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अम्बिका खण्ड · अध्याय 40

नरकवर्णन: कुम्भीपाककथन

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41

श्लोक 1 (skanda.8.40.1)

सुशर्मोवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि कुम्भीपाकं महाभयम् । श्रोतॄणामपि तत्कालं भयदं ह्यकृतात्मनाम्

suśarmovāca | ataḥ paraṁ pravakṣyāmi kumbhīpākaṁ mahābhayam | śrotṝṇāmapi tatkālaṁ bhayadaṁ hyakṛtātmanām

सुशर्मा ने कहा - अब इसके बाद मैं महाभयंकर कुम्भीपाक नरक के विषय में बताता हूँ, जो अकृतात्मा श्रोताओं के लिए भी सुनते ही भय उत्पन्न करने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.8.40.2)

आयस्यस्तत्र ब्रह्मणश्च अञ्जनाचलसन्निभाः । कुम्भ्यस्तैलेन संपूर्णा वह्निवर्णाः सुदुःसहाः

āyasyastatra brahmaṇaśca añjanācalasannibhāḥ | kumbhyastailena saṁpūrṇā vahnivarṇāḥ suduḥsahāḥ

वहाँ अंजनाचल पर्वत के समान काली, लोहे की बड़ी हांडियाँ हैं, जो तेल से भरी हुई, अग्नि के वर्ण वाली तथा अत्यन्त असह्य हैं।

श्लोक 3 (skanda.8.40.3)

दुष्कृतीन् तासु तप्तासु बद्ध्वा बद्ध्वा महाबलाः । क्षिपन्ति राक्षसा घोराः क्रन्दमानाः सुभैरवम्

duṣkṛtīn tāsu taptāsu baddhvā baddhvā mahābalāḥ | kṣipanti rākṣasā ghorāḥ krandamānāḥ subhairavam

उन तपे हुए कड़ाहों में महाबली, भयंकर राक्षस दुष्कर्मियों को बार-बार बाँधकर, अत्यन्त भयंकर स्वर में चिल्लाते हुए उन्हें डाल देते हैं।

श्लोक 4 (skanda.8.40.4)

वर्षकोटीश्चतस्रश्च पच्यन्ते तत्र जन्तवः । ये तानिमान्निबोध त्वमुच्यमानान्मया विभो

varṣakoṭīścatasraśca pacyante tatra jantavaḥ | ye tānimānnibodha tvamucyamānānmayā vibho

वहाँ प्राणी पूरे चार करोड़ वर्षों तक पकाए जाते हैं। हे प्रभो! अब जिनके बारे में मैं बता रहा हूँ, उन्हें जानो।

श्लोक 5 (skanda.8.40.5)

इष्टकापाककारी च कुम्भपाककरस्तथा । तौ विनाशयते यश्च अग्निदो यो गृहेषु च

iṣṭakāpākakārī ca kumbhapākakarastathā | tau vināśayate yaśca agnido yo gṛheṣu ca

ईंट पकाने वाला, तथा घड़े पकाने वाला; जो उन्हें अपने कार्य में नष्ट करता है, तथा जो घरों में आग लगाने वाला है।

श्लोक 6 (skanda.8.40.6)

वने खलेथ गोष्ठे वा अन्नपानविनाशकः । भोजने विघ्नकारी च यज्ञहा यज्ञदाहकः

vane khaletha goṣṭhe vā annapānavināśakaḥ | bhojane vighnakārī ca yajñahā yajñadāhakaḥ

वन में, खलिहान में या गोशाला में आग लगाने वाला, अन्न-जल का नाश करने वाला, भोजन में विघ्न डालने वाला, यज्ञ का नाश करने वाला तथा यज्ञ को जलाने वाला।

श्लोक 7 (skanda.8.40.7)

कूटकर्मकरो यश्च कूटसाक्षी तथैव च । मिथ्याग्निचयनी चैव मिथ्याग्न्याहरणी तथा

kūṭakarmakaro yaśca kūṭasākṣī tathaiva ca | mithyāgnicayanī caiva mithyāgnyāharaṇī tathā

जो कपटपूर्ण कर्म करने वाला हो, जो झूठा साक्षी हो, जो अग्नि का मिथ्या आधान करने वाला हो, तथा जो अग्नि का मिथ्या आवाहन करने वाला हो।

श्लोक 8 (skanda.8.40.8)

मिथ्यापाकप्रदाता च वेदानां यश्च दूषकः । हर्तोपकरणानां च शिल्पिनां यो नराधमः

mithyāpākapradātā ca vedānāṁ yaśca dūṣakaḥ | hartopakaraṇānāṁ ca śilpināṁ yo narādhamaḥ

जो मिथ्या रूप से पाक-सामग्री देने वाला हो, जो वेदों को दूषित करने वाला हो, तथा जो शिल्पियों के उपकरणों का हरण करने वाला अधम पुरुष हो।

श्लोक 9 (skanda.8.40.9)

एवं ते यातितास्तत्र विश्रामं पुनरुच्छ्रये । संप्राप्य नरके भूयो निपतन्ति क्षयान्तिकम्

evaṁ te yātitāstatra viśrāmaṁ punarucchraye | saṁprāpya narake bhūyo nipatanti kṣayāntikam

इस प्रकार वे वहाँ यातना सहकर, पुनः उच्छ्रय में विश्राम पाकर, फिर से उसी नरक को प्राप्त होकर, तब तक गिरते रहते हैं जब तक उनका पाप क्षीण न हो जाए।

श्लोक 10 (skanda.8.40.10)

य इमं बहुदुष्कृतान्तपाकं शृणुयाद्वा मनुजो हि कर्मपाकम् । न स गच्छति तं दुरात्मपाकं नरकं साधनदुःखकुम्भिपाकम्

ya imaṁ bahuduṣkṛtāntapākaṁ śṛṇuyādvā manujo hi karmapākam | na sa gacchati taṁ durātmapākaṁ narakaṁ sādhanaduḥkhakumbhipākam

जो मनुष्य अनेक दुष्कर्मों के इस अन्तिम पाक को, इस कर्मपाक को सुनता है, वह उस दुरात्माओं के पाक-स्वरूप, साधना और दुःख से भरे कुम्भीपाक नामक नरक को कभी नहीं जाता।

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