अम्बिका खण्ड · अध्याय 32
दक्ष-यज्ञ का विध्वंस
श्लोक 1 (skanda.8.32.1)
सनत्कुमार उवाच । एतस्मिन्नेव काले तु व्यास दक्षः प्रजापतिः । अयजत् सोश्वमेधेन राजा प्राचेतसात्मजः
sanatkumāra uvāca | etasminneva kāle tu vyāsa dakṣaḥ prajāpatiḥ | ayajat sośvamedhena rājā prācetasātmajaḥ
सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इसी समय प्रजापति दक्ष, प्राचेतस के पुत्र राजा ने अश्वमेध यज्ञ किया।
श्लोक 2 (skanda.8.32.2)
तत्र देवनिकायानां भागधेयानि सर्वशः । हव्यवाहस्तदा तत्रावहन्मन्त्रैस्समीरितः
tatra devanikāyānāṁ bhāgadheyāni sarvaśaḥ | havyavāhastadā tatrāvahanmantraissamīritaḥ
वहाँ मंत्रों द्वारा प्रेरित अग्नि देवताओं के समस्त गणों के भाग वहन कर रहा था।
श्लोक 3 (skanda.8.32.3)
वहन्तं तमपश्यच्च देवी गिरिवरात्मजा । अनुस्मरन्ती तद्वैरं शापकारणमेव च
vahantaṁ tamapaśyacca devī girivarātmajā | anusmarantī tadvairaṁ śāpakāraṇameva ca
पर्वतश्रेष्ठ की पुत्री देवी ने उसे अग्नि को हव्य ले जाते देखा, और उस पुराने वैर तथा शाप के कारण को स्मरण किया।
श्लोक 4 (skanda.8.32.4)
उवाच चैनं गिरिजा बोधयन्ती पुरातनम् । श्लिष्टं मधुरया वाचा कारणेन समन्वितम्
uvāca cainaṁ girijā bodhayantī purātanam | śliṣṭaṁ madhurayā vācā kāraṇena samanvitam
गिरिजा ने मधुर वाणी से उसे उस पुरातन बात को कारण सहित स्मरण कराते हुए कहा।
श्लोक 5 (skanda.8.32.5)
त्वं देवः सर्वदेवानां गतिश्च शरणं तथा । त्वया विना कथं यज्ञो वर्तते सर्वदेवप
tvaṁ devaḥ sarvadevānāṁ gatiśca śaraṇaṁ tathā | tvayā vinā kathaṁ yajño vartate sarvadevapa
आप ही देव हैं, समस्त देवताओं की गति और शरण हैं। हे सर्वदेवप! आपके बिना यह यज्ञ कैसे चल रहा है?
श्लोक 6 (skanda.8.32.6)
देवानां भागधेयानि वहत्यग्निरयं भव । नायं तव महेशान किं कारणमतिद्युते
devānāṁ bhāgadheyāni vahatyagnirayaṁ bhava | nāyaṁ tava maheśāna kiṁ kāraṇamatidyute
हे भव! यह अग्नि देवताओं के भाग वहन कर रहा है - यह आप नहीं हैं। हे महेशान! हे अतिद्युते! इसका क्या कारण है?
श्लोक 7 (skanda.8.32.7)
न साम्ना सिध्यते कार्यं विक्रमेण विना प्रभो । अयं मूढोवलिप्तश्च राजा प्राचेतसात्मजः
na sāmnā sidhyate kāryaṁ vikrameṇa vinā prabho | ayaṁ mūḍhovaliptaśca rājā prācetasātmajaḥ
हे प्रभो! बिना पराक्रम के केवल साम-नीति से कार्य सिद्ध नहीं होता। यह मूर्ख और अहंकारी राजा, प्राचेतस-पुत्र...
श्लोक 8 (skanda.8.32.8)
अनुस्मरन् पूर्ववैरं नैव दास्यत्यशासितः । दधीचस्य वरश्चापि त्वया दत्तस्तदा प्रभो । तस्यायमागतः कालस्तदर्थेन विधीयताम्
anusmaran pūrvavairaṁ naiva dāsyatyaśāsitaḥ | dadhīcasya varaścāpi tvayā dattastadā prabho | tasyāyamāgataḥ kālastadarthena vidhīyatām
...पुराने वैर का स्मरण करते हुए बिना दण्डित हुए वह कभी नहीं देगा। और हे प्रभो! आपने तब दधीचि को जो वर दिया था, उसका समय अब आ गया है; उसी के लिए व्यवस्था कीजिए।
श्लोक 9 (skanda.8.32.9)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तस्तदा व्यास भगवान् वृषभध्वजः । उवाच प्रहसन् देवीं पिता तव शुचिस्मिते
sanatkumāra uvāca | evamuktastadā vyāsa bhagavān vṛṣabhadhvajaḥ | uvāca prahasan devīṁ pitā tava śucismite
सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इस प्रकार कहे जाने पर वृषभध्वज भगवान ने हँसते हुए देवी से कहा - हे शुचिस्मिते! वह तुम्हारा पिता है।
श्लोक 10 (skanda.8.32.10)
पूर्वजन्मनि सुश्रोणि प्रजापतिसुतः शुभे । मम त्वं भावविज्ञानं कुर्वती देवि भाषसे
pūrvajanmani suśroṇi prajāpatisutaḥ śubhe | mama tvaṁ bhāvavijñānaṁ kurvatī devi bhāṣase
हे सुश्रोणि! हे शुभे! पूर्वजन्म में वह प्रजापति का पुत्र था। हे देवि! तुम मानो मेरे भाव को परखने के लिए ही ऐसा कह रही हो।
श्लोक 11 (skanda.8.32.11)
नहि दुःखं पितुर्लोके कश्चिदिच्छति भामिनि । एवमुक्ता तदा व्यास देवेन विमलात्मना
nahi duḥkhaṁ piturloke kaścidicchati bhāmini | evamuktā tadā vyāsa devena vimalātmanā
हे भामिनि! संसार में कोई भी पिता का दुःख नहीं चाहता। हे व्यास! उस निर्मल-आत्मा देव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर...
श्लोक 12 (skanda.8.32.12)
ललाटे भृकुटीं कृत्वा ततो देव्यायतेक्षणा । क्रोधात् करेण नासाग्रं संममर्द शुचिस्मिता
lalāṭe bhṛkuṭīṁ kṛtvā tato devyāyatekṣaṇā | krodhāt kareṇa nāsāgraṁ saṁmamarda śucismitā
...विशाल-नेत्रा, मुस्कुराती हुई देवी ने माथे पर भृकुटी चढ़ाकर, क्रोधवश अपने हाथ से नासिका के अग्रभाग को मसल दिया।
श्लोक 13 (skanda.8.32.13)
तस्यां संमृद्यमानायां नासिकायामतिप्रभा । जज्ञे स्त्री भृकुटीवक्त्रा चतुर्दंष्ट्रा त्रिलोचना । बद्धगोधांगुलित्रा च कवचा बद्धमेखला
tasyāṁ saṁmṛdyamānāyāṁ nāsikāyāmatiprabhā | jajñe strī bhṛkuṭīvaktrā caturdaṁṣṭrā trilocanā | baddhagodhāṁgulitrā ca kavacā baddhamekhalā
उस मसली जाती हुई नासिका से एक अत्यंत तेजस्वी स्त्री उत्पन्न हुई - भृकुटीयुक्त मुख वाली, चार दाढ़ों वाली, त्रिनेत्रा, चमड़े का अंगुलित्राण बाँधे, कवचधारिणी और करधनी बाँधे हुए।
श्लोक 14 (skanda.8.32.14)
सखङ्गा सधनुष्का च सतूणीरा पताकिनी । द्वादशास्या दशभुजा तनुमध्या तमोनिभा
sakhaṅgā sadhanuṣkā ca satūṇīrā patākinī | dvādaśāsyā daśabhujā tanumadhyā tamonibhā
वह खड्ग, धनुष तथा तरकश धारण किए, ध्वजा वाली, बारह मुख वाली, दस भुजा वाली, पतली कमर वाली और अंधकार के समान श्याम वर्ण वाली थी।
श्लोक 15 (skanda.8.32.15)
घनस्तनी पृथुकटी नागनासोरुरव्यया । भद्रकालीति तां प्राह देवीं देवी शुभानना
ghanastanī pṛthukaṭī nāganāsoruravyayā | bhadrakālīti tāṁ prāha devīṁ devī śubhānanā
स्थूल स्तनों वाली, चौड़ी कटि वाली, हाथी की सूँड़ के समान जंघाओं वाली, अविनाशी - शुभमुखी देवी ने उस देवी को 'भद्रकाली' कहकर पुकारा।
श्लोक 16 (skanda.8.32.16)
ततोब्रवीत् तदा देवमेषा सृष्टा मया प्रभो । त्वमप्यन्यं सृज गणमनुरूपं नमोस्तुते
tatobravīt tadā devameṣā sṛṣṭā mayā prabho | tvamapyanyaṁ sṛja gaṇamanurūpaṁ namostute
तब उसने देव से कहा - 'हे प्रभो! यह मेरे द्वारा उत्पन्न की गई है। आप भी इसके अनुरूप कोई अन्य गण उत्पन्न करें, आपको नमस्कार है।'
श्लोक 17 (skanda.8.32.17)
ततो देवस्तदा स्कन्धं स्वमवैक्षत भास्वरम् । तस्माज्जज्ञे पुमान् दिव्यस्त्रैलोक्यं प्रदहन्निव
tato devastadā skandhaṁ svamavaikṣata bhāsvaram | tasmājjajñe pumān divyastrailokyaṁ pradahanniva
तब देव ने अपने प्रकाशमान कंधे की ओर देखा। उससे एक दिव्य पुरुष उत्पन्न हुआ, मानो त्रिलोक को जलाता हुआ।
श्लोक 18 (skanda.8.32.18)
भृकुटीभूषितास्यश्च बद्धगोधांगुलित्रवान् । कवची बद्धतूणीरः शरी खङ्गी शरासनी
bhṛkuṭībhūṣitāsyaśca baddhagodhāṁgulitravān | kavacī baddhatūṇīraḥ śarī khaṅgī śarāsanī
उसका मुख भृकुटी से सुशोभित था, वह चमड़े का अंगुलित्राण बाँधे, कवचधारी, तरकश बाँधे, बाण, खड्ग और धनुष से युक्त था।
श्लोक 19 (skanda.8.32.19)
त्र्यक्षश्चतुर्भुजश्चैव वज्रसंहननो युवा । स सृष्टः प्रणतो भूत्वा हरिर्नाम्ना गणेश्वरः
tryakṣaścaturbhujaścaiva vajrasaṁhanano yuvā | sa sṛṣṭaḥ praṇato bhūtvā harirnāmnā gaṇeśvaraḥ
त्रिनेत्र, चतुर्भुज, वज्र के समान सुदृढ़ शरीर वाला, युवा - इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह हरि नामक गणेश्वर, प्रणाम करके...
श्लोक 20 (skanda.8.32.20)
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा देवदेवं सहोमया । आज्ञापय सुरेशान यत् कर्तव्यं मया विभो
uvāca prāñjalirbhūtvā devadevaṁ sahomayā | ājñāpaya sureśāna yat kartavyaṁ mayā vibho
...हाथ जोड़कर उमा सहित देवदेव से बोला - 'हे सुरेशान! हे विभो! जो कुछ भी मुझे करना हो, आज्ञा दीजिए।'
श्लोक 21 (skanda.8.32.21)
ततस्स भगवानाह हरिं तं गणनायकम् । प्राचेतससुतस्यास्य यज्ञं गच्छ विनाशय
tatassa bhagavānāha hariṁ taṁ gaṇanāyakam | prācetasasutasyāsya yajñaṁ gaccha vināśaya
तब भगवान ने उस गणनायक हरि से कहा - 'जाओ, इस प्राचेतस-पुत्र के यज्ञ को नष्ट कर दो।'
श्लोक 22 (skanda.8.32.22)
भद्रकाल्या सहाशु त्वमेतत् कृत्यं गणेश्वर । ततः स भगवान् देवो गणेशान् कामरूपिणः
bhadrakālyā sahāśu tvametat kṛtyaṁ gaṇeśvara | tataḥ sa bhagavān devo gaṇeśān kāmarūpiṇaḥ
'हे गणेश्वर! भद्रकाली के साथ शीघ्र इस कार्य को सम्पन्न करो।' तब भगवान देव ने कामरूपधारी गणेशों को...
श्लोक 23 (skanda.8.32.23)
स्वगात्रेभ्योसृजद् धीमान् नाना रूपधरान् गणान् । पस्पर्श बाहुं सम्यक् च तस्मा ज्जाता महाबलाः
svagātrebhyosṛjad dhīmān nānā rūpadharān gaṇān | pasparśa bāhuṁ samyak ca tasmā jjātā mahābalāḥ
...बुद्धिमान भगवान ने अपने अंगों से नाना रूपधारी गणों को उत्पन्न किया। उन्होंने अपनी भुजा का स्पर्श किया, जिससे महाबली गण उत्पन्न हुए।
श्लोक 24 (skanda.8.32.24)
कोट्यस्ता नवतिश्चैव शतञ्चैव तदा प्रभोः । स ताँश्चोवाच भगवान् यज्ञं प्रमथतानघाः
koṭyastā navatiścaiva śatañcaiva tadā prabhoḥ | sa tā~ścovāca bhagavān yajñaṁ pramathatānaghāḥ
तब प्रभु के नब्बे करोड़ और सौ गण उत्पन्न हुए। भगवान ने उनसे कहा - 'हे निष्पाप गणो! यज्ञ का विध्वंस करो।'
श्लोक 25 (skanda.8.32.25)
सनत्कुमार उवाच । ततस्तौ तेन सैन्येन महताभिसमावृतौ । जग्मतुः सागरोन्नाद मेघाशनिनिनादितैः
sanatkumāra uvāca | tatastau tena sainyena mahatābhisamāvṛtau | jagmatuḥ sāgaronnāda meghāśaninināditaiḥ
सनत्कुमार बोले - तब वे दोनों (हरि और भद्रकाली), उस विशाल सेना से घिरे हुए, समुद्र-गर्जन के समान, मेघ और वज्र की ध्वनि से गूँजते हुए चल पड़े।
श्लोक 26 (skanda.8.32.26)
देवोपि सह पार्वत्या रैभ्याश्रमसमीपतः । स्थित्वापश्यद् गणेशानां कर्म तद् यज्ञनाशनम्
devopi saha pārvatyā raibhyāśramasamīpataḥ | sthitvāpaśyad gaṇeśānāṁ karma tad yajñanāśanam
देव भी पार्वती सहित रैभ्य के आश्रम के समीप खड़े होकर गणेशों के उस यज्ञ-विध्वंसक कर्म को देखने लगे।
श्लोक 27 (skanda.8.32.27)
सनत्कुमार उवाच । वृक्षाः कनखलेयास्तु गङ्गाद्वारसमीपगाः । सुवर्णशृंगश्च गिरिर्मेरुपर्वतसन्निभः
sanatkumāra uvāca | vṛkṣāḥ kanakhaleyāstu gaṅgādvārasamīpagāḥ | suvarṇaśṛṁgaśca girirmeruparvatasannibhaḥ
सनत्कुमार बोले - गंगाद्वार के समीप स्थित कनखल के वृक्ष और मेरु पर्वत के समान स्वर्णशृंगी पर्वत...
श्लोक 28 (skanda.8.32.28)
तस्मिन् प्रदेशे दक्षस्य यज्ञोसावभवत्तदा । गणेश्वरबलं चागाद् भीमं कालीपुरोगमम्
tasmin pradeśe dakṣasya yajñosāvabhavattadā | gaṇeśvarabalaṁ cāgād bhīmaṁ kālīpurogamam
...उसी क्षेत्र में दक्ष का वह यज्ञ हो रहा था। वहाँ काली के नेतृत्व में गणेश्वरों की भयंकर सेना आ पहुँची।
श्लोक 29 (skanda.8.32.29)
ते संप्राप्य महाभागाः सर्वे दीप्तानलप्रभाः । ऊचुस्तं यजमानञ्च ऋत्विजोथ मुनीन् सुरान्
te saṁprāpya mahābhāgāḥ sarve dīptānalaprabhāḥ | ūcustaṁ yajamānañca ṛtvijotha munīn surān
वहाँ पहुँचकर, प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी वे सभी महाभाग गण, यजमान, ऋत्विजों, मुनियों और देवताओं से बोले।
श्लोक 30 (skanda.8.32.30)
वयं ह्यनुचराः सर्वे शर्वस्य परमात्मनः । इहाभिलिप्सवः प्राप्ता भागान् यच्छध्वमीप्सितान्
vayaṁ hyanucarāḥ sarve śarvasya paramātmanaḥ | ihābhilipsavaḥ prāptā bhāgān yacchadhvamīpsitān
'हम सब परमात्मा शर्व के अनुचर हैं। हम यहाँ भाग पाने की इच्छा से आए हैं। हमें इच्छित भाग दीजिए।'
श्लोक 31 (skanda.8.32.31)
तपसा यज्ञभागार्हा बलेन नियमेन वा । ऐश्वर्येणाथ योगेन येन तेन पुरो हि वः
tapasā yajñabhāgārhā balena niyamena vā | aiśvaryeṇātha yogena yena tena puro hi vaḥ
'चाहे तप से, चाहे बल से, नियम से, ऐश्वर्य से अथवा योग से - जिस भी कारण से हम यज्ञ-भाग के अधिकारी हों, हम तुम्हारे समक्ष उपस्थित हैं।'
श्लोक 32 (skanda.8.32.32)
सर्वञ्चास्मास्वपि हि तद् वयमप्यंशभागिनः । अथ चेत् स्वामिनो देवास्तेन भागार्हतां गताः
sarvañcāsmāsvapi hi tad vayamapyaṁśabhāginaḥ | atha cet svāmino devāstena bhāgārhatāṁ gatāḥ
'और वह सब हममें भी विद्यमान है, अतः हम भी भाग के अधिकारी हैं। यदि देवगण स्वामी माने जाते हैं, तो उसी कारण वे भाग के योग्य ठहरे हैं।'
श्लोक 33 (skanda.8.32.33)
स्वामित्वे च बलं हेतुस्तपो वा नात्र संशयः । अस्मास्वेवोभयं तच्च स्वामित्वं तेन नो वरम्
svāmitve ca balaṁ hetustapo vā nātra saṁśayaḥ | asmāsvevobhayaṁ tacca svāmitvaṁ tena no varam
'स्वामित्व का कारण बल अथवा तप है, इसमें संदेह नहीं। वे दोनों ही हममें विद्यमान हैं, अतः स्वामित्व हमारा ही श्रेष्ठ है।'
श्लोक 34 (skanda.8.32.34)
अथ चेत् कस्यचिदियमाज्ञा मुनिसुरोत्तमाः । भागो भवद्भ्यो देयस्तु नास्मभ्यमिति कथ्यताम्
atha cet kasyacidiyamājñā munisurottamāḥ | bhāgo bhavadbhyo deyastu nāsmabhyamiti kathyatām
'हे मुनि-सुरोत्तमो! यदि यह किसी की आज्ञा है कि भाग तुम्हें ही देना है, हमें नहीं, तो यह बता दिया जाए।'
श्लोक 35 (skanda.8.32.35)
तं ब्रूत यो ज्ञापयति वेत्स्यामो हि वयं ततः । एवमुक्तास्तु हरिणा सर्वे देवपुरस्सराः
taṁ brūta yo jñāpayati vetsyāmo hi vayaṁ tataḥ | evamuktāstu hariṇā sarve devapurassarāḥ
'बताओ, ऐसा किसने आदेश दिया है, तभी हम जान पाएँगे।' हरि द्वारा ऐसा कहे जाने पर, देवताओं के साथ सभी पुरोहित...
श्लोक 36 (skanda.8.32.36)
ऊचुर्मन्त्राः प्रमाणं वो भागं प्रति गणेश्वराः । मन्त्राप्यूचुः सुरान् यूयं तमोपहतचेतसः
ūcurmantrāḥ pramāṇaṁ vo bhāgaṁ prati gaṇeśvarāḥ | mantrāpyūcuḥ surān yūyaṁ tamopahatacetasaḥ
...ने कहा - 'हे गणेश्वरो! भाग के विषय में मंत्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण हैं।' मंत्रों ने भी देवताओं से कहा - 'तुम अज्ञान से ग्रस्त-चित्त हो...'
श्लोक 37 (skanda.8.32.37)
येन प्रथमभागार्हं नायजध्वं महेश्वरम् । मन्त्रैस्ते प्रोच्यमानापि नैव भागान् ददुर्यदा
yena prathamabhāgārhaṁ nāyajadhvaṁ maheśvaram | mantraiste procyamānāpi naiva bhāgān daduryadā
'...क्योंकि तुमने पहले भाग के अधिकारी महेश्वर को यज्ञ में सम्मिलित नहीं किया।' मंत्रों द्वारा ऐसा कहे जाने पर भी जब उन्होंने भाग नहीं दिए...
श्लोक 38 (skanda.8.32.38)
तदा यातास्ततो मन्त्रा ब्रह्मलोकं सनातनम् । ततः शक्रादयो देवाः सर्वे ऊचुर्गणेश्वरान्
tadā yātāstato mantrā brahmalokaṁ sanātanam | tataḥ śakrādayo devāḥ sarve ūcurgaṇeśvarān
...तब मंत्र वहाँ से सनातन ब्रह्मलोक को चले गए। तब इन्द्र आदि सभी देवताओं ने गणेश्वरों से कहा...
श्लोक 39 (skanda.8.32.39)
त्यक्त्वा । युष्मान्निहन्मो विक्रम्य सर्वानेवागतान् युधि
tyaktvā | yuṣmānnihanmo vikramya sarvānevāgatān yudhi
'...[तुम मंत्रों द्वारा त्याग दिए गए हो, शेष पाठ मूल में लुप्त है]। युद्ध के लिए आए हुए तुम सबको हम पराक्रमपूर्वक मार डालेंगे।'
श्लोक 40 (skanda.8.32.40)
तेषां सगर्वं तद् वाक्यं श्रुत्वा हरिरमित्रजित् । उवाच प्रहसन् सर्वानिदं वचनसूर्जितम्
teṣāṁ sagarvaṁ tad vākyaṁ śrutvā hariramitrajit | uvāca prahasan sarvānidaṁ vacanasūrjitam
उनके उस गर्वयुक्त वचन को सुनकर, शत्रुविजयी हरि ने हँसते हुए सबसे यह ओजस्वी वचन कहा।
श्लोक 41 (skanda.8.32.41)
मन्त्राः प्रमाणं न कृता युष्माभिर्बलगर्वितैः । यस्मात् प्रसह्य तस्माद्वो नाशयाम्यद्य गर्जितान्
mantrāḥ pramāṇaṁ na kṛtā yuṣmābhirbalagarvitaiḥ | yasmāt prasahya tasmādvo nāśayāmyadya garjitān
'तुमने बल के अहंकार में मंत्रों को प्रमाण नहीं माना, इसलिए हे गर्जन करने वालो! मैं आज तुम्हें बलपूर्वक नष्ट करूँगा।'
श्लोक 42 (skanda.8.32.42)
ऋत्विग्भिर्भागधेयैश्च सह यज्ञेन चोद्यतः । येषां च लवत्ता वस्तान् सर्वान् नाशयाम्यहम्
ṛtvigbhirbhāgadheyaiśca saha yajñena codyataḥ | yeṣāṁ ca lavattā vastān sarvān nāśayāmyaham
'ऋत्विजों, भागों तथा यज्ञ सहित, जिनका यह अभिमान है, उन सबको मैं नष्ट कर दूँगा।'
श्लोक 43 (skanda.8.32.43)
एवमुक्त्वा स तेजस्वी हरिभद्रः प्रतापवान् । भद्रकाली च संक्रुद्धा अभिदुद्रुवतुः सुरान्
evamuktvā sa tejasvī haribhadraḥ pratāpavān | bhadrakālī ca saṁkruddhā abhidudruvatuḥ surān
ऐसा कहकर तेजस्वी और प्रतापी हरिभद्र तथा क्रुद्ध भद्रकाली देवताओं पर टूट पड़े।
श्लोक 44 (skanda.8.32.44)
गणेश्वराश्च संक्रुद्धा यूपानुत्पाट्य चिक्षिपुः । प्रस्थात्रा सह होतारमश्वं चैव गणेश्वराः
gaṇeśvarāśca saṁkruddhā yūpānutpāṭya cikṣipuḥ | prasthātrā saha hotāramaśvaṁ caiva gaṇeśvarāḥ
क्रुद्ध गणेश्वरों ने यज्ञ-स्तंभों को उखाड़कर फेंक दिया। गणेश्वरों ने प्रस्तोता तथा होता और यज्ञ के अश्व को भी...
श्लोक 45 (skanda.8.32.45)
गृहीत्वा कुपिताः सर्वे गङ्गास्रोतसि चिक्षिपुः । यजमानञ्च पाशेन बद्ध्वा निन्युर्यथासुखम्
gṛhītvā kupitāḥ sarve gaṅgāsrotasi cikṣipuḥ | yajamānañca pāśena baddhvā ninyuryathāsukham
...पकड़कर, क्रोधित होकर सबको गंगा की धारा में फेंक दिया। और यजमान को पाश से बाँधकर मनमाने ढंग से घसीटा।
श्लोक 46 (skanda.8.32.46)
वेदीमन्ये कुशानन्ये स्रुचोन्ये चमसान् परे । व्यनाशयँश्चिक्षिपुश्च शालाश्चान्येभ्यदीपयन्
vedīmanye kuśānanye sruconye camasān pare | vyanāśaya~ścikṣipuśca śālāścānyebhyadīpayan
किन्हीं ने वेदी को, किन्हीं ने कुशों को, किन्हीं ने स्रुवों को, किन्हीं ने चमसों को नष्ट कर फेंक दिया, और किन्हीं ने यज्ञशालाओं में आग लगा दी।
श्लोक 47 (skanda.8.32.47)
हरिभद्रोपि दीप्तात्मा शक्रस्योद्यच्छतः करम् । व्यष्टंभयददीनात्मा तथान्येषां दिवौकसाम्
haribhadropi dīptātmā śakrasyodyacchataḥ karam | vyaṣṭaṁbhayadadīnātmā tathānyeṣāṁ divaukasām
तेजस्वी और अदीन-चित्त हरिभद्र ने इन्द्र के उठे हुए हाथ को तथा अन्य देवताओं के हाथों को भी स्तंभित कर दिया।
श्लोक 48 (skanda.8.32.48)
भगस्य नेत्रे पूष्णश्च दशनान् रुषिताननः । धनुष्कोट्या समाहत्य मिषतां संन्यपातयत्
bhagasya netre pūṣṇaśca daśanān ruṣitānanaḥ | dhanuṣkoṭyā samāhatya miṣatāṁ saṁnyapātayat
क्रोधित मुख वाले उसने धनुष के अग्रभाग से प्रहार करके, सबके देखते-देखते भग के नेत्र और पूषा के दाँत गिरा दिए।
श्लोक 49 (skanda.8.32.49)
विष्णोश्चक्रं च तद् घोरं युगान्तादित्यवर्चसम् । व्यष्टम्भयददीनात्मा करस्थं न चचाल ह
viṣṇoścakraṁ ca tad ghoraṁ yugāntādityavarcasam | vyaṣṭambhayadadīnātmā karasthaṁ na cacāla ha
और युगान्त के सूर्य के समान तेजस्वी विष्णु के उस भयंकर चक्र को, उस अदीन-चित्त ने हाथ में ही स्तंभित कर दिया, वह हिला तक नहीं।
श्लोक 50 (skanda.8.32.50)
तुषिताँश्च तथा देवानुद्युक्तान् युद्धलालसान् । वायव्यास्त्रेण संहत्य पृथिव्यां तान्न्यपातयत्
tuṣitā~śca tathā devānudyuktān yuddhalālasān | vāyavyāstreṇa saṁhatya pṛthivyāṁ tānnyapātayat
युद्ध की लालसा से उद्यत तुषित देवताओं को भी उसने वायव्यास्त्र से आहत कर पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 51 (skanda.8.32.51)
अन्याँश्च देवान् देवोसौ सर्वान् युद्धाय संस्थितान् । मोहनेनास्त्रवर्येणे समोहयदनिन्दितः
anyā~śca devān devosau sarvān yuddhāya saṁsthitān | mohanenāstravaryeṇe samohayadaninditaḥ
और युद्ध के लिए डटे हुए अन्य सभी देवताओं को भी उस निष्कलंक ने श्रेष्ठ मोहन अस्त्र से मोहित कर दिया।
श्लोक 52 (skanda.8.32.52)
राजानश्चापि ये केचित् तत्रायाता दिदृक्षवः । तान्सर्वानस्त्रवीर्येण स्वगृहाननयद् बलात्
rājānaścāpi ye kecit tatrāyātā didṛkṣavaḥ | tānsarvānastravīryeṇa svagṛhānanayad balāt
और वहाँ जो भी राजा केवल देखने के लिए आए थे, उन सबको उसने अस्त्र के बल से बलपूर्वक अपने-अपने घर भेज दिया।
श्लोक 53 (skanda.8.32.53)
तद् प्रविध्वस्तकलशं भग्नयूपसतोरणम् । प्रदीपितमहाशालं दृष्टवा यज्ञोभिदुद्रुवे
tad pravidhvastakalaśaṁ bhagnayūpasatoraṇam | pradīpitamahāśālaṁ dṛṣṭavā yajñobhidudruve
अपने कलशों को टूटा हुआ, यूप और तोरण को भग्न, विशाल शाला को जलती हुई देखकर, यज्ञ मूर्तिमान होकर भाग गया।
श्लोक 54 (skanda.8.32.54)
तं तदा मृगरूपेण धावन्तं गगनं प्रति । हरिः शरं स सन्धाय विशिरस्कमथाकरोत्
taṁ tadā mṛgarūpeṇa dhāvantaṁ gaganaṁ prati | hariḥ śaraṁ sa sandhāya viśiraskamathākarot
मृगरूप धारण कर आकाश की ओर भागते हुए उसे, हरि ने बाण चढ़ाकर सिरहीन कर दिया।
श्लोक 55 (skanda.8.32.55)
शरं चापरमादाय वीरभद्रः प्रतापवान् । पलायमानं तं यज्ञं ससार मृगरूपिणम् । नक्षत्रसमतां यातुं द्वाबद्धं वीतमभ्यगात्
śaraṁ cāparamādāya vīrabhadraḥ pratāpavān | palāyamānaṁ taṁ yajñaṁ sasāra mṛgarūpiṇam | nakṣatrasamatāṁ yātuṁ dvābaddhaṁ vītamabhyagāt
एक और बाण लेकर प्रतापी वीरभद्र ने मृगरूप धारण कर भाग रहे उस यज्ञ का पीछा किया, जो नक्षत्रों की समानता को प्राप्त होने के लिए जा रहा था।
श्लोक 56 (skanda.8.32.56)
सनत्कुमार उवाच । एवं ते निकृता व्यास गणैः काल्या तथैव च । हरिणा चैव देवेन सर्वे शरणमागताः
sanatkumāra uvāca | evaṁ te nikṛtā vyāsa gaṇaiḥ kālyā tathaiva ca | hariṇā caiva devena sarve śaraṇamāgatāḥ
सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इस प्रकार गणों, काली तथा देव हरि द्वारा पराजित होकर वे सब शरण में आए।
श्लोक 57 (skanda.8.32.57)
तान् प्रपन्नान् तदा सर्वान् देवान् समुनिलोकपान् । हरिः काल्या सहैवाह गच्छध्वं सोममव्यम् । प्रसादयध्वं देवेशं ततो वो भविता शमः
tān prapannān tadā sarvān devān samunilokapān | hariḥ kālyā sahaivāha gacchadhvaṁ somamavyam | prasādayadhvaṁ deveśaṁ tato vo bhavitā śamaḥ
उन शरणागत हुए सभी देवताओं, मुनियों तथा लोकपालों से हरि ने काली सहित कहा - 'अविनाशी सोम को जाओ, देवेश को प्रसन्न करो, तभी तुम्हें शान्ति मिलेगी।'
श्लोक 58 (skanda.8.32.58)
सनत्कुमार उवाच । त एवमुक्ता हरिणा जग्मुर्देवं प्रमन्यवः । प्रसादयितुमव्यग्रा दुःखशोकसमन्विताः
sanatkumāra uvāca | ta evamuktā hariṇā jagmurdevaṁ pramanyavaḥ | prasādayitumavyagrā duḥkhaśokasamanvitāḥ
सनत्कुमार बोले - हरि द्वारा ऐसा कहे जाने पर, दुःख-शोक से युक्त वे सब व्याकुल होकर, अविचल भाव से देव को प्रसन्न करने के लिए चल पड़े।
श्लोक 59 (skanda.8.32.59)
ततस्ते नातिदूरे तु साम्बं सगणमीश्वरम् । अपश्यन्त महात्मानः सर्वे तद्गतमानसाः
tataste nātidūre tu sāmbaṁ sagaṇamīśvaram | apaśyanta mahātmānaḥ sarve tadgatamānasāḥ
तब उन सब महात्माओं ने, जिनका मन उन्हीं में लगा था, न अधिक दूर उमा-सहित तथा गणों-सहित ईश्वर को देखा।
श्लोक 60 (skanda.8.32.60)
ते तं दृष्ट्वा प्रणम्योच्चै स्तुष्टुवुर्दीप्ततेजसम् । वाग्भिराहवनीयाभिः कृत्वा ब्रह्माणमग्रतः
te taṁ dṛṣṭvā praṇamyoccai stuṣṭuvurdīptatejasam | vāgbhirāhavanīyābhiḥ kṛtvā brahmāṇamagrataḥ
उन्हें देखकर और ऊँचे स्वर में प्रणाम करके, ब्रह्मा को आगे करके, उन्होंने उपयुक्त वाणी से उस तेजोमय देव की स्तुति की।
श्लोक 61 (skanda.8.32.61)
देवा ऊचुः । नमस्ते सुरशत्रुध्न सुरयज्ञप्रमर्दक । महायज्ञ महासत्व महाक्रतुशतस्तुत
devā ūcuḥ | namaste suraśatrudhna surayajñapramardaka | mahāyajña mahāsatva mahākratuśatastuta
देवताओं ने कहा - हे देवशत्रुओं के नाशक, देवयज्ञ के मर्दक! आपको नमस्कार है। हे महायज्ञ! हे महासत्व! हे सैकड़ों महाक्रतुओं में स्तुत!
श्लोक 62 (skanda.8.32.62)
नमो यज्ञविनाशाय वेदसर्वस्वदाय च । शिपि विष्टकृते विष्णोर्नरसिंहाभिघातिने
namo yajñavināśāya vedasarvasvadāya ca | śipi viṣṭakṛte viṣṇornarasiṁhābhighātine
यज्ञ के विनाशक और वेद का समस्त सार देने वाले को नमस्कार। शिपिविष्ट को तथा विष्णु के नृसिंह रूप पर आघात करने वाले को नमस्कार।
श्लोक 63 (skanda.8.32.63)
मन्दराद्रिनिवासाय शुभसर्वस्वदाय च । महाविमानयानाय ऋतुविघ्नकराय च
mandarādrinivāsāya śubhasarvasvadāya ca | mahāvimānayānāya ṛtuvighnakarāya ca
मन्दराचल-निवासी, समस्त शुभ के दाता, महाविमान पर आरूढ़ होने वाले तथा ऋतु में विघ्न करने वाले को नमस्कार।
श्लोक 64 (skanda.8.32.64)
मन्त्रान्तः करणयैव मन्त्रव्रतकराय च । पूष्णो दन्तविनाशाय भगनेत्रहराय च
mantrāntaḥ karaṇayaiva mantravratakarāya ca | pūṣṇo dantavināśāya bhaganetraharāya ca
मंत्रों के अन्तःकरण-स्वरूप, मंत्र-व्रत के विधाता, पूषा के दाँतों के नाशक तथा भग के नेत्रों के हरने वाले को नमस्कार।
श्लोक 65 (skanda.8.32.65)
विष्टम्भनाय शक्रस्य विष्णोश्चक्रस्य चैव हि । नमो यज्ञप्रणेत्रे च यज्ञोत्पत्तिकराय च
viṣṭambhanāya śakrasya viṣṇoścakrasya caiva hi | namo yajñapraṇetre ca yajñotpattikarāya ca
इन्द्र तथा विष्णु के चक्र को स्तंभित करने वाले को नमस्कार। यज्ञ के प्रणेता तथा यज्ञ की उत्पत्ति करने वाले को नमस्कार।
श्लोक 66 (skanda.8.32.66)
वरदानाधिगम्याय ब्रह्मणो जनकाय च । व्याघ्रचर्मभृते तुभ्यं कृष्णचर्माम्बराय च
varadānādhigamyāya brahmaṇo janakāya ca | vyāghracarmabhṛte tubhyaṁ kṛṣṇacarmāmbarāya ca
वरदान से प्राप्त होने योग्य, ब्रह्मा के जनक, व्याघ्रचर्मधारी तथा कृष्णचर्म को वस्त्र बनाने वाले आपको नमस्कार है।
श्लोक 67 (skanda.8.32.67)
नमः स्रग्वरमालाय नरपित्रे तथैव च । उत्पादकाय विष्णोश्च जयाय विजयाय च
namaḥ sragvaramālāya narapitre tathaiva ca | utpādakāya viṣṇośca jayāya vijayāya ca
उत्तम माला धारण करने वाले, मनुष्यों के पिता, विष्णु के उत्पादक तथा जय और विजय को नमस्कार है।
श्लोक 68 (skanda.8.32.68)
नमो मन्युविनाशाय वीरभद्रप्रजाय च । नमो हर्षाय कोपाय गणेश्वरसृजे नमः
namo manyuvināśāya vīrabhadraprajāya ca | namo harṣāya kopāya gaṇeśvarasṛje namaḥ
क्रोध के नाशक तथा वीरभद्र के जनक को नमस्कार। हर्ष और कोप-स्वरूप, गणेश्वरों के स्रष्टा को नमस्कार है।
श्लोक 69 (skanda.8.32.69)
नमो देवानुतापाय मृगबाणार्पणाय च । नमस्ते भगवन् देव नमस्ते भगवञ्छिव
namo devānutāpāya mṛgabāṇārpaṇāya ca | namaste bhagavan deva namaste bhagavañchiva
देवताओं को पश्चाताप कराने वाले तथा मृग पर बाण चलाने वाले को नमस्कार। हे भगवन् देव! आपको नमस्कार। हे भगवन् शिव! आपको नमस्कार।
श्लोक 70 (skanda.8.32.70)
नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते लोकभावन । त्वया सृष्टमिदं विश्वं यज्ञो देवाश्च यज्ञहन् । प्रसीद मा क्रुधोस्माकं मा नः कृत्वा विनाशय
namaste sarvalokeśa namaste lokabhāvana | tvayā sṛṣṭamidaṁ viśvaṁ yajño devāśca yajñahan | prasīda mā krudhosmākaṁ mā naḥ kṛtvā vināśaya
हे सर्वलोकेश! आपको नमस्कार। हे लोकभावन! आपको नमस्कार। हे यज्ञहन्! यह विश्व, यज्ञ और देवगण - सब आपके ही द्वारा रचे गए हैं। प्रसन्न होइए, हम पर क्रोध मत कीजिए; हमें बनाकर फिर नष्ट मत कीजिए।
श्लोक 71 (skanda.8.32.71)
सनत्कुमार उवाच । य इमं पठते नित्यं प्रयतः प्रातरुत्थितः । न तस्य विघ्नरूपाणि कदाचित् संभवन्त्युत
sanatkumāra uvāca | ya imaṁ paṭhate nityaṁ prayataḥ prātarutthitaḥ | na tasya vighnarūpāṇi kadācit saṁbhavantyuta
सनत्कुमार बोले - जो कोई प्रातःकाल उठकर संयमपूर्वक नित्य इसका पाठ करता है, उसके लिए कभी भी विघ्न उत्पन्न नहीं होते।
श्लोक 72 (skanda.8.32.72)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तो देवेशस्तदा तान् स्तुवतः स्थितान् । उवाच प्रहसन् वाक्यं सर्वात्मा सर्वभावनः
sanatkumāra uvāca | sa evamukto deveśastadā tān stuvataḥ sthitān | uvāca prahasan vākyaṁ sarvātmā sarvabhāvanaḥ
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, सर्वात्मा सर्वभावन देवेश ने स्तुति करते हुए खड़े उन देवताओं से हँसते हुए कहा।
श्लोक 73 (skanda.8.32.73)
देवदेव उवाच । नाहं क्रुद्धो भवन्तो मे नित्यमेवातिवल्लभाः । क्रुद्धे हि मयि युष्माकं न स्याज्जीवं क्षणान्तरे
devadeva uvāca | nāhaṁ kruddho bhavanto me nityamevātivallabhāḥ | kruddhe hi mayi yuṣmākaṁ na syājjīvaṁ kṣaṇāntare
देवदेव ने कहा - मैं क्रुद्ध नहीं हूँ, तुम सब मुझे सदा अत्यंत प्रिय हो। यदि मैं क्रुद्ध होता, तो क्षणभर में भी तुम में से कोई जीवित नहीं रहता।
श्लोक 74 (skanda.8.32.74)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्त्वा तदा देवः सुराणां हितकाम्यया । प्रावेशयत् सुरान् सर्वान् ततस्तान् योगमायया
sanatkumāra uvāca | evamuktvā tadā devaḥ surāṇāṁ hitakāmyayā | prāveśayat surān sarvān tatastān yogamāyayā
सनत्कुमार बोले - ऐसा कहकर देव ने देवताओं के हित की कामना से अपनी योगमाया द्वारा उन सब देवताओं को अपने भीतर प्रवेश करा दिया।
श्लोक 75 (skanda.8.32.75)
स्वे शरीरे महादेवो विस्मापयितुमोजसा । ते प्रविष्टास्तदा देहमीश्वरस्य महात्मनः
sve śarīre mahādevo vismāpayitumojasā | te praviṣṭāstadā dehamīśvarasya mahātmanaḥ
महादेव ने अपने ओज से उन्हें विस्मित करने के लिए अपने शरीर में प्रवेश कराया। वे उस महात्मा ईश्वर के शरीर में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 76 (skanda.8.32.76)
सप्तलोकसमायुक्तमपश्यन् जगदद्भुतम् । ते परिभ्रम्य ताँल्लोकान् कृत्स्नान् सर्वे भयान्विताः
saptalokasamāyuktamapaśyan jagadadbhutam | te paribhramya tā~llokān kṛtsnān sarve bhayānvitāḥ
उन्होंने सातों लोकों से युक्त एक अद्भुत जगत देखा। उन सब लोकों में घूमते हुए वे सब भयभीत हो गए।
श्लोक 77 (skanda.8.32.77)
पञ्चाक्षं गणपं वीरं तत्रापश्यन् समागताः । तेन ते सुरशार्दूलाः सर्वे ह्यूर्ध्वमतन्द्रिताः
pañcākṣaṁ gaṇapaṁ vīraṁ tatrāpaśyan samāgatāḥ | tena te suraśārdūlāḥ sarve hyūrdhvamatandritāḥ
वहाँ एकत्र होकर उन्होंने वीर पंचाक्ष नामक गणपति को देखा। उन देवश्रेष्ठों ने अथक होकर उसके साथ ऊपर की ओर यात्रा की।
श्लोक 78 (skanda.8.32.78)
आक्षिप्तास्तन्मुहूर्तेन लोकमन्यमुपागताः । अपश्यंस्ते महाभागा नगरं सूर्यसन्निभम्
ākṣiptāstanmuhūrtena lokamanyamupāgatāḥ | apaśyaṁste mahābhāgā nagaraṁ sūryasannibham
उसी क्षण में खींचे जाकर वे एक अन्य लोक में जा पहुँचे। उन महाभागों ने सूर्य के समान तेजस्वी एक नगर देखा।
श्लोक 79 (skanda.8.32.79)
स्फाटिकेनातिमहता प्राकारेणाभिसंवृतम् । शृंगैश्च विविधैश्चित्रैर्मणिहेमोज्ज्वलैः शुभैः
sphāṭikenātimahatā prākāreṇābhisaṁvṛtam | śṛṁgaiśca vividhaiścitrairmaṇihemojjvalaiḥ śubhaiḥ
वह अत्यंत विशाल स्फटिक-निर्मित प्राचीर से घिरा हुआ था, तथा मणि-स्वर्ण से देदीप्यमान नाना प्रकार के सुंदर शिखरों से युक्त था।
श्लोक 80 (skanda.8.32.80)
ततोपरमपश्यँस्ते तन्मध्ये सुरसत्तमाः । सप्तयोजनकोटीकं समन्तान्नगरं शुभम्
tatoparamapaśya~ste tanmadhye surasattamāḥ | saptayojanakoṭīkaṁ samantānnagaraṁ śubham
फिर उससे आगे, उन देवश्रेष्ठों ने उसके भीतर एक और शुभ नगर देखा, जो चारों ओर सात करोड़ योजन विस्तृत था।
श्लोक 81 (skanda.8.32.81)
राजतेनावृतं दिव्यं प्राकारेणेन्दुवर्चसा । तस्य मध्ये परं चोर्ध्वं षट्कोट्या विस्तृतं पुरम्
rājatenāvṛtaṁ divyaṁ prākāreṇenduvarcasā | tasya madhye paraṁ cordhvaṁ ṣaṭkoṭyā vistṛtaṁ puram
वह दिव्य नगर चन्द्रमा के समान कान्तिमय रजत-प्राचीर से घिरा था। उसके भीतर, उससे भी ऊपर, छह करोड़ योजन विस्तृत एक नगर था।
श्लोक 82 (skanda.8.32.82)
जाम्बूनदमयेनैव प्राकारेण सुसंवृतम् । तस्य मध्ये ततश्चान्यत् पंचकोटी प्रमाणतः
jāmbūnadamayenaiva prākāreṇa susaṁvṛtam | tasya madhye tataścānyat paṁcakoṭī pramāṇataḥ
वह स्वर्णमय प्राचीर से सुसज्जित था। उसके भीतर फिर एक और नगर था, जो पाँच करोड़ योजन विस्तार का था।
श्लोक 83 (skanda.8.32.83)
इन्द्रनीलोपलेनैव प्राकारेण समावृतम् । तस्य मध्ये ह्यपश्यंस्ते विबुधा मुनिसत्तम
indranīlopalenaiva prākāreṇa samāvṛtam | tasya madhye hyapaśyaṁste vibudhā munisattama
वह नीलमणि-प्राचीर से घिरा हुआ था। हे मुनिसत्तम! उसके भीतर उन देवताओं ने देखा...
श्लोक 84 (skanda.8.32.84)
चतुर्योजनकोटीकं विस्तारायामतः समम् । वैदूर्योपलयुक्तेन प्राकारेणाभिसंवृतम्
caturyojanakoṭīkaṁ vistārāyāmataḥ samam | vaidūryopalayuktena prākāreṇābhisaṁvṛtam
...चार करोड़ योजन लंबे-चौड़े एक समान नगर को, जो वैदूर्यमणि-युक्त प्राचीर से घिरा हुआ था।
श्लोक 85 (skanda.8.32.85)
नगरं तस्य मध्ये च त्रिकोटीयोजनं शुभम् । सर्वरत्नविचित्रेण प्राकारेणाभिसंवृतम्
nagaraṁ tasya madhye ca trikoṭīyojanaṁ śubham | sarvaratnavicitreṇa prākāreṇābhisaṁvṛtam
और उसके भीतर तीन करोड़ योजन का एक शुभ नगर था, जो सर्वरत्नों से चित्रित प्राचीर से घिरा हुआ था।
श्लोक 86 (skanda.8.32.86)
तेषां मध्ये जनपदाः सर्वदुःखविवर्जिताः । शुक्लाभिजनसंपन्नाः सर्वे च स्थिरयौवनाः
teṣāṁ madhye janapadāḥ sarvaduḥkhavivarjitāḥ | śuklābhijanasaṁpannāḥ sarve ca sthirayauvanāḥ
उन नगरों के बीच ऐसे जनपद थे जो समस्त दुःखों से रहित, शुद्ध कुल वाले तथा सदा स्थिर यौवन वाले थे।
श्लोक 87 (skanda.8.32.87)
क्षुत्पिसाविनिर्मुक्ता रोगशोकविवजिताः । अमरा जरया त्यक्ता नित्यं मुदितमानसाः
kṣutpisāvinirmuktā rogaśokavivajitāḥ | amarā jarayā tyaktā nityaṁ muditamānasāḥ
वे भूख-प्यास से रहित, रोग-शोक से मुक्त, अमर, जरा-रहित तथा सदा प्रसन्नचित्त थे।
श्लोक 88 (skanda.8.32.88)
दीर्घिकाभिर्विचित्राभिर्वापीभिश्चाप्यलंकृताः । वक्षैर्नानाविधैश्चित्रैः सदा पुष्पफलोपगैः
dīrghikābhirvicitrābhirvāpībhiścāpyalaṁkṛtāḥ | vakṣairnānāvidhaiścitraiḥ sadā puṣpaphalopagaiḥ
वे विचित्र सरोवरों और बावड़ियों से तथा सदा पुष्प-फलों से युक्त नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित थे।
श्लोक 89 (skanda.8.32.89)
सर्वभक्षान् प्रसूयन्ते वृक्षास्तत्रापरे शुभाः । अपरे चाप्यलंकारान् सर्ववासांसि चापरे
sarvabhakṣān prasūyante vṛkṣāstatrāpare śubhāḥ | apare cāpyalaṁkārān sarvavāsāṁsi cāpare
वहाँ कुछ शुभ वृक्ष सब प्रकार के भोज्य पदार्थ उत्पन्न करते थे, कुछ आभूषण, और कुछ सब प्रकार के वस्त्र।
श्लोक 90 (skanda.8.32.90)
अपरे सर्वपुष्पाणि सर्वाण्येव फलानि च । सर्वभावाँस्तथा चान्ये मधु चामाक्षिकं शुभम्
apare sarvapuṣpāṇi sarvāṇyeva phalāni ca | sarvabhāvā~stathā cānye madhu cāmākṣikaṁ śubham
कुछ सब प्रकार के पुष्प और फल, और कुछ अन्य सभी वस्तुएँ तथा शुद्ध मधु भी उत्पन्न करते थे।
श्लोक 91 (skanda.8.32.91)
अपरे क्षीरिणस्तत्र वृक्षा व्यास महाप्रभाः । क्षीरं क्षरन्ति ते नित्यं सर्वे गव्यं समन्विताः
apare kṣīriṇastatra vṛkṣā vyāsa mahāprabhāḥ | kṣīraṁ kṣaranti te nityaṁ sarve gavyaṁ samanvitāḥ
हे व्यास! वहाँ अन्य महातेजस्वी वृक्ष भी थे जो सदा गाय के दूध के समान दूध बहाते रहते थे।
श्लोक 92 (skanda.8.32.92)
सर्वा मणिमयी भूमिः शुभा काञ्चनवालुका । उद्भिदान्युदकान्यत्र गिरि प्रस्रवणानि च
sarvā maṇimayī bhūmiḥ śubhā kāñcanavālukā | udbhidānyudakānyatra giri prasravaṇāni ca
वहाँ की समस्त भूमि मणिमय थी, उसकी शुभ बालुका स्वर्ण की थी। वहाँ जल के सोते और पर्वतीय झरने थे।
श्लोक 93 (skanda.8.32.93)
न तेषु क्रोधो लोभो वा युद्धं द्वेषोथ मत्सरः । न मोहो नैव च स्तम्भो न दोषास्तत्र चापरे
na teṣu krodho lobho vā yuddhaṁ dveṣotha matsaraḥ | na moho naiva ca stambho na doṣāstatra cāpare
वहाँ के प्राणियों में न क्रोध था, न लोभ, न युद्ध, न द्वेष, न ईर्ष्या; न मोह था और न ही अहंकार अथवा अन्य कोई दोष।
श्लोक 94 (skanda.8.32.94)
तस्य मध्ये पुरं चान्यद् द्विकोटीविस्तृतं शुभम् । पद्मरागमयेनैव प्राकारेण परिष्कृतम्
tasya madhye puraṁ cānyad dvikoṭīvistṛtaṁ śubham | padmarāgamayenaiva prākāreṇa pariṣkṛtam
उसके भीतर दो करोड़ योजन विस्तृत एक और शुभ नगर था, जो पद्मरागमणि से बने प्राचीर से सुसज्जित था।
श्लोक 95 (skanda.8.32.95)
ईदृशानि पुराणि स्म व्यतिक्रम्य सुरास्ततः । कोटीयोजनविस्तीर्णं समन्ताद् वह्निनावृतम्
īdṛśāni purāṇi sma vyatikramya surāstataḥ | koṭīyojanavistīrṇaṁ samantād vahnināvṛtam
ऐसे नगरों को पार करके देवगण फिर एक ऐसे स्थान पर पहुँचे, जो एक करोड़ योजन विस्तृत तथा चारों ओर से अग्नि से घिरा हुआ था।
श्लोक 96 (skanda.8.32.96)
संवर्तकानलाकारं दुर्निरीक्ष्यं पुरं महत् । अद्वारं ददृशुर्दिव्यमनन्तं ते सुरोत्तमाः
saṁvartakānalākāraṁ durnirīkṣyaṁ puraṁ mahat | advāraṁ dadṛśurdivyamanantaṁ te surottamāḥ
उन देवश्रेष्ठों ने प्रलयकालीन अग्नि के समान, देखने में असह्य, द्वाररहित तथा अनंत उस महान दिव्य नगर को देखा।
श्लोक 97 (skanda.8.32.97)
दृष्टवा जग्मुः परं चैव विस्मयं भयमेव च । तान् भीतवदनान् व्यास वेपमानान् सुरेश्वरान् । पञ्चाक्षो गणपः प्राह मा भीर्भवतु वः सुराः
dṛṣṭavā jagmuḥ paraṁ caiva vismayaṁ bhayameva ca | tān bhītavadanān vyāsa vepamānān sureśvarān | pañcākṣo gaṇapaḥ prāha mā bhīrbhavatu vaḥ surāḥ
उसे देखकर वे अत्यंत विस्मय और भय से भर गए। हे व्यास! भयभीत मुख वाले, काँपते हुए उन देवताओं से पंचाक्ष गणपति ने कहा - 'हे देवो! भयभीत मत होओ।'
श्लोक 98 (skanda.8.32.98)
इदन्तत् सुमहद् घोरं पुरं घोरानलावृतम् । द्रष्ट्व्यं वो महात्मानो यत्कृते चागतास्त्विह
idantat sumahad ghoraṁ puraṁ ghorānalāvṛtam | draṣṭvyaṁ vo mahātmāno yatkṛte cāgatāstviha
'हे महात्मन! यह वही अत्यंत विशाल, भयंकर, घोर अग्नि से घिरा हुआ नगर है, जिसे देखने के लिए तुम यहाँ आए हो।'
श्लोक 99 (skanda.8.32.99)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्त्वा स पंचाक्षः शूलेनानलवर्चसा । पश्यतां सुरसंघानां द्वारं चक्रे महाबलः
sanatkumāra uvāca | evamuktvā sa paṁcākṣaḥ śūlenānalavarcasā | paśyatāṁ surasaṁghānāṁ dvāraṁ cakre mahābalaḥ
सनत्कुमार बोले - ऐसा कहकर महाबली पंचाक्ष ने देवसमूहों के देखते-देखते अग्नि के समान तेजस्वी त्रिशूल से एक द्वार बना दिया।
श्लोक 100 (skanda.8.32.100)
ते प्रविष्टा महात्मानः पञ्चाक्षसहिताः सुराः । दिव्यं ददृशिरे पूर्णं सिंहानां तत् पुरं महत्
te praviṣṭā mahātmānaḥ pañcākṣasahitāḥ surāḥ | divyaṁ dadṛśire pūrṇaṁ siṁhānāṁ tat puraṁ mahat
पंचाक्ष सहित प्रविष्ट हुए उन महात्मा देवताओं ने उस विशाल दिव्य नगर को सिंहों से परिपूर्ण देखा।
श्लोक 101 (skanda.8.32.101)
मेरुमन्दरकल्पानां नखदंष्ट्रावतां तथा । घोराणामग्निवर्णानां क्रुद्धानामतितेजसाम्
merumandarakalpānāṁ nakhadaṁṣṭrāvatāṁ tathā | ghorāṇāmagnivarṇānāṁ kruddhānāmatitejasām
वे सिंह मेरु और मन्दराचल के समान विशाल, नख-दाढ़ों से युक्त, भयंकर, अग्नि के समान वर्ण वाले, क्रुद्ध और अत्यंत तेजस्वी थे।
श्लोक 102 (skanda.8.32.102)
तेषामेकस्तदासिंहश्छित्त्वा बन्धनमूर्जितः । अन्वधावत संक्रुद्धः प्रलम्बितमहासटः
teṣāmekastadāsiṁhaśchittvā bandhanamūrjitaḥ | anvadhāvata saṁkruddhaḥ pralambitamahāsaṭaḥ
उनमें से एक बलशाली सिंह उस समय अपने बंधन को तोड़कर, अपने लंबे केसर को लहराता हुआ, क्रुद्ध होकर उनके पीछे दौड़ा।
श्लोक 103 (skanda.8.32.103)
तस्य सिंहस्य नादेन भैरवेण दिवौकसः । विषण्णवदनाः सर्वे पञ्चाक्षं शरणं ययुः
tasya siṁhasya nādena bhairaveṇa divaukasaḥ | viṣaṇṇavadanāḥ sarve pañcākṣaṁ śaraṇaṁ yayuḥ
उस सिंह की भयंकर गर्जना से उदास मुख हुए सभी देवगण पंचाक्ष की शरण में गए।
श्लोक 104 (skanda.8.32.104)
पञ्चाक्ष उवाच । न भेतव्यं सुरा देवं दर्शयाम्यधुना हि वः
pañcākṣa uvāca | na bhetavyaṁ surā devaṁ darśayāmyadhunā hi vaḥ
पंचाक्ष ने कहा - 'हे देवो! भयभीत मत हो, मैं अभी तुम्हें देव के दर्शन कराता हूँ।'
श्लोक 105 (skanda.8.32.105)
सनत्कुमार उवाच । इत्युक्ता ददृशुः शर्वं सहसा ते सहोमया । न चैव तत्पुरं व्यास न सिंहं नापि किञ्चन
sanatkumāra uvāca | ityuktā dadṛśuḥ śarvaṁ sahasā te sahomayā | na caiva tatpuraṁ vyāsa na siṁhaṁ nāpi kiñcana
सनत्कुमार बोले - ऐसा कहे जाने पर उन्होंने सहसा उमा-सहित शर्व को देखा। और हे व्यास! न वह नगर रहा, न सिंह, न कुछ और।
श्लोक 106 (skanda.8.32.106)
वेपमाना भयेनेशं शरणं पर्युपागताः । तान् शरण्यः स भगवानुवाच प्रहसँस्तदा
vepamānā bhayeneśaṁ śaraṇaṁ paryupāgatāḥ | tān śaraṇyaḥ sa bhagavānuvāca prahasa~stadā
भय से काँपते हुए वे ईश्वर की शरण में आए। उन शरणागतों से शरण्य भगवान ने तब हँसते हुए कहा।
श्लोक 107 (skanda.8.32.107)
आमंत्र्य सर्वान् देवेशो भयत्रस्तान् दिवौकसः । दृष्टा हि वो मम क्रोधाः सिंहरूपा भयानकाः
āmaṁtrya sarvān deveśo bhayatrastān divaukasaḥ | dṛṣṭā hi vo mama krodhāḥ siṁharūpā bhayānakāḥ
भय से त्रस्त उन सभी देवताओं को संबोधित कर देवेश ने कहा - 'तुमने मेरे क्रोध को सिंहरूप में भयानक रूप से देखा है।'
श्लोक 108 (skanda.8.32.108)
एकेन तेषां रौद्रेण यूयं सर्वेपि तर्जिताः । यदि सर्वानहं क्रोधाद् विसृजेयं कदाचन
ekena teṣāṁ raudreṇa yūyaṁ sarvepi tarjitāḥ | yadi sarvānahaṁ krodhād visṛjeyaṁ kadācana
'उनमें से केवल एक भयंकर रूप से ही तुम सब भयभीत हो गए। यदि मैं कभी क्रोधवश उन सबको छोड़ दूँ...'
श्लोक 109 (skanda.8.32.109)
न भवेत न सन्देहः सर्वे यूयं क्षणान्तरे । इयन्तु देवी युष्माकं कुपिता पर्वतात्मजा । एतां प्रसादयत व नाहं कुप्यामि वः सुराः
na bhaveta na sandehaḥ sarve yūyaṁ kṣaṇāntare | iyantu devī yuṣmākaṁ kupitā parvatātmajā | etāṁ prasādayata va nāhaṁ kupyāmi vaḥ surāḥ
'...इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम सब क्षणभर में नष्ट हो जाते। बल्कि यह पर्वतात्मजा देवी ही तुमसे रुष्ट हैं; इन्हें प्रसन्न करो, मैं तुम पर क्रुद्ध नहीं हूँ।'
श्लोक 110 (skanda.8.32.110)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तवति स्वामिन्युद्धता ताम्रलोचना । देवी देवीं मुखाद् घोरां ससृजे भयवर्द्धनीम्
sanatkumāra uvāca | evamuktavati svāminyuddhatā tāmralocanā | devī devīṁ mukhād ghorāṁ sasṛje bhayavarddhanīm
सनत्कुमार बोले - स्वामी के ऐसा कहने पर उद्धत, ताम्रनेत्री देवी ने अपने मुख से एक घोर, भय बढ़ाने वाली देवी को उत्पन्न किया।
श्लोक 111 (skanda.8.32.111)
दंष्ट्राकरालवदनां बहुपादकरांगुलिम् । धनुपरशुखड्गोग्र चक्रशूलेषुधारिणीम्
daṁṣṭrākarālavadanāṁ bahupādakarāṁgulim | dhanuparaśukhaḍgogra cakraśūleṣudhāriṇīm
दाढ़ों से विकराल मुख वाली, अनेक पैर-हाथ-अंगुलियों वाली; धनुष, फरसा, खड्ग, भयंकर चक्र, त्रिशूल तथा बाण धारण किए हुए।
श्लोक 112 (skanda.8.32.112)
ज्वलर्दकसहस्रांशुतेजसं विश्वरूपिणीम् । दशयोजनसाहस्र स्तस्या देहः प्रमाणतः
jvalardakasahasrāṁśutejasaṁ viśvarūpiṇīm | daśayojanasāhasra stasyā dehaḥ pramāṇataḥ
वह सहस्र किरणों के तेज से जाज्वल्यमान तथा विश्वरूपिणी थी। उसका शरीर दस हजार योजन विस्तार का था।
श्लोक 113 (skanda.8.32.113)
तयाभिभूतास्ते देवा वध्यमानाश्च सर्वशः । न शेकुः पुरतः स्थातुं व्याघ्राद् मृगगणा इव
tayābhibhūtāste devā vadhyamānāśca sarvaśaḥ | na śekuḥ purataḥ sthātuṁ vyāghrād mṛgagaṇā iva
उससे अभिभूत तथा सब ओर से आहत होते हुए वे देवगण उसके सामने वैसे ही खड़े न रह सके, जैसे व्याघ्र के सामने मृगों के झुंड नहीं रह पाते।
श्लोक 114 (skanda.8.32.114)
ततो व्यथितचित्तास्ते कालकर्णीभयात् सुराः । भस्मराशिं स्थितं पार्श्वे देवस्य विविशुर्भयात्
tato vyathitacittāste kālakarṇībhayāt surāḥ | bhasmarāśiṁ sthitaṁ pārśve devasya viviśurbhayāt
तब कालकर्णी के भय से व्यथित-चित्त देवगण, भय के कारण देव के समीप स्थित भस्म-राशि में जा घुसे।
श्लोक 115 (skanda.8.32.115)
तान् दृष्टवा भस्मकूटं तु प्रविष्टान् शरणार्थिनः । सुरान् भस्मविलिप्ताङ्गान् देवी देवीं न्यषेधयत्
tān dṛṣṭavā bhasmakūṭaṁ tu praviṣṭān śaraṇārthinaḥ | surān bhasmaviliptāṅgān devī devīṁ nyaṣedhayat
भस्म-राशि में प्रविष्ट, शरणार्थी, भस्म से लिप्त-अंग देवताओं को देखकर देवी ने उस देवी कालकर्णी को रोका।
श्लोक 116 (skanda.8.32.116)
देव्युवाच । कालकर्णि निवर्तस्व मा वधीः सुरसत्तमान् । एते पाशुपती भूता भस्मना दिग्धमूर्तयः
devyuvāca | kālakarṇi nivartasva mā vadhīḥ surasattamān | ete pāśupatī bhūtā bhasmanā digdhamūrtayaḥ
देवी ने कहा - 'हे कालकर्णि! रुक जाओ, इन देवश्रेष्ठों को मत मारो। ये भस्म से लिप्त होकर पाशुपत व्रतधारी हो गए हैं।'
श्लोक 117 (skanda.8.32.117)
एतत् पशुपतिप्रोक्तं व्रतं पाशुपतं पुरा । यद् भस्मना पवित्रेण स्नानं स्नानेभ्य उत्तमम्
etat paśupatiproktaṁ vrataṁ pāśupataṁ purā | yad bhasmanā pavitreṇa snānaṁ snānebhya uttamam
'यह वही पाशुपत व्रत है, जो पूर्वकाल में पशुपति ने कहा था, जिसमें पवित्र भस्म से स्नान करना समस्त स्नानों में उत्तम है।'
श्लोक 118 (skanda.8.32.118)
एते भगवतोवश्य मनुग्राह्याः सुरोत्तमाः । भस्म येन प्रविष्टास्तु तस्मान्मैतान् विनाशय
ete bhagavatovaśya manugrāhyāḥ surottamāḥ | bhasma yena praviṣṭāstu tasmānmaitān vināśaya
'ये देवश्रेष्ठ भगवान के अधीन होकर अनुग्रह के पात्र हैं। चूँकि वे भस्म के द्वारा शरण में आए हैं, अतः इन्हें नष्ट मत करो।'
श्लोक 119 (skanda.8.32.119)
रौद्राः पशव एते हि प्रवेशाद् भस्मसोधुना । जाताश्च गणपाः सर्वे हन्तव्या न त्वयेश्वरि
raudrāḥ paśava ete hi praveśād bhasmasodhunā | jātāśca gaṇapāḥ sarve hantavyā na tvayeśvari
'भस्म में प्रवेश करने से अब ये रुद्र के पशु बन गए हैं और सभी गणपति हो गए हैं। हे ईश्वरि! इन्हें तुम्हारे द्वारा वध्य नहीं होना चाहिए।'
श्लोक 120 (skanda.8.32.120)
नैषां मृत्युः प्रभवति शङ्करार्पितचेतसाम् । मया ह्येतत् व्रतं शर्वं चरितं सार्वकामिकम्
naiṣāṁ mṛtyuḥ prabhavati śaṅkarārpitacetasām | mayā hyetat vrataṁ śarvaṁ caritaṁ sārvakāmikam
'जिनका चित्त शंकर को समर्पित है, उन पर मृत्यु का प्रभाव नहीं होता। मैंने स्वयं शर्व के लिए यह सर्वकामनापूर्ण व्रत आचरित किया है।'
श्लोक 121 (skanda.8.32.121)
इत्युक्ता कालकर्णी तु देव्या भैरवरूपिणी । न्यवर्तत सुरेभ्यस्तु कोपं तत्याज चोत्थितम्
ityuktā kālakarṇī tu devyā bhairavarūpiṇī | nyavartata surebhyastu kopaṁ tatyāja cotthitam
इस प्रकार कहे जाने पर, वह भैरवरूपिणी कालकर्णी देवताओं से निवृत्त हो गई और अपने उठे हुए क्रोध को त्याग दिया।
श्लोक 122 (skanda.8.32.122)
कालकर्णीं निवृत्तां तु दृष्ट्वा तेपि सुरास्ततः । शान्तञ्च भयमत्युग्रं तुष्टुवुर्हिमवत्सुताम्
kālakarṇīṁ nivṛttāṁ tu dṛṣṭvā tepi surāstataḥ | śāntañca bhayamatyugraṁ tuṣṭuvurhimavatsutām
कालकर्णी को निवृत्त हुआ देखकर तथा अपने अत्यंत उग्र भय को शांत हुआ पाकर, उन देवताओं ने तब हिमवत्पुत्री की स्तुति की।
श्लोक 123 (skanda.8.32.123)
देवा ऊचुः हरवरमहिषीं महादेवपत्नीं प्रियां त्र्यम्बकस्याम्बिकां वाचमेकाक्षरां लोकसंहारकर्त्रीमुमां । देवदेवस्य पात्नीं शुभां शंखकुन्देन्दुहाराम्बुगौरोग्रदंष्ट्रां जयामाहवे दुर्निरीक्ष्यामचिन्त्योग्रदृष्टिं । विशालेक्षणां पीतकोशेयवस्त्रां महाशूलघण्टापताकाध्वजां दिव्यगन्धाज्यधूपप्रियां कालदण्डासिचर्मोग्रहस्तां । वपाशोणितान्त्रवसापूर्णभाण्डां दिशां दक्षिणां चारुचामीकराबद्धपट्टां युगान्तानलाभेक्षणामट्टहासान्सृजंतीं । यथाकामकर्त्रीमनङ्गायुधावि क्षतां शूरसेनां नदीं विश्रुतां मन्दरावासनित्यां दिविष्ठां प्रपद्यामहे । कानसी ष्टि मसुरमहिषदारणीं दारणीं दुन्दुभेः सुन्दमारीं निशुम्भस्य मृत्युं विभां सोमसूर्याग्निभासां । सृज त्कान्तिमिष्टप्रदां शोकदुःखार्तिहर्त्रीं विशेकामघोरांघनामन्तकस्या न्तकर्त्री मुनेर्जामदग्न्यस्य । चोर्ज्जां तथा राजराज्ञीं मनोज्ञां करालां क्षपां दण्डनीतिं स्थितिं सिद्धिमिष्टां शुभां कालरात्रीमपर्णां । समाधिं शरण्यां नगेन्द्राधिवासप्रियां क्षीरोदनित्यां शुभां महाकिंकिणीकां प्रकीर्णोर्ध्वकेशीं । प्रदीप्ताग्निसन्ध्याभ्ररागत्विषं बद्धगोधाङ्गुलित्रां त्रिनेत्रां जटाकेशरक्ताम्बुजाबद्धमालां । विशल्यामनङ्गारिनेत्रोल्कजां हेममालानिबद्धस्रजां दीर्घवेणीं सुवेणीं यशःकीर्तियुक्तां मयूराङ्गजाबद्धचित्रध्वजां । राजसां शान्तिकर्त्रीं प्रपद्येहमेकां सदा भुजङ्गशतकृताङ्गदां महादानवप्राणशौण्डां चिताभस्मरूक्षाङ्गकेशीं । महाजानुलम्बो दरां सर्पयज्ञोपवीतर्द्ध वक्त्रोद्धृताक्षार्द्ध पादार्द्र हस्तावतंसां महामेखलादामलम्बद्विचित्रस्रजां । महामेघतूर्योग्रवादित्रनृत्तप्रियां गीतहास्यप्रलापप्रमोदप्रियां जाप्यहोमोपवासादवासाप्रवासाधिवासातिरिक्तां । महायोगविज्ञातसारा नुसारोग्रसारां धृतिं ज्यानुघण्टा वबद्धोग्रशब्दां महामेघवज्रप्रपातोदधिप्रख्यतीव्रोग्रघोषां । क्रियां दीक्षितानाञ्च दीक्षां विरूपाक्षभार्यां हरस्यार्धदेहाधिवासां प्रप्रद्ये मुखोल्कोद्भवां । देवीमाद्यां परां पार्वतीं सर्वविद्याधिदेवीं गतिं यमनियमदमात्मभूतां पितॄणां च कन्यां शुभां । पर्वतेन्द्रात्मजां दक्षयज्ञान्तकर्त्रीं भवस्यार्धदेहाश्रितादित्यदन्तावपातां सुरेन्द्राग्रहस्तप्रतिस्तम्भनीं । विष्णुकेशापहर्त्रीं महासिहयुक्तातिवाहां महाभैरवां भीषितां स्कन्दचन्द्रारणीं मातरं हस्तिवक्त्रस्य । चाग्र्यां विशाखस्य जन्मारणीं नन्दिनो नैगमेषस्य चोत्पादनीं सर्वलोकस्य चाद्यारणीं पूज्यां मातरं । योगिनां योगिनीं ध्यायमानां धृतिं देवविप्रैर्महा योगतर्कैरगम्यां विशिष्टेष्टशिष्टाधिवासां च । लक्ष्मीं नरी भूर्भुवःस्वर्जनस्सत्यवैराजमाहात्म्यलोकारणीं कारणीमिन्द्रियाणामहङ्कारतन्मात्रकर्त्रीं । तमस्सत्वरागप्रवृत्तिं पराञ्च प्रवृत्तिं महेशस्य शक्तिं तथा चेतनां सर्वविज्ञानचिन्त्यां प्रपद्याम । देवीं उमां मातरं दिश त्वं सुखं मातरस्मासु तुष्टा महादेवपत्नीं शुभां यां वयं चिन्तयामैकया संविदा । ध्यायमानाः सदा दारुणं चापि सर्वं कृतं यत्त्वया तच्च नो नाशयाम्बाद्य तुष्टा यथा वै तुषारं महासूर्यदेहोद्भवा । तच्च नो जातिकोटीसहस्रेषु पूर्वं कृतं यत् करिष्याम यत्कुर्म तत्सर्वमेवञ्च दद्याश्च नः सर्वमर्थं । सकामं तथारोग्यमूर्जां श्रियं ज्ञानविज्ञानमेधास्तथा धारणां तर्कमूहामपोहं धृतिं चार्यभावं गतिञ्चैव । दिव्यां तथा धर्मनित्यत्वमेताँश्च ये चाप्यतोन्ये गुणास्ताँश्च सर्वान् जुषस्वाद्य देवि तुभ्यं । नमः
devā ūcuḥ haravaramahiṣīṁ mahādevapatnīṁ priyāṁ tryambakasyāmbikāṁ vācamekākṣarāṁ lokasaṁhārakartrīmumāṁ | devadevasya pātnīṁ śubhāṁ śaṁkhakundenduhārāmbugaurogradaṁṣṭrāṁ jayāmāhave durnirīkṣyāmacintyogradṛṣṭiṁ | viśālekṣaṇāṁ pītakośeyavastrāṁ mahāśūlaghaṇṭāpatākādhvajāṁ divyagandhājyadhūpapriyāṁ kāladaṇḍāsicarmograhastāṁ | vapāśoṇitāntravasāpūrṇabhāṇḍāṁ diśāṁ dakṣiṇāṁ cārucāmīkarābaddhapaṭṭāṁ yugāntānalābhekṣaṇāmaṭṭahāsānsṛjaṁtīṁ | yathākāmakartrīmanaṅgāyudhāvi kṣatāṁ śūrasenāṁ nadīṁ viśrutāṁ mandarāvāsanityāṁ diviṣṭhāṁ prapadyāmahe | kānasī ṣṭi masuramahiṣadāraṇīṁ dāraṇīṁ dundubheḥ sundamārīṁ niśumbhasya mṛtyuṁ vibhāṁ somasūryāgnibhāsāṁ | sṛja tkāntimiṣṭapradāṁ śokaduḥkhārtihartrīṁ viśekāmaghorāṁghanāmantakasyā ntakartrī munerjāmadagnyasya | corjjāṁ tathā rājarājñīṁ manojñāṁ karālāṁ kṣapāṁ daṇḍanītiṁ sthitiṁ siddhimiṣṭāṁ śubhāṁ kālarātrīmaparṇāṁ | samādhiṁ śaraṇyāṁ nagendrādhivāsapriyāṁ kṣīrodanityāṁ śubhāṁ mahākiṁkiṇīkāṁ prakīrṇordhvakeśīṁ | pradīptāgnisandhyābhrarāgatviṣaṁ baddhagodhāṅgulitrāṁ trinetrāṁ jaṭākeśaraktāmbujābaddhamālāṁ | viśalyāmanaṅgārinetrolkajāṁ hemamālānibaddhasrajāṁ dīrghaveṇīṁ suveṇīṁ yaśaḥkīrtiyuktāṁ mayūrāṅgajābaddhacitradhvajāṁ | rājasāṁ śāntikartrīṁ prapadyehamekāṁ sadā bhujaṅgaśatakṛtāṅgadāṁ mahādānavaprāṇaśauṇḍāṁ citābhasmarūkṣāṅgakeśīṁ | mahājānulambo darāṁ sarpayajñopavītarddha vaktroddhṛtākṣārddha pādārdra hastāvataṁsāṁ mahāmekhalādāmalambadvicitrasrajāṁ | mahāmeghatūryogravāditranṛttapriyāṁ gītahāsyapralāpapramodapriyāṁ jāpyahomopavāsādavāsāpravāsādhivāsātiriktāṁ | mahāyogavijñātasārā nusārograsārāṁ dhṛtiṁ jyānughaṇṭā vabaddhograśabdāṁ mahāmeghavajraprapātodadhiprakhyatīvrograghoṣāṁ | kriyāṁ dīkṣitānāñca dīkṣāṁ virūpākṣabhāryāṁ harasyārdhadehādhivāsāṁ prapradye mukholkodbhavāṁ | devīmādyāṁ parāṁ pārvatīṁ sarvavidyādhidevīṁ gatiṁ yamaniyamadamātmabhūtāṁ pitṝṇāṁ ca kanyāṁ śubhāṁ | parvatendrātmajāṁ dakṣayajñāntakartrīṁ bhavasyārdhadehāśritādityadantāvapātāṁ surendrāgrahastapratistambhanīṁ | viṣṇukeśāpahartrīṁ mahāsihayuktātivāhāṁ mahābhairavāṁ bhīṣitāṁ skandacandrāraṇīṁ mātaraṁ hastivaktrasya | cāgryāṁ viśākhasya janmāraṇīṁ nandino naigameṣasya cotpādanīṁ sarvalokasya cādyāraṇīṁ pūjyāṁ mātaraṁ | yogināṁ yoginīṁ dhyāyamānāṁ dhṛtiṁ devaviprairmahā yogatarkairagamyāṁ viśiṣṭeṣṭaśiṣṭādhivāsāṁ ca | lakṣmīṁ narī bhūrbhuvaḥsvarjanassatyavairājamāhātmyalokāraṇīṁ kāraṇīmindriyāṇāmahaṅkāratanmātrakartrīṁ | tamassatvarāgapravṛttiṁ parāñca pravṛttiṁ maheśasya śaktiṁ tathā cetanāṁ sarvavijñānacintyāṁ prapadyāma | devīṁ umāṁ mātaraṁ diśa tvaṁ sukhaṁ mātarasmāsu tuṣṭā mahādevapatnīṁ śubhāṁ yāṁ vayaṁ cintayāmaikayā saṁvidā | dhyāyamānāḥ sadā dāruṇaṁ cāpi sarvaṁ kṛtaṁ yattvayā tacca no nāśayāmbādya tuṣṭā yathā vai tuṣāraṁ mahāsūryadehodbhavā | tacca no jātikoṭīsahasreṣu pūrvaṁ kṛtaṁ yat kariṣyāma yatkurma tatsarvamevañca dadyāśca naḥ sarvamarthaṁ | sakāmaṁ tathārogyamūrjāṁ śriyaṁ jñānavijñānamedhāstathā dhāraṇāṁ tarkamūhāmapohaṁ dhṛtiṁ cāryabhāvaṁ gatiñcaiva | divyāṁ tathā dharmanityatvametā~śca ye cāpyatonye guṇāstā~śca sarvān juṣasvādya devi tubhyaṁ | namaḥ
देवताओं ने कहा - हम उस देवी की शरण में हैं, जो हर की श्रेष्ठ महिषी, महादेव की पत्नी, त्र्यम्बक की प्रिया अम्बिका हैं; जो एकाक्षर वाणी ओम् स्वरूपा, लोक-संहार करने वाली उमा, देवदेव की शुभ पत्नी हैं; जो शंख, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमा के समान गौरवर्णा हैं, जिनकी दाढ़ें भयंकर हैं, जो युद्ध में विजयिनी और देखने में असह्य हैं, जिनकी दृष्टि अचिन्त्य और उग्र है, जो विशाल नेत्रों वाली, पीत रेशमी वस्त्र धारण करने वाली हैं; जो महाशूल, घण्टा, पताका और ध्वज धारण करती हैं, जो दिव्य गन्ध, घृत और धूप की प्रिया हैं, जिनका हाथ कालदण्ड, खड्ग और ढाल से भयंकर है, जिनका पात्र वपा, रक्त और अन्त्रों से भरा है, जो दक्षिण दिशा में स्वर्ण-पट्ट से बँधी हैं, जिनकी आँखें युगान्त की अग्नि के समान हैं, जो अट्टहास करती हैं, जो इच्छानुसार फल देने वाली हैं, जो कामदेव के बाणों से अक्षत हैं; जो विख्यात शूरसेना नदी हैं, जो सदा मन्दराचल पर निवास करती हैं, जो स्वर्ग में स्थित हैं; जो महिषासुर की विनाशिनी, असुरों को विदीर्ण करने वाली, दुन्दुभि की मृत्युस्वरूपा, निशुम्भ की संहारिणी हैं; जो सूर्य, चन्द्र और अग्नि की कान्ति से युक्त हैं, जो इष्ट कान्ति देने वाली, शोक-दुःख-पीड़ा हरने वाली हैं; जो अत्यन्त विशाल और घोर हैं, जो अन्तक की भी अन्तकर्त्री हैं, जो जमदग्नि ऋषि की शक्ति हैं, जो राजाओं की राज्ञी, मनोहर किन्तु भयंकर, रात्रि-स्वरूपा, दण्ड-नीति, स्थिति, सिद्धि, इष्ट, शुभ कालरात्रि, अपर्णा, समाधि, शरण्या हैं; जो नगेन्द्र-निवास की प्रिया, क्षीरसागर में सदा निवास करने वाली, महाकिंकिणी धारण करने वाली, ऊर्ध्व केशों वाली हैं; जो प्रज्वलित अग्नि और सन्ध्या के मेघों के समान रंग वाली हैं, जो चर्म का अंगुलित्राण बाँधे, त्रिनेत्रा, जटाओं में रक्तकमल की माला बाँधे हैं; जो सर्वदोषरहित, कामदेव को भस्म करने वाली अग्निदृष्टि से उत्पन्न, स्वर्णमाला से युक्त, दीर्घ वेणी और सुन्दर वेणी वाली हैं; जो यश-कीर्ति से युक्त, मयूर-चिह्नित ध्वजा धारण करने वाली, शान्ति करने वाली हैं - हम सदा इसी एक देवी की शरण लेते हैं, जो सैकड़ों सर्पों के केयूर धारण करती हैं, जो महादानवों के प्राणों की मद-स्वरूपा हैं, जिनके अंग और केश चिता की भस्म से रूखे हैं, जिनका उदर विशाल तथा घुटने लटके हुए हैं, जो सर्प का यज्ञोपवीत धारण करती हैं; जो महामेखला और विचित्र माला से सुशोभित हैं, जिन्हें मेघगर्जन के समान वाद्यों के नृत्य प्रिय हैं, जिन्हें गीत, हास्य और प्रलाप प्रिय हैं, जो जप, होम, उपवास और एकान्तवास में रत, आवास-प्रवास से परे, महायोग द्वारा ही जानी जा सकने वाली हैं; जो धृति, धनुष की टंकार और घण्टा के भयंकर शब्द से युक्त हैं, जो महामेघ और वज्रपात के समान भीषण गर्जना वाली हैं, जो दीक्षा और दीक्षितों की क्रिया हैं, जो विरूपाक्ष शिव की भार्या, हर के अर्धांग में निवास करने वाली, मुख की अग्नि से उत्पन्न, आद्या, परा पार्वती, सर्वविद्याओं की अधिष्ठात्री देवी, यम-नियम-दम की आत्मस्वरूपा गति हैं; जो पितरों की शुभ कन्या, पर्वतेन्द्र की पुत्री, दक्षयज्ञ का अन्त करने वाली, भव के अर्धशरीर पर आश्रित हैं, जिनके चरणों में आदित्य के दाँत गिरे थे; जो इन्द्र के उठे हुए हाथ को स्तंभित करने वाली, विष्णु के केश हरने वाली, महासिंह पर सवार होकर वेगगामिनी, महाभैरवा, भयंकर, स्कन्द और चन्द्र की कारणस्वरूपा माता हैं; जो गजमुख गणेश की अग्रगण्या, विशाख के जन्म का कारण, नन्दी और नैगमेष की उत्पादिका, सम्पूर्ण लोक की आदि-कारणस्वरूपा, पूज्या माता, योगियों द्वारा योगिनी रूप में ध्यान की जाने वाली, देवों और विप्रों के महायोग-तर्क से भी अगम्य धृति हैं; जो श्रेष्ठ शिष्टजनों के निवास की प्रिया लक्ष्मी, भूः-भुवः-स्वः लोकों की सत्यस्वरूपा, राजस महिमा की कारणस्वरूपा, इन्द्रियों तथा अहंकार-तन्मात्राओं की रचयित्री, तमस्-सत्त्व-रज की प्रवृत्ति तथा परम प्रवृत्ति, महेश्वर की शक्ति तथा चेतना, सम्पूर्ण विज्ञान से चिन्त्य हैं - हम उस देवी उमा माता की शरण लेते हैं। हे माता! प्रसन्न होकर हमें सुख प्रदान कीजिए। महादेव की उस शुभ पत्नी का हम एक ही चित्त से निरन्तर ध्यान करते हैं - आपके द्वारा किया गया जो भी भयंकर कर्म है, वह प्रसन्न होकर आज हमारे लिए नष्ट कर दीजिए। जैसे महासूर्य के उदय होने पर हिम नष्ट हो जाता है, वैसे ही हमने सहस्रों-करोड़ों पूर्वजन्मों में जो कुछ किया है और जो हम करेंगे, वह सब आप नष्ट कर दीजिए, और हमें समस्त इष्ट पदार्थ, आरोग्य, बल, श्री, ज्ञान-विज्ञान, मेधा, धारणा, तर्क, ऊहा, अपोह, धृति, श्रेष्ठ आचरण, दिव्य गति तथा धर्म की नित्यता - और इनके अतिरिक्त जो भी अन्य गुण हों, वे सब आज हमें प्रदान कीजिए, हे देवि! आपको नमस्कार है।
श्लोक 124 (skanda.8.32.124)
सनत्कुमार उवाच । एवं सा संस्तुता देवी देवैर्हृष्टेन चेतसा । त्र्यम्बकानुग्रहाच्चैव देवाँस्तुष्टाब्रवीदिदम्
sanatkumāra uvāca | evaṁ sā saṁstutā devī devairhṛṣṭena cetasā | tryambakānugrahāccaiva devā~stuṣṭābravīdidam
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, हर्षित हृदय वाली तथा त्र्यम्बक के अनुग्रह से प्रसन्न देवी ने देवताओं से प्रसन्न होकर यह कहा।
श्लोक 125 (skanda.8.32.125)
देव्युवाच । गच्छध्वं विज्वराः सर्वे तुष्टाहं वो न संशयः । मैवं कार्ष्ट पुनर्देवा मा विनाशो हि वो भवेत्
devyuvāca | gacchadhvaṁ vijvarāḥ sarve tuṣṭāhaṁ vo na saṁśayaḥ | maivaṁ kārṣṭa punardevā mā vināśo hi vo bhavet
देवी ने कहा - जाओ, तुम सब निश्चिन्त हो जाओ, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, इसमें संदेह नहीं। हे देवो! पुनः ऐसा मत करना, अन्यथा तुम्हारा विनाश हो सकता है।
श्लोक 126 (skanda.8.32.126)
सनत्कुमार उवाच । ततः स देवः प्रहसन् कपर्दी नीललोहितः । प्रकृतिस्थान् सुरान् सर्वांश्चकार सुरशत्रुहा
sanatkumāra uvāca | tataḥ sa devaḥ prahasan kapardī nīlalohitaḥ | prakṛtisthān surān sarvāṁścakāra suraśatruhā
सनत्कुमार बोले - तब जटाधारी, नीललोहित, देवशत्रुओं के संहारक देव ने हँसते हुए सभी देवताओं को उनकी स्वाभाविक अवस्था में लौटा दिया।
श्लोक 127 (skanda.8.32.127)
उवाच चैतान् देवेशो गच्छध्वं विगतज्वराः । यज्ञश्चैव यदा कृत्यं तदायं भविता हि वः
uvāca caitān deveśo gacchadhvaṁ vigatajvarāḥ | yajñaścaiva yadā kṛtyaṁ tadāyaṁ bhavitā hi vaḥ
और देवेश ने उनसे कहा - 'निश्चिन्त होकर जाओ; और जब यज्ञ का उचित कृत्य सम्पन्न होगा, तब यह भाग तुम्हें प्राप्त होगा।'
श्लोक 128 (skanda.8.32.128)
सशिरस्को दितेः पुत्रा मन्त्रेणानेन सन्धितः । ततः स्तोत्रं च मन्त्रं च सन्धानकरमव्ययम् । ददावाथर्वणं देवः प्रोवाचेदं च सुस्वरम्
saśirasko diteḥ putrā mantreṇānena sandhitaḥ | tataḥ stotraṁ ca mantraṁ ca sandhānakaramavyayam | dadāvātharvaṇaṁ devaḥ provācedaṁ ca susvaram
इस मंत्र से सिर सहित दिति-पुत्र को जोड़ दिया गया। तब देव ने संधान करने वाला अविनाशी आथर्वण स्तोत्र और मंत्र दिया, और इसे मधुर स्वर में कहा।
श्लोक 129 (skanda.8.32.129)
देवदेव उवाच । नक्षत्रसमतां यातु यज्ञोयं सुरसत्तमाः । मृगानुसारी देवोपि हरिरस्य भवत्वयम्
devadeva uvāca | nakṣatrasamatāṁ yātu yajñoyaṁ surasattamāḥ | mṛgānusārī devopi harirasya bhavatvayam
देवदेव ने कहा - 'हे देवश्रेष्ठो! यह यज्ञ नक्षत्रों की समानता को प्राप्त हो, और यह देव हरि इसका अनुसरण करने वाला मृग बने।'
श्लोक 130 (skanda.8.32.130)
भद्रकाली हरिश्चैव गणाश्चेमे महाबलाः । सर्वे भद्रा भविष्यन्ति युष्माकममरास्सदा
bhadrakālī hariścaiva gaṇāśceme mahābalāḥ | sarve bhadrā bhaviṣyanti yuṣmākamamarāssadā
'भद्रकाली, हरि तथा ये महाबली गण - हे अमरो! ये सब सदा तुम्हारे लिए कल्याणकारी होंगे।'
श्लोक 131 (skanda.8.32.131)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्ता भगवता देवास्ते ब्रह्माणा सह । शिरोभिः प्रणतास्सर्वे शर्वमूचुरिदं वचः
sanatkumāra uvāca | evamuktā bhagavatā devāste brahmāṇā saha | śirobhiḥ praṇatāssarve śarvamūcuridaṁ vacaḥ
सनत्कुमार बोले - भगवान द्वारा ऐसा कहे जाने पर, ब्रह्मा सहित वे सब देवगण सिर झुकाकर शर्व से यह वचन बोले।
श्लोक 132 (skanda.8.32.132)
एष तावत् क्रतु श्रेष्ठस्तवैव भवतु प्रभो । सर्वः सुरपते देव शतमभ्यर्च्यतेव्यय
eṣa tāvat kratu śreṣṭhastavaiva bhavatu prabho | sarvaḥ surapate deva śatamabhyarcyatevyaya
'हे प्रभो! यह श्रेष्ठ यज्ञ पूर्णतः आपका ही हो। हे सुरपते! हे अव्यय देव! यह सौ गुना पूजित हो।'
श्लोक 133 (skanda.8.32.133)
भागानां सर्वयज्ञेषु तुभ्यं सर्वं ददामहे । एवमुक्तोथ देवेशः सुरैः सर्वैः सुरेश्वरः
bhāgānāṁ sarvayajñeṣu tubhyaṁ sarvaṁ dadāmahe | evamuktotha deveśaḥ suraiḥ sarvaiḥ sureśvaraḥ
'हम समस्त यज्ञों के सब भाग आपको ही देते हैं।' समस्त देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर सुरेश्वर देवेश ने...
श्लोक 134 (skanda.8.32.134)
चकार रूपं परमं सर्वदेवमयं शुभम् । स्वात्मानन्ते तदा देवा ह्यपश्यन्त महेश्वरे
cakāra rūpaṁ paramaṁ sarvadevamayaṁ śubham | svātmānante tadā devā hyapaśyanta maheśvare
...एक परम, शुभ, सर्वदेवमय रूप धारण किया। तब देवताओं ने महेश्वर में अपनी-अपनी आत्मा को देखा।
श्लोक 135 (skanda.8.32.135)
शिरोबाहूरुपादेषु वस्तिहस्तोदरादिषु । अवस्थितान् महात्मानो मुनीँश्चैव तपोधनान्
śirobāhūrupādeṣu vastihastodarādiṣu | avasthitān mahātmāno munī~ścaiva tapodhanān
...उनके सिर, भुजाओं, जंघाओं, पैरों, कटि, हाथों, उदर आदि अंगों में स्थित महात्माओं तथा तपोधन मुनियों को देखा।
श्लोक 136 (skanda.8.32.136)
स तद्रूपं तदा कृत्वा देवान् प्रोवाच शंकरः । सर्वे यूयं महात्मानो मच्छरीरसमुद्भवाः
sa tadrūpaṁ tadā kṛtvā devān provāca śaṁkaraḥ | sarve yūyaṁ mahātmāno maccharīrasamudbhavāḥ
उस रूप को धारण कर शंकर ने देवताओं से कहा - 'तुम सभी महात्मा मेरे ही शरीर से उत्पन्न हुए हो।'
श्लोक 137 (skanda.8.32.137)
युष्माकञ्च शरीराणि मन्मयानि प्रपश्यत । ततस्ते देवता व्यास सर्वं रुद्रात्मकं जगत्
yuṣmākañca śarīrāṇi manmayāni prapaśyata | tataste devatā vyāsa sarvaṁ rudrātmakaṁ jagat
'और देखो, तुम्हारे शरीर भी मुझसे ही बने हैं।' हे व्यास! तब उन देवताओं ने सम्पूर्ण जगत को रुद्रमय देखा...
श्लोक 138 (skanda.8.32.138)
आत्मानं चाप्यपश्यन्त विस्मयापन्नचेतसः । एवं स तेषां देवेशो दर्शयित्वात्मनो बलम्
ātmānaṁ cāpyapaśyanta vismayāpannacetasaḥ | evaṁ sa teṣāṁ deveśo darśayitvātmano balam
...और विस्मित-चित्त होकर उन्होंने अपनी आत्मा को भी रुद्रस्वरूप देखा। इस प्रकार देवेश ने उन्हें अपना बल दिखाकर...
श्लोक 139 (skanda.8.32.139)
उवाच सुरशार्दूलान् दृष्टा ह्येता विभूतयः । यो यां पूजयते मूर्तिं भक्त्या परममया युतः
uvāca suraśārdūlān dṛṣṭā hyetā vibhūtayaḥ | yo yāṁ pūjayate mūrtiṁ bhaktyā paramamayā yutaḥ
...देवश्रेष्ठों से कहा - 'तुमने ये विभूतियाँ देख लीं। जो भी परम भक्ति से युक्त होकर जिस मूर्ति की पूजा करता है...'
श्लोक 140 (skanda.8.32.140)
तस्य तां मूर्त्तिमास्थाय पूजां गृह्णाम्यहं सुराः । न भागधेयैः कृत्यं मे भागधेयानि वस्मुराः । सर्वाण्येव ददाम्यद्य यात सर्वे गतज्वराः
tasya tāṁ mūrttimāsthāya pūjāṁ gṛhṇāmyahaṁ surāḥ | na bhāgadheyaiḥ kṛtyaṁ me bhāgadheyāni vasmurāḥ | sarvāṇyeva dadāmyadya yāta sarve gatajvarāḥ
'...उसी मूर्ति में स्थित होकर मैं उसकी पूजा ग्रहण करता हूँ, हे देवो। मुझे भागों की आवश्यकता नहीं है - हे देवो! तुम्हारे भाग तुम्हारे ही हैं। मैं आज वे सब तुम्हें देता हूँ। जाओ, सब निश्चिन्त होकर।'
श्लोक 141 (skanda.8.32.141)
देवा ऊचुः । गुह्यमेतत् परं देव त्वयास्माकं निदर्शितम् । एवं यो वेत्स्यते मर्त्यः स लोकान् प्राप्स्यतेव्ययान्
devā ūcuḥ | guhyametat paraṁ deva tvayāsmākaṁ nidarśitam | evaṁ yo vetsyate martyaḥ sa lokān prāpsyatevyayān
देवताओं ने कहा - 'हे देव! यह परम गुह्य रहस्य आपने हमें दिखा दिया है। जो भी मनुष्य इसे इस प्रकार जान लेगा, वह अविनाशी लोकों को प्राप्त करेगा।'
श्लोक 142 (skanda.8.32.142)
इदं च भगवन् स्थानं भद्रेश्वरमिति श्रुतम् । भविष्यति जगच्छ्रेष्ठं पुण्येभ्यः पुण्यवत्तमम्
idaṁ ca bhagavan sthānaṁ bhadreśvaramiti śrutam | bhaviṣyati jagacchreṣṭhaṁ puṇyebhyaḥ puṇyavattamam
'और हे भगवन्! यह स्थान, जो भद्रेश्वर नाम से विख्यात है, संसार में समस्त पुण्य-स्थानों में सर्वश्रेष्ठ पुण्यकारी होगा।'
श्लोक 143 (skanda.8.32.143)
समन्ताद् योजनं चैवं रुद्रक्षेत्रं सनातनम् । मृतोत्र गणपो देव वल्लभस्ते भविष्यति
samantād yojanaṁ caivaṁ rudrakṣetraṁ sanātanam | mṛtotra gaṇapo deva vallabhaste bhaviṣyati
'चारों ओर एक योजन तक यह सनातन रुद्रक्षेत्र होगा। हे देव! यहाँ मरने वाला आपका प्रिय गणपति बनेगा।'
श्लोक 144 (skanda.8.32.144)
यश्चेदं कीर्त्तयेन्नित्यं कल्य उत्थाय यज्ञहन् । श्रावयेच्चापि विप्रेभ्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते
yaścedaṁ kīrttayennityaṁ kalya utthāya yajñahan | śrāvayeccāpi viprebhyaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate
'हे यज्ञहन्! जो प्रातःकाल उठकर नित्य इसका कीर्तन करता है और ब्राह्मणों को भी सुनाता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।'
श्लोक 145 (skanda.8.32.145)
भद्रकर्णह्रदे चास्मिन् स्नात्वा योभ्यर्चयेद्धरम् । साधयित्वा चरुं चैव भोजयेद् ब्राह्मणान् शुचिः
bhadrakarṇahrade cāsmin snātvā yobhyarcayeddharam | sādhayitvā caruṁ caiva bhojayed brāhmaṇān śuciḥ
'जो इस भद्रकर्ण ह्रद में स्नान करके हर की अर्चना करता है, और चरु तैयार करके पवित्र होकर ब्राह्मणों को भोजन कराता है...'
श्लोक 146 (skanda.8.32.146)
स सर्वपापनिर्मुक्तो. यत्र तत्र मृतो नरः । मोदतेप्सरसां मध्ये दिवि देव इवापरः
sa sarvapāpanirmukto. yatra tatra mṛto naraḥ | modatepsarasāṁ madhye divi deva ivāparaḥ
'...वह सब पापों से मुक्त होकर, जहाँ कहीं भी मरे, स्वर्ग में अप्सराओं के बीच किसी अन्य देवता के समान आनन्द भोगता है।'
श्लोक 147 (skanda.8.32.147)
यत्र चोक्तं त्वया देव स्थितेन भगवन् प्रभो । हरभद्रेति पुण्योयं त्वत्प्रसादाद् भवत्वज
yatra coktaṁ tvayā deva sthitena bhagavan prabho | harabhadreti puṇyoyaṁ tvatprasādād bhavatvaja
'और हे देव! जहाँ आपने खड़े होकर "हरभद्र" यह शब्द कहा, हे अज! आपकी कृपा से यह स्थान पुण्यमय हो।'
श्लोक 148 (skanda.8.32.148)
अश्वमेधस्य यत्पुण्यं सम्यगिष्टस्य यज्ञहन् । तदत्र देव भवतु नरस्याभ्यर्चतः सदा
aśvamedhasya yatpuṇyaṁ samyagiṣṭasya yajñahan | tadatra deva bhavatu narasyābhyarcataḥ sadā
'हे यज्ञहन्! जो पुण्य सम्यक् रूप से किए गए अश्वमेध यज्ञ का है, हे देव! वही पुण्य यहाँ अर्चना करने वाले मनुष्य को सदा प्राप्त हो।'
श्लोक 149 (skanda.8.32.149)
परित्यक्ष्यति यश्चात्र कश्चित् प्राणान् नरोत्तमः । हरिभद्रस्य स गणो भविष्यति महाबलः
parityakṣyati yaścātra kaścit prāṇān narottamaḥ | haribhadrasya sa gaṇo bhaviṣyati mahābalaḥ
'और जो भी श्रेष्ठ मनुष्य यहाँ अपने प्राण त्यागेगा, वह हरिभद्र का महाबली गण बनेगा।'
श्लोक 150 (skanda.8.32.150)
सनत्कुमार उवाच । एवमस्त्विति स प्रोच्य मन्दरं चारुकन्दरम् । जगाम भगवान् शर्वः सोमो गणशतैर्वृतः
sanatkumāra uvāca | evamastviti sa procya mandaraṁ cārukandaram | jagāma bhagavān śarvaḥ somo gaṇaśatairvṛtaḥ
सनत्कुमार बोले - 'ऐसा ही हो' कहकर भगवान शर्व, उमा सहित, सैकड़ों गणों से घिरे हुए, सुन्दर कन्दराओं वाले मन्दराचल को चले।
श्लोक 151 (skanda.8.32.151)
देवापि राज्ञा सहितास्तस्मिँस्थाने यथासुखम् । तस्थुर्ब्रह्मा च विष्णुश्च जग्मतुर्देवपृष्ठतः
devāpi rājñā sahitāstasmi~sthāne yathāsukham | tasthurbrahmā ca viṣṇuśca jagmaturdevapṛṣṭhataḥ
देवगण भी राजा दक्ष सहित उस स्थान पर सुखपूर्वक रहे। ब्रह्मा और विष्णु देव के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 152 (skanda.8.32.152)
स गत्वा स्तोकमध्वानमुभाभ्यां सहितः प्रभुः । नातिदूरे ततः प्राह तिष्ठ विष्णो महाबल
sa gatvā stokamadhvānamubhābhyāṁ sahitaḥ prabhuḥ | nātidūre tataḥ prāha tiṣṭha viṣṇo mahābala
दोनों के साथ कुछ दूर तक जाकर, प्रभु ने न अधिक दूर जाकर कहा - 'हे महाबल विष्णु! यहीं ठहरो।'
श्लोक 153 (skanda.8.32.153)
स प्रणम्य ततः पादौ हरस्य पुरुषोत्तमः । तस्थावाम्रं समालम्ब्य स कुब्जस्समपद्यत
sa praṇamya tataḥ pādau harasya puruṣottamaḥ | tasthāvāmraṁ samālambya sa kubjassamapadyata
तब हर के चरणों में प्रणाम करके पुरुषोत्तम विष्णु आम्रवृक्ष का सहारा लेकर खड़े हो गए, और कुबड़े हो गए।
श्लोक 154 (skanda.8.32.154)
यस्मादाम्रं समालम्ब्य तस्मिन् देशे स्थितो हरिः । निरीक्षमाणो देवेशं देशस्तस्मादभूदसौ
yasmādāmraṁ samālambya tasmin deśe sthito hariḥ | nirīkṣamāṇo deveśaṁ deśastasmādabhūdasau
चूँकि हरि आम्रवृक्ष का सहारा लेकर उस स्थान पर देवेश को निहारते हुए खड़े रहे, इसी कारण वह स्थान इस नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 155 (skanda.8.32.155)
कुव्जाम्रक इति ख्यातो विष्णोः क्षेत्रं समृद्धिमत् । पुण्यं निवर्तनाद्विष्णो गोसहस्रफलप्रदम्
kuvjāmraka iti khyāto viṣṇoḥ kṣetraṁ samṛddhimat | puṇyaṁ nivartanādviṣṇo gosahasraphalapradam
वह 'कुब्जाम्रक' नाम से विख्यात, समृद्धिशाली विष्णु-क्षेत्र हुआ, जो पुण्यदायी है तथा वहाँ से लौटने पर सहस्र गौओं के दान का फल देता है।
श्लोक 156 (skanda.8.32.156)
नातिदूरं ततो गत्वा भूयो देवः पितामहम् । निवर्त्तेत्यब्रवीद् व्यास गगनञ्च समाविशत्
nātidūraṁ tato gatvā bhūyo devaḥ pitāmaham | nivarttetyabravīd vyāsa gaganañca samāviśat
तब कुछ और दूर जाकर देव ने पुनः पितामह से कहा - हे व्यास! 'लौट जाओ' और स्वयं आकाश में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 157 (skanda.8.32.157)
तस्मिन् वियद्गते देवे ब्रह्मा प्राञ्जलिरुन्मुखः । प्रदक्षिणं समावृत्य प्रणम्य प्रययौ ततः
tasmin viyadgate deve brahmā prāñjalirunmukhaḥ | pradakṣiṇaṁ samāvṛtya praṇamya prayayau tataḥ
देव के आकाश में चले जाने पर, हाथ जोड़े, ऊपर की ओर मुख किए ब्रह्मा ने प्रदक्षिणा करके, प्रणाम करके, प्रस्थान किया।
श्लोक 158 (skanda.8.32.158)
यस्मात्तत्र हरं तेन कुर्वता वै प्रदक्षिणम् । आवर्त्तः स्वशरीरस्य प्रकृतः पुण्यकर्मणा
yasmāttatra haraṁ tena kurvatā vai pradakṣiṇam | āvarttaḥ svaśarīrasya prakṛtaḥ puṇyakarmaṇā
चूँकि वहाँ हर की प्रदक्षिणा करते समय उस पुण्यकर्मा के अपने शरीर का आवर्तन हुआ...
श्लोक 159 (skanda.8.32.159)
तस्मात् स देशो विख्यातो ब्रह्मावर्त्तेति शोभनः । अश्वमेधफलं तत्र स्नातः प्राप्नोति मानवः
tasmāt sa deśo vikhyāto brahmāvartteti śobhanaḥ | aśvamedhaphalaṁ tatra snātaḥ prāpnoti mānavaḥ
...इसलिए वह सुंदर स्थान 'ब्रह्मावर्त' नाम से विख्यात हुआ। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य अश्वमेध का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 160 (skanda.8.32.160)
साधयित्वा चरुं चात्र भोजयित्वा तथा द्विजान् । प्राणान् परित्यज्य ततो ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्
sādhayitvā caruṁ cātra bhojayitvā tathā dvijān | prāṇān parityajya tato brahmalokamavāpnuyāt
यहाँ चरु तैयार करके तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर, फिर प्राण त्यागने पर वह ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 161 (skanda.8.32.161)
ततोभ्येत्य सुरैस्सार्धं ब्रह्मा विष्णुपुरस्सरैः । भद्रेश्वरे पशुपतेर्महिमानमथाकरोत्
tatobhyetya suraissārdhaṁ brahmā viṣṇupurassaraiḥ | bhadreśvare paśupatermahimānamathākarot
तब ब्रह्मा ने विष्णु आदि देवताओं सहित लौटकर भद्रेश्वर में पशुपति की महिमा स्थापित की।
श्लोक 162 (skanda.8.32.162)
स लिङ्गः तत्र संस्थाप्य पूजां कृत्वातिभास्वराम् । भद्रकर्णह्रदे स्नात्वा सह देवैर्दिवं ययौ
sa liṅgaḥ tatra saṁsthāpya pūjāṁ kṛtvātibhāsvarām | bhadrakarṇahrade snātvā saha devairdivaṁ yayau
वहाँ लिंग की स्थापना करके अत्यंत तेजस्वी पूजा करके, भद्रकर्ण ह्रद में स्नान करके, वह देवताओं सहित स्वर्ग को गया।
श्लोक 163 (skanda.8.32.163)
तं प्रयान्तं तदा दक्षो ब्रह्माणमिदमूचिवान् । कर्तव्यं किं मया देव मम तद् ब्रूहि पृच्छतः
taṁ prayāntaṁ tadā dakṣo brahmāṇamidamūcivān | kartavyaṁ kiṁ mayā deva mama tad brūhi pṛcchataḥ
जाते हुए उन ब्रह्मा से दक्ष ने तब यह कहा - 'हे देव! मुझे क्या करना चाहिए? पूछने पर मुझे बताइए।'
श्लोक 164 (skanda.8.32.164)
पितामह उवाच । प्रसादय महेष्वासं शर्वमुग्रं कपर्दिनम् । ततो यज्ञसमाप्तिं च लोकांश्च प्राप्स्यसे क्षयान्
pitāmaha uvāca | prasādaya maheṣvāsaṁ śarvamugraṁ kapardinam | tato yajñasamāptiṁ ca lokāṁśca prāpsyase kṣayān
पितामह ने कहा - 'महाधनुर्धर, उग्र, जटाधारी शर्व को प्रसन्न करो; तब तुम यज्ञ की समाप्ति और अक्षय लोक प्राप्त करोगे।'
श्लोक 165 (skanda.8.32.165)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तो देवेन ब्रह्मणा व्यास तत्त्वतः । लिंगं कनखले कृत्वा रुद्रमभ्यर्चयत् तदा
sanatkumāra uvāca | sa evamukto devena brahmaṇā vyāsa tattvataḥ | liṁgaṁ kanakhale kṛtvā rudramabhyarcayat tadā
सनत्कुमार बोले - हे व्यास! ब्रह्मा देव द्वारा सत्य रूप से ऐसा कहे जाने पर, उसने कनखल में लिंग स्थापित करके रुद्र की अर्चना की।
श्लोक 166 (skanda.8.32.166)
तस्य संवत्सरशते पूर्णे दिव्ये प्रजापतेः । महादेवोद्रिजां प्राह प्रहसन् गिरिमूर्धनि
tasya saṁvatsaraśate pūrṇe divye prajāpateḥ | mahādevodrijāṁ prāha prahasan girimūrdhani
प्रजापति दक्ष के सौ दिव्य वर्ष पूर्ण होने पर, पर्वत-शिखर पर महादेव ने हँसते हुए गिरिजा से कहा...
श्लोक 167 (skanda.8.32.167)
प्राचेतसात्मजो देवि स्थितस्तपसि संयतः । पश्यैनं मद्गतेनेशे चेतसा समवस्थितम्
prācetasātmajo devi sthitastapasi saṁyataḥ | paśyainaṁ madgateneśe cetasā samavasthitam
'हे देवि! प्राचेतस-पुत्र संयमपूर्वक तप में स्थित है। इसे देखो, यह अपने चित्त को मुझमें ही लगाए हुए स्थित है।'
श्लोक 168 (skanda.8.32.168)
ततो दृष्ट्वा महादेवी वायुभक्षमवस्थितम् । लिङ्गेपरमया भक्त्या पूजयन्तं महेश्वरम्
tato dṛṣṭvā mahādevī vāyubhakṣamavasthitam | liṅgeparamayā bhaktyā pūjayantaṁ maheśvaram
तब महादेवी ने उसे वायु मात्र का आहार करते हुए, लिंग में परम भक्ति से महेश्वर की पूजा करते हुए देखा...
श्लोक 169 (skanda.8.32.169)
उवाच हृषिता देवी देवं सर्वसुरार्चितम् । कृताञ्जलिपुटा व्यास सर्वदेवपतिं पतिम्
uvāca hṛṣitā devī devaṁ sarvasurārcitam | kṛtāñjalipuṭā vyāsa sarvadevapatiṁ patim
...हे व्यास! प्रसन्न देवी ने हाथ जोड़कर सर्वदेवपूजित, सर्वदेवपति, अपने पति देव से कहा।
श्लोक 170 (skanda.8.32.170)
देव्युवाच । क्षुद्रोयं दुष्टचेताश्च स्तब्धो मानी च दुर्मतिः । विष्ट्या त्वया विनिकृत स्त्वामेव शरणं गतः
devyuvāca | kṣudroyaṁ duṣṭacetāśca stabdho mānī ca durmatiḥ | viṣṭyā tvayā vinikṛta stvāmeva śaraṇaṁ gataḥ
देवी ने कहा - 'यह क्षुद्र, दुष्टचित्त, हठी, अभिमानी और दुर्बुद्धि व्यक्ति, आपके द्वारा इस विपत्ति से पराजित होकर, आपकी ही शरण में आया है।'
श्लोक 171 (skanda.8.32.171)
तदस्य दुष्टभावस्य प्रपन्नस्य महेश्वर । क्षन्तुमर्हसि भक्तस्य त्वामस्यार्थे प्रसादये
tadasya duṣṭabhāvasya prapannasya maheśvara | kṣantumarhasi bhaktasya tvāmasyārthe prasādaye
'अतः हे महेश्वर! इस दुष्ट-स्वभाव वाले, शरणागत भक्त को क्षमा करना आपको उचित है; मैं इसके लिए आपसे प्रार्थना करती हूँ।'
श्लोक 172 (skanda.8.32.172)
देवदेव उवाच । त्वमेव देवि यच्छास्मै वरानिष्टान् यथासुखम् । अनुज्ञाता मया सुभ्रु त्वमेवास्य वरं दिश
devadeva uvāca | tvameva devi yacchāsmai varāniṣṭān yathāsukham | anujñātā mayā subhru tvamevāsya varaṁ diśa
देवदेव ने कहा - 'हे देवि! तुम स्वयं ही इसे इच्छित वर सुखपूर्वक दे दो। हे सुभ्रु! मेरी अनुमति से तुम स्वयं ही इसे वर प्रदान करो।'
श्लोक 173 (skanda.8.32.173)
सनत्कुमार उवाच । ततस्तौ देवदेवेशौ सङ्गतौ स्वगणैर्वृतौ । ऊचतुः पश्य दक्षावां तुष्टौ दिव्येन चक्षुषा
sanatkumāra uvāca | tatastau devadeveśau saṅgatau svagaṇairvṛtau | ūcatuḥ paśya dakṣāvāṁ tuṣṭau divyena cakṣuṣā
सनत्कुमार बोले - तब वे दोनों देवदेवेश, एक साथ अपने गणों से घिरे हुए, बोले - 'हे दक्ष! हम दोनों को प्रसन्न देखो, दिव्य दृष्टि से।'
श्लोक 174 (skanda.8.32.174)
प्राचेतस महाभाग वरदौ स्वो महातपः
prācetasa mahābhāga varadau svo mahātapaḥ
'हे प्राचेतस! हे महाभाग! हम दोनों वरदाता तुम्हारे महान् तप से...' (इस श्लोक की शेष पंक्ति मूल में लुप्त है)
श्लोक 175 (skanda.8.32.175)
शापशान्त्यर्थमेत् ते वरं दद्मि तवेप्सितम् । यस्ते यज्ञो गणैर्ध्वस्तः फलं तस्य त्वमाप्नुहि
śāpaśāntyarthamet te varaṁ dadmi tavepsitam | yaste yajño gaṇairdhvastaḥ phalaṁ tasya tvamāpnuhi
'...शाप की शांति के लिए मैं तुम्हें इच्छित वर देता हूँ; गणों द्वारा नष्ट किए गए तुम्हारे उस यज्ञ का फल तुम्हें प्राप्त हो।'
श्लोक 176 (skanda.8.32.176)
कामरूपधरः श्रीमान् गणेशश्च भवस्व मे । अक्षयश्चामरश्चैव दुःखशोकविवर्जितः । भविष्यसि महाभाग मम चैव समीपगः
kāmarūpadharaḥ śrīmān gaṇeśaśca bhavasva me | akṣayaścāmaraścaiva duḥkhaśokavivarjitaḥ | bhaviṣyasi mahābhāga mama caiva samīpagaḥ
'हे श्रीमान्! तुम कामरूपधारी मेरे गणेश बन जाओ। हे महाभाग! तुम अक्षय, अमर, दुःख-शोक से रहित तथा सदा मेरे समीप रहने वाले होओगे।'
श्लोक 177 (skanda.8.32.177)
देव्युवाच । शृणुष्व भूयः किं चान्यत् प्रयच्छतु महेश्वरः । सुदुष्करमपि ह्येष वरं दद्यात् त्वयार्थितः
devyuvāca | śṛṇuṣva bhūyaḥ kiṁ cānyat prayacchatu maheśvaraḥ | suduṣkaramapi hyeṣa varaṁ dadyāt tvayārthitaḥ
देवी ने कहा - 'और सुनो, महेश्वर तुम्हें और क्या दें? यदि तुम माँगो, तो वे अत्यंत दुष्कर वर भी दे देंगे।'
श्लोक 178 (skanda.8.32.178)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तस्तदा दक्षो हिमवत्सुतया तया । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा इदमाह महामतिः
sanatkumāra uvāca | evamuktastadā dakṣo himavatsutayā tayā | prāñjaliḥ praṇato bhūtvā idamāha mahāmatiḥ
सनत्कुमार बोले - हिमवत्पुत्री द्वारा ऐसा कहे जाने पर, महामति दक्ष ने हाथ जोड़कर, प्रणाम करके यह कहा।
श्लोक 179 (skanda.8.32.179)
दक्ष उवाच । यो देवस्त्रिभुवनजन्मनाशकर्ता यं मूढा न विदुरनुक्तमेकमेव । भक्तानामशुभहरं पिनाकपाणिं तं देवं शरणगता वयं सभार्म्
dakṣa uvāca | yo devastribhuvanajanmanāśakartā yaṁ mūḍhā na viduranuktamekameva | bhaktānāmaśubhaharaṁ pinākapāṇiṁ taṁ devaṁ śaraṇagatā vayaṁ sabhārm
दक्ष ने कहा - 'जो देव त्रिभुवन की उत्पत्ति और संहार करने वाले हैं, जिन्हें मूर्ख लोग अद्वितीय अनुक्त परमेश्वर के रूप में नहीं जानते, जो भक्तों के अशुभ को हरने वाले, पिनाकधारी हैं - उन देव की हम अपनी पत्नी सहित शरण में आए हैं।'
श्लोक 180 (skanda.8.32.180)
योज्ञानादसुरतयातिमानमोहान्नास्माभिस्सह खलु पूजितोद्रिपुत्र्या । यश्शापं मम रुषितो ददौ सुरेशस्तं देवं शरणगता वयं सभार्यम्
yojñānādasuratayātimānamohānnāsmābhissaha khalu pūjitodriputryā | yaśśāpaṁ mama ruṣito dadau sureśastaṁ devaṁ śaraṇagatā vayaṁ sabhāryam
'जिन्हें अज्ञानवश, असुरता, अत्यधिक अभिमान और मोह के कारण हमने पर्वतपुत्री सहित नहीं पूजा था, तथा जिन सुरेश ने रुष्ट होकर मुझे शाप दिया था - उन्हीं देव की हम पत्नी सहित शरण में आए हैं।'
श्लोक 181 (skanda.8.32.181)
यस्स्रष्टा सुरगणयक्षराक्षसानां सिद्धानां दितिसुतदानवेन्द्रनॄणाम् । भूतानां पशुमृगपक्षिपत्तगानां तं देवं शरणगता वयं सभार्यम्
yassraṣṭā suragaṇayakṣarākṣasānāṁ siddhānāṁ ditisutadānavendranṝṇām | bhūtānāṁ paśumṛgapakṣipattagānāṁ taṁ devaṁ śaraṇagatā vayaṁ sabhāryam
'जो देवगण, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, दितिपुत्रों, दानवेन्द्रों और मनुष्यों के, तथा भूतों, पशुओं, मृगों, पक्षियों और सर्पों के स्रष्टा हैं - उन्हीं देव की हम पत्नी सहित शरण में आए हैं।'
श्लोक 182 (skanda.8.32.182)
यः कोधान्महदसृजद् गणेश्वरेशं सिंहेन्द्रं हरिममितप्रभावरूपम् । पत्नीं चाप्यमितगुणप्रभावयुक्तां तं देवं शरणगता वयं सभार्यम्
yaḥ kodhānmahadasṛjad gaṇeśvareśaṁ siṁhendraṁ harimamitaprabhāvarūpam | patnīṁ cāpyamitaguṇaprabhāvayuktāṁ taṁ devaṁ śaraṇagatā vayaṁ sabhāryam
'जिन्होंने क्रोधवश अपार प्रभाव और रूप वाले सिंहतुल्य महान् गणेश्वरेश हरि को तथा अपार गुण-प्रभाव से युक्त पत्नी को उत्पन्न किया - उन्हीं देव की हम पत्नी सहित शरण में आए हैं।'
श्लोक 183 (skanda.8.32.183)
यो देवान् सहवरुणान् सवित्तगोपान् सब्रह्मान् सशतमखान् सविष्णुवायून् । इन्द्राग्र्यान् समुनिमहायुधान् विजिग्ये तं देवं शरणगता वयं सभार्यम्
yo devān sahavaruṇān savittagopān sabrahmān saśatamakhān saviṣṇuvāyūn | indrāgryān samunimahāyudhān vijigye taṁ devaṁ śaraṇagatā vayaṁ sabhāryam
'जिन्होंने वरुण, कुबेर, ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, वायु तथा इन्द्र-प्रमुख देवताओं को, मुनियों और उनके महाअस्त्रों सहित, जीत लिया - उन्हीं देव की हम पत्नी सहित शरण में आए हैं।'
श्लोक 184 (skanda.8.32.184)
यत्किञ्चित्त्वयि कलुषं कृतं च दुष्टं ह्यज्ञानादपि च हि रागदोषमोहात् । तत्सर्वं मम सह भार्ययाद्य शर्वो विश्वात्मा क्षमतु महानुभावभावात्
yatkiñcittvayi kaluṣaṁ kṛtaṁ ca duṣṭaṁ hyajñānādapi ca hi rāgadoṣamohāt | tatsarvaṁ mama saha bhāryayādya śarvo viśvātmā kṣamatu mahānubhāvabhāvāt
'हे विश्वात्मा शर्व! आपके प्रति जो भी अपराध, जो भी दोष, अज्ञानवश अथवा राग-मोह के दोष से हुआ हो, वह सब आप अपने महान् उदार भाव से आज मुझे पत्नी सहित क्षमा कीजिए।'
श्लोक 185 (skanda.8.32.185)
सनत्कुमार उवाच । तत एवं स देवेशं स्तुत्वा सास्राविलेक्षणः । प्रसार्य बाहू सर्वेण शरीरेणापतद् भुवि
sanatkumāra uvāca | tata evaṁ sa deveśaṁ stutvā sāsrāvilekṣaṇaḥ | prasārya bāhū sarveṇa śarīreṇāpatad bhuvi
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार देवेश की स्तुति करके, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाला वह, भुजाएँ फैलाकर, अपने सम्पूर्ण शरीर सहित पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 186 (skanda.8.32.186)
तं प्रपन्नं तदा देवो दक्षं सास्राविलेक्षणम् । देव्या सह महाभाग स्वयमुत्थापयद् बली
taṁ prapannaṁ tadā devo dakṣaṁ sāsrāvilekṣaṇam | devyā saha mahābhāga svayamutthāpayad balī
हे महाभाग! तब बलवान् देव ने देवी सहित उस शरणागत, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले दक्ष को स्वयं उठाया।
श्लोक 187 (skanda.8.32.187)
तस्याश्रूण्यपतन्भूमौ बिन्दुभूतानि तत्र वै । तानि संहत्य विप्रेन्द्र नदी तु समपद्यत
tasyāśrūṇyapatanbhūmau bindubhūtāni tatra vai | tāni saṁhatya viprendra nadī tu samapadyata
उसके आँसू वहाँ बूँद-बूँद बनकर भूमि पर गिरे। हे विप्रेन्द्र! वे सब मिलकर एक नदी बन गए।
श्लोक 188 (skanda.8.32.188)
तामुवाच ततो देवो नदीं वै पुण्यलक्षणाम् । अर्जुनादश्रुबिन्दोस्त्वं यस्माद् देवि विनिःसृता
tāmuvāca tato devo nadīṁ vai puṇyalakṣaṇām | arjunādaśrubindostvaṁ yasmād devi viniḥsṛtā
तब देव ने उस पुण्यलक्षणा नदी से कहा - 'हे देवि! चूँकि तुम निर्मल अश्रुबिन्दु से उत्पन्न हुई हो...'
श्लोक 189 (skanda.8.32.189)
तस्मात् ख्याता भवित्री त्वमर्जुना नामतः शुभा । पर्वपर्व समासाद्य वहिष्यसि महायशे
tasmāt khyātā bhavitrī tvamarjunā nāmataḥ śubhā | parvaparva samāsādya vahiṣyasi mahāyaśe
'...इसलिए हे महायशस्विनी! तुम "अर्जुना" नाम से विख्यात शुभ नदी बनोगी, और प्रत्येक पर्व को प्राप्त कर प्रवाहित होती रहोगी।'
श्लोक 190 (skanda.8.32.190)
अश्वमेधफलं चापि त्वयि स्नातो ह्यवाप्स्यति । मृतश्च तव तीरेस्मिन् नियमेनेतरेण वा
aśvamedhaphalaṁ cāpi tvayi snāto hyavāpsyati | mṛtaśca tava tīresmin niyamenetareṇa vā
'और जो तुझमें स्नान करेगा, वह अश्वमेध का फल प्राप्त करेगा। और जो तेरे इस तट पर, चाहे नियमपूर्वक हो या अन्यथा, मरेगा...'
श्लोक 191 (skanda.8.32.191)
न पुनर्जन्म मानुष्ये दुर्गतिञ्चोपलप्स्यते । त्रिरात्रोपोषितो यश्च चरुं कृत्वा निवेद्य च
na punarjanma mānuṣye durgatiñcopalapsyate | trirātropoṣito yaśca caruṁ kṛtvā nivedya ca
'...उसे न तो मनुष्य-योनि में पुनर्जन्म मिलेगा और न दुर्गति प्राप्त होगी। और जो तीन रात्रि उपवास करके चरु बनाकर अर्पित करता है...'
श्लोक 192 (skanda.8.32.192)
ब्राह्मणं भोजयेत् स्नातस्त्वयि सोपि गमिष्यति । गवां लोकं महातेजा न च तस्मात् पतिष्यति
brāhmaṇaṁ bhojayet snātastvayi sopi gamiṣyati | gavāṁ lokaṁ mahātejā na ca tasmāt patiṣyati
'...और तुझमें स्नान करके ब्राह्मण को भोजन कराता है, वह भी महातेजस्वी होकर गोलोक को जाएगा, और वहाँ से कभी नहीं गिरेगा।'
श्लोक 193 (skanda.8.32.193)
सनत्कुमार उवाच । एवं स सृष्ट्वा सरितं कृत्वा चैवाप्यनुग्रहम् । तमाश्वास्य सुरेशस्तु दक्षं प्राह नृपं तदा
sanatkumāra uvāca | evaṁ sa sṛṣṭvā saritaṁ kṛtvā caivāpyanugraham | tamāśvāsya sureśastu dakṣaṁ prāha nṛpaṁ tadā
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार नदी की सृष्टि करके और अनुग्रह करके, सुरेश ने राजा दक्ष को सांत्वना देकर तब कहा।
श्लोक 194 (skanda.8.32.194)
देवदेव उवाच । गतं तस्माद् भयं तेस्तु गणेशो मे भव प्रियः । ब्रूहि किन्ते पुनस्साधो ददानि वरमीप्सितम्
devadeva uvāca | gataṁ tasmād bhayaṁ testu gaṇeśo me bhava priyaḥ | brūhi kinte punassādho dadāni varamīpsitam
देवदेव ने कहा - 'तुम्हारा भय दूर हो गया; तुम मेरे प्रिय गणेश बन जाओ। हे साधो! और क्या चाहते हो, कहो, मैं तुम्हें इच्छित वर दूँगा।'
श्लोक 195 (skanda.8.32.195)
सनत्कुमार उवाच । अथ दक्षस्तदोवाच प्रणम्य शुभया गिरा । भूयो भूयस्समाश्वस्य निरीक्ष्य च पुनः पुनः
sanatkumāra uvāca | atha dakṣastadovāca praṇamya śubhayā girā | bhūyo bhūyassamāśvasya nirīkṣya ca punaḥ punaḥ
सनत्कुमार बोले - तब दक्ष ने प्रणाम करके, बार-बार धैर्य धारण करते हुए और बार-बार निहारते हुए शुभ वाणी से कहा।
श्लोक 196 (skanda.8.32.196)
दक्ष उवाच । यदि तुष्टोसि मे देव भवत्वेतद् तवाव्यय । स्थानं पवित्रं पुण्यं च वर एषोस्तु मे शिव
dakṣa uvāca | yadi tuṣṭosi me deva bhavatvetad tavāvyaya | sthānaṁ pavitraṁ puṇyaṁ ca vara eṣostu me śiva
दक्ष ने कहा - 'हे अव्यय देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो यह हो। हे शिव! यही मेरा वर हो - यह स्थान पवित्र और पुण्यमय बने।'
श्लोक 197 (skanda.8.32.197)
देवदेव उवाच । एते च मुनिकन्ये द्वे तप आस्थाय दुष्करम् । कणैस्संवत्सरे पूर्ण्णे खलेन च यतोशनम्
devadeva uvāca | ete ca munikanye dve tapa āsthāya duṣkaram | kaṇaissaṁvatsare pūrṇṇe khalena ca yatośanam
देवदेव ने कहा - 'इन दोनों मुनि-कन्याओं ने दुष्कर तप करते हुए, एक पूर्ण वर्ष तक अन्न-कणों तथा भूसी से रहित उशन का सेवन करके...'
श्लोक 198 (skanda.8.32.198)
कृतवत्यौ महाभागे त्वं च दक्ष यतः स्थितः । इदं कनखलं तस्मान्मम स्थानं भविष्यति
kṛtavatyau mahābhāge tvaṁ ca dakṣa yataḥ sthitaḥ | idaṁ kanakhalaṁ tasmānmama sthānaṁ bhaviṣyati
'...ऐसा तप किया है, हे महाभागे! और हे दक्ष! चूँकि तुम यहाँ स्थित रहे हो, इसलिए यह कनखल मेरा स्थान बनेगा।'
श्लोक 199 (skanda.8.32.199)
तीर्थञ्चैव महत्पुण्यं गङ्गासागरसन्निभम् । नात्र पापा न च शठा नास्तिका न च मानिनः
tīrthañcaiva mahatpuṇyaṁ gaṅgāsāgarasannibham | nātra pāpā na ca śaṭhā nāstikā na ca māninaḥ
'और यह गंगासागर के समान महापुण्य तीर्थ बनेगा। यहाँ न पापी, न धूर्त, न नास्तिक और न अभिमानी लोग...'
श्लोक 200 (skanda.8.32.200)
लप्स्यन्ते वै सदा गन्तुं न च वस्तुं कथंचन । मृतोत्र न पुनर्जन्म लप्स्यते मम तेजसा
lapsyante vai sadā gantuṁ na ca vastuṁ kathaṁcana | mṛtotra na punarjanma lapsyate mama tejasā
'...कभी वहाँ जाने या रहने में समर्थ न होंगे। यहाँ मरने वाले को मेरे तेज से पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होगा।'
श्लोक 201 (skanda.8.32.201)
अत्राभिगम्य स्नात्वा च चरुं कृत्वा तथैव च । सर्वपापविमुक्तात्मा शक्रलोके महीयते
atrābhigamya snātvā ca caruṁ kṛtvā tathaiva ca | sarvapāpavimuktātmā śakraloke mahīyate
'यहाँ आकर स्नान करके तथा चरु बनाकर, समस्त पापों से मुक्त आत्मा वाला मनुष्य इन्द्रलोक में सम्मानित होता है।'
श्लोक 202 (skanda.8.32.202)
ततो गणपतिं तत्र हरिभद्रमयोजयत् । कालीञ्चास्मै ददौ प्रीत्या भार्यां सर्वगुणोदिताम्
tato gaṇapatiṁ tatra haribhadramayojayat | kālīñcāsmai dadau prītyā bhāryāṁ sarvaguṇoditām
तब उन्होंने वहाँ हरिभद्र को गणपति नियुक्त किया, और प्रेमपूर्वक उसे सर्वगुणसम्पन्न काली को पत्नी रूप में प्रदान किया।
श्लोक 203 (skanda.8.32.203)
वराँश्च .विपुलान् दिव्यान् द्वीपञ्चापि घृतोदकम् । बाहुजेभ्यश्च सुबहून् गणेभ्यः प्रददौ वरान्
varā~śca .vipulān divyān dvīpañcāpi ghṛtodakam | bāhujebhyaśca subahūn gaṇebhyaḥ pradadau varān
उन्होंने विपुल दिव्य वर तथा घृतोदक द्वीप भी दिया, और अपनी भुजाओं से उत्पन्न गणों को भी अनेक वर प्रदान किए।
श्लोक 204 (skanda.8.32.204)
सनत्कुमार उवाच । एवं स दक्षयज्ञो वै विध्वस्तो व्यास शम्भुना । यज्ञस्य च शिरश्छिन्नं यथैतत् कथितं तव
sanatkumāra uvāca | evaṁ sa dakṣayajño vai vidhvasto vyāsa śambhunā | yajñasya ca śiraśchinnaṁ yathaitat kathitaṁ tava
सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इस प्रकार शम्भु द्वारा दक्ष का यज्ञ नष्ट किया गया, और यज्ञ का सिर काटा गया, जैसा तुम्हें बताया गया।
श्लोक 205 (skanda.8.32.205)
व्यास उवाच । सा देवीमुखजा घोरा दिव्या देव भयंकरी । क्व वा गता कथं वापि ह्येतदिच्छामि वेदितुम्
vyāsa uvāca | sā devīmukhajā ghorā divyā deva bhayaṁkarī | kva vā gatā kathaṁ vāpi hyetadicchāmi veditum
व्यास ने कहा - 'हे देव! वह देवी के मुख से उत्पन्न घोर, दिव्य, भयंकर देवी कहाँ गई और कैसे गई? यह मैं जानना चाहता हूँ।'
श्लोक 206 (skanda.8.32.206)
सनत्कुमार उवाच । स्तुता यदा भगवती प्रणतै स्सुरसत्तमैः । तदास्य साम्बिका प्राह ब्रूहि किङ्करवाण्यहम्
sanatkumāra uvāca | stutā yadā bhagavatī praṇatai ssurasattamaiḥ | tadāsya sāmbikā prāha brūhi kiṅkaravāṇyaham
सनत्कुमार बोले - जब भगवती प्रणत देवश्रेष्ठों द्वारा स्तुत हुईं, तब अम्बिका ने कहा - 'कहो, मैं क्या करूँ?'
श्लोक 207 (skanda.8.32.207)
ततो ब्रह्मा महादेवीं प्रणम्य बहुमानतः । उवाच दुहितृत्वे मे भवत्वेषा सुरेश्वरि
tato brahmā mahādevīṁ praṇamya bahumānataḥ | uvāca duhitṛtve me bhavatveṣā sureśvari
तब ब्रह्मा ने महादेवी को अत्यंत सम्मानपूर्वक प्रणाम करके कहा - 'हे सुरेश्वरि! यह मेरी पुत्री बन जाए।'
श्लोक 208 (skanda.8.32.208)
सनत्कुमार उवाच । एवमस्त्वित्युमा प्रोच्य तां देवीं प्रददौ सुताम् । मृत्युस्त्वमिति सोप्युक्त्वा घोरे कर्मण्ययोजयत्
sanatkumāra uvāca | evamastvityumā procya tāṁ devīṁ pradadau sutām | mṛtyustvamiti sopyuktvā ghore karmaṇyayojayat
सनत्कुमार बोले - 'ऐसा ही हो' कहकर उमा ने उस देवी को पुत्री के रूप में दे दिया। और ब्रह्मा ने भी 'तुम मृत्यु हो' कहकर उसे घोर कर्म में नियुक्त कर दिया।
श्लोक 209 (skanda.8.32.209)
सर्वप्राणभृतां देवीम् प्राणापहरणे शुभाम् । सापि तत्कार्यकरणे नियुक्ता ब्रह्मणा स्वयम् । ऊर्ध्वबाहुः सदेवेशा सदोद्युक्ता त्वया मया
sarvaprāṇabhṛtāṁ devīm prāṇāpaharaṇe śubhām | sāpi tatkāryakaraṇe niyuktā brahmaṇā svayam | ūrdhvabāhuḥ sadeveśā sadodyuktā tvayā mayā
उस देवी को समस्त प्राणियों के प्राण हरने के कार्य में नियुक्त किया गया। स्वयं ब्रह्मा द्वारा उस कार्य में नियुक्त वह भी, हे देवेश! ऊर्ध्वबाहु होकर सदा तुम्हारे और मेरे आदेश से कार्यरत रहती है।
श्लोक 210 (skanda.8.32.210)
य इदं दक्षयज्ञस्य विध्वंसनमनुत्तमम् । भद्रेश्वरप्रतिष्ठाञ्च दक्षानुग्रहमेव च
ya idaṁ dakṣayajñasya vidhvaṁsanamanuttamam | bhadreśvarapratiṣṭhāñca dakṣānugrahameva ca
जो कोई दक्ष के यज्ञ के इस अनुपम विध्वंस, भद्रेश्वर की प्रतिष्ठा तथा दक्ष पर हुए अनुग्रह के इस वृत्तान्त को...
श्लोक 211 (skanda.8.32.211)
पठेद् वा शृणुयाद्वापि श्रावयीत द्विजानपि । स सर्वपापविर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते
paṭhed vā śṛṇuyādvāpi śrāvayīta dvijānapi | sa sarvapāpavirmuktaḥ svargaloke mahīyate
...पढ़ता है, सुनता है, अथवा ब्राह्मणों को सुनाता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 212 (skanda.8.32.212)
भगनयननिपातं दक्षयज्ञे दवाग्निं । मदनपुरहुताशं चन्द्रलेखोज्ज्वलाङ्गम् । सुरगुरुमखकालं सप्तलोकाधिपालं । शरणमुपगतोहं शङ्करं शर्महेतोः
bhaganayananipātaṁ dakṣayajñe davāgniṁ | madanapurahutāśaṁ candralekhojjvalāṅgam | suragurumakhakālaṁ saptalokādhipālaṁ | śaraṇamupagatohaṁ śaṅkaraṁ śarmahetoḥ
मैं भग के नेत्रों को गिराने वाले, दक्ष के यज्ञ में दावाग्नि के समान, मदन के नगर को भस्म करने वाले, चन्द्रकला से उज्ज्वल अंग वाले, देवगुरु के यज्ञ के लिए काल-स्वरूप, सातों लोकों के अधिपालक शंकर की, सुख की प्राप्ति के लिए शरण में गया हूँ।