अम्बिका खण्ड · अध्याय 36
सुकेशमहाभाग्य
श्लोक 1 (skanda.8.36.1)
सनत्कुमार उवाच । त्रिकूटशिखरे तस्मिन्नगरे देवनिर्मिते । आसीनः काञ्चने दिव्ये विमाने स्त्रीसमाकुले
sanatkumāra uvāca | trikūṭaśikhare tasminnagare devanirmite | āsīnaḥ kāñcane divye vimāne strīsamākule
सनत्कुमार बोले - देवताओं द्वारा निर्मित उस त्रिकूट शिखर के नगर में, स्त्रियों से भरे हुए दिव्य स्वर्ण-विमान पर बैठे हुए।
श्लोक 2 (skanda.8.36.2)
पितॄन सर्वान् समाहूय संपूज्य विधिवत्तदा । सुखोपविष्टान् तान् दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत्
pitṝna sarvān samāhūya saṁpūjya vidhivattadā | sukhopaviṣṭān tān dṛṣṭvā idaṁ vacanamabravīt
अपने सभी पितरों को बुलाकर, विधिपूर्वक उनका सम्मान कर, उन्हें सुखपूर्वक बैठे हुए देखकर, उसने यह वचन कहा।
श्लोक 3 (skanda.8.36.3)
सुकेश उवाच । युष्माकं तेजसा सर्वमिदमैश्वर्यमीदृशम् । भवद्भिस्तत्कृतं देवा येनास्मि सुखभाक्कृतः
sukeśa uvāca | yuṣmākaṁ tejasā sarvamidamaiśvaryamīdṛśam | bhavadbhistatkṛtaṁ devā yenāsmi sukhabhākkṛtaḥ
सुकेश ने कहा - आप सबके तेज से ही यह सारा ऐश्वर्य ऐसा हुआ है; हे देवगण! यह आपके ही द्वारा किया गया है, जिससे मैं सुखी हुआ हूँ।
श्लोक 4 (skanda.8.36.4)
पितर ऊचुः । मैवं वदानृतं पुत्र माधर्मस्ते भवेदिह । नास्मत्प्रसादादैश्वर्यं तव पुत्र कदाचन
pitara ūcuḥ | maivaṁ vadānṛtaṁ putra mādharmaste bhavediha | nāsmatprasādādaiśvaryaṁ tava putra kadācana
पितरों ने कहा - हे पुत्र! ऐसा असत्य मत बोलो, इससे तुम्हें अधर्म हो सकता है। हे पुत्र! तुम्हारा यह ऐश्वर्य हमारी कृपा से कभी नहीं हुआ है।
श्लोक 5 (skanda.8.36.5)
वयन्तु निरये घोरे यात्यमानाः सुदारुणे । तपसा तव वीर्येण सुखमाप्म सुदुर्लभम्
vayantu niraye ghore yātyamānāḥ sudāruṇe | tapasā tava vīryeṇa sukhamāpma sudurlabham
हम तो अत्यन्त भयंकर, घोर नरक में गिराए जा रहे थे; तुम्हारे ही तप और पराक्रम से हमें यह दुर्लभ सुख प्राप्त हुआ।
श्लोक 6 (skanda.8.36.6)
त्वया वयं सुपुत्रेण तारिता निरयाद् यथा । तथा नान्यं प्रपश्यामो धन्यो हि त्वं सुतो हि नः
tvayā vayaṁ suputreṇa tāritā nirayād yathā | tathā nānyaṁ prapaśyāmo dhanyo hi tvaṁ suto hi naḥ
जिस प्रकार तुम, हमारे उत्तम पुत्र, ने हमें नरक से तार दिया, वैसा हमें कोई अन्य दिखाई नहीं देता; तुम धन्य हो, तुम ही हमारे सच्चे पुत्र हो।
श्लोक 7 (skanda.8.36.7)
अद्य वर्षसहस्राणि बहूनि निरये वयम् । पच्येम घोरे दुर्वृत्ता बन्धुः स्यास्त्वं न नो यदि
adya varṣasahasrāṇi bahūni niraye vayam | pacyema ghore durvṛttā bandhuḥ syāstvaṁ na no yadi
आज हम बहुत हजारों वर्षों तक उस घोर नरक में दुराचारी होकर पकते रहते, यदि तुम हमारे बन्धु न होते।
श्लोक 8 (skanda.8.36.8)
बहवः प्राणिनः पुत्र यात्यन्ते तत्र संयताः । अति घोरे सुदुर्वृत्तास्तपो येषां न विद्यते
bahavaḥ prāṇinaḥ putra yātyante tatra saṁyatāḥ | ati ghore sudurvṛttāstapo yeṣāṁ na vidyate
हे पुत्र! अनेक संयत प्राणी उस अत्यन्त भयंकर, दुराचारी नरक में जाते हैं, जिनके पास तप नहीं होता।
श्लोक 9 (skanda.8.36.9)
सुकेश उवाच । पितरो नोक्तपूर्वं मे मृषा न च वदामि वै । यथा प्रभावाद्युष्माकमैश्वर्यं मम तत्तदा
sukeśa uvāca | pitaro noktapūrvaṁ me mṛṣā na ca vadāmi vai | yathā prabhāvādyuṣmākamaiśvaryaṁ mama tattadā
सुकेश ने कहा - हे पितरो! मैंने आपसे पहले कभी मिथ्या नहीं कहा, और अब भी मिथ्या नहीं कह रहा हूँ; जिस प्रभाव से आपका यह ऐश्वर्य हुआ, वह मेरा ही था।
श्लोक 10 (skanda.8.36.10)
शृणुध्वं वदतः सम्यक् मावमध्वं वचो मम । न चावमन्ये पितरो देवताः कोवमन्यते
śṛṇudhvaṁ vadataḥ samyak māvamadhvaṁ vaco mama | na cāvamanye pitaro devatāḥ kovamanyate
मेरा कहा हुआ भलीभाँति सुनिए, मेरे वचन का अनादर मत कीजिए; मैं पितरों का अनादर नहीं करता, देवताओं में से कौन अनादर करता है?
श्लोक 11 (skanda.8.36.11)
पितरः कर्म कुर्वन्ति सतां यत् संमतं भुवि । नित्यं चाशासते चैव प्रजा नः सन्तु पुष्कलाः
pitaraḥ karma kurvanti satāṁ yat saṁmataṁ bhuvi | nityaṁ cāśāsate caiva prajā naḥ santu puṣkalāḥ
पितर वही कर्म करते हैं, जो लोक में सज्जनों को मान्य है, और सदा यह कामना करते हैं कि हमारी सन्तान प्रचुर हो।
श्लोक 12 (skanda.8.36.12)
धार्मिकाश्च कृतज्ञाश्च सत्कर्मरतयस्तथा । ये नो नरकगर्तस्थान् तारयिष्यन्ति नित्यशः
dhārmikāśca kṛtajñāśca satkarmaratayastathā | ye no narakagartasthān tārayiṣyanti nityaśaḥ
धार्मिक, कृतज्ञ तथा सत्कर्मों में रत, जो हमें नरक के गड्ढे से सदा के लिए तार देंगे।
श्लोक 13 (skanda.8.36.13)
तेषां तत्कार्यकरणात् स्वधर्माच्यवनेन च । स धर्मोनुष्ठितः सम्यक् प्रजा जनयते शुभाः
teṣāṁ tatkāryakaraṇāt svadharmācyavanena ca | sa dharmonuṣṭhitaḥ samyak prajā janayate śubhāḥ
उनके इस कार्य के करने से तथा अपने स्वधर्म से च्युत न होने से, वह सम्यक् प्रकार से पालित धर्म शुभ सन्तान उत्पन्न करता है।
श्लोक 14 (skanda.8.36.14)
धार्मिकाश्च वदान्याश्च कृतज्ञाः सत्पथे स्थिताः । पितृभक्ताश्च सर्वत्र पितॄणां तारणे रताः
dhārmikāśca vadānyāśca kṛtajñāḥ satpathe sthitāḥ | pitṛbhaktāśca sarvatra pitṝṇāṁ tāraṇe ratāḥ
धार्मिक, उदार, कृतज्ञ, सन्मार्ग पर स्थित, सर्वत्र पितृभक्त तथा पितरों को तारने में तत्पर।
श्लोक 15 (skanda.8.36.15)
सोहं भवद्भिर्धर्मेण परेण च समाधिना । जनितस्तपसा युक्तो भवतामेव सर्वशः
sohaṁ bhavadbhirdharmeṇa pareṇa ca samādhinā | janitastapasā yukto bhavatāmeva sarvaśaḥ
वही मैं, आप सबके ही धर्म और परम समाधि से, आप ही के तप से युक्त होकर, सर्वथा उत्पन्न हुआ हूँ।
श्लोक 16 (skanda.8.36.16)
देवमाराध्य नरकात् पितॄँस्तारितवान् पुनः । एष प्रभावो युष्माकं तपः सुचरितं च ह
devamārādhya narakāt pitṝṁstāritavān punaḥ | eṣa prabhāvo yuṣmākaṁ tapaḥ sucaritaṁ ca ha
मैंने देव की आराधना करके नरक से पितरों को पुनः तार दिया; यह आपका ही प्रभाव और आपका ही सुचरित तप है।
श्लोक 17 (skanda.8.36.17)
ममात्र किं महाप्रज्ञा अनृतं वात्र किं वचः । इयंञ्च वैदिकी शुभ्रा श्रुतिर्वेदविदां वराः
mamātra kiṁ mahāprajñā anṛtaṁ vātra kiṁ vacaḥ | iyaṁñca vaidikī śubhrā śrutirvedavidāṁ varāḥ
इसमें मेरा क्या है, हे महाप्राज्ञो? क्या इसमें मेरा वचन मिथ्या है? यह वैदिक शुभ श्रुति भी, हे वेद के जानने वालों में श्रेष्ठ, यही कहती है।
श्लोक 18 (skanda.8.36.18)
प्रमाणं यदि मन्यध्वं आत्मना कृतमित्युत । अङ्गादङ्गात् संभवसि हदयादधिजायसे
pramāṇaṁ yadi manyadhvaṁ ātmanā kṛtamityuta | aṅgādaṅgāt saṁbhavasi hadayādadhijāyase
यदि आप इसे प्रमाण मानते हैं कि यह आत्मा द्वारा ही किया गया, तो सुनिए - तुम अंग-अंग से उत्पन्न होते हो, हृदय से भी जन्म लेते हो।
श्लोक 19 (skanda.8.36.19)
आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदां शतम् । अङ्गेभ्योहं समुत्पन्नो युष्माकं हदयाच्च ह
ātmā vai putranāmāsi sa jīva śaradāṁ śatam | aṅgebhyohaṁ samutpanno yuṣmākaṁ hadayācca ha
पुत्र आत्मा ही का नाम है, वह सौ वर्षों तक जीवित रहे। मैं भी आपके अंगों से तथा हृदय से ही उत्पन्न हुआ हूँ।
श्लोक 20 (skanda.8.36.20)
आत्मनाहं तथात्मानं युष्माँस्तारिवाँस्ततः । तस्माद् भवन्तो मन्यन्तां सर्व एव समाधिना
ātmanāhaṁ tathātmānaṁ yuṣmāṁstārivāṁstataḥ | tasmād bhavanto manyantāṁ sarva eva samādhinā
आत्मा द्वारा ही मैंने अपने ही आत्मा-स्वरूप आप सबको तार दिया; इसलिए आप सब भलीभाँति समाधानपूर्वक विचार करें।
श्लोक 21 (skanda.8.36.21)
तस्माद्धि घोरान्तरकात्तारिताः स्वेन कर्मणा । न चान्यकर्मणा कश्चिदन्यस्तरति दुर्मतिः । स्वकर्मणा हि जन्तूनां फलपाको विधीयते
tasmāddhi ghorāntarakāttāritāḥ svena karmaṇā | na cānyakarmaṇā kaścidanyastarati durmatiḥ | svakarmaṇā hi jantūnāṁ phalapāko vidhīyate
इसीलिए आप उस घोर नरक से अपने ही कर्म से तारे गए हैं; किसी और के कर्म से कोई अन्य दुर्बुद्धि तर नहीं पाता। प्राणियों के कर्मफल का पाक उन्हीं के अपने कर्म से होता है।
श्लोक 22 (skanda.8.36.22)
सनत्कुमार उवाच । ततस्त एवं पितरस्तेन प्रोक्ता महात्मना । हर्षेण साश्रुनयना इदमूचुस्तदा वचः
sanatkumāra uvāca | tatasta evaṁ pitarastena proktā mahātmanā | harṣeṇa sāśrunayanā idamūcustadā vacaḥ
सनत्कुमार बोले - तब उस महात्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वे पितर हर्ष से भरकर, अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह वचन बोले।
श्लोक 23 (skanda.8.36.23)
पितर ऊचुः । त्वदन्यः को वदेदेवं यो न स्यादीशसंमतः । युक्तमेतत्तव वचो धार्मिकस्य महात्मनः
pitara ūcuḥ | tvadanyaḥ ko vadedevaṁ yo na syādīśasaṁmataḥ | yuktametattava vaco dhārmikasya mahātmanaḥ
पितरों ने कहा - तुम्हारे अतिरिक्त और कौन ऐसा कह सकता है, जो ईश्वर को अभीष्ट न हो? हे महात्मन्! तुम्हारा यह धार्मिक वचन युक्तिसंगत है।
श्लोक 24 (skanda.8.36.24)
यो न स्यादीदृशः पुत्र कथं तं सवदेवपः । इष्टैस्तु योजयेत् सम्यग् यथा त्वां गोवृषध्वजः
yo na syādīdṛśaḥ putra kathaṁ taṁ savadevapaḥ | iṣṭaistu yojayet samyag yathā tvāṁ govṛṣadhvajaḥ
हे पुत्र! जो ऐसा न हो, वह देवताओं के पालक (शिव) को इष्ट पदार्थों से किस प्रकार भलीभाँति संयुक्त कर सकता है, जैसा वृषभध्वज ने तुम्हें किया?
श्लोक 25 (skanda.8.36.25)
त्वं धाता त्वं हि नो बन्धुस्त्वं जनेता महामते । पिता त्वमेव पुत्रा हि वयं तव न संशयः
tvaṁ dhātā tvaṁ hi no bandhustvaṁ janetā mahāmate | pitā tvameva putrā hi vayaṁ tava na saṁśayaḥ
हे महामते! तुम ही हमारे धाता हो, तुम ही हमारे बन्धु हो, तुम ही हमारे जन्मदाता हो। तुम ही पिता हो, हम निःसंदेह तुम्हारे पुत्र हैं।
श्लोक 26 (skanda.8.36.26)
अत्र ते वर्तयिष्यामः पुरावृत्तं महामते । श्रुतौ स्मृतौ च यद् गीतं तन्नस्त्वं मन्तुमर्हसि
atra te vartayiṣyāmaḥ purāvṛttaṁ mahāmate | śrutau smṛtau ca yad gītaṁ tannastvaṁ mantumarhasi
हे महामते! हम यहाँ तुम्हें पुरातन वृत्तान्त सुनाएँगे, जो श्रुति और स्मृति में गाया गया है; उसे तुम सुनने योग्य समझो।
श्लोक 27 (skanda.8.36.27)
पितर ऊचुः । पुत्रा हि ब्रह्मणा सृष्टा देवा यजत मामिति । ते यजन्त तदात्मानं तेषां ब्रह्मा चुकोप ह
pitara ūcuḥ | putrā hi brahmaṇā sṛṣṭā devā yajata māmiti | te yajanta tadātmānaṁ teṣāṁ brahmā cukopa ha
पितरों ने कहा - ब्रह्मा द्वारा सृष्ट पुत्रों से देवताओं ने कहा - 'मेरा यजन करो'; उन्होंने उस समय अपने ही आत्मस्वरूप का यजन किया, जिससे ब्रह्मा क्रोधित हो गए।
श्लोक 28 (skanda.8.36.28)
उवाच चेनान् संरब्धो नष्टसंज्ञा भविष्यथ । ते शप्ताः ब्रह्मणा सर्वे समेत्य च दिवौकसः
uvāca cenān saṁrabdho naṣṭasaṁjñā bhaviṣyatha | te śaptāḥ brahmaṇā sarve sametya ca divaukasaḥ
क्रोधित होकर उन्होंने कहा - तुम स्मृतिरहित हो जाओगे। ब्रह्मा द्वारा शापित वे सब स्वर्गवासी देवता एकत्र होकर।
श्लोक 29 (skanda.8.36.29)
दुःखशोकसमायुक्ता दीनास्तं तुष्टुवुस्तदा । प्रसन्नं तं समालक्ष्य त ऊचुः शिरसा नताः
duḥkhaśokasamāyuktā dīnāstaṁ tuṣṭuvustadā | prasannaṁ taṁ samālakṣya ta ūcuḥ śirasā natāḥ
दुःख और शोक से युक्त, दीन होकर तब उन्होंने उनकी स्तुति की। उन्हें प्रसन्न देखकर वे सिर झुकाकर बोले।
श्लोक 30 (skanda.8.36.30)
नष्टसंज्ञा वयं देव तान्नो यच्छ पुनः प्रभो । तत् क्षमस्व च देवेश अज्ञानाद्यत् कृतं हि नः
naṣṭasaṁjñā vayaṁ deva tānno yaccha punaḥ prabho | tat kṣamasva ca deveśa ajñānādyat kṛtaṁ hi naḥ
हे देव! हम स्मृतिरहित हो गए हैं, हे प्रभो! हमें वह पुनः प्रदान कीजिए। हे देवेश! अज्ञानवश हमसे जो कुछ किया गया, उसे क्षमा कीजिए।
श्लोक 31 (skanda.8.36.31)
अथैवमुक्तो देवैस्तैर्ब्रह्मा लोकपितामहः । उवाच प्रणतान् देवान् सानुक्रोशमिदं वचः
athaivamukto devaistairbrahmā lokapitāmahaḥ | uvāca praṇatān devān sānukrośamidaṁ vacaḥ
उन देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, लोकपितामह ब्रह्मा ने उन प्रणत देवताओं से करुणापूर्वक यह वचन कहा।
श्लोक 32 (skanda.8.36.32)
ब्रह्मोवाच । प्रायश्चित्तं महासत्वाश्चरध्वं नियमेन ह । व्यभिचारकृतं सर्वं ततः पापं प्रहास्यथ
brahmovāca | prāyaścittaṁ mahāsatvāścaradhvaṁ niyamena ha | vyabhicārakṛtaṁ sarvaṁ tataḥ pāpaṁ prahāsyatha
ब्रह्मा ने कहा - हे महाबलियो! नियमपूर्वक प्रायश्चित्त का आचरण करो, तब तुम्हारा यह व्यभिचार से उत्पन्न सारा पाप नष्ट हो जाएगा।
श्लोक 33 (skanda.8.36.33)
देवा ऊचुः । सैव संज्ञा न नो देव विद्यते सर्वसृक् प्रभो । यया ज्ञास्यामहे तानि प्रायश्चित्तानि लोकप
devā ūcuḥ | saiva saṁjñā na no deva vidyate sarvasṛk prabho | yayā jñāsyāmahe tāni prāyaścittāni lokapa
देवताओं ने कहा - हे विश्व के स्रष्टा प्रभो! हे लोकपते! हमारे पास तो वही स्मृति नहीं है, जिससे हम उन प्रायश्चित्तों को जान सकें।
श्लोक 34 (skanda.8.36.34)
ब्रह्मोवाच । स्वान् पुत्रान् परिपृच्छध्वं ततः श्रेयमवाप्स्यथ । पुनः संज्ञां च धर्मज्ञा मा कुरुध्वमतोन्यथा
brahmovāca | svān putrān paripṛcchadhvaṁ tataḥ śreyamavāpsyatha | punaḥ saṁjñāṁ ca dharmajñā mā kurudhvamatonyathā
ब्रह्मा ने कहा - अपने ही पुत्रों से पूछो, तभी तुम्हारा कल्याण होगा। हे धर्मज्ञो! पुनः स्मृति पाकर इससे अन्यथा मत करना।
श्लोक 35 (skanda.8.36.35)
पितर ऊचुः । ततस्ते सुरशार्दूलाः पप्रच्छुः स्वान् सुताँस्तदा । प्रायश्चित्तानि धर्माँश्च वेदान् साङ्गान् सविस्तरान्
pitara ūcuḥ | tataste suraśārdūlāḥ papracchuḥ svān sutāṁstadā | prāyaścittāni dharmāṁśca vedān sāṅgān savistarān
पितरों ने कहा - तब उन देवश्रेष्ठों ने अपने पुत्रों से प्रायश्चित्त, धर्म तथा साङ्ग वेदों को विस्तारपूर्वक पूछा।
श्लोक 36 (skanda.8.36.36)
ते च तेभ्यस्तदा पुत्रा आचुख्युः प्रयताः शुभाः । याथातथ्येन तत्सर्वं परमेण समाधिना
te ca tebhyastadā putrā ācukhyuḥ prayatāḥ śubhāḥ | yāthātathyena tatsarvaṁ parameṇa samādhinā
तब उन पुत्रों ने उन्हें, संयत तथा शुभ होकर, वह सब यथार्थ रूप से, परम समाधिपूर्वक बता दिया।
श्लोक 37 (skanda.8.36.37)
अथ ते लब्धसंज्ञाश्च लब्धकामास्तथैव च । स्वान्पुत्रानभ्यभाषन्त प्रीयमाणा मुदा युताः
atha te labdhasaṁjñāśca labdhakāmāstathaiva ca | svānputrānabhyabhāṣanta prīyamāṇā mudā yutāḥ
तब स्मृति पाकर तथा अभीष्ट को भी पाकर, वे प्रसन्न और आनन्दित होकर अपने पुत्रों से बोले।
श्लोक 38 (skanda.8.36.38)
देवा ऊचुः । पुत्रा न यूयमस्माकं वयं पुत्रा हि वः सुताः । यैर्ज्ञानं नष्टसंज्ञानां कृतमस्माकमव्ययम्
devā ūcuḥ | putrā na yūyamasmākaṁ vayaṁ putrā hi vaḥ sutāḥ | yairjñānaṁ naṣṭasaṁjñānāṁ kṛtamasmākamavyayam
देवताओं ने कहा - तुम हमारे पुत्र नहीं हो, बल्कि हम ही तुम्हारे पुत्र हैं, जिन्होंने स्मृतिरहित हुए हम अविनाशियों को ज्ञान प्रदान किया।
श्लोक 39 (skanda.8.36.39)
तैरेवमुक्ते तत्रागाद् ब्रह्मा लोकपितामहः । उवाच चेदं तान्देवान् सर्वानेव महायशाः
tairevamukte tatrāgād brahmā lokapitāmahaḥ | uvāca cedaṁ tāndevān sarvāneva mahāyaśāḥ
उनके ऐसा कहे जाने पर, लोकपितामह ब्रह्मा वहाँ आए और उन महायशस्वी देवताओं से यह कहा।
श्लोक 40 (skanda.8.36.40)
ब्रह्मोवाच । वदन्ति नानृतं देवाः सत्यं देवेषु वर्तते । सुताश्चोक्ता हि वः सर्वे पितरो नानृतं हि तत्
brahmovāca | vadanti nānṛtaṁ devāḥ satyaṁ deveṣu vartate | sutāścoktā hi vaḥ sarve pitaro nānṛtaṁ hi tat
ब्रह्मा ने कहा - देवता कभी असत्य नहीं बोलते, देवताओं में सत्य ही स्थित रहता है; तुम सबको जो पुत्र कहा गया, वह भी असत्य नहीं है।
श्लोक 41 (skanda.8.36.41)
तस्मात् पितृत्वं युष्माकं पुत्राणां नित्यमव्ययम् । भविष्यति न सन्देहो यूयं पुत्राश्च सर्वशः
tasmāt pitṛtvaṁ yuṣmākaṁ putrāṇāṁ nityamavyayam | bhaviṣyati na sandeho yūyaṁ putrāśca sarvaśaḥ
इसलिए, हे पुत्रो! तुम सबका पितृत्व सदा अविनाशी रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं; और तुम सब भी सर्वथा पुत्र ही हो।
श्लोक 42 (skanda.8.36.42)
नह्य शिष्याय कथ्यन्ते रहस्यानि कथंचन । एकार्थौ पुत्रशिष्यौ च तस्मात् पुत्राः स्थ सर्वशः
nahya śiṣyāya kathyante rahasyāni kathaṁcana | ekārthau putraśiṣyau ca tasmāt putrāḥ stha sarvaśaḥ
गुप्त रहस्य शिष्य को भी कभी नहीं बताए जाते; पुत्र और शिष्य एक ही अर्थ रखते हैं, इसलिए तुम सब सर्वथा पुत्र हो।
श्लोक 43 (skanda.8.36.43)
तरन्ति पुत्रैः पितरः पुत्राँस्तान् तारयन्ति च । तारयित्वा पितृत्वञ्च कर्मणा तेन यान्ति ते
taranti putraiḥ pitaraḥ putrāṁstān tārayanti ca | tārayitvā pitṛtvañca karmaṇā tena yānti te
पितर पुत्रों के द्वारा तरते हैं, और वे ही पुत्रों को तारते हैं; इस प्रकार तारकर वे उसी कर्म से पितृत्व को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 44 (skanda.8.36.44)
यूयञ्च तारिताः पुत्रैरज्ञानान्नरकात्तथा । तस्मादिमे हि पितरो यूयं पुत्राश्च सर्वशः
yūyañca tāritāḥ putrairajñānānnarakāttathā | tasmādime hi pitaro yūyaṁ putrāśca sarvaśaḥ
और तुम भी अज्ञान से पुत्रों द्वारा नरक से तारे गए हो; इसलिए ये ही तुम्हारे पितर हैं, तथा तुम सब सर्वथा पुत्र हो।
श्लोक 45 (skanda.8.36.45)
पाति यस्मात् पिता तस्माज् जनयत्यपि वा पिता । पुत्रेषु चैतदुभयं पितरस्तेन वो मताः
pāti yasmāt pitā tasmāj janayatyapi vā pitā | putreṣu caitadubhayaṁ pitarastena vo matāḥ
जो रक्षा करता है, वह पिता कहलाता है; और जो जन्म भी देता है, वह भी पिता है। पुत्रों में ये दोनों ही बातें होने से, वे भी तुम्हारे लिए पितर माने गए हैं।
श्लोक 46 (skanda.8.36.46)
ततस्ते ब्रह्म
tataste brahma
तत्पश्चात् उन ब्रह्मा... [इस श्लोक का शेष भाग मूल में अनुपलब्ध है, एक पत्र खण्डित होने से]
श्लोक 47 (skanda.8.36.47)
बलाः । पितरस्तान् वरैरिष्टैश्छन्दयामासुः
balāḥ | pitarastān varairiṣṭaiśchandayāmāsuḥ
[इस श्लोक के आरम्भ का पाठ मूल में अनुपलब्ध है] ...बलशाली। पितरों ने उन्हें अभीष्ट वरों से संतुष्ट किया।
श्लोक 48 (skanda.8.36.48)
पितरश्च ततो वव्रुरग्रे यजनमात्मनः । यो नोनिष्ट्वा यजेद्देवान् न स तत्फलमाप्नुयात्
pitaraśca tato vavruragre yajanamātmanaḥ | yo noniṣṭvā yajeddevān na sa tatphalamāpnuyāt
तत्पश्चात् पितरों ने अपने ही यजन को श्रेष्ठ माना; जो देवताओं का यजन किए बिना उन्हें (पितरों को) यजता है, वह उसका फल नहीं पाता।
श्लोक 49 (skanda.8.36.49)
एनसा चाभिसंयुक्तो मह
enasā cābhisaṁyukto maha
और पाप से युक्त हुआ महान्... [इस श्लोक का शेष भाग मूल में अनुपलब्ध है]
श्लोक 50 (skanda.8.36.50)
यथागतं ततो जग्मुर्ब्रह्मणा सह सर्वशः
yathāgataṁ tato jagmurbrahmaṇā saha sarvaśaḥ
[इस श्लोक के आरम्भ का पाठ मूल में अनुपलब्ध है] ...तत्पश्चात् वे सब ब्रह्मा के साथ जैसे आए थे, वैसे ही चले गए।
श्लोक 51 (skanda.8.36.51)
पितर ऊचुः । यथा वयं त्वया पुत्र नरकान्नष्टचेतसः । तारिताश्चेतनावन्तः पुनश्च प्रवरीकृताः
pitara ūcuḥ | yathā vayaṁ tvayā putra narakānnaṣṭacetasaḥ | tāritāścetanāvantaḥ punaśca pravarīkṛtāḥ
पितरों ने कहा - हे पुत्र! जैसे हमें, स्मृतिरहित होकर नरक में पड़े हुए, तुमने पुनः चेतनायुक्त कर तार दिया, और श्रेष्ठ बना दिया।
श्लोक 52 (skanda.8.36.52)
पिता ततो भवान् पूज्यो योनुयासि महा
pitā tato bhavān pūjyo yonuyāsi mahā
इसलिए तुम पूज्य पिता हो, जिसका अनुसरण महान्... [इस श्लोक का शेष भाग मूल में अनुपलब्ध है]
श्लोक 53 (skanda.8.36.53)
सत्तमः । प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा पितॄन् वचनमब्रवीत्
sattamaḥ | praṇataḥ prāñjalirbhūtvā pitṝn vacanamabravīt
[इस श्लोक के आरम्भ का पाठ मूल में अनुपलब्ध है] ...श्रेष्ठ। प्रणत होकर, हाथ जोड़कर, उसने पितरों से यह वचन कहा।
श्लोक 54 (skanda.8.36.54)
एवमेतद्यथोक्तं वो नानृतं वो वचः शुभम् । परस्पर पितृत्वं हि सर्वेषां समुदाहृतम्
evametadyathoktaṁ vo nānṛtaṁ vo vacaḥ śubham | paraspara pitṛtvaṁ hi sarveṣāṁ samudāhṛtam
यह जैसा कहा गया, वैसा ही सत्य है, आपका यह शुभ वचन असत्य नहीं है; सबका परस्पर पितृत्व इस प्रकार वर्णित हुआ।
श्लोक 55 (skanda.8.36.55)
वरं भूय इमं मह्यं प्रयच्छत गणेश्वराः । एतेन प्रश्नमिष्टं हि कथितं द्विजसत्तम
varaṁ bhūya imaṁ mahyaṁ prayacchata gaṇeśvarāḥ | etena praśnamiṣṭaṁ hi kathitaṁ dvijasattama
हे गणेश्वरो! मुझे एक और वर प्रदान कीजिए... [इस श्लोक के मध्य का कुछ पाठ मूल में अनुपलब्ध है] ...हे द्विजश्रेष्ठ! इस प्रश्न के द्वारा जो अभीष्ट था, वह कह दिया गया।
श्लोक 56 (skanda.8.36.56)
पितर ऊचुः । नास्ति किंचिदविदितं भवतः प्रवरेश्वर । भवानस्मत्प्रमाणार्थं व्याख्यातत्त्वमिहेच्छसि
pitara ūcuḥ | nāsti kiṁcidaviditaṁ bhavataḥ pravareśvara | bhavānasmatpramāṇārthaṁ vyākhyātattvamihecchasi
पितरों ने कहा - हे श्रेष्ठ ईश्वर! आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है; आप तो हमारे प्रमाण के लिए ही यहाँ तत्त्व का व्याख्यान चाहते हैं।
श्लोक 57 (skanda.8.36.57)
ब्रूहि यद्विदितं नोस्ति कथायिष्याम तद्धि ते । श्रुतं वाप्यनुभूतं वा यथाशक्ति यथातथम्
brūhi yadviditaṁ nosti kathāyiṣyāma taddhi te | śrutaṁ vāpyanubhūtaṁ vā yathāśakti yathātatham
जो कुछ आपको ज्ञात नहीं है, वह कहिए, हम आपको वह अवश्य बताएँगे - चाहे वह सुना हुआ हो या अनुभव किया हुआ, यथाशक्ति यथार्थ रूप से... [इस श्लोक का शेष भाग मूल में अनुपलब्ध है]
श्लोक 58 (skanda.8.36.58)
सुकेश उवाच । भवन्तो नरके घोरे परिक्लिष्टाः सुदारुणे । अतः श्रुतिज्ञाः सर्वेषां नरकाणामसंशयम्
sukeśa uvāca | bhavanto narake ghore parikliṣṭāḥ sudāruṇe | ataḥ śrutijñāḥ sarveṣāṁ narakāṇāmasaṁśayam
सुकेश ने कहा - आप सब अत्यन्त भयंकर, घोर नरक में क्लेश सहते रहे हैं; इसलिए निःसंदेह आप सभी नरकों के ज्ञाता हैं।
श्लोक 59 (skanda.8.36.59)
तेषां सतत्त्वं योगञ्च कालभेदं तथा क्रमम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे
teṣāṁ satattvaṁ yogañca kālabhedaṁ tathā kramam | tatsarvaṁ śrotumicchāmi paraṁ kautūhalaṁ hi me
उनका सच्चा स्वरूप, उनका क्रम तथा कालभेद - यह सब मैं सुनना चाहता हूँ; मुझे इसमें अत्यन्त कौतूहल है।
श्लोक 60 (skanda.8.36.60)
कियन्तो नरकास्ते च किं प्रमाणाः किमाश्रयाः । किं रूपा के च यात्यन्ते कथं चैव सुदुःखिताः
kiyanto narakāste ca kiṁ pramāṇāḥ kimāśrayāḥ | kiṁ rūpā ke ca yātyante kathaṁ caiva suduḥkhitāḥ
वे नरक कितने हैं, उनका परिमाण क्या है, उनका आश्रय क्या है, वे किस रूप के हैं, तथा कौन लोग वहाँ जाते हैं और किस प्रकार अत्यन्त दुःखी होते हैं?
श्लोक 61 (skanda.8.36.61)
कथं च तप्यते जन्तुर्वाच्यते च कथं तथा । कियता चैव कालेन नरकात् स विमुच्यते । मुक्तश्चोत्तिष्ठते केन कथं संसरते पुनः
kathaṁ ca tapyate janturvācyate ca kathaṁ tathā | kiyatā caiva kālena narakāt sa vimucyate | muktaścottiṣṭhate kena kathaṁ saṁsarate punaḥ
प्राणी वहाँ किस प्रकार पीड़ित होता है, तथा किस प्रकार वर्णित किया जाता है, और कितने समय में वह नरक से मुक्त होता है? मुक्त होकर वह किस रूप में उठता है, और किस प्रकार पुनः संसार में लौटता है?
श्लोक 62 (skanda.8.36.62)
एतत्सर्वमशेषेण विस्तरेण यथातथम् । कथयध्वं महाप्रज्ञाः परं कौतूहलं हि मे
etatsarvamaśeṣeṇa vistareṇa yathātatham | kathayadhvaṁ mahāprajñāḥ paraṁ kautūhalaṁ hi me
यह सब कुछ, बिना किसी शेष के, विस्तारपूर्वक, यथार्थ रूप में, हे महाप्राज्ञो! मुझे बताइए; मुझे इसमें अत्यन्त कौतूहल है।
श्लोक 63 (skanda.8.36.63)
तमुपेन्द्रपितामहेश्वरेशप्रवरेशं विदितार्थतत्त्वकोशम् । दुरितांकित मुक्तयोगं प्रतियोगं त्विदमाहुरग्रयोगम्
tamupendrapitāmaheśvareśapravareśaṁ viditārthatattvakośam | duritāṁkita muktayogaṁ pratiyogaṁ tvidamāhuragrayogam
उन्हें, जो उपेन्द्र, पितामह, ईश्वरों के ईश्वर, श्रेष्ठों के भी श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने अर्थ और तत्त्व के भण्डार को जान लिया है, पापों से चिह्नित... [एक छोटा अंश मूल में अनुपलब्ध है]... मुक्तियोग वाले, प्रतियोग करने वाले, इसे ही अग्रयोग कहते हैं।