अम्बिका खण्ड · अध्याय 34
उपमन्युवरप्रदान
श्लोक 1 (skanda.8.34.1)
सनत्कुमार उवाच । एवं स भगवान् व्यास मेघमुत्सृज्य देवपः । वृषवाहः समभवद् यथा ते कथितं मया
sanatkumāra uvāca | evaṁ sa bhagavān vyāsa meghamutsṛjya devapaḥ | vṛṣavāhaḥ samabhavad yathā te kathitaṁ mayā
सनत्कुमार बोले - हे व्यास! इस प्रकार वह देवताओं के पालक भगवान मेघ को त्यागकर वृषभवाहन हो गए, जैसा मैंने तुम्हें बताया।
श्लोक 2 (skanda.8.34.2)
व्यास उवाच । कथं भगवती देवी कृष्णा गौरत्वमागता । कारणं तत्र किं चापि ह्येतदिच्छामि वेदितुम्
vyāsa uvāca | kathaṁ bhagavatī devī kṛṣṇā gauratvamāgatā | kāraṇaṁ tatra kiṁ cāpi hyetadicchāmi veditum
व्यास ने कहा - भगवती देवी 'कृष्णा' से 'गौरी' अवस्था को किस प्रकार प्राप्त हुईं? उसका क्या कारण था? यह मैं जानना चाहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.8.34.3)
सनत्कुमार उवाच । आसीनौ मन्दरप्रस्थे उमाकामाङ्गनाशनौ । रेमाते प्रमथैस्सार्धं नानारूपधरैस्तदा
sanatkumāra uvāca | āsīnau mandaraprasthe umākāmāṅganāśanau | remāte pramathaissārdhaṁ nānārūpadharaistadā
सनत्कुमार बोले - मन्दराचल के शिखर पर बैठे हुए उमा और काम के शत्रु (शिव), अनेक रूप धारण करने वाले प्रमथगणों के साथ क्रीड़ा कर रहे थे।
श्लोक 4 (skanda.8.34.4)
अथ देवेन तत्रस्था क्रीडता सा कथान्तरे । कृष्णेत्युक्ता भगवती सा चुकोप मनस्विनी
atha devena tatrasthā krīḍatā sā kathāntare | kṛṣṇetyuktā bhagavatī sā cukopa manasvinī
इसी बीच क्रीड़ा करते हुए देव ने किसी बात के मध्य में उस भगवती को 'कृष्णा' कहकर पुकारा; वह मनस्विनी देवी क्रोधित हो गईं।
श्लोक 5 (skanda.8.34.5)
कुपितां तां महादेवः परिष्वज्य महाद्युतिः । उवाचा सकृदव्यग्रः सांत्वयन् मधुरं वचः
kupitāṁ tāṁ mahādevaḥ pariṣvajya mahādyutiḥ | uvācā sakṛdavyagraḥ sāṁtvayan madhuraṁ vacaḥ
क्रोधित हुई उस देवी को महातेजस्वी महादेव ने आलिंगन कर, बिना विचलित हुए, मधुर वचनों से समझाते हुए एक बार पुनः कहा।
श्लोक 6 (skanda.8.34.6)
देवदेव उवाच । देवि मा क्रोधमनघे कृथा विश्वसृगव्यये । हास्यं प्रकृतमेतन्मे कृष्णेति समुदाहृतम्
devadeva uvāca | devi mā krodhamanaghe kṛthā viśvasṛgavyaye | hāsyaṁ prakṛtametanme kṛṣṇeti samudāhṛtam
देवदेव ने कहा - हे निष्पाप देवि! हे विश्व की सृष्टिकर्ता, अव्यय देवि! क्रोध मत करो। यह 'कृष्णा' शब्द तो मैंने हास्यवश स्वाभाविक रूप से कहा था।
श्लोक 7 (skanda.8.34.7)
अद्य प्रभृति नानेन वचसाहं शुभानने । वक्ष्यामि त्वां त्यज क्रोधं
adya prabhṛti nānena vacasāhaṁ śubhānane | vakṣyāmi tvāṁ tyaja krodhaṁ
हे शुभानने! आज से मैं इस वचन से तुम्हें कभी नहीं पुकारूँगा; क्रोध त्याग दो... [इस पंक्ति का शेष भाग मूल में लुप्त है]
श्लोक 8 (skanda.8.34.8)
सनत्कुमार उवाच । तमेवंवदिनं देवं श्रुत्वा गिरिवरात्मजा । अगमत् परमां तुष्टिमिदं चोवाच सुस्वरम्
sanatkumāra uvāca | tamevaṁvadinaṁ devaṁ śrutvā girivarātmajā | agamat paramāṁ tuṣṭimidaṁ covāca susvaram
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार बोलते हुए देव को सुनकर पर्वतराज-पुत्री को परम संतोष प्राप्त हुआ और उसने मधुर स्वर में यह कहा।
श्लोक 9 (skanda.8.34.9)
देव्युवाच । त्वं गुरुस्सर्वलोकस्य पूज्यो भर्त्ता ममैव च ।
devyuvāca | tvaṁ gurussarvalokasya pūjyo bharttā mamaiva ca |
देवी ने कहा - आप ही समस्त लोक के गुरु हैं, पूज्य हैं, तथा मेरे भी पति हैं। [इस श्लोक का शेष भाग तथा अगला संपूर्ण श्लोक मूल पोथी में एक पत्र के खण्डित होने से अनुपलब्ध है]
श्लोक 10 (skanda.8.34.10)
सनत्कुमार उवाच । इति तेनेष्टवचसा तुष्टो देव्याः पिनाकधृक् । वरेणच्छंदयामास तयैषोभ्यर्थितो वरः
sanatkumāra uvāca | iti teneṣṭavacasā tuṣṭo devyāḥ pinākadhṛk | vareṇacchaṁdayāmāsa tayaiṣobhyarthito varaḥ
सनत्कुमार बोले - इस प्रिय वचन से संतुष्ट हुए पिनाकधारी ने उसके द्वारा माँगे गए वर से उसे संतुष्ट करना चाहा।
श्लोक 11 (skanda.8.34.11)
देव्युवाच । यदा यदा वदसि मां कृष्णेति वदतां वर । तदा तदा मे हृदयं विदीर्यत इव प्रभो
devyuvāca | yadā yadā vadasi māṁ kṛṣṇeti vadatāṁ vara | tadā tadā me hṛdayaṁ vidīryata iva prabho
देवी ने कहा - हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! जब-जब आप मुझे 'कृष्णा' कहते हैं, तब-तब, हे प्रभो! मेरा हृदय मानो विदीर्ण हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.8.34.12)
विज्ञापयामि सर्वेश गौरवर्णमनुत्तमम्
vijñāpayāmi sarveśa gauravarṇamanuttamam
[इस श्लोक के आरम्भ का तथा एक पूर्ण श्लोक का पाठ मूल में अनुपलब्ध है] ... हे सर्वेश! मैं अनुपम गौर वर्ण की प्रार्थना करती हूँ।
श्लोक 13 (skanda.8.34.13)
जगद्भर्ता सुरेशान आत्मतुल्यपराक्रमः
jagadbhartā sureśāna ātmatulyaparākramaḥ
[इस श्लोक के आरम्भ का पाठ मूल में अनुपलब्ध है] ... हे देवेश्वरों के स्वामी! आप संसार के पालक हैं, अपने ही समान पराक्रम वाले हैं।
श्लोक 14 (skanda.8.34.14)
अग्रणीः सर्वदेवानां सर्वदैत्यनिषूदनः ।
agraṇīḥ sarvadevānāṁ sarvadaityaniṣūdanaḥ |
आप समस्त देवताओं में अग्रणी तथा समस्त दैत्यों के संहारक हैं... [इस श्लोक का शेष भाग मूल में अनुपलब्ध है]
श्लोक 15 (skanda.8.34.15)
यदि तुष्टोसि मे देव यदि देयो वरश्च मे । तपश्चरितुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि
yadi tuṣṭosi me deva yadi deyo varaśca me | tapaścaritumicchāmi tadanujñātumarhasi
यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे देव! और यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं तप करना चाहती हूँ; इसकी मुझे अनुमति दीजिए।
श्लोक 16 (skanda.8.34.16)
सनत्कुमार उवाच । ततो भवः प्रहस्यैनामुवाच तपसा हि किम् । तपसा कांक्षितं यत्तु तदद्यैव ददामि ते
sanatkumāra uvāca | tato bhavaḥ prahasyaināmuvāca tapasā hi kim | tapasā kāṁkṣitaṁ yattu tadadyaiva dadāmi te
सनत्कुमार बोले - तब भव ने हँसते हुए उससे कहा - तप से क्या प्रयोजन? जो कुछ तुम तप से चाहती हो, वह मैं आज ही तुम्हें दे देता हूँ।
श्लोक 17 (skanda.8.34.17)
इत्युक्ता गिरिजा प्राह तप्ते तपसि पुष्कले । त्वमेव दाता भगवन् वरान् मह्यं यथेप्सितान्
ityuktā girijā prāha tapte tapasi puṣkale | tvameva dātā bhagavan varān mahyaṁ yathepsitān
ऐसा कहे जाने पर, प्रचुर तप में लीन गिरिजा ने कहा - हे भगवन्! मुझे इच्छित वर देने वाले तो आप ही हैं।
श्लोक 18 (skanda.8.34.18)
तदा विज्ञापितेनैवं सर्वकार्यार्थदर्शिना । चरणौ च नमस्कृत्य शिवस्यामिततेजसः
tadā vijñāpitenaivaṁ sarvakāryārthadarśinā | caraṇau ca namaskṛtya śivasyāmitatejasaḥ
तब समस्त कार्यों के तत्त्वदर्शी शिव द्वारा इस प्रकार प्रार्थित होकर, उस अपरिमित तेजस्वी शिव के चरणों में प्रणाम करके।
श्लोक 19 (skanda.8.34.19)
सा क्षणादागता देवी हिमवन्तं नगोत्तमम् । ददर्श ऋषिमुख्यानामाश्रमैरुपशोभितम्
sā kṣaṇādāgatā devī himavantaṁ nagottamam | dadarśa ṛṣimukhyānāmāśramairupaśobhitam
वह देवी क्षणभर में हिमालय पर्वतश्रेष्ठ पर पहुँच गईं और श्रेष्ठ ऋषियों के आश्रमों से सुशोभित उस पर्वत को देखा।
श्लोक 20 (skanda.8.34.20)
सरो मानसमासाद्य तथा बिन्दुसरश्च तत् । दिव्यां पाण्डुशिलां चैव गङ्गाप्रभवमेव च
saro mānasamāsādya tathā bindusaraśca tat | divyāṁ pāṇḍuśilāṁ caiva gaṅgāprabhavameva ca
मानसरोवर तथा बिन्दुसरोवर को, दिव्य पाण्डुशिला को तथा गंगा के उद्गम-स्थान को भी देखा।
श्लोक 21 (skanda.8.34.21)
ततो महालयं प्राप्य देवदारुवनं तथा । अन्यानि च ततोग्र्याणि वनान्यासाद्य सा सती । तस्योत्तरेण शैलस्य गत्वा चाति मनोहरम्
tato mahālayaṁ prāpya devadāruvanaṁ tathā | anyāni ca tatogryāṇi vanānyāsādya sā satī | tasyottareṇa śailasya gatvā cāti manoharam
फिर महालय तथा देवदारु वन को प्राप्त कर, वह पतिव्रता अन्य श्रेष्ठ वनों को भी देखते हुए, उस पर्वत के उत्तर दिशा में अत्यन्त मनोहर स्थान पर गईं।
श्लोक 22 (skanda.8.34.22)
अपश्यच्छिखरं दिव्यमेकमेकान्तमाश्रितम् । चामीकरमयं दिव्यं सवौषधिसमावृतम्
apaśyacchikharaṁ divyamekamekāntamāśritam | cāmīkaramayaṁ divyaṁ savauṣadhisamāvṛtam
उन्होंने एक दिव्य, एकान्त में स्थित शिखर देखा, जो सुवर्णमय, दिव्य तथा सब औषधियों से आवृत था।
श्लोक 23 (skanda.8.34.23)
इन्द्रनीलमहानीलनीलोपलतलैः शुभैः । वृक्षैर्मणिमयैश्चित्रैः सर्वतः परिसंवृतम्
indranīlamahānīlanīlopalatalaiḥ śubhaiḥ | vṛkṣairmaṇimayaiścitraiḥ sarvataḥ parisaṁvṛtam
वह इन्द्रनील, महानील तथा नीलमणि के शुभ शिलातलों से युक्त था और मणिमय, विचित्र वृक्षों से चारों ओर घिरा हुआ था।
श्लोक 24 (skanda.8.34.24)
क्वचिदञ्जनपुञ्जाभं स्फटिकोपलमेव च । क्वचिद्धेमोपलं दिव्यं काचिच्चित्रोपलं पुनः
kvacidañjanapuñjābhaṁ sphaṭikopalameva ca | kvaciddhemopalaṁ divyaṁ kāciccitropalaṁ punaḥ
कहीं वह अंजनराशि के समान श्याम था, कहीं स्फटिकमणि से युक्त था, कहीं दिव्य स्वर्णमणि से युक्त, कहीं विचित्र मणियों से।
श्लोक 25 (skanda.8.34.25)
क्वचिन्मनःशिलाशृङ्गं हरितालोपमं क्वचित् । शालैस्तालैस्तमालैश्च प्रियालाम्रातकैरपि
kvacinmanaḥśilāśṛṅgaṁ haritālopamaṁ kvacit | śālaistālaistamālaiśca priyālāmrātakairapi
कहीं मैनसिल के शिखर वाला, कहीं हरताल के समान वर्ण वाला था; शाल, ताल, तमाल, प्रियाल तथा आम्रातक वृक्षों से युक्त था।
श्लोक 26 (skanda.8.34.26)
अशोकैश्चम्पकैर्लोध्रैः कदम्बाम्रातिमुक्तकैः । नागपुन्नागतिलकैः सुरभीचन्दनैरपि
aśokaiścampakairlodhraiḥ kadambāmrātimuktakaiḥ | nāgapunnāgatilakaiḥ surabhīcandanairapi
अशोक, चम्पक, लोध्र, कदम्ब, आम्र, अतिमुक्तक, नागकेसर, पुन्नाग, तिलक तथा सुगन्धित चन्दन के वृक्षों से युक्त था।
श्लोक 27 (skanda.8.34.27)
धातकीकेतकीभिश्च तथैवोद्दालकैरपि । कदलीभिश्च चित्राभिः खर्जूरैः पनसैरपि
dhātakīketakībhiśca tathaivoddālakairapi | kadalībhiśca citrābhiḥ kharjūraiḥ panasairapi
धातकी, केतकी तथा उद्दालक वृक्षों से, विचित्र केले के वृक्षों से, खजूर तथा कटहल के वृक्षों से भी युक्त था।
श्लोक 28 (skanda.8.34.28)
बकुलैर्नालिकेरैश्च पद्मषण्डैश्च शोभितम् । कपित्थैः खदिरैश्चैव भव्यैः पारावतैरपि
bakulairnālikeraiśca padmaṣaṇḍaiśca śobhitam | kapitthaiḥ khadiraiścaiva bhavyaiḥ pārāvatairapi
बकुल, नारियल तथा कमल-समूहों से सुशोभित था; कैथ, खदिर, भव्य वृक्षों तथा पारावत वृक्षों से भी युक्त था।
श्लोक 29 (skanda.8.34.29)
मृद्वीकामण्डपैश्चैव तथांकोठैः समावृतम् । सदा पुष्पफलोपेतैश्चारुचामीकरप्रभैः
mṛdvīkāmaṇḍapaiścaiva tathāṁkoṭhaiḥ samāvṛtam | sadā puṣpaphalopetaiścārucāmīkaraprabhaiḥ
दाख की लताओं के मण्डपों से तथा अंकोठ वृक्षों से घिरा हुआ था, जो सदा सुवर्ण-कान्ति वाले फल-फूलों से युक्त रहते थे।
श्लोक 30 (skanda.8.34.30)
तथा प्रस्रवणैश्चैव नदीभिश्चोपशोभितम् । पक्षिभिर्मधुरालापैः समन्ताच्चाभिनादितम्
tathā prasravaṇaiścaiva nadībhiścopaśobhitam | pakṣibhirmadhurālāpaiḥ samantāccābhināditam
झरनों तथा नदियों से भी सुशोभित था, तथा मधुर बोलने वाले पक्षियों की चहचहाहट से चारों ओर गूँजता रहता था।
श्लोक 31 (skanda.8.34.31)
मयूरचातकोपेतं हंसचक्राह्वसंकुलम् । सारसैः खञ्जरीटैश्च हारीतैश्चाभिनादितम्
mayūracātakopetaṁ haṁsacakrāhvasaṁkulam | sārasaiḥ khañjarīṭaiśca hārītaiścābhināditam
वहाँ मोर तथा चातक पक्षी थे, हंस तथा चक्रवाक पक्षियों से भरा हुआ था, सारस, खंजरीट तथा हारीत पक्षियों की ध्वनि से गूँजता था।
श्लोक 32 (skanda.8.34.32)
जीवं जीवसमाकीर्णं महिषर्क्षसमाकुलम् । सिंहशार्दूलचरितं शरभेभसमाकुलम्
jīvaṁ jīvasamākīrṇaṁ mahiṣarkṣasamākulam | siṁhaśārdūlacaritaṁ śarabhebhasamākulam
वहाँ जीवंजीवक पक्षी भरे हुए थे, भैंसे और भालू विचरते थे, सिंह तथा व्याघ्र विचरण करते थे, तथा शरभ और हाथी भी भरे हुए थे।
श्लोक 33 (skanda.8.34.33)
मेरुमन्दरसंकाशं सर्वपुण्यफलप्रदम् । रम्यं स्वर्गमिवागम्यं पापानां क्रूरकर्मणाम्
merumandarasaṁkāśaṁ sarvapuṇyaphalapradam | ramyaṁ svargamivāgamyaṁ pāpānāṁ krūrakarmaṇām
वह मेरु तथा मन्दराचल के समान, समस्त पुण्य-फल देने वाला, रमणीय, दुष्ट कर्म करने वाले पापियों के लिए स्वर्ग के समान अगम्य था।
श्लोक 34 (skanda.8.34.34)
श्रिया स्वलंकृतं साक्षादुद्यानमिव सत्कृतम् । तत्र केचिन्मधुफला वृक्षाः सर्वर्तुकामदाः
śriyā svalaṁkṛtaṁ sākṣādudyānamiva satkṛtam | tatra kecinmadhuphalā vṛkṣāḥ sarvartukāmadāḥ
वह लक्ष्मी से स्वयं अलंकृत, मानो साक्षात् उद्यान के समान सुसज्जित था। वहाँ कुछ वृक्ष मधुर फलों वाले, सभी ऋतुओं में कामनाएँ पूर्ण करने वाले थे।
श्लोक 35 (skanda.8.34.35)
अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र मनोरमाः । अपरे सर्वपुष्पाणि फलानि च महीरुहाः
apare kṣīriṇo nāma vṛkṣāstatra manoramāḥ | apare sarvapuṣpāṇi phalāni ca mahīruhāḥ
कुछ मनोहर वृक्ष क्षीरी नाम से प्रसिद्ध थे, कुछ अन्य वृक्ष सभी प्रकार के फूल और फल देने वाले थे।
श्लोक 36 (skanda.8.34.36)
पुष्प्यन्ते च फलन्ते च काञ्चनाश्चापरे द्रुमाः । फलन्ति भक्ष्याण्यपरे भोजनानि च सर्वशः
puṣpyante ca phalante ca kāñcanāścāpare drumāḥ | phalanti bhakṣyāṇyapare bhojanāni ca sarvaśaḥ
कुछ स्वर्णिम वृक्ष फूलते और फलते रहते थे, कुछ अन्य हर प्रकार के खाद्य पदार्थ तथा भोजन फलस्वरूप देते थे।
श्लोक 37 (skanda.8.34.37)
मानुष्याण्यथ दिव्यानि षड्रसानि महाद्रुमाः । वस्त्राण्यन्ये प्रसूयन्ते फलेष्वाभरणानि च
mānuṣyāṇyatha divyāni ṣaḍrasāni mahādrumāḥ | vastrāṇyanye prasūyante phaleṣvābharaṇāni ca
महान् वृक्ष मानवोचित तथा दिव्य दोनों प्रकार के छहों रस देते थे; कुछ वृक्ष वस्त्र तथा फलों के रूप में आभूषण उत्पन्न करते थे।
श्लोक 38 (skanda.8.34.38)
तथा बहुविधामन्ये शय्यां चाभरणद्रुमाः । अमाक्षिकं मध्वपरे चामृतप्रतिमं नगाः
tathā bahuvidhāmanye śayyāṁ cābharaṇadrumāḥ | amākṣikaṁ madhvapare cāmṛtapratimaṁ nagāḥ
कुछ अन्य वृक्ष नाना प्रकार की शय्याएँ तथा आभूषण देने वाले थे, कुछ मधुमक्खी-रहित मधु देते थे, कुछ अमृत के समान वृक्ष थे।
श्लोक 39 (skanda.8.34.39)
भोगाँश्च विविधानन्ये तथैवाभरणानि च । अन्ये स्त्रीः संप्रसूयन्ते मनुष्याँश्च तथापरे
bhogāṁśca vividhānanye tathaivābharaṇāni ca | anye strīḥ saṁprasūyante manuṣyāṁśca tathāpare
कुछ अन्य वृक्ष विविध भोग तथा आभूषण भी उत्पन्न करते थे; कुछ स्त्रियाँ उत्पन्न करते थे तथा कुछ अन्य पुरुष भी।
श्लोक 40 (skanda.8.34.40)
सर्वा मणिमयी भूमिर्दिव्ये तस्मिञ्छिलोच्चये । सुगन्धिः पवनो वाति नात्यर्थं चोष्णशीतलः
sarvā maṇimayī bhūmirdivye tasmiñchiloccaye | sugandhiḥ pavano vāti nātyarthaṁ coṣṇaśītalaḥ
उस दिव्य पर्वत की सारी भूमि मणिमय थी, वहाँ अत्यधिक उष्ण या शीतल न होकर सुगन्धित पवन बहता था।
श्लोक 41 (skanda.8.34.41)
यावदेव महादेवी तं गिरिं नाभिगच्छति । प्रीत्यर्थं तावदेवासौ देव्या रुद्रेण निर्मितः
yāvadeva mahādevī taṁ giriṁ nābhigacchati | prītyarthaṁ tāvadevāsau devyā rudreṇa nirmitaḥ
जब तक महादेवी उस पर्वत के पास नहीं जातीं, तब तक उनकी प्रसन्नता के लिए ही रुद्र द्वारा वह निर्मित किया गया था।
श्लोक 42 (skanda.8.34.42)
तस्यैव च प्रसादेन नासौ गम्यः शिलोच्चयः । सर्वदेवनिकायानां भूतानाञ्चैव सर्वशः
tasyaiva ca prasādena nāsau gamyaḥ śiloccayaḥ | sarvadevanikāyānāṁ bhūtānāñcaiva sarvaśaḥ
उन्हीं की कृपा से वह पर्वत समस्त देवगणों तथा समस्त प्राणियों के लिए भी अगम्य था।
श्लोक 43 (skanda.8.34.43)
सनत्कुमार उवाच । तस्मिन् गिरिवरे देवी तपस्तेपे सुदुश्चरम् । वार्क्षे दधाना वसने रुचिरे धर्मसाधने
sanatkumāra uvāca | tasmin girivare devī tapastepe suduścaram | vārkṣe dadhānā vasane rucire dharmasādhane
सनत्कुमार बोले - उस श्रेष्ठ पर्वत पर देवी ने वृक्ष-वल्कल का सुन्दर, धर्मसाधक वस्त्र धारण करके अत्यन्त दुष्कर तप किया।
श्लोक 44 (skanda.8.34.44)
कदाचित्सा फलाहारा कदाचित्पर्णभोजना । कदाचिदम्बुभक्षाभूत्कदाचिदनिलाशना
kadācitsā phalāhārā kadācitparṇabhojanā | kadācidambubhakṣābhūtkadācidanilāśanā
कभी वह फल खाकर रहती थीं, कभी पत्ते खाकर, कभी केवल जल पीकर, कभी केवल वायु का ही आहार लेकर।
श्लोक 45 (skanda.8.34.45)
कदाचिदेकपादेन सूर्यस्याभिमुखी स्थिता । निगृहीतेन्द्रियग्रामा सा बभूव वरानना
kadācidekapādena sūryasyābhimukhī sthitā | nigṛhītendriyagrāmā sā babhūva varānanā
कभी एक पैर पर खड़ी होकर सूर्य के सम्मुख रहती थीं; वह श्रेष्ठमुखी अपनी इन्द्रियों के समूह को पूर्णतः वश में किए हुए थीं।
श्लोक 46 (skanda.8.34.46)
महादेवनमस्कारा महादेवपरायणा । महादेवप्रिया देवी पुत्रार्थञ्च वरार्थिनी
mahādevanamaskārā mahādevaparāyaṇā | mahādevapriyā devī putrārthañca varārthinī
वह महादेव को नमस्कार करने वाली, महादेव में तत्पर, महादेव की प्रिय देवी, पुत्र की कामना से वर की अभिलाषिणी थीं।
श्लोक 47 (skanda.8.34.47)
अजैकपादं रुद्रञ्च डिण्डिमुण्डेश्वरं तथा । कापालिनं भारभूतिं माषाढिञ्चैव सानुगम्
ajaikapādaṁ rudrañca ḍiṇḍimuṇḍeśvaraṁ tathā | kāpālinaṁ bhārabhūtiṁ māṣāḍhiñcaiva sānugam
अजैकपाद, रुद्र, डिण्डिमुण्डेश्वर, कापालिन, भारभूति, माषाढि को उनके अनुचरों सहित।
श्लोक 48 (skanda.8.34.48)
निकुम्भं गतमन्युं च भूतमोहनमेव च । कालदण्डधरं चैव मृत्युदण्डधरं तथा
nikumbhaṁ gatamanyuṁ ca bhūtamohanameva ca | kāladaṇḍadharaṁ caiva mṛtyudaṇḍadharaṁ tathā
निकुम्भ, गतमन्यु तथा भूतमोहन को, कालदण्डधर तथा मृत्युदण्डधर को भी।
श्लोक 49 (skanda.8.34.49)
ब्रह्मदण्डधरं चैव घोरचक्रधरं तथा । अन्तरिक्षचरान् घोरान् दिशासु विदिशासु च
brahmadaṇḍadharaṁ caiva ghoracakradharaṁ tathā | antarikṣacarān ghorān diśāsu vidiśāsu ca
ब्रह्मदण्डधर तथा घोरचक्रधर को, आकाश में विचरने वाले भयंकर गणों को, दिशाओं तथा विदिशाओं में।
श्लोक 50 (skanda.8.34.50)
एतान् गुह्यान् गणाध्यक्षानदृश्यान् सर्वतोमुखान् । प्रागेव तस्या रक्षार्थं महादेवो नियुक्तवान्
etān guhyān gaṇādhyakṣānadṛśyān sarvatomukhān | prāgeva tasyā rakṣārthaṁ mahādevo niyuktavān
इन गुह्य, अदृश्य, सर्वतोमुख गणाध्यक्षों को महादेव ने पहले से ही उसकी रक्षा के लिए नियुक्त कर रखा था।
श्लोक 51 (skanda.8.34.51)
उपरिष्टादधस्ताच्च तं गिरिं ते गणेश्वराः । अदृश्याः सर्वतश्चैव न ररक्षुरमितौजसः
upariṣṭādadhastācca taṁ giriṁ te gaṇeśvarāḥ | adṛśyāḥ sarvataścaiva na rarakṣuramitaujasaḥ
ऊपर तथा नीचे, अत्यन्त तेजस्वी वे अदृश्य गणेश्वर उस पर्वत को सब ओर से घेरकर रक्षा करते रहे।
श्लोक 52 (skanda.8.34.52)
न तस्य गिरिशृंगस्य रक्ष्यमाणस्य तैस्तथा । देवदानवगन्धर्वाः शेकुर्गन्तुमुपान्तिकम्
na tasya giriśṛṁgasya rakṣyamāṇasya taistathā | devadānavagandharvāḥ śekurgantumupāntikam
इस प्रकार उनके द्वारा उस पर्वतशिखर की रक्षा किए जाने पर, देवता, दानव तथा गन्धर्व भी उसके समीप जाने में समर्थ नहीं थे।
श्लोक 53 (skanda.8.34.53)
प्रागेव स्थापितवती यानि चारुशिलातले । भूषणानि नदी तेभ्यो जज्ञे पुण्यजलाश्रया
prāgeva sthāpitavatī yāni cāruśilātale | bhūṣaṇāni nadī tebhyo jajñe puṇyajalāśrayā
पहले से ही उन्होंने सुन्दर शिलातल पर जो आभूषण रख दिए थे, उन्हीं से पुण्य जल वाली एक नदी उत्पन्न हुई।
श्लोक 54 (skanda.8.34.54)
तामलंकारधारेति विश्रुतां पापनाशिनीम् । पश्यन्त्यद्यापि च जनाः सर्वकालजलां शुभाम्
tāmalaṁkāradhāreti viśrutāṁ pāpanāśinīm | paśyantyadyāpi ca janāḥ sarvakālajalāṁ śubhām
उसे 'अलंकारधारा' नाम से प्रसिद्ध, पापनाशिनी, सदा जलयुक्त, शुभ नदी को लोग आज भी देखते हैं।
श्लोक 55 (skanda.8.34.55)
यस्मिन्नेव दिने देवी सा तथा तिष्ठदद्रिजा । तस्मिन्नेव दिने व्यास शार्दूलोपि जगाम ताम्
yasminneva dine devī sā tathā tiṣṭhadadrijā | tasminneva dine vyāsa śārdūlopi jagāma tām
जिस दिन वह पर्वतराज-पुत्री देवी वहाँ इस प्रकार तप में स्थित थीं, उसी दिन, हे व्यास! एक व्याघ्र भी उनके पास आ पहुँचा।
श्लोक 56 (skanda.8.34.56)
महकायमुखो भीमः पिङ्गलामललोचनः । नखदंष्ट्रायुधो भीमस्त्रासनः सर्वदेहिनाम्
mahakāyamukho bhīmaḥ piṅgalāmalalocanaḥ | nakhadaṁṣṭrāyudho bhīmastrāsanaḥ sarvadehinām
वह विशाल शरीर तथा मुख वाला, भयंकर, पीले तथा निर्मल नेत्रों वाला, नख-दाढ़ रूपी शस्त्रों वाला, भयंकर तथा समस्त प्राणियों को त्रास देने वाला था।
श्लोक 57 (skanda.8.34.57)
गुहामुखाद् विनिःसृत्य व्यजृम्भत महाबलः ।
guhāmukhād viniḥsṛtya vyajṛmbhata mahābalaḥ |
वह महाबली गुहामुख से निकलकर जँभाई लेने लगा... [इस श्लोक का शेष भाग मूल में अनुपलब्ध है]
श्लोक 58 (skanda.8.34.58)
ततः स देवीमालोक्य भक्षार्थमुपचक्रमे । तपसा स्तम्भितस्तस्या ह्येतदेवान्वचिन्तयत्
tataḥ sa devīmālokya bhakṣārthamupacakrame | tapasā stambhitastasyā hyetadevānvacintayat
तब उसने देवी को देखकर उसे भक्षण करने के लिए उद्यत हुआ, किन्तु उनके तप से स्तंभित होकर उसने यह सोचा।
श्लोक 59 (skanda.8.34.59)
नार्येषा दृष्टपूर्वा मे शर्वपार्श्वे सुशोभना । यादृशं तपसश्चास्या वीर्यं मन्ये न मानुषी
nāryeṣā dṛṣṭapūrvā me śarvapārśve suśobhanā | yādṛśaṁ tapasaścāsyā vīryaṁ manye na mānuṣī
मैंने शिव के समीप ऐसी सुशोभित स्त्री पहले कभी नहीं देखी; इसके तप का जैसा प्रभाव है, उससे मैं इसे मनुष्य-स्त्री नहीं मानता।
श्लोक 60 (skanda.8.34.60)
अथवा नित्यमेवासौ महेश्वरमनुव्रता । मन्दरे सह देवेन रमते हिमवत्सुता
athavā nityamevāsau maheśvaramanuvratā | mandare saha devena ramate himavatsutā
अथवा यह वही हिमालय-पुत्री है, जो सदा महेश्वर की अनुव्रता है और मन्दराचल पर देव के साथ रमण करती है।
श्लोक 61 (skanda.8.34.61)
तपसा किं तदा चास्या यस्या भर्त्ता पिनाकधृक् । तद्रूपिणीयं काप्यन्या तपोनियममास्थिता
tapasā kiṁ tadā cāsyā yasyā bharttā pinākadhṛk | tadrūpiṇīyaṁ kāpyanyā taponiyamamāsthitā
जिसका पति पिनाकधारी है, उसके तप से क्या प्रयोजन? यह तो कोई अन्य ही स्त्री होगी, जो उसी के रूप में तपोनियम में स्थित है।
श्लोक 62 (skanda.8.34.62)
महता तेजसा युक्ता नेयं शक्या मया शुभा । हन्तुं भक्षार्थमद्येह ययाहं स्तम्भितः स्थितः
mahatā tejasā yuktā neyaṁ śakyā mayā śubhā | hantuṁ bhakṣārthamadyeha yayāhaṁ stambhitaḥ sthitaḥ
महान् तेज से युक्त इस शुभ स्त्री को मारकर खाना मेरे लिए संभव नहीं है, इसीलिए मैं आज यहाँ स्तंभित होकर खड़ा हूँ।
श्लोक 63 (skanda.8.34.63)
तस्मादेनामुपासिष्ये यावत् कालस्य पर्ययः । स्वयमेतां मृतां पश्चाद् यथेष्टमबलामहम्
tasmādenāmupāsiṣye yāvat kālasya paryayaḥ | svayametāṁ mṛtāṁ paścād yatheṣṭamabalāmaham
इसलिए जब तक काल का परिवर्तन न हो, तब तक मैं इसकी सेवा में रहूँगा; बाद में जब यह स्वयं मृत हो जाएगी, तब मैं इस असहाय स्त्री को जैसे चाहूँ।
श्लोक 64 (skanda.8.34.64)
भक्षयिष्ये बुभुक्षार्त्तो मुनिः फलमिवाश्रमे । विचिन्त्यैवं स शार्दूलो देव्यादूरे समास्थितः
bhakṣayiṣye bubhukṣārtto muniḥ phalamivāśrame | vicintyaivaṁ sa śārdūlo devyādūre samāsthitaḥ
मैं उसे भूख से पीड़ित होकर खा लूँगा, जैसे कोई मुनि आश्रम में फल खाता है - ऐसा विचार कर वह व्याघ्र देवी से दूर बैठ गया।
श्लोक 65 (skanda.8.34.65)
स्तब्धदृक् कर्णलाङ्गूल उपविष्टो निरीक्ष्य ताम् । सापि देव्यूर्ध्वदृष्टिन्तं दृष्ट्वा स्थितमसङ्गिनी । अनुग्रहकरीं बुद्धिं चक्रे तस्मिन् सदैव हि
stabdhadṛk karṇalāṅgūla upaviṣṭo nirīkṣya tām | sāpi devyūrdhvadṛṣṭintaṁ dṛṣṭvā sthitamasaṅginī | anugrahakarīṁ buddhiṁ cakre tasmin sadaiva hi
स्थिर दृष्टि, कान तथा पूँछ वाला वह बैठकर उसे देखता रहा। देवी ने भी उसे ऊर्ध्व दृष्टि से स्थिर देखकर, स्वयं निर्लिप्त रहते हुए भी, सदैव उस पर अनुग्रह करने वाली बुद्धि धारण की।
श्लोक 66 (skanda.8.34.66)
व्यास उवाच । तपश्चरणसक्तायां देव्यां देवस्त्रिलोचनः । किमकार्षीत् सुरेशान एतदिच्छामि वेदितुम्
vyāsa uvāca | tapaścaraṇasaktāyāṁ devyāṁ devastrilocanaḥ | kimakārṣīt sureśāna etadicchāmi veditum
व्यास ने कहा - तप के आचरण में लीन उस देवी के प्रति, हे देवेशों के स्वामी! त्रिलोचन देव ने क्या किया? यह मैं जानना चाहता हूँ।
श्लोक 67 (skanda.8.34.67)
सनत्कुमार उवाच । प्रति भावितायाम् । पुत्रार्थमासक्तमनोरथायां देवोकरोद्यत्तदिदं शृणुष्व
sanatkumāra uvāca | prati bhāvitāyām | putrārthamāsaktamanorathāyāṁ devokarodyattadidaṁ śṛṇuṣva
सनत्कुमार बोले - [इस श्लोक का आरम्भिक भाग मूल में अनुपलब्ध है] ...के प्रति भावित हुई तथा पुत्र-प्राप्ति की कामना में मन को लगाए हुए उस देवी के लिए देव ने जो कुछ किया, वह सुनो, यह मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 68 (skanda.8.34.68)
देव्यां तपसि सक्तायां भगवान् गोवृषध्वजः । जागामानुग्रहं कर्तुमुपमन्योर्महात्मनः
devyāṁ tapasi saktāyāṁ bhagavān govṛṣadhvajaḥ | jāgāmānugrahaṁ kartumupamanyormahātmanaḥ
तप में लीन उस देवी पर वृषभ-ध्वज भगवान महामना उपमन्यु पर अनुग्रह करने के लिए वहाँ आए।
श्लोक 69 (skanda.8.34.69)
स ऋषिर्मातुलगृहे कदाचित् क्षीरमुत्तमम्
sa ṛṣirmātulagṛhe kadācit kṣīramuttamam
वह ऋषि (उपमन्यु) एक बार अपने मामा के घर में उत्तम दूध।
श्लोक 70 (skanda.8.34.70)
होमशेषमति स्वादु पीतवानग्निहोत्रिणः । तत् स्मृत्वा मातरं प्राह देहि मातः पयो मम
homaśeṣamati svādu pītavānagnihotriṇaḥ | tat smṛtvā mātaraṁ prāha dehi mātaḥ payo mama
अग्निहोत्री का होम-शेष, अत्यन्त स्वादिष्ट, पी लिया। उसे स्मरण कर उसने अपनी माता से कहा - हे माता! मुझे भी दूध दो।
श्लोक 71 (skanda.8.34.71)
तस्मै पिष्टं ददौ माता तोयेनालोड्य दुःखिता । क्षीरमित्युपनीतं तद् दृष्टवा पिष्टं तदा मुनिः
tasmai piṣṭaṁ dadau mātā toyenāloḍya duḥkhitā | kṣīramityupanītaṁ tad dṛṣṭavā piṣṭaṁ tadā muniḥ
दुःखी माता ने उसके लिए आटे को जल में घोलकर दे दिया। उसे 'यह दूध है' कहकर लाया गया देखकर उस मुनि ने तब आटा पहचान लिया।
श्लोक 72 (skanda.8.34.72)
नैतत् क्षीरमिति प्राह मातरं सा ततोब्रवीत् । वत्स क्षीरं कुतोस्माकं कुतश्चान्नं तपस्विनाम्
naitat kṣīramiti prāha mātaraṁ sā tatobravīt | vatsa kṣīraṁ kutosmākaṁ kutaścānnaṁ tapasvinām
उसने कहा - यह दूध नहीं है। तब माता ने उससे कहा - हे वत्स! हम तपस्वियों को दूध कहाँ से, और अन्न भी कहाँ से मिले?
श्लोक 73 (skanda.8.34.73)
आराधय महादेवं स ते सर्वं प्रदास्यति । इत्युक्तः स तदा मात्रा दुःखशोकपरिप्लुतः
ārādhaya mahādevaṁ sa te sarvaṁ pradāsyati | ityuktaḥ sa tadā mātrā duḥkhaśokapariplutaḥ
महादेव की आराधना करो, वे ही तुम्हें सब कुछ प्रदान करेंगे। इस प्रकार माता द्वारा कहे जाने पर वह दुःख और शोक में डूब गया।
श्लोक 74 (skanda.8.34.74)
जगाम शरणं देवं सर्वभावेन शङ्करम् । आदित्याभिमुखो भूत्वा पादेनैकेन संयतः
jagāma śaraṇaṁ devaṁ sarvabhāvena śaṅkaram | ādityābhimukho bhūtvā pādenaikena saṁyataḥ
वह सर्वभाव से शंकर देव की शरण में गया। सूर्य के सम्मुख होकर, एक पैर पर संयमपूर्वक खड़ा हुआ।
श्लोक 75 (skanda.8.34.75)
मनसाचिन्तयन्नित्यं प्रणतार्तिहरं हरम् । सहस्रमेकं वर्षाणां तस्थौ दिव्यं फलाशनः
manasācintayannityaṁ praṇatārtiharaṁ haram | sahasramekaṁ varṣāṇāṁ tasthau divyaṁ phalāśanaḥ
मन में सदा प्रणतजनों की पीड़ा हरने वाले हर का ध्यान करते हुए, वह दिव्य फल खाकर एक हजार वर्षों तक खड़ा रहा।
श्लोक 76 (skanda.8.34.76)
द्वितीयं शीर्णपर्णाशी तृतीयं चाम्बुभोजनः । महादेवपरो भूत्वा चतुर्थं यो जितेन्द्रियः । तस्थौ सहस्रं वर्षाणामनिलाशन एव च
dvitīyaṁ śīrṇaparṇāśī tṛtīyaṁ cāmbubhojanaḥ | mahādevaparo bhūtvā caturthaṁ yo jitendriyaḥ | tasthau sahasraṁ varṣāṇāmanilāśana eva ca
दूसरे हजार वर्ष सूखे पत्ते खाकर, तीसरे में केवल जल पीकर, महादेव में तत्पर होकर, चौथे में जितेन्द्रिय होकर।
श्लोक 77 (skanda.8.34.77)
यदा चतुर्थं संपूर्णं सहस्रं शरदां मुनेः । तुष्टस्तदा ददौ शर्वः शक्ररूपेण दर्शनम्
yadā caturthaṁ saṁpūrṇaṁ sahasraṁ śaradāṁ muneḥ | tuṣṭastadā dadau śarvaḥ śakrarūpeṇa darśanam
वह केवल वायु का आहार लेकर हजार वर्षों तक खड़ा रहा। जब उस मुनि के चौथे हजार वर्ष पूर्ण हो गए, तब प्रसन्न होकर शर्व ने इन्द्र के रूप में दर्शन दिया।
श्लोक 78 (skanda.8.34.78)
शक्र उवाच । उपमन्यो महाभाग तपस्ते बहु संचितम् । तुष्टोस्मि ते वरं ब्रूहि यद्यदिच्छसि पुत्रक
śakra uvāca | upamanyo mahābhāga tapaste bahu saṁcitam | tuṣṭosmi te varaṁ brūhi yadyadicchasi putraka
इन्द्र ने कहा - हे महाभाग उपमन्यु! तुमने बहुत तप संचित किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; हे पुत्रक! जो कुछ चाहते हो, वर माँगो।
श्लोक 79 (skanda.8.34.79)
उपमन्युरुवाच । स्वागतं देवराजस्य त्रैलोक्याधिपतेरिह । अद्य निष्कल्मषं मन्ये तपश्चीर्णं मया महत्
upamanyuruvāca | svāgataṁ devarājasya trailokyādhipateriha | adya niṣkalmaṣaṁ manye tapaścīrṇaṁ mayā mahat
उपमन्यु ने कहा - त्रिलोक के अधिपति देवराज का यहाँ स्वागत है। आज मैं मानता हूँ कि मेरा किया हुआ महान तप निष्कलंक हो गया।
श्लोक 80 (skanda.8.34.80)
योहं त्रैलोक्यदेवेशमिन्द्रं पश्यामि दिक्पतिम् । इदं पाद्यमिदं चार्ध्यमिदमासनविष्टरम्
yohaṁ trailokyadeveśamindraṁ paśyāmi dikpatim | idaṁ pādyamidaṁ cārdhyamidamāsanaviṣṭaram
मैं, जो त्रिलोक के देवेश, दिक्पति इन्द्र को देख रहा हूँ - यह पाद्य है, यह अर्घ्य है, यह आसन है।
श्लोक 81 (skanda.8.34.81)
अयं च मधुपर्कस्ते गृह्यतां सदसस्पते । किं करोमि तदाख्याहि प्रार्थयस्व महाबल । कृतमेव हि तद्विद्धि यदि स्यात् सुकरं मया
ayaṁ ca madhuparkaste gṛhyatāṁ sadasaspate | kiṁ karomi tadākhyāhi prārthayasva mahābala | kṛtameva hi tadviddhi yadi syāt sukaraṁ mayā
और यह आपके लिए मधुपर्क है, हे सभा के स्वामी! इसे ग्रहण कीजिए। मैं क्या करूँ, यह बताइए, हे महाबल! आज्ञा दीजिए। यदि मुझसे सहज हो सके, तो जान लीजिए कि वह किया ही हुआ है।
श्लोक 82 (skanda.8.34.82)
शक्र उवाच । भक्तो मे पिता विप्र सखाभूत् परमः पुरा । तेन स्नेहेन दृष्ट्वाहं भवन्तं तपसि स्थितम् । क्लिश्यमानमिहायातो ब्रूहि किन्ते ददान्यहम्
śakra uvāca | bhakto me pitā vipra sakhābhūt paramaḥ purā | tena snehena dṛṣṭvāhaṁ bhavantaṁ tapasi sthitam | kliśyamānamihāyāto brūhi kinte dadānyaham
इन्द्र ने कहा - हे विप्र! पहले तुम्हारे पिता मेरे परम प्रिय भक्त और मित्र थे। उसी स्नेह के कारण मैं तुम्हें तप में स्थित तथा क्लेश उठाते देखकर यहाँ आया हूँ; बताओ, मैं तुम्हें क्या दूँ?
श्लोक 83 (skanda.8.34.83)
उपमन्युरुवाच । देवराज्यमपि त्वत्तो नाहं कांक्षे सुरोत्तम । महादेवमहं भक्तस्तस्मादिच्छाम्यहं वरम्
upamanyuruvāca | devarājyamapi tvatto nāhaṁ kāṁkṣe surottama | mahādevamahaṁ bhaktastasmādicchāmyahaṁ varam
उपमन्यु ने कहा - हे उत्तम देव! मैं आपसे देवराज्य की भी इच्छा नहीं करता। मैं महादेव का भक्त हूँ, इसलिए उन्हीं से वर की इच्छा करता हूँ।
श्लोक 84 (skanda.8.34.84)
शक्र उवाच । महादेवं न पश्यन्ति सुरापि सदसस्पतिम् । न तं द्रक्ष्यसि विप्रेन्द्र ब्रूहि यत्ते मनोगतम्
śakra uvāca | mahādevaṁ na paśyanti surāpi sadasaspatim | na taṁ drakṣyasi viprendra brūhi yatte manogatam
इन्द्र ने कहा - हे विप्रेन्द्र! सभा के स्वामी महादेव को तो देवता भी नहीं देख पाते; तुम भी उन्हें नहीं देख सकोगे। जो तुम्हारे मन में हो, वह मुझसे कहो।
श्लोक 85 (skanda.8.34.85)
अहं पितुस्ते स्नेहेन इहायातो महाव्रत । धर्मतो हि सुतो मे त्वं ब्रूहि तस्माद् ददाम्यहम्
ahaṁ pituste snehena ihāyāto mahāvrata | dharmato hi suto me tvaṁ brūhi tasmād dadāmyaham
मैं तुम्हारे पिता के स्नेह के कारण ही, हे महाव्रत! यहाँ आया हूँ। धर्म से तुम मेरे ही पुत्र हो; इसलिए बताओ, मैं तुम्हें दूँगा।
श्लोक 86 (skanda.8.34.86)
उपमन्युरुवाच । कृतं स्वजनकृत्यं ते पूजितोस्मि त्वया प्रभो । गच्छ नाहमृते रुद्राद् वरं याचेन्यसंभवम्
upamanyuruvāca | kṛtaṁ svajanakṛtyaṁ te pūjitosmi tvayā prabho | gaccha nāhamṛte rudrād varaṁ yācenyasaṁbhavam
उपमन्यु ने कहा - आपने अपने आत्मीयजन के प्रति कर्तव्य पूरा कर लिया, हे प्रभो! मैं आपके द्वारा सम्मानित हुआ। जाइए; रुद्र के बिना मैं ऐसा वर नहीं माँगूँगा जो असंभव हो।
श्लोक 87 (skanda.8.34.87)
सनत्कुमार उवाच । एवमुक्तः स तेजस्वी शक्ररूपी महेश्वरः । उवाच तप्स्यसे पश्चात् किं ते रुद्रः करिष्यति
sanatkumāra uvāca | evamuktaḥ sa tejasvī śakrarūpī maheśvaraḥ | uvāca tapsyase paścāt kiṁ te rudraḥ kariṣyati
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार कहे जाने पर, इन्द्र-रूपधारी वह तेजस्वी महेश्वर बोले - बाद में तुम तप करते रहोगे, तब रुद्र तुम्हारे लिए क्या करेंगे?
श्लोक 88 (skanda.8.34.88)
गच्छामि स्वस्ति ते चास्तु निर्विघ्नस्ते भवत्वयम् । रुद्रं प्रति समारम्भः स्मरेथास्त्वं हि मां विभो
gacchāmi svasti te cāstu nirvighnaste bhavatvayam | rudraṁ prati samārambhaḥ smarethāstvaṁ hi māṁ vibho
मैं जाता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे लिए यह निर्विघ्न हो। जब रुद्र के विषय में इस प्रयास में लगोगे, हे विभो! तब तुम मुझे स्मरण करना।
श्लोक 89 (skanda.8.34.89)
सनत्कुमार उवाच । गते तस्मिन् तदा हीन्द्रे रुद्रः स्वं रूपमास्थितः । तस्यादर्शयदव्यग्र इदं चोवाच सुस्वरम्
sanatkumāra uvāca | gate tasmin tadā hīndre rudraḥ svaṁ rūpamāsthitaḥ | tasyādarśayadavyagra idaṁ covāca susvaram
सनत्कुमार बोले - इन्द्र के चले जाने पर, रुद्र ने अपने ही रूप में स्थित होकर, बिना विचलित हुए, उसे अपना दर्शन दिया और मधुर स्वर में यह कहा।
श्लोक 90 (skanda.8.34.90)
रुद्र उवाच । उपमन्यो महाभाग पश्य मां विगतज्वरः । ब्रूहि निश्चित्य मनसा वरं यावद्ददामि ते
rudra uvāca | upamanyo mahābhāga paśya māṁ vigatajvaraḥ | brūhi niścitya manasā varaṁ yāvaddadāmi te
रुद्र ने कहा - हे महाभाग उपमन्यु! मुझे ज्वररहित होकर देखो। जो वर तुम मुझसे चाहते हो, उसे मन में निश्चय करके कहो, मैं तुम्हें दूँगा।
श्लोक 91 (skanda.8.34.91)
सनत्कुमार उवाच । ततः स दृष्ट्वा देवेशं शिरसाभिप्रणम्य च । उवाच प्रणतो वाक्यं मनसा संप्रधारयन्
sanatkumāra uvāca | tataḥ sa dṛṣṭvā deveśaṁ śirasābhipraṇamya ca | uvāca praṇato vākyaṁ manasā saṁpradhārayan
सनत्कुमार बोले - तब उस देवेश को देखकर, सिर से प्रणाम करके, विनम्र होकर, मन में भलीभाँति विचार करते हुए उसने यह कहा।
श्लोक 92 (skanda.8.34.92)
भगवन् यदि तुष्टोसि सदा सुरगणार्चित । यद् ब्रवीमि तदीशान मह्यं यच्छ नमोस्तु ते
bhagavan yadi tuṣṭosi sadā suragaṇārcita | yad bravīmi tadīśāna mahyaṁ yaccha namostu te
हे भगवन्! यदि आप, जिनकी सदा देवगण अर्चना करते हैं, प्रसन्न हैं, तो हे ईशान! जो मैं कहता हूँ, वह मुझे प्रदान कीजिए; आपको नमस्कार है।
श्लोक 93 (skanda.8.34.93)
द्रव्यं किंचिदनाश्रित्य मानुषं दिव्यमेव वा । क्षीरोदनं समश्नीयामयाचितमुपस्थितम्
dravyaṁ kiṁcidanāśritya mānuṣaṁ divyameva vā | kṣīrodanaṁ samaśnīyāmayācitamupasthitam
मैं बिना किसी वस्तु का, चाहे मानुष हो या दिव्य, आश्रय लिए, अयाचित रूप से उपस्थित क्षीरौदन (खीर) का भोजन करूँ।
श्लोक 94 (skanda.8.34.94)
देवदेव उवाच । अनाश्रित्येह नैवास्ति कस्यचिद् द्विजसत्तम । तृणमप्याश्रयं कृत्वा तस्माद्वद महामुने
devadeva uvāca | anāśrityeha naivāsti kasyacid dvijasattama | tṛṇamapyāśrayaṁ kṛtvā tasmādvada mahāmune
देवदेव ने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! इस संसार में बिना किसी आश्रय के कुछ भी नहीं है, तिनके का भी आश्रय लिए बिना कोई नहीं रह सकता; इसलिए, हे महामुने! ऐसा कहो।
श्लोक 95 (skanda.8.34.95)
उपमन्युरुवाच । नैवाहमाश्रये किञ्चित् प्रसादाद् भगवँस्तव । तदर्थश्चायमारम्भस्तत् प्रयच्छ यथार्थितम्
upamanyuruvāca | naivāhamāśraye kiñcit prasādād bhagavaṁstava | tadarthaścāyamārambhastat prayaccha yathārthitam
उपमन्यु ने कहा - हे भगवन्! मैं आपकी कृपा के अतिरिक्त किसी वस्तु का आश्रय नहीं लेता। इसी उद्देश्य से यह प्रयास है; कृपया वह मुझे प्रदान कीजिए, जैसा प्रार्थना की गई है।
श्लोक 96 (skanda.8.34.96)
देवदेव उवाच । मुने किञ्चिदनाश्रित्य नास्ति क्षीरोदनं तव । इत्युक्त्वा तं महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत
devadeva uvāca | mune kiñcidanāśritya nāsti kṣīrodanaṁ tava | ityuktvā taṁ mahādevastatraivāntaradhīyata
देवदेव ने कहा - हे मुने! बिना किसी वस्तु का आश्रय लिए तुम्हारे लिए क्षीरौदन नहीं है। ऐसा कहकर महादेव वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 97 (skanda.8.34.97)
अन्तर्धानं ततो गत्वा जिज्ञासार्थं पिनाकधृक् । ब्रह्मणो रूपमास्थाय भूय एनं ततोब्रवीत्
antardhānaṁ tato gatvā jijñāsārthaṁ pinākadhṛk | brahmaṇo rūpamāsthāya bhūya enaṁ tatobravīt
अन्तर्धान होकर, उसकी परीक्षा के लिए, पिनाकधारी ने ब्रह्मा का रूप धारण कर, पुनः उसके सामने आकर यह कहा।
श्लोक 98 (skanda.8.34.98)
ब्रह्मोवाच । उपमन्यो महाप्राज्ञ सुचीर्णं ते तपः शुभम् । तुष्टोस्मि ते वरं ब्रूहि प्रयच्छामि यथेप्सितम्
brahmovāca | upamanyo mahāprājña sucīrṇaṁ te tapaḥ śubham | tuṣṭosmi te varaṁ brūhi prayacchāmi yathepsitam
ब्रह्मा ने कहा - हे महाप्राज्ञ उपमन्यु! तुमने अत्यन्त उत्तम तप का सम्यक् आचरण किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, वर माँगो, मैं तुम्हें इच्छानुसार प्रदान करूँगा।
श्लोक 99 (skanda.8.34.99)
उपमन्युरुवाच । भगवन् सर्वलोकेश नमस्ते सर्वसृक् प्रभो । सुचीर्णं मे तपो देव यत्त्वां पश्यामि लोकप
upamanyuruvāca | bhagavan sarvalokeśa namaste sarvasṛk prabho | sucīrṇaṁ me tapo deva yattvāṁ paśyāmi lokapa
उपमन्यु ने कहा - हे भगवन्! हे सर्वलोकेश! हे सृष्टिकर्ता प्रभो! आपको नमस्कार है। हे लोकपते! मेरा तप सफल हुआ, क्योंकि मैं आपको देख रहा हूँ।
श्लोक 100 (skanda.8.34.100)
महेश्वरमहं भक्तस्तदाशीस्तत्परायणः । तस्माद्वरं वृणे देव त्वत्तो नाहमसंशयम्
maheśvaramahaṁ bhaktastadāśīstatparāyaṇaḥ | tasmādvaraṁ vṛṇe deva tvatto nāhamasaṁśayam
मैं महेश्वर का भक्त हूँ, उन्हीं का आशीर्वाद पाने में तत्पर हूँ। इसलिए, हे देव! मैं निःसंदेह आपसे कोई वर नहीं माँगता।
श्लोक 101 (skanda.8.34.101)
ब्रह्मोवाच । रुद्रस्ते नाददद्विप्र क्षोरौदनमदुर्लभम् । स तेन्यत् कुत एवेह दास्यते वरमुत्तमम्
brahmovāca | rudraste nādadadvipra kṣoraudanamadurlabham | sa tenyat kuta eveha dāsyate varamuttamam
ब्रह्मा ने कहा - हे विप्र! रुद्र ने तुम्हें दुर्लभ क्षीरौदन नहीं दिया; फिर वह और क्या देगा, कि यहाँ से तुम्हें उत्तम वर मिल सके?
श्लोक 102 (skanda.8.34.102)
प्राजापत्यं सुरत्वं वाप्यमरत्वमथापि वा । इन्द्रत्वमथ सोमत्वं विष्णुत्वं वा ददानि ते
prājāpatyaṁ suratvaṁ vāpyamaratvamathāpi vā | indratvamatha somatvaṁ viṣṇutvaṁ vā dadāni te
मैं तुम्हें प्रजापतित्व, देवत्व, अथवा अमरत्व दे सकता हूँ; या इन्द्रत्व, या सोमत्व, या विष्णुत्व भी दे सकता हूँ।
श्लोक 103 (skanda.8.34.103)
लोकपालो भवानस्तु सर्वलोकाभिपूजितः । ब्रूहि किन्ते ददान्यद्य विसृजस्व महेश्वरम् । नासौ दाता तवेशानस्तृणमप्येकमल्पकम्
lokapālo bhavānastu sarvalokābhipūjitaḥ | brūhi kinte dadānyadya visṛjasva maheśvaram | nāsau dātā taveśānastṛṇamapyekamalpakam
तुम समस्त लोकों द्वारा पूजित लोकपाल बन जाओ। बताओ, मैं आज तुम्हें क्या दूँ; महेश्वर को त्याग दो। वह ईश तुम्हें एक तिनका भी देने वाला नहीं है।
श्लोक 104 (skanda.8.34.104)
उपमन्युरुवाच । न गृहीतं प्रभो तेन मम किञ्चिन्महात्मना । ईश्वरः सर्वभूतानां न स्वामी तस्य कश्चन
upamanyuruvāca | na gṛhītaṁ prabho tena mama kiñcinmahātmanā | īśvaraḥ sarvabhūtānāṁ na svāmī tasya kaścana
उपमन्यु ने कहा - हे प्रभो! उस महात्मा ने मुझसे कुछ भी नहीं लिया है। वे समस्त प्राणियों के स्वामी हैं; उनका कोई स्वामी नहीं है।
श्लोक 105 (skanda.8.34.105)
इच्छया कुरुते देवः सर्वकार्याणि कार्यिणाम् । ददाति यदि लाभो मे न ददाति तथापि च
icchayā kurute devaḥ sarvakāryāṇi kāryiṇām | dadāti yadi lābho me na dadāti tathāpi ca
वह देव अपनी इच्छा से ही समस्त कार्यकर्ताओं के सारे कार्य करते हैं। यदि वे देते हैं, तो मेरा लाभ है; न भी दें, तो भी।
श्लोक 106 (skanda.8.34.106)
बहुना किं प्रलप्तेन तेन दत्तमहं वृणे । नरकं वा पशुत्वं वा किं पुनर्यदतोन्यथा
bahunā kiṁ pralaptena tena dattamahaṁ vṛṇe | narakaṁ vā paśutvaṁ vā kiṁ punaryadatonyathā
बहुत बकवाद करने से क्या लाभ? जो कुछ भी उन्होंने दिया है, वही मैं स्वीकार करता हूँ - चाहे वह नरक हो या पशुयोनि, अन्यथा इससे और क्या हो सकता है?
श्लोक 107 (skanda.8.34.107)
त्वत्तो नेच्छामि विष्णुत्वं न शक्रत्वं पितामह । गच्छ सर्वसुरेशान मा वृथा क्लेशमाचर
tvatto necchāmi viṣṇutvaṁ na śakratvaṁ pitāmaha | gaccha sarvasureśāna mā vṛthā kleśamācara
हे पितामह! मैं आपसे न विष्णुत्व चाहता हूँ, न इन्द्रत्व। जाइए, हे समस्त देवताओं के स्वामी! व्यर्थ ही कष्ट मत उठाइए।
श्लोक 108 (skanda.8.34.108)
सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तो देवेशस्तेन ब्रह्मर्षिणा तदा । तस्य तत्र पुनर्वाक्यं वरार्थमवदत् प्रभुः
sanatkumāra uvāca | sa evamukto deveśastena brahmarṣiṇā tadā | tasya tatra punarvākyaṁ varārthamavadat prabhuḥ
सनत्कुमार बोले - इस प्रकार उस ब्रह्मर्षि द्वारा कहे जाने पर, वे प्रभु देवेश (ब्रह्मारूपी शिव) वहाँ पुनः वर के लिए उससे बोले।
श्लोक 109 (skanda.8.34.109)
उपमन्युरपीशाने मन आधाय निश्चलम् । तूष्णीं बभूव देवोपि तत्रैवान्तरधीयत
upamanyurapīśāne mana ādhāya niścalam | tūṣṇīṁ babhūva devopi tatraivāntaradhīyata
उपमन्यु ने भी अपने मन को ईश्वर में ही स्थिर करके मौन धारण कर लिया। तब वह देव भी वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 110 (skanda.8.34.110)
तस्य तां भावनां ज्ञात्वा पिनाकीशस्त्रिलोचनः । स्वमेव रूपमास्थाय दर्शयामास तत्क्षणात्
tasya tāṁ bhāvanāṁ jñātvā pinākīśastrilocanaḥ | svameva rūpamāsthāya darśayāmāsa tatkṣaṇāt
उसकी उस भावना को जानकर, पिनाकधारी त्रिलोचन देव ने अपने ही वास्तविक रूप को धारण कर, तत्क्षण ही उसे दर्शन दिया।
श्लोक 111 (skanda.8.34.111)
त्र्यक्षो जटी विशालाक्षः कुण्डली दीप्तलोचनः । ज्वालामालाधरः श्रीमान् भुजगाबद्धमेखलः
tryakṣo jaṭī viśālākṣaḥ kuṇḍalī dīptalocanaḥ | jvālāmālādharaḥ śrīmān bhujagābaddhamekhalaḥ
वे त्रिनेत्र, जटाधारी, विशाल नेत्रों वाले, कुण्डलधारी, प्रज्वलित नेत्रों वाले, ज्वालाओं की माला धारण करने वाले, श्रीमान्, सर्पों से बँधी हुई करधनी वाले थे।
श्लोक 112 (skanda.8.34.112)
सर्पयज्ञोपवीती च व्याघ्रचर्माम्बरच्छदः । कृष्णाजिनोत्तरीयश्च कमण्डलुधरस्तथा
sarpayajñopavītī ca vyāghracarmāmbaracchadaḥ | kṛṣṇājinottarīyaśca kamaṇḍaludharastathā
सर्पमय यज्ञोपवीत धारण किए, व्याघ्रचर्म का वस्त्र पहने, कृष्णमृगचर्म को उत्तरीय के रूप में धारण किए, कमण्डलु धारण करने वाले थे।
श्लोक 113 (skanda.8.34.113)
दण्डी शूली महाहासो गणपैर्बहुभिर्वृतः । उवाच पुत्र पुत्रेति तुष्टोस्मि तपसा तव
daṇḍī śūlī mahāhāso gaṇapairbahubhirvṛtaḥ | uvāca putra putreti tuṣṭosmi tapasā tava
दण्ड, त्रिशूल धारण करने वाले, महान् अट्टहास करने वाले, अनेक गणों से घिरे हुए। उन्होंने कहा - हे पुत्र, पुत्र! मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ।
श्लोक 114 (skanda.8.34.114)
अमरो जरया त्यक्तः सर्वदुःखविवर्जितः । कामरूपधरः श्रीमान् मत्प्रसादाद् भविष्यसि
amaro jarayā tyaktaḥ sarvaduḥkhavivarjitaḥ | kāmarūpadharaḥ śrīmān matprasādād bhaviṣyasi
मेरी कृपा से तुम अमर, जरा से रहित, समस्त दुःखों से मुक्त, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, श्रीमान् हो जाओगे।
श्लोक 115 (skanda.8.34.115)
द्वीपञ्चेमं गृहाण त्वं मया सृष्टं हि कामगम् । क्षीरौदनसमुद्रेण सर्वतः परिवारितम्
dvīpañcemaṁ gṛhāṇa tvaṁ mayā sṛṣṭaṁ hi kāmagam | kṣīraudanasamudreṇa sarvataḥ parivāritam
मेरे द्वारा रचित इस इच्छानुसार गमन करने वाले द्वीप को ग्रहण करो, जो चारों ओर क्षीरौदन के समुद्र से घिरा हुआ है।
श्लोक 116 (skanda.8.34.116)
महायोगबलो भूत्वा सर्वज्ञः प्रियदर्शनः । भुंक्ष्व क्षीरौदनं वत्स बन्धुभिस्सहितः सदा
mahāyogabalo bhūtvā sarvajñaḥ priyadarśanaḥ | bhuṁkṣva kṣīraudanaṁ vatsa bandhubhissahitaḥ sadā
महान् योगबल से युक्त, सर्वज्ञ, प्रियदर्शन होकर, हे वत्स! सदा अपने बन्धुजनों सहित उस क्षीरौदन का भोग करो।
श्लोक 117 (skanda.8.34.117)
सप्तपूर्वाणि सर्वाणि कुलानि तव तापस । इदं चैव कुलं सर्वमनुगृहणामि सुव्रत
saptapūrvāṇi sarvāṇi kulāni tava tāpasa | idaṁ caiva kulaṁ sarvamanugṛhaṇāmi suvrata
हे तपस्वी! तुम्हारे सातों पूर्व कुलों को, तथा इस वर्तमान कुल को भी, हे सुव्रत! मैं अनुगृहीत करता हूँ।
श्लोक 118 (skanda.8.34.118)
सर्वे भवन्तु विप्रर्षे य इमे तव बान्धवाः । मत्प्रसादान्महासत्वा नित्यं क्षीरौदनाशनाः
sarve bhavantu viprarṣe ya ime tava bāndhavāḥ | matprasādānmahāsatvā nityaṁ kṣīraudanāśanāḥ
हे विप्रर्षे! जो भी तुम्हारे बन्धुजन हैं, वे सब मेरी कृपा से महान् बलशाली होकर सदा क्षीरौदन खाने वाले बनें।
श्लोक 119 (skanda.8.34.119)
सनत्कुमार उवाच । स तु तं वरमादाय प्रणम्य शिरसा भवम् । शिरस्यञ्जलिमाधाय अस्तौषीत् प्रयतात्मवान्
sanatkumāra uvāca | sa tu taṁ varamādāya praṇamya śirasā bhavam | śirasyañjalimādhāya astauṣīt prayatātmavān
सनत्कुमार बोले - उसने वह वर प्राप्त कर, सिर झुकाकर भव को प्रणाम किया, सिर पर अंजलि रखकर, संयमित मन से उनकी स्तुति की।
श्लोक 120 (skanda.8.34.120)
उपमन्युरुवाच । नमः सर्वामरेशाय विश्वेशाय नमो नमः । नमः सर्वार्तिहर्त्रे च नमश्शोकहराय च
upamanyuruvāca | namaḥ sarvāmareśāya viśveśāya namo namaḥ | namaḥ sarvārtihartre ca namaśśokaharāya ca
उपमन्यु ने कहा - समस्त देवताओं के स्वामी को नमस्कार, विश्वेश्वर को बारम्बार नमस्कार। समस्त पीड़ाओं को हरने वाले को तथा शोक हरने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 121 (skanda.8.34.121)
नमः पवनवेगाय नमः पवनरूपिणे । नमः काञ्चनमालाय पद्ममालाय वै नमः
namaḥ pavanavegāya namaḥ pavanarūpiṇe | namaḥ kāñcanamālāya padmamālāya vai namaḥ
वायु के समान वेग वाले को नमस्कार, वायु-रूप को नमस्कार। सुवर्ण की माला वाले को, कमल की माला वाले को नमस्कार है।
श्लोक 122 (skanda.8.34.122)
नमः सुररिपुघ्नाय चण्डवेगाय वै नमः । नमः पितृसुरेशाय मखघ्नाय च वै नमः
namaḥ suraripughnāya caṇḍavegāya vai namaḥ | namaḥ pitṛsureśāya makhaghnāya ca vai namaḥ
देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले को नमस्कार, प्रचण्ड वेग वाले को नमस्कार। पितरों तथा देवताओं के स्वामी को, यज्ञ का नाश करने वाले को भी नमस्कार है।
श्लोक 123 (skanda.8.34.123)
स्त्रीरूपाय नमस्तुभ्यं सर्वरूपधराय च । नमः कन्दर्पनाशाय विश्वस्रष्ट्रे नमो नमः
strīrūpāya namastubhyaṁ sarvarūpadharāya ca | namaḥ kandarpanāśāya viśvasraṣṭre namo namaḥ
स्त्री-रूप धारण करने वाले को नमस्कार, समस्त रूप धारण करने वाले को नमस्कार। काम के नाशक को, विश्व के स्रष्टा को बारम्बार नमस्कार है।
श्लोक 124 (skanda.8.34.124)
नमो विश्वाय पाशाय नमोचिन्त्याय चैव हि । त्वन्नो गतिश्च श्रेयश्च त्वमेव हृदयं सदा
namo viśvāya pāśāya namocintyāya caiva hi | tvanno gatiśca śreyaśca tvameva hṛdayaṁ sadā
विश्व-स्वरूप, पाशधारी को नमस्कार, अचिन्त्य को भी नमस्कार। आप ही हमारी गति और कल्याण हैं, आप ही सदा हमारे हृदय हैं।
श्लोक 125 (skanda.8.34.125)
सनत्कुमार उवाच । ततस्तं मूर्ध्न्युपाघ्राय समाश्वास्य विसृज्य च । जगाम भगवान् व्यास सुकेशं प्रति स प्रभुः
sanatkumāra uvāca | tatastaṁ mūrdhnyupāghrāya samāśvāsya visṛjya ca | jagāma bhagavān vyāsa sukeśaṁ prati sa prabhuḥ
सनत्कुमार बोले - तब उसके मस्तक को सूँघकर, उसे सांत्वना देकर तथा विदा करके, हे व्यास! प्रभु भगवान सुकेश की ओर चले गए।
श्लोक 126 (skanda.8.34.126)
उपमन्युं ज्वलितानलप्रकाशं शतमन्युं तपसा जिगीषमाणम् । स चकार नतं हरोग्रमन्युं वरदानेन तदा व्यपेतमन्युम्
upamanyuṁ jvalitānalaprakāśaṁ śatamanyuṁ tapasā jigīṣamāṇam | sa cakāra nataṁ harogramanyuṁ varadānena tadā vyapetamanyum
इस प्रकार हर ने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, अपने तप से शतमन्यु (इन्द्र) को भी जीतने की इच्छा रखने वाले, उग्र क्रोधी उपमन्यु को वर देकर विनम्र तथा क्रोधरहित बना दिया।