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अम्बिका खण्ड · अध्याय 35

सुकेशवरप्रदान

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

श्लोक 1 (skanda.8.35.1)

सनत्कुमार उवाच । ततः स भगवान् देवः सुकेशं गणपं पुनः । चकार ब्राह्मणं व्यास तपः सत्यपरायणम्

sanatkumāra uvāca | tataḥ sa bhagavān devaḥ sukeśaṁ gaṇapaṁ punaḥ | cakāra brāhmaṇaṁ vyāsa tapaḥ satyaparāyaṇam

सनत्कुमार बोले - हे व्यास! तदनन्तर भगवान देव ने सत्यनिष्ठ तप करने वाले उस ब्राह्मण सुकेश को पुनः गणप बना दिया।

श्लोक 2 (skanda.8.35.2)

व्यास उवाच । कथं स ब्राह्मणः पूर्वं गणेशत्वमुपागतः । केनास्य तपसा तुष्टो गणेशत्वं ददौ प्रभुः

vyāsa uvāca | kathaṁ sa brāhmaṇaḥ pūrvaṁ gaṇeśatvamupāgataḥ | kenāsya tapasā tuṣṭo gaṇeśatvaṁ dadau prabhuḥ

व्यास ने कहा - वह ब्राह्मण पहले किस प्रकार गणेशत्व को प्राप्त हुआ था? उसके किस तप से प्रसन्न होकर प्रभु ने उसे गणेशत्व प्रदान किया था?

श्लोक 3 (skanda.8.35.3)

सनत्कुमार उवाच । आसीद्वसिष्ठकुलजो ब्राह्मणस्सत्यवाक् शुचिः । तीर्थयात्रास्वभिरत उपवासपरायणः

sanatkumāra uvāca | āsīdvasiṣṭhakulajo brāhmaṇassatyavāk śuciḥ | tīrthayātrāsvabhirata upavāsaparāyaṇaḥ

सनत्कुमार बोले - वसिष्ठ के कुल में उत्पन्न, सत्यवादी, पवित्र एक ब्राह्मण था, जो तीर्थयात्राओं में रत तथा उपवास में तत्पर रहता था।

श्लोक 4 (skanda.8.35.4)

स कदाचिद्विदेशस्थो वने पश्यन् पथि स्थितम् । व्याघ्रं व्यात्ताननं घोरं नखदंष्ट्रायुधं तदा

sa kadācidvideśastho vane paśyan pathi sthitam | vyāghraṁ vyāttānanaṁ ghoraṁ nakhadaṁṣṭrāyudhaṁ tadā

एक बार वह विदेश में वन में मार्ग पर खड़ा हुआ, फैले हुए मुख वाला, भयंकर, नख-दाढ़ रूपी शस्त्रों वाला व्याघ्र देख रहा था।

श्लोक 5 (skanda.8.35.5)

दृष्ट्वा तं स तदा विप्रस्त्यक्त्वा पन्थानमाशुगः । विवेश महतीं घोरामटवीं प्राणिवर्जिताम्

dṛṣṭvā taṁ sa tadā viprastyaktvā panthānamāśugaḥ | viveśa mahatīṁ ghorāmaṭavīṁ prāṇivarjitām

उसे देखकर वह ब्राह्मण मार्ग छोड़कर वेगपूर्वक भागा, तथा एक विशाल, भयंकर, प्राणि-रहित अटवी में प्रवेश कर गया।

श्लोक 6 (skanda.8.35.6)

तत्रापश्यत् स पुरतो वीरणस्तम्बमाश्रितान् । पुरुषाँल्लम्बमानाँश्च क्रन्दमानान् सुदुःखितान्

tatrāpaśyat sa purato vīraṇastambamāśritān | puruṣāṁllambamānāṁśca krandamānān suduḥkhitān

वहाँ उसने आगे वीरण घास के झुरमुट के सहारे लटके हुए पुरुषों को देखा, जो चिल्ला रहे थे और अत्यन्त दुःखी थे।

श्लोक 7 (skanda.8.35.7)

तानवाक्शिरसो दृष्ट्वा लम्बमानांस्तदा द्विजान् । के यूयमिति पप्रच्छ ते चैनमिदमूचिरे

tānavākśiraso dṛṣṭvā lambamānāṁstadā dvijān | ke yūyamiti papraccha te cainamidamūcire

उन नीचे सिर किए हुए, लटकते हुए द्विजों को देखकर उसने पूछा - तुम कौन हो? तब उन्होंने उससे यह कहा।

श्लोक 8 (skanda.8.35.8)

पितर ऊचुः । तव स्मः पितरस्सर्वे नरकेस्मिन्नधोमुखाः । वीरणे त्वयि लम्बामस्तव दोषेण दुर्मते

pitara ūcuḥ | tava smaḥ pitarassarve narakesminnadhomukhāḥ | vīraṇe tvayi lambāmastava doṣeṇa durmate

पितरों ने कहा - हम सब तुम्हारे पितर हैं, इस नरक में अधोमुख होकर, तुम्हारे ही दोष के कारण, हे दुर्बुद्धे! इस वीरण घास पर लटके हुए हैं।

श्लोक 9 (skanda.8.35.9)

पुत्रानिच्छन्ति मनुजास्तारयिष्यन्ति नस्त्विमे । नरकादिति स त्वन्नः पातयिष्यसि दुःखितान्

putrānicchanti manujāstārayiṣyanti nastvime | narakāditi sa tvannaḥ pātayiṣyasi duḥkhitān

मनुष्य पुत्रों की इच्छा करते हैं, क्योंकि वे उन्हें नरक से तार देते हैं; परन्तु तुम तो हमें, दुःखी लोगों को, इस प्रकार गिरा दोगे।

श्लोक 10 (skanda.8.35.10)

विप्र उवाच । मया तीर्थाभिगमनात् तपो यत् समुपार्जितम् । जन्मप्रभृति यच्चापि मया किञ्चित् कृतं शुभम् । तेन यूयमितो गर्त्तादुद्धरध्वं पितामहाः

vipra uvāca | mayā tīrthābhigamanāt tapo yat samupārjitam | janmaprabhṛti yaccāpi mayā kiñcit kṛtaṁ śubham | tena yūyamito garttāduddharadhvaṁ pitāmahāḥ

ब्राह्मण ने कहा - तीर्थयात्राओं से मैंने जो तप अर्जित किया है, तथा जन्म से लेकर मैंने जो कुछ भी शुभ किया है, उसी से, हे पितामहो! मुझसे इस गड्ढे से बाहर निकलो।

श्लोक 11 (skanda.8.35.11)

पितर ऊचुः । न वयं तपसा शक्या न यज्ञैर्नाप्यतोन्यथा । गर्त्तादस्मात्समुद्धर्तुं यद् ब्रूमस्तत्कुरुष्व नः

pitara ūcuḥ | na vayaṁ tapasā śakyā na yajñairnāpyatonyathā | garttādasmātsamuddhartuṁ yad brūmastatkuruṣva naḥ

पितरों ने कहा - न तो तप से, न यज्ञों से, न किसी अन्य उपाय से हम इस गड्ढे से बाहर निकाले जा सकते हैं; जो हम कहते हैं, वह करो।

श्लोक 12 (skanda.8.35.12)

अपत्यं गुणसंयुक्तमुत्पादय तपोयुतम् । ततो वयमितो गर्त्तान्मुच्येम यदि मन्यसे

apatyaṁ guṇasaṁyuktamutpādaya tapoyutam | tato vayamito garttānmucyema yadi manyase

गुणसम्पन्न, तपस्वी सन्तान उत्पन्न करो; तभी हम इस गड्ढे से मुक्त हो सकेंगे, यदि तुम ऐसा मानते हो।

श्लोक 13 (skanda.8.35.13)

विप्र उवाच । ऊर्ध्वरेताहमित्येतन्मया व्रतमुपाकृतम् । न दारानाहरिष्यामि तारयिष्ये च वै पितॄन्

vipra uvāca | ūrdhvaretāhamityetanmayā vratamupākṛtam | na dārānāhariṣyāmi tārayiṣye ca vai pitṝn

ब्राह्मण ने कहा - मैंने तो ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) रहने का व्रत धारण कर रखा है; मैं विवाह नहीं करूँगा, फिर भी मैं पितरों को तार दूँगा।

श्लोक 14 (skanda.8.35.14)

ततस्स तान् तथोत्सृज्य दुःखेन महता वृतः । जगाम रुद्रं शरणं पितरोन्तर्हितास्ततः

tatassa tān tathotsṛjya duḥkhena mahatā vṛtaḥ | jagāma rudraṁ śaraṇaṁ pitarontarhitāstataḥ

इस प्रकार उन्हें वहीं छोड़कर, अत्यन्त दुःख से घिरा हुआ वह रुद्र की शरण में गया, और तब पितर अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 15 (skanda.8.35.15)

पितृष्वन्तर्हितेष्वेवं वायुभक्षस्तदा द्विजः । काष्ठलोष्ठोपलीभूतो निरुच्छ्वासोवतिष्ठत

pitṛṣvantarhiteṣvevaṁ vāyubhakṣastadā dvijaḥ | kāṣṭhaloṣṭhopalībhūto nirucchvāsovatiṣṭhata

पितरों के अन्तर्धान हो जाने पर, वह द्विज वायु-भक्षण करने लगा, तथा काठ, ढेले और पत्थर के समान स्थिर होकर, श्वास रोककर खड़ा रहा।

श्लोक 16 (skanda.8.35.16)

सन्धाय मानसं रुद्रे निश्चलः सुसमाहितः । हृदयेन जपन् रुद्रानाकाशे समतिष्ठत

sandhāya mānasaṁ rudre niścalaḥ susamāhitaḥ | hṛdayena japan rudrānākāśe samatiṣṭhata

अपने मन को रुद्र में स्थिर करके, निश्चल तथा सुसमाहित होकर, हृदय में रुद्र का जप करते हुए वह आकाश में स्थित रहा।

श्लोक 17 (skanda.8.35.17)

तस्य पूर्णे तदा मासि वातवर्षमभून्महत् । सर्वसत्वप्रमथनं दुस्सहं भीमशब्दवत्

tasya pūrṇe tadā māsi vātavarṣamabhūnmahat | sarvasatvapramathanaṁ dussahaṁ bhīmaśabdavat

उसके एक मास पूर्ण होने पर, समस्त प्राणियों को मथने वाली, असह्य, भयंकर ध्वनि वाली महान् आँधी-वर्षा हुई।

श्लोक 18 (skanda.8.35.18)

तेन वर्षेण महता नैव तस्याभवत्तदा । दुःखं वाप्यथवा भङ्गः सम्यगेवावतस्थिवान्

tena varṣeṇa mahatā naiva tasyābhavattadā | duḥkhaṁ vāpyathavā bhaṅgaḥ samyagevāvatasthivān

उस महान् वर्षा से भी उसे तब न कोई दुःख हुआ और न कोई विकार हुआ; वह भलीभाँति स्थिर बना रहा।

श्लोक 19 (skanda.8.35.19)

अथ तं भगवान् देवो मासे वर्तति सप्तमे । विष्णुरूपधरो भूत्वा प्रोवाच द्विजसत्तमम्

atha taṁ bhagavān devo māse vartati saptame | viṣṇurūpadharo bhūtvā provāca dvijasattamam

फिर सातवाँ मास बीतने पर, भगवान देव ने विष्णु का रूप धारण कर उस श्रेष्ठ द्विज से कहा।

श्लोक 20 (skanda.8.35.20)

तुष्टोस्मि तव भद्रन्ते तपसानेन सुव्रत । वरं वरय विप्रर्षे यस्ते मनसि वर्तते

tuṣṭosmi tava bhadrante tapasānena suvrata | varaṁ varaya viprarṣe yaste manasi vartate

हे सुव्रत! मैं तुम्हारे इस तप से प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। हे विप्रर्षे! जो तुम्हारे मन में है, वह वर माँगो।

श्लोक 21 (skanda.8.35.21)

सुकेशस्तु ततो दृष्ट्वा नारायणमुपागतम् । अब्रवीच्छङ्करादिच्छे वरं न भवतो ह्यहम्

sukeśastu tato dṛṣṭvā nārāyaṇamupāgatam | abravīcchaṅkarādicche varaṁ na bhavato hyaham

तब सुकेश ने आए हुए नारायण को देखकर कहा - मैं आपसे शंकर के अतिरिक्त कोई वर नहीं चाहता।

श्लोक 22 (skanda.8.35.22)

विष्णुरुवाच । अलमेतेन विप्रर्षे निर्बन्धेन हरं प्रति । देवैरपि न शक्योसौ द्रष्टुं किमुत मानुषैः

viṣṇuruvāca | alametena viprarṣe nirbandhena haraṁ prati | devairapi na śakyosau draṣṭuṁ kimuta mānuṣaiḥ

विष्णु ने कहा - हे विप्रर्षे! हर के प्रति इस हठ को छोड़ो; देवता भी उन्हें देखने में समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या।

श्लोक 23 (skanda.8.35.23)

सुकेश उवाच । द्रष्टुं शक्यो न वा शक्यः किमेभिर्वो विचारितैः । कुग्रहः सुग्रहो वाहं तथापीशे मनो मम

sukeśa uvāca | draṣṭuṁ śakyo na vā śakyaḥ kimebhirvo vicāritaiḥ | kugrahaḥ sugraho vāhaṁ tathāpīśe mano mama

सुकेश ने कहा - वे देखे जा सकते हैं या नहीं, इस विचार से मुझे क्या प्रयोजन? चाहे मेरा ग्रह अशुभ हो या शुभ, फिर भी उन्हीं में मेरा मन लगा है।

श्लोक 24 (skanda.8.35.24)

शंकरादेव चक्रेश शुभं वा यदि वाशुभम् । वरं कांक्षे न च त्वत्तो न चान्यस्मात् कथञ्चन

śaṁkarādeva cakreśa śubhaṁ vā yadi vāśubham | varaṁ kāṁkṣe na ca tvatto na cānyasmāt kathañcana

हे चक्रधारी! शंकर से ही, चाहे शुभ हो या अशुभ, मैं वर चाहता हूँ, न आपसे और न किसी अन्य से कभी भी।

श्लोक 25 (skanda.8.35.25)

भवन्तोपि हि तं देवं यस्मात् सर्वे समाहिताः । अर्चयध्वे स्तुवध्वे च तस्माच्छ्रेष्ठः स उच्यते

bhavantopi hi taṁ devaṁ yasmāt sarve samāhitāḥ | arcayadhve stuvadhve ca tasmācchreṣṭhaḥ sa ucyate

आप लोग भी तो उन्हीं देवता की, जिनके प्रति सभी समाहित रहते हैं, अर्चना और स्तुति करते हैं; इसीलिए वे ही सबसे श्रेष्ठ कहे जाते हैं।

श्लोक 26 (skanda.8.35.26)

सनत्कुमार उवाच । तस्य तन्निश्चयं ज्ञात्वा संतुष्टो भगवान् हरः । विष्णुरूपं परित्यज्य स्वं रूप प्रत्यपद्यत

sanatkumāra uvāca | tasya tanniścayaṁ jñātvā saṁtuṣṭo bhagavān haraḥ | viṣṇurūpaṁ parityajya svaṁ rūpa pratyapadyata

सनत्कुमार बोले - उसका यह निश्चय जानकर, भगवान हर संतुष्ट हुए और विष्णु का रूप त्यागकर अपने ही रूप में प्रकट हुए।

श्लोक 27 (skanda.8.35.27)

उवाच चैनं विप्रेन्द्र गणपो मे भवाक्षयः । अमरो जरया त्यक्तः सर्वदुःविवर्जितः

uvāca cainaṁ viprendra gaṇapo me bhavākṣayaḥ | amaro jarayā tyaktaḥ sarvaduḥvivarjitaḥ

उन्होंने उससे कहा - हे विप्रेन्द्र! तुम मेरे गणप बनो, अक्षय, अमर, जरारहित तथा समस्त दुःखों से मुक्त होकर।

श्लोक 28 (skanda.8.35.28)

ऐश्वर्येण च संयुक्तः प्रियो मम पुरस्सरः । इमं च मत्कृतं दिव्यं त्रिकूटं नाम पर्वतम्

aiśvaryeṇa ca saṁyuktaḥ priyo mama purassaraḥ | imaṁ ca matkṛtaṁ divyaṁ trikūṭaṁ nāma parvatam

ऐश्वर्य से युक्त, मेरा प्रिय अग्रगामी बनो; तथा मेरे द्वारा रचित इस दिव्य त्रिकूट नामक पर्वत को भी।

श्लोक 29 (skanda.8.35.29)

भवनैः काञ्चनैर्युक्तं कामगं ते वदाम्यहम् । येषां कृते च पुत्र त्वं मां तोषयितुमुद्यतः

bhavanaiḥ kāñcanairyuktaṁ kāmagaṁ te vadāmyaham | yeṣāṁ kṛte ca putra tvaṁ māṁ toṣayitumudyataḥ

जो स्वर्णमय भवनों से युक्त और इच्छानुसार गमन करने वाला है, वह मैं तुम्हें देता हूँ। हे पुत्र! जिनके लिए तुम मुझे प्रसन्न करने में तत्पर हुए।

श्लोक 30 (skanda.8.35.30)

ते चेमे पितरस्सर्वे सुपुत्रेण त्वयानघ । तारिता नरकाद् घोराद् गणेशं त्वामुपस्थिताः

te ceme pitarassarve suputreṇa tvayānagha | tāritā narakād ghorād gaṇeśaṁ tvāmupasthitāḥ

हे निष्पाप! वे सब तुम्हारे, एक उत्तम पुत्र के द्वारा, घोर नरक से तार दिए गए, और अब गणेश बने हुए तुम्हारे समीप उपस्थित हैं।

श्लोक 31 (skanda.8.35.31)

किंकरास्ते भविष्यन्ति नित्यं दुःखविवर्जिताः । गणेश्वरास्तवैवेमे भविष्यन्ति वशानुगाः

kiṁkarāste bhaviṣyanti nityaṁ duḥkhavivarjitāḥ | gaṇeśvarāstavaiveme bhaviṣyanti vaśānugāḥ

वे सदा दुःखरहित, तुम्हारे किंकर बनेंगे; ये सब तुम्हारे ही अधीन गणेश्वर होंगे।

श्लोक 32 (skanda.8.35.32)

सुकेश इति नाम्ना च प्रथितस्त्वं भविष्यसि । सदा चाष्टगुणैश्वर्यसमायुक्तश्चरिष्यसि

sukeśa iti nāmnā ca prathitastvaṁ bhaviṣyasi | sadā cāṣṭaguṇaiśvaryasamāyuktaścariṣyasi

तुम 'सुकेश' इस नाम से प्रसिद्ध होगे, और सदा आठों गुणों वाले ऐश्वर्य से युक्त होकर विचरण करोगे।

श्लोक 33 (skanda.8.35.33)

सनत्कुमार उवाच । ततस्स दृष्ट्वाथ पितॄन्नरकात् ससुहृज्जनान् । तीर्णान् गणेश्वरत्वेन पुनः पूज्येन संयुतान्

sanatkumāra uvāca | tatassa dṛṣṭvātha pitṝnnarakāt sasuhṛjjanān | tīrṇān gaṇeśvaratvena punaḥ pūjyena saṁyutān

सनत्कुमार बोले - तब अपने पितरों को, मित्रजनों सहित, नरक से तरकर पुनः पूज्य गणेश्वरत्व से युक्त देखकर।

श्लोक 34 (skanda.8.35.34)

महेश्वरं हृष्टमनाः शिरसा प्राञ्जलिर्गतः । उवाच हृष्यमाणास्यस्तदा वचनकोविदः

maheśvaraṁ hṛṣṭamanāḥ śirasā prāñjalirgataḥ | uvāca hṛṣyamāṇāsyastadā vacanakovidaḥ

प्रसन्न मन से महेश्वर को सिर से प्रणाम कर, हाथ जोड़कर, वचनकुशल वह प्रफुल्लित मुख से यह कहने लगा।

श्लोक 35 (skanda.8.35.35)

सुकेश उवाच । भगवन् गणपत्वं च लब्धमैश्वर्यमेव च । अमरत्वं तथाक्षय्यं तथैवाजरता वरा

sukeśa uvāca | bhagavan gaṇapatvaṁ ca labdhamaiśvaryameva ca | amaratvaṁ tathākṣayyaṁ tathaivājaratā varā

सुकेश ने कहा - हे भगवन्! मुझे गणपत्व, ऐश्वर्य, अक्षय अमरत्व तथा श्रेष्ठ अजरता भी प्राप्त हो गई।

श्लोक 36 (skanda.8.35.36)

पितरस्तारिताश्चेमे गणपाश्चैव मे कृताः । नगश्च कामगो ह्येष लब्धो मे त्वत्प्रसादतः

pitarastāritāśceme gaṇapāścaiva me kṛtāḥ | nagaśca kāmago hyeṣa labdho me tvatprasādataḥ

मेरे ये पितर तर गए, और मेरे गणप भी बना दिए गए; तथा आपकी कृपा से यह इच्छानुसार गमन करने वाला पर्वत भी मुझे प्राप्त हुआ।

श्लोक 37 (skanda.8.35.37)

इच्छामि त्वां महादेव सोमं सप्रवरेश्वरम् । सदा सुमुखमत्यर्थं सुदृश्यं चैव कामद

icchāmi tvāṁ mahādeva somaṁ sapravareśvaram | sadā sumukhamatyarthaṁ sudṛśyaṁ caiva kāmada

हे महादेव! हे कामनाओं को पूर्ण करने वाले! मैं चाहता हूँ कि आप, चन्द्रशेखर, श्रेष्ठ ईश्वरों सहित, सदा अत्यन्त सुमुख तथा सुदृश्य हों।

श्लोक 38 (skanda.8.35.38)

सनत्कुमार उवाच । स एवमुक्तो भगवान् सुकेशेन महात्मना । उवाचैव मिदं सर्वं भविष्यति गणेश्वर

sanatkumāra uvāca | sa evamukto bhagavān sukeśena mahātmanā | uvācaiva midaṁ sarvaṁ bhaviṣyati gaṇeśvara

सनत्कुमार बोले - महात्मा सुकेश द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, भगवान ने कहा - हे गणेश्वर! यह सब वैसा ही होगा।

श्लोक 39 (skanda.8.35.39)

इमं गिरिं समाश्रित्य सहैभिः प्रवरैर्वरैः । गच्छ स्वेष्टां गतिं वत्स देवान् विप्राँश्च पालय

imaṁ giriṁ samāśritya sahaibhiḥ pravarairvaraiḥ | gaccha sveṣṭāṁ gatiṁ vatsa devān viprāṁśca pālaya

इस पर्वत का आश्रय लेकर, इन श्रेष्ठ वरों सहित, हे वत्स! अपनी इच्छित गति को प्राप्त करो, तथा देवताओं और ब्राह्मणों का पालन करो।

श्लोक 40 (skanda.8.35.40)

विसृज्य तं ततो देवः सुकेशं गणनायकम् । जगामादर्शनं सोमः सर्वेषामेव पश्यताम्

visṛjya taṁ tato devaḥ sukeśaṁ gaṇanāyakam | jagāmādarśanaṁ somaḥ sarveṣāmeva paśyatām

तत्पश्चात् गणनायक सुकेश को विदा कर, सबके देखते-देखते सोम (देव) अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 41 (skanda.8.35.41)

सुकेशोपि गिरौ तस्मिन्नगरे स्वर्गसन्निभे । नरकाणां स तत्त्वार्थं पितॄन् पप्रच्छ यत्नतः

sukeśopi girau tasminnagare svargasannibhe | narakāṇāṁ sa tattvārthaṁ pitṝn papraccha yatnataḥ

सुकेश भी उस स्वर्ग-सदृश नगर वाले पर्वत पर, नरकों के तत्त्वार्थ को जानने के लिए, प्रयत्नपूर्वक अपने पितरों से पूछने लगा।

श्लोक 42 (skanda.8.35.42)

व्यास उवाच । किमर्थं गणपो ब्रह्मन् तान् पितॄन् पर्यपृच्छत । कथञ्च पितरस्तत्र आचख्युस्तस्य धीमतः

vyāsa uvāca | kimarthaṁ gaṇapo brahman tān pitṝn paryapṛcchata | kathañca pitarastatra ācakhyustasya dhīmataḥ

व्यास ने कहा - हे ब्रह्मन्! उस गणप ने अपने पितरों से किस प्रयोजन से यह पूछा? और उन बुद्धिमान पितरों ने उसे वहाँ किस प्रकार बताया?

श्लोक 43 (skanda.8.35.43)

एतद्विस्तरशस्तात संक्षेपाद्वा यथातथम् । त्वत्तोहं श्रोतुमिच्छामि हितं सर्वसुखावहम्

etadvistaraśastāta saṁkṣepādvā yathātatham | tvattohaṁ śrotumicchāmi hitaṁ sarvasukhāvaham

हे तात! यह विस्तार से अथवा संक्षेप में, जैसा भी हो, मैं आपसे सुनना चाहता हूँ - जो कल्याणकारी हो और सबको सुख देने वाला हो।

श्लोक 44 (skanda.8.35.44)

सूत उवाच । स एवमुक्तः सुरसृक्सुतः प्रभुर्विमानकर्ता विगतप्रयोजनः । जगाद वाक्यं सुरलोकवर्धनः पुराकृतं दुष्कृतसर्वनाशनम्

sūta uvāca | sa evamuktaḥ surasṛksutaḥ prabhurvimānakartā vigataprayojanaḥ | jagāda vākyaṁ suralokavardhanaḥ purākṛtaṁ duṣkṛtasarvanāśanam

सूत ने कहा - इस प्रकार पूछे जाने पर, देवताओं के स्रष्टा (ब्रह्मा) के पुत्र, विमानों के निर्माता, निष्प्रयोजन प्रभु, स्वर्गलोक को बढ़ाने वाले उन्होंने पूर्वकृत समस्त दुष्कर्मों का नाश करने वाला यह वचन कहा।

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