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अम्बिका खण्ड · अध्याय 31

क्षुप और दधीचि का विवाद

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (skanda.8.31.1)

सनत्कुमार उवाच । एतस्मिन्नन्तरे देवो देवीमाह गिरीन्द्रजाम् । व्रजाम दातुं यक्षाय वरं भक्ताय भाविनि

sanatkumāra uvāca | etasminnantare devo devīmāha girīndrajām | vrajāma dātuṁ yakṣāya varaṁ bhaktāya bhāvini

सनत्कुमार ने कहा - इसी बीच भगवान् शिव ने पर्वतराज-पुत्री देवी से कहा - हे भाविनि! चलो, हम अपने भक्त यक्ष को वर देने चलें।

श्लोक 2 (skanda.8.31.2)

भक्तो मम वरारोहे तपसा दग्धकिल्बिषः । अर्हो वरमसौ लब्धुमस्मत्तो भुवनेश्वरि

bhakto mama varārohe tapasā dagdhakilbiṣaḥ | arho varamasau labdhumasmatto bhuvaneśvari

हे सुन्दरी! वह मेरा भक्त है, जिसने तपस्या से अपने पाप जला डाले हैं। हे भुवनेश्वरि! वह हमसे वर पाने का अधिकारी है।

श्लोक 3 (skanda.8.31.3)

एवमुक्त्वा ततो देवः सह देव्या जगत्पतिः । जगाम यक्षो यत्रास्ते कृशो धमनिसंततः । दिव्यं चक्षुरदाच्चैव येनापश्यत् स शंकरम्

evamuktvā tato devaḥ saha devyā jagatpatiḥ | jagāma yakṣo yatrāste kṛśo dhamanisaṁtataḥ | divyaṁ cakṣuradāccaiva yenāpaśyat sa śaṁkaram

ऐसा कहकर जगत्पति देव देवी के साथ वहाँ गए जहाँ वह यक्ष कृश शरीर और उभरी हुई नसों के साथ था। उन्होंने उसे दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे उसने शंकर को देखा।

श्लोक 4 (skanda.8.31.4)

सनत्कुमार उवाच । अथ यक्षस्तदा व्यास शनैरुन्मील्य लोचने । अपश्यत् सगणं देवं वृषकेतुमुपाश्रितम्

sanatkumāra uvāca | atha yakṣastadā vyāsa śanairunmīlya locane | apaśyat sagaṇaṁ devaṁ vṛṣaketumupāśritam

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! तब उस यक्ष ने धीरे-धीरे अपने नेत्र खोलकर, गणों सहित वृषभध्वज भगवान को अपने निकट देखा।

श्लोक 5 (skanda.8.31.5)

देवदेव उवाच । वरं ददामि ते पूर्वं त्रैलोक्ये नर्शनं तथा । सारत्वं च शरीरस्य पश्य मां विगतज्वरः

devadeva uvāca | varaṁ dadāmi te pūrvaṁ trailokye narśanaṁ tathā | sāratvaṁ ca śarīrasya paśya māṁ vigatajvaraḥ

देवदेव ने कहा - मैं पहले तुम्हें यह वर देता हूँ - त्रिलोक में मेरा दर्शन तथा शरीर की सम्पूर्ण स्वस्थता। अब ज्वर-रहित होकर मुझे देखो।

श्लोक 6 (skanda.8.31.6)

सनत्कुमार उवाच । ततः स लब्ध्वा तु वरं शरीरेणाक्षतेन च । पादयोः प्रणतस्तस्थौ कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa labdhvā tu varaṁ śarīreṇākṣatena ca | pādayoḥ praṇatastasthau kṛtvā śirasi cāñjalim

सनत्कुमार बोले - तब वर पाकर और शरीर के अक्षत हो जाने पर, वह सिर पर अंजलि बाँधकर भगवान के चरणों में प्रणत होकर खड़ा रहा।

श्लोक 7 (skanda.8.31.7)

उवाच च तदेशेन वरदोस्मीति चोदितः । भगवन् भक्तिमव्यग्रां त्वय्यनन्यां विधत्स्व मे

uvāca ca tadeśena varadosmīti coditaḥ | bhagavan bhaktimavyagrāṁ tvayyananyāṁ vidhatsva me

देव के 'मैं वरदाता हूँ' यह कहे जाने पर प्रेरित होकर उसने कहा - हे भगवन्! मुझे आपके प्रति अव्यग्र और अनन्य भक्ति प्रदान कीजिए।

श्लोक 8 (skanda.8.31.8)

अन्नदत्वं च लोकानां गाणपत्यं तथाक्षयम् । अविमुक्ते च ते स्थाने वसेयं सर्वदा यथा । एतमिच्छामि देवेश दत्तं वरमनुत्तमम्

annadatvaṁ ca lokānāṁ gāṇapatyaṁ tathākṣayam | avimukte ca te sthāne vaseyaṁ sarvadā yathā | etamicchāmi deveśa dattaṁ varamanuttamam

और मैं लोगों को अन्न देने वाला बनूँ तथा अक्षय गणपतित्व प्राप्त करूँ, और मैं सदा आपके अविमुक्त क्षेत्र में निवास करूँ। हे देवेश! मैं यही उत्तम वर पाना चाहता हूँ।

श्लोक 9 (skanda.8.31.9)

देवदेव उवाच । जरामरणसंत्यक्तः सर्वशोकविवर्जितः । भविष्यसि गणाध्यक्षो वरदः सर्वपूजितः

devadeva uvāca | jarāmaraṇasaṁtyaktaḥ sarvaśokavivarjitaḥ | bhaviṣyasi gaṇādhyakṣo varadaḥ sarvapūjitaḥ

देवदेव ने कहा - तुम जरा-मरण से रहित, समस्त शोक से मुक्त, गणाध्यक्ष, वरदाता तथा सबके द्वारा पूजित होओगे।

श्लोक 10 (skanda.8.31.10)

अजय्यश्चापि सर्वेषां योगैश्वर्यसमन्वितः । अन्नदश्चापि लोकेभ्यः क्षेत्रपालो भविष्यसि

ajayyaścāpi sarveṣāṁ yogaiśvaryasamanvitaḥ | annadaścāpi lokebhyaḥ kṣetrapālo bhaviṣyasi

तुम सबके लिए अजेय, योग-ऐश्वर्य से युक्त, लोकों के लिए अन्नदाता तथा क्षेत्रपाल होओगे।

श्लोक 11 (skanda.8.31.11)

महाबलो महासत्वो ब्रह्मण्यो थ मम प्रियः । त्र्यक्षश्च दण्डपाणिश्च महायोगी तथैव च

mahābalo mahāsatvo brahmaṇyo tha mama priyaḥ | tryakṣaśca daṇḍapāṇiśca mahāyogī tathaiva ca

तुम महाबली, महासत्त्ववान्, ब्राह्मणों के हितैषी और मुझे प्रिय होगे। तुम त्रिनेत्र, दण्डपाणि तथा महायोगी भी होगे।

श्लोक 12 (skanda.8.31.12)

उद्भ्रमः संभ्रमश्चैव गणौ ते परिचारकौ । तवाज्ञया करिष्येते लोकस्योद्भ्रमसंभ्रमौ

udbhramaḥ saṁbhramaścaiva gaṇau te paricārakau | tavājñayā kariṣyete lokasyodbhramasaṁbhramau

उद्भ्रम और संभ्रम नामक दो गण तुम्हारे परिचारक होंगे। वे तुम्हारी आज्ञा से लोक में उद्भ्रम और संभ्रम उत्पन्न करेंगे।

श्लोक 13 (skanda.8.31.13)

सनत्कुमार उवाच । एवं स भगवान् व्यास यक्षं कृत्वा गणेश्वरम् । जगाम धाम देवेशः सह तेन सुरेश्वरः

sanatkumāra uvāca | evaṁ sa bhagavān vyāsa yakṣaṁ kṛtvā gaṇeśvaram | jagāma dhāma deveśaḥ saha tena sureśvaraḥ

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इस प्रकार उस यक्ष को गणेश्वर बनाकर देवेश सुरेश्वर उसके साथ अपने धाम को गए।

श्लोक 14 (skanda.8.31.14)

अथ दृष्ट्वा ततो देवीं देवदेवो वृषध्वजः । तप्यतो मन्दरस्याशु वरदानार्थमब्रवीत्

atha dṛṣṭvā tato devīṁ devadevo vṛṣadhvajaḥ | tapyato mandarasyāśu varadānārthamabravīt

तदनन्तर देवी को देखकर, तप करते हुए मन्दराचल के लिए, वृषभध्वज देवदेव ने वर देने हेतु शीघ्र कुछ कहा।

श्लोक 15 (skanda.8.31.15)

देवदेव उवाच । देवि फुल्लारविन्दाक्षि गमिष्यामि सुमध्यमे । मन्दरं पर्वतश्रेष्ठमनुग्रहवरेप्सया

devadeva uvāca | devi phullāravindākṣi gamiṣyāmi sumadhyame | mandaraṁ parvataśreṣṭhamanugrahavarepsayā

देवदेव ने कहा - हे कमलनयनी, सुमध्यमे देवि! मैं अनुग्रह-वर देने की इच्छा से पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल को जाऊँगा।

श्लोक 16 (skanda.8.31.16)

सभार्यः ससुतश्चैव स हि मां ससुहृज्जनः । प्रपन्न स्तापस श्रेष्ठो मन्दरः पर्वतोत्तमः

sabhāryaḥ sasutaścaiva sa hi māṁ sasuhṛjjanaḥ | prapanna stāpasa śreṣṭho mandaraḥ parvatottamaḥ

क्योंकि पर्वतों में उत्तम, तपस्वियों में श्रेष्ठ वह मन्दराचल अपनी पत्नी, पुत्रों तथा सुहृज्जनों सहित मेरी शरण में आया है।

श्लोक 17 (skanda.8.31.17)

अद्य वर्षसहस्राणि पञ्च दिव्यानि पार्वति । तप्यते तपतां श्रेष्ठो मयि सर्वात्मभावतः

adya varṣasahasrāṇi pañca divyāni pārvati | tapyate tapatāṁ śreṣṭho mayi sarvātmabhāvataḥ

हे पार्वति! आज पाँच सहस्र दिव्य वर्षों से तपस्वियों में श्रेष्ठ वह मन्दराचल सर्वात्मभाव से मेरे प्रति तपस्या कर रहा है।

श्लोक 18 (skanda.8.31.18)

देव्युवाच । नय मामपि देवेश मन्दरं चारुकन्दरम् । न रंस्येहं विना देव त्वया सर्वजगत्पते

devyuvāca | naya māmapi deveśa mandaraṁ cārukandaram | na raṁsyehaṁ vinā deva tvayā sarvajagatpate

देवी ने कहा - हे देवेश! मुझे भी सुन्दर कन्दराओं वाले मन्दराचल ले चलिए। हे सर्वजगत्पते! मैं आपके बिना यहाँ प्रसन्न नहीं रहूँगी।

श्लोक 19 (skanda.8.31.19)

ततो देवः प्रहस्यैनामुवाच परमेश्वरः । अविमुक्तं न मोक्तव्यं कथं त्वं यातुमिच्छसि

tato devaḥ prahasyaināmuvāca parameśvaraḥ | avimuktaṁ na moktavyaṁ kathaṁ tvaṁ yātumicchasi

तब परमेश्वर ने मुस्कुराते हुए उससे कहा - अविमुक्त क्षेत्र को कभी नहीं त्यागना चाहिए, फिर तुम वहाँ जाने की इच्छा कैसे करती हो?

श्लोक 20 (skanda.8.31.20)

देव्युवाच । इह चैव निवत्स्यामि गमिष्यामि च मन्दरम् । अविमुक्तमिदं स्थानं ततो देव भविष्यति

devyuvāca | iha caiva nivatsyāmi gamiṣyāmi ca mandaram | avimuktamidaṁ sthānaṁ tato deva bhaviṣyati

देवी ने कहा - मैं यहाँ भी निवास करूँगी और मन्दराचल भी जाऊँगी। हे देव! इस प्रकार वह स्थान भी 'अविमुक्त' ही हो जाएगा।

श्लोक 21 (skanda.8.31.21)

देवदेव उवाच । एवमेतद् वरारोहे यथा वदसि पार्वति । ऐश्वर्यात् सर्वगा हि त्वं यथाहं देवि सर्वशः

devadeva uvāca | evametad varārohe yathā vadasi pārvati | aiśvaryāt sarvagā hi tvaṁ yathāhaṁ devi sarvaśaḥ

देवदेव ने कहा - हे वरारोहे पार्वति! जैसा तुम कहती हो, वैसा ही है। हे देवि! अपने ऐश्वर्य से तुम भी मेरी ही भाँति सर्वत्र व्यापक हो।

श्लोक 22 (skanda.8.31.22)

सनत्कुमार उवाच । ततः स भगवान् देवो वृषमारुह्य सर्वगम् । सोमः सनन्दी सगणो मन्दरं प्रययौ हरः

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa bhagavān devo vṛṣamāruhya sarvagam | somaḥ sanandī sagaṇo mandaraṁ prayayau haraḥ

सनत्कुमार बोले - तब वे भगवान् हर देव सर्वगामी वृषभ पर सवार होकर, सोम, नन्दी तथा गणों सहित मन्दराचल की ओर चले।

श्लोक 23 (skanda.8.31.23)

स गत्वा भुवनेशानस्तप्यमानं परं तपः । अपश्यन्मन्दरं तत्र दृष्टवा चैन मुवाच ह

sa gatvā bhuvaneśānastapyamānaṁ paraṁ tapaḥ | apaśyanmandaraṁ tatra dṛṣṭavā caina muvāca ha

वहाँ जाकर लोकेश्वर शिव ने परम तप करते हुए मन्दराचल को देखा, और उसे देखकर उससे कहा।

श्लोक 24 (skanda.8.31.24)

वरदोस्मि गिरीशान तुष्टस्ते तपसा भृशम् । वरं वृणु यथेष्टन्त्वं सर्वं तत् प्रददामि ते

varadosmi girīśāna tuṣṭaste tapasā bhṛśam | varaṁ vṛṇu yatheṣṭantvaṁ sarvaṁ tat pradadāmi te

हे गिरीशान! मैं वरदाता हूँ, तुम्हारी तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो इष्ट हो, वह वर माँगो, मैं तुम्हें वह सब दूँगा।

श्लोक 25 (skanda.8.31.25)

सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तश्शर्वेण दृष्ट्वा त्रिभुवनेश्वरम् । सोमं सनन्दिनं चैव प्रणम्य वृषवाहनम्

sanatkumāra uvāca | sa evamuktaśśarveṇa dṛṣṭvā tribhuvaneśvaram | somaṁ sanandinaṁ caiva praṇamya vṛṣavāhanam

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार शर्व द्वारा कहे जाने पर, त्रिभुवनेश्वर, सोम और नन्दी सहित वृषवाहन शिव को देखकर उन्हें प्रणाम करके...

श्लोक 26 (skanda.8.31.26)

पुनः पुनर्हरं दृष्टवा देवीञ्चैव पुनः पुनः । पुनः पुनर्गणञ्चैव नन्दिनञ्च ननाम सः

punaḥ punarharaṁ dṛṣṭavā devīñcaiva punaḥ punaḥ | punaḥ punargaṇañcaiva nandinañca nanāma saḥ

...बार-बार हर को देखकर, बार-बार देवी को, बार-बार गणों को तथा नन्दी को भी उसने बार-बार प्रणाम किया।

श्लोक 27 (skanda.8.31.27)

तं तथा व्याकुलं दृष्टवा हर्षजास्राविलेक्षणः । वरेणच्छन्दयामास भूय एव हरो गिरिम्

taṁ tathā vyākulaṁ dṛṣṭavā harṣajāsrāvilekṣaṇaḥ | vareṇacchandayāmāsa bhūya eva haro girim

उसे इस प्रकार भाव-विह्वल देखकर, हर्ष के आँसुओं से धुँधली आँखों वाले हर ने पुनः उस पर्वत को वर माँगने के लिए प्रेरित किया।

श्लोक 28 (skanda.8.31.28)

देवदेव उवाच । वरं वृणीष्व भद्रं ते वरदोहं तवाचल । यथेष्टं दातुमिच्छामि वरं वरय भूधर

devadeva uvāca | varaṁ vṛṇīṣva bhadraṁ te varadohaṁ tavācala | yatheṣṭaṁ dātumicchāmi varaṁ varaya bhūdhara

देवदेव ने कहा - हे अचल! वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारा वरदाता हूँ। हे भूधर! मैं तुम्हें इच्छित वर देना चाहता हूँ, वर माँगो।

श्लोक 29 (skanda.8.31.29)

मन्दर उवाच । भगवन् यदि तुष्टोसि देवदेव जगत्पते । मयि ते वासिच्छामि सोमस्य सगणस्य च

mandara uvāca | bhagavan yadi tuṣṭosi devadeva jagatpate | mayi te vāsicchāmi somasya sagaṇasya ca

मन्दर ने कहा - हे भगवन् जगत्पते देवदेव! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मैं चाहता हूँ कि आप सोम और अपने गणों सहित मुझमें निवास करें।

श्लोक 30 (skanda.8.31.30)

इच्छामि देवदेवेश पादस्पर्शेन ते सदा । पवित्रीकृतमात्मानं सोमेन सगणेन च

icchāmi devadeveśa pādasparśena te sadā | pavitrīkṛtamātmānaṁ somena sagaṇena ca

हे देवदेवेश! मैं चाहता हूँ कि सोम और गणों सहित मेरा शरीर सदा आपके चरण-स्पर्श से पवित्र होता रहे।

श्लोक 31 (skanda.8.31.31)

नान्यं वरमिहेच्छामि त्वत्तो देव जगद्गुरो । एष एव वरो मह्यं दीयतां भुवनेश्वर

nānyaṁ varamihecchāmi tvatto deva jagadguro | eṣa eva varo mahyaṁ dīyatāṁ bhuvaneśvara

हे जगद्गुरु देव! मैं आपसे और कोई वर नहीं चाहता। हे भुवनेश्वर! मुझे यही वर दीजिए।

श्लोक 32 (skanda.8.31.32)

सनत्कुमार उवाच । एवमस्त्विति तं प्राह मन्दरं वरदस्तदा । सनन्दी सह देव्या च निवत्स्यामि सदा त्वयि

sanatkumāra uvāca | evamastviti taṁ prāha mandaraṁ varadastadā | sanandī saha devyā ca nivatsyāmi sadā tvayi

सनत्कुमार बोले - तब वरदाता ने मन्दराचल से कहा - 'ऐसा ही हो। मैं नन्दी और देवी सहित सदा तुम पर निवास करूँगा।'

श्लोक 33 (skanda.8.31.33)

त्वं चापि भूभृतां श्रेष्ठो जरामरणवर्जितः । अभेद्यश्चैव वज्रेण मत्प्रसादाद् भविष्यसि

tvaṁ cāpi bhūbhṛtāṁ śreṣṭho jarāmaraṇavarjitaḥ | abhedyaścaiva vajreṇa matprasādād bhaviṣyasi

'और तुम भी पर्वतों में श्रेष्ठ, जरा-मृत्यु से रहित होगे तथा मेरी कृपा से वज्र से भी अभेद्य हो जाओगे।'

श्लोक 34 (skanda.8.31.34)

रम्यश्च सर्वभूतानां हेमरत्नविभूषितः । अप्सरोगणसंकीर्णः सुरसिद्धनिषेवितः

ramyaśca sarvabhūtānāṁ hemaratnavibhūṣitaḥ | apsarogaṇasaṁkīrṇaḥ surasiddhaniṣevitaḥ

'तुम समस्त प्राणियों के लिए रमणीय, स्वर्ण-रत्नों से विभूषित, अप्सराओं के समूह से भरे हुए तथा देवों और सिद्धों द्वारा सेवित होओगे।'

श्लोक 35 (skanda.8.31.35)

सनत्कुमार उवाच । ततोसृजद् गृहं तत्र जाम्बूनदमयं महत् । मनसातिगुणं व्यास न तेनास्ति समं क्वचित्

sanatkumāra uvāca | tatosṛjad gṛhaṁ tatra jāmbūnadamayaṁ mahat | manasātiguṇaṁ vyāsa na tenāsti samaṁ kvacit

सनत्कुमार बोले - तब उन्होंने वहाँ स्वर्णमय एक विशाल भवन का निर्माण किया, जो हे व्यास! मन से भी परे था, जिसके समान कहीं कुछ नहीं है।

श्लोक 36 (skanda.8.31.36)

न तादृग् ब्रह्मणोप्यस्ति किमुतान्यस्य कस्यचित् । तेजसा वर्ष्मणा कान्त्या वृषनाम्नातिविश्रुतम्

na tādṛg brahmaṇopyasti kimutānyasya kasyacit | tejasā varṣmaṇā kāntyā vṛṣanāmnātiviśrutam

ऐसा भवन ब्रह्मा के पास भी नहीं है, फिर किसी और की तो बात ही क्या। वह तेज, आकार और कान्ति से 'वृष' नाम से अत्यन्त विख्यात हुआ।

श्लोक 37 (skanda.8.31.37)

व्यास उवाच । भगवन् ब्रह्मणः सूनो सर्वयोगेश्वरेश्वर । न मे तृप्तिस्त्वयाख्याते देवदेवस्य च चेष्टिते

vyāsa uvāca | bhagavan brahmaṇaḥ sūno sarvayogeśvareśvara | na me tṛptistvayākhyāte devadevasya ca ceṣṭite

व्यास ने कहा - हे भगवन्! हे ब्रह्मपुत्र! हे समस्त योगेश्वरों के ईश्वर! आपके द्वारा वर्णित देवदेव की लीलाओं से मेरी तृप्ति नहीं हो रही।

श्लोक 38 (skanda.8.31.38)

स वृषो दयितश्चैव वाहनत्त्वं महाबलः । केनागमन्महाशब्दो महेशस्य महात्मनः

sa vṛṣo dayitaścaiva vāhanattvaṁ mahābalaḥ | kenāgamanmahāśabdo maheśasya mahātmanaḥ

वह प्रिय और महाबली वृषभ, जिसकी बड़ी महिमा है, महात्मा महेश्वर का वाहनत्व कैसे प्राप्त हुआ?

श्लोक 39 (skanda.8.31.39)

कस्य पुत्रः कस्य नप्ता कथं जज्ञे तथैव च । किं तपः किं फलं तस्य एतदिच्छामि वेदितुम्

kasya putraḥ kasya naptā kathaṁ jajñe tathaiva ca | kiṁ tapaḥ kiṁ phalaṁ tasya etadicchāmi veditum

वह किसका पुत्र, किसका पौत्र है, और कैसे उत्पन्न हुआ? उसका क्या तप था और उसका क्या फल मिला - यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 40 (skanda.8.31.40)

अभवज्जलदः पूर्वं वाहनं रुद्रवल्लभम् । स कथं तत् परित्यज्य वृषभे मतिमादधे

abhavajjaladaḥ pūrvaṁ vāhanaṁ rudravallabham | sa kathaṁ tat parityajya vṛṣabhe matimādadhe

पहले मेघ ही रुद्र का प्रिय वाहन था। उसे त्यागकर उन्होंने वृषभ में अपना मन कैसे लगाया?

श्लोक 41 (skanda.8.31.41)

सनत्कुमार उवाच । पुरा वेदः सुतो जज्ञे ब्रह्मणः प्रथमोद्भुतः । द्वितीयश्चैव यज्ञोभूत् तं च लोके न्ययुंजत

sanatkumāra uvāca | purā vedaḥ suto jajñe brahmaṇaḥ prathamodbhutaḥ | dvitīyaścaiva yajñobhūt taṁ ca loke nyayuṁjata

सनत्कुमार बोले - पूर्वकाल में ब्रह्मा का प्रथम पुत्र वेद उत्पन्न हुआ, और दूसरा यज्ञ; उसे उन्होंने लोक में नियुक्त किया।

श्लोक 42 (skanda.8.31.42)

स लोकाप्यायनकरः प्रयुक्तो ब्रह्महणा स्वयम् । प्रजा विवर्द्धयिषता नावर्द्धयदशेषतः

sa lokāpyāyanakaraḥ prayukto brahmahaṇā svayam | prajā vivarddhayiṣatā nāvarddhayadaśeṣataḥ

स्वयं ब्रह्मा द्वारा, जो प्रजा को बढ़ाना चाहते थे, लोक-पोषण के लिए नियुक्त किया गया वह यज्ञ, उन्हें पूर्ण रूप से नहीं बढ़ा सका।

श्लोक 43 (skanda.8.31.43)

यज्ञ उवाच । भगवन् लोकसिद्ध्यर्थं प्रयुक्तोहं स्वयंभुवा । न च मेस्ति तथा वीर्यमन्यमिच्छ नमस्तव

yajña uvāca | bhagavan lokasiddhyarthaṁ prayuktohaṁ svayaṁbhuvā | na ca mesti tathā vīryamanyamiccha namastava

यज्ञ ने कहा - हे भगवन्! स्वयंभू ब्रह्मा ने मुझे लोक-सिद्धि के लिए नियुक्त किया है, परन्तु मुझमें वैसा सामर्थ्य नहीं है। आप किसी अन्य को चुनें, आपको नमस्कार।

श्लोक 44 (skanda.8.31.44)

देवदेव उवाच । जीमूतो भव लोकानां तव सिद्धिर्भविष्यति । ततोमृताभिरद्भिस्त्वं लोकान् संवर्धयिष्यति

devadeva uvāca | jīmūto bhava lokānāṁ tava siddhirbhaviṣyati | tatomṛtābhiradbhistvaṁ lokān saṁvardhayiṣyati

देवदेव ने कहा - तुम लोकों के लिए मेघ (जीमूत) बन जाओ, तब तुम्हारी सिद्धि होगी। फिर अमृतमयी जलधाराओं से तुम लोकों को पुष्ट करोगे।

श्लोक 45 (skanda.8.31.45)

यज्ञ उवाच । जीमूतत्वं यदि मम लोकसिद्धिकरं शुभम् । अस्मद्भवन्तं पृष्ठेन वहेयं विद्युतालय

yajña uvāca | jīmūtatvaṁ yadi mama lokasiddhikaraṁ śubham | asmadbhavantaṁ pṛṣṭhena vaheyaṁ vidyutālaya

यज्ञ ने कहा - यदि मेघ-रूप होना मेरे लिए लोक-सिद्धिकारक शुभ है, तो हे विद्युत् के आश्रय! मैं आपको अपनी पीठ पर धारण करूँ।

श्लोक 46 (skanda.8.31.46)

आत्मानमथ स ज्ञात्वा नातितेजसमच्युतः । तताप सुमहद् व्यास तपो यज्ञः सुदुश्चरम्

ātmānamatha sa jñātvā nātitejasamacyutaḥ | tatāpa sumahad vyāsa tapo yajñaḥ suduścaram

तब स्वयं को अत्यधिक तेजस्वी न पाकर, हे व्यास! उस अच्युत यज्ञ ने अत्यन्त कठिन महान् तप किया।

श्लोक 47 (skanda.8.31.47)

अथ तुष्टस्तदा देवः शर्वो यज्ञस्य सुव्रत । उवाच वरदोस्मीति स वव्रे वरदं वरम्

atha tuṣṭastadā devaḥ śarvo yajñasya suvrata | uvāca varadosmīti sa vavre varadaṁ varam

हे सुव्रत! तब यज्ञ की तपस्या से प्रसन्न होकर शर्व देव ने कहा - 'मैं वरदाता हूँ।' तब उसने वरदाता से वर माँगा।

श्लोक 48 (skanda.8.31.48)

यथाहं यज्ञभावेन वहामि त्वां महाप्रभ । तथैव जलदत्वेपि वहेयं त्वाह मव्ययम्

yathāhaṁ yajñabhāvena vahāmi tvāṁ mahāprabha | tathaiva jaladatvepi vaheyaṁ tvāha mavyayam

जैसे मैं यज्ञ-रूप में आपको, हे महाप्रभु! धारण करता हूँ, वैसे ही मेघ-रूप में भी मैं आप अव्यय को धारण करूँ।

श्लोक 49 (skanda.8.31.49)

सनत्कुमार उवाच । एवमस्त्विति सं प्रोच्य वाहनत्वे व्यकल्पयत् । जीमूतं व्यास भगवान् यज्ञमूर्तिमतिप्रभम्

sanatkumāra uvāca | evamastviti saṁ procya vāhanatve vyakalpayat | jīmūtaṁ vyāsa bhagavān yajñamūrtimatiprabham

सनत्कुमार बोले - 'ऐसा ही हो' कहकर भगवान ने अत्यन्त तेजस्वी यज्ञमूर्ति को, हे व्यास! जीमूत (मेघ) के रूप में अपना वाहन बना दिया।

श्लोक 50 (skanda.8.31.50)

यदा तु यजतो व्यास दक्षस्य सुमहात्मनः । शिरश्छिन्नं शरेणाशु यज्ञस्यामिततेजसः । तदा शिरस्कं तं यज्ञं वाहनत्वादपानुदत

yadā tu yajato vyāsa dakṣasya sumahātmanaḥ | śiraśchinnaṁ śareṇāśu yajñasyāmitatejasaḥ | tadā śiraskaṁ taṁ yajñaṁ vāhanatvādapānudata

किन्तु हे व्यास! महात्मा दक्ष के यज्ञ में जब अपार तेज वाले यज्ञ का सिर बाण से शीघ्र काट दिया गया, तब भगवान ने उस यज्ञ को सिर सहित वाहन-पद से हटा दिया।

श्लोक 51 (skanda.8.31.51)

व्यास उवाच । कथं यज्ञं स दक्षस्य भगवानाहनच्छुभम् । कारणं चात्र किं विप्र येन तं हतवान् प्रभुः

vyāsa uvāca | kathaṁ yajñaṁ sa dakṣasya bhagavānāhanacchubham | kāraṇaṁ cātra kiṁ vipra yena taṁ hatavān prabhuḥ

व्यास ने कहा - हे विप्र! भगवान ने दक्ष के शुभ यज्ञ का वध कैसे किया? और इसका क्या कारण था, जिससे प्रभु ने उसे नष्ट किया?

श्लोक 52 (skanda.8.31.52)

सनत्कुमार उवाच । शापः पूर्वं समाख्यातः कारणं मुनिसत्तम । इदञ्च शृणु मे भूयो विस्तरेण पुरातनम्

sanatkumāra uvāca | śāpaḥ pūrvaṁ samākhyātaḥ kāraṇaṁ munisattama | idañca śṛṇu me bhūyo vistareṇa purātanam

सनत्कुमार बोले - हे मुनिसत्तम! इसका कारण शाप पहले ही बताया जा चुका है। अब मुझसे इस प्राचीन वृत्तान्त को पुनः विस्तार से सुनो।

श्लोक 53 (skanda.8.31.53)

पुरा हि ब्रह्मणो वक्त्रात् क्षुवतोभिविनिःसृतः । बद्धगोध्वांगुलित्रश्च शरी तूणी शरासनी

purā hi brahmaṇo vaktrāt kṣuvatobhiviniḥsṛtaḥ | baddhagodhvāṁgulitraśca śarī tūṇī śarāsanī

पूर्वकाल में छींकते हुए ब्रह्मा के मुख से एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसने चमड़े का अंगुलित्राण बाँध रखा था और जो बाण, तरकश तथा धनुष से युक्त था।

श्लोक 54 (skanda.8.31.54)

खङ्गी किरीटमाली च कुण्डली कवची तथा । महोरस्को महोत्साहः पुरुषः काञ्चनप्रभः

khaṅgī kirīṭamālī ca kuṇḍalī kavacī tathā | mahorasko mahotsāhaḥ puruṣaḥ kāñcanaprabhaḥ

वह खड्गधारी, मुकुटधारी, मालाधारी, कुण्डलधारी और कवचधारी था। वह चौड़ी छाती वाला, महान् उत्साही और स्वर्ण के समान कान्तिमान् पुरुष था।

श्लोक 55 (skanda.8.31.55)

क्षुप इत्येव नाम्ना तं ब्रह्मा स्वयमभाषत । तमिन्द्रो वरयामास राजानं भुवि लोकपम्

kṣupa ityeva nāmnā taṁ brahmā svayamabhāṣata | tamindro varayāmāsa rājānaṁ bhuvi lokapam

ब्रह्मा ने स्वयं उसका नाम 'क्षुप' रखा। इन्द्र ने उसे पृथ्वी पर राजा और लोकपाल के रूप में वरण किया।

श्लोक 56 (skanda.8.31.56)

सोब्रवीद्यदि मे वज्रमायुधं स्वं प्रयच्छसि । ततः स्यां भुवि राजाहं नान्यथा रोचते मम

sobravīdyadi me vajramāyudhaṁ svaṁ prayacchasi | tataḥ syāṁ bhuvi rājāhaṁ nānyathā rocate mama

उसने कहा - यदि तुम मुझे अपना वज्र नामक शस्त्र दे दो, तो मैं पृथ्वी पर राजा बनूँगा; अन्यथा मुझे यह स्वीकार नहीं।

श्लोक 57 (skanda.8.31.57)

इन्द्र उवाच । चिन्तितं करमेतत्ते वज्रमेष्यति नान्यथा । एवं भवतु भद्रं ते भव राजा प्रजाहितः

indra uvāca | cintitaṁ karametatte vajrameṣyati nānyathā | evaṁ bhavatu bhadraṁ te bhava rājā prajāhitaḥ

इन्द्र ने कहा - जैसा तुमने सोचा है, वैसा ही होगा, वज्र तुम्हें अवश्य मिलेगा। ऐसा ही हो, तुम्हारा कल्याण हो; प्रजा-हितैषी राजा बनो।

श्लोक 58 (skanda.8.31.58)

सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तस्तेजस्वी राजा भुवि बभूव ह । च्यावनिश्च दधीचोस्य सखा समभवत्तदा

sanatkumāra uvāca | sa evamuktastejasvī rājā bhuvi babhūva ha | cyāvaniśca dadhīcosya sakhā samabhavattadā

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार कहे जाने पर वह तेजस्वी पृथ्वी पर राजा हुआ। और तभी च्यावनि दधीचि उसका मित्र बना।

श्लोक 59 (skanda.8.31.59)

स तेन सह संगत्य सुखासीनो वरासने । चक्रे कथा विचित्रार्थाः प्रीयमाणः पुनः पुनः

sa tena saha saṁgatya sukhāsīno varāsane | cakre kathā vicitrārthāḥ prīyamāṇaḥ punaḥ punaḥ

उसके साथ मिलकर, सुन्दर आसन पर सुखपूर्वक बैठकर, वह बार-बार प्रसन्न होकर विविध विषयों की बातें करता रहा।

श्लोक 60 (skanda.8.31.60)

अथाभवत्तयोर्व्यास रागो जातिकृतः पुनः । क्षत्रं श्रेष्ठं न वा श्रेष्ठं ब्रह्म श्रेष्ठं न वेति च

athābhavattayorvyāsa rāgo jātikṛtaḥ punaḥ | kṣatraṁ śreṣṭhaṁ na vā śreṣṭhaṁ brahma śreṣṭhaṁ na veti ca

हे व्यास! तब उन दोनों में पुनः जाति-जनित आवेश उत्पन्न हुआ - क्षत्रिय श्रेष्ठ है या नहीं, ब्राह्मण श्रेष्ठ है या नहीं।

श्लोक 61 (skanda.8.31.61)

क्षुपोब्रवीत् क्षत्रमिति दधीचो ब्रह्म चेति ह । अथू तां कारणे चोभौ न न्यवर्तत कश्चन

kṣupobravīt kṣatramiti dadhīco brahma ceti ha | athū tāṁ kāraṇe cobhau na nyavartata kaścana

क्षुप ने कहा - 'क्षत्रिय श्रेष्ठ है', और दधीचि ने कहा - 'ब्राह्मण श्रेष्ठ है।' इस विषय में दोनों में से कोई भी पीछे नहीं हटा।

श्लोक 62 (skanda.8.31.62)

अथ तीक्ष्णतया चैव तपोधिकतया तथा । ब्राह्मणत्वस्य चाग्र्यत्वात्तथा दैवकृतेन च

atha tīkṣṇatayā caiva tapodhikatayā tathā | brāhmaṇatvasya cāgryatvāttathā daivakṛtena ca

तब अपने तीक्ष्ण स्वभाव, अधिक तपोबल, ब्राह्मणत्व की श्रेष्ठता तथा दैव-योग से...

श्लोक 63 (skanda.8.31.63)

कुद्धो दधीचस्तं व्यास वामहस्तेन मूर्धनि । आजघान महातेजा वज्रेणातडयत् स च

kuddho dadhīcastaṁ vyāsa vāmahastena mūrdhani | ājaghāna mahātejā vajreṇātaḍayat sa ca

...क्रुद्ध होकर महातेजस्वी दधीचि ने हे व्यास! उसके सिर पर बाएँ हाथ से प्रहार किया, और उसने (क्षुप ने) वज्र से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 64 (skanda.8.31.64)

वज्रेण स द्विधा छिन्नः शक्रमाह्वयदव्ययः । सोवदत् त्वं महायोगः शक्तः सन्धातुमात्मना

vajreṇa sa dvidhā chinnaḥ śakramāhvayadavyayaḥ | sovadat tvaṁ mahāyogaḥ śaktaḥ sandhātumātmanā

वज्र से दो टुकड़े हो जाने पर उस अविनाशी दधीचि ने इन्द्र को पुकारा। इन्द्र ने कहा - तुम महायोगी हो, स्वयं अपने को जोड़ने में समर्थ हो।

श्लोक 65 (skanda.8.31.65)

स्वं देहं स तथाभूतं दधीचो योगमायया । सन्धयामास शर्वञ्च शरणं समपद्यत

svaṁ dehaṁ sa tathābhūtaṁ dadhīco yogamāyayā | sandhayāmāsa śarvañca śaraṇaṁ samapadyata

तब दधीचि ने योगमाया से अपने उस विभक्त शरीर को जोड़ लिया, और शर्व (शिव) की शरण ली।

श्लोक 66 (skanda.8.31.66)

स सुरेश्वरमाराध्य प्राप्यावध्यत्वमुत्तमम् । वज्रास्थित्वमभेद्यत्वमजरत्वञ्च शङ्करात्

sa sureśvaramārādhya prāpyāvadhyatvamuttamam | vajrāsthitvamabhedyatvamajaratvañca śaṅkarāt

सुरेश्वर की आराधना करके उसने शंकर से उत्तम अवध्यत्व, वज्र के समान अस्थियाँ, अभेद्यता तथा अजरत्व प्राप्त किया।

श्लोक 67 (skanda.8.31.67)

सर्वभूतानुकम्पित्वं महायोगित्वमेव च । पुनरागात् क्षुपं द्रष्टुं पुनः सख्यमभूत् तयोः

sarvabhūtānukampitvaṁ mahāyogitvameva ca | punarāgāt kṣupaṁ draṣṭuṁ punaḥ sakhyamabhūt tayoḥ

उसने सब प्राणियों पर करुणा और महायोगित्व भी प्राप्त किया। वह पुनः क्षुप को देखने आया और उन दोनों में फिर मित्रता हो गई।

श्लोक 68 (skanda.8.31.68)

रागो जातिकृतो यश्च पूर्ववत् स बभूव ह । वामपादेन चाप्येनं क्षुप स समताडयत्

rāgo jātikṛto yaśca pūrvavat sa babhūva ha | vāmapādena cāpyenaṁ kṣupa sa samatāḍayat

किन्तु जाति-जनित वही आवेश पूर्ववत् पुनः उत्पन्न हो गया, और क्षुप ने उसे अपने बाएँ पैर से प्रहार किया।

श्लोक 69 (skanda.8.31.69)

पुनश्च वज्रमादाय स चैनमहनत्तदा । न चार्तिं न व्यथां तस्य तद्वज्रमकरोन्मुने

punaśca vajramādāya sa cainamahanattadā | na cārtiṁ na vyathāṁ tasya tadvajramakaronmune

और पुनः वज्र उठाकर उसने उस पर प्रहार किया, किन्तु हे मुने! उस वज्र से उसे न तो पीड़ा हुई और न कोई कष्ट।

श्लोक 70 (skanda.8.31.70)

अवध्यत्वमथो ज्ञात्वा क्षुपस्तस्य महात्मनः । नारायणं समासाद्य वरार्थं समराधयत्

avadhyatvamatho jñātvā kṣupastasya mahātmanaḥ | nārāyaṇaṁ samāsādya varārthaṁ samarādhayat

तब उस महात्मा की अवध्यता जानकर क्षुप ने नारायण के पास जाकर वर के लिए उनकी आराधना की।

श्लोक 71 (skanda.8.31.71)

वरदोस्मीति तुष्टेन विष्णुना स च चोदितः । प्रोवाच प्रणतो विष्णुमिदं व्यास महामनाः

varadosmīti tuṣṭena viṣṇunā sa ca coditaḥ | provāca praṇato viṣṇumidaṁ vyāsa mahāmanāḥ

प्रसन्न होकर विष्णु ने 'मैं वरदाता हूँ' कहकर उसे प्रेरित किया। हे व्यास! तब उस महामना क्षुप ने प्रणाम करके विष्णु से यह कहा।

श्लोक 72 (skanda.8.31.72)

क्षुप उवाच । दधीचो नाम विप्रर्षिरवध्योक्षय एव च । सखा मम हृषीकेश स च मामाह नित्यदा

kṣupa uvāca | dadhīco nāma viprarṣiravadhyokṣaya eva ca | sakhā mama hṛṣīkeśa sa ca māmāha nityadā

क्षुप ने कहा - हे हृषीकेश! दधीचि नामक एक अवध्य और अक्षय ब्रह्मर्षि है, वह मेरा मित्र है, और वह सदा मुझसे कहता है...

श्लोक 73 (skanda.8.31.73)

बिभेम्यहं न देवस्य राक्षसस्यासुरस्य वा । पिशाचस्याथ यक्षस्य वयसो मानुषस्य वा

bibhemyahaṁ na devasya rākṣasasyāsurasya vā | piśācasyātha yakṣasya vayaso mānuṣasya vā

'...मैं न देव से डरता हूँ, न राक्षस से, न असुर से, न पिशाच से, न यक्ष से, न पक्षी से और न मनुष्य से।'

श्लोक 74 (skanda.8.31.74)

बिभेमीति यथा ब्रूयात् तथा त्वं कर्तुमर्हसि । एवमुक्तो नरेशेन स विष्णुर्लोकभावनः

bibhemīti yathā brūyāt tathā tvaṁ kartumarhasi | evamukto nareśena sa viṣṇurlokabhāvanaḥ

'आप ऐसा कर दीजिए कि वह कह उठे - मैं डरता हूँ।' राजा द्वारा ऐसा कहे जाने पर लोकों को पालने वाले विष्णु ने...

श्लोक 75 (skanda.8.31.75)

तथास्त्विति च तं प्रोच्य दधीचस्याश्रमं ययौ । स प्रविश्याश्रमं व्यास दधीचेनाभिपूजितः

tathāstviti ca taṁ procya dadhīcasyāśramaṁ yayau | sa praviśyāśramaṁ vyāsa dadhīcenābhipūjitaḥ

...'ऐसा ही होगा' कहकर दधीचि के आश्रम को प्रस्थान किया। हे व्यास! आश्रम में प्रवेश करने पर दधीचि ने उनका सम्मान किया।

श्लोक 76 (skanda.8.31.76)

अभिवाद्याञ्जलिं कृत्वा दधीचमिदमब्रवीत् । भगवन् ब्रह्मणश्रेष्ठ पितामहसमद्युते

abhivādyāñjaliṁ kṛtvā dadhīcamidamabravīt | bhagavan brahmaṇaśreṣṭha pitāmahasamadyute

अभिवादन कर अंजलि बाँधकर उन्होंने दधीचि से यह कहा - 'हे भगवन्! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हे पितामह के समान तेजस्वी...'

श्लोक 77 (skanda.8.31.77)

वरमेकं वृणेहं यं तं भवान्दातुमर्हति । प्रसादितोहं विप्रेन्द्र क्षुपेण शुभकर्मणा

varamekaṁ vṛṇehaṁ yaṁ taṁ bhavāndātumarhati | prasāditohaṁ viprendra kṣupeṇa śubhakarmaṇā

'...मैं एक वर माँगता हूँ, जिसे देने में आप समर्थ हैं। हे विप्रेन्द्र! मुझे शुभकर्मा क्षुप ने प्रार्थना करके भेजा है।'

श्लोक 78 (skanda.8.31.78)

वरदोस्मीति चाप्युक्तो वरं वव्रे महामुने । प्रोक्तं त्वया बिभेमीति ब्रूहि तन् मदनुग्रहात्

varadosmīti cāpyukto varaṁ vavre mahāmune | proktaṁ tvayā bibhemīti brūhi tan madanugrahāt

'मैं वरदाता हूँ' यह कहे जाने पर, हे महामुने! उन्होंने यह वर माँगा - 'मेरे अनुग्रह के लिए आप "मैं डरता हूँ" ऐसा कह दीजिए।'

श्लोक 79 (skanda.8.31.79)

अभयं सर्वभूतेभ्यो ब्राह्मणस्य न संशयः । अवध्यश्चापि सर्वेषां महायोगबलान्वितः

abhayaṁ sarvabhūtebhyo brāhmaṇasya na saṁśayaḥ | avadhyaścāpi sarveṣāṁ mahāyogabalānvitaḥ

'ब्राह्मण को समस्त प्राणियों से अभय प्राप्त है, इसमें कोई संशय नहीं। और महायोगबल से युक्त होने के कारण वह सबके लिए अवध्य है।'

श्लोक 80 (skanda.8.31.80)

अभीतस्त्वं तथाप्यद्य मदर्थं वद तत् प्रभो । दधीचश्चैव मुक्तोपि विष्णुना मधुरं तदा

abhītastvaṁ tathāpyadya madarthaṁ vada tat prabho | dadhīcaścaiva muktopi viṣṇunā madhuraṁ tadā

'आप निर्भय हैं, फिर भी हे प्रभो! आज मेरे लिए वह वचन कह दीजिए।' किन्तु विष्णु द्वारा मधुर वचनों से आग्रह किए जाने पर भी दधीचि...

श्लोक 81 (skanda.8.31.81)

उवाच न बिभेमीति भूयो भूयो जनार्दनम् । नाहं वक्ष्ये बिभेमीति नोक्तं नाप्युच्यते मया

uvāca na bibhemīti bhūyo bhūyo janārdanam | nāhaṁ vakṣye bibhemīti noktaṁ nāpyucyate mayā

...ने बार-बार जनार्दन से कहा - 'मैं नहीं डरता। मैं "मैं डरता हूँ" ऐसा कभी नहीं कहूँगा - न पहले कहा है, न अब कहूँगा।'

श्लोक 82 (skanda.8.31.82)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तश्चक्रपाणिश्च्यावनिं क्रोधमूर्च्छितः । उवाच चक्रमुद्यम्य भयमस्य विदर्शयन्

sanatkumāra uvāca | evamuktaścakrapāṇiścyāvaniṁ krodhamūrcchitaḥ | uvāca cakramudyamya bhayamasya vidarśayan

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार कहे जाने पर, क्रोध से मूर्च्छित चक्रपाणि ने चक्र उठाकर च्यावनि को भय दिखाते हुए कहा...

श्लोक 83 (skanda.8.31.83)

एवमेव हि कर्तव्या ये भूत्वा बलवत्तराः । अस्वामिन इव प्रेम्णा ब्रुवते दुर्बलं जनम्

evameva hi kartavyā ye bhūtvā balavattarāḥ | asvāmina iva premṇā bruvate durbalaṁ janam

'बलवान् होकर भी जो दुर्बल जन से मानो स्वामी न होकर प्रेमपूर्वक बात करते हैं, उनके साथ ठीक इसी प्रकार व्यवहार करना चाहिए।'

श्लोक 84 (skanda.8.31.84)

न चेद् द्रक्ष्यसि भीतोस्मीत्येतच्चक्र ततस्तव । सुनसं शिर आदाय महीं सं प्रापयिष्यति

na ced drakṣyasi bhītosmītyetaccakra tatastava | sunasaṁ śira ādāya mahīṁ saṁ prāpayiṣyati

'यदि तुम अभी "मैं भयभीत हूँ" यह न कहोगे, तो यह चक्र तुम्हारे सुन्दर सिर को लेकर पृथ्वी पर गिरा देगा।'

श्लोक 85 (skanda.8.31.85)

दधीचिरुवाच । किं वृथा चक्रमुद्यम्य विष्णो त्वं क्लेशमिच्छसि । नाहं चक्रस्य ते गम्यः प्रसादात् त्र्यम्बकस्य तु

dadhīciruvāca | kiṁ vṛthā cakramudyamya viṣṇo tvaṁ kleśamicchasi | nāhaṁ cakrasya te gamyaḥ prasādāt tryambakasya tu

दधीचि ने कहा - 'हे विष्णु! व्यर्थ चक्र उठाकर आप क्यों कष्ट चाहते हैं? त्र्यम्बक की कृपा से मैं आपके चक्र की पहुँच से परे हूँ।'

श्लोक 86 (skanda.8.31.86)

किन्तु जिज्ञासया यामि लोकपालशरण्यताम् । तेषां निष्क्रियतां ज्ञात्वा ततो यास्यामि शंकरम्

kintu jijñāsayā yāmi lokapālaśaraṇyatām | teṣāṁ niṣkriyatāṁ jñātvā tato yāsyāmi śaṁkaram

'किन्तु जिज्ञासावश मैं लोकपालों की शरण्यता की परीक्षा लेने जाता हूँ। उनकी असमर्थता जानकर फिर मैं शंकर के पास जाऊँगा।'

श्लोक 87 (skanda.8.31.87)

एवमुक्त्वा च्यावनिस्तु प्राद्रवद् वरुणं प्रति । शरणं तं प्रपन्नश्च सं प्रादादभयं प्रभुः

evamuktvā cyāvanistu prādravad varuṇaṁ prati | śaraṇaṁ taṁ prapannaśca saṁ prādādabhayaṁ prabhuḥ

ऐसा कहकर च्यावनि वरुण की ओर दौड़ा और उसकी शरण ली, और प्रभु वरुण ने उसे अभय प्रदान किया।

श्लोक 88 (skanda.8.31.88)

तत्र विष्णोश्च देवस्य वरुणस्य च धीमतः । युद्धं समभवद् घोरं बहूनब्दान् विभीषणम्

tatra viṣṇośca devasya varuṇasya ca dhīmataḥ | yuddhaṁ samabhavad ghoraṁ bahūnabdān vibhīṣaṇam

वहाँ भगवान् विष्णु और बुद्धिमान् वरुण के बीच अनेक वर्षों तक घोर और भयंकर युद्ध हुआ।

श्लोक 89 (skanda.8.31.89)

निगृहीतेथ वरुणे च्यावनिर्यममभ्ययात् । स चाप्यभयद स्तस्मै विष्णुना निर्जितो युधि

nigṛhītetha varuṇe cyāvaniryamamabhyayāt | sa cāpyabhayada stasmai viṣṇunā nirjito yudhi

वरुण के पराजित हो जाने पर च्यावनि यम के पास गया। यम ने भी उसे अभय दिया, किन्तु वह भी युद्ध में विष्णु से पराजित हो गया।

श्लोक 90 (skanda.8.31.90)

ततोग्निमभ्ययाद् व्यास सोपि तेनाभिनिर्जितः । ततः स मुष्टिमादाय कुशानां च्यावनिस्तदा

tatognimabhyayād vyāsa sopi tenābhinirjitaḥ | tataḥ sa muṣṭimādāya kuśānāṁ cyāvanistadā

हे व्यास! तब वह अग्नि के पास गया, वह भी विष्णु से पराजित हो गया। तब च्यावनि ने कुश की एक मुट्ठी लेकर...

श्लोक 91 (skanda.8.31.91)

स्वमाश्रममुपागम्य तिष्ठतिष्ठेत्यभाषत । जिज्ञासार्थं लोकपालानहं शरण मेयिवान्

svamāśramamupāgamya tiṣṭhatiṣṭhetyabhāṣata | jijñāsārthaṁ lokapālānahaṁ śaraṇa meyivān

...अपने आश्रम लौटकर कहा - 'ठहरो, ठहरो! मैं तो केवल परीक्षा के लिए लोकपालों की शरण में गया था।'

श्लोक 92 (skanda.8.31.92)

अबलास्ते च सर्वेपि मय्येव बलमुत्तमम् । अद्य गर्वञ्च दर्पञ्च बलं यच्च तवाद्भुतम् । तत्सर्वं नाशयिष्यामि तिष्ठेदानीं जनार्दन

abalāste ca sarvepi mayyeva balamuttamam | adya garvañca darpañca balaṁ yacca tavādbhutam | tatsarvaṁ nāśayiṣyāmi tiṣṭhedānīṁ janārdana

'और वे सब निर्बल हैं, उत्तम बल तो मुझमें ही है। हे जनार्दन! आज मैं तुम्हारे गर्व, दर्प तथा तुम्हारे अद्भुत बल - इन सबको नष्ट कर दूँगा, अब सामना करो।'

श्लोक 93 (skanda.8.31.93)

सनत्कुमार उवाच । ततो युद्धं समभवत् तुमुलं लोमहर्षणम् । नारायणस्य च व्यास च्यावनेश्च महात्मनः

sanatkumāra uvāca | tato yuddhaṁ samabhavat tumulaṁ lomaharṣaṇam | nārāyaṇasya ca vyāsa cyāvaneśca mahātmanaḥ

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! तब नारायण और महात्मा च्यावन के बीच एक भीषण एवं रोमांचकारी युद्ध हुआ।

श्लोक 94 (skanda.8.31.94)

यान्यस्त्राणि शरा ये च नारायणकरच्युताः । योगेन तान् दधीचोसौ कुशमुष्टौ न्ययेशयत्

yānyastrāṇi śarā ye ca nārāyaṇakaracyutāḥ | yogena tān dadhīcosau kuśamuṣṭau nyayeśayat

नारायण के हाथ से छूटे हुए जो भी अस्त्र-शस्त्र और बाण थे, दधीचि ने अपने योगबल से उन सबको कुश की मुट्ठी में समाहित कर दिया।

श्लोक 95 (skanda.8.31.95)

ततो विष्णोर्योगबलाद् गात्रेभ्यः संप्रजज्ञिरे । देवा युयुधिरे सर्वे विष्णुना सह दंशिताः

tato viṣṇoryogabalād gātrebhyaḥ saṁprajajñire | devā yuyudhire sarve viṣṇunā saha daṁśitāḥ

तब विष्णु के योगबल से उनके अंगों से देवता उत्पन्न हुए, और वे सभी कवचधारी होकर विष्णु के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 96 (skanda.8.31.96)

तानप्यशेषतः सर्वान् सायुधान् सह वाहनैः । कुशमुष्टौ स संक्रुद्धो विष्णुवर्जं न्यवेशयत्

tānapyaśeṣataḥ sarvān sāyudhān saha vāhanaiḥ | kuśamuṣṭau sa saṁkruddho viṣṇuvarjaṁ nyaveśayat

उन सबको भी, शस्त्रों और वाहनों सहित, विष्णु को छोड़कर, उस क्रुद्ध दधीचि ने कुश की मुट्ठी में समाहित कर दिया।

श्लोक 97 (skanda.8.31.97)

ततस्सर्वामरैर्व्यास कुशमुष्टौ प्रवेशितैः । योगेन तेजसा चैव दधीचेन महात्मना

tatassarvāmarairvyāsa kuśamuṣṭau praveśitaiḥ | yogena tejasā caiva dadhīcena mahātmanā

हे व्यास! इस प्रकार महात्मा दधीचि के योगबल और तेज से समस्त देवगण कुश की मुट्ठी में प्रविष्ट करा दिए गए, तब...

श्लोक 98 (skanda.8.31.98)

विष्णुं संविग्नरूपं तु कोपावेशात् प्रमोहितम् । तत्रागम्य स्वयं ब्रह्मा तदा वचनमब्रवीत्

viṣṇuṁ saṁvignarūpaṁ tu kopāveśāt pramohitam | tatrāgamya svayaṁ brahmā tadā vacanamabravīt

...क्रोधावेश से मोहित और व्याकुल हुए विष्णु के पास स्वयं ब्रह्मा आए और यह वचन कहा।

श्लोक 99 (skanda.8.31.99)

किन्तवानेन गोविन्द तथा यत्नेन सदद्विजे । कृतेनाथ दधीचस्य शर्वाल्लब्धवरस्य तु

kintavānena govinda tathā yatnena sadadvije | kṛtenātha dadhīcasya śarvāllabdhavarasya tu

'हे गोविन्द! शर्व से वर पाए हुए इस सज्जन ब्राह्मण दधीचि के प्रति तुमने इतना प्रयत्न करके यह क्या किया?'

श्लोक 100 (skanda.8.31.100)

किन्न वेत्सि यथा ह्येष प्रसादात् पारमेश्वरात् । अवध्यत्वं सुयोगित्वं गुणैश्वर्यत्वमेव च

kinna vetsi yathā hyeṣa prasādāt pārameśvarāt | avadhyatvaṁ suyogitvaṁ guṇaiśvaryatvameva ca

'क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर की कृपा से इसने अवध्यत्व, उत्तम योगशक्ति तथा गुणैश्वर्य...'

श्लोक 101 (skanda.8.31.101)

वज्रास्थिसारताञ्चैव लब्धवान् स्वयमीश्वरात् । न चैवं त्वद्विधा देव ब्राह्मणेषु विकुर्वते

vajrāsthisāratāñcaiva labdhavān svayamīśvarāt | na caivaṁ tvadvidhā deva brāhmaṇeṣu vikurvate

'...और अपनी हड्डियों में वज्र की कठोरता स्वयं ईश्वर से प्राप्त की है? हे देव! तुम्हारे जैसों को ब्राह्मणों के प्रति ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 102 (skanda.8.31.102)

तस्मादाशु निवर्तस्व क्षमयैनं द्विजोत्तमम् । ततो ब्रह्मवचः श्रुत्वा स विष्णुर्लोकभावनः

tasmādāśu nivartasva kṣamayainaṁ dvijottamam | tato brahmavacaḥ śrutvā sa viṣṇurlokabhāvanaḥ

'अतः शीघ्र निवृत्त हो जाओ और इस द्विजोत्तम से क्षमा माँगो।' तब ब्रह्मा के वचन सुनकर लोकों का पालन करने वाले विष्णु ने...

श्लोक 103 (skanda.8.31.103)

योगेन तद्बलं ज्ञात्वा दधीचस्य महात्मनः । क्षामयामास विप्रेन्द्रं स्वं चावासमथाभ्यगात्

yogena tadbalaṁ jñātvā dadhīcasya mahātmanaḥ | kṣāmayāmāsa viprendraṁ svaṁ cāvāsamathābhyagāt

...महात्मा दधीचि के योगबल को जानकर, विप्रेन्द्र से क्षमा माँगी, और फिर अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 104 (skanda.8.31.104)

ब्रह्मापि तमृषिं सान्त्व्य पूजयित्वा त्रिलोकपः । जगामादर्शनं व्यास सह सर्वामरैस्तदा

brahmāpi tamṛṣiṁ sāntvya pūjayitvā trilokapaḥ | jagāmādarśanaṁ vyāsa saha sarvāmaraistadā

हे व्यास! त्रिलोकपति ब्रह्मा भी उस ऋषि को सान्त्वना और सम्मान देकर, तब समस्त देवताओं सहित वहाँ से चले गए।

श्लोक 105 (skanda.8.31.105)

दधीचोपि महातेजास्तपस्तेपे स्वकाश्रमे । महादेवप्रसादार्थमुग्रं वाय्वम्बुभोजनः

dadhīcopi mahātejāstapastepe svakāśrame | mahādevaprasādārthamugraṁ vāyvambubhojanaḥ

महातेजस्वी दधीचि ने भी अपने आश्रम में, महादेव की कृपा के लिए, केवल वायु और जल का आहार करते हुए उग्र तप किया।

श्लोक 106 (skanda.8.31.106)

अथास्य युक्तस्य तदा तपसा भास्करद्युतेः । तुतोष भगवान् त्र्यक्षस्तुष्टश्चैवाब्रवीदिदम्

athāsya yuktasya tadā tapasā bhāskaradyuteḥ | tutoṣa bhagavān tryakṣastuṣṭaścaivābravīdidam

तब सूर्य के समान तेजस्वी उसकी तपस्या से भगवान् त्र्यक्ष प्रसन्न हुए, और प्रसन्न होकर उन्होंने यह कहा।

श्लोक 107 (skanda.8.31.107)

देवदेव उवाच । च्यावने तपसानेन तव तुष्टोस्मि सुव्रत । ब्रूहि यत्ते भिलषितं कृतमेव हि तन्मया

devadeva uvāca | cyāvane tapasānena tava tuṣṭosmi suvrata | brūhi yatte bhilaṣitaṁ kṛtameva hi tanmayā

देवदेव ने कहा - 'हे च्यावन! हे सुव्रत! इस तप से मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। जो तुम्हें अभीष्ट हो, कहो, वह मेरे द्वारा किया हुआ ही समझो।'

श्लोक 108 (skanda.8.31.108)

दधीचिरुवाच । भगवन् यदि तुष्टोसि यदि देयो वरश्च मे । इच्छामि विष्णुना सार्धं सर्वान्देवाँस्त्वया जितान्

dadhīciruvāca | bhagavan yadi tuṣṭosi yadi deyo varaśca me | icchāmi viṣṇunā sārdhaṁ sarvāndevā~stvayā jitān

दधीचि ने कहा - 'हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना है, तो मैं विष्णु सहित उन सभी देवताओं को चाहता हूँ, जिन्हें आपने जीता है।'

श्लोक 109 (skanda.8.31.109)

सनत्कुमार उवाच । ततः प्रहस्य वरदो दधीचमृषिसत्तमम् । एवमस्त्विति तं प्राह प्रणतार्तिहरो हरः

sanatkumāra uvāca | tataḥ prahasya varado dadhīcamṛṣisattamam | evamastviti taṁ prāha praṇatārtiharo haraḥ

सनत्कुमार बोले - तब वरदाता, प्रणतार्तिहर हर ने हँसकर ऋषिश्रेष्ठ दधीचि से कहा - 'ऐसा ही हो।'

श्लोक 110 (skanda.8.31.110)

तस्मिन्दत्ते तदा तेन त्र्यम्बकेण वरे शुभे । अमन्यत स्थितं वैरं क्षुपेण सह वै ऋषिः

tasmindatte tadā tena tryambakeṇa vare śubhe | amanyata sthitaṁ vairaṁ kṣupeṇa saha vai ṛṣiḥ

त्र्यम्बक द्वारा वह शुभ वर दिए जाने पर भी, ऋषि ने सोचा कि क्षुप के साथ उसका वैर अभी भी बना हुआ है।

श्लोक 111 (skanda.8.31.111)

ध्यायन्तं तं तथा दृष्ट्वा भगवान् गोवृषध्वजः । उवाच वरमन्यञ्च ब्रूहि विप्र ददामि ते

dhyāyantaṁ taṁ tathā dṛṣṭvā bhagavān govṛṣadhvajaḥ | uvāca varamanyañca brūhi vipra dadāmi te

उसे इस प्रकार चिन्तामग्न देखकर वृषभध्वज भगवान ने कहा - 'हे विप्र! और कोई वर माँगो, मैं तुम्हें दूँगा।'

श्लोक 112 (skanda.8.31.112)

दधीचिरुवाच । यस्मात् स्थितमिदं वैरं वरदानात् तव प्रभो । इह तस्मात्तव स्थानं नाम्नैतेन भवत्वज

dadhīciruvāca | yasmāt sthitamidaṁ vairaṁ varadānāt tava prabho | iha tasmāttava sthānaṁ nāmnaitena bhavatvaja

दधीचि ने कहा - 'हे प्रभो! हे अज! चूँकि आपके वरदान के कारण यहाँ यह वैर स्थित हुआ है, अतः यह आपका स्थान इसी नाम से प्रसिद्ध हो।'

श्लोक 113 (skanda.8.31.113)

देवदेव उवाच । स्थानेश्वरमिति ख्यातं नाम्नैतत् स्थानमुत्तमम् । भवितृ क्रोशपर्यन्तं नानापुष्पलताकुलम्

devadeva uvāca | sthāneśvaramiti khyātaṁ nāmnaitat sthānamuttamam | bhavitṛ krośaparyantaṁ nānāpuṣpalatākulam

देवदेव ने कहा - 'यह उत्तम स्थान "स्थानेश्वर" नाम से विख्यात होगा, जो एक क्रोश तक फैला हुआ, नाना पुष्प-लताओं से युक्त होगा।'

श्लोक 114 (skanda.8.31.114)

अत्र योभ्यर्चयेन्मां तु परं नियममास्थितः । त्रिरात्रोपोषितः सम्यक् स्नात्वा नद्यां तु मानवः

atra yobhyarcayenmāṁ tu paraṁ niyamamāsthitaḥ | trirātropoṣitaḥ samyak snātvā nadyāṁ tu mānavaḥ

'यहाँ जो मनुष्य परम नियम का पालन करते हुए तीन रात्रि तक विधिवत् उपवास करके, नदी में स्नान करके मेरी अर्चना करता है...'

श्लोक 115 (skanda.8.31.115)

ब्राह्मणं भोजयित्वा च चरुं धर्मेण संयुतः । सर्वपापविनिर्मुक्तो मम लोकमवाप्नुयात्

brāhmaṇaṁ bhojayitvā ca caruṁ dharmeṇa saṁyutaḥ | sarvapāpavinirmukto mama lokamavāpnuyāt

'...और धर्मपूर्वक ब्राह्मण को चरु का भोजन कराता है, वह सब पापों से मुक्त होकर मेरे लोक को प्राप्त करता है।'

श्लोक 116 (skanda.8.31.116)

स्थाणुतीर्थं च भवितृ तथैतत् पापनाशनम् । अश्वमेधफलं ह्यत्र स्नातः प्राप्नोति पुष्कलम्

sthāṇutīrthaṁ ca bhavitṛ tathaitat pāpanāśanam | aśvamedhaphalaṁ hyatra snātaḥ prāpnoti puṣkalam

'और यह स्थाणु-तीर्थ भी होगा, जो पापनाशक है; यहाँ स्नान करने वाला अश्वमेध यज्ञ का प्रचुर फल प्राप्त करता है।'

श्लोक 117 (skanda.8.31.117)

अयञ्चापि वटः श्रीमान् स्थितोहं यत्र सांप्रतम् । वरं दातुं मदाख्यानो नाम्ना स्थाणुवटो महान्

ayañcāpi vaṭaḥ śrīmān sthitohaṁ yatra sāṁpratam | varaṁ dātuṁ madākhyāno nāmnā sthāṇuvaṭo mahān

'और यह श्रीमान् वटवृक्ष, जहाँ मैं अभी वर देने के लिए खड़ा हूँ, मेरे ही नाम से प्रसिद्ध महान् "स्थाणुवट" कहलाएगा।'

श्लोक 118 (skanda.8.31.118)

भविष्यति न सन्देहः फलञ्चाप्यस्य मे शृणु । योत्र तिष्ठेदहोरात्रं संयतो नियताशनः

bhaviṣyati na sandehaḥ phalañcāpyasya me śṛṇu | yotra tiṣṭhedahorātraṁ saṁyato niyatāśanaḥ

'यह निःसंदेह होगा; और इसका फल भी मुझसे सुनो। जो यहाँ संयमित होकर, नियमित आहार के साथ एक दिन-रात रहता है...'

श्लोक 119 (skanda.8.31.119)

चीर्णं स्वयं भवेत्तेन स्थाणुव्रतमनुत्तमम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो गणपस्स भवेन्मम

cīrṇaṁ svayaṁ bhavettena sthāṇuvratamanuttamam | sarvapāpavinirmukto gaṇapassa bhavenmama

'...उसके द्वारा स्वयं ही उत्तम स्थाणुव्रत का पालन हो जाएगा, और वह सब पापों से मुक्त होकर मेरा गणपति हो जाएगा।'

श्लोक 120 (skanda.8.31.120)

अकम्पनो नाम महान् महायोगबलान्वितः । यश्च प्राणान्नियमवान् यमवानथवा पुनः

akampano nāma mahān mahāyogabalānvitaḥ | yaśca prāṇānniyamavān yamavānathavā punaḥ

'अकम्पन नामक एक महान् और महायोगबल-सम्पन्न पुरुष है; और जो प्राणों को संयमित रखने वाला, नियमवान् अथवा...'

श्लोक 121 (skanda.8.31.121)

परित्यजेत मनुजस्तस्य पुण्यफलं महत् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वबन्धविवर्जितः । गणोश्वरो नन्दिसमः स मे भवति सर्वगः

parityajeta manujastasya puṇyaphalaṁ mahat | sarvapāpavinirmuktaḥ sarvabandhavivarjitaḥ | gaṇośvaro nandisamaḥ sa me bhavati sarvagaḥ

'...जो मनुष्य वहाँ सब कुछ त्याग देता है, उसे महान् पुण्यफल प्राप्त होता है। वह सब पापों से मुक्त, समस्त बन्धनों से रहित होकर नन्दी के समान सर्वव्यापी गणेश्वर बन जाता है।'

श्लोक 122 (skanda.8.31.122)

स्थानेश्वरे यस्त्विह चैकरात्रं स्थित्वा क्षपेत् सर्वमशेषतो हि । स सर्वपापप्रविमुक्तचेता गणेश्वरो मे भवितातिभीमः

sthāneśvare yastviha caikarātraṁ sthitvā kṣapet sarvamaśeṣato hi | sa sarvapāpapravimuktacetā gaṇeśvaro me bhavitātibhīmaḥ

'जो यहाँ स्थानेश्वर में एक रात्रि रहकर सब कुछ पूर्णतः त्याग देता है, वह सब पापों से पूर्णतः मुक्त-चित्त होकर मेरा अत्यन्त प्रभावशाली गणेश्वर बन जाता है।'

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