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अम्बिका खण्ड · अध्याय 33

वृषोत्पत्तिमाहात्म्य

अध्याय 32अध्याय-सूचीअध्याय 34

श्लोक 1 (skanda.8.33.1)

सनत्कुमार उवाच । यथा तु वृषभो देवमवहन्मुनिपुङ्गव । तत्तेहं संप्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य वृषध्वजम्

sanatkumāra uvāca | yathā tu vṛṣabho devamavahanmunipuṅgava | tattehaṁ saṁpravakṣyāmi namaskṛtya vṛṣadhvajam

सनत्कुमार ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ! जिस प्रकार वृषभ ने भगवान को धारण किया, वह मैं वृषध्वज को नमस्कार करके तुम्हें सुनाता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.8.33.2)

पूर्वमेव महासत्वो धर्मो यज्ञ सहायवान् । तताप विपुलं न्यासतपः परमदुश्चरम्

pūrvameva mahāsatvo dharmo yajña sahāyavān | tatāpa vipulaṁ nyāsatapaḥ paramaduścaram

पूर्वकाल में महाबली धर्म ने यज्ञ को सहायक बनाकर, अत्यन्त कठिन और विस्तृत न्यास-तप किया।

श्लोक 3 (skanda.8.33.3)

हिमवन्तं गिरिं प्राप्य वाय्वाहारौ बभूवतुः । वर्षाणान्तु सहस्राणि दश द्वादश चैव तौ

himavantaṁ giriṁ prāpya vāyvāhārau babhūvatuḥ | varṣāṇāntu sahasrāṇi daśa dvādaśa caiva tau

वे दोनों हिमालय पर्वत पर जाकर वायु-भक्षण करने लगे और दस हज़ार तथा बारह वर्षों तक ऐसे ही रहे।

श्लोक 4 (skanda.8.33.4)

मानुषाणि ततो भूयः शाकाहारौ बभूवतुः । ततोचिरात् तर्योर्देवो गणैस्सह महाद्युतिः

mānuṣāṇi tato bhūyaḥ śākāhārau babhūvatuḥ | tatocirāt taryordevo gaṇaissaha mahādyutiḥ

इसके बाद वे मानव वर्षों तक शाकाहारी हो गए। तत्पश्चात् शीघ्र ही महातेजस्वी देव अपने गणों सहित उनके समक्ष प्रकट हुए।

श्लोक 5 (skanda.8.33.5)

सवैस्समानरूपैस्तैर्दर्शनं प्रददौ हरः । ताँस्तौ महेश्वरान् दृष्टवा बहून् वै सदृशप्रभान्

savaissamānarūpaistairdarśanaṁ pradadau haraḥ | tāṁstau maheśvarān dṛṣṭavā bahūn vai sadṛśaprabhān

हर ने अपने समान रूप वाले अनेक गणों सहित उन्हें दर्शन दिया। उन दोनों ने समान तेजवाले उन बहुत से महेश्वरों को देखा।

श्लोक 6 (skanda.8.33.6)

परस्परममन्येतां कोन्वेषामीश्वरो भवेत् । तौ तदा वीक्ष्य संमन्त्र्य स्मृत्वा चैव पुनः पुनः

parasparamamanyetāṁ konveṣāmīśvaro bhavet | tau tadā vīkṣya saṁmantrya smṛtvā caiva punaḥ punaḥ

वे आपस में विचार करने लगे कि इनमें से ईश्वर कौन होगा। तब वे दोनों उन्हें देखकर, आपस में विचार-विमर्श करके तथा बार-बार स्मरण करके।

श्लोक 7 (skanda.8.33.7)

मध्ये महेश्वरं तेषां मेनाते तेजसां निधिम् । तौ तं मध्ये भवं देवं प्रणम्य बहुमानतः । शिरसोरञ्जली कृत्वा तुष्टुवाते मितौजसौ

madhye maheśvaraṁ teṣāṁ menāte tejasāṁ nidhim | tau taṁ madhye bhavaṁ devaṁ praṇamya bahumānataḥ | śirasorañjalī kṛtvā tuṣṭuvāte mitaujasau

उन्होंने उन सबके मध्य में स्थित तेजोनिधि महेश्वर को पहचान लिया। तब उन दोनों ने मध्य में स्थित भगवान को अत्यन्त सम्मानपूर्वक प्रणाम कर, सिर पर अंजलि बाँधकर, अल्पतेज वाले उन्होंने उनकी स्तुति की।

श्लोक 8 (skanda.8.33.8)

धर्मयज्ञौ ऊचतुः । नमस्त्रैलोक्यनाथाय दिग्वासायामृतात्मते । चतुष्पथनिवासाय चतुष्पथरताय च

dharmayajñau ūcatuḥ | namastrailokyanāthāya digvāsāyāmṛtātmate | catuṣpathanivāsāya catuṣpatharatāya ca

धर्म और यज्ञ ने कहा - त्रिलोकनाथ, दिशाओं को ही वस्त्र धारण करने वाले, अमृतस्वरूप, चौराहों में निवास करने वाले तथा चौराहों में रत रहने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 9 (skanda.8.33.9)

चतुर्व्यूहाय देवाय त्रिनेत्राय भवाय च । चतुर्मुखाय शुद्धाय जालान्तर विचारिणे

caturvyūhāya devāya trinetrāya bhavāya ca | caturmukhāya śuddhāya jālāntara vicāriṇe

चार व्यूहों वाले, तीन नेत्रों वाले, भव, चार मुखों वाले, शुद्धस्वरूप तथा जाल के भीतर विचरण करने वाले देव को नमस्कार है।

श्लोक 10 (skanda.8.33.10)

इन्द्रानुग्रहकर्त्रे च ब्रह्मानुग्रहकारिणे । ऊर्ध्वलिङ्गाय देवाय मदनायामदाय च

indrānugrahakartre ca brahmānugrahakāriṇe | ūrdhvaliṅgāya devāya madanāyāmadāya ca

इन्द्र पर अनुग्रह करने वाले, ब्रह्मा पर अनुग्रह करने वाले, ऊर्ध्वलिंग देव, मदनस्वरूप तथा मदरहित आपको नमस्कार है।

श्लोक 11 (skanda.8.33.11)

नमो हिरण्यवर्णाय सूर्याक्षाय तथैव च । नमः पवित्रकेशाय दीर्घजिह्वाय चैव हि

namo hiraṇyavarṇāya sūryākṣāya tathaiva ca | namaḥ pavitrakeśāya dīrghajihvāya caiva hi

स्वर्णवर्ण वाले, सूर्य के समान नेत्र वाले, पवित्र केशों वाले तथा दीर्घ जिह्वा वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 12 (skanda.8.33.12)

नमस्ते नैकपादाय एकाक्षाय नमो नमः । नमःसहस्रघण्टाय सहस्राक्षाय वै नमः

namaste naikapādāya ekākṣāya namo namaḥ | namaḥsahasraghaṇṭāya sahasrākṣāya vai namaḥ

अनेक पैरों वाले आपको नमस्कार, एक नेत्र वाले को बारम्बार नमस्कार। सहस्र घण्टाओं वाले तथा सहस्र नेत्रों वाले को नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.8.33.13)

नमः पिनाकिने चैव ध्वजिने च नमो नमः । नमः सहस्रशीर्षाय संवर्त्ताय नमो नमः

namaḥ pinākine caiva dhvajine ca namo namaḥ | namaḥ sahasraśīrṣāya saṁvarttāya namo namaḥ

पिनाकधारी को नमस्कार, ध्वजधारी को बारम्बार नमस्कार। सहस्र मस्तक वाले तथा संवर्तक को नमस्कार है।

श्लोक 14 (skanda.8.33.14)

नमः स्तव्याय वै नित्यं शत्रुघ्नाय नमो नमः । नमो भवाय भव्याय भावनाय नमो नमः

namaḥ stavyāya vai nityaṁ śatrughnāya namo namaḥ | namo bhavāya bhavyāya bhāvanāya namo namaḥ

सदा स्तुति के योग्य को नमस्कार, शत्रुओं का नाश करने वाले को बारम्बार नमस्कार। भव, भव्य तथा भावन को नमस्कार है।

श्लोक 15 (skanda.8.33.15)

नमो वराय वै नित्यं वरदाय तथैव च । गोकर्णाय नमो नित्यमैश्वर्यपतये नमः

namo varāya vai nityaṁ varadāya tathaiva ca | gokarṇāya namo nityamaiśvaryapataye namaḥ

सदा श्रेष्ठ को नमस्कार, वरदाता को भी नमस्कार। गोकर्ण को सदा नमस्कार, ऐश्वर्य के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 16 (skanda.8.33.16)

नमोस्तु विष्वक्सेनाय प्रभासाय नमो नमः । नमोस्तु तेन्नदायैव प्राणदाय नमोस्तु ते

namostu viṣvaksenāya prabhāsāya namo namaḥ | namostu tennadāyaiva prāṇadāya namostu te

विष्वक्सेन को नमस्कार, प्रभास को बारम्बार नमस्कार। अन्न देने वाले तथा प्राण देने वाले आपको नमस्कार है।

श्लोक 17 (skanda.8.33.17)

नमः प्रवर्तकायैव पद्ममालाय वै नमः । नमो महारथायैव भैरवाय नमो नमः

namaḥ pravartakāyaiva padmamālāya vai namaḥ | namo mahārathāyaiva bhairavāya namo namaḥ

प्रवर्तक को नमस्कार, कमल-माला धारण करने वाले को नमस्कार। महारथी को नमस्कार, भैरव को बारम्बार नमस्कार।

श्लोक 18 (skanda.8.33.18)

नमश्चतुर्मुखायैव महादेवाय वै नमः । नमोस्तु ब्रह्मणे चैव ध्रुवायैव चलाय च

namaścaturmukhāyaiva mahādevāya vai namaḥ | namostu brahmaṇe caiva dhruvāyaiva calāya ca

चार मुखों वाले को नमस्कार, महादेव को नमस्कार। ब्रह्मा-स्वरूप, ध्रुव तथा चल-स्वरूप को नमस्कार है।

श्लोक 19 (skanda.8.33.19)

नमोस्तु नारीरूपाय सुभगाय नमो नमः । मध्यमाय नमस्तेस्तु नमस्ते सर्वतस्तथा

namostu nārīrūpāya subhagāya namo namaḥ | madhyamāya namastestu namaste sarvatastathā

स्त्री-रूप धारण करने वाले को नमस्कार, सौभाग्यशाली को बारम्बार नमस्कार। मध्यम रूप वाले आपको नमस्कार, सब ओर से आपको नमस्कार है।

श्लोक 20 (skanda.8.33.20)

नमोनुमन्ता मन्ता त्वं सर्वभूतप्रवर्तक । आवयोरीप्सितान् कामान् विधत्स्व भुवनेश्वर

namonumantā mantā tvaṁ sarvabhūtapravartaka | āvayorīpsitān kāmān vidhatsva bhuvaneśvara

आप ही अनुमन्ता और मन्ता हैं, हे समस्त प्राणियों को प्रवृत्त करने वाले! हे भुवनेश्वर! हम दोनों की अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण कीजिए।

श्लोक 21 (skanda.8.33.21)

सनत्कुमार उवाच । योनेन स्तौति वै नित्यं नियमेन समन्वितः । सर्वकामैस्स सम्पन्नो यथेष्टां गतिमाप्नुयात्

sanatkumāra uvāca | yonena stauti vai nityaṁ niyamena samanvitaḥ | sarvakāmaissa sampanno yatheṣṭāṁ gatimāpnuyāt

सनत्कुमार ने कहा - जो कोई नियमपूर्वक सदा इस स्तोत्र से स्तुति करता है, वह समस्त कामनाओं से सम्पन्न होकर इच्छित गति को प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (skanda.8.33.22)

सनत्कुमार उवाच । अथ देवस्तु तान् सर्वाननयत्प्रकृतिं गणान् । नन्दिनं चैव देवीञ्च स्वयं चात्मानमप्युत । उवाच चैतौ तुष्टोस्मि गृह्यतामीप्सितो वरः

sanatkumāra uvāca | atha devastu tān sarvānanayatprakṛtiṁ gaṇān | nandinaṁ caiva devīñca svayaṁ cātmānamapyuta | uvāca caitau tuṣṭosmi gṛhyatāmīpsito varaḥ

सनत्कुमार बोले - तब भगवान ने उन सब गणों को, नन्दी को, देवी को और स्वयं अपने को भी उनके सामने प्रकृत रूप में ला दिया तथा इन दोनों से कहा - मैं प्रसन्न हूँ, अभीष्ट वर माँग लो।

श्लोक 23 (skanda.8.33.23)

देवौ ऊचतुः । यदि तुष्टोसि देवेश यदि देयो वरश्च नौः । जात्यन्तरगतौ नित्यं वहेव त्वां सुरेश्वर

devau ūcatuḥ | yadi tuṣṭosi deveśa yadi deyo varaśca nauḥ | jātyantaragatau nityaṁ vaheva tvāṁ sureśvara

दोनों देवों ने कहा - हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि हमें वर देना चाहते हैं, तो हे सुरेश्वर! हम दोनों दूसरे जन्म में जाकर सदा आपको वहन करें।

श्लोक 24 (skanda.8.33.24)

इदञ्च गुह्यं स्थानं नौ तपसातीव भावितम् । तव चैव प्रसादेन भवेत् पुण्यं सुरेश्वर

idañca guhyaṁ sthānaṁ nau tapasātīva bhāvitam | tava caiva prasādena bhavet puṇyaṁ sureśvara

यह गुप्त स्थान हमारे तप से अत्यन्त पवित्र हुआ है; हे सुरेश्वर! आपकी कृपा से यह पुण्यमय हो जाए।

श्लोक 25 (skanda.8.33.25)

देवदेव उवाच । इदं मम परं गुह्यं भवितृ स्थानमुत्तमम् । पञ्चेषुक्षेपमात्रं वै मृतोत्र गणपो भवेत्

devadeva uvāca | idaṁ mama paraṁ guhyaṁ bhavitṛ sthānamuttamam | pañceṣukṣepamātraṁ vai mṛtotra gaṇapo bhavet

देवदेव ने कहा - यह मेरा परम गुप्त तथा उत्तम स्थान होगा। यहाँ पाँच बाणों की दूरी तक मरने वाला गणपति हो जाएगा।

श्लोक 26 (skanda.8.33.26)

यस्मान्मध्ये भवोस्मीति युवयोरर्चितः स्थितः । तस्मान्नाम्ना तु विख्यातमिदं भवतु मध्यमम्

yasmānmadhye bhavosmīti yuvayorarcitaḥ sthitaḥ | tasmānnāmnā tu vikhyātamidaṁ bhavatu madhyamam

क्योंकि मैं भव तुम दोनों के मध्य में पूजित होकर खड़ा हुआ, इसलिए यह स्थान 'मध्यम' नाम से विख्यात हो।

श्लोक 27 (skanda.8.33.27)

युवां जात्यन्तरं प्राप्य पूजितौ बलवत्तरौ । वाहनत्वं ममासाद्य लोकान् सन्धारयिष्यथः

yuvāṁ jātyantaraṁ prāpya pūjitau balavattarau | vāhanatvaṁ mamāsādya lokān sandhārayiṣyathaḥ

तुम दोनों दूसरे जन्म को प्राप्त कर, अत्यन्त बलवान तथा पूजित होकर, मेरा वाहन बनकर लोकों को धारण करोगे।

श्लोक 28 (skanda.8.33.28)

सनत्कुमार उवाच । तत एवं तदा देवस्तावुक्त्वा देवसत्तमौ । जगाम गणपैस्सार्धं मन्दरं हेमकन्दरम्

sanatkumāra uvāca | tata evaṁ tadā devastāvuktvā devasattamau | jagāma gaṇapaissārdhaṁ mandaraṁ hemakandaram

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार उन दोनों श्रेष्ठ देवों से कहकर, भगवान अपने गणों सहित स्वर्णगुहा वाले मन्दराचल को चले गए।

श्लोक 29 (skanda.8.33.29)

गतेथ देवे सगणे कालेन बहुना ततः । मन्वन्तरेस्मिन् सुरभी रुद्रमाराधयच्छुभा

gatetha deve sagaṇe kālena bahunā tataḥ | manvantaresmin surabhī rudramārādhayacchubhā

भगवान के अपने गणों सहित चले जाने पर, बहुत समय बीतने के बाद, इसी मन्वन्तर में शुभा सुरभी ने रुद्र की आराधना की।

श्लोक 30 (skanda.8.33.30)

तया वर्षसहस्रेण तपसा तोषितो भवः । जगाम दर्शनं व्यास वरदोस्मीति चाब्रवीत्

tayā varṣasahasreṇa tapasā toṣito bhavaḥ | jagāma darśanaṁ vyāsa varadosmīti cābravīt

उसके सहस्र वर्षों के तप से प्रसन्न होकर भव उसे दर्शन देने गए और बोले - हे व्यास! मैं वर देने को तैयार हूँ।

श्लोक 31 (skanda.8.33.31)

सा वव्रे पुत्रमतुलं सर्वप्राणभृतां वरम् । पुत्राँश्चान्यान्महासत्वान् यज्ञियान् सुरसत्तमान्

sā vavre putramatulaṁ sarvaprāṇabhṛtāṁ varam | putrāṁścānyānmahāsatvān yajñiyān surasattamān

उसने सब प्राणियों में श्रेष्ठ, अनुपम पुत्र माँगा, साथ ही अन्य महाबली, यज्ञ के योग्य तथा श्रेष्ठ देव-पुत्रों को भी माँगा।

श्लोक 32 (skanda.8.33.32)

तथा दुहितॄश्चान्याश्च जगद्धात्रीः सुशोभनाः । ततः सर्वं ददौ देवो ह्यदृश्यत्वं जगाम च

tathā duhitṝścānyāśca jagaddhātrīḥ suśobhanāḥ | tataḥ sarvaṁ dadau devo hyadṛśyatvaṁ jagāma ca

और अन्य सुशोभित पुत्रियाँ भी माँगीं, जो जगत का पालन-पोषण करने वाली हों। तब भगवान ने सब कुछ प्रदान कर दिया और अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 33 (skanda.8.33.33)

तस्मिन् गते महादेवे सुरभी दीप्ततेजसम् । सर्वभूताग्रजं पुत्रं वृषभं समसूयत

tasmin gate mahādeve surabhī dīptatejasam | sarvabhūtāgrajaṁ putraṁ vṛṣabhaṁ samasūyata

महादेव के चले जाने पर, सुरभी ने प्रज्वलित तेज वाले, समस्त प्राणियों में अग्रज पुत्र वृषभ को जन्म दिया।

श्लोक 34 (skanda.8.33.34)

एकादश तथा रुद्रान् वृषभस्यानुजान् शुभान् । सप्त कन्याश्च ता गा वै जगद्धात्री प्रसूयत

ekādaśa tathā rudrān vṛṣabhasyānujān śubhān | sapta kanyāśca tā gā vai jagaddhātrī prasūyata

उस जगद्धात्री ने वृषभ के छोटे भाई ग्यारह शुभ रुद्रों को तथा सात गौरूपी कन्याओं को भी जन्म दिया।

श्लोक 35 (skanda.8.33.35)

वृषभः स तु संगत्य नित्यं प्रातः कृताह्निकः । पितरं मातरं चैव तथैव च पितामहम्

vṛṣabhaḥ sa tu saṁgatya nityaṁ prātaḥ kṛtāhnikaḥ | pitaraṁ mātaraṁ caiva tathaiva ca pitāmaham

वह वृषभ प्रतिदिन प्रातःकाल अपनी नित्यक्रिया पूर्ण कर, पिता, माता तथा पितामह के पास जाकर उन्हें प्रणाम करता था।

श्लोक 36 (skanda.8.33.36)

अभिवाद्यायते शुभ्रश्चतुर्दिग्गजसेवितम् । वनं सिद्धगणावासं यत्र सा ह्यमृतोद्भवा

abhivādyāyate śubhraścaturdiggajasevitam | vanaṁ siddhagaṇāvāsaṁ yatra sā hyamṛtodbhavā

प्रणाम करके वह श्वेत वर्ण वाला उस वन में जाता था, जो चारों दिशाओं के गजों से सेवित तथा सिद्धगणों का निवास-स्थान था, जहाँ वह अमृत से उत्पन्न (गौ) रहती थी।

श्लोक 37 (skanda.8.33.37)

दूर्वामृतरसा दिव्या छिन्नदग्धप्रसेहणी । स कदाचिद्वने तस्मिँश्चरन् तृप्तस्तृडर्द्दितः

dūrvāmṛtarasā divyā chinnadagdhaprasehaṇī | sa kadācidvane tasmiṁścaran tṛptastṛḍardditaḥ

वहाँ दिव्य दूर्वा अमृत-रस से युक्त थी, जो कटने और जलने पर भी पुनः उग आती थी। एक बार उस वन में विचरते हुए वह तृप्त होते हुए भी प्यास से पीड़ित हो गया।

श्लोक 38 (skanda.8.33.38)

जगाम सागरं पातुं वृषराट् सुरभीसुतः । सोवगाह्य महाग्रासः सागरस्य तदा महत्

jagāma sāgaraṁ pātuṁ vṛṣarāṭ surabhīsutaḥ | sovagāhya mahāgrāsaḥ sāgarasya tadā mahat

सुरभी-पुत्र वृषराज पीने के लिए समुद्र के पास गया। महान् ग्रास लेने वाले उस विशाल शरीर वाले ने समुद्र के महान् जल में प्रवेश किया।

श्लोक 39 (skanda.8.33.39)

मध्यं व्यादाय वदनं सरुषं सतिमिंगिलम् । अपिबत् सागरजलं न च तृप्तिमुपागमत्

madhyaṁ vyādāya vadanaṁ saruṣaṁ satimiṁgilam | apibat sāgarajalaṁ na ca tṛptimupāgamat

अपना मुख फैलाकर, क्रोधसहित, तिमिंगिल मछलियों समेत उसने समुद्र का जल पी लिया, फिर भी उसे तृप्ति नहीं मिली।

श्लोक 40 (skanda.8.33.40)

तस्मिन् पिबति दैत्येन्द्राः सन्नद्धाः सासिमार्गणाः । सधनुष्पाणयस्सर्वे सहस्राणि चतुर्दश

tasmin pibati daityendrāḥ sannaddhāḥ sāsimārgaṇāḥ | sadhanuṣpāṇayassarve sahasrāṇi caturdaśa

उसके इस प्रकार पीते रहने पर, चौदह हजार दैत्येन्द्र कवच धारण किए, तलवार-बाण तथा धनुष हाथों में लिए हुए (आ पहुँचे)।

श्लोक 41 (skanda.8.33.41)

निष्पेतुश्शक्रसंकाशा यमकालानलोपमाः । मयपुत्रा महासत्वा वृषभं प्रति वेगिताः

niṣpetuśśakrasaṁkāśā yamakālānalopamāḥ | mayaputrā mahāsatvā vṛṣabhaṁ prati vegitāḥ

इन्द्र के समान तेजस्वी, यमराज के कालाग्नि के सदृश, मय के महाबली पुत्र वेगपूर्वक वृषभ की ओर झपटे।

श्लोक 42 (skanda.8.33.42)

तांस्तथा रुषितान्दैत्यान् सासिमुद्गरतोमरान् । सहैव सागराम्भोभिरपिबत् स महाबलः

tāṁstathā ruṣitāndaityān sāsimudgaratomarān | sahaiva sāgarāmbhobhirapibat sa mahābalaḥ

क्रोधित उन दैत्यों को, जो तलवार, मुद्गर और तोमर लिए हुए थे, उस महाबली ने समुद्र के जल के साथ ही पी लिया।

श्लोक 43 (skanda.8.33.43)

तान् पीतान् पीयमानाँश्च दृष्टवा ह्यर्णववासिनः । वित्रेसुः सहसा सर्वे विनेदुश्चापि दुःखिताः

tān pītān pīyamānāṁśca dṛṣṭavā hyarṇavavāsinaḥ | vitresuḥ sahasā sarve vineduścāpi duḥkhitāḥ

उन दैत्यों को पिए जाते और पीये गए देखकर, समुद्र में रहने वाले सभी प्राणी सहसा भयभीत हो गए और दुःखी होकर चिल्लाने लगे।

श्लोक 44 (skanda.8.33.44)

ततस्समुद्रो भगवान् पीयमानः सुदुःखितः । वडवामुखमागत्य संवर्तं शरणं ययौ

tatassamudro bhagavān pīyamānaḥ suduḥkhitaḥ | vaḍavāmukhamāgatya saṁvartaṁ śaraṇaṁ yayau

तब पान किए जाते हुए अत्यन्त दुःखी भगवान समुद्र, वडवामुख में स्थित संवर्तक अग्नि की शरण में गया।

श्लोक 45 (skanda.8.33.45)

स चानलः सुसंरब्धो दत्त्वा तस्य महाबलः । अभयं वृषमागत्य प्रोवाचेदं कृताञ्जलिः

sa cānalaḥ susaṁrabdho dattvā tasya mahābalaḥ | abhayaṁ vṛṣamāgatya provācedaṁ kṛtāñjaliḥ

अत्यन्त क्रोधित उस महाबली अग्नि ने समुद्र को अभयदान देकर, वृषभ के पास आकर हाथ जोड़कर यह कहा।

श्लोक 46 (skanda.8.33.46)

संवर्त्त उवाच । सर्वभूतशरण्योयं दैत्यानाञ्चालयः शुभः । नैनं हीनं भवानद्भिः कर्तुमर्हति वीर्यवान्

saṁvartta uvāca | sarvabhūtaśaraṇyoyaṁ daityānāñcālayaḥ śubhaḥ | nainaṁ hīnaṁ bhavānadbhiḥ kartumarhati vīryavān

संवर्तक ने कहा - यह समुद्र सब प्राणियों का शरण-स्थान तथा दैत्यों का शुभ आलय है। हे वीर्यवान! आपको इसे जल से रहित नहीं करना चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.8.33.47)

वृषभ उवाच । न मे मतिरभूदग्ने निःशेषं कर्तुमम्बुधिम् । भवान् त्वस्य ये यतो मन्ता न करिष्येहं ततोद्यवै

vṛṣabha uvāca | na me matirabhūdagne niḥśeṣaṁ kartumambudhim | bhavān tvasya ye yato mantā na kariṣyehaṁ tatodyavai

वृषभ ने कहा - हे अग्ने! समुद्र को पूर्णतः रिक्त करने का मेरा विचार नहीं था। यदि आप इसके रक्षक हैं, तो मैं आज से ऐसा नहीं करूँगा।

श्लोक 48 (skanda.8.33.48)

यस्ते दर्पश्च गर्वश्च यद्बलं यच्च पौरुषम् । तन्मे दर्शय हव्येश पिबाम्येनं तवाग्रतः

yaste darpaśca garvaśca yadbalaṁ yacca pauruṣam | tanme darśaya havyeśa pibāmyenaṁ tavāgrataḥ

किन्तु हे हव्यवाहन! जो तुम्हारा दर्प, गर्व, बल और पौरुष है, वह मुझे दिखाओ; मैं तुम्हारे सामने ही इसे पी जाऊँगा।

श्लोक 49 (skanda.8.33.49)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्त्वा वृषेन्द्रस्तु वडवामुखवासिनम् । संरम्भात् सागरं पातुं निःशेषमुपचक्रमे

sanatkumāra uvāca | evamuktvā vṛṣendrastu vaḍavāmukhavāsinam | saṁrambhāt sāgaraṁ pātuṁ niḥśeṣamupacakrame

सनत्कुमार बोले - ऐसा कहकर वृषेन्द्र वडवामुख-निवासी अग्नि के प्रति क्रोध से समुद्र को पूर्णतः पी डालने के लिए उद्यत हो गया।

श्लोक 50 (skanda.8.33.50)

अनल उवाच । न मे त्वं प्रतिमः शक्तौ न च वैरं त्वया हि मे । यत्र कृत्येहमाबद्धस्तत्करिष्ये तथा ह्यहम्

anala uvāca | na me tvaṁ pratimaḥ śaktau na ca vairaṁ tvayā hi me | yatra kṛtyehamābaddhastatkariṣye tathā hyaham

अग्नि ने कहा - शक्ति में तुम मेरी बराबरी नहीं कर सकते, और मेरा तुमसे कोई वैर भी नहीं है; परन्तु जिस कर्तव्य में मैं बँधा हूँ, वही मैं अवश्य करूँगा।

श्लोक 51 (skanda.8.33.51)

न त्वं पास्यसि रक्षिष्ये सागरं मम सन्निधौ । अहं त्वां वारयिष्यामि सुरभीसुत कत्थन

na tvaṁ pāsyasi rakṣiṣye sāgaraṁ mama sannidhau | ahaṁ tvāṁ vārayiṣyāmi surabhīsuta katthana

हे सुरभी-पुत्र! तुम इसे नहीं पी सकोगे, मैं अपनी उपस्थिति में समुद्र की रक्षा करूँगा। तुम्हारी डींग मैं ही रोकूँगा।

श्लोक 52 (skanda.8.33.52)

सनत्कुमार उवाच । ततस्तं भगवान् वह्निरुपप्लुत्य महाद्युतिः । गले जग्राह बलवान् न चचाल ततः स च

sanatkumāra uvāca | tatastaṁ bhagavān vahnirupaplutya mahādyutiḥ | gale jagrāha balavān na cacāla tataḥ sa ca

सनत्कुमार बोले - तब उस महातेजस्वी बलवान भगवान अग्नि ने उछलकर उसके गले को पकड़ लिया, फिर भी वह टस से मस नहीं हुआ।

श्लोक 53 (skanda.8.33.53)

यत् पीतं छर्दयामास तत्तोयं दानवैर्विना । औदरेणाग्निना तस्य ते दग्धाः सर्व एव हि

yat pītaṁ chardayāmāsa tattoyaṁ dānavairvinā | audareṇāgninā tasya te dagdhāḥ sarva eva hi

जो जल उसने पिया था, वह उसने दानवों को छोड़कर उगल दिया; उसके उदर की अग्नि से वे सब दानव जल गए थे।

श्लोक 54 (skanda.8.33.54)

सनत्कुमार उवाच । ततः संवर्तको वह्निर्निगृहीतं ककुद्मिनम् । विसृज्योवाच गच्छेति न त्वां हन्मि वृषेश्वर

sanatkumāra uvāca | tataḥ saṁvartako vahnirnigṛhītaṁ kakudminam | visṛjyovāca gaccheti na tvāṁ hanmi vṛṣeśvara

सनत्कुमार बोले - तब संवर्तक अग्नि ने पकड़े हुए उस वृषभ को छोड़कर कहा - जाओ, हे वृषेश्वर! मैं तुम्हें नहीं मारूँगा।

श्लोक 55 (skanda.8.33.55)

शक्तस्तवाहं दहने ह्यशक्तो मे भवान् वधे । तथाप्यहं न गर्जामि गर्जितैः किं बलीयसाम्

śaktastavāhaṁ dahane hyaśakto me bhavān vadhe | tathāpyahaṁ na garjāmi garjitaiḥ kiṁ balīyasām

मैं तुम्हें जलाने में समर्थ हूँ, परन्तु तुम मुझे मारने में असमर्थ हो; फिर भी मैं गर्जना नहीं करता, क्योंकि बलवानों को गर्जना से क्या लाभ?

श्लोक 56 (skanda.8.33.56)

सनत्कुमार उवाच । विसृज्य वृषभं वह्निराशु यातः स्वमालयम् । वृषभोपि जगामेव दुःखशोकाभिसंवृतः

sanatkumāra uvāca | visṛjya vṛṣabhaṁ vahnirāśu yātaḥ svamālayam | vṛṣabhopi jagāmeva duḥkhaśokābhisaṁvṛtaḥ

सनत्कुमार बोले - वृषभ को छोड़कर अग्नि शीघ्र ही अपने स्थान को चला गया। वृषभ भी दुःख और शोक से घिरा हुआ वहाँ से चला गया।

श्लोक 57 (skanda.8.33.57)

सोवमानेन तेजस्वी महोक्षः सुरभीसुतः । दुःखेन चाभिसन्नात्मा जगामैवं विचिन्तयन्

sovamānena tejasvī mahokṣaḥ surabhīsutaḥ | duḥkhena cābhisannātmā jagāmaivaṁ vicintayan

अपमानित हुआ वह तेजस्वी, सुरभी-पुत्र महान् वृषभ, दुःख से खिन्न मन होकर इस प्रकार विचार करते हुए चला।

श्लोक 58 (skanda.8.33.58)

अबलोहं बली वह्निर्येनाहं निकृतस्तथा । जीवितेशेन भूत्वा च नाहं प्राणैर्वियोजितः

abalohaṁ balī vahniryenāhaṁ nikṛtastathā | jīviteśena bhūtvā ca nāhaṁ prāṇairviyojitaḥ

मैं दुर्बल हूँ, अग्नि बलवान है, जिसने मुझे इस प्रकार तिरस्कृत किया; मेरे जीवन का स्वामी होकर भी उसने मुझे प्राणों से वियुक्त नहीं किया।

श्लोक 59 (skanda.8.33.59)

मोघं मम बल सर्वं तथा चैवाभिगर्जितम् । शरज्जलधरस्येव विहीनस्याद्भिरम्बरे

moghaṁ mama bala sarvaṁ tathā caivābhigarjitam | śarajjaladharasyeva vihīnasyādbhirambare

मेरा सारा बल तथा गर्जन व्यर्थ हो गया, जैसे शरद ऋतु के आकाश में जल से रहित मेघ व्यर्थ होता है।

श्लोक 60 (skanda.8.33.60)

अद्य प्राणानहं त्यक्ष्ये नियतो व्रतमास्थितः । यथा न पुनरेवं मे मानभङ्गो भविष्यति

adya prāṇānahaṁ tyakṣye niyato vratamāsthitaḥ | yathā na punarevaṁ me mānabhaṅgo bhaviṣyati

आज मैं संयमपूर्वक व्रत धारण कर अपने प्राण त्याग दूँगा, जिससे मेरा ऐसा मानभंग पुनः न हो।

श्लोक 61 (skanda.8.33.61)

शत्रुणा निगृहीतस्य दुर्बलस्य दुरात्मनः । जीवितान्मरणं मन्ये विशिष्टं जीवितेन किम्

śatruṇā nigṛhītasya durbalasya durātmanaḥ | jīvitānmaraṇaṁ manye viśiṣṭaṁ jīvitena kim

शत्रु द्वारा पकड़े गए दुर्बल तथा दुरात्मा के लिए, मैं जीवन से मरण को ही श्रेष्ठ मानता हूँ; ऐसे जीवन से क्या लाभ?

श्लोक 62 (skanda.8.33.62)

सनत्कुमार उवाच । स एवं चिन्तयन्नुक्षा वाचं शुश्राव खाच्छुभाम् । सौरभेय न भेतव्यं यद् ब्रवीमि कुरुष्व तत्

sanatkumāra uvāca | sa evaṁ cintayannukṣā vācaṁ śuśrāva khācchubhām | saurabheya na bhetavyaṁ yad bravīmi kuruṣva tat

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार विचार करते हुए उस वृषभ ने आकाशवाणी सुनी - हे सौरभेय! भयभीत मत हो, जो मैं कहता हूँ वही करो।

श्लोक 63 (skanda.8.33.63)

रुद्रं सर्वसुरेशानं सर्वेभ्यो बलवत्तरम् । तं प्रपद्यस्व देवेशं ततो जेष्यसि पावकम्

rudraṁ sarvasureśānaṁ sarvebhyo balavattaram | taṁ prapadyasva deveśaṁ tato jeṣyasi pāvakam

सब देवों के स्वामी, सबसे अधिक बलवान रुद्र की शरण लो; उस देवेश की शरण में जाकर ही तुम अग्नि पर विजय पाओगे।

श्लोक 64 (skanda.8.33.64)

स स्रष्टा सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां न संशयः । स ते दुःखमिदं सर्वं व्यपनेष्यति भो वृष

sa sraṣṭā sarvabhūtānāṁ brahmādīnāṁ na saṁśayaḥ | sa te duḥkhamidaṁ sarvaṁ vyapaneṣyati bho vṛṣa

वह ब्रह्मा आदि सहित समस्त प्राणियों का स्रष्टा है, इसमें संशय नहीं। हे वृष! वही तुम्हारे इस समस्त दुःख को दूर करेगा।

श्लोक 65 (skanda.8.33.65)

सनत्कुमार उवाच । एतच्छ्रुत्वा महातेजाः साध्यस्य सुमहात्मनः । हिमवन्तं गिरिं प्राप्य तताप विपुलं तपः

sanatkumāra uvāca | etacchrutvā mahātejāḥ sādhyasya sumahātmanaḥ | himavantaṁ giriṁ prāpya tatāpa vipulaṁ tapaḥ

सनत्कुमार बोले - उस महान् साध्य की यह वाणी सुनकर वह महातेजस्वी हिमालय पर्वत पर जाकर विपुल तप करने लगा।

श्लोक 66 (skanda.8.33.66)

तस्य वर्षसहस्रेण तत्परस्य तदाशिषः । भगवान् सर्वभूतेशः साम्बः सगण ऊचिवान्

tasya varṣasahasreṇa tatparasya tadāśiṣaḥ | bhagavān sarvabhūteśaḥ sāmbaḥ sagaṇa ūcivān

उसके हज़ार वर्षों तक उस वर के लिए तत्पर तप से प्रसन्न होकर, समस्त प्राणियों के स्वामी, अम्बा-सहित भगवान अपने गणों सहित बोले।

श्लोक 67 (skanda.8.33.67)

देवदेव उवाच । सौरभेय महाभाग तुष्टोस्मि तव पुत्रक । इष्टान् ब्रूहि वरान् वत्स दास्ये तान् सुबहूनपि

devadeva uvāca | saurabheya mahābhāga tuṣṭosmi tava putraka | iṣṭān brūhi varān vatsa dāsye tān subahūnapi

देवदेव ने कहा - हे महाभाग सौरभेय पुत्र! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; हे वत्स! अपने अभीष्ट वर माँगो, मैं उन्हें प्रचुर मात्रा में भी दूँगा।

श्लोक 68 (skanda.8.33.68)

सनत्कुमार उवाच । ततस्स देवं संदृश्य साम्बं सगणमीश्वरम् । प्रणम्य शिरसा पादौ प्राञ्जलिस्सुसमाहितः

sanatkumāra uvāca | tatassa devaṁ saṁdṛśya sāmbaṁ sagaṇamīśvaram | praṇamya śirasā pādau prāñjalissusamāhitaḥ

सनत्कुमार बोले - तब वह अम्बा-सहित तथा गणों सहित ईश्वर देव को देखकर, सिर से उनके चरणों में प्रणाम कर, हाथ जोड़कर, एकाग्रचित्त होकर बोला।

श्लोक 69 (skanda.8.33.69)

भूयो भूयो निरीक्ष्यैनं प्रणम्य च पुनः पुनः । उवाच तपसोक्षय्यमिच्छेयं वै जगत्पते

bhūyo bhūyo nirīkṣyainaṁ praṇamya ca punaḥ punaḥ | uvāca tapasokṣayyamiccheyaṁ vai jagatpate

बार-बार उन्हें देखकर और बार-बार प्रणाम करके उसने कहा - हे जगत्पते! मैं अपने तप का अक्षय फल चाहता हूँ।

श्लोक 70 (skanda.8.33.70)

बलञ्चानुत्तमं देव योगैश्वर्यन्तथाक्षयम् । त्वदीयो वाहनश्चाहमग्निनैवं विमानितः

balañcānuttamaṁ deva yogaiśvaryantathākṣayam | tvadīyo vāhanaścāhamagninaivaṁ vimānitaḥ

हे देव! मुझे सर्वोत्तम बल तथा अक्षय योगैश्वर्य चाहिए। मैं आपका वाहन बनना चाहता हूँ, क्योंकि अग्नि ने मेरा इस प्रकार अपमान किया है।

श्लोक 71 (skanda.8.33.71)

संवर्त्तकानलञ्चैव वडवामुखवासिनम् । द्रष्टुमिच्छामि देवेश निगृहीतं त्वयाव्यय

saṁvarttakānalañcaiva vaḍavāmukhavāsinam | draṣṭumicchāmi deveśa nigṛhītaṁ tvayāvyaya

हे देवेश! हे अव्यय! मैं वडवामुख-निवासी संवर्तक अग्नि को आपके द्वारा पराजित हुआ देखना चाहता हूँ।

श्लोक 72 (skanda.8.33.72)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तस्तु तान्दत्त्वा वरान् सत्यवतीसुत । वामं पार्श्वं तथा मृज्य रुद्रमेकं ससर्ज ह

sanatkumāra uvāca | evamuktastu tāndattvā varān satyavatīsuta | vāmaṁ pārśvaṁ tathā mṛjya rudramekaṁ sasarja ha

सनत्कुमार बोले - हे सत्यवती-पुत्र! ऐसा कहे जाने पर उसे वे वर देकर, अपने वाम पार्श्व को स्पर्श कर, भगवान ने एक रुद्र को उत्पन्न किया।

श्लोक 73 (skanda.8.33.73)

किरीटमालिनं त्र्यक्षं कुण्डलाङ्गदभूषणम् । महोरस्कं कबचिनं धनुर्हस्तं महाबलम् । बद्धगोधाङ्गुलित्रं च खङ्गदिव्यास्त्रधारिणम्

kirīṭamālinaṁ tryakṣaṁ kuṇḍalāṅgadabhūṣaṇam | mahoraskaṁ kabacinaṁ dhanurhastaṁ mahābalam | baddhagodhāṅgulitraṁ ca khaṅgadivyāstradhāriṇam

मुकुट और माला से सुशोभित, तीन नेत्रों वाला, कुण्डल तथा बाजूबंद से भूषित, विशाल वक्षस्थल वाला, कवचधारी, हाथ में धनुष लिए हुए महाबली, गोधा की अँगुलित्राण बाँधे हुए, तलवार तथा दिव्य अस्त्र धारण करने वाला।

श्लोक 74 (skanda.8.33.74)

तमाह रुद्रं गच्छेति वडवामुखवासिनम् । संवर्त्तकानलं बद्ध्वा विस्फुरन्तमिहानय

tamāha rudraṁ gaccheti vaḍavāmukhavāsinam | saṁvarttakānalaṁ baddhvā visphurantamihānaya

उन्होंने उस रुद्र से कहा - जाओ, और वडवामुख-निवासी, धधकते हुए संवर्तक अग्नि को बाँधकर यहाँ ले आओ।

श्लोक 75 (skanda.8.33.75)

सनत्कुमार उवाच । वन्दित्वा चरणौ तस्य सोमस्य गणनायकः । जगाम सागरं वेगाद् ददर्श च हुताशनम्

sanatkumāra uvāca | vanditvā caraṇau tasya somasya gaṇanāyakaḥ | jagāma sāgaraṁ vegād dadarśa ca hutāśanam

सनत्कुमार बोले - उस चन्द्रशेखर के चरणों की वन्दना कर, वह गणनायक वेग से समुद्र की ओर गया और अग्नि को देखा।

श्लोक 76 (skanda.8.33.76)

स युद्धं बलवत् कृत्वा सुघोरं लोमहर्षणम् । संवर्त्तकानलं बद्ध्वा देवपार्श्वमुपानयत्

sa yuddhaṁ balavat kṛtvā sughoraṁ lomaharṣaṇam | saṁvarttakānalaṁ baddhvā devapārśvamupānayat

अत्यन्त बलवान तथा रोमांचकारी घोर युद्ध करके उसने संवर्तक अग्नि को बाँध लिया और देवता के समीप ले आया।

श्लोक 77 (skanda.8.33.77)

व्यास उवाच । कीदृक् तद्युद्धमभवत् विट्पतेः पावकस्य च । एतदिच्छामि विज्ञातुं वद त्वं वदतां वर

vyāsa uvāca | kīdṛk tadyuddhamabhavat viṭpateḥ pāvakasya ca | etadicchāmi vijñātuṁ vada tvaṁ vadatāṁ vara

व्यास ने कहा - उस वैश्यपति और अग्नि का वह युद्ध कैसा हुआ? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! यह मैं जानना चाहता हूँ, कहिए।

श्लोक 78 (skanda.8.33.78)

सनत्कुमार उवाच । स गत्वा गणपः क्रुद्धः संवर्त्तकमथानलम् । उवाच क्रोधरक्ताक्षस्तदा वचनमर्थवत्

sanatkumāra uvāca | sa gatvā gaṇapaḥ kruddhaḥ saṁvarttakamathānalam | uvāca krodharaktākṣastadā vacanamarthavat

सनत्कुमार बोले - वह गणपति क्रोधित होकर संवर्तक अग्नि के पास गया और क्रोध से लाल नेत्रों वाले उसने तब सारगर्भित वचन कहा।

श्लोक 79 (skanda.8.33.79)

गणप उवाच । स्वामी सर्वस्य जगतो देवश्चन्द्रार्धभूषणः । आज्ञापयति वह्ने त्वां वृषमेनं प्रसादय

gaṇapa uvāca | svāmī sarvasya jagato devaścandrārdhabhūṣaṇaḥ | ājñāpayati vahne tvāṁ vṛṣamenaṁ prasādaya

गणप ने कहा - हे अग्ने! समस्त जगत के स्वामी, अर्धचन्द्र से भूषित देव तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इस वृषभ को प्रसन्न करो।

श्लोक 80 (skanda.8.33.80)

प्रणातोस्मीति तं ब्रूहि वृषभं ससुहृज्जनः । निदेशे तिष्ठ चैवास्य यत् कर्तव्यं च तत्कुरु

praṇātosmīti taṁ brūhi vṛṣabhaṁ sasuhṛjjanaḥ | nideśe tiṣṭha caivāsya yat kartavyaṁ ca tatkuru

'मैं नत हूँ' -- ऐसा कहो उस वृषभ से, उसके मित्रजनों सहित, और उसके निर्देश में रहो, तथा जो करणीय है वह करो।

श्लोक 81 (skanda.8.33.81)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तोनलः श्रुत्वा देवदेवस्य तद्वचः । उवाच नातिसंहष्टस्त्विदं वचनमर्थवत्

sanatkumāra uvāca | evamuktonalaḥ śrutvā devadevasya tadvacaḥ | uvāca nātisaṁhaṣṭastvidaṁ vacanamarthavat

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार कहे जाने पर, देवदेव का वह वचन सुनकर, अग्नि ने अत्यन्त प्रसन्न न होते हुए भी यह सारगर्भित वचन कहा।

श्लोक 82 (skanda.8.33.82)

अनल उवाच । नियोज्यो देवदेवस्य तस्यैवाहं सदानुगः । न च मां स नियुक्त्वेह योक्ष्यतेन्यत्र कर्हिचित्

anala uvāca | niyojyo devadevasya tasyaivāhaṁ sadānugaḥ | na ca māṁ sa niyuktveha yokṣyatenyatra karhicit

अग्नि ने कहा - मैं सदा उन्हीं देवदेव का अनुगामी और उन्हीं के द्वारा नियुक्त होने वाला हूँ; वे मुझे यहाँ नियुक्त किए बिना कहीं अन्यत्र कभी नहीं लगाएँगे।

श्लोक 83 (skanda.8.33.83)

गच्छ मद्वचनाद् ब्रूहि भगवन्तं त्रिलोचनम् । यदि मां वक्ष्यति पुनः करिष्येहं ततस्तथा

gaccha madvacanād brūhi bhagavantaṁ trilocanam | yadi māṁ vakṣyati punaḥ kariṣyehaṁ tatastathā

जाओ, मेरी ओर से त्रिलोचन भगवान से कहो; यदि वे स्वयं मुझसे पुनः कहेंगे, तो मैं वैसा ही करूँगा।

श्लोक 84 (skanda.8.33.84)

गणेश्वर उवाच । बालिशा वत ये प्राज्ञा बलज्ञानबहिष्कृताः । त एवमुक्ता गच्छन्ति यथा मां त्वं प्रभाषसे

gaṇeśvara uvāca | bāliśā vata ye prājñā balajñānabahiṣkṛtāḥ | ta evamuktā gacchanti yathā māṁ tvaṁ prabhāṣase

गणेश्वर ने कहा - अफसोस! जो बुद्धिमान होकर भी बल के ज्ञान से रहित हैं, वे बालक के समान होते हैं; ऐसा कहे जाने पर वे वैसे ही चले जाते हैं जैसे तुम मुझसे कह रहे हो।

श्लोक 85 (skanda.8.33.85)

सकृदाज्ञा बलवतां सकृत् प्रभवतामपि । दूतश्चापि स वै श्रेष्ठो यो भवेदर्थसाधकः

sakṛdājñā balavatāṁ sakṛt prabhavatāmapi | dūtaścāpi sa vai śreṣṭho yo bhavedarthasādhakaḥ

बलवानों की आज्ञा एक ही बार होती है, समर्थ पुरुषों की भी एक ही बार। और वही दूत श्रेष्ठ होता है, जो कार्यसिद्धि करने वाला हो।

श्लोक 86 (skanda.8.33.86)

सोहं बलवता तेन लोककर्त्रा पिनाकिना । दूतः सर्वार्थसिद्ध्यर्थं प्रहितो बलवानिह

sohaṁ balavatā tena lokakartrā pinākinā | dūtaḥ sarvārthasiddhyarthaṁ prahito balavāniha

मैं, वह बलवान दूत, उन्हीं शक्तिशाली, लोक-निर्माता पिनाकधारी द्वारा यहाँ सब कार्यों की सिद्धि के लिए भेजा गया हूँ।

श्लोक 87 (skanda.8.33.87)

न चेद्वचो मे कर्तासि बद्ध्वा त्वाहन्ततोद्य वै । विस्फुरन्तं महापाशैर्नेष्यामि द्युभृतोन्तिकम्

na cedvaco me kartāsi baddhvā tvāhantatodya vai | visphurantaṁ mahāpāśairneṣyāmi dyubhṛtontikam

यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे, तो आज ही महापाशों से बाँधकर, धधकते हुए तुम्हें, स्वर्ग को धारण करने वाले भगवान के समीप ले जाऊँगा।

श्लोक 88 (skanda.8.33.88)

सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तस्तेजस्वी क्रोधदीप्तानलेक्षणः । गणपं प्रति दुद्राव तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्

sanatkumāra uvāca | sa evamuktastejasvī krodhadīptānalekṣaṇaḥ | gaṇapaṁ prati dudrāva tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

सनत्कुमार बोले - इस प्रकार कहे जाने पर, वह तेजस्वी, क्रोध से प्रज्वलित नेत्रों वाला अग्नि, गणप की ओर दौड़ पड़ा और 'ठहरो, ठहरो' कहने लगा।

श्लोक 89 (skanda.8.33.89)

तमापतन्तं वेगेन पर्जन्यास्त्रेण सोस्त्रवित् । ताडयामास बलवान् स प्रजज्वाल वेगवान्

tamāpatantaṁ vegena parjanyāstreṇa sostravit | tāḍayāmāsa balavān sa prajajvāla vegavān

वेग से आते हुए उसे उसने पर्जन्यास्त्र से भिगो दिया; उस बलवान ने उसे प्रहार किया और वह वेगवान अग्नि प्रज्वलित हो उठा।

श्लोक 90 (skanda.8.33.90)

ज्वलन्तं तं तदाभ्यासमागतं क्रोधमूच्छितम् । अशन्यस्त्रेण महता स जघान स्तनान्तरे

jvalantaṁ taṁ tadābhyāsamāgataṁ krodhamūcchitam | aśanyastreṇa mahatā sa jaghāna stanāntare

उस धधकते हुए, समीप आए हुए, क्रोध से मूर्च्छित अग्नि को, उसने महान अशनि अस्त्र से उसके वक्षस्थल पर प्रहार किया।

श्लोक 91 (skanda.8.33.91)

अभ्याहतस्ततोस्त्रेण वेगवानपि मूर्च्छितः । तस्थौ मुहूर्त्तं संविग्नो विधूमो दहनेश्वरः

abhyāhatastatostreṇa vegavānapi mūrcchitaḥ | tasthau muhūrttaṁ saṁvigno vidhūmo dahaneśvaraḥ

उस अस्त्र से आहत होकर, वेगवान होते हुए भी अग्नि मूर्च्छित हो गया और घबराया हुआ, धूमरहित होकर वह क्षणभर के लिए स्थिर हो गया।

श्लोक 92 (skanda.8.33.92)

ततस्तं रुद्रपाशेन बबन्ध करयोस्तदा । विस्फुरन्तं महावह्निं गणपः क्रोधमूर्छितः

tatastaṁ rudrapāśena babandha karayostadā | visphurantaṁ mahāvahniṁ gaṇapaḥ krodhamūrchitaḥ

तब क्रोध से मूर्च्छित उस गणप ने रुद्र-पाश से उस धधकते हुए महान अग्नि को दोनों हाथों से बाँध लिया।

श्लोक 93 (skanda.8.33.93)

तं बद्धं पाशवर्येण पतितं वीक्ष्य चैव हि । तस्य पुत्रसुहृद्वर्गा विविधायुधपाणयः

taṁ baddhaṁ pāśavaryeṇa patitaṁ vīkṣya caiva hi | tasya putrasuhṛdvargā vividhāyudhapāṇayaḥ

उस श्रेष्ठ पाश से बाँधे गए तथा गिरे हुए अग्नि को देखकर, उसके पुत्र और मित्रगण विविध शस्त्र हाथों में लिए हुए (आ पहुँचे)।

श्लोक 94 (skanda.8.33.94)

दुद्रुवुर्गणपं क्रुद्धाः शतशोथ सहस्रशः । तानप्यसौ विनिर्जित्य गणपस्तं हुताशनम्

dudruvurgaṇapaṁ kruddhāḥ śataśotha sahasraśaḥ | tānapyasau vinirjitya gaṇapastaṁ hutāśanam

वे सैकड़ों तथा हजारों की संख्या में क्रोधित होकर गणप की ओर दौड़े; परन्तु गणप ने उन्हें भी परास्त कर, उस अग्नि को आगे ले चला।

श्लोक 95 (skanda.8.33.95)

उपनिन्ये हरायाशु पशुं मेध्यमिवाध्वरे । तमानीतं महादेवः संप्रेक्ष्यार्णवभोजनम्

upaninye harāyāśu paśuṁ medhyamivādhvare | tamānītaṁ mahādevaḥ saṁprekṣyārṇavabhojanam

यज्ञ में मेध्य पशु की भाँति उसे शीघ्र ही हर के समीप ले गया। महादेव ने समुद्र-भक्षी उस लाए गए अग्नि को देखकर।

श्लोक 96 (skanda.8.33.96)

उवाच वृषभं ब्रूहि किमस्य क्रियतामिति । स तं कृपणमालक्ष्य महोक्षा दीनचेतसम्

uvāca vṛṣabhaṁ brūhi kimasya kriyatāmiti | sa taṁ kṛpaṇamālakṣya mahokṣā dīnacetasam

वृषभ से कहा - बताओ, इसके साथ क्या किया जाए। उस महाबली वृषभ ने उस दीनचित्त, दयनीय अग्नि को देखकर।

श्लोक 97 (skanda.8.33.97)

प्रणम्य शिरसा पादाविदमाह कृताञ्जलिः । भगवन् देवदेवेश सर्वलोकमहेश्वर

praṇamya śirasā pādāvidamāha kṛtāñjaliḥ | bhagavan devadeveśa sarvalokamaheśvara

सिर से चरणों में प्रणाम कर, हाथ जोड़कर यह कहा - हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे सर्वलोकमहेश्वर!

श्लोक 98 (skanda.8.33.98)

दृष्टमेतत्तव विभो माहात्म्यं सदसस्पते । दृष्टोयं कृपणश्चापि ह्यबलश्च महाबल

dṛṣṭametattava vibho māhātmyaṁ sadasaspate | dṛṣṭoyaṁ kṛpaṇaścāpi hyabalaśca mahābala

हे प्रभो! हे सभा के स्वामी! आपकी यह महिमा मैंने देख ली है। हे महाबली! इसे भी मैंने अत्यन्त दीन और निर्बल देखा है।

श्लोक 99 (skanda.8.33.99)

विसृज्यतां सुरश्रेष्ठ हत एष न संशयः । पुत्रा ह्यस्य हताः सर्वे सुहृदश्चैव सर्वशः

visṛjyatāṁ suraśreṣṭha hata eṣa na saṁśayaḥ | putrā hyasya hatāḥ sarve suhṛdaścaiva sarvaśaḥ

हे देवश्रेष्ठ! इसे छोड़ दिया जाए, यह तो पहले ही पराजित हो चुका है, इसमें संदेह नहीं। इसके सभी पुत्र और सभी मित्र मारे जा चुके हैं।

श्लोक 100 (skanda.8.33.100)

दीनस्यास्य न मे देव वध इष्टो विमुच्यताम् । एतद्वचो महेशो वै वृषभस्याभिभाषितम्

dīnasyāsya na me deva vadha iṣṭo vimucyatām | etadvaco maheśo vai vṛṣabhasyābhibhāṣitam

हे देव! मैं इस दीन के वध की इच्छा नहीं रखता, इसे मुक्त कर दिया जाए। महेश ने वृषभ के इस वचन को सुना।

श्लोक 101 (skanda.8.33.101)

श्रुत्वा तुष्टः प्रहस्यैनं दहनं व्यसृजत् तदा । रुद्रं तञ्च जराशोकजन्ममृत्युविर्जितम्

śrutvā tuṣṭaḥ prahasyainaṁ dahanaṁ vyasṛjat tadā | rudraṁ tañca jarāśokajanmamṛtyuvirjitam

सुनकर प्रसन्न होकर, हँसते हुए उन्होंने उस अग्नि को छोड़ दिया, और उस रुद्र को जरा, शोक, जन्म तथा मृत्यु से रहित कर दिया।

श्लोक 102 (skanda.8.33.102)

गणेश्वरपतिं कृत्वा द्वीपमस्मै ददत् प्रभुः । मनोरमणमित्येव नाम्ना ख्यातं महर्द्धिमत्

gaṇeśvarapatiṁ kṛtvā dvīpamasmai dadat prabhuḥ | manoramaṇamityeva nāmnā khyātaṁ maharddhimat

उसे गणेश्वरों का स्वामी बनाकर, प्रभु ने उसे 'मनोरमण' नामक विख्यात एवं महान ऋद्धि वाला द्वीप प्रदान किया।

श्लोक 103 (skanda.8.33.103)

दिव्यं कामगमं व्यास भवनैरुपशोभितम् । जाम्बूनदमयैः शुभ्रैः सर्वकामसमन्वितैः

divyaṁ kāmagamaṁ vyāsa bhavanairupaśobhitam | jāmbūnadamayaiḥ śubhraiḥ sarvakāmasamanvitaiḥ

हे व्यास! वह दिव्य, इच्छानुसार गमन करने वाला द्वीप, स्वर्णमय, शुभ्र भवनों से सुशोभित तथा समस्त कामनाओं से युक्त था।

श्लोक 104 (skanda.8.33.104)

तस्मिन् काले तदा देवाः सर्वे ब्रह्मपुरस्सराः । देवदेवं समागम्य वाक्यमूचुर्यथार्थवत्

tasmin kāle tadā devāḥ sarve brahmapurassarāḥ | devadevaṁ samāgamya vākyamūcuryathārthavat

उसी समय ब्रह्मा को आगे कर सभी देवगण देवदेव के पास आकर यथार्थ वचन कहने लगे।

श्लोक 105 (skanda.8.33.105)

भगवन् देवतारिघ्न वृषोयं देवसत्तम । त्वया ह्यध्यासितः पूर्वं नादेनापूरयद्बली

bhagavan devatārighna vṛṣoyaṁ devasattama | tvayā hyadhyāsitaḥ pūrvaṁ nādenāpūrayadbalī

हे देवताओं के शत्रुओं के संहारक भगवान्! हे देवश्रेष्ठ! यह वृषभ, जिस पर पहले आप विराजमान हुए थे, अपनी बलवती गर्जना से सब कुछ भर देता था।

श्लोक 106 (skanda.8.33.106)

त्रैलोक्यमखिलं दर्पादस्वस्थं कृतवान् प्रभो । वेगेन च दिशः सर्वा विमानैः सह भूतप

trailokyamakhilaṁ darpādasvasthaṁ kṛtavān prabho | vegena ca diśaḥ sarvā vimānaiḥ saha bhūtapa

हे प्रभो! उसने अपने दर्प से समस्त त्रिलोक को अस्वस्थ कर दिया था। हे भूतपते! अपने वेग से विमानों सहित सब दिशाओं को व्याकुल कर दिया।

श्लोक 107 (skanda.8.33.107)

भ्रामयन् त्रिदशान् नादाद् गगने संचचार ह । अधुना वरलब्धश्च अस्मान् भूयस्तथैव च

bhrāmayan tridaśān nādād gagane saṁcacāra ha | adhunā varalabdhaśca asmān bhūyastathaiva ca

देवताओं को घुमाते हुए, अपनी गर्जना से वह आकाश में विचरता रहा। अब वर पाकर वह पुनः हमें भी उसी प्रकार सताएगा।

श्लोक 108 (skanda.8.33.108)

यथा न कुरुते देव उपायः स विधीयताम् । त्वन्नो गतिश्च देवेश शरणं चैव भूतप । सदा भयाभिभूतानां त्वं त्राता सर्वशः प्रभो

yathā na kurute deva upāyaḥ sa vidhīyatām | tvanno gatiśca deveśa śaraṇaṁ caiva bhūtapa | sadā bhayābhibhūtānāṁ tvaṁ trātā sarvaśaḥ prabho

हे देव! ऐसा उपाय किया जाए कि वह ऐसा न करे। हे देवेश! हे भूतपते! आप ही हमारी गति और शरण हैं। हे प्रभो! भय से पीड़ितों के आप सदा सर्वथा रक्षक हैं।

श्लोक 109 (skanda.8.33.109)

देवदेव उवाच । यथा भयं न भवति यथा स्वस्थाश्च नित्यशः । लोका भवन्ति सर्वे वै तथाहं विदधामि वः

devadeva uvāca | yathā bhayaṁ na bhavati yathā svasthāśca nityaśaḥ | lokā bhavanti sarve vai tathāhaṁ vidadhāmi vaḥ

देवदेव ने कहा - जिस प्रकार भय न हो, जिस प्रकार सभी लोक सदा स्वस्थ रहें, उसी प्रकार मैं तुम्हारे लिए व्यवस्था करता हूँ।

श्लोक 110 (skanda.8.33.110)

सनत्कुमार उवाच । ततस्स भगवान् व्यास देवदेवो महाद्युतिः । असृजद् वरदानाच्च गणेशं चारुकुण्डलम्

sanatkumāra uvāca | tatassa bhagavān vyāsa devadevo mahādyutiḥ | asṛjad varadānācca gaṇeśaṁ cārukuṇḍalam

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! तब उस महातेजस्वी देवदेव भगवान ने वर देने के साथ ही सुन्दर कुण्डलों वाले एक गणेश को उत्पन्न किया।

श्लोक 111 (skanda.8.33.111)

आकर्णाद् दारितास्यं च महाकायं महाबलम् । महापरिघबाहुं च वज्रसंहननं दृढम्

ākarṇād dāritāsyaṁ ca mahākāyaṁ mahābalam | mahāparighabāhuṁ ca vajrasaṁhananaṁ dṛḍham

कानों तक फटा हुआ मुख, विशाल शरीर, महान बल, महापरिघ के समान भुजाएँ तथा वज्र के समान दृढ़ शरीर वाला।

श्लोक 112 (skanda.8.33.112)

महादंष्ट्रं महोरस्कं महाखड्गधनुर्धरम । दीप्ताङ्गारकनेत्रं च त्रिनेत्रं कवचोज्ज्वलम्

mahādaṁṣṭraṁ mahoraskaṁ mahākhaḍgadhanurdharama | dīptāṅgārakanetraṁ ca trinetraṁ kavacojjvalam

विशाल दाढ़ों वाला, विशाल वक्षस्थल वाला, महान खड्ग और धनुष धारण करने वाला, प्रज्वलित अंगारे के समान नेत्रों वाला, त्रिनेत्र, कवच से उज्ज्वल।

श्लोक 113 (skanda.8.33.113)

बिभ्रत्तं चाक्षयेत्यर्थमिषुधी चर्मवाससम् । शरमेकेन हस्तेन धनुरेकेन बिभ्रतम्

bibhrattaṁ cākṣayetyarthamiṣudhī carmavāsasam | śaramekena hastena dhanurekena bibhratam

अक्षय अर्थ के लिए दो तरकश धारण करने वाला, चर्म का वस्त्र पहने हुए, एक हाथ में बाण तथा दूसरे में धनुष धारण करने वाला।

श्लोक 114 (skanda.8.33.114)

ग्रहनक्षत्रचित्रेण तडित्सूर्यावभासिता । उत्तरीयेण वियता भास्वन्तं मेरुकूटवत्

grahanakṣatracitreṇa taḍitsūryāvabhāsitā | uttarīyeṇa viyatā bhāsvantaṁ merukūṭavat

ग्रहों और नक्षत्रों से चित्रित, बिजली और सूर्य के समान प्रकाशमान, आकाश के समान उत्तरीय वस्त्र से युक्त, मेरु पर्वत के शिखर के समान देदीप्यमान।

श्लोक 115 (skanda.8.33.115)

प्रभाकरेति सुव्यक्तमामन्त्र्य भगवानिदम् । अब्रवीत्सर्वदेवानां समक्षं तं प्रभाकरम्

prabhākareti suvyaktamāmantrya bhagavānidam | abravītsarvadevānāṁ samakṣaṁ taṁ prabhākaram

'प्रभाकर' -- इस स्पष्ट नाम से पुकारकर, भगवान ने समस्त देवताओं के समक्ष उस प्रभाकर से यह कहा।

श्लोक 116 (skanda.8.33.116)

प्रभाकर मयाज्ञप्तस्त्वं देवानां गुणाकर । परमैश्वर्यसंयुक्तो वृषवेगं निवारय । निवासार्थञ्च दिव्यन्तमिन्द्रद्वीपं ददामि ते

prabhākara mayājñaptastvaṁ devānāṁ guṇākara | paramaiśvaryasaṁyukto vṛṣavegaṁ nivāraya | nivāsārthañca divyantamindradvīpaṁ dadāmi te

हे प्रभाकर! हे देवताओं के गुणों की खान! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, परम ऐश्वर्य से युक्त होकर वृषभ के वेग का निवारण करो। मैं तुम्हें निवास के लिए दिव्य इन्द्रद्वीप प्रदान करता हूँ।

श्लोक 117 (skanda.8.33.117)

ज्योत्स्ना भवित्री पत्नी ते तथा चैवाजरामरः । भविष्यसि मयायज्ञप्तो महागणपतिर्मम

jyotsnā bhavitrī patnī te tathā caivājarāmaraḥ | bhaviṣyasi mayāyajñapto mahāgaṇapatirmama

ज्योत्स्ना तुम्हारी पत्नी होगी, और तुम अजर-अमर होगे; मेरे द्वारा आदिष्ट होकर तुम मेरे महागणपति बनोगे।

श्लोक 118 (skanda.8.33.118)

सनत्कुमार उवाच । ततस्तं देवतास्सर्वाः प्रणम्य ब्रह्मणा सह । जग्मुः स्वानि क्षयानि स्म देवोपि वृषवान् वभौ

sanatkumāra uvāca | tatastaṁ devatāssarvāḥ praṇamya brahmaṇā saha | jagmuḥ svāni kṣayāni sma devopi vṛṣavān vabhau

सनत्कुमार बोले - तब सभी देवता ब्रह्मा सहित उन्हें प्रणाम कर अपने-अपने निवास स्थान को चले गए, और देव भी वृषभ के साथ सुशोभित हुए।

श्लोक 119 (skanda.8.33.119)

मुखतोर्द्धं वृषो धर्मो जघनं यज्ञ उच्यते । चक्षुषी चन्द्रसूयौ च ब्रह्मा मूर्धानमाश्रितः

mukhatorddhaṁ vṛṣo dharmo jaghanaṁ yajña ucyate | cakṣuṣī candrasūyau ca brahmā mūrdhānamāśritaḥ

वृषभ का ऊपरी मुख भाग धर्म कहा जाता है, तथा जघन भाग यज्ञ कहा जाता है। उसके दोनों नेत्र चन्द्र और सूर्य हैं, तथा ब्रह्मा उसके मस्तक में आश्रित हैं।

श्लोक 120 (skanda.8.33.120)

जिह्वायां तस्य वरुणो वायुरन्तश्चरः स्वयम् । पादान् विष्णुर्भगश्चैव पूषा शक्रश्च संस्थिताः

jihvāyāṁ tasya varuṇo vāyurantaścaraḥ svayam | pādān viṣṇurbhagaścaiva pūṣā śakraśca saṁsthitāḥ

उसकी जिह्वा में वरुण है, वायु स्वयं उसके भीतर विचरण करता है। उसके पैरों में विष्णु, भग, पूषा और इन्द्र स्थित हैं।

श्लोक 121 (skanda.8.33.121)

जंघाः शेषास्तथा दित्या ऊरूश्चैव समाश्रिताः । रुद्राः कर्णौ च नासाञ्च ग्रीवोष्ठौ हनुमेव च

jaṁghāḥ śeṣāstathā dityā ūrūścaiva samāśritāḥ | rudrāḥ karṇau ca nāsāñca grīvoṣṭhau hanumeva ca

उसकी पिंडलियों में शेष तथा दैत्य आश्रित हैं, जाँघों में भी वे ही आश्रित हैं। रुद्रगण उसके कान, नासिका, गर्दन, ओष्ठ तथा ठोड़ी में स्थित हैं।

श्लोक 122 (skanda.8.33.122)

आयुधानि खुरास्तस्य चक्रवज्रौ च शृङ्गयोः । अपाने च स्वयं मित्रः पुच्छं दानानि सर्वशः

āyudhāni khurāstasya cakravajrau ca śṛṅgayoḥ | apāne ca svayaṁ mitraḥ pucchaṁ dānāni sarvaśaḥ

उसके खुर ही आयुध हैं, उसके दोनों सींगों में चक्र और वज्र हैं। उसके गुदा-स्थान में स्वयं मित्र देव विराजते हैं, तथा उसकी पूँछ में समस्त दान स्थित हैं।

श्लोक 123 (skanda.8.33.123)

अस्थीनि पर्वताः सर्वे पुरीषं श्रीरभूच्छुभा । मूत्रं चास्याभवद् दिव्यममृतं व्यास पावनम्

asthīni parvatāḥ sarve purīṣaṁ śrīrabhūcchubhā | mūtraṁ cāsyābhavad divyamamṛtaṁ vyāsa pāvanam

उसकी हड्डियाँ ही सब पर्वत हैं, उसका मल शुभ लक्ष्मी हो गया। हे व्यास! उसका मूत्र दिव्य, पावन अमृत हो गया।

श्लोक 124 (skanda.8.33.124)

रोमाणि ऋषयस्सर्वे नक्षत्राणि च सर्वशः । ग्रहास्तस्याभवन् व्यास सन्धयः शुभदर्शनाः

romāṇi ṛṣayassarve nakṣatrāṇi ca sarvaśaḥ | grahāstasyābhavan vyāsa sandhayaḥ śubhadarśanāḥ

उसके रोम ही समस्त ऋषि और समस्त नक्षत्र हैं। हे व्यास! उसकी संधियाँ ही शुभ दर्शन वाले ग्रह बन गईं।

श्लोक 125 (skanda.8.33.125)

इष्टयो वेदयज्ञाश्च मन्त्राः स्तोत्रा फलानि च । अभवंस्तस्य मांसानि रुधिरं सरिदर्णवाः

iṣṭayo vedayajñāśca mantrāḥ stotrā phalāni ca | abhavaṁstasya māṁsāni rudhiraṁ saridarṇavāḥ

इष्टियाँ, वेद, यज्ञ, मन्त्र, स्तोत्र और फल -- ये सब उसका मांस बन गए, और नदियाँ तथा समुद्र उसका रुधिर बन गए।

श्लोक 126 (skanda.8.33.126)

सप्तलोकं मुखं ह्यासीत् तस्याप्रतिमतेजसः । हस्ता मरीचयश्चैव मज्जा औषध्य एव च

saptalokaṁ mukhaṁ hyāsīt tasyāpratimatejasaḥ | hastā marīcayaścaiva majjā auṣadhya eva ca

उस अनुपम तेजस्वी का मुख ही सातों लोक था। उसके हाथ सूर्य-किरणें बने और उसकी मज्जा औषधियाँ बनीं।

श्लोक 127 (skanda.8.33.127)

मन्त्रभूताश्च पशवः स्नायुश्च वीरुधः । वल्ल्योथ वृक्षगुल्माश्च तथैवान्ये नगाः शुभाः

mantrabhūtāśca paśavaḥ snāyuśca vīrudhaḥ | vallyotha vṛkṣagulmāśca tathaivānye nagāḥ śubhāḥ

पशु उसके मन्त्ररूप बने, स्नायुएँ लताएँ बनीं। बेलें, वृक्ष, झाड़ियाँ तथा अन्य शुभ पर्वत भी उसी से बने।

श्लोक 128 (skanda.8.33.128)

नागास्तस्याभवन् नाड्यो वसवः शुक्रसंचयः । आमपक्वाशयौ तस्य तौ देवावश्विनौ स्मृतौ

nāgāstasyābhavan nāḍyo vasavaḥ śukrasaṁcayaḥ | āmapakvāśayau tasya tau devāvaśvinau smṛtau

उसकी नाड़ियाँ नाग बनीं, वसुगण उसके वीर्य के संचय से बने। उसके कच्चे तथा पके आशय ही दोनों अश्विनी देवता कहे जाते हैं।

श्लोक 129 (skanda.8.33.129)

मेघास्तस्याभवन् त्वक्च तडिन्माला ... यक्षा गन्धर्वाप्सरसस्तथा

meghāstasyābhavan tvakca taḍinmālā ... yakṣā gandharvāpsarasastathā

उसकी त्वचा मेघ बनी, बिजली की माला (इस श्लोक का यह अंश मूल में खण्डित है, अनुपलब्ध) ... तथा यक्ष, गन्धर्व और अप्सराएँ भी उसी से उत्पन्न हुईं।

श्लोक 130 (skanda.8.33.130)

शिरा धमन्योथ मदो दर्पाश्चैवाभिजज्ञिरे । मानुषा मातरश्चैव भूतानि विविधानि च

śirā dhamanyotha mado darpāścaivābhijajñire | mānuṣā mātaraścaiva bhūtāni vividhāni ca

उसकी शिराओं और धमनियों से मद और दर्प उत्पन्न हुए, तथा मनुष्य, मातृगण और नाना प्रकार के भूत भी उत्पन्न हुए।

श्लोक 131 (skanda.8.33.131)

रोमकूपाणि तस्यासन् वृषभस्य महात्मनः । एवं स भगवान् देवः परमैश्वर्यसंयुतः । सौरभेयो महादेवः सर्वदेवमयोभवत्

romakūpāṇi tasyāsan vṛṣabhasya mahātmanaḥ | evaṁ sa bhagavān devaḥ paramaiśvaryasaṁyutaḥ | saurabheyo mahādevaḥ sarvadevamayobhavat

उस महात्मा वृषभ के रोमकूप शेष सब बन गए। इस प्रकार परम ऐश्वर्य से युक्त वह भगवान सुरभी-पुत्र महादेव सर्वदेवमय हो गया।

श्लोक 132 (skanda.8.33.132)

य इदं सौरभेयस्य जन्म कर्म च तत्त्वतः । माहात्म्यमखिलं चैव शृणुयाद्वा पठेत वा

ya idaṁ saurabheyasya janma karma ca tattvataḥ | māhātmyamakhilaṁ caiva śṛṇuyādvā paṭheta vā

जो कोई सौरभेय के इस जन्म, कर्म तथा समस्त महिमा को यथार्थ रूप से सुनता है या पढ़ता है।

श्लोक 133 (skanda.8.33.133)

नित्यं शुचिरदीनात्मा सर्वपापैः प्रमुच्यते । मृतश्च कालेकाले वा रुद्रलोकमवाप्नुयात्

nityaṁ śuciradīnātmā sarvapāpaiḥ pramucyate | mṛtaśca kālekāle vā rudralokamavāpnuyāt

वह सदा पवित्र तथा उदार-चित्त होकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, और मृत्यु होने पर रुद्रलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 134 (skanda.8.33.134)

नेदं शठाय दातव्यं श्राव्यं वापि कथंचन । न नास्तिकाय दुष्टाय तथा वा पापकर्मणे

nedaṁ śaṭhāya dātavyaṁ śrāvyaṁ vāpi kathaṁcana | na nāstikāya duṣṭāya tathā vā pāpakarmaṇe

यह किसी दुष्ट को न दिया जाए और न ही किसी प्रकार सुनाया जाए; न ही नास्तिक, दुष्ट या पापकर्मी को।

श्लोक 135 (skanda.8.33.135)

इदं पुत्राय शिष्याय धार्मिकाय महात्मने । देयं श्राव्यञ्च शुचये गुह्यमेतत् सनातनम्

idaṁ putrāya śiṣyāya dhārmikāya mahātmane | deyaṁ śrāvyañca śucaye guhyametat sanātanam

यह सनातन रहस्य केवल पुत्र, शिष्य, धार्मिक तथा महात्मा एवं पवित्र व्यक्ति को ही दिया और सुनाया जाना चाहिए।

श्लोक 136 (skanda.8.33.136)

यो लोकवेदप्रभवेन तेन सर्वार्थसिद्धेन महाबलेन । यात्यम्बुदाम्भोनिधिगर्जितेन स वोस्तु नित्यं सुमना महेशः

yo lokavedaprabhavena tena sarvārthasiddhena mahābalena | yātyambudāmbhonidhigarjitena sa vostu nityaṁ sumanā maheśaḥ

जो लोक और वेद से प्रकट हुए, सब कार्यों को सिद्ध करने वाले, महाबली, मेघ और समुद्र के समान गर्जने वाले वृषभ पर सवार होकर विचरते हैं, वे महेश तुम पर सदा प्रसन्न हों।

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