma puratastadā
— यक्षराज के, जो अपने हृदय में महेश्वर को धारण किए तप कर रहे थे, वर देने के लिए देवेश तब उनके सामने गए।
श्लोक 32 (skanda.8.30.32)
अथ दृष्टवा त्रिपादञ्च ह्रस्वबाहूरुपादकम् । तप्यमानं तपो घोरं सुतं विस्रवसस्तदा
atha dṛṣṭavā tripādañca hrasvabāhūrupādakam | tapyamānaṁ tapo ghoraṁ sutaṁ visravasastadā
फिर उन्होंने विश्रवा के पुत्र को, जो त्रिपाद, छोटी भुजा-जाँघ-पैर वाला, घोर तप करता हुआ था, देखा।
श्लोक 33 (skanda.8.30.33)
दृष्ट्वोवाच ततो देवः कुबेरं दीप्ततेजसम् । तपसा भावितं व्यास त्वगस्थिपरिसंस्थितम्
dṛṣṭvovāca tato devaḥ kuberaṁ dīptatejasam | tapasā bhāvitaṁ vyāsa tvagasthiparisaṁsthitam
हे व्यास, देखकर देव ने तप से पवित्र, केवल त्वचा और हड्डी शेष रहे, तेजस्वी कुबेर से कहा —
श्लोक 34 (skanda.8.30.34)
देवदेव उवाच। भो भो विस्रवसः पुत्र चक्षुर्दिव्यं ददामि ते । सोमं पश्य महासत्व मां त्वं दिव्येन चक्षुषा
devadeva uvāca| bho bho visravasaḥ putra cakṣurdivyaṁ dadāmi te | somaṁ paśya mahāsatva māṁ tvaṁ divyena cakṣuṣā
देवदेव ने कहा — हे विश्रवा-पुत्र, मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ। हे महासत्त्व, दिव्य नेत्र से मुझ सोम को देखो।
श्लोक 35 (skanda.8.30.35)
ततस्स दृष्ट्वा देवेशं साम्बं नन्दिपुरस्सरम् । प्रणम्य कर्षितस्सम्यगुत्थातुं न शशाक ह
tatassa dṛṣṭvā deveśaṁ sāmbaṁ nandipurassaram | praṇamya karṣitassamyagutthātuṁ na śaśāka ha
तब अम्बिका सहित, नन्दी को आगे किए हुए देवेश को देखकर उसने प्रणाम किया, किन्तु क्षीण होने से भलीभाँति उठ नहीं सका।
श्लोक 36 (skanda.8.30.36)
अबलं तं समालक्ष्य उत्थानेशक्तमीश्वरः । उवाचोत्तिष्ठ भद्रन्ते बलं पौराणमस्तु ते
abalaṁ taṁ samālakṣya utthāneśaktamīśvaraḥ | uvācottiṣṭha bhadrante balaṁ paurāṇamastu te
उसे कमजोर और उठने में असमर्थ देखकर ईश्वर ने कहा — उठो, तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारा पुराना बल पुनः प्राप्त हो।
श्लोक 37 (skanda.8.30.37)
तत उत्थाय जानुभ्यां कुबेरो ह्यवतिष्ठत । पार्श्वगां चैव नेत्रेण देवीमालोकयन् स्थितः
tata utthāya jānubhyāṁ kubero hyavatiṣṭhata | pārśvagāṁ caiva netreṇa devīmālokayan sthitaḥ
फिर घुटनों के बल उठकर कुबेर खड़ा हुआ, और पास खड़ी देवी को नेत्रों से देखते हुए स्थित रहा।
श्लोक 38 (skanda.8.30.38)
इयं सा पर्वतसुता सर्वलोकनमस्कृता । माता लोकत्रयस्यास्य महायोगबलान्विता
iyaṁ sā parvatasutā sarvalokanamaskṛtā | mātā lokatrayasyāsya mahāyogabalānvitā
(उसने सोचा —) यही वह पर्वतसुता हैं, समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत, इन तीनों लोकों की माता, महायोगबल से सम्पन्न।
श्लोक 39 (skanda.8.30.39)
अहोस्यास्तपसो वीर्यमहो दीप्तिरहो बलम् । या प्रभोः सर्वलोकस्य पत्नीत्वं प्रजगाम ह
ahosyāstapaso vīryamaho dīptiraho balam | yā prabhoḥ sarvalokasya patnītvaṁ prajagāma ha
अहो! इनके तप का सामर्थ्य, अहो! इनकी दीप्ति, अहो! इनका बल! जो समस्त लोकों के स्वामी की पत्नी बनी हैं।
श्लोक 40 (skanda.8.30.40)
सनत्कुमार उवाच। तमेवंभूतमनसमीक्षमाणं च पार्वतीम् । बुबोध देवी बुद्ध्वा च चुकोप परमेश्वरी
sanatkumāra uvāca| tamevaṁbhūtamanasamīkṣamāṇaṁ ca pārvatīm | bubodha devī buddhvā ca cukopa parameśvarī
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार पार्वती को देखते हुए, ऐसे भाव वाले उसे परमेश्वरी देवी ने जान लिया, और जानकर क्रुद्ध हो उठीं।
श्लोक 41 (skanda.8.30.41)
सा क्रुद्ध्वा तु कुबेरस्य वाममक्षि सुदीप्तिमत् । विशुष्कं कक्षमादीप्ता ददाहाग्नेः शिखा यथा
sā kruddhvā tu kuberasya vāmamakṣi sudīptimat | viśuṣkaṁ kakṣamādīptā dadāhāgneḥ śikhā yathā
वे क्रुद्ध होकर कुबेर के अत्यन्त तेजस्वी बाएँ नेत्र को, जैसे अग्नि की शिखा सूखी झाड़ी को जला देती है, वैसे ही जला दिया।
श्लोक 42 (skanda.8.30.42)
पुनश्चास्य विनाशाय कुबेरस्य शुभानना । मतिं दध्रे तपोयोनिरथैनामवदद्धरः
punaścāsya vināśāya kuberasya śubhānanā | matiṁ dadhre tapoyonirathaināmavadaddharaḥ
फिर उस शुभमुखी ने कुबेर के विनाश का ही विचार किया; तब हर ने उससे कहा —
श्लोक 43 (skanda.8.30.43)
मा क्रुधो देवि यक्षस्य भक्तस्यास्य तपस्विनः । यशस्वी धार्मिकश्चायं भक्तस्त्वाञ्च विशेषतः
mā krudho devi yakṣasya bhaktasyāsya tapasvinaḥ | yaśasvī dhārmikaścāyaṁ bhaktastvāñca viśeṣataḥ
हे देवि, इस भक्त, तपस्वी यक्ष पर क्रोध मत करो। यह यशस्वी और धार्मिक है, और विशेष रूप से तुम्हारा भी भक्त है।
श्लोक 44 (skanda.8.30.44)
कौतूहलतया ह्येष त्वान्निरीक्षितवान् शुभे । प्रसादं कुरु बालस्य धनदस्य महेश्वरि
kautūhalatayā hyeṣa tvānnirīkṣitavān śubhe | prasādaṁ kuru bālasya dhanadasya maheśvari
हे शुभे, इसने केवल कौतूहलवश ही तुम्हें देखा है। हे महेश्वरि, इस बालक धनद पर कृपा करो।
श्लोक 45 (skanda.8.30.45)
देव्युवाच। एष सकृन्मां देवेश वीक्षतेविनयात् प्रभो । मिनोति न गुणान् देव कस्मान्मम पुरः स्थितः
devyuvāca| eṣa sakṛnmāṁ deveśa vīkṣatevinayāt prabho | minoti na guṇān deva kasmānmama puraḥ sthitaḥ
देवी ने कहा — हे देवेश, हे प्रभो, यह एक बार अविनयपूर्वक मुझे देखता है। हे देव, यह मेरे सामने खड़े होकर अपने गुणों को क्यों नहीं तौलता?
श्लोक 46 (skanda.8.30.46)
तेजसां योप्रमेयानां कुर्यान्मोहेन लंघनम् । सोल्पवीर्यो विनश्येत पतङ्गोग्निमिवागतः
tejasāṁ yoprameyānāṁ kuryānmohena laṁghanam | solpavīryo vinaśyeta pataṅgognimivāgataḥ
जो मोहवश अप्रमेय तेजों का उल्लंघन करता है, वह अल्पशक्ति होकर उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे पतंगा अग्नि में गिरकर।
श्लोक 47 (skanda.8.30.47)
सनत्कुमार उवाच। तामेवं क्रोधताम्राक्षीं क्रुद्धां संप्रेक्ष्य शंकरीम् । उवाच मधुरं श्लक्ष्णं गिरीन्द्रतनयां वचः
sanatkumāra uvāca| tāmevaṁ krodhatāmrākṣīṁ kruddhāṁ saṁprekṣya śaṁkarīm | uvāca madhuraṁ ślakṣṇaṁ girīndratanayāṁ vacaḥ
सनत्कुमार ने कहा — क्रोध से तांबे-सी लाल आँखों वाली, क्रुद्ध उस शंकरी को देखकर उन्होंने गिरिराज-पुत्री से मधुर, कोमल वचन कहा —
श्लोक 48 (skanda.8.30.48)
ब्रवीमि त्वां महाभागे मा क्रुधो जगतोरणि । त्वया सृष्टं जगत् सर्व प्रकृतिस्त्वं सुरेश्वरि
bravīmi tvāṁ mahābhāge mā krudho jagatoraṇi | tvayā sṛṣṭaṁ jagat sarva prakṛtistvaṁ sureśvari
हे महाभागे, हे जगत् की उत्पत्ति-स्थान, मैं तुमसे कहता हूँ, क्रोध मत करो। यह सम्पूर्ण जगत् तुम्हारे द्वारा ही सृजित है; हे सुरेश्वरि, तुम ही प्रकृति हो।
श्लोक 49 (skanda.8.30.49)
पुत्रस्तेयं यतो देवि तस्मान्न क्रोद्धुमर्हसि । मातरं चैव पुत्रस्य वीक्षमाणस्य शोभने
putrasteyaṁ yato devi tasmānna kroddhumarhasi | mātaraṁ caiva putrasya vīkṣamāṇasya śobhane
हे देवि, चूँकि यह तुम्हारा पुत्र है, इसलिए तुम्हें क्रोध करना उचित नहीं है; और हे शोभने, पुत्र द्वारा माता को देख लेने में भी दोष नहीं है।
श्लोक 50 (skanda.8.30.50)
न दोषोस्ति न चैवास्य त्वयि चेतो विमोहितम् । तस्मात् त्वमेव देव्यस्य प्रपन्नस्य नतस्य च । प्रसादं कुरु देवेशे कुबेरस्य यथेप्सितम्
na doṣosti na caivāsya tvayi ceto vimohitam | tasmāt tvameva devyasya prapannasya natasya ca | prasādaṁ kuru deveśe kuberasya yathepsitam
न इसमें कोई दोष है, और न तुम्हारे प्रति इसका चित्त मोहित हुआ है। अतः, हे देवि, तुम स्वयं ही शरणागत और नत कुबेर पर यथेच्छ कृपा करो।
श्लोक 51 (skanda.8.30.51)
सनत्कुमार उवाच। सा तथा देवदेवेन प्रोक्ता गिरिवरात्मजा । प्रसादमकरोत्तस्य प्रसन्ना चेदमब्रवीत्
sanatkumāra uvāca| sā tathā devadevena proktā girivarātmajā | prasādamakarottasya prasannā cedamabravīt
सनत्कुमार ने कहा — देवदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उस पर्वतश्रेष्ठ-पुत्री ने उस पर कृपा की, और प्रसन्न होकर यह कहा —
श्लोक 52 (skanda.8.30.52)
देव्युवाच। कुबेर यत्ते दुरितं क्षान्तं तत्ते मयानघ । तुष्टास्मि मा कृथाश्चैवं पुनस्तेजस्विलंघनम्
devyuvāca| kubera yatte duritaṁ kṣāntaṁ tatte mayānagha | tuṣṭāsmi mā kṛthāścaivaṁ punastejasvilaṁghanam
देवी ने कहा — हे निष्पाप कुबेर, तुम्हारा जो दोष था, वह मेरे द्वारा क्षमा किया गया। मैं प्रसन्न हूँ; फिर कभी तेजस्वियों का उल्लंघन मत करना।
श्लोक 53 (skanda.8.30.53)
यत् त्विदन्ते मया दग्धमीक्षमाणस्य लोचनम् । एतत्तथैव भवतु पिङ्गलं दीप्तिमच्च ह
yat tvidante mayā dagdhamīkṣamāṇasya locanam | etattathaiva bhavatu piṅgalaṁ dīptimacca ha
किन्तु जो नेत्र मुझे देखते हुए मैंने जला दिया, वह वैसे ही रहे — पिंगल और तेजस्वी।
श्लोक 54 (skanda.8.30.54)
अनेन चाङ्कितो लोके भविष्यसि न संशयः । एकाक्षिपिङ्गलो नाम्ना ख्यातस्सर्वत्रपूजितः
anena cāṅkito loke bhaviṣyasi na saṁśayaḥ | ekākṣipiṅgalo nāmnā khyātassarvatrapūjitaḥ
इससे चिह्नित होकर तुम लोक में इसमें संशय नहीं, 'एकाक्षिपिंगल' नाम से विख्यात, सर्वत्र पूजित बनोगे।
श्लोक 55 (skanda.8.30.55)
चरितं यत्तपश्चेदमक्षयं तच्च तेव्ययम् । सौभाग्यमुत्तमं चैव मत्प्रसादाद् भविष्यति
caritaṁ yattapaścedamakṣayaṁ tacca tevyayam | saubhāgyamuttamaṁ caiva matprasādād bhaviṣyati
यह जो तप तुमने किया है, वह तुम्हारे लिए अक्षय और अविनाशी होगा; और मेरी कृपा से तुम्हें उत्तम सौभाग्य प्राप्त होगा।
श्लोक 56 (skanda.8.30.56)
सनत्कुमार उवाच। एवमुक्त्वा ततो देवी विरराम शुभानना । भगवान् वरदोस्मीति कुवेरमवदत्ततः
sanatkumāra uvāca| evamuktvā tato devī virarāma śubhānanā | bhagavān varadosmīti kuveramavadattataḥ
सनत्कुमार ने कहा — यह कहकर शुभमुखी देवी मौन हो गईं। फिर भगवान् ने कुबेर से कहा — मैं वरदाता हूँ।
श्लोक 57 (skanda.8.30.57)
अथैव मुक्तो देवेन कुवेरो हृष्टमानसः । तुष्टाव देवं देवीं च शिरसा प्राञ्जलिर्नतः
athaiva mukto devena kuvero hṛṣṭamānasaḥ | tuṣṭāva devaṁ devīṁ ca śirasā prāñjalirnataḥ
इस प्रकार देव द्वारा अनुमति पाकर प्रसन्नचित्त कुबेर ने सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर देव और देवी की स्तुति की।
श्लोक 58 (skanda.8.30.58)
कुवेर उवाच। नमः पट्टिशहस्ताय किरीटवरधारिणे । नमो वलयधारिण्यै धारिण्यै दर्पणस्य च
kuvera uvāca| namaḥ paṭṭiśahastāya kirīṭavaradhāriṇe | namo valayadhāriṇyai dhāriṇyai darpaṇasya ca
कुबेर ने कहा — पट्टिशधारी हाथ वाले, उत्तम मुकुट धारण करने वाले को नमस्कार है। कंकणधारिणी, दर्पणधारिणी को नमस्कार है।
श्लोक 59 (skanda.8.30.59)
नमः सर्वाङ्गकेशाय दीर्घकेश्यै नमो नमः । नमो मेखलधारिण्यै नमो मौञ्जीधराय च
namaḥ sarvāṅgakeśāya dīrghakeśyai namo namaḥ | namo mekhaladhāriṇyai namo mauñjīdharāya ca
सर्वांग-केश वाले को नमस्कार है, दीर्घकेशी को नमस्कार-नमस्कार है। मेखलाधारिणी को नमस्कार है, मौञ्जीधारी को नमस्कार है।
श्लोक 60 (skanda.8.30.60)
नमश्चित्रशिखडिन्यै नमः पिङ्गजटाभृते । नमो ज्ञानाय तनवे भूताधिपतये नमः
namaścitraśikhaḍinyai namaḥ piṅgajaṭābhṛte | namo jñānāya tanave bhūtādhipataye namaḥ
विचित्र शिखा वाली को नमस्कार है, पिंगल जटा धारण करने वाले को नमस्कार है। ज्ञान को, सूक्ष्म को, भूताधिपति को नमस्कार है।
श्लोक 61 (skanda.8.30.61)
नमस्ताराभिधारिण्यै सिंहोरस्काय वै नमः । नमो रत्नाग्र्यधारिण्यै नमश्चन्द्रार्धमौलये
namastārābhidhāriṇyai siṁhoraskāya vai namaḥ | namo ratnāgryadhāriṇyai namaścandrārdhamaulaye
ताराधारिणी को नमस्कार है, सिंह-वक्ष वाले को नमस्कार है। श्रेष्ठ रत्नधारिणी को नमस्कार है, अर्धचन्द्रमौलि को नमस्कार है।
श्लोक 62 (skanda.8.30.62)
नमः प्रकृतये चैव नमोस्तु पुरुषाय च । नमोस्तु बुद्धये चैव अहंकाराय वै नमः
namaḥ prakṛtaye caiva namostu puruṣāya ca | namostu buddhaye caiva ahaṁkārāya vai namaḥ
प्रकृति को नमस्कार है, पुरुष को नमस्कार हो। बुद्धि को नमस्कार हो, अहंकार को नमस्कार है।
श्लोक 63 (skanda.8.30.63)
नमोस्तु रतये चैव सुखाय च नमो नमः । नमः कृत्यै कर्मणे च आरम्भाय समाप्तये
namostu rataye caiva sukhāya ca namo namaḥ | namaḥ kṛtyai karmaṇe ca ārambhāya samāptaye
रति को नमस्कार हो, सुख को नमस्कार-नमस्कार है। कृत्य, कर्म, आरम्भ और समाप्ति को नमस्कार है।
श्लोक 64 (skanda.8.30.64)
नमो यज्ञाय मन्त्राय दक्षिणायै ऋचे नमः । नमः साम्नेथ यजुषे छन्दसे स्तुतये नमः
namo yajñāya mantrāya dakṣiṇāyai ṛce namaḥ | namaḥ sāmnetha yajuṣe chandase stutaye namaḥ
यज्ञ, मन्त्र और दक्षिणा को नमस्कार है, ऋचा को नमस्कार है। साम, यजु, छन्द और स्तुति को नमस्कार है।
श्लोक 65 (skanda.8.30.65)
नमो ग्रये च वेद्यै च स्वाहायै हविषे नमः । नमो लक्ष्म्यै श्रिये चैव नमो धर्माय वेधसे
namo graye ca vedyai ca svāhāyai haviṣe namaḥ | namo lakṣmyai śriye caiva namo dharmāya vedhase
अग्र और वेदी को नमस्कार है, स्वाहा और हविष को नमस्कार है। लक्ष्मी और श्री को नमस्कार है, धर्म और विधाता को नमस्कार है।
श्लोक 66 (skanda.8.30.66)
इच्छायै रतये चैव नमः सम्पद्विरागिणे । नमः सिद्ध्यै तथा पुष्ट्यै तुष्ट्यै क्षान्त्यै नमो नमः
icchāyai rataye caiva namaḥ sampadvirāgiṇe | namaḥ siddhyai tathā puṣṭyai tuṣṭyai kṣāntyai namo namaḥ
इच्छा और रति को, सम्पत्ति में विरक्त को नमस्कार है। सिद्धि, पुष्टि, तुष्टि और क्षमा को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 67 (skanda.8.30.67)
नमस्स्वधायै कव्याय हव्याय च नमो नमः । नमो वेद्याय विद्यायै नमः शर्वाय भक्तये
namassvadhāyai kavyāya havyāya ca namo namaḥ | namo vedyāya vidyāyai namaḥ śarvāya bhaktaye
स्वधा को नमस्कार है, कव्य और हव्य को नमस्कार-नमस्कार है। वेद्य और विद्या को नमस्कार है, शर्व और भक्ति को नमस्कार है।
श्लोक 68 (skanda.8.30.68)
लयायोत्पत्तये चैव स्थित्यै संसारणाय च । मोक्षाय मुक्तये चैव नमः कालाय मृत्यवे
layāyotpattaye caiva sthityai saṁsāraṇāya ca | mokṣāya muktaye caiva namaḥ kālāya mṛtyave
लय और उत्पत्ति को, स्थिति और संसरण को नमस्कार है। मोक्ष और मुक्ति को नमस्कार है, काल और मृत्यु को नमस्कार है।
श्लोक 69 (skanda.8.30.69)
नमस्ते भगवन् देव सह देव्या जगत्पते । दिश नो भूतभव्येश यन्मे मनसि संस्थितम्
namaste bhagavan deva saha devyā jagatpate | diśa no bhūtabhavyeśa yanme manasi saṁsthitam
हे भगवन् देव, हे जगत्पते, देवी सहित आपको नमस्कार है। हे भूत-भविष्य के स्वामी, जो मेरे मन में स्थित है, वह मुझे प्रदान कीजिए।
श्लोक 70 (skanda.8.30.70)
सनत्कुमार उवाच। य इमं पठते नित्यं स्तवं प्रातस्समुत्थितः । जपंश्च विप्रो वैश्यो वा शूद्रः क्षत्रिय एव वा
sanatkumāra uvāca| ya imaṁ paṭhate nityaṁ stavaṁ prātassamutthitaḥ | japaṁśca vipro vaiśyo vā śūdraḥ kṣatriya eva vā
सनत्कुमार ने कहा — जो भी ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र या क्षत्रिय प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्र का नित्य जप-पाठ करता है —
श्लोक 71 (skanda.8.30.71)
तस्य तुष्टो धनेशस्तु प्रयच्छति महद्धनम् । सोमश्च भगवान् तुष्टो गतिमिष्टां प्रयच्छति
tasya tuṣṭo dhaneśastu prayacchati mahaddhanam | somaśca bhagavān tuṣṭo gatimiṣṭāṁ prayacchati
— उससे प्रसन्न होकर धनेश उसे महान धन देते हैं, और भगवान् सोम भी प्रसन्न होकर उसे इष्ट गति प्रदान करते हैं।
श्लोक 72 (skanda.8.30.72)
सनत्कुमार उवाच। एवं हि संस्तुतस्तेन कुबेरेण जगत्पतिः । उवाच वरदोस्मीति ब्रूहि विश्रवसस्सुत
sanatkumāra uvāca| evaṁ hi saṁstutastena kubereṇa jagatpatiḥ | uvāca varadosmīti brūhi viśravasassuta
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कुबेर द्वारा स्तुत जगत्पति ने कहा — मैं वरदाता हूँ; हे विश्रवा-पुत्र, कहो।
श्लोक 73 (skanda.8.30.73)
कुबेर उवाच। त्वत्तः प्रसादं सततं भक्तिं च त्वयि शाश्वतीम् । भगवन् त्वाञ्च पश्येयं वर एषोस्तु मे विभो
kubera uvāca| tvattaḥ prasādaṁ satataṁ bhaktiṁ ca tvayi śāśvatīm | bhagavan tvāñca paśyeyaṁ vara eṣostu me vibho
कुबेर ने कहा — आपसे सतत कृपा और आपमें शाश्वत भक्ति, तथा हे भगवन्, हे विभो, आपका दर्शन — यही मेरा वर हो।
श्लोक 74 (skanda.8.30.74)
सनत्कुमार उवाच। एवमस्त्विति तत्सर्वं प्रदाय भगवान् शिवः । आत्मना सह सख्यं च ददावात्यन्तिकं तदा
sanatkumāra uvāca| evamastviti tatsarvaṁ pradāya bhagavān śivaḥ | ātmanā saha sakhyaṁ ca dadāvātyantikaṁ tadā
सनत्कुमार ने कहा — 'ऐसा ही हो' कहकर वह सब प्रदान करके भगवान् शिव ने तब उसे अपने साथ अनन्त सख्यत्व भी दे दिया।
श्लोक 75 (skanda.8.30.75)
देवदेव उवाच। गृहाण चैतां शिबिकां नरयुक्तामसंगिनीम् । लोकान् यथेष्टाँल्लोकेश यामारुह्य चरिष्यसि
devadeva uvāca| gṛhāṇa caitāṁ śibikāṁ narayuktāmasaṁginīm | lokān yatheṣṭā~llokeśa yāmāruhya cariṣyasi
देवदेव ने कहा — यह मनुष्यों से जुती हुई, बन्धनरहित पालकी लो; हे लोकेश, इस पर आरूढ़ होकर तुम इच्छानुसार लोकों में विचरण करोगे।
श्लोक 76 (skanda.8.30.76)
इमां चैवाशनिं दिव्यामप्रतीघातलक्षणाम् । गृहाणायुधमेतत्ते भविष्यत्यरिदुस्सहम्
imāṁ caivāśaniṁ divyāmapratīghātalakṣaṇām | gṛhāṇāyudhametatte bhaviṣyatyaridussaham
और यह दिव्य, अप्रतिहत वज्र भी लो; यह तुम्हारा आयुध शत्रुओं के लिए असह्य होगा।
श्लोक 77 (skanda.8.30.77)
अस्त्रञ्च ते प्रयच्छामि तव नाम्ना भविष्यति । कौबेरमिति विख्यातं मोहनं सर्वदेहिनाम्
astrañca te prayacchāmi tava nāmnā bhaviṣyati | kauberamiti vikhyātaṁ mohanaṁ sarvadehinām
मैं तुम्हें एक और अस्त्र भी देता हूँ, जो तुम्हारे ही नाम से 'कौबेर' कहलाएगा और समस्त प्राणियों को मोहित करने वाला होगा।
श्लोक 78 (skanda.8.30.78)
सनत्कुमार उवाच। ततस्स देवस्तुष्टात्मा मालां स्वीयामनिन्दिताम् । आबबद्धास्य शिरसि भास्कराकारवर्चसम्
sanatkumāra uvāca| tatassa devastuṣṭātmā mālāṁ svīyāmaninditām | ābabaddhāsya śirasi bhāskarākāravarcasam
सनत्कुमार ने कहा — तब प्रसन्नचित्त उस देव ने सूर्य के समान तेजस्वी अपनी निर्दोष माला उसके सिर पर बाँध दी।
श्लोक 79 (skanda.8.30.79)
कुशेशयानां फुल्लानां स्रग्दाम च मनोरमम् । आबबद्धास्य कण्ठे वै प्रीयमाण उमापतिः
kuśeśayānāṁ phullānāṁ sragdāma ca manoramam | ābabaddhāsya kaṇṭhe vai prīyamāṇa umāpatiḥ
और प्रसन्न उमापति ने खिले हुए कमलों की एक मनोहर माला उसके कण्ठ में बाँध दी।
श्लोक 80 (skanda.8.30.80)
प्रकामं दर्शनञ्चास्य दत्त्वा चैव धनेशताम् । जगाम भगवान् सोमस्ततोन्यं देशमीप्सितम्
prakāmaṁ darśanañcāsya dattvā caiva dhaneśatām | jagāma bhagavān somastatonyaṁ deśamīpsitam
उसे भरपूर दर्शन देकर और धनेशत्व प्रदान करके भगवान् सोम फिर किसी अन्य वांछित स्थान को चले गए।
श्लोक 81 (skanda.8.30.81)
सनत्कुमार उवाच। य इदं तु कुबेरस्य वरदानमशेषतः । शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि नित्यं विप्रान् समाहितः
sanatkumāra uvāca| ya idaṁ tu kuberasya varadānamaśeṣataḥ | śṛṇuyācchrāvayedvāpi nityaṁ viprān samāhitaḥ
सनत्कुमार ने कहा — जो भी संयतचित्त होकर कुबेर के इस सम्पूर्ण वरदान की कथा को नित्य सुनता है, अथवा ब्राह्मणों को सुनाता है —
श्लोक 82 (skanda.8.30.82)
धनवान् रूपसंपन्नः पुत्रपौत्रसमन्वितः । कुलज्ञानबलोपेतो जायते स मृतो नरः
dhanavān rūpasaṁpannaḥ putrapautrasamanvitaḥ | kulajñānabalopeto jāyate sa mṛto naraḥ
— वह मनुष्य मरने के पश्चात् धनवान, रूपसम्पन्न, पुत्र-पौत्रों से युक्त, कुल-ज्ञान-बल से सम्पन्न होकर जन्म लेता है।
श्लोक 83 (skanda.8.30.83)
सनत्कुमार उवाच। अथ देवी महाभागा सहिता शंभुना तदा । संचिन्त्य पंचचूडास्तु तपन्त्योप्सरसः शुभाः
sanatkumāra uvāca| atha devī mahābhāgā sahitā śaṁbhunā tadā | saṁcintya paṁcacūḍāstu tapantyopsarasaḥ śubhāḥ
सनत्कुमार ने कहा — फिर महाभाग्यशालिनी देवी ने शम्भु सहित, तप करती हुई शुभ पंचचूड़ा अप्सराओं का चिन्तन करके —
श्लोक 84 (skanda.8.30.84)
कृशाङ्ग्यो भक्तिमत्यश्च तपसा दग्धकिल्बिषाः । कारुण्याहृतचेतस्का देवं वचनमब्रवीत्
kṛśāṅgyo bhaktimatyaśca tapasā dagdhakilbiṣāḥ | kāruṇyāhṛtacetaskā devaṁ vacanamabravīt
— जो कृशांगी, भक्तिमती और तप से पापदग्ध थीं, उन पर करुणा से आकृष्ट होकर देव से यह वचन कहा —
श्लोक 85 (skanda.8.30.85)
एतासां तप्यमानानां योषितां वरमुत्तमम् । ददामीप्सितमीशान तन्मेनुज्ञातुमर्हसि । तस्या विज्ञप्तिमाकर्ण्य भगवानिदमब्रवीत्
etāsāṁ tapyamānānāṁ yoṣitāṁ varamuttamam | dadāmīpsitamīśāna tanmenujñātumarhasi | tasyā vijñaptimākarṇya bhagavānidamabravīt
— हे ईशान, तप करने वाली इन स्त्रियों को मैं वांछित उत्तम वर देना चाहती हूँ; इसकी अनुमति दीजिए। उनकी यह प्रार्थना सुनकर भगवान् ने यह कहा —
श्लोक 86 (skanda.8.30.86)
देवदेव उवाच। एवं कुरु महाभागे भक्तानुग्रहमीप्सितम् । वैदिक्योप्सरसो ह्येताः पंचचूडा इति स्मृताः
devadeva uvāca| evaṁ kuru mahābhāge bhaktānugrahamīpsitam | vaidikyopsaraso hyetāḥ paṁcacūḍā iti smṛtāḥ
देवदेव ने कहा — हे महाभागे, ऐसा ही करो, भक्तों पर वांछित अनुग्रह करो। ये वैदिक अप्सराएँ 'पंचचूड़ा' नाम से जानी जाती हैं —
श्लोक 87 (skanda.8.30.87)
त्वां कृत्वा हृदि तप्यन्ते वर आभ्यः प्रदीयताम् । ततः सा देवदेवेन तथा समनुचोदिता । पंचचूडाः समागम्य वच एतदुवाच ह
tvāṁ kṛtvā hṛdi tapyante vara ābhyaḥ pradīyatām | tataḥ sā devadevena tathā samanucoditā | paṁcacūḍāḥ samāgamya vaca etaduvāca ha
— तुम्हें हृदय में धारण करके तप कर रही हैं; इन्हें वर दिया जाए। तब देवदेव द्वारा इस प्रकार प्रेरित होकर वे पंचचूड़ाओं के पास जाकर यह वचन बोलीं —
श्लोक 88 (skanda.8.30.88)
तुष्टास्म्यप्सरसः साक्षात् पश्यध्वं मां शुचिस्मिताः । ददामि वो वरानिष्टान् ये वो हृदयसंस्थिताः
tuṣṭāsmyapsarasaḥ sākṣāt paśyadhvaṁ māṁ śucismitāḥ | dadāmi vo varāniṣṭān ye vo hṛdayasaṁsthitāḥ
हे अप्सराओ, मैं प्रसन्न हूँ; मुझे साक्षात् देखो, हे पवित्र-मुस्कान वालो। तुम्हारे हृदय में जो इष्ट वर स्थित हैं, वे मैं तुम्हें देती हूँ।
श्लोक 89 (skanda.8.30.89)
सनत्कुमार उवाच। ता एवमुक्ताः पार्वत्या वैदिक्योप्सरसः शुभाः । देवीं दृष्ट्वा प्रणम्यैनां शिरसा पादयोर्नताः
sanatkumāra uvāca| tā evamuktāḥ pārvatyā vaidikyopsarasaḥ śubhāḥ | devīṁ dṛṣṭvā praṇamyaināṁ śirasā pādayornatāḥ
सनत्कुमार ने कहा — पार्वती द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उन शुभ वैदिक अप्सराओं ने देवी को देखकर प्रणाम किया, उनके चरणों में सिर झुकाकर।
श्लोक 90 (skanda.8.30.90)
अश्रुपूर्णेक्षणा दीनाः संस्तभ्यात्मानमात्मना । शिरस्यञ्जलिमाधाय तुष्टुवुः सहिताः समम्
aśrupūrṇekṣaṇā dīnāḥ saṁstabhyātmānamātmanā | śirasyañjalimādhāya tuṣṭuvuḥ sahitāḥ samam
अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली, दीन, स्वयं को संयत करती हुई, सिर पर अंजलि रखकर वे सब मिलकर स्तुति करने लगीं।
श्लोक 91 (skanda.8.30.91)
अप्सरस ऊचुः। नमः सिद्ध्यै नमस्तुष्ट्यै क्रियायै बुद्धये नमः । नमः कीर्त्यै नमः सत्यै उल्काजायै तथेष्टये
apsarasa ūcuḥ| namaḥ siddhyai namastuṣṭyai kriyāyai buddhaye namaḥ | namaḥ kīrtyai namaḥ satyai ulkājāyai tatheṣṭaye
अप्सराओं ने कहा — सिद्धि को नमस्कार है, तुष्टि को नमस्कार है, क्रिया और बुद्धि को नमस्कार है। कीर्ति को नमस्कार है, सत्य को नमस्कार है, उल्काजा और इष्टि को नमस्कार है।
श्लोक 92 (skanda.8.30.92)
नमः पृथिव्यै कल्याण्यै श्रियै लक्ष्म्यै नमो नमः । नमः सुधायै स्वाहायै स्वधायै दितये नमः
namaḥ pṛthivyai kalyāṇyai śriyai lakṣmyai namo namaḥ | namaḥ sudhāyai svāhāyai svadhāyai ditaye namaḥ
कल्याणी पृथ्वी को नमस्कार है, श्री और लक्ष्मी को नमस्कार-नमस्कार है। सुधा, स्वाहा और स्वधा को नमस्कार है, दिति को नमस्कार है।
श्लोक 93 (skanda.8.30.93)
नमोस्तु तडिते चैव सौदामन्यै नमो नमः । सवित्र्यै चाथ गायत्र्यै वेदमात्रे नमो नमः
namostu taḍite caiva saudāmanyai namo namaḥ | savitryai cātha gāyatryai vedamātre namo namaḥ
बिजली को नमस्कार हो, सौदामनी को नमस्कार-नमस्कार है। सावित्री और गायत्री, वेदमाता को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 94 (skanda.8.30.94)
नमः पर्वतकन्यायै मतये स्मृतये नमः । नमः पर्वतवासिन्यै रुद्राण्यै च नमो नमः
namaḥ parvatakanyāyai mataye smṛtaye namaḥ | namaḥ parvatavāsinyai rudrāṇyai ca namo namaḥ
पर्वतकन्या को नमस्कार है, मति और स्मृति को नमस्कार है। पर्वतवासिनी को नमस्कार है, रुद्राणी को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 95 (skanda.8.30.95)
नमः प्रकृतये चैव ज्योत्स्नायै ऋद्धये नमः । शोभायै दीप्तये चैव भास्करग्रहरश्मये
namaḥ prakṛtaye caiva jyotsnāyai ṛddhaye namaḥ | śobhāyai dīptaye caiva bhāskaragraharaśmaye
प्रकृति को नमस्कार है, ज्योत्स्ना को, ऋद्धि को नमस्कार है। शोभा और दीप्ति को, सूर्य-ग्रहों की किरण को नमस्कार है।
श्लोक 96 (skanda.8.30.96)
गत्यायै गतये चैव इन्द्राण्यै मुक्तये नमः । नियत्यै सरिते चैव गङ्गायै सूतये नमः
gatyāyai gataye caiva indrāṇyai muktaye namaḥ | niyatyai sarite caiva gaṅgāyai sūtaye namaḥ
गत्या और गति को, इन्द्राणी और मुक्ति को नमस्कार है। नियति और नदी को, गंगा और सूति को नमस्कार है।
श्लोक 97 (skanda.8.30.97)
हेतवे प्रीतये चैव नमः करणवृत्तये । नमः सन्ततये चैव इरायै वृत्तये नमः
hetave prītaye caiva namaḥ karaṇavṛttaye | namaḥ santataye caiva irāyai vṛttaye namaḥ
हेतु और प्रीति को, करणवृत्ति को नमस्कार है। सन्तति को, इरा और वृत्ति को नमस्कार है।
श्लोक 98 (skanda.8.30.98)
वारुण्यै च शरण्यायै शान्त्यै कान्त्यै नमो नमः । कौशिक्यै च नमस्तेस्तु कात्यायन्यै नमो नमः
vāruṇyai ca śaraṇyāyai śāntyai kāntyai namo namaḥ | kauśikyai ca namastestu kātyāyanyai namo namaḥ
वारुणी और शरण्या को, शान्ति और कान्ति को नमस्कार-नमस्कार है। कौशिकी को नमस्कार हो, कात्यायनी को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 99 (skanda.8.30.99)
नमः सन्नतये चैव महिम्ने च नमो नमः । अणिमायै नमस्तेस्तु लघिमायै नमो नमः
namaḥ sannataye caiva mahimne ca namo namaḥ | aṇimāyai namastestu laghimāyai namo namaḥ
सन्नति को, महिमा को नमस्कार-नमस्कार है। अणिमा को नमस्कार हो, लघिमा को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 100 (skanda.8.30.100)
पूजायै ते नमश्चैव शितिबाह्वे च सृप्तये । संज्ञायै च नमस्तेस्तु गिरेथ स्मृतये नमः
pūjāyai te namaścaiva śitibāhve ca sṛptaye | saṁjñāyai ca namastestu giretha smṛtaye namaḥ
पूजा को नमस्कार है, शितिबाहु और सृप्ति को नमस्कार है। संज्ञा को नमस्कार हो, गिरि और स्मृति को नमस्कार है।
श्लोक 101 (skanda.8.30.101)
नमस्तेस्तु सरस्वत्यै जिह्वायै दृष्टये नमः । नमो महिषघातिन्यै तथा शुंभनिशुंभयोः
namastestu sarasvatyai jihvāyai dṛṣṭaye namaḥ | namo mahiṣaghātinyai tathā śuṁbhaniśuṁbhayoḥ
सरस्वती को नमस्कार हो, जिह्वा और दृष्टि को नमस्कार है। महिषासुर-घातिनी को, तथा शुम्भ-निशुम्भ की संहारिणी को नमस्कार है।
श्लोक 102 (skanda.8.30.102)
नमः सिंहरथिन्यै च शूलिन्यै च नमो नमः । नमो मुद्गरधारिण्यै कवचिन्यै नमो नमः
namaḥ siṁharathinyai ca śūlinyai ca namo namaḥ | namo mudgaradhāriṇyai kavacinyai namo namaḥ
सिंहवाहिनी को, शूलधारिणी को नमस्कार-नमस्कार है। मुद्गरधारिणी को, कवचधारिणी को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 103 (skanda.8.30.103)
नमः कुण्डलधारिण्यै धारिण्यै जगतो नमः । नमो धनुर्धरायै च खडगिन्यै च नमो नमः
namaḥ kuṇḍaladhāriṇyai dhāriṇyai jagato namaḥ | namo dhanurdharāyai ca khaḍaginyai ca namo namaḥ
कुण्डलधारिणी को नमस्कार है, जगत् को धारण करने वाली को नमस्कार है। धनुर्धारिणी को, खड्गधारिणी को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 104 (skanda.8.30.104)
नमः पिच्छध्वजिन्यै च धारिण्यै पट्टिशस्य च । नमोस्तु भूतमात्रे च स्कन्दमात्रे नमो नमः
namaḥ picchadhvajinyai ca dhāriṇyai paṭṭiśasya ca | namostu bhūtamātre ca skandamātre namo namaḥ
पिच्छध्वजा को, पट्टिशधारिणी को नमस्कार है। भूतमाता को नमस्कार हो, स्कन्दमाता को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 105 (skanda.8.30.105)
विशाखशाखयोर्मात्रे नैगमेशस्य चैव हि । जात्यै सर्वसुराणां च देवतायै वनस्य च
viśākhaśākhayormātre naigameśasya caiva hi | jātyai sarvasurāṇāṁ ca devatāyai vanasya ca
विशाख और शाख की माता को, तथा नैगमेश की भी माता को नमस्कार है। समस्त देवताओं की जननी को, तथा वन-देवता को नमस्कार है।
श्लोक 106 (skanda.8.30.106)
आर्यायै च नमो नित्यं शिखण्डिन्यै नमो नमः । नमो नीलशिखण्डिन्यै दीर्घवेण्यै नमो नमः
āryāyai ca namo nityaṁ śikhaṇḍinyai namo namaḥ | namo nīlaśikhaṇḍinyai dīrghaveṇyai namo namaḥ
आर्या को नित्य नमस्कार है, शिखण्डिनी को नमस्कार-नमस्कार है। नीलशिखण्डिनी को, दीर्घवेणी को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 107 (skanda.8.30.107)
नमोस्तु तनुमध्यायै देवतायै धनस्य च । नमो धृत्यै नमश्चित्यै कीर्तये च नमो नमः
namostu tanumadhyāyai devatāyai dhanasya ca | namo dhṛtyai namaścityai kīrtaye ca namo namaḥ
तनुमध्या को नमस्कार हो, धन की देवता को नमस्कार है। धृति को नमस्कार है, चिति को नमस्कार है, कीर्ति को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 108 (skanda.8.30.108)
स्त्रीणां सौभाग्यदायिन्यै धारिण्यै च नमो नमः । राकानुमतये चैव सिनीवाल्यै नमो नमः
strīṇāṁ saubhāgyadāyinyai dhāriṇyai ca namo namaḥ | rākānumataye caiva sinīvālyai namo namaḥ
स्त्रियों को सौभाग्य देने वाली, धारिणी को नमस्कार-नमस्कार है। राका और अनुमति को, सिनीवाली को नमस्कार है।
श्लोक 109 (skanda.8.30.109)
नमः क्रियायै श्रद्धायै मेधायै च नमो नमः । नमोस्तु धारणायै च ऊहायै च नमो नमः
namaḥ kriyāyai śraddhāyai medhāyai ca namo namaḥ | namostu dhāraṇāyai ca ūhāyai ca namo namaḥ
क्रिया और श्रद्धा को, मेधा को नमस्कार-नमस्कार है। धारणा को नमस्कार हो, ऊहा को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 110 (skanda.8.30.110)
अपोहायै नमस्तेस्तु वषट्प्रकृतये नमः । नमः समाधये चैव स्पृहायै चित्तये नमः
apohāyai namastestu vaṣaṭprakṛtaye namaḥ | namaḥ samādhaye caiva spṛhāyai cittaye namaḥ
अपोहा को नमस्कार हो, वषट्कार-स्वरूपा को नमस्कार है। समाधि को, स्पृहा और चित्ति को नमस्कार है।
श्लोक 111 (skanda.8.30.111)
वेदनायै नमस्तेस्तु बृहदुक्थ्यै नमो नमः । नमः प्रभायै शुद्धायै शुद्धये शुचये नमः
vedanāyai namastestu bṛhadukthyai namo namaḥ | namaḥ prabhāyai śuddhāyai śuddhaye śucaye namaḥ
वेदना को नमस्कार हो, बृहदुक्थ्या को नमस्कार-नमस्कार है। शुद्ध प्रभा को, शुद्धि और शुचि को नमस्कार है।
श्लोक 112 (skanda.8.30.112)
नमस्त्र्यम्बकभार्यायै विद्यायै च नमो नमः । दीक्षायै दक्षिणायै च ज्वालायै च नमो नमः
namastryambakabhāryāyai vidyāyai ca namo namaḥ | dīkṣāyai dakṣiṇāyai ca jvālāyai ca namo namaḥ
त्र्यम्बक की पत्नी को नमस्कार है, विद्या को नमस्कार-नमस्कार है। दीक्षा और दक्षिणा को, ज्वाला को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 113 (skanda.8.30.113)
इन्द्रियाणां प्रवृत्त्यै च निवृत्त्यै चैव कर्मणाम् । श्रुतये सर्ववेदानां भवान्यै च नमो नमः
indriyāṇāṁ pravṛttyai ca nivṛttyai caiva karmaṇām | śrutaye sarvavedānāṁ bhavānyai ca namo namaḥ
इन्द्रियों की प्रवृत्ति को, कर्मों की निवृत्ति को नमस्कार है। समस्त वेदों के श्रवण को, भवानी को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 114 (skanda.8.30.114)
दुर्गायै दुर्गतारिण्यै धारिण्यै सर्वदेहिनाम् । नमस्ते सर्वदेवत्ये नमस्ते लोकभाविनि
durgāyai durgatāriṇyai dhāriṇyai sarvadehinām | namaste sarvadevatye namaste lokabhāvini
दुर्गा को, संकट से तारने वाली को, समस्त प्राणियों को धारण करने वाली को नमस्कार है। हे सर्वदेवस्वरूपिणी, तुम्हें नमस्कार है; हे लोकों की जननी, तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 115 (skanda.8.30.115)
नमः शान्त्यै नमः कान्त्यै नमः पत्न्यै हरस्य च । नमोस्त्वदित्यै दानव्यै वितानायै नमो नमः
namaḥ śāntyai namaḥ kāntyai namaḥ patnyai harasya ca | namostvadityai dānavyai vitānāyai namo namaḥ
शान्ति को नमस्कार है, कान्ति को नमस्कार है, हर की पत्नी को नमस्कार है। अदिति और दानवी को नमस्कार हो, वितान को नमस्कार-नमस्कार है।
श्लोक 116 (skanda.8.30.116)
नमः शिवायै कर्त्र्यै च प्रभावायै नमो नमः । मृकण्ड्वै मार्द्दबाह्वै च तथा सुरभये नमः
namaḥ śivāyai kartryai ca prabhāvāyai namo namaḥ | mṛkaṇḍvai mārddabāhvai ca tathā surabhaye namaḥ
शिवा और कर्त्री को, प्रभावा को नमस्कार-नमस्कार है। मृकण्डु और मृदुबाहु को, तथा सुरभि को नमस्कार है।
श्लोक 117 (skanda.8.30.117)
विनतायै तथा लक्ष्म्यै सुरसायै नमो नमः । नमस्ते शितिकण्ठिन्यै नमस्ते सर्वतः सदा । दिश नः सुमनाः सर्वं यत् किंचिद् हदये स्थितम्
vinatāyai tathā lakṣmyai surasāyai namo namaḥ | namaste śitikaṇṭhinyai namaste sarvataḥ sadā | diśa naḥ sumanāḥ sarvaṁ yat kiṁcid hadaye sthitam
विनता और लक्ष्मी को, सुरसा को नमस्कार-नमस्कार है। हे नीलकण्ठी, तुम्हें नमस्कार है; तुम्हें सदा सर्वत्र से नमस्कार है। हृदय में जो कुछ भी स्थित है, वह सब हमें सुमनस्क होकर प्रदान करो।
श्लोक 118 (skanda.8.30.118)
सनत्कुमार उवाच। य इदं पठते नित्यं नरः स्त्री वा समाहितः । स रात्रिषु कृतं पापं त्यजेत् सर्वमशेषतः
sanatkumāra uvāca| ya idaṁ paṭhate nityaṁ naraḥ strī vā samāhitaḥ | sa rātriṣu kṛtaṁ pāpaṁ tyajet sarvamaśeṣataḥ
सनत्कुमार ने कहा — जो भी पुरुष या स्त्री संयतचित्त होकर इसे नित्य पढ़ता है, वह रात्रि में किए गए समस्त पापों का पूर्णतः त्याग कर देता है।
श्लोक 119 (skanda.8.30.119)
शयानो जपते यश्च प्रयतो व्यास नित्यशः । दिवाकृतं स जह्यात्तु मृतश्च सुगतिं व्रजेत्
śayāno japate yaśca prayato vyāsa nityaśaḥ | divākṛtaṁ sa jahyāttu mṛtaśca sugatiṁ vrajet
हे व्यास, जो संयतचित्त होकर शयन करते हुए नित्य इसका जप करता है, वह दिन में किए गए पाप को त्याग देता है, और मरकर सुगति को प्राप्त होता है।
श्लोक 120 (skanda.8.30.120)
यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं द्विजान् वा श्रावयेत् सदा । स देहभेदमासाद्य पञ्चचूडप्रियो भवेत्
yaścaitacchṛṇuyānnityaṁ dvijān vā śrāvayet sadā | sa dehabhedamāsādya pañcacūḍapriyo bhavet
जो इसे नित्य सुनता है, अथवा द्विजों को सदा सुनाता है, वह शरीर त्यागने पर पंचचूड़ाओं का प्रिय बन जाता है।
श्लोक 121 (skanda.8.30.121)
यश्चेदं प्रजपन् मर्त्त्यस्त्यजेत् प्राणान् सुदुस्त्यजान् । विमाने सूर्यसंकाशे अप्सरोगणसेविते
yaścedaṁ prajapan marttyastyajet prāṇān sudustyajān | vimāne sūryasaṁkāśe apsarogaṇasevite
जो मनुष्य इसका जप करते हुए दुस्त्याज्य प्राणों को त्यागता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी, अप्सरागणों से सेवित विमान में —
श्लोक 122 (skanda.8.30.122)
सर्वपापविनिर्मुक्तो रमेद्वर्षायुतं शतम् । यश्च भक्त्या परमया तिथौ नियमवान्नरः
sarvapāpavinirmukto ramedvarṣāyutaṁ śatam | yaśca bhaktyā paramayā tithau niyamavānnaraḥ
— समस्त पापों से मुक्त होकर एक लाख वर्षों तक रमण करता है। और जो मनुष्य परम भक्ति से, तिथि के दिन नियमपूर्वक —
श्लोक 123 (skanda.8.30.123)
देवीभ्यर्च्य जपते सर्वपापैः प्रमुच्यते । जपनादेव तपसा देहे भिन्ने च भक्तिमान् । स भूत्वानुचरो देव्याः पुण्ये लोके महीयते
devībhyarcya japate sarvapāpaiḥ pramucyate | japanādeva tapasā dehe bhinne ca bhaktimān | sa bhūtvānucaro devyāḥ puṇye loke mahīyate
— देवी की पूजा करके इसका जप करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। उस जप और तप से ही वह भक्तिमान, शरीर छूटने पर देवी का अनुचर बनकर पुण्यलोक में पूजित होता है।
श्लोक 124 (skanda.8.30.124)
सनत्कुमार उवाच। ताभिरेव स्तुता देवी स्थिता देवस्य सन्निधौ । उवाच हृष्यमाणास्या पञ्चचूडा इदं वचः
sanatkumāra uvāca| tābhireva stutā devī sthitā devasya sannidhau | uvāca hṛṣyamāṇāsyā pañcacūḍā idaṁ vacaḥ
सनत्कुमार ने कहा — उनके द्वारा इस प्रकार स्तुत, देव के समीप खड़ी देवी ने प्रसन्नमुख होकर पंचचूड़ाओं से यह वचन कहा —
श्लोक 125 (skanda.8.30.125)
शृणुताप्सरसः सर्वास्तपसोस्य महत्फलम् । यच्चापि परया भक्त्या मां प्रपन्नाः स्थ शोभनाः
śṛṇutāpsarasaḥ sarvāstapasosya mahatphalam | yaccāpi parayā bhaktyā māṁ prapannāḥ stha śobhanāḥ
हे शोभना अप्सराओ, तुम सब इस तप के महान फल को सुनो, तथा यह भी कि तुम परम भक्ति से मेरी शरण में आई हो।
श्लोक 126 (skanda.8.30.126)
अजराश्च विशोकाश्च नित्यं मुदितमानसाः । प्रियाश्च सर्वलोकस्य भविष्यथ ममाज्ञया
ajarāśca viśokāśca nityaṁ muditamānasāḥ | priyāśca sarvalokasya bhaviṣyatha mamājñayā
मेरी आज्ञा से तुम अजर, शोकरहित, सदा प्रसन्नचित्त और समस्त लोकों को प्रिय बनोगी।
श्लोक 127 (skanda.8.30.127)
ब्रूत यच्चापि किंचिद्वो हृदि स्थितमशंकिताः । सर्वं दास्यामि तद्वोहं मा चिरायत दुर्व्यथाः
brūta yaccāpi kiṁcidvo hṛdi sthitamaśaṁkitāḥ | sarvaṁ dāsyāmi tadvohaṁ mā cirāyata durvyathāḥ
निःशंक होकर बताओ, तुम्हारे हृदय में और भी जो कुछ है; मैं तुम्हें वह सब दूँगी, हे दुःख सहने वालियो, विलम्ब मत करो।
श्लोक 128 (skanda.8.30.128)
पञ्चचूडा ऊचुः। देवि पुंसां स्त्रियः सर्वाः कार्यार्थं विदितं च ते । अर्थिनस्ते च नस्तावत् यावत् कार्यं समाप्यते । समाप्ते चैव ते कार्ये परा इव भवन्ति नः
pañcacūḍā ūcuḥ| devi puṁsāṁ striyaḥ sarvāḥ kāryārthaṁ viditaṁ ca te | arthinaste ca nastāvat yāvat kāryaṁ samāpyate | samāpte caiva te kārye parā iva bhavanti naḥ
पंचचूड़ाओं ने कहा — हे देवि, समस्त स्त्रियाँ पुरुषों के लिए ही होती हैं, यह आपको ज्ञात है। पुरुष हमारे अभिलाषी तब तक रहते हैं, जब तक उनका कार्य पूर्ण नहीं होता; कार्य पूर्ण होते ही वे हमारे लिए मानो पराए बन जाते हैं।
श्लोक 129 (skanda.8.30.129)
तद् देवि यदि तुष्टासि यदि देयो वरश्च नः । सर्वस्त्रीणां महादेवि भवन्तु पुरुषा वशाः
tad devi yadi tuṣṭāsi yadi deyo varaśca naḥ | sarvastrīṇāṁ mahādevi bhavantu puruṣā vaśāḥ
अतः हे देवि, यदि आप प्रसन्न हैं और हमें वर देना चाहती हैं, तो हे महादेवि, समस्त स्त्रियों के अधीन पुरुष हो जाएँ।
श्लोक 130 (skanda.8.30.130)
देव्युवाच। अद्यप्रभृति लोकेषु सर्वस्त्रीणां नराः सदा । वश्या भवन्तु सर्वत्र सर्वकार्यकराश्च ह
devyuvāca| adyaprabhṛti lokeṣu sarvastrīṇāṁ narāḥ sadā | vaśyā bhavantu sarvatra sarvakāryakarāśca ha
देवी ने कहा — आज से लोकों में समस्त स्त्रियों के अधीन पुरुष सदा और सर्वत्र रहें, और उनके समस्त कार्य करने वाले बनें।
श्लोक 131 (skanda.8.30.131)
अदौ पश्चाच्च सर्वाभ्यो हिरण्यं पशवः स्त्रियः । सर्वभोगांश्च दास्यन्तु वशगाः सर्वथापि च
adau paścācca sarvābhyo hiraṇyaṁ paśavaḥ striyaḥ | sarvabhogāṁśca dāsyantu vaśagāḥ sarvathāpi ca
आरम्भ से अन्त तक वे सर्वथा वशगत होकर सबको स्वर्ण, पशु, स्त्रियाँ और समस्त भोग प्रदान करेंगे।
श्लोक 132 (skanda.8.30.132)
व्यलीकान्यपि कुर्वन्त्यो बहूनि विविधानि च । प्रिया एव भविष्यन्ति पापं न च भवेत् सदा
vyalīkānyapi kurvantyo bahūni vividhāni ca | priyā eva bhaviṣyanti pāpaṁ na ca bhavet sadā
बहुत-से विविध छल करते हुए भी वे स्त्रियाँ प्रिय ही बनी रहेंगी, और उन्हें कभी पाप नहीं लगेगा।
श्लोक 133 (skanda.8.30.133)
मातरं पितरं भ्रातॄन् सुह्रदोथ सुतानपि । अर्कायाणि करिष्यन्ति स्त्रीणां वश्यत्वमागताः
mātaraṁ pitaraṁ bhrātṝn suhradotha sutānapi | arkāyāṇi kariṣyanti strīṇāṁ vaśyatvamāgatāḥ
माता, पिता, भाइयों, मित्रों और पुत्रों तक को छोड़कर, स्त्रियों के वश में आए हुए पुरुष उन्हें सूर्य के समान पूज्य मानेंगे।
श्लोक 134 (skanda.8.30.134)
पश्यन्तोपि व्यलीकानि दोषान् वैकृत्यमेव च । नैव द्रवन्ति ते पुंसां मद्वरान्मोहितेन्द्रियाः
paśyantopi vyalīkāni doṣān vaikṛtyameva ca | naiva dravanti te puṁsāṁ madvarānmohitendriyāḥ
छल, दोष और विकार को देखते हुए भी, मेरे वर से इन्द्रियाँ मोहित हुए वे पुरुष स्त्रियों से कभी विमुख नहीं होंगे।
श्लोक 135 (skanda.8.30.135)
सनत्कुमार उवाच। ततः सा देवदेवस्य पत्नी हिमवतः सुता । माल्यदाम गृहीत्वा तु भ्रामयन्ती शुभानना
sanatkumāra uvāca| tataḥ sā devadevasya patnī himavataḥ sutā | mālyadāma gṛhītvā tu bhrāmayantī śubhānanā
सनत्कुमार ने कहा — फिर देवदेव की पत्नी, हिमवान की पुत्री, वह शुभमुखी एक पुष्पमाला लेकर उसे घुमाती हुई —
श्लोक 136 (skanda.8.30.136)
भव नार्य इति प्राह हसन्ती प्रियमव्यया । भ्राम्यमाणस्य दाम्नोस्य यान्य शीर्यन्त भूतले
bhava nārya iti prāha hasantī priyamavyayā | bhrāmyamāṇasya dāmnosya yānya śīryanta bhūtale
— हँसते हुए बोलीं, 'स्त्रियाँ बन जाओ।' उस घुमाई जाती हुई माला के जो अंश पृथ्वी पर झरे —
श्लोक 137 (skanda.8.30.137)
कुसुमान्यभवँस्तानि नार्यः कमललोचनाः । ता उवाच पुरा यूयं जराक्षयविवर्जिताः
kusumānyabhava~stāni nāryaḥ kamalalocanāḥ | tā uvāca purā yūyaṁ jarākṣayavivarjitāḥ
— वे पुष्प कमलनयनी स्त्रियाँ बन गईं। उनसे उन्होंने कहा — तुम अब से जरा और क्षय से रहित होगी,
श्लोक 138 (skanda.8.30.138)
जगन्मोहकराः सर्वाः पुंसां हृदयबन्धनाः । दृष्टिस्पर्शविलासेषु आविश्य जगतीत्रयम्
jaganmohakarāḥ sarvāḥ puṁsāṁ hṛdayabandhanāḥ | dṛṣṭisparśavilāseṣu āviśya jagatītrayam
— जगत् को मोहित करने वाली, पुरुषों के हृदय को बाँधने वाली; अपनी दृष्टि, स्पर्श और विलास से तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर —
श्लोक 139 (skanda.8.30.139)
पुरुषाँस्त्रीवशाँश्च करिष्यथ । नराः सर्वे च युष्मासु भविष्यन्ति सदा रताः
puruṣā~strīvaśā~śca kariṣyatha | narāḥ sarve ca yuṣmāsu bhaviṣyanti sadā ratāḥ
(इससे पूर्व पंक्ति का अंश मूल पाठ में खण्डित है) — तुम पुरुषों को स्त्रियों के वश में कर दोगी। और समस्त पुरुष सदा तुममें अनुरक्त रहेंगे।
श्लोक 140 (skanda.8.30.140)
वृत्तिः शुभा भवित्री च सर्वासां मम तेजसा । पुंसां स्त्रीभोगसिद्ध्यर्थं स्त्रीणां रत्यर्थमेव च
vṛttiḥ śubhā bhavitrī ca sarvāsāṁ mama tejasā | puṁsāṁ strībhogasiddhyarthaṁ strīṇāṁ ratyarthameva ca
मेरे तेज से तुम सबकी शुभ वृत्ति होगी — पुरुषों के लिए स्त्री-भोग की सिद्धि हेतु, और स्त्रियों के लिए रति के हेतु ही।
श्लोक 141 (skanda.8.30.141)
क्रियाः शुभाङ्गसंस्कारा दिव्या ये मानुषाश्च ह । बहुरूपाश्च ता भूत्वा विविशुः सर्वदाङ्गनाः
kriyāḥ śubhāṅgasaṁskārā divyā ye mānuṣāśca ha | bahurūpāśca tā bhūtvā viviśuḥ sarvadāṅganāḥ
शुभ अंग-संस्कार की जो दिव्य और मानवीय क्रियाएँ हैं, उनसे युक्त, अनेक रूप धारण करके वे सदा सुसज्जित स्त्रियाँ जगत् में प्रविष्ट हुईं।
श्लोक 142 (skanda.8.30.142)
सनत्कुमार उवाच। एवं देवी तदा व्यास सृष्ट्वा ता वै विसृज्य च । उवाचाप्सरसो ब्रूत किं वो भूयः करोम्यहम्
sanatkumāra uvāca| evaṁ devī tadā vyāsa sṛṣṭvā tā vai visṛjya ca | uvācāpsaraso brūta kiṁ vo bhūyaḥ karomyaham
सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, इस प्रकार देवी ने उन्हें रचकर विदा किया, और अप्सराओं से कहा — बताओ, मैं तुम्हारे लिए और क्या करूँ?
श्लोक 143 (skanda.8.30.143)
तास्तुष्टमनसश्चापि ऊचुर्व्यास भवेम हि । देवानां मानुषाणां च अवश्याश्चैव रक्षसाम् । ता उवाच ततो देवो एवं लोके भविष्यथ
tāstuṣṭamanasaścāpi ūcurvyāsa bhavema hi | devānāṁ mānuṣāṇāṁ ca avaśyāścaiva rakṣasām | tā uvāca tato devo evaṁ loke bhaviṣyatha
हे व्यास, प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने कहा — हम देवताओं, मनुष्यों और राक्षसों के वश में न रहें। तब देव ने उनसे कहा — लोक में ऐसा ही होगा।
श्लोक 144 (skanda.8.30.144)
ततः स सहितो देव्या सनन्दी परमेश्वरः । गणैः सर्वैश्च सहितो गृहान्स्वानाविशत् प्रभुः
tataḥ sa sahito devyā sanandī parameśvaraḥ | gaṇaiḥ sarvaiśca sahito gṛhānsvānāviśat prabhuḥ
फिर देवी सहित, नन्दी सहित, समस्त गणों सहित वे परमेश्वर प्रभु अपने भवन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 145 (skanda.8.30.145)
भगनयननिपाती दैत्यदर्पापहारी सुरकमलहिमौघः कामयज्ञाग्निहन्ता । जलदवृषभयायी सर्वदुःखान्तकारी समरवृषभकेतुश्चन्द्रमौलिर्जगाम
bhaganayananipātī daityadarpāpahārī surakamalahimaughaḥ kāmayajñāgnihantā | jaladavṛṣabhayāyī sarvaduḥkhāntakārī samaravṛṣabhaketuścandramaulirjagāma
भग के नेत्र को गिराने वाले, दैत्यों के गर्व को हरने वाले, देवरूपी कमल के लिए हिमजल के प्रवाह के समान शीतलता देने वाले, काम के यज्ञ-अग्नि को नष्ट करने वाले, मेघ के समान वृषभ पर सवार, समस्त दुःखों का अन्त करने वाले, युद्ध में वृषभ-ध्वज धारण करने वाले, चन्द्रमौलि — वे वहाँ से चले गए।
श्लोक 146 (skanda.8.30.146)
व्यास उवाच। भगवन् पिङ्गलः केन गणत्वं समुपागतः । अन्नदत्वञ्च संप्राप्तो वाराणस्यां महाद्युतिः
vyāsa uvāca| bhagavan piṅgalaḥ kena gaṇatvaṁ samupāgataḥ | annadatvañca saṁprāpto vārāṇasyāṁ mahādyutiḥ
व्यास ने पूछा — हे भगवन्, पिङ्गल किस प्रकार गणत्व को प्राप्त हुए तथा वाराणसी में महातेजस्वी अन्नदाता (अन्नदाता का पद) किस प्रकार प्राप्त किया?
श्लोक 147 (skanda.8.30.147)
क्षेत्रपालः कथं जातः प्रियत्वं च कथं गतः । एतदिच्छामि कथितं श्रोतुं ब्रह्मसुत त्वया
kṣetrapālaḥ kathaṁ jātaḥ priyatvaṁ ca kathaṁ gataḥ | etadicchāmi kathitaṁ śrotuṁ brahmasuta tvayā
वे क्षेत्रपाल (क्षेत्र के रक्षक) कैसे बने, और आपकी प्रियता को कैसे प्राप्त हुए? हे ब्रह्मपुत्र, यह सब मैं आपसे विस्तार से सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 148 (skanda.8.30.148)
सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास यथा लेभे गणेशत्वं स पिंगलः । अन्नदत्वं च लोकानां स्थानं वाराणसीं च हि
sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa yathā lebhe gaṇeśatvaṁ sa piṁgalaḥ | annadatvaṁ ca lokānāṁ sthānaṁ vārāṇasīṁ ca hi
सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, सुनो, वह पिङ्गल किस प्रकार गणेशत्व, समस्त लोकों का अन्नदातृत्व, तथा वाराणसी में अपना स्थान प्राप्त हुआ।
श्लोक 149 (skanda.8.30.149)
पूर्णभद्रसुतः श्रीमानासीद् यक्षः प्रतापवान् । हरिकेश इति ख्यातो ब्रह्मण्यो धार्मिकश्च ह
pūrṇabhadrasutaḥ śrīmānāsīd yakṣaḥ pratāpavān | harikeśa iti khyāto brahmaṇyo dhārmikaśca ha
पूर्णभद्र का पुत्र, अत्यन्त तेजस्वी और प्रतापी एक यक्ष था, जो हरिकेश नाम से विख्यात था, ब्राह्मणभक्त और धर्मात्मा।
श्लोक 150 (skanda.8.30.150)
तस्य जन्मप्रभृत्येव भवे भक्तिरनुत्तमा । तदाशीस्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः
tasya janmaprabhṛtyeva bhave bhaktiranuttamā | tadāśīstannamaskārastanniṣṭhastatparāyaṇaḥ
जन्म से ही उसकी भगवान् शिव (भव) में अनुपम भक्ति थी; उसका आशीर्वचन, उसका नमस्कार, उसकी निष्ठा और उसका परायणत्व — सब कुछ केवल उन्हीं के प्रति था।
श्लोक 151 (skanda.8.30.151)
आसीनश्च शयानश्च गच्छन्तिष्ठन्ननुव्रजन् । भुञ्जानोथ पिबन् वापि रुद्रमेवान्वचिन्तयत्
āsīnaśca śayānaśca gacchantiṣṭhannanuvrajan | bhuñjānotha piban vāpi rudramevānvacintayat
बैठते, सोते, चलते, खड़े होते, अनुसरण करते, खाते अथवा पीते समय भी, वह सदा केवल रुद्र का ही चिन्तन करता रहता था।
श्लोक 152 (skanda.8.30.152)
तमेवं युक्तमनसं पूर्णभद्रः पिताब्रवीत् । न त्वा पुत्रमहं मन्ये दुर्जातो यस्त्वमन्यथा
tamevaṁ yuktamanasaṁ pūrṇabhadraḥ pitābravīt | na tvā putramahaṁ manye durjāto yastvamanyathā
इस प्रकार जिसका मन सदा उन्हीं में लगा रहता था, उससे उसके पिता पूर्णभद्र ने कहा — "मैं तुझे अपना पुत्र नहीं मानता; जो इस प्रकार विपरीत आचरण करता है, वह कुजात है।"
श्लोक 153 (skanda.8.30.153)
नहि यक्षकुलीनाना मेतद् वृत्तं भवत्युत । गुह्यका बत यूयं वै स्वभावात् क्रूरचेतसः
nahi yakṣakulīnānā metad vṛttaṁ bhavatyuta | guhyakā bata yūyaṁ vai svabhāvāt krūracetasaḥ
"यक्षकुल में जन्मे लोगों का यह आचरण नहीं है। हाय, तुम गुह्यक स्वभाव से ही क्रूरचित्त होते हो,"
श्लोक 154 (skanda.8.30.154)
क्रव्यादाश्चैव किं भक्षा हिंसाशीलाश्च पुत्रक । मैवं कार्षीर्न नो वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मनाम् । स्वयंभुवा यथा सृष्टा सैव वृत्तिः प्रशस्यते
kravyādāścaiva kiṁ bhakṣā hiṁsāśīlāśca putraka | maivaṁ kārṣīrna no vṛttirevaṁ dṛṣṭā mahātmanām | svayaṁbhuvā yathā sṛṣṭā saiva vṛttiḥ praśasyate
"कच्चा मांस खाने वाले और हिंसक स्वभाव वाले, हे पुत्र — ऐसा मत करो! महात्माओं का आचरण यह नहीं है, अपितु स्वयंभू (ब्रह्मा) द्वारा जो सृष्टि हुई है, वही वृत्ति प्रशंसनीय मानी गई है।"
श्लोक 155 (skanda.8.30.155)
हरिकेश उवाच। सृष्टा चैवा प्रशस्ता च गर्हिता साधुभिः सदा । वृत्तिः स्वयंभुविहिता त्यक्तव्या यदि नो भवेत्
harikeśa uvāca| sṛṣṭā caivā praśastā ca garhitā sādhubhiḥ sadā | vṛttiḥ svayaṁbhuvihitā tyaktavyā yadi no bhavet
हरिकेश ने कहा — जो वृत्ति स्वयंभू द्वारा विहित है, वह भी सज्जनों द्वारा सदा कभी प्रशंसित और कभी निन्दित होती रही है; यदि वह वृत्ति उपयुक्त न हो, तो उसे त्याग देना चाहिए।
श्लोक 156 (skanda.8.30.156)
आश्रमान्तरजं कर्म न कुर्युर्गृहिणस्ततः । हित्वा मनुष्यभावं च कर्मभिर्विविधैश्च ह
āśramāntarajaṁ karma na kuryurgṛhiṇastataḥ | hitvā manuṣyabhāvaṁ ca karmabhirvividhaiśca ha
गृहस्थों को अपने आश्रम से भिन्न आश्रम के कर्म नहीं करने चाहिए; मनुष्य-स्वभाव को त्यागकर विविध कर्मों द्वारा,
श्लोक 157 (skanda.8.30.157)
देवत्वं नो विमार्गेयुर्मानुष्यं जातिमेव च । अथ चेद्विहितं तेषां कर्म तत्प्राप्तिसंसृतम् । ममापि विहितं पश्य कर्म तन्नात्र संशयः
devatvaṁ no vimārgeyurmānuṣyaṁ jātimeva ca | atha cedvihitaṁ teṣāṁ karma tatprāptisaṁsṛtam | mamāpi vihitaṁ paśya karma tannātra saṁśayaḥ
उन्हें मनुष्य-जाति को छोड़कर देवत्व की खोज नहीं करनी चाहिए। परन्तु यदि उनका विहित कर्म ही उन्हें उस [उच्च] प्राप्ति तक ले जाने वाला हो, तो देखिए — मेरा भी विहित कर्म वैसा ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक 158 (skanda.8.30.158)
सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तः पुत्रेण पूर्णभद्रः प्रतापवान् । उवाच निष्क्रम क्षिप्रं गच्छ त्वं यत्र रोचते
sanatkumāra uvāca| sa evamuktaḥ putreṇa pūrṇabhadraḥ pratāpavān | uvāca niṣkrama kṣipraṁ gaccha tvaṁ yatra rocate
सनत्कुमार ने कहा — पुत्र द्वारा इस प्रकार उत्तर दिए जाने पर, प्रतापी पूर्णभद्र ने कहा — "तुरन्त यहाँ से निकल जाओ, जहाँ तुम्हें अच्छा लगे वहाँ चले जाओ।"
श्लोक 159 (skanda.8.30.159)
ततः स निर्गत स्त्यक्त्वा गृहसंबन्धिबान्धवान् । वाराणसीम् समासाद्य तपस्तेपे सुदुश्चरम्
tataḥ sa nirgata styaktvā gṛhasaṁbandhibāndhavān | vārāṇasīm samāsādya tapastepe suduścaram
तब वह घर-सम्बन्धियों और बन्धुओं को त्यागकर बाहर निकल गया, और वाराणसी पहुँचकर अत्यन्त दुष्कर तप करने लगा।
श्लोक 160 (skanda.8.30.160)
स्थाणुभूतो ह्यनिमिषः शुष्ककाष्ठोपलोपमः । संनियम्येन्द्रियग्राममवातिष्ठत निश्चलः
sthāṇubhūto hyanimiṣaḥ śuṣkakāṣṭhopalopamaḥ | saṁniyamyendriyagrāmamavātiṣṭhata niścalaḥ
स्थाणु के समान अचल, अनिमेष, सूखी लकड़ी अथवा पत्थर के समान, इन्द्रियों के समूह को पूर्णतः संयमित कर वह निश्चल खड़ा रहा।
श्लोक 161 (skanda.8.30.161)
अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य तदाशिषः । सहस्रमेकं वर्षाणां दिव्यमत्यतिवर्तत
atha tasyaivamaniśaṁ tatparasya tadāśiṣaḥ | sahasramekaṁ varṣāṇāṁ divyamatyativartata
इस प्रकार उस तत्पर व्यक्ति के लिए, जो निरन्तर उसी आशा में लीन था, एक हज़ार दिव्य वर्ष व्यतीत हो गए।
श्लोक 162 (skanda.8.30.162)
वल्मीकेन समाक्रान्तो भक्ष्यमाणः पिपीलिकैः । वज्रसूचीमुखैर्व्यास विध्यमानस्तथैव च
valmīkena samākrānto bhakṣyamāṇaḥ pipīlikaiḥ | vajrasūcīmukhairvyāsa vidhyamānastathaiva ca
हे व्यास, वह बाँबी से ढक गया, चींटियों द्वारा खाया जाने लगा, वज्र के समान सूई-मुख वाली चींटियों द्वारा बिंधता रहा।
श्लोक 163 (skanda.8.30.163)
निर्मांसरुधिरत्वग् वै कुन्दशंखेन्दुसप्रभः । अस्थिशेषो भवत् सर्वो देवश्चैवममन्यत
nirmāṁsarudhiratvag vai kundaśaṁkhendusaprabhaḥ | asthiśeṣo bhavat sarvo devaścaivamamanyata
मांस, रक्त और त्वचा से रहित होकर वह कुन्द-पुष्प, शंख और चन्द्रमा के समान श्वेत-प्रभा वाला केवल अस्थि-शेष रह गया — और देव ने भी इसे स्वीकार किया (सराहा)।
श्लोक 164 (skanda.8.30.164)
एतस्मिन्नन्तरे देवी व्यज्ञापयत शंकरम् । उद्यानं पुनरेवेदं द्रष्टुमिच्छामि सर्वद
etasminnantare devī vyajñāpayata śaṁkaram | udyānaṁ punarevedaṁ draṣṭumicchāmi sarvada
इसी बीच देवी ने शंकर से निवेदन किया — "मैं इस उद्यान को पुनः देखना चाहती हूँ, सदा के लिए।"
श्लोक 165 (skanda.8.30.165)
क्षेत्रस्य चैव माहात्म्यं श्रोतुं कौतूहलं हि मे । यतश्च प्रियमेतत्ते यच्चास्य फलमुत्तमम्
kṣetrasya caiva māhātmyaṁ śrotuṁ kautūhalaṁ hi me | yataśca priyametatte yaccāsya phalamuttamam
"मुझे इस क्षेत्र के माहात्म्य को सुनने की उत्कण्ठा है, क्योंकि यह आपको प्रिय है, और इसका उत्तम फल क्या है, यह भी मैं जानना चाहती हूँ।"
श्लोक 166 (skanda.8.30.166)
इति विज्ञापितो देवः पार्वत्या भुवनेश्वरः । सर्वं पृष्टं यथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे
iti vijñāpito devaḥ pārvatyā bhuvaneśvaraḥ | sarvaṁ pṛṣṭaṁ yathānyāyamākhyātumupacakrame
इस प्रकार पार्वती द्वारा निवेदित होने पर, भुवनेश्वर देव ने उनके सब प्रश्नों का यथोचित उत्तर देना आरम्भ किया।
श्लोक 167 (skanda.8.30.167)
निर्जगाम च देवेशः पार्वत्या सह शंकरः । उद्यानं दर्शयामास देव्या देवः पिनाकधृक्
nirjagāma ca deveśaḥ pārvatyā saha śaṁkaraḥ | udyānaṁ darśayāmāsa devyā devaḥ pinākadhṛk
देवेश शंकर पार्वती के साथ बाहर निकले; पिनाकधारी देव ने देवी को वह उद्यान दिखाना आरम्भ किया।
श्लोक 168 (skanda.8.30.168)
प्रफुल्लनानाविधगुल्मशोभितं लताप्रतानावनतं मनोरमम् । विरूढपुष्पैः परितः प्रियंगुभिः सुपुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः
praphullanānāvidhagulmaśobhitaṁ latāpratānāvanataṁ manoramam | virūḍhapuṣpaiḥ paritaḥ priyaṁgubhiḥ supuṣpitaiḥ kaṇṭakitaiśca ketakaiḥ
वह उद्यान विविध प्रकार से खिली हुई झाड़ियों से सुशोभित था, फैली हुई लताओं के भार से झुका हुआ, मनोहर था; चारों ओर उगे प्रियंगु के फूलों से, तथा सुपुष्पित काँटेदार केतकी के फूलों से भरा हुआ था।
श्लोक 169 (skanda.8.30.169)
तमालगुल्मैर्निचितं सुगन्धिभिर्निकामपुष्पैर्बकुलैश्च सर्वशः । अशोकपुंनागवनैस्सुपुष्पितैर्द्विरेफमालाकुलपुष्पसंचयैः
tamālagulmairnicitaṁ sugandhibhirnikāmapuṣpairbakulaiśca sarvaśaḥ | aśokapuṁnāgavanaissupuṣpitairdvirephamālākulapuṣpasaṁcayaiḥ
वह सर्वत्र तमाल की झाड़ियों से सघन था, सुगन्धित और भरपूर फूलों वाले बकुल वृक्षों से युक्त था, अशोक और पुन्नाग के सुपुष्पित वनों से — जिनके फूलों के गुच्छे भ्रमर-पंक्तियों से घिरे थे — सुशोभित था।
श्लोक 170 (skanda.8.30.170)
क्वचित् प्रफुल्लाम्बुजरेणुरूषितै विहङ्गमैश्चारुकलप्रणादिभिः । विनादितं सारसहंसमद्गुभिः प्रमत्तदात्यूहरुतैश्च वल्गुभिः
kvacit praphullāmbujareṇurūṣitai vihaṅgamaiścārukalapraṇādibhiḥ | vināditaṁ sārasahaṁsamadgubhiḥ pramattadātyūharutaiśca valgubhiḥ
कहीं-कहीं वह खिले हुए कमलों के पराग से आच्छादित पक्षियों की मधुर बोलियों से गूँज रहा था; सारस, हंस, जलकाग तथा मतवाले चातकों की मनोहर बोलियों से वह निनादित था।
श्लोक 171 (skanda.8.30.171)
क्वचिच्च चक्राह्वरुतोपनादितं क्वचिच्च कादम्बकदम्बकैर्युतम् । क्वचिच्च कारण्डवनादनादितं क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतम्
kvacicca cakrāhvarutopanāditaṁ kvacicca kādambakadambakairyutam | kvacicca kāraṇḍavanādanāditaṁ kvacicca mattālikulākulīkṛtam
कहीं यह चक्रवाकों की बोली से गूँजता था, कहीं कादम्ब हंसों के झुण्डों से भरा था, कहीं कारण्डव पक्षियों की ध्वनि से निनादित था, और कहीं मतवाले भ्रमर-समूहों से व्याकुल था।
श्लोक 172 (skanda.8.30.172)
मदाकुलाभिर्भ्रमराङ्गनाभिर्निषेवितं चारुसुगंधिपुष्पम् । क्वचित् सपुष्पैः सहकारवृक्षैर्लतोपगूढैस्तिलकैश्च गूढम्
madākulābhirbhramarāṅganābhirniṣevitaṁ cārusugaṁdhipuṣpam | kvacit sapuṣpaiḥ sahakāravṛkṣairlatopagūḍhaistilakaiśca gūḍham
उसके सुन्दर, सुगन्धित फूल मतवाली भ्रमरियों द्वारा सेवित थे; कहीं वह पुष्पित आम्रवृक्षों से और लताओं में लिपटे तिलक वृक्षों से आच्छादित था।
श्लोक 173 (skanda.8.30.173)
प्रगीतविद्याधरसिद्धधारणं प्रनृत्तनित्यानुगताप्सरोगणम् । प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितं प्रमत्तहारीतकुलोपनादितम्
pragītavidyādharasiddhadhāraṇaṁ pranṛttanityānugatāpsarogaṇam | prahṛṣṭanānāvidhapakṣisevitaṁ pramattahārītakulopanāditam
वहाँ विद्याधरों और सिद्धों के गीत गूँजते रहते थे, अप्सराओं के समूह वहाँ निरन्तर नृत्य करते रहते थे; प्रसन्न विविध पक्षी वहाँ सेवा करते थे, और मतवाले हारीत पक्षियों के झुण्ड वहाँ ध्वनि करते थे।
श्लोक 174 (skanda.8.30.174)
मृगेन्द्रनादाकुलसन्नमानसैः क्वचित्क्वचिद्बद्धकदम्बकं मृगैः । प्रफुल्लनानाविधचारुपङ्कजै स्सरस्तडागैरुपशोभितं क्वचित्
mṛgendranādākulasannamānasaiḥ kvacitkvacidbaddhakadambakaṁ mṛgaiḥ | praphullanānāvidhacārupaṅkajai ssarastaḍāgairupaśobhitaṁ kvacit
कहीं-कहीं सिंह की गर्जना से व्याकुल हुए मृगों के झुण्ड इकट्ठे खड़े थे; कहीं वह अनेक प्रकार के पूर्ण खिले हुए सुन्दर कमलों वाले सरोवरों और तालाबों से सुशोभित था।
श्लोक 175 (skanda.8.30.175)
निविडनिचुललीनानीलकण्ठाभिरामं मदमुदितविहङ्गवातनादाभिरामम् । कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफं नवकिशलयशोभाशोभित प्रान्तशाखम्
niviḍaniculalīnānīlakaṇṭhābhirāmaṁ madamuditavihaṅgavātanādābhirāmam | kusumitataruśākhālīnamattadvirephaṁ navakiśalayaśobhāśobhita prāntaśākham
सघन नरकुल-झाड़ियों में छिपे नीलकण्ठ मोरों से वह मनोहर था, मतवाले प्रसन्न पक्षियों की ध्वनि से मनोहर था; उसकी खिली हुई डालियाँ मतवाले भ्रमरों से भरी थीं, और उसकी बाहरी शाखाएँ नई कोंपलों की शोभा से सुशोभित थीं।
श्लोक 176 (skanda.8.30.176)
क्वचिच्च दन्तिक्षतचारुवीरुत् क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षम् । क्वचिद्विलासालसगामिनीभिर्निषेवितं किम्पुरुषाङ्गनाभिः
kvacicca dantikṣatacāruvīrut kvacillatāliṅgitacāruvṛkṣam | kvacidvilāsālasagāminībhirniṣevitaṁ kimpuruṣāṅganābhiḥ
कहीं हाथियों द्वारा क्षत-विक्षत सुन्दर लताएँ थीं, कहीं लताओं से आलिंगित सुन्दर वृक्ष थे; कहीं वह विलासपूर्वक मंथर गति से चलने वाली किंपुरुष स्त्रियों द्वारा सेवित था।
श्लोक 177 (skanda.8.30.177)
पारावतध्वनिविकूजितगारु शृंगैरभ्रंकषैः सितमनोहरचारुरूपैः । आकीर्णपुष्पनिकरप्रविविक्तहासैर्विभ्राजितं त्रिदशदेवकुलैरनेकैः
pārāvatadhvanivikūjitagāru śṛṁgairabhraṁkaṣaiḥ sitamanoharacārurūpaiḥ | ākīrṇapuṣpanikarapraviviktahāsairvibhrājitaṁ tridaśadevakulairanekaiḥ
वह कबूतरों की कूक से गूँजता था; उसके आकाश-चुम्बी शिखर श्वेत, मनोहर और सुन्दर आकार वाले थे; बिखरे हुए फूलों के समूहों की भाँति स्पष्ट हास्य से युक्त होकर वह देवताओं के अनेक समूहों से सुशोभित हो रहा था।
श्लोक 178 (skanda.8.30.178)
फुल्लोत्पलाम्बुजसहस्रवितानयुक्तैस्तोयाशयैस्समनुशोभितदेवमार्गम् । मार्गान्तरागलितपुष्पविचित्रभक्तै स्सम्बद्धगुल्मविटपैर्विहगैरुपेतम्
phullotpalāmbujasahasravitānayuktaistoyāśayaissamanuśobhitadevamārgam | mārgāntarāgalitapuṣpavicitrabhaktai ssambaddhagulmaviṭapairvihagairupetam
देवमार्ग हज़ारों खिले हुए नीलकमलों और कमलों की छतरी से सुशोभित जलाशयों से भरा हुआ था; मार्ग के बीच-बीच में गिरे हुए विचित्र फूलों से भरा हुआ था, और झाड़ियों की परस्पर जुड़ी शाखाओं पर बैठे पक्षियों से युक्त था।
श्लोक 179 (skanda.8.30.179)
तुङ्गाग्रैर्नील पुष्पस्तबकभरनतप्रान्तशाखैरशोकैर्मत्तालिव्रातगीतश्रुतिसुखजननैर्भासितं तन्मनोज्ञैः । रात्रौ चन्द्रप्रभासा कुमुमिततिलकैरेकतां संप्रयातं छायासुप्तप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुप्तदर्भाङ्कुराग्रम्
tuṅgāgrairnīla puṣpastabakabharanataprāntaśākhairaśokairmattālivrātagītaśrutisukhajananairbhāsitaṁ tanmanojñaiḥ | rātrau candraprabhāsā kumumitatilakairekatāṁ saṁprayātaṁ chāyāsuptaprabuddhasthitahariṇakulāluptadarbhāṅkurāgram
ऊँचे अशोक वृक्षों से वह देदीप्यमान था, जिनकी बाहरी शाखाएँ नीले फूलों के गुच्छों के भार से झुकी हुई थीं, और जिनकी मनोहरता मतवाले भ्रमर-समूहों की गुंजार से कानों को सुख देती थी; रात्रि में चन्द्रमा की चाँदनी खिले हुए तिलक वृक्षों के साथ मानो एकाकार हो जाती थी; छाया में सोते-जागते मृगों के झुण्डों ने वहाँ की दूब की कोंपलों को अछूता छोड़ रखा था।
श्लोक 180 (skanda.8.30.180)
हंसानां पक्षवात प्रचलितकमलस्वच्छविस्तीर्णतोयं तोयानां तीरजातप्रविकचकदलीवाटनृत्तन्मयूरम् । मायूरैः पक्षचन्द्रैः क्वचिदपि पतितं रञ्जितक्ष्माप्रदेशं देशे देशे निलीनप्रमुदितविलसन्मत्तहारीतवृन्दम्
haṁsānāṁ pakṣavāta pracalitakamalasvacchavistīrṇatoyaṁ toyānāṁ tīrajātapravikacakadalīvāṭanṛttanmayūram | māyūraiḥ pakṣacandraiḥ kvacidapi patitaṁ rañjitakṣmāpradeśaṁ deśe deśe nilīnapramuditavilasanmattahārītavṛndam
हंसों के पंखों की हवा से हिलते हुए कमलों से उसका जल स्वच्छ और विस्तृत था; तटों पर उगे खिले हुए केले के वृक्षों के बीच मोर नाचते थे; कहीं-कहीं गिरे हुए चन्द्राकार मोरपंखों से भूमि रंगी हुई थी; हर स्थान पर आनन्दित, क्रीड़ारत, मतवाले हारीत पक्षियों के झुण्ड छिपे रहते थे।
श्लोक 181 (skanda.8.30.181)
सारङ्गैः क्वचिदुपसेवितप्रदेशं संछन्नं कुसुमचयैः क्वचिद्विचित्रैः । हृष्टाभिः क्वचिदपि किन्नराङ्गनाभिः क्षीबाभिः सुमधुरगीतवृक्षषण्डम्
sāraṅgaiḥ kvacidupasevitapradeśaṁ saṁchannaṁ kusumacayaiḥ kvacidvicitraiḥ | hṛṣṭābhiḥ kvacidapi kinnarāṅganābhiḥ kṣībābhiḥ sumadhuragītavṛkṣaṣaṇḍam
कहीं वह मृगों द्वारा सेवित प्रदेशों से युक्त था, कहीं विचित्र फूलों के ढेरों से ढका हुआ था; कहीं-कहीं उसके वृक्षों के झुरमुट प्रसन्न, मतवाली किन्नर स्त्रियों के अत्यन्त मधुर गीतों से गूँजते थे।
श्लोक 182 (skanda.8.30.182)
संसृष्टैः क्वचिदुपरि प्रकीर्णपुष्पै रावासैः परिवृतपादपं मुनीनाम् । आमूलात्फलनिचितैः क्वचिद्विशालैरुत्तुङ्गैः पनसमहीरुहैरुपेतम्
saṁsṛṣṭaiḥ kvacidupari prakīrṇapuṣpai rāvāsaiḥ parivṛtapādapaṁ munīnām | āmūlātphalanicitaiḥ kvacidviśālairuttuṅgaiḥ panasamahīruhairupetam
कहीं मुनियों के आश्रमों से घिरे वृक्ष ऊपर से बिखरे हुए मिश्रित फूलों से युक्त थे; कहीं जड़ से लेकर ऊपर तक फलों से लदे विशाल और ऊँचे कटहल के वृक्ष थे।
श्लोक 183 (skanda.8.30.183)
फुल्लातिमुक्तकलतागृहलीनसिद्धं सिद्धाङ्गनाकनकनूपुररावरम्यम् । रम्य प्रियंगुतरुमञ्जरिसक्तभृङ्गं भृङ्गावलीशबलिताम्रकदम्बपुष्पम्
phullātimuktakalatāgṛhalīnasiddhaṁ siddhāṅganākanakanūpurarāvaramyam | ramya priyaṁgutarumañjarisaktabhṛṅgaṁ bhṛṅgāvalīśabalitāmrakadambapuṣpam
खिली हुई अतिमुक्त लताओं के मण्डपों में सिद्धगण छिपे रहते थे, जो सिद्ध-स्त्रियों के स्वर्ण-नूपुरों की ध्वनि से मनोहर लगते थे; सुन्दर प्रियंगु वृक्षों की मंजरियों में भ्रमर आसक्त थे, और भ्रमर-पंक्तियों से चित्रित ताम्रवर्णी कदम्ब के फूल थे।
श्लोक 184 (skanda.8.30.184)
पुष्पोत्करानिल विघूर्णितपादापग्र मग्रे सुरेभविनिपाटितवंशगुल्मम् । गुल्मान्तरप्रसृतभीत मृगीसमूह मूहावतां तनुभृतामपवर्गदातृ
puṣpotkarānila vighūrṇitapādāpagra magre surebhavinipāṭitavaṁśagulmam | gulmāntaraprasṛtabhīta mṛgīsamūha mūhāvatāṁ tanubhṛtāmapavargadātṛ
फूलों के ढेरों को उड़ाती हवा से वृक्षों की चोटियाँ हिलती थीं; ऐरावत हाथी द्वारा बाँस की झाड़ियाँ रौंदी जाती थीं; झुरमुटों के बीच भयभीत हिरनियों के झुण्ड इधर-उधर भागते थे — इस प्रकार यह उद्यान देहधारियों को मुक्ति देने वाला था।
श्लोक 185 (skanda.8.30.185)
चन्द्रांशुजालधवलैस्तिलकैर्मनोज्ञैः सिन्दूरकुंकुमकुसुम्भनिभैरशोकैः । चामीकरप्रतिसमैरथ कर्णिकारैः पुष्पोत्करैरुपचितं सुविशालशाखैः
candrāṁśujāladhavalaistilakairmanojñaiḥ sindūrakuṁkumakusumbhanibhairaśokaiḥ | cāmīkarapratisamairatha karṇikāraiḥ puṣpotkarairupacitaṁ suviśālaśākhaiḥ
उसकी विशाल शाखाएँ फूलों के ढेरों से भरी थीं — चन्द्र-किरणों के समान श्वेत मनोहर तिलक वृक्ष, सिन्दूर, कुंकुम और कुसुम्भ के रंग के समान अशोक वृक्ष, तथा शुद्ध स्वर्ण के समान कर्णिकार वृक्ष।
श्लोक 186 (skanda.8.30.186)
क्वचिदञ्जनचूर्णाभैः क्वचिद्विद्रुमसन्निभैः । क्वचित्काञ्चनसंकाशैः पुष्पैराचितभूतलम्
kvacidañjanacūrṇābhaiḥ kvacidvidrumasannibhaiḥ | kvacitkāñcanasaṁkāśaiḥ puṣpairācitabhūtalam
कहीं काजल के चूर्ण के समान श्याम फूलों से, कहीं मूँगे के समान लाल फूलों से, और कहीं स्वर्ण के समान पीले फूलों से भूमि आच्छादित थी।
श्लोक 187 (skanda.8.30.187)
पुन्नागेषु द्विजशतविरुतं रक्ताशोकस्तबकभरनतम् । रम्योपान्तं क्लमहरपवनं फुल्लाब्जेषु भ्रमरविलसितम्
punnāgeṣu dvijaśatavirutaṁ raktāśokastabakabharanatam | ramyopāntaṁ klamaharapavanaṁ phullābjeṣu bhramaravilasitam
पुन्नाग वृक्षों में सैकड़ों पक्षियों की चहचहाहट थी, जो लाल अशोक के फूलों के गुच्छों के भार से झुके हुए थे; उसके किनारे मनोहर थे, वायु थकान दूर करने वाली थी, और खिले हुए कमलों पर भ्रमर क्रीड़ा कर रहे थे।
श्लोक 188 (skanda.8.30.188)
सकलभुवनभर्ता लोकनाथस्तदानीं तुहिनशिखरिपुत्र्या सार्धमिष्टैर्गणेशैः । विविधतरुविशालं मत्तहृष्टान्यपुष्टमुपवनमतिरम्यं दर्शयामास देव्याः
sakalabhuvanabhartā lokanāthastadānīṁ tuhinaśikhariputryā sārdhamiṣṭairgaṇeśaiḥ | vividhataruviśālaṁ mattahṛṣṭānyapuṣṭamupavanamatiramyaṁ darśayāmāsa devyāḥ
उस समय समस्त लोकों के स्वामी लोकनाथ ने, हिमगिरि-पुत्री (पार्वती) के साथ अपने प्रिय गणेश्वरों को लेकर, विविध विशाल वृक्षों वाला, मत्त और प्रसन्न पक्षियों से भरा, अत्यन्त रमणीय वह उपवन देवी को दिखाया।
श्लोक 189 (skanda.8.30.189)
देव्युवाच। उद्यानं दर्शितं देव शोभया परया युतम् । क्षेत्रस्य तु गुणान् सर्वान् पुनर्वक्तुमिहार्हसि
devyuvāca| udyānaṁ darśitaṁ deva śobhayā parayā yutam | kṣetrasya tu guṇān sarvān punarvaktumihārhasi
देवी ने कहा — हे देव, आपने परम शोभा से युक्त यह उद्यान मुझे दिखाया। अब कृपया इस क्षेत्र के समस्त गुणों को भी पुनः मुझसे कहिए।
श्लोक 190 (skanda.8.30.190)
अस्य क्षेत्रस्य महात्म्यमविमुक्तस्य तत्तदा । श्रुत्वा हि नहि मे तृप्तिरतो भूयो वदस्व मे
asya kṣetrasya mahātmyamavimuktasya tattadā | śrutvā hi nahi me tṛptirato bhūyo vadasva me
इस अविमुक्त क्षेत्र के माहात्म्य को उस समय सुनकर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई है; इसलिए आप मुझसे और अधिक कहिए।
श्लोक 191 (skanda.8.30.191)
देवदेव उवाच। इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम । सर्वेषामेव जन्तूनां हेतुर्मोक्षस्य सर्वदा
devadeva uvāca| idaṁ guhyatamaṁ kṣetraṁ sadā vārāṇasī mama | sarveṣāmeva jantūnāṁ heturmokṣasya sarvadā
देवदेव ने कहा — यह अत्यन्त गुह्य क्षेत्र सदा मेरी वाराणसी है, जो समस्त प्राणियों के लिए सदैव मोक्ष का कारण है।
श्लोक 192 (skanda.8.30.192)
अस्मिन् सिद्धाः सदा देवि मदीयं व्रतमास्थिताः । नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकांक्षिणः
asmin siddhāḥ sadā devi madīyaṁ vratamāsthitāḥ | nānāliṅgadharā nityaṁ mama lokābhikāṁkṣiṇaḥ
हे देवि, यहाँ सिद्धगण सदा मेरे व्रत में स्थित रहकर, विविध लिंग धारण करते हुए, नित्य मेरे लोक की ही कामना करते हुए,
श्लोक 193 (skanda.8.30.193)
अभ्यस्यन्ति परं योगं युक्तात्मानो जितेन्द्रियाः । नानावृक्षलताकीर्णे नानाविहगसेविते
abhyasyanti paraṁ yogaṁ yuktātmāno jitendriyāḥ | nānāvṛkṣalatākīrṇe nānāvihagasevite
मन को वश में करके, इन्द्रियों को जीतकर, विविध वृक्षों और लताओं से भरे तथा अनेक पक्षियों से सेवित इस स्थान में, परम योग का अभ्यास करते हैं —
श्लोक 194 (skanda.8.30.194)
कमलोत्पलपुष्पाढ्यैः सरोभिः समलंकृते । अप्सरोगणगन्धर्वैः सदा संसेविते शुभे
kamalotpalapuṣpāḍhyaiḥ sarobhiḥ samalaṁkṛte | apsarogaṇagandharvaiḥ sadā saṁsevite śubhe
कमल और नीलकमल के फूलों से भरे सरोवरों से सुशोभित, तथा अप्सराओं और गन्धर्वों के समूहों द्वारा सदा सेवित इस मंगलमय स्थान में।
श्लोक 195 (skanda.8.30.195)
रोचते मे इहावासो येन कार्येण तच्छृणु । मन्मना मम भक्तश्च मयि सर्वार्पितक्रियः
rocate me ihāvāso yena kāryeṇa tacchṛṇu | manmanā mama bhaktaśca mayi sarvārpitakriyaḥ
यहाँ निवास करना मुझे प्रिय है — इसका कारण सुनो। जिसका मन मुझमें लगा है, जो मेरा भक्त है और जिसने अपनी सारी क्रियाएँ मुझे समर्पित कर दी हैं,
श्लोक 196 (skanda.8.30.196)
यथा मोक्षमिहाप्नोति अन्यत्र न तथा क्वचित् । जपध्यानोद्यतानां च ज्ञानेष्वारक्तचेतसाम्
yathā mokṣamihāpnoti anyatra na tathā kvacit | japadhyānodyatānāṁ ca jñāneṣvāraktacetasām
वह यहाँ जैसा मोक्ष प्राप्त करता है, वैसा अन्यत्र कहीं भी नहीं। जो जप और ध्यान में तत्पर हैं तथा जिनका चित्त ज्ञान में अनुरक्त है,
श्लोक 197 (skanda.8.30.197)
तमोमोहहतानां च वाराणस्यां गतिर्नॄणाम् । अत्रोत्क्रमणकाले तुव स्वयमेव महेश्वरः
tamomohahatānāṁ ca vārāṇasyāṁ gatirnṝṇām | atrotkramaṇakāle tuva svayameva maheśvaraḥ
तथा जो अज्ञान और मोह से पराजित हैं — उन मनुष्यों के लिए वाराणसी ही परम गति है। यहाँ मृत्यु के समय स्वयं महेश्वर,
श्लोक 198 (skanda.8.30.198)
ददाति तारकं ब्रह्म येनासौ तन्मयो भवेत् । एवं मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतरं महत्
dadāti tārakaṁ brahma yenāsau tanmayo bhavet | evaṁ mama puraṁ divyaṁ guhyād guhyataraṁ mahat
तारक-ब्रह्म प्रदान करते हैं, जिससे वह उसी में तन्मय हो जाता है। इस प्रकार मेरा यह दिव्य नगर गुह्य से भी अधिक गुह्य और महान् है,
श्लोक 199 (skanda.8.30.199)
ब्रह्मादयो विजानन्ति ये च सिद्धा मुमुक्षवः । अतः प्रियमिदं क्षेत्रं यस्माच्चेह रतिर्मम
brahmādayo vijānanti ye ca siddhā mumukṣavaḥ | ataḥ priyamidaṁ kṣetraṁ yasmācceha ratirmama
जिसे ब्रह्मा आदि देवता तथा मोक्षेच्छु सिद्धगण ही जानते हैं। इसीलिए यह क्षेत्र मुझे अत्यन्त प्रिय है, क्योंकि यहीं मेरी रति है।
श्लोक 200 (skanda.8.30.200)
विमुक्तं न मया यस्माद् मोक्ष्यते वा कदा च न । मम क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिदं स्मृतम्
vimuktaṁ na mayā yasmād mokṣyate vā kadā ca na | mama kṣetramidaṁ tasmādavimuktamidaṁ smṛtam
चूँकि यह मेरे द्वारा कभी त्यागा नहीं गया और न कभी त्यागा जाएगा, इसलिए मेरा यह क्षेत्र 'अविमुक्त' (कभी न त्यागा गया) कहलाता है।
श्लोक 201 (skanda.8.30.201)
नैमिशेथ कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारेथ पुष्करे । स्नानात् संसेवनाच्चापि न मोक्षः प्राप्यते यतः
naimiśetha kurukṣetre gaṅgādvāretha puṣkare | snānāt saṁsevanāccāpi na mokṣaḥ prāpyate yataḥ
न नैमिष में, न कुरुक्षेत्र में, न गंगाद्वार में, न पुष्कर में — केवल स्नान करने या वहाँ निवास करने मात्र से मोक्ष प्राप्त नहीं होता,
श्लोक 202 (skanda.8.30.202)
इह संप्राप्यते येन तत एतद् विशिष्यते । प्रयागे वा भवेन् मोक्ष इह वा मत्परिग्रहात्
iha saṁprāpyate yena tata etad viśiṣyate | prayāge vā bhaven mokṣa iha vā matparigrahāt
जबकि यहाँ वह प्राप्त हो जाता है — इसीलिए यह स्थान विशिष्ट है। प्रयाग में भी मोक्ष हो सकता है, अथवा मेरी शरण लेने से यहाँ भी।
श्लोक 203 (skanda.8.30.203)
प्रयागादपि तीर्थाग्र्यादिदमेव महत् स्मृतम् । जैगीषव्यः परा सिद्धिं यो गतः स महातपाः
prayāgādapi tīrthāgryādidameva mahat smṛtam | jaigīṣavyaḥ parā siddhiṁ yo gataḥ sa mahātapāḥ
तीर्थों में श्रेष्ठ प्रयाग से भी यह स्थान महान् माना गया है। जैगीषव्य, जो परम सिद्धि को प्राप्त हुए महातपस्वी थे,
श्लोक 204 (skanda.8.30.204)
अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् भक्त्या च मम भावतः । जैगीषव्यगुहा प्रेष्ठा योगिनां स्थानमिष्यते
asya kṣetrasya māhātmyād bhaktyā ca mama bhāvataḥ | jaigīṣavyaguhā preṣṭhā yogināṁ sthānamiṣyate
इस क्षेत्र की महिमा से और मेरे प्रति भक्ति तथा भाव से — जैगीषव्य की गुफा योगियों को अत्यन्त प्रिय है, और उसे योगियों का निवास-स्थान माना जाता है।
श्लोक 205 (skanda.8.30.205)
ध्यायतस्तत्र मां नित्यं योगाग्निर्दीप्यते भृशम् । कैवल्यं परमं याति देवानामपि दुर्लभम्
dhyāyatastatra māṁ nityaṁ yogāgnirdīpyate bhṛśam | kaivalyaṁ paramaṁ yāti devānāmapi durlabham
वहाँ नित्य मेरा ध्यान करने वाले के लिए योगाग्नि प्रबल रूप से प्रज्वलित होती है; वह देवताओं को भी दुर्लभ परम कैवल्य को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 206 (skanda.8.30.206)
अत्र सिद्धिं परां प्राप्तो मार्कण्डेयो महातपाः । बालखिल्यास्तथा सिद्धा अस्मिन् क्षेत्रे सुदुर्लभे
atra siddhiṁ parāṁ prāpto mārkaṇḍeyo mahātapāḥ | bālakhilyāstathā siddhā asmin kṣetre sudurlabhe
यहाँ महातपस्वी मार्कण्डेय ने परम सिद्धि प्राप्त की, तथा इस अत्यन्त दुर्लभ क्षेत्र में बालखिल्य ऋषि भी सिद्ध हुए।
श्लोक 207 (skanda.8.30.207)
आत्रेया भार्गवाः सिद्धा अस्मिन् क्षेत्रे सुदुर्लभे । अव्यक्तलिङ्गै र्मुनिभिः सर्वसिद्धान्तवेदिभिः
ātreyā bhārgavāḥ siddhā asmin kṣetre sudurlabhe | avyaktaliṅgai rmunibhiḥ sarvasiddhāntavedibhiḥ
इस अत्यन्त दुर्लभ क्षेत्र में आत्रेय और भार्गव ऋषिगण भी सिद्ध हुए — गूढ़ चिह्न धारण करने वाले, सम्पूर्ण सिद्धान्तों के ज्ञाता मुनि।
श्लोक 208 (skanda.8.30.208)
इह संप्राप्यते मोक्षो दुर्लभोन्यत्र कर्हिचित् । तेभ्यश्चाहं प्रयच्छामि योगैश्वर्यमनुत्तमम्
iha saṁprāpyate mokṣo durlabhonyatra karhicit | tebhyaścāhaṁ prayacchāmi yogaiśvaryamanuttamam
यहाँ मोक्ष प्राप्त होता है, जो अन्यत्र कभी भी दुर्लभ है। उन्हें मैं अनुपम योगैश्वर्य प्रदान करता हूँ,
श्लोक 209 (skanda.8.30.209)
आत्मनश्चैव सायुज्यमीप्सितं स्थानमेव च १ । कुवेरः स महासत्वस्तथा सर्वार्पितक्रियः
ātmanaścaiva sāyujyamīpsitaṁ sthānameva ca 1 | kuveraḥ sa mahāsatvastathā sarvārpitakriyaḥ
साथ ही अपने साथ सायुज्य (एकत्व) तथा वांछित पद भी। कुबेर, वह महाशक्तिशाली, जिसने भी अपनी सारी क्रियाएँ मुझे समर्पित कर दी थीं,
श्लोक 210 (skanda.8.30.210)
क्षेत्रसंसेवनादेव धनेशत्वमवाप ह
kṣetrasaṁsevanādeva dhaneśatvamavāpa ha
इस क्षेत्र की सेवा मात्र से धनेश्वरत्व (धन के स्वामित्व) को प्राप्त हुआ। [इस श्लोक का शेष भाग मूल स्रोत में नष्ट/अपठनीय है।]
श्लोक 211 (skanda.8.30.211)
इहैवाराध्य मां देवि सिद्धिं यास्यत्यनुत्तमाम् । पराशरसुतो योगी ऋषिर्व्यासो महातपाः
ihaivārādhya māṁ devi siddhiṁ yāsyatyanuttamām | parāśarasuto yogī ṛṣirvyāso mahātapāḥ
हे देवि, यहीं मेरी आराधना करके पराशर-पुत्र, महातपस्वी योगी ऋषि व्यास, अनुपम सिद्धि को प्राप्त करेंगे,
श्लोक 212 (skanda.8.30.212)
मम भक्तो भविष्यश्च वेदसंस्थाप्रवर्तकः । रमते सोपि पद्माक्षि क्षेत्रेस्मिन्मुनिपुंगवः
mama bhakto bhaviṣyaśca vedasaṁsthāpravartakaḥ | ramate sopi padmākṣi kṣetresminmunipuṁgavaḥ
और मेरे भक्त तथा वेद-परम्परा के प्रवर्तक होंगे। हे कमललोचने, वे मुनिश्रेष्ठ भी इसी क्षेत्र में आनन्दित रहते हैं।
श्लोक 213 (skanda.8.30.213)
ब्रह्मापि ऋषिभिः सार्धं विष्णुर्वायुर्दिवाकरः । देवराजस्तथा शक्रो अपि चान्ये दिवौकसः
brahmāpi ṛṣibhiḥ sārdhaṁ viṣṇurvāyurdivākaraḥ | devarājastathā śakro api cānye divaukasaḥ
ब्रह्मा भी ऋषियों सहित, विष्णु, वायु, सूर्य, देवराज इन्द्र तथा अन्य समस्त स्वर्गवासी देवता भी,
श्लोक 214 (skanda.8.30.214)
उपासते महात्मानः सर्वेशमिह सुव्रते । अनन्यमनसो भूत्वा मामेवोपासते सदा
upāsate mahātmānaḥ sarveśamiha suvrate | ananyamanaso bhūtvā māmevopāsate sadā
हे सुव्रते, यहाँ आकर सबके स्वामी की उपासना करते हैं; अनन्यचित्त होकर वे सदा केवल मेरी ही उपासना करते हैं।
श्लोक 215 (skanda.8.30.215)
आलर्कश्च पुरीमेतां मत्प्रसादादवाप्स्यति । स चैनां पूर्ववत् कृत्वा चतुवर्णसमाकुलाम्
ālarkaśca purīmetāṁ matprasādādavāpsyati | sa caināṁ pūrvavat kṛtvā catuvarṇasamākulām
मेरी कृपा से आलर्क इस नगरी को प्राप्त करेगा; उसे पूर्व की भाँति पुनः चारों वर्णों से परिपूर्ण बनाकर,
श्लोक 216 (skanda.8.30.216)
स्फीतां जनपदाकीर्णां भुक्त्वा च सुचिरं तदा । मयि सर्वार्पितप्राणो मामेव प्रतिपत्स्यते
sphītāṁ janapadākīrṇāṁ bhuktvā ca suciraṁ tadā | mayi sarvārpitaprāṇo māmeva pratipatsyate
समृद्ध और प्रजा से भरी उस नगरी का दीर्घकाल तक भोग करके, अन्ततः वह अपने प्राण मुझे समर्पित कर मुझे ही प्राप्त होगा।
श्लोक 217 (skanda.8.30.217)
ततः प्रभृति चार्वंगि येपि क्षेत्रनिवासिनः । गृहिणो लिंगिनो वापि मद्भक्ता मत्परायणाः
tataḥ prabhṛti cārvaṁgi yepi kṣetranivāsinaḥ | gṛhiṇo liṁgino vāpi madbhaktā matparāyaṇāḥ
हे सुन्दरांगी, उसके बाद जो भी इस क्षेत्र में निवास करेंगे — गृहस्थ हों या संन्यासी (लिंगधारी) — वे मेरे भक्त, मेरे परायण होकर,
श्लोक 218 (skanda.8.30.218)
मत्प्रसादाद् गमिष्यन्ति मोक्षं परमदुर्गमम् । विषयासक्तचित्तोपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः
matprasādād gamiṣyanti mokṣaṁ paramadurgamam | viṣayāsaktacittopi tyaktadharmaratirnaraḥ
मेरी कृपा से उस अत्यन्त दुर्गम मोक्ष को प्राप्त करेंगे। जो मनुष्य विषयों में आसक्त-चित्त होकर भी धर्म में अपनी रति त्याग देता है,
श्लोक 219 (skanda.8.30.219)
इह क्षेत्रे मृतश्चापि संसारं न पुनर्विशेत् । ये पुनर्निर्ममा धीराः सिद्धाः स्युर्विजितेन्द्रियाः
iha kṣetre mṛtaścāpi saṁsāraṁ na punarviśet | ye punarnirmamā dhīrāḥ siddhāḥ syurvijitendriyāḥ
और इस क्षेत्र में मर जाता है, तो वह संसार में पुनः प्रवेश नहीं करता। और जो ममता-रहित, धीर तथा जितेन्द्रिय हैं, वे सिद्ध होते हैं।
श्लोक 220 (skanda.8.30.220)
व्रतिन स्थानिरावस्थाः सर्वतो मयि भाविताः । देहभेदं समासाद्य धीमन्तः सर्गवर्जिताः
vratina sthānirāvasthāḥ sarvato mayi bhāvitāḥ | dehabhedaṁ samāsādya dhīmantaḥ sargavarjitāḥ
व्रतधारी, विविध अवस्थाओं में स्थित रहकर सर्वथा मुझमें लीन मन वाले बुद्धिमान् जन, शरीर का त्याग करते ही आगे की सृष्टि (पुनर्जन्म) से मुक्त हो जाते हैं,
श्लोक 221 (skanda.8.30.221)
प्रपत्स्यन्ते परं मोक्षं प्रसन्ने मयि सुव्रते । जन्मान्त्तरसहस्रेषु युञ्जन् योगमवाप्नुयात् । तदिहैव परं मोक्षं मरणादधि गच्छति
prapatsyante paraṁ mokṣaṁ prasanne mayi suvrate | janmānttarasahasreṣu yuñjan yogamavāpnuyāt | tadihaiva paraṁ mokṣaṁ maraṇādadhi gacchati
और जब मैं प्रसन्न होता हूँ, हे सुव्रते, वे परम मोक्ष को प्राप्त करते हैं। अन्यत्र योगाभ्यास करने वाला हज़ारों जन्मों में जो प्राप्त करता, वही परम मोक्ष यहाँ मृत्यु के द्वारा ही प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 222 (skanda.8.30.222)
ब्रह्मघ्नगोघ्नगुरुतल्पगचौरवृत्तिर्न मो प है नियतस्ववृत्तिः । संसारभूतदृढपाशविमुक्तशोको वाराणसीं मम पुरीं समुपैति लोकः
brahmaghnagoghnagurutalpagacauravṛttirna mo pa hai niyatasvavṛttiḥ | saṁsārabhūtadṛḍhapāśavimuktaśoko vārāṇasīṁ mama purīṁ samupaiti lokaḥ
ब्रह्महत्या, गोहत्या, गुरु की शय्या को दूषित करना, तथा चोरी — ऐसे आचरण वाला व्यक्ति भी [स्रोत में यहाँ कुछ अक्षर अपठनीय/नष्ट हैं] संयमित आचरण वाला होकर, संसार के दृढ़ पाश से मुक्त होकर शोकरहित हो, मेरी नगरी वाराणसी को प्राप्त करता है।
श्लोक 223 (skanda.8.30.223)
एतत् संक्षेपतो देवि क्षेत्रस्यास्य महत् फलम् । अविमुक्तस्य कथितं मया ते गुह्यमुत्तमम्
etat saṁkṣepato devi kṣetrasyāsya mahat phalam | avimuktasya kathitaṁ mayā te guhyamuttamam
हे देवि, संक्षेप में यही इस क्षेत्र का महान् फल है; अविमुक्त क्षेत्र का यह उत्तम रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया।
श्लोक 224 (skanda.8.30.224)
अतः परतरं नास्ति सिद्धं गुह्यमधीश्वरि । एतद् बुध्यन्ति योगज्ञा ये च योग परा भुवि
ataḥ parataraṁ nāsti siddhaṁ guhyamadhīśvari | etad budhyanti yogajñā ye ca yoga parā bhuvi
हे अधीश्वरि, इससे बढ़कर कोई सिद्ध रहस्य नहीं है। इसे वे ही समझते हैं जो योग के ज्ञाता हैं और इस पृथ्वी पर परम योग में लगे रहते हैं।
श्लोक 225 (skanda.8.30.225)
एतदेव परं ज्ञानमेतदेव परं शिवम् । एतदेव परं ब्रह्म एतदेव परं पदम्
etadeva paraṁ jñānametadeva paraṁ śivam | etadeva paraṁ brahma etadeva paraṁ padam
यही परम ज्ञान है, यही परम मंगल है, यही परम ब्रह्म है, और यही परम पद है।
श्लोक 226 (skanda.8.30.226)
वाराणसी तु भुवनत्रयसारभूता रम्या पुरी मम सदा गिरिराजपुत्रि । यत्रागता विविधदुष्कृतकारिणोपि पापक्षयाद्विरजसः श्रुति यांति मुक्तिम्
vārāṇasī tu bhuvanatrayasārabhūtā ramyā purī mama sadā girirājaputri | yatrāgatā vividhaduṣkṛtakāriṇopi pāpakṣayādvirajasaḥ śruti yāṁti muktim
हे गिरिराज-पुत्री, वाराणसी तीनों लोकों का सार है, मेरी सदा-रमणीय नगरी है, जहाँ आकर विविध पाप करने वाले लोग भी पाप के क्षय से निर्मल होकर मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 227 (skanda.8.30.227)
य आगच्छेत् कथंचिच्च पुरीं वाराणसीं नरः । तमुपायं प्रकुर्वीत निर्गच्छेन्न पुनर्यथा
ya āgacchet kathaṁcicca purīṁ vārāṇasīṁ naraḥ | tamupāyaṁ prakurvīta nirgacchenna punaryathā
जो मनुष्य किसी भी प्रकार वाराणसी नगरी में आ जाए, उसे ऐसा उपाय करना चाहिए कि वह पुनः वहाँ से बाहर न निकले।
श्लोक 228 (skanda.8.30.228)
यदीच्छेत् सफलं जन्म कोन्यं वेद्याफलं तथा । काशीपुर्यां त्यजेद् देहं यदीच्छेत् परमं पदम्
yadīcchet saphalaṁ janma konyaṁ vedyāphalaṁ tathā | kāśīpuryāṁ tyajed dehaṁ yadīcchet paramaṁ padam
यदि कोई सफल जन्म चाहता है — और इसके समान अन्य कौन-सा फल जानने योग्य है? — तो उसे परम पद की इच्छा से काशीपुरी में ही देह त्यागनी चाहिए।
श्लोक 229 (skanda.8.30.229)
एतत्स्मृतं प्रियतमं मम देवि विश्वं क्षेत्रं विचित्रतरुगुल्मनिकामपुष्पम् । अस्मिन्मृतास्तनुभृतः पदमाप्नुवन्ति मोक्षाख्यमेवशिवतापि न संशयोत्र
etatsmṛtaṁ priyatamaṁ mama devi viśvaṁ kṣetraṁ vicitratarugulmanikāmapuṣpam | asminmṛtāstanubhṛtaḥ padamāpnuvanti mokṣākhyamevaśivatāpi na saṁśayotra
हे देवि, यह मुझे अत्यन्त प्रिय स्मरण किया गया समस्त क्षेत्र है — विचित्र वृक्षों, झाड़ियों और भरपूर फूलों से युक्त। यहाँ मरने वाले देहधारी मोक्ष नामक उस मंगलमय पद को प्राप्त करते हैं — इसमें कोई संशय नहीं है।