अम्बिका खण्ड · अध्याय 39
नरकवर्णन: कालसूत्रकथन
श्लोक 1 (skanda.8.39.1)
सुशर्मोवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि नरकं कालसूत्रकम् । समन्तान्महतोच्चेन प्राकारेण सुसंवृतम्
suśarmovāca | ataḥ paraṁ pravakṣyāmi narakaṁ kālasūtrakam | samantānmahatoccena prākāreṇa susaṁvṛtam
सुशर्मा ने कहा - अब इसके बाद मैं कालसूत्रक नामक नरक के विषय में बताता हूँ, जो चारों ओर से एक विशाल, ऊँची प्राचीर से घिरा हुआ है।
श्लोक 2 (skanda.8.39.2)
लोहजालेन च तथा आकाशेप्यभिसंवृतः । यथैकश्च तथा सर्वे नरका अभिसंवृताः
lohajālena ca tathā ākāśepyabhisaṁvṛtaḥ | yathaikaśca tathā sarve narakā abhisaṁvṛtāḥ
वह लोहे के जाल से तथा आकाश से भी आच्छादित है। जिस प्रकार यह एक नरक है, उसी प्रकार सभी नरक इसी तरह आच्छादित हैं।
श्लोक 3 (skanda.8.39.3)
सोच्छ्रयाश्चैव विज्ञेया न वक्ष्ये तानहं पुनः । लोकद्रुहो जनास्तत्र यात्यन्ते पुरुषाधमाः
socchrayāścaiva vijñeyā na vakṣye tānahaṁ punaḥ | lokadruho janāstatra yātyante puruṣādhamāḥ
उनके उच्छ्रय भी इसी प्रकार जानने चाहिए, उन्हें मैं पुनः नहीं बताऊँगा। वहाँ लोक-द्रोही अधम पुरुष यातना सहते हैं।
श्लोक 4 (skanda.8.39.4)
ये हरन्ति स्त्रियं वापि विक्रेता यस्तथा गवाम् । धर्मस्य चात्मनश्चैव ब्राह्मणानां च निन्दकः
ye haranti striyaṁ vāpi vikretā yastathā gavām | dharmasya cātmanaścaiva brāhmaṇānāṁ ca nindakaḥ
जो स्त्री का हरण करते हैं, जो गौओं को बेचने वाले हैं, तथा जो धर्म, अपने ही आत्मा और ब्राह्मणों की निन्दा करने वाले हैं।
श्लोक 5 (skanda.8.39.5)
छद्मना यश्च शास्त्राणि गुरुभ्योपह्नवेत् पुनः । गुरुं निन्दति यश्चापि पितरं मातरं तथा
chadmanā yaśca śāstrāṇi gurubhyopahnavet punaḥ | guruṁ nindati yaścāpi pitaraṁ mātaraṁ tathā
जो छल से गुरुओं से शास्त्रों को छिपाता है, जो गुरु की निन्दा करता है, तथा जो पिता और माता की भी निन्दा करता है।
श्लोक 6 (skanda.8.39.6)
श्वशुरं भ्रातरं ज्येष्ठं तथा चान्यान् गरीयसः । आक्रोशयति यस्तान्वै तथा चाप्यवमन्यते
śvaśuraṁ bhrātaraṁ jyeṣṭhaṁ tathā cānyān garīyasaḥ | ākrośayati yastānvai tathā cāpyavamanyate
जो श्वसुर, बड़े भाई तथा अन्य गुरुजनों को गाली देता है, तथा जो उनका अनादर करता है।
श्लोक 7 (skanda.8.39.7)
आश्रमाणां तथा भेत्ता रहस्यानां च सर्वशः । अदत्तं यः समादद्यात् स गच्छेद् द्विज तत्र वै
āśramāṇāṁ tathā bhettā rahasyānāṁ ca sarvaśaḥ | adattaṁ yaḥ samādadyāt sa gacched dvija tatra vai
जो आश्रमों को भंग करने वाला हो, जो गुप्त रहस्यों को सर्वथा प्रकट करने वाला हो, तथा जो बिना दिए हुए वस्तु को ग्रहण करता है - हे द्विज! वह वहाँ जाता है।
श्लोक 8 (skanda.8.39.8)
ते तत्र पतिता घोरे नरके पापचेतसः । तिस्रः कोटीस्तु संपूर्णा वर्षाणान्तु नराधमाः । यात्यन्ते मृत्युवचनात् क्रन्दमाना विचेतसः
te tatra patitā ghore narake pāpacetasaḥ | tisraḥ koṭīstu saṁpūrṇā varṣāṇāntu narādhamāḥ | yātyante mṛtyuvacanāt krandamānā vicetasaḥ
वे पापचेता अधम पुरुष उस घोर नरक में गिरकर, पूरे तीन करोड़ वर्षों तक, मृत्यु के वचन से, चेतनाशून्य होकर विलाप करते हुए यातना सहते हैं।
श्लोक 9 (skanda.8.39.9)
कालसूत्रेण महता मित्वा मित्वा तु दुष्कृतम् । छिन्दन्त्यङ्गानि जन्तूनां कुण्ठाग्रैरायुधैर्भृशम्
kālasūtreṇa mahatā mitvā mitvā tu duṣkṛtam | chindantyaṅgāni jantūnāṁ kuṇṭhāgrairāyudhairbhṛśam
महान् कालसूत्र से, उस दुष्कर्मी को बार-बार माप-मापकर, वे कुंठित नोक वाले शस्त्रों से प्राणियों के अंगों को अत्यन्त काट डालते हैं।
श्लोक 10 (skanda.8.39.10)
किंकरैस्तैरविश्रान्तं दिवारात्रमतन्द्रितैः । पूर्णे काले ततो जंतुरुच्छ्रयान् प्रतिपद्यते
kiṁkaraistairaviśrāntaṁ divārātramatandritaiḥ | pūrṇe kāle tato jaṁturucchrayān pratipadyate
उन अथक, दिन-रात सजग रहने वाले किंकरों द्वारा बिना विश्राम के यातना सहते हुए, समय पूरा होने पर वह प्राणी उच्छ्रयों को प्राप्त होता है।
श्लोक 11 (skanda.8.39.11)
विश्राम्य स तदा जन्तुः पात्यते नरके पुनः । यावदस्य कृतं पापं क्षीणं सर्वमशेषतः
viśrāmya sa tadā jantuḥ pātyate narake punaḥ | yāvadasya kṛtaṁ pāpaṁ kṣīṇaṁ sarvamaśeṣataḥ
तब कुछ समय विश्राम पाकर वह प्राणी पुनः उसी नरक में गिरा दिया जाता है, जब तक उसका किया हुआ सारा पाप पूर्णतः क्षीण न हो जाए।
श्लोक 12 (skanda.8.39.12)
य इमं बहुपापकर्तृसूत्रं शृणुयाद् दुष्करलोककर्मसूत्रम् । न स याति तदुग्रदुःखसूत्रं नरकं तद् यमलोककालसूत्रम्
ya imaṁ bahupāpakartṛsūtraṁ śṛṇuyād duṣkaralokakarmasūtram | na sa yāti tadugraduḥkhasūtraṁ narakaṁ tad yamalokakālasūtram
जो कोई अनेक पापकर्ताओं के इस सूत्र को, दुष्कर लोक-कर्मों के इस सूत्र को सुनता है, वह उस उग्र-दुःख वाले सूत्र को, यमलोक के उस कालसूत्र नामक नरक को, कभी नहीं जाता।