अम्बिका खण्ड · अध्याय 42
नरकवर्णन: वैतरणीकथन
श्लोक 1 (skanda.8.42.1)
सुशर्मोवाच । अतः परं वैतरणीं नदीं पापप्रणाशनीम् । शृणुष्वावहितः पुत्र पापकर्मभयावहाम्
suśarmovāca | ataḥ paraṁ vaitaraṇīṁ nadīṁ pāpapraṇāśanīm | śṛṇuṣvāvahitaḥ putra pāpakarmabhayāvahām
सुशर्मा ने कहा - अब इसके बाद मैं पापों का नाश करने वाली वैतरणी नदी के विषय में बताता हूँ। हे पुत्र! पापकर्मों को भय देने वाली उस नदी को सावधान होकर सुनो।
श्लोक 2 (skanda.8.42.2)
नदी वैतरणी पुत्र टङ्कच्छिन्नतटा शुभा । केशास्थिरुधिरापूर्णा महाक्षाररसा तथा
nadī vaitaraṇī putra ṭaṅkacchinnataṭā śubhā | keśāsthirudhirāpūrṇā mahākṣārarasā tathā
हे पुत्र! वैतरणी नदी टाँकी से काटे हुए जैसे किनारों वाली, शुभ, तथा केश, हड्डी और रुधिर से भरी हुई, अत्यन्त क्षारयुक्त रस वाली है।
श्लोक 3 (skanda.8.42.3)
उल्लुम्पकैर्गर्दभकैर्मकरैः कच्छपैरपि । शिशुमारैश्च नक्रैश्च तन्तुकै राक्षसैरपि
ullumpakairgardabhakairmakaraiḥ kacchapairapi | śiśumāraiśca nakraiśca tantukai rākṣasairapi
गिद्धों, गधों, मगरमच्छों, कछुओं, शिशुमारों, नक्रों तथा तन्तुक-राक्षसों से युक्त।
श्लोक 4 (skanda.8.42.4)
महादष्ट्रैर्महाकायैः पिशिताशैः समाकुला । असिपत्रैश्च तैर्वृक्षैस्तीरजातैः समावृता
mahādaṣṭrairmahākāyaiḥ piśitāśaiḥ samākulā | asipatraiśca tairvṛkṣaistīrajātaiḥ samāvṛtā
बड़ी-बड़ी दाढ़ों वाले, विशाल शरीर वाले, मांसभक्षी प्राणियों से भरी हुई; तथा उसके किनारों पर उगे हुए असिपत्र वृक्षों से घिरी हुई।
श्लोक 5 (skanda.8.42.5)
शैवलेन च दीर्घेण वितानेनेव संवृता । तस्यास्तीरे वनं घोरं शरभर्क्षसमाकुलम्
śaivalena ca dīrgheṇa vitāneneva saṁvṛtā | tasyāstīre vanaṁ ghoraṁ śarabharkṣasamākulam
लम्बी काई से मानो चँदोवे के समान ढकी हुई है। उसके तट पर एक भयंकर वन है, जो शरभों और भालुओं से भरा हुआ है।
श्लोक 6 (skanda.8.42.6)
व्याघ्रद्वीपिसमाकीर्णं सिंहेभखरसंकुलम् । तत्र दुष्कृतकर्माणस्तैर्व्याघ्रादिभिरर्दिताः
vyāghradvīpisamākīrṇaṁ siṁhebhakharasaṁkulam | tatra duṣkṛtakarmāṇastairvyāghrādibhirarditāḥ
व्याघ्रों और चीतों से व्याप्त, सिंहों, हाथियों तथा गधों से भरा हुआ। वहाँ दुष्कर्मी लोग उन व्याघ्रों आदि से पीड़ित होते हैं।
श्लोक 7 (skanda.8.42.7)
तां नदीं सुमहाघोरां पात्यन्ते दुःखितास्ततः । तत्र ते पतिता वत्स तन्तुकैः शैवलेन च
tāṁ nadīṁ sumahāghorāṁ pātyante duḥkhitāstataḥ | tatra te patitā vatsa tantukaiḥ śaivalena ca
उससे दुःखी होकर वे उस अत्यन्त भयंकर नदी में गिरा दिए जाते हैं। हे वत्स! वहाँ गिरने पर वे तन्तुओं तथा काई में उलझ जाते हैं।
श्लोक 8 (skanda.8.42.8)
वितानेन च संनद्धा भक्ष्यन्ते तैर्नक्रादिभिः । क्षारोदकेन दह्यन्तो ननादयन्तश्च दुःखिताः
vitānena ca saṁnaddhā bhakṣyante tairnakrādibhiḥ | kṣārodakena dahyanto nanādayantaśca duḥkhitāḥ
उस चँदोवे जैसी काई से बँधे हुए, वे नक्र आदि जलजन्तुओं द्वारा खाए जाते हैं; क्षार जल से जलते हुए वे दुःखी होकर चीत्कार करते रहते हैं।
श्लोक 9 (skanda.8.42.9)
षड् वर्षकोटीः यात्यन्ते यावत् पापस्य संक्षयः । ततो मुक्तास्तूच्छ्रयेषु पात्यन्ते वै पुनः पुनः
ṣaḍ varṣakoṭīḥ yātyante yāvat pāpasya saṁkṣayaḥ | tato muktāstūcchrayeṣu pātyante vai punaḥ punaḥ
वे पूरे छह करोड़ वर्षों तक तब तक यातना सहते हैं, जब तक उनका पाप क्षीण नहीं हो जाता। तत्पश्चात् मुक्त होकर वे उच्छ्रयों में गिरा दिए जाते हैं, बारम्बार।
श्लोक 10 (skanda.8.42.10)
विश्रान्तास्तत्र ते सर्वे ये उच्छ्रयान् नरके पुनः । पात्यन्ते विवशा मूढा यावत् पापं क्षयं गतम्
viśrāntāstatra te sarve ye ucchrayān narake punaḥ | pātyante vivaśā mūḍhā yāvat pāpaṁ kṣayaṁ gatam
वहाँ विश्राम पाकर वे सब पुनः उच्छ्रयों से नरक में गिरा दिए जाते हैं। वे मूढ, विवश होकर तब तक गिरते रहते हैं जब तक उनका पाप क्षीण नहीं हो जाता।
श्लोक 11 (skanda.8.42.11)
उत्तीर्णः सोच्छ्रयानेतान् संसारं प्रतिप्रद्यते । तीर्णोन्तमेषु च पुनर्नरकेषु पृथक् पृथक् । कोटिरेका तु कालस्य वर्द्धते ह्युत्तरोत्तरम्
uttīrṇaḥ socchrayānetān saṁsāraṁ pratipradyate | tīrṇontameṣu ca punarnarakeṣu pṛthak pṛthak | koṭirekā tu kālasya varddhate hyuttarottaram
इन उच्छ्रयों को पार करके वह संसार को प्राप्त होता है। इनसे भी पार होकर, अन्य-अन्य नरकों में पृथक्-पृथक् काल की एक-एक करोड़ वर्षों की वृद्धि उत्तरोत्तर होती जाती है।
श्लोक 12 (skanda.8.42.12)
उच्छ्रयाणान्तु सर्वेषामेकैकस्य पृथक् पृथक् । सहस्रं वर्द्धते पुत्र वर्षाणां वै समासतः
ucchrayāṇāntu sarveṣāmekaikasya pṛthak pṛthak | sahasraṁ varddhate putra varṣāṇāṁ vai samāsataḥ
और सभी उच्छ्रयों में से प्रत्येक की, हे पुत्र! संक्षेप में, एक-एक सहस्र वर्षों की वृद्धि होती जाती है।
श्लोक 13 (skanda.8.42.13)
ये तु गच्छन्ति तं घोरं नरकं दुष्टचेतसः । शृणुष्व तानिमान् सम्यगुच्यमानान्मयानघ
ye tu gacchanti taṁ ghoraṁ narakaṁ duṣṭacetasaḥ | śṛṇuṣva tānimān samyagucyamānānmayānagha
जो दुष्ट-चित्त लोग उस घोर नरक को जाते हैं, हे निष्पाप! उनके विषय में मेरे द्वारा भलीभाँति बताए जा रहे इन बातों को सुनो।
श्लोक 14 (skanda.8.42.14)
सरितं योभिशपते यश्चैनामवमन्यते । यश्च नग्नः प्रविशति स्त्रियं यश्चात्र गच्छति
saritaṁ yobhiśapate yaścaināmavamanyate | yaśca nagnaḥ praviśati striyaṁ yaścātra gacchati
जो नदी को शाप देता है, जो उसका अनादर करता है, जो नग्न होकर उसमें प्रवेश करता है, तथा जो स्त्री-सम्भोग करते हुए उसमें प्रवेश करता है।
श्लोक 15 (skanda.8.42.15)
निष्ठीवेदथ मूत्रं वा पुरीषं वाप्यथोत्सृजेत् । अपश्च हरते यस्तु क्षेत्रारामजनोपगाः
niṣṭhīvedatha mūtraṁ vā purīṣaṁ vāpyathotsṛjet | apaśca harate yastu kṣetrārāmajanopagāḥ
जो उसमें थूकता है, मूत्र त्यागता है, या मल त्यागता है, तथा जो खेत, बगीचे और लोगों के लिए आने वाले जल का हरण करता है।
श्लोक 16 (skanda.8.42.16)
अपां सेतुहरश्चैव तडागस्य च भेदकः । तथा पुष्करिणीनां च दूषको यश्च मानवः
apāṁ setuharaścaiva taḍāgasya ca bhedakaḥ | tathā puṣkariṇīnāṁ ca dūṣako yaśca mānavaḥ
जो जल के सेतु को नष्ट करता है, जो तालाब को तोड़ता है, तथा वह मनुष्य जो कमल-सरोवरों को दूषित करने वाला हो।
श्लोक 17 (skanda.8.42.17)
दुष्टामदुष्टामथवा यश्च नारीं प्रदूषयेत् । पद्मिनीं यश्च हरति नाशयेद्वापि दुर्मतिः
duṣṭāmaduṣṭāmathavā yaśca nārīṁ pradūṣayet | padminīṁ yaśca harati nāśayedvāpi durmatiḥ
जो दुष्ट अथवा निर्दोष स्त्री को दूषित करता है, तथा जो दुर्बुद्धि कमलिनी को हर लेता है या नष्ट कर देता है।
श्लोक 18 (skanda.8.42.18)
सार्थस्य वाथ जन्तोर्वा यो जन्तुर्भयमावहेत् । ते सर्वे नरकं घोरं प्रपद्यन्ते नराधमाः
sārthasya vātha jantorvā yo janturbhayamāvahet | te sarve narakaṁ ghoraṁ prapadyante narādhamāḥ
जो किसी यात्री-समूह या प्राणी को भय पहुँचाता है - ये सब अधम पुरुष उस घोर नरक को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 19 (skanda.8.42.19)
य इमामशुभप्रणाशनीं शृणुयान्नित्यमशुद्धबाधनीम् । प्रयतः स न याति भावनीं सरितं वैतरणीमसङ्गिनीम्
ya imāmaśubhapraṇāśanīṁ śṛṇuyānnityamaśuddhabādhanīm | prayataḥ sa na yāti bhāvanīṁ saritaṁ vaitaraṇīmasaṅginīm
जो पवित्र व्यक्ति इस अशुभ-नाशिनी, अशुद्धि को सदा दूर करने वाली कथा को सुनता है, वह उस भावमयी, असंग वैतरणी नदी को कभी प्राप्त नहीं होता।