अम्बिका खण्ड · अध्याय 41
नरकवर्णन: असिपत्रवनकथन
श्लोक 1 (skanda.8.41.1)
सुशर्मोवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि असिपत्रवनं पुनः । नरकं पापकृद्दुःखं सर्वसत्वभयंकरम्
suśarmovāca | ataḥ paraṁ pravakṣyāmi asipatravanaṁ punaḥ | narakaṁ pāpakṛdduḥkhaṁ sarvasatvabhayaṁkaram
सुशर्मा ने कहा - अब इसके बाद मैं पुनः असिपत्रवन नामक नरक के विषय में बताता हूँ, जो पापियों को दुःख देने वाला तथा समस्त प्राणियों को भयभीत करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.8.41.2)
असिपत्र इति ख्याता वृक्षास्तत्र दुरासदाः । बहवः सुमहाशाखा घनाश्चोच्चाश्च ते भृशम्
asipatra iti khyātā vṛkṣāstatra durāsadāḥ | bahavaḥ sumahāśākhā ghanāścoccāśca te bhṛśam
वहाँ 'असिपत्र' नाम से विख्यात दुर्गम वृक्ष हैं, बहुत से, विशाल शाखाओं वाले, अत्यन्त सघन तथा ऊँचे।
श्लोक 3 (skanda.8.41.3)
तेषां पत्राणि घोराणि तीक्ष्णान्यसिनिभानि च । आयसेभ्यो विशिष्टानि न च तान्यायसानि हि
teṣāṁ patrāṇi ghorāṇi tīkṣṇānyasinibhāni ca | āyasebhyo viśiṣṭāni na ca tānyāyasāni hi
उनके पत्ते भयंकर, तलवार के समान तीक्ष्ण हैं, तथा लोहे से भी बढ़कर हैं, यद्यपि वे लोहे के नहीं हैं।
श्लोक 4 (skanda.8.41.4)
तैक्ष्ण्यात्तानि विशिष्टानि छेदने च महामते । तैः पत्रैराचिताश्चैव तथा कण्टकिनश्च ते
taikṣṇyāttāni viśiṣṭāni chedane ca mahāmate | taiḥ patrairācitāścaiva tathā kaṇṭakinaśca te
हे महामते! अपनी तीक्ष्णता में वे काटने में विशिष्ट हैं। उन पत्तों से आच्छादित तथा काँटेदार भी वे वृक्ष हैं।
श्लोक 5 (skanda.8.41.5)
जन्तवस्तत्र रक्षोभिः पापकर्मनिबन्धनाः । वध्यमानासिमुशलैस्तथैवान्यैर्महायुधैः
jantavastatra rakṣobhiḥ pāpakarmanibandhanāḥ | vadhyamānāsimuśalaistathaivānyairmahāyudhaiḥ
वहाँ राक्षसों द्वारा पापकर्मों में बँधे हुए प्राणी, तलवार, मूसल तथा अन्य महान् शस्त्रों से मारे जाते हैं।
श्लोक 6 (skanda.8.41.6)
अग्निना दह्यमानाश्च वृक्षांस्तान् संप्रयान्ति ते । तानागतान् समीक्ष्यैव पर्णानि प्रपतन्त्युत
agninā dahyamānāśca vṛkṣāṁstān saṁprayānti te | tānāgatān samīkṣyaiva parṇāni prapatantyuta
अग्नि से जलाए जाते हुए वे उन वृक्षों की ओर भागते हैं; उन्हें आते देखकर ही उन वृक्षों के पत्ते गिरने लगते हैं।
श्लोक 7 (skanda.8.41.7)
महागुरूणि तीक्ष्णानि विनिकृन्तन्ति ताँश्च ह । ते निकृत्तशिरोग्रीवा देशात्तस्मात् प्रयान्ति वै
mahāgurūṇi tīkṣṇāni vinikṛntanti tāṁśca ha | te nikṛttaśirogrīvā deśāttasmāt prayānti vai
वे भारी और तीक्ष्ण पत्ते उन्हें काट डालते हैं; सिर और गर्दन कटे हुए वे उस स्थान से भाग निकलते हैं।
श्लोक 8 (skanda.8.41.8)
ते गता राक्षसैर्भूयो भूयो वृक्षैर्दुरासदैः । यात्यन्ते वर्षकोटीस्तु तत्र पञ्च सुदुःखिताः
te gatā rākṣasairbhūyo bhūyo vṛkṣairdurāsadaiḥ | yātyante varṣakoṭīstu tatra pañca suduḥkhitāḥ
वे फिर राक्षसों द्वारा तथा उन दुर्गम वृक्षों द्वारा बारम्बार पकड़े जाते हैं, और वहाँ पूरे पाँच करोड़ वर्षों तक अत्यन्त दुःखी होकर यातना सहते हैं।
श्लोक 9 (skanda.8.41.9)
ततो विमुक्तास्तेभ्यस्ते उच्छ्रयान् संविशन्ति हि । विश्रान्तास्तत्र ते सर्वे उच्छ्रयान्नरके पुनः
tato vimuktāstebhyaste ucchrayān saṁviśanti hi | viśrāntāstatra te sarve ucchrayānnarake punaḥ
उनसे मुक्त होकर वे उच्छ्रयों में प्रवेश करते हैं। वहाँ विश्राम पाकर, वे सब पुनः उच्छ्रयों से उस नरक में गिरा दिए जाते हैं।
श्लोक 10 (skanda.8.41.10)
पात्यन्ते विवशा मूढा यावत् पापं क्षयं गतम् । ये तु तं नरकं घोरं नरा गच्छन्ति पापिनः
pātyante vivaśā mūḍhā yāvat pāpaṁ kṣayaṁ gatam | ye tu taṁ narakaṁ ghoraṁ narā gacchanti pāpinaḥ
वे मूढ, विवश होकर तब तक गिरते रहते हैं जब तक उनका पाप क्षीण नहीं हो जाता। अब जो पापी पुरुष उस घोर नरक में जाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.8.41.11)
तांस्तेहं संप्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो द्विज । वृक्षं यः पुत्रकृतकं विनाशयति दुर्मतिः
tāṁstehaṁ saṁpravakṣyāmi śṛṇuṣvāvahito dvija | vṛkṣaṁ yaḥ putrakṛtakaṁ vināśayati durmatiḥ
उनके विषय में मैं तुम्हें बताता हूँ, हे द्विज! सावधान होकर सुनो। जो दुर्बुद्धि पुत्र के समान पाले गए वृक्ष को नष्ट करता है।
श्लोक 12 (skanda.8.41.12)
आरामे वाथ ग्रामे वा विक्रीणाति च दुर्मतिः । निष्पादितं तथा वृक्षमाश्रमे पथि वा पुनः
ārāme vātha grāme vā vikrīṇāti ca durmatiḥ | niṣpāditaṁ tathā vṛkṣamāśrame pathi vā punaḥ
जो दुर्बुद्धि उसे उद्यान या ग्राम में बेच देता है, अथवा जो आश्रम में या मार्ग में उगाए गए वृक्ष को नष्ट करता है।
श्लोक 13 (skanda.8.41.13)
तडागे वा तथोद्याने देवतायतनेषु वा । गृहे प्रपायामथवा नद्यास्तीरे चतुष्पथे
taḍāge vā tathodyāne devatāyataneṣu vā | gṛhe prapāyāmathavā nadyāstīre catuṣpathe
तालाब में, उद्यान में, देवालयों में, घर में, पौशाला में, नदी के तट पर या चौराहे पर।
श्लोक 14 (skanda.8.41.14)
यत्र वा तत्र वा जातं यो नाशयति दुर्मतिः । पादपान् गुल्मवल्लीर्वा क्षुपानथ तृणान्यपि
yatra vā tatra vā jātaṁ yo nāśayati durmatiḥ | pādapān gulmavallīrvā kṣupānatha tṛṇānyapi
जहाँ कहीं भी उगे हुए वृक्षों, झाड़ियों, लताओं, क्षुपों अथवा तृणों को भी जो दुर्बुद्धि नष्ट करता है।
श्लोक 15 (skanda.8.41.15)
छायापुष्पफलार्थं हि स्वकार्यकरणाय वा । विनाशयति यो मूढः स च तं प्रतिपद्यते
chāyāpuṣpaphalārthaṁ hi svakāryakaraṇāya vā | vināśayati yo mūḍhaḥ sa ca taṁ pratipadyate
छाया, पुष्प या फल के लिए, अथवा अपने ही किसी कार्य के लिए, जो मूढ उन्हें नष्ट करता है, वह भी उसी नरक को प्राप्त होता है।
श्लोक 16 (skanda.8.41.16)
यश्चापहरते मूलं पुष्पाणि च फलानि च । आत्मार्थं कामसंपत्तौ न देवपितृकारणात्
yaścāpaharate mūlaṁ puṣpāṇi ca phalāni ca | ātmārthaṁ kāmasaṁpattau na devapitṛkāraṇāt
जो अपने ही स्वार्थ की पूर्ति के लिए, न कि देवताओं या पितरों के निमित्त, मूल, पुष्प तथा फल का अपहरण करता है।
श्लोक 17 (skanda.8.41.17)
नदीं यश्चावरुध्नीयात् कूपान्यश्च प्रपूरयेत् । यश्च पर्णत्वचामर्थे वृक्षं छिन्द्यान्नराधमः । विनाशयेद्वा तं वृक्षं स च तं प्रतिपद्यते
nadīṁ yaścāvarudhnīyāt kūpānyaśca prapūrayet | yaśca parṇatvacāmarthe vṛkṣaṁ chindyānnarādhamaḥ | vināśayedvā taṁ vṛkṣaṁ sa ca taṁ pratipadyate
जो नदी को अवरुद्ध करता है, जो कुओं को पाट देता है, तथा जो अधम पुरुष पत्ते या छाल के लिए वृक्ष को काटता या नष्ट करता है, वह भी उसी को प्राप्त होता है।
श्लोक 18 (skanda.8.41.18)
यश्च छायासमासन्नान् जन्तून् वै संप्रबाधते । स्वस्थानं च समासन्नान् त्रासयेद्वारयेदपि
yaśca chāyāsamāsannān jantūn vai saṁprabādhate | svasthānaṁ ca samāsannān trāsayedvārayedapi
और जो छाया में आश्रय लिए हुए निकटवर्ती प्राणियों को पीड़ा देता है, तथा जो अपने ही स्थान के पास आए हुए प्राणियों को भयभीत करता या रोकता है।
श्लोक 19 (skanda.8.41.19)
सर्वे ते तं प्रपद्यन्ते सोच्छ्रयं नरकं महत् । उत्तीर्णाश्च ततो भूयः संसारं यान्ति तेशुभाः
sarve te taṁ prapadyante socchrayaṁ narakaṁ mahat | uttīrṇāśca tato bhūyaḥ saṁsāraṁ yānti teśubhāḥ
वे सब उस विशाल, उच्छ्रयसहित नरक को प्राप्त होते हैं; और वहाँ से पार होकर वे शुभ लोग फिर से संसार में लौट आते हैं।
श्लोक 20 (skanda.8.41.20)
य इमं शृणुयादतन्द्रितात्मा नरकं पापकृतामशर्मभूतम् । न स तं समुपैति पुण्यकर्मा विदितात्मा ह्यसिपत्रनामधेयम्
ya imaṁ śṛṇuyādatandritātmā narakaṁ pāpakṛtāmaśarmabhūtam | na sa taṁ samupaiti puṇyakarmā viditātmā hyasipatranāmadheyam
जो सजग मन वाला व्यक्ति पापियों के इस दुःखरहित-सुखरहित नरक की कथा को सुनता है, वह पुण्यकर्मी, आत्मज्ञानी व्यक्ति उस असिपत्र नामक नरक को कभी प्राप्त नहीं होता।