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अम्बिका खण्ड · अध्याय 38

नरकवर्णन: कूटशाल्मलिकथन

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (skanda.8.38.1)

सुशर्मोवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि शाल्मलीनरकं पुनः । यात्यन्ते तत्र पुरुषाः सुभृशं पापकर्मिणः

suśarmovāca | ataḥ paraṁ pravakṣyāmi śālmalīnarakaṁ punaḥ | yātyante tatra puruṣāḥ subhṛśaṁ pāpakarmiṇaḥ

सुशर्मा ने कहा - अब इसके बाद मैं पुनः शाल्मली नरक के विषय में बताता हूँ। वहाँ अत्यन्त पापकर्मी पुरुष यातना सहते हैं।

श्लोक 2 (skanda.8.38.2)

शाल्मलीनां सहस्राणि बहूनि प्रवरेश्वर । उच्चास्सर्वाश्च ता घोरा बहुयोजनविस्तृताः

śālmalīnāṁ sahasrāṇi bahūni pravareśvara | uccāssarvāśca tā ghorā bahuyojanavistṛtāḥ

हे श्रेष्ठ ईश्वर! वहाँ शाल्मली के हजारों वृक्ष हैं, सब ऊँचे, भयंकर तथा अनेक योजनों तक विस्तृत।

श्लोक 3 (skanda.8.38.3)

महाशाखा महापत्रा महाकण्टकसंयुताः । लौहेन महता चैव प्राकारेणाभिसंवृताः

mahāśākhā mahāpatrā mahākaṇṭakasaṁyutāḥ | lauhena mahatā caiva prākāreṇābhisaṁvṛtāḥ

बड़ी शाखाओं वाले, बड़े पत्तों वाले, बड़े काँटों से युक्त, तथा विशाल लोहे की प्राचीर से घिरे हुए।

श्लोक 4 (skanda.8.38.4)

जालेन महता सर्वा उपरिष्ठान् समावृताः । पुरुषास्तत्र तिष्ठन्ति बहवो रुषिताननाः

jālena mahatā sarvā upariṣṭhān samāvṛtāḥ | puruṣāstatra tiṣṭhanti bahavo ruṣitānanāḥ

सब ऊपर से विशाल जाल से आच्छादित हैं। वहाँ अनेक क्रोधित मुख वाले पुरुष खड़े रहते हैं।

श्लोक 5 (skanda.8.38.5)

वज्रदण्डोपलधरा असिमुद्गरधारिणः । अन्यैश्च विविधाकारैरायुधैर्वृतपाणयः

vajradaṇḍopaladharā asimudgaradhāriṇaḥ | anyaiśca vividhākārairāyudhairvṛtapāṇayaḥ

जो वज्र, दण्ड तथा पत्थर धारण किए हुए, तलवार और मुद्गर धारण किए हुए, तथा अन्य विविध प्रकार के अस्त्रों को हाथों में लिए हुए हैं।

श्लोक 6 (skanda.8.38.6)

यातयन्ति भृशं जन्तूनवशास्ते सुदारुणाः । छिद्यमानाश्च तत्रापि राक्षसैः क्रूरकर्मभिः

yātayanti bhṛśaṁ jantūnavaśāste sudāruṇāḥ | chidyamānāśca tatrāpi rākṣasaiḥ krūrakarmabhiḥ

वे अत्यन्त भयंकर, निरंकुश होकर प्राणियों को अत्यन्त यातना देते हैं, और वहाँ क्रूरकर्मी राक्षसों द्वारा भी वे काटे जाते हैं।

श्लोक 7 (skanda.8.38.7)

दिशः प्रपद्यते सर्वा वेदनार्तः सुदुःखितः । व्रजते यत्र यत्रासौ तत्र तत्राभिहन्यते

diśaḥ prapadyate sarvā vedanārtaḥ suduḥkhitaḥ | vrajate yatra yatrāsau tatra tatrābhihanyate

वेदना से पीड़ित, अत्यन्त दुःखी वह सभी दिशाओं में भागता है; परन्तु जहाँ-जहाँ वह जाता है, वहाँ-वहाँ ही वह मारा जाता है।

श्लोक 8 (skanda.8.38.8)

गर्तेषु पतितं चैव राक्षसाः प्राप्य सर्वशः । शस्त्रैश्च विविधाकारैर्निकृन्तन्त्यतिदारुणाः

garteṣu patitaṁ caiva rākṣasāḥ prāpya sarvaśaḥ | śastraiśca vividhākārairnikṛntantyatidāruṇāḥ

गड्ढों में गिरे हुए उसे भी राक्षस सब ओर से पकड़कर, अत्यन्त भयंकर विविध प्रकार के शस्त्रों से काट डालते हैं।

श्लोक 9 (skanda.8.38.9)

श्रावयन्तः पुरानेन कृतं पापं दुरात्मना । भर्त्सयन्तश्च दुर्वृत्तं पतितं क्वचिदेव हि

śrāvayantaḥ purānena kṛtaṁ pāpaṁ durātmanā | bhartsayantaśca durvṛttaṁ patitaṁ kvacideva hi

उस दुरात्मा द्वारा पूर्वकाल में किए गए पाप को सुनाते हुए, वे उस दुराचारी को, जहाँ भी वह गिरा हो, फटकारते रहते हैं।

श्लोक 10 (skanda.8.38.10)

तत उत्थाय भिन्नाङ्गः सोनुबद्धश्च राक्षसैः । सूचीकण्टकसंयुक्तं देशमन्यं प्रपद्यते

tata utthāya bhinnāṅgaḥ sonubaddhaśca rākṣasaiḥ | sūcīkaṇṭakasaṁyuktaṁ deśamanyaṁ prapadyate

फिर वहाँ से उठकर, अंगों के टूटे हुए, राक्षसों द्वारा पीछा किए जाते हुए, वह सुइयों जैसे काँटों से युक्त किसी अन्य स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 11 (skanda.8.38.11)

तत्र सूचीभिरुग्राभिः कण्टकैश्चायसैः पुनः । भिद्यमानो नदन् दुःखान्निपतत्यतिदुःखितः

tatra sūcībhirugrābhiḥ kaṇṭakaiścāyasaiḥ punaḥ | bhidyamāno nadan duḥkhānnipatatyatiduḥkhitaḥ

वहाँ तीक्ष्ण सुइयों तथा लोहे के काँटों से बिंधता हुआ, दुःख से चिल्लाता हुआ, वह अत्यन्त दुःखी होकर गिर पड़ता है।

श्लोक 12 (skanda.8.38.12)

तत्राप्येनं समासाद्य विविधायुधपाणयः । राक्षसाभिद्रवन्त्येव वैरिणो वैरिणं यथा

tatrāpyenaṁ samāsādya vividhāyudhapāṇayaḥ | rākṣasābhidravantyeva vairiṇo vairiṇaṁ yathā

वहाँ भी उसे पाकर, विविध शस्त्र हाथों में लिए हुए राक्षस, वैरी के प्रति वैरी की भाँति उस पर टूट पड़ते हैं।

श्लोक 13 (skanda.8.38.13)

तस्मादुत्थाय वेगेन वृक्षं यद्यभिरोहति । तत्र तैः कण्टकैस्तीक्ष्णैर्भिद्यते छिद्यतेपि च

tasmādutthāya vegena vṛkṣaṁ yadyabhirohati | tatra taiḥ kaṇṭakaistīkṣṇairbhidyate chidyatepi ca

वहाँ से वेगपूर्वक उठकर यदि वह किसी वृक्ष पर चढ़ता है, तो वहाँ भी वह तीक्ष्ण काँटों से बिंध जाता है और कट जाता है।

श्लोक 14 (skanda.8.38.14)

पत्रैश्च विविधाकारैरयस्तुण्डैश्च पक्षिभिः । हृतकर्णाक्षिनासोष्ठः पतितो धरणीतले

patraiśca vividhākārairayastuṇḍaiśca pakṣibhiḥ | hṛtakarṇākṣināsoṣṭhaḥ patito dharaṇītale

विविध प्रकार के पत्तों से तथा लोहे की चोंच वाले पक्षियों से भी वह कान, नेत्र, नासिका तथा ओष्ठ खोकर धरती पर गिर पड़ता है।

श्लोक 15 (skanda.8.38.15)

तत्र सूचीभिरुग्राभिः सर्वाङ्गेषु विभिद्यते । एवं बहुविधाकारा यातनास्तत्र दुःखिताः

tatra sūcībhirugrābhiḥ sarvāṅgeṣu vibhidyate | evaṁ bahuvidhākārā yātanāstatra duḥkhitāḥ

वहाँ तीक्ष्ण सुइयों से उसके समस्त अंग बिंध जाते हैं। इस प्रकार अनेक प्रकार की यातनाएँ वहाँ दुःखी लोगों को प्राप्त होती हैं।

श्लोक 16 (skanda.8.38.16)

प्राप्नुवन्ति दुराचारा ये तान्निगदतः शृणु । अग्निदो गरदाता च वियोनौ यश्च गच्छति

prāpnuvanti durācārā ye tānnigadataḥ śṛṇu | agnido garadātā ca viyonau yaśca gacchati

अब यह सुनो कि कौन दुराचारी उन्हें प्राप्त होते हैं - अग्नि लगाने वाला, विष देने वाला, तथा जो अगम्य योनि में गमन करता है।

श्लोक 17 (skanda.8.38.17)

पुंसि यो वोच्छृजेच्छुक्रं विषदो मांसविक्रयी । समुद्रयायी दुष्टात्मा यश्चैको मिष्टमश्नुते

puṁsi yo vocchṛjecchukraṁ viṣado māṁsavikrayī | samudrayāyī duṣṭātmā yaścaiko miṣṭamaśnute

जो पुरुष के साथ वीर्य त्याग करता है, विष बेचने वाला, मांस बेचने वाला; जो समुद्रयात्री दुष्टात्मा हो, तथा जो अकेला ही मिष्ठान्न खाता है।

श्लोक 18 (skanda.8.38.18)

अतिथिन्नार्चयेद्यश्च यश्च मिथ्याव्रती भवेत् । ब्रह्महा च विवासाश्च योपः प्रविशते द्विजः

atithinnārcayedyaśca yaśca mithyāvratī bhavet | brahmahā ca vivāsāśca yopaḥ praviśate dvijaḥ

जो अतिथि का सत्कार नहीं करता, जो मिथ्या व्रती हो, जो ब्रह्महत्या करने वाला हो, जो वस्त्रहीन रहे, तथा जो द्विज अपवित्र होकर जल में प्रवेश करे।

श्लोक 19 (skanda.8.38.19)

घण्टिको ग्रामयाजी च शूद्राध्यापक एव च । तथा वार्धुषिको लुब्धो ब्रह्मणश्चैव विक्रयी

ghaṇṭiko grāmayājī ca śūdrādhyāpaka eva ca | tathā vārdhuṣiko lubdho brahmaṇaścaiva vikrayī

घंटा बजाने वाला, ग्राम-पुरोहित, शूद्रों को वेद पढ़ाने वाला, ब्याज लेने वाला लोभी, तथा ब्राह्मण को बेचने वाला।

श्लोक 20 (skanda.8.38.20)

एते गच्छन्ति दुर्वृत्ताः कूटशाल्मलिसंज्ञकम् । कोटीद्वयेन तूत्तीर्णा वर्षाणां वै पुनश्च ते

ete gacchanti durvṛttāḥ kūṭaśālmalisaṁjñakam | koṭīdvayena tūttīrṇā varṣāṇāṁ vai punaśca te

ये सब दुराचारी 'कूटशाल्मलि' नामक नरक को जाते हैं। दो करोड़ वर्ष वहाँ बीत जाने पर।

श्लोक 21 (skanda.8.38.21)

उच्छ्रये पातिताः स्तोकं कालं विश्राम्य वै पुनः । पात्यन्ते नरके तस्मिन् यावत् क्षीणं तदेनसम् । एषैव विधिरन्येषां नरकाणां मुने स्मृतः

ucchraye pātitāḥ stokaṁ kālaṁ viśrāmya vai punaḥ | pātyante narake tasmin yāvat kṣīṇaṁ tadenasam | eṣaiva vidhiranyeṣāṁ narakāṇāṁ mune smṛtaḥ

वे उच्छ्रय में गिराए जाते हैं, तथा थोड़े समय विश्राम पाकर पुनः उसी नरक में गिरा दिए जाते हैं, जब तक उनका वह पाप क्षीण न हो जाए। हे मुने! यही विधि अन्य सभी नरकों की भी मानी गई है।

श्लोक 22 (skanda.8.38.22)

य इमं भृशदुःखितोपलम्भं सुकृतीनामतिदुर्गमाचलम् । शृणुयात् प्रयतः कुतूहलात्मा न स गच्छेन्निरयं हि शाल्मलम्

ya imaṁ bhṛśaduḥkhitopalambhaṁ sukṛtīnāmatidurgamācalam | śṛṇuyāt prayataḥ kutūhalātmā na sa gacchennirayaṁ hi śālmalam

जो पवित्र तथा जिज्ञासु मन वाला व्यक्ति, पुण्यात्माओं के लिए भी अत्यन्त दुःखदायी और दुर्गम इस शाल्मली पर्वत के वृत्तान्त को सुनता है, वह उस शाल्मली नरक को कभी नहीं जाता।

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