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अम्बिका खण्ड · अध्याय 37

नरकवर्णन: यमलाचलकथन

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38

श्लोक 1 (skanda.8.37.1)

सनत्कुमार उवाच । ततस्ते पितरस्तस्य प्रतिष्ठां स्वसुतं प्रति । सुशर्माणमिति ख्यातं कथयामासुरव्ययाः

sanatkumāra uvāca | tataste pitarastasya pratiṣṭhāṁ svasutaṁ prati | suśarmāṇamiti khyātaṁ kathayāmāsuravyayāḥ

सनत्कुमार बोले - तब उन अविनाशी पितरों ने अपने पुत्र सुकेश से 'सुशर्मा' नाम से विख्यात, प्रतिष्ठा-प्राप्त एक पितर के विषय में कहा।

श्लोक 2 (skanda.8.37.2)

पितर ऊचुः । अयन्ते जनकः पुत्र सुशर्मा लोकविश्रुतः । कथायिष्यति तत्त्वेन यत्त्वया समुदाहृतम्

pitara ūcuḥ | ayante janakaḥ putra suśarmā lokaviśrutaḥ | kathāyiṣyati tattvena yattvayā samudāhṛtam

पितरों ने कहा - हे पुत्र! यह लोकविख्यात सुशर्मा तुम्हारा जनक है; जो कुछ तुमने पूछा है, वह वही तुम्हें यथार्थ रूप से बताएगा।

श्लोक 3 (skanda.8.37.3)

सनत्कुमार उवाच । ततः सुशर्मा विप्रर्षे तमामन्त्र्य महामनाः । उवाचेदं महासत्त्वं सुकेशं गणसत्तमम्

sanatkumāra uvāca | tataḥ suśarmā viprarṣe tamāmantrya mahāmanāḥ | uvācedaṁ mahāsattvaṁ sukeśaṁ gaṇasattamam

सनत्कुमार बोले - तब उन महान् मन वाले सुशर्मा ऋषि ने उस महाबली सुकेश गणश्रेष्ठ को संबोधित कर यह कहा।

श्लोक 4 (skanda.8.37.4)

सुशर्मोवाच । सुकेश न वयं साक्षात् पतिता नरकार्णवे । त्वय्यालम्बितचित्तास्तु पतिष्यामस्त्वया विना

suśarmovāca | sukeśa na vayaṁ sākṣāt patitā narakārṇave | tvayyālambitacittāstu patiṣyāmastvayā vinā

सुशर्मा ने कहा - हे सुकेश! हम साक्षात् नरक-सागर में नहीं गिरे थे, परन्तु तुम्हारे बिना, तुम्हीं पर मन टिकाए हुए हम गिर सकते थे।

श्लोक 5 (skanda.8.37.5)

किन्तु तद्यातनाभीताश्चिंतयामस्त्वहर्निशम् । कीदृशास्ते महाघोरा नरकाः श्रुतिदारुणाः

kintu tadyātanābhītāściṁtayāmastvaharniśam | kīdṛśāste mahāghorā narakāḥ śrutidāruṇāḥ

किन्तु उस यातना के भय से हम रात-दिन यही सोचते रहते हैं कि वे महाघोर, सुनने में भी भयंकर नरक कैसे होते हैं।

श्लोक 6 (skanda.8.37.6)

ततस्ते कथयिष्याम यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् । गणेश्वरेश शृणु मे नरका ये प्रकीर्तिताः

tataste kathayiṣyāma yathāprajñaṁ yathāśrutam | gaṇeśvareśa śṛṇu me narakā ye prakīrtitāḥ

इसलिए हम तुम्हें अपनी बुद्धि तथा सुने हुए के अनुसार बताएँगे। हे गणेश्वरों के ईश्वर! जो नरक कहे गए हैं, वे मुझसे सुनो।

श्लोक 7 (skanda.8.37.7)

दुरासदा महादुर्गाः सर्वप्राणिभयंकराः । प्रथमो नरकस्तत्र विश्रुतो यमलाचलः

durāsadā mahādurgāḥ sarvaprāṇibhayaṁkarāḥ | prathamo narakastatra viśruto yamalācalaḥ

वे दुर्गम, महान् दुर्ग, समस्त प्राणियों को भय देने वाले हैं। उनमें प्रथम नरक यमलाचल नाम से विख्यात है।

श्लोक 8 (skanda.8.37.8)

द्वितीयः शाल्मलो नाम तृतीयः कालसूत्रकः । कुम्भीपाकश्चतुर्थश्च असिपत्रवनोपरः

dvitīyaḥ śālmalo nāma tṛtīyaḥ kālasūtrakaḥ | kumbhīpākaścaturthaśca asipatravanoparaḥ

दूसरा शाल्मल नाम का, तीसरा कालसूत्रक; चौथा कुम्भीपाक तथा उसके बाद असिपत्रवन है।

श्लोक 9 (skanda.8.37.9)

तथा वैतरणी षष्ठः सप्तमश्चाप्ययोघनः । अष्टमः पद्म इत्येव महापद्मस्तथापरः

tathā vaitaraṇī ṣaṣṭhaḥ saptamaścāpyayoghanaḥ | aṣṭamaḥ padma ityeva mahāpadmastathāparaḥ

छठा वैतरणी है, सातवाँ अयोघन; आठवाँ पद्म कहा जाता है, तथा उसके बाद महापद्म है।

श्लोक 10 (skanda.8.37.10)

रौरवो दशमश्चैव महारौरव एव च । द्वादशश्च तमो नाम तमस्तमतरस्तथा

rauravo daśamaścaiva mahāraurava eva ca | dvādaśaśca tamo nāma tamastamatarastathā

दसवाँ रौरव है, तथा महारौरव भी; बारहवाँ तमस नाम का है, तथा उसके बाद तमस्तमतर है।

श्लोक 11 (skanda.8.37.11)

एते महान्तो नरका उच्छ्रायाश्च तथापरे । एकैकस्योच्छ्रया ह्यष्टौ नरकास्तेपि कीर्तिताः

ete mahānto narakā ucchrāyāśca tathāpare | ekaikasyocchrayā hyaṣṭau narakāstepi kīrtitāḥ

ये महान् नरक हैं, तथा इनके अतिरिक्त उच्छ्रय भी हैं; प्रत्येक के आठ-आठ उच्छ्रय होते हैं, वे भी नरक ही कहे गए हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.37.12)

उच्छ्रयेषु सविश्रामा यातना भवतीश्वर । इतरेषु त्वविश्रामो विशेषो ह्येष कीर्तितः

ucchrayeṣu saviśrāmā yātanā bhavatīśvara | itareṣu tvaviśrāmo viśeṣo hyeṣa kīrtitaḥ

हे ईश्वर! उच्छ्रयों में यातना विश्रामसहित होती है, जबकि अन्य में बिना विश्राम के होती है; यही उनका विशेष भेद बताया गया है।

श्लोक 13 (skanda.8.37.13)

तेषां सततदुःखं तु नॄणां पापेन कर्मणा । भेदः क्षयाच्च पापस्य क्रमस्तेषां प्रवक्ष्यते

teṣāṁ satataduḥkhaṁ tu nṝṇāṁ pāpena karmaṇā | bhedaḥ kṣayācca pāpasya kramasteṣāṁ pravakṣyate

मनुष्यों को उनके पापपूर्ण कर्मों के कारण उनमें निरन्तर दुःख होता है; पाप के क्षय से जो भेद होता है, उनका क्रम अब बताया जाएगा।

श्लोक 14 (skanda.8.37.14)

प्रमाणं तु गणेशेह न शक्यं वक्तुमेकशः । विभुत्वात् कर्मणस्तस्य क्षयादन्तं प्रपश्यति

pramāṇaṁ tu gaṇeśeha na śakyaṁ vaktumekaśaḥ | vibhutvāt karmaṇastasya kṣayādantaṁ prapaśyati

हे गणेश! इनका परिमाण एक साथ पूरी तरह नहीं बताया जा सकता; उस कर्म की विशालता के कारण, केवल उसके क्षय होने से ही उसका अन्त दिखाई देता है।

श्लोक 15 (skanda.8.37.15)

नरके पतितः सर्वो नान्तं तस्य प्रपश्यति । क्षीणपापाः प्रपश्यन्ति यथा तच्छृणु मेव्यय

narake patitaḥ sarvo nāntaṁ tasya prapaśyati | kṣīṇapāpāḥ prapaśyanti yathā tacchṛṇu mevyaya

जो भी नरक में गिरता है, वह उसका अन्त नहीं देख पाता; क्षीण-पाप हुए लोग ही उसे देख पाते हैं। हे अव्यय! वह जैसे होता है, वह मुझसे सुनो।

श्लोक 16 (skanda.8.37.16)

पतितो नरके घोरे दुष्कृती स्वेन कर्मणा । यात्यमानोतिकरुणं दिशमेकां प्रपद्यते

patito narake ghore duṣkṛtī svena karmaṇā | yātyamānotikaruṇaṁ diśamekāṁ prapadyate

अपने ही कर्म से घोर नरक में गिरा हुआ दुष्कृती, अत्यन्त करुणापूर्वक यातना सहते हुए एक दिशा को प्राप्त करता है।

श्लोक 17 (skanda.8.37.17)

स गत्वा शीघ्रमध्वानं बहुयोजनविस्तृतम् । बहूनन्यान् नासाद्य तस्यान्तं विनिवर्तते

sa gatvā śīghramadhvānaṁ bahuyojanavistṛtam | bahūnanyān nāsādya tasyāntaṁ vinivartate

वह अनेक योजनों तक विस्तृत मार्ग को शीघ्रता से चलकर, बहुत सी अन्य वस्तुओं को प्राप्त कर, उसका अन्त न पाकर लौट आता है।

श्लोक 18 (skanda.8.37.18)

विनिवृत्य ततो भूयो यात्यमानो विचेतनः । अन्या दिशं पुनर्गत्वा तथैव विनिवर्तते

vinivṛtya tato bhūyo yātyamāno vicetanaḥ | anyā diśaṁ punargatvā tathaiva vinivartate

वहाँ से लौटकर, फिर से यातना सहते हुए, चेतनाशून्य होकर, वह दूसरी दिशा में जाकर भी उसी प्रकार लौट आता है।

श्लोक 19 (skanda.8.37.19)

एवं सर्वा दिशो गत्वा ह्यन्तमप्राप्य दुःखितः । यात्यते करुणं तत्र न कश्चिदिह विद्यते

evaṁ sarvā diśo gatvā hyantamaprāpya duḥkhitaḥ | yātyate karuṇaṁ tatra na kaścidiha vidyate

इस प्रकार सभी दिशाओं में जाकर भी अन्त न पाकर, वह दुःखी होकर वहाँ करुणापूर्वक यातना सहता है; वहाँ उसका कोई सहायक नहीं होता।

श्लोक 20 (skanda.8.37.20)

यातनान्ते त्वकरुणं पापस्यान्ते ततः पुनः । प्रपश्यते परिमितं परिच्छिन्नं च सर्वशः

yātanānte tvakaruṇaṁ pāpasyānte tataḥ punaḥ | prapaśyate parimitaṁ paricchinnaṁ ca sarvaśaḥ

यातना के अन्त में, अत्यन्त निर्दयतापूर्वक, पाप के भी अन्त होने पर, तब वह उसे परिमित तथा सर्वथा सीमित रूप में देखता है।

श्लोक 21 (skanda.8.37.21)

द्वारेण महता युक्तं ततस्तस्माद्विमुच्यते । एवं हि नरकास्सर्वे ह्यनन्ताश्चाक्षयाव्ययाः

dvāreṇa mahatā yuktaṁ tatastasmādvimucyate | evaṁ hi narakāssarve hyanantāścākṣayāvyayāḥ

एक विशाल द्वार से युक्त होकर, वह तब उससे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सभी नरक अनन्त, अक्षय तथा अविनाशी हैं।

श्लोक 22 (skanda.8.37.22)

न तेषां परिसंख्यानं योजनैस्संविधीयते । येन कालेन तु पुनर्जन्तुः पतति दुःखितः

na teṣāṁ parisaṁkhyānaṁ yojanaissaṁvidhīyate | yena kālena tu punarjantuḥ patati duḥkhitaḥ

उनकी गणना योजनों से नहीं की जा सकती। जितने काल में वह प्राणी दुःखी होकर फिर से गिरता है।

श्लोक 23 (skanda.8.37.23)

यथा चैतच्छृणु विभो कथ्यमानं मयानघ । कृत्वा पापानि कर्माणि क्षयान्ते दुष्टचेतनः

yathā caitacchṛṇu vibho kathyamānaṁ mayānagha | kṛtvā pāpāni karmāṇi kṣayānte duṣṭacetanaḥ

हे निष्पाप! मेरे द्वारा जैसा कहा जा रहा है, वह सुनो। पापपूर्ण कर्म करके, अन्त में दुष्ट-चित्त वाला वह।

श्लोक 24 (skanda.8.37.24)

व्याध्याधियुक्तः क्लेशेन त्यजति स्वान्तनून् ततः । यमदूतैर्महापाशैर्बद्ध्वा दुःखसमीरितः

vyādhyādhiyuktaḥ kleśena tyajati svāntanūn tataḥ | yamadūtairmahāpāśairbaddhvā duḥkhasamīritaḥ

रोग और मानसिक पीड़ा से युक्त होकर, क्लेश के साथ अपने शरीर को त्यागता है; तब दुःख से पीड़ित वह यमदूतों द्वारा महापाशों से बाँधा जाता है।

श्लोक 25 (skanda.8.37.25)

विषमेण पथा देव नीयते विकृताकृतिः । अयोमयैः कण्टकैश्च विध्यमानस्ततस्ततः

viṣameṇa pathā deva nīyate vikṛtākṛtiḥ | ayomayaiḥ kaṇṭakaiśca vidhyamānastatastataḥ

हे देव! विकृत आकृति वाला वह विषम मार्ग से ले जाया जाता है, तथा जगह-जगह लोहे के काँटों से बींधा जाता है।

श्लोक 26 (skanda.8.37.26)

केशमज्जास्थिपंकैश्च दिह्यमानस्समन्ततः । विषमेषु च गर्तेषु प्रपतन्भिद्यते पुनः

keśamajjāsthipaṁkaiśca dihyamānassamantataḥ | viṣameṣu ca garteṣu prapatanbhidyate punaḥ

केश, मज्जा तथा हड्डियों के कीचड़ से चारों ओर लिथड़ा हुआ, वह विषम गड्ढों में गिरता हुआ पुनः बिंध जाता है।

श्लोक 27 (skanda.8.37.27)

क्वचिच्चोपलवर्षेण महता सन्निकीर्यते । तत्र भिन्नशिरोजानुपादबाहूरूबन्धनः

kvaciccopalavarṣeṇa mahatā sannikīryate | tatra bhinnaśirojānupādabāhūrūbandhanaḥ

कहीं वह भारी पत्थरों की वर्षा से आच्छादित हो जाता है, वहाँ उसका सिर, घुटने, पैर, भुजाएँ तथा जाँघें बँध जाती हैं और टूट जाती हैं।

श्लोक 28 (skanda.8.37.28)

कृष्यते यमदूतैश्च पुनः कण्टकिभिर्द्रुमैः । यात्यते भिद्यते चैव वल्लीभिश्चावबद्ध्यते

kṛṣyate yamadūtaiśca punaḥ kaṇṭakibhirdrumaiḥ | yātyate bhidyate caiva vallībhiścāvabaddhyate

यमदूतों द्वारा घसीटा जाता है, फिर काँटेदार वृक्षों में उलझाया जाता है, यातना सहता है, बिंधता है तथा लताओं से बाँध दिया जाता है।

श्लोक 29 (skanda.8.37.29)

एवं बहुविधाकारैर्दुःखदैः पथिभिः प्रभो । नीयमानो वशः क्लेशान् प्राप्नोति यमसादनम्

evaṁ bahuvidhākārairduḥkhadaiḥ pathibhiḥ prabho | nīyamāno vaśaḥ kleśān prāpnoti yamasādanam

हे प्रभो! इस प्रकार अनेक प्रकार के दुःखदायी मार्गों से ले जाया जाता हुआ, वश में किया गया वह क्लेशों को सहते हुए यमराज के भवन को प्राप्त होता है।

श्लोक 30 (skanda.8.37.30)

स ततो यममप्राप्य दूरादेव यमाज्ञया । चित्रगुप्तमुपागम्य श्राव्यते कर्म यत्कृतम्

sa tato yamamaprāpya dūrādeva yamājñayā | citraguptamupāgamya śrāvyate karma yatkṛtam

वहाँ पहुँचने पर, यम के पास न जाकर, यम की ही आज्ञा से, दूर से ही, उसे चित्रगुप्त के समीप ले जाया जाता है, जहाँ उसके किए हुए कर्मों को उसे सुनाया जाता है।

श्लोक 31 (skanda.8.37.31)

सोमोग्निर्वरुणो वायुः सूर्यश्चेति तदा नरम् । साक्षिणस्तत्र जन्तूनां ब्रुवते यत् कृताकृतम्

somognirvaruṇo vāyuḥ sūryaśceti tadā naram | sākṣiṇastatra jantūnāṁ bruvate yat kṛtākṛtam

उस समय सोम, अग्नि, वरुण, वायु तथा सूर्य - ये उस मनुष्य के लिए, प्राणियों के साक्षी बनकर, जो कुछ किया या न किया गया हो, वह बताते हैं।

श्लोक 32 (skanda.8.37.32)

उक्तो विभावितश्चैव चित्रगुप्तेन चोषितः । नरके पात्यते आर्त्त ऊर्ध्वपादो ह्यधःशिराः

ukto vibhāvitaścaiva citraguptena coṣitaḥ | narake pātyate ārtta ūrdhvapādo hyadhaḥśirāḥ

इस प्रकार बताया गया, जाँचा गया तथा चित्रगुप्त द्वारा फटकारा गया वह पीड़ित प्राणी, ऊपर पैर तथा नीचे सिर करके नरक में गिरा दिया जाता है।

श्लोक 33 (skanda.8.37.33)

तोमरैश्चातितीक्षणाग्रैश्शरैश्चाथ परश्वधैः । भिन्दिपालैर्मुद्गरैश्च अतिभिर्दीर्घवेधनैः

tomaraiścātitīkṣaṇāgraiśśaraiścātha paraśvadhaiḥ | bhindipālairmudgaraiśca atibhirdīrghavedhanaiḥ

अत्यन्त तीक्ष्ण नोकों वाले भालों से, बाणों से, फरसों से, भिन्दिपालों तथा मुद्गरों से, तथा गहरे तक बींधने वाले बाणों से।

श्लोक 34 (skanda.8.37.34)

परिघैः करपत्रैश्च वज्रैष्टंकैर्हलोपलैः । कीलैश्च मुशलैश्चैव क्षारपिष्टेन चैव हि

parighaiḥ karapatraiśca vajraiṣṭaṁkairhalopalaiḥ | kīlaiśca muśalaiścaiva kṣārapiṣṭena caiva hi

गदाओं, आरों, वज्रों, टाँकियों, हल तथा पत्थरों से, कीलों तथा मूसलों से, और क्षारयुक्त पिसान से भी उसे पीड़ित किया जाता है।

श्लोक 35 (skanda.8.37.35)

प्रदीप्तैश्चायुधैर्घोरैरग्निवर्षेण चाप्युत । हन्यमानो दिवारात्रं विनदन् करुणं बहु

pradīptaiścāyudhairghorairagnivarṣeṇa cāpyuta | hanyamāno divārātraṁ vinadan karuṇaṁ bahu

प्रज्वलित, भयंकर अस्त्रों से तथा अग्निवर्षा से भी उसे मारा जाता है; वह दिन-रात मार खाता हुआ अत्यन्त करुणापूर्वक चिल्लाता रहता है।

श्लोक 36 (skanda.8.37.36)

वर्षाणां तु सहस्रेण नरकं प्राप्नुते शुभम् । स तत्र पतितो भूयो यात्यमानः सुदुःखितः

varṣāṇāṁ tu sahasreṇa narakaṁ prāpnute śubham | sa tatra patito bhūyo yātyamānaḥ suduḥkhitaḥ

एक सहस्र वर्षों के पश्चात् वह उस नरक को प्राप्त करता है; वहाँ गिरकर, अत्यन्त दुःखी होकर वह पुनः यातना सहता है।

श्लोक 37 (skanda.8.37.37)

वर्षकोटिमविश्रान्तं निरयान्तं प्रपद्यते । महानरकमुक्तश्च उच्छ्रयान्तरमाश्रितः

varṣakoṭimaviśrāntaṁ nirayāntaṁ prapadyate | mahānarakamuktaśca ucchrayāntaramāśritaḥ

एक करोड़ वर्षों तक बिना विश्राम के वह नरक के अन्त तक पहुँचता है। महानरक से मुक्त होकर वह किसी अन्य उच्छ्रय का आश्रय लेता है।

श्लोक 38 (skanda.8.37.38)

शीतेन वायुना स्पृष्टः सुखं तत्र स विन्दति । स तं विश्राममासाद्य विस्मृतो यातनां तदा

śītena vāyunā spṛṣṭaḥ sukhaṁ tatra sa vindati | sa taṁ viśrāmamāsādya vismṛto yātanāṁ tadā

वहाँ शीतल वायु का स्पर्श पाकर वह सुख का अनुभव करता है; उस विश्राम को पाकर वह उस समय अपनी यातना को भूल जाता है।

श्लोक 39 (skanda.8.37.39)

मुहूर्त्तमाहृते स्वप्ने राक्षसेनापकृष्यते । स तेन कृष्यमाणश्च भूयो दुःखशुचार्दितः

muhūrttamāhṛte svapne rākṣasenāpakṛṣyate | sa tena kṛṣyamāṇaśca bhūyo duḥkhaśucārditaḥ

किन्तु क्षणभर की उस स्वप्न जैसी नींद में ही एक राक्षस उसे घसीट ले जाता है। उसके द्वारा घसीटे जाते हुए वह पुनः दुःख और शोक से पीड़ित होता है।

श्लोक 40 (skanda.8.37.40)

करुणं बहुधातीव प्रविलप्यावतिष्ठते । ततो भूयः समाकृष्य यातनायां स राक्षसः

karuṇaṁ bahudhātīva pravilapyāvatiṣṭhate | tato bhūyaḥ samākṛṣya yātanāyāṁ sa rākṣasaḥ

वह अत्यन्त करुणापूर्वक बारम्बार विलाप करते हुए खड़ा रहता है। उसके बाद वह राक्षस उसे पुनः घसीटकर यातना में डाल देता है।

श्लोक 41 (skanda.8.37.41)

यातयत्येव तं जन्तुं सविश्रामं सचेतसम् । तत्र वर्षसहस्रं वै यातितः पुनरेव सः

yātayatyeva taṁ jantuṁ saviśrāmaṁ sacetasam | tatra varṣasahasraṁ vai yātitaḥ punareva saḥ

वह उस प्राणी को, जो विश्राम पाकर सचेत हुआ था, फिर से यातना देता है; वहाँ वह पुनः एक सहस्र वर्षों तक यातना सहता है।

श्लोक 42 (skanda.8.37.42)

अन्यस्मिन्नुच्छ्रये घोरे यात्यते तावदेव हि । एवं स उच्छ्रयान् प्राप्य अष्टौ पापेन कर्मणा

anyasminnucchraye ghore yātyate tāvadeva hi | evaṁ sa ucchrayān prāpya aṣṭau pāpena karmaṇā

फिर किसी अन्य घोर उच्छ्रय में भी उतने ही समय तक यातना सहता है। इस प्रकार वह अपने पाप-कर्म के कारण आठों उच्छ्रयों को प्राप्त करता है।

श्लोक 43 (skanda.8.37.43)

संसारे कृमिकीटादिजन्तुः संप्रतिपद्यते । ये तु गच्छन्ति तान् घोरान् नरकान् पुरुषाधमाः

saṁsāre kṛmikīṭādijantuḥ saṁpratipadyate | ye tu gacchanti tān ghorān narakān puruṣādhamāḥ

फिर संसार में कृमि-कीट आदि योनियों को प्राप्त होता है। अब जो अधम पुरुष उन घोर नरकों में जाते हैं।

श्लोक 44 (skanda.8.37.44)

तानहं संप्रवक्ष्यामि तव पुत्र समासतः । प्रथमो यो मया प्रोक्तो नरको यमलाचलः

tānahaṁ saṁpravakṣyāmi tava putra samāsataḥ | prathamo yo mayā prokto narako yamalācalaḥ

हे पुत्र! उनके विषय में मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ। जो पहला नरक मैंने बताया, वह यमलाचल है।

श्लोक 45 (skanda.8.37.45)

यात्यन्ते तत्र पुरुषा महानिरयगामिनः । पर्वतौ द्वौ महासत्वसिंहव्याघ्रसमाकुलौ

yātyante tatra puruṣā mahānirayagāminaḥ | parvatau dvau mahāsatvasiṁhavyāghrasamākulau

वहाँ महान् नरक में जाने वाले पुरुष यातना सहते हैं। वहाँ दो पर्वत हैं, जो महाबली सिंहों और व्याघ्रों से भरे हुए हैं।

श्लोक 46 (skanda.8.37.46)

शरभेभसमाकीर्णौ बहुसर्पसमाकुलौ । पक्षिभिर्विविधाकारैः पुरुषैश्चोद्यतायुधैः

śarabhebhasamākīrṇau bahusarpasamākulau | pakṣibhirvividhākāraiḥ puruṣaiścodyatāyudhaiḥ

शरभों और हाथियों से भरे हुए, अनेक सर्पों से व्याप्त, विविध आकार के पक्षियों से तथा शस्त्र उठाए हुए पुरुषों से युक्त।

श्लोक 47 (skanda.8.37.47)

वृक्षैरपर्ण्णैस्संयुक्तौ सूचीभिर्वज्रकण्टकैः । तयोरन्तरमेकं वै समं सूचीभिरावृतम्

vṛkṣairaparṇṇaissaṁyuktau sūcībhirvajrakaṇṭakaiḥ | tayorantaramekaṁ vai samaṁ sūcībhirāvṛtam

पत्तों से रहित वृक्षों से युक्त, वज्र के समान काँटों वाली सुइयों से युक्त। उन दोनों पर्वतों के बीच का स्थान समतल है, जो सुइयों से आच्छादित है।

श्लोक 48 (skanda.8.37.48)

ऊर्ध्वाभिर्वज्रतुण्डाभिरभेद्याभिस्तथैव च । अन्यतः पुरुषैर्घोरैः शस्त्रपाणिभिरावृतौ

ūrdhvābhirvajratuṇḍābhirabhedyābhistathaiva ca | anyataḥ puruṣairghoraiḥ śastrapāṇibhirāvṛtau

जो ऊपर की ओर उठी हुई, वज्र जैसी नोकों वाली तथा अभेद्य हैं। दूसरी ओर से वे दोनों पर्वत शस्त्र लिए हुए भयंकर पुरुषों से घिरे हुए हैं।

श्लोक 49 (skanda.8.37.49)

प्राकारेण च लौहेन समन्तात् परिवारितौ । आकाशे चापि लौहेन तौ जालेन समावृतौ

prākāreṇa ca lauhena samantāt parivāritau | ākāśe cāpi lauhena tau jālena samāvṛtau

वे चारों ओर से लोहे की प्राचीर से घिरे हुए हैं, तथा आकाश में भी लोहे के जाल से आच्छादित हैं।

श्लोक 50 (skanda.8.37.50)

यात्यन्ते तत्र पुरुषा ये वै स्त्रियमनिच्छतीम् । आक्रमन्ति परक्यां वै कन्यादूषक एव च

yātyante tatra puruṣā ye vai striyamanicchatīm | ākramanti parakyāṁ vai kanyādūṣaka eva ca

वहाँ वे पुरुष यातना सहते हैं, जो अनिच्छुक स्त्री पर, अथवा किसी और की स्त्री पर बलात् आक्रमण करते हैं, तथा जो कन्या को दूषित करने वाले होते हैं।

श्लोक 51 (skanda.8.37.51)

न्यासापहारकश्चैव तथा मांसापहारकः । रसापहारकश्चैव यश्चापि परदूषकः

nyāsāpahārakaścaiva tathā māṁsāpahārakaḥ | rasāpahārakaścaiva yaścāpi paradūṣakaḥ

जो धरोहर का हरण करने वाला हो, मांस का हरण करने वाला हो, रस का हरण करने वाला हो, तथा जो दूसरों को दूषित करने वाला हो।

श्लोक 52 (skanda.8.37.52)

इन्द्रियग्रामघाती च मिथ्यालिङ्गी तथैव च । मृगश्वापदहन्ता च पृष्ठमांसाशिनश्च ये

indriyagrāmaghātī ca mithyāliṅgī tathaiva ca | mṛgaśvāpadahantā ca pṛṣṭhamāṁsāśinaśca ye

जो इन्द्रियों के समूह को नष्ट करने वाला हो, जो मिथ्या वेष धारण करने वाला हो, जो मृग तथा हिंसक पशुओं का वध करने वाला हो, तथा जो पीठ का मांस खाने वाले हों।

श्लोक 53 (skanda.8.37.53)

वृथामांसाशिनो ये च हिंसां ये च प्रकुर्वते । एते नराधमाः पुत्र गच्छन्ति यमलाचलम्

vṛthāmāṁsāśino ye ca hiṁsāṁ ye ca prakurvate | ete narādhamāḥ putra gacchanti yamalācalam

जो व्यर्थ ही मांस खाने वाले हैं, तथा जो हिंसा करते हैं - हे पुत्र! ये सब अधम पुरुष यमलाचल को जाते हैं।

श्लोक 54 (skanda.8.37.54)

यमलेषु च जातेषु यो न कुर्यान्नराधमः । प्रायश्चित्तमशुद्धात्मा स च तं प्रतिपद्यते

yamaleṣu ca jāteṣu yo na kuryānnarādhamaḥ | prāyaścittamaśuddhātmā sa ca taṁ pratipadyate

और जो अशुद्ध-चित्त, अधम पुरुष यमल सन्तान उत्पन्न होने पर उनके लिए प्रायश्चित्त नहीं करता, वह भी उसी को प्राप्त होता है।

श्लोक 55 (skanda.8.37.55)

स प्रसन्नो यथोक्तैस्तैः पुरुषैः समभिद्रुतः । आयुधैश्छिद्यमानश्च पर्वतं तं प्रपद्यते

sa prasanno yathoktaistaiḥ puruṣaiḥ samabhidrutaḥ | āyudhaiśchidyamānaśca parvataṁ taṁ prapadyate

वह, उन ऊपर कहे गए पुरुषों द्वारा प्रसन्नतापूर्वक घेर लिया गया तथा शस्त्रों से काटा जाता हुआ, उस पर्वत को प्राप्त होता है।

श्लोक 56 (skanda.8.37.56)

तत्र व्याघ्रैश्च कुपितैः शरभैश्च तरक्षुभिः । सर्पैर्विडालैः पतगैरयस्तुण्डैश्च भक्ष्यते

tatra vyāghraiśca kupitaiḥ śarabhaiśca tarakṣubhiḥ | sarpairviḍālaiḥ patagairayastuṇḍaiśca bhakṣyate

वहाँ क्रोधित व्याघ्रों, शरभों, लकड़बग्घों, सर्पों, बिल्लियों तथा लोहे की चोंच वाले पक्षियों द्वारा वह खाया जाता है।

श्लोक 57 (skanda.8.37.57)

तैर्भक्ष्यमाणो यदि च वृक्षं समधिरोहति । तत्र तैः कण्टकैस्तीक्ष्णैर्भिद्यते पक्षिभिश्च ह

tairbhakṣyamāṇo yadi ca vṛkṣaṁ samadhirohati | tatra taiḥ kaṇṭakaistīkṣṇairbhidyate pakṣibhiśca ha

उनके द्वारा खाया जाते हुए यदि वह किसी वृक्ष पर चढ़ता है, तो वहाँ भी वह तीक्ष्ण काँटों से तथा पक्षियों से बिंध जाता है।

श्लोक 58 (skanda.8.37.58)

अथ चेत् कन्दरां तस्य गुहां वा यातुमिच्छति । तत्रापि ह्यग्निना दग्धो दुःखार्त्तो विनिवर्तते

atha cet kandarāṁ tasya guhāṁ vā yātumicchati | tatrāpi hyagninā dagdho duḥkhārtto vinivartate

यदि वह उसकी कन्दरा या गुफा में जाना चाहे, तो वहाँ भी अग्नि से जलकर, दुःख से पीड़ित होकर वह लौट आता है।

श्लोक 59 (skanda.8.37.59)

अथ चेदन्तरं घोरं तयोः संप्रतिप्रद्यते । तत्र सूचीभिरुग्राभिः पादयोर्भिद्यते नरः

atha cedantaraṁ ghoraṁ tayoḥ saṁpratipradyate | tatra sūcībhirugrābhiḥ pādayorbhidyate naraḥ

यदि वह उन दोनों पर्वतों के बीच के भयंकर स्थान में प्रवेश करे, तो वहाँ तीक्ष्ण सुइयों से उसके दोनों पैर बिंध जाते हैं।

श्लोक 60 (skanda.8.37.60)

भिन्नञ्च तं समालक्ष्य ह्यशक्तमपसर्पणे । समागमम्याचलौ क्षिप्रं पीडयेतामतीव हि

bhinnañca taṁ samālakṣya hyaśaktamapasarpaṇe | samāgamamyācalau kṣipraṁ pīḍayetāmatīva hi

इस प्रकार बिंधे हुए तथा हटने में असमर्थ उसे देखकर, वे दोनों पर्वत तुरन्त एक साथ मिलकर उसे अत्यन्त पीड़ा देते हैं।

श्लोक 61 (skanda.8.37.61)

पीड्यमानोचलाभ्यां स यन्त्रेणेक्षुवदातुरः । करुणं क्रन्दमानस्तु यातनां तां समश्नुते

pīḍyamānocalābhyāṁ sa yantreṇekṣuvadāturaḥ | karuṇaṁ krandamānastu yātanāṁ tāṁ samaśnute

उन दोनों पर्वतों द्वारा पीड़ित होकर, वह पीड़ा से व्याकुल, यन्त्र में गन्ने की भाँति, करुणापूर्वक चिल्लाते हुए उस यातना को भोगता है।

श्लोक 62 (skanda.8.37.62)

भक्षितस्याथ भिन्नस्य विलुप्तस्य च पक्षिभिः । दग्धस्य च नवं भूयः शरीरमभिजायते

bhakṣitasyātha bhinnasya viluptasya ca pakṣibhiḥ | dagdhasya ca navaṁ bhūyaḥ śarīramabhijāyate

इस प्रकार खाए गए, बिंधे हुए, पक्षियों द्वारा नोच लिए गए तथा जलाए गए उसके लिए फिर से एक नया शरीर उत्पन्न होता है।

श्लोक 63 (skanda.8.37.63)

एवं स यात्यमानो वै बहूनब्दान् सुःदुखितः । द्वारं लब्ध्वा विनिर्यात उच्छ्रायेषु निपात्यते

evaṁ sa yātyamāno vai bahūnabdān suḥdukhitaḥ | dvāraṁ labdhvā viniryāta ucchrāyeṣu nipātyate

इस प्रकार अत्यन्त दुःखी होकर वह अनेक वर्षों तक यातना सहता है; तत्पश्चात् द्वार पाकर बाहर निकलता है, और उच्छ्रयों में गिरा दिया जाता है।

श्लोक 64 (skanda.8.37.64)

यमलाचलमेतमुग्रवेगं बहुधापापसमेतकर्मयोगम् । शृणुयाद्य अभीक्ष्णशोतिवेगं स न यात्येव तमुग्रपापयोगम्

yamalācalametamugravegaṁ bahudhāpāpasametakarmayogam | śṛṇuyādya abhīkṣṇaśotivegaṁ sa na yātyeva tamugrapāpayogam

जो कोई इस अत्यन्त वेगवान्, विविध पापों से युक्त कर्मों वाले यमलाचल की कथा को सदा सुनता है, वह उस भयंकर पाप-योग वाले नरक को कभी प्राप्त नहीं होता।

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