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अम्बिका खण्ड · अध्याय 43

नरकवर्णन: अयोघनकथन

अध्याय 42अध्याय-सूचीअध्याय 44

श्लोक 1 (skanda.8.43.1)

अतः परं प्रवक्ष्यामि नरकं पापनाशनम् । अयोघनमितिख्यातं सर्वप्राणिभयङ्करम्

ataḥ paraṁ pravakṣyāmi narakaṁ pāpanāśanam | ayoghanamitikhyātaṁ sarvaprāṇibhayaṅkaram

अब इसके बाद मैं उस पापनाशक नरक के विषय में बताता हूँ, जो 'अयोघन' नाम से विख्यात है, और समस्त प्राणियों को भय देने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.8.43.2)

यत्र ते पुरुषा घोरा यमाभा यमकिङ्कराः । महाबला महासत्वाः सर्वेयोगेश्वरास्तथा

yatra te puruṣā ghorā yamābhā yamakiṅkarāḥ | mahābalā mahāsatvāḥ sarveyogeśvarāstathā

वहाँ यम के समान भयंकर, यम के किंकर, महाबली, महासत्व तथा सभी योगेश्वर पुरुष हैं।

श्लोक 3 (skanda.8.43.3)

अयस्कारा यथा पिण्डमयसोग्निप्रतापितम् । संदंशेनाभिसंगृह्य स्थापयित्वायसे घने

ayaskārā yathā piṇḍamayasognipratāpitam | saṁdaṁśenābhisaṁgṛhya sthāpayitvāyase ghane

जैसे लोहार लोहे के अग्नि-तप्त पिण्ड को चिमटे से पकड़कर बड़े लोहे के निहाई पर रखता है।

श्लोक 4 (skanda.8.43.4)

अभिघ्नन्ति घनैरन्यैस्तथा तत्रापि जन्तवः । हन्यन्ते राक्षसैर्घोरैस्तर्जयद्भिः सुदारुणम्

abhighnanti ghanairanyaistathā tatrāpi jantavaḥ | hanyante rākṣasairghoraistarjayadbhiḥ sudāruṇam

और अन्य बड़े हथौड़ों से उसे पीटता है, उसी प्रकार वहाँ भी वे प्राणी होते हैं; वे भयंकर राक्षसों द्वारा अत्यन्त डराते हुए मारे जाते हैं।

श्लोक 5 (skanda.8.43.5)

वर्षकोटीस्तथा सप्त यातिताः स्वेन कर्मणा । उच्छ्रयेषु तथा घोरां यातनां प्राप्नुवन्ति ते

varṣakoṭīstathā sapta yātitāḥ svena karmaṇā | ucchrayeṣu tathā ghorāṁ yātanāṁ prāpnuvanti te

इस प्रकार वे अपने ही कर्म से पूरे सात करोड़ वर्षों तक यातना सहते हैं, तथा उच्छ्रयों में भी वे उतनी ही घोर यातना पाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.8.43.6)

एतद् ये यान्ति पुरुषाः सोच्छ्रयं नरकं महत् । तानहं संप्रवक्ष्यामि अनिर्देश्यान् नराधमान्

etad ye yānti puruṣāḥ socchrayaṁ narakaṁ mahat | tānahaṁ saṁpravakṣyāmi anirdeśyān narādhamān

जो पुरुष इस उच्छ्रयसहित महान् नरक को जाते हैं, उन अनिर्देश्य अधम पुरुषों के विषय में अब मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 7 (skanda.8.43.7)

पादेन हन्यात् पितरं मातरं पूज्यमेव वा । अन्यां काञ्चित् स्त्रियं वापि हस्तेनाथ कशादिभिः

pādena hanyāt pitaraṁ mātaraṁ pūjyameva vā | anyāṁ kāñcit striyaṁ vāpi hastenātha kaśādibhiḥ

जो पैर से पिता, माता या किसी पूज्य व्यक्ति को मारता है, अथवा जो किसी अन्य स्त्री को हाथ से, कोड़े आदि से मारता है।

श्लोक 8 (skanda.8.43.8)

तथा प्रव्रजितं चैव अग्निं वाप्यथ लंघयेत् । बालमर्थकृते यश्च मृत्युना योजयेत्तथा

tathā pravrajitaṁ caiva agniṁ vāpyatha laṁghayet | bālamarthakṛte yaśca mṛtyunā yojayettathā

तथा जो किसी संन्यासी को, अथवा अग्नि को लांघता है, तथा जो अपने स्वार्थ के लिए किसी बालक को मृत्यु के हवाले करता है।

श्लोक 9 (skanda.8.43.9)

स्त्रियं वाथ पुमांसं वा क्लीबं वान्यन्नराधमः । भ्रातॄन् यश्चाभिसन्धत्ते द्रव्ये कस्मिंश्चिदेव हि

striyaṁ vātha pumāṁsaṁ vā klībaṁ vānyannarādhamaḥ | bhrātṝn yaścābhisandhatte dravye kasmiṁścideva hi

जो अधम पुरुष किसी स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक को धोखा देता है, अथवा किसी द्रव्य के विषय में अपने भाइयों के साथ छल करता है।

श्लोक 10 (skanda.8.43.10)

पितरं वाथ दुर्बुद्धिर्मातरं भगिनीमपि । पतिर्यश्चैव भार्यां स्वां पुत्रांश्चैवाभिसंधयेत् । भार्या पतिं वा पुत्रान् वा तेषां सा गतिरुच्यते

pitaraṁ vātha durbuddhirmātaraṁ bhaginīmapi | patiryaścaiva bhāryāṁ svāṁ putrāṁścaivābhisaṁdhayet | bhāryā patiṁ vā putrān vā teṣāṁ sā gatirucyate

जो दुर्बुद्धि पिता, माता या बहन के साथ, अथवा जो पति अपनी पत्नी और पुत्रों के साथ छल करे; या पत्नी पति अथवा पुत्रों के साथ छल करे - उनकी वही गति कही गई है।

श्लोक 11 (skanda.8.43.11)

कीलयेद्यश्च देवार्चास्तीर्थानि च दुरात्मवान् । विद्याः शास्त्राणि दिव्यानि तेषां सा गतिरुच्यते

kīlayedyaśca devārcāstīrthāni ca durātmavān | vidyāḥ śāstrāṇi divyāni teṣāṁ sā gatirucyate

और वह दुरात्मा जो देवमूर्तियों तथा तीर्थों को नष्ट करता है, तथा दिव्य विद्याओं और शास्त्रों को नष्ट करता है - उनकी भी वही गति कही गई है।

श्लोक 12 (skanda.8.43.12)

य इमं बहुपापयोगकारणं शृणुयान्नित्यमसौख्यसर्वदारणम् । प्रयतस्स न याति तं भयानकं नरकं दुर्गमयोधनावतानकम्

ya imaṁ bahupāpayogakāraṇaṁ śṛṇuyānnityamasaukhyasarvadāraṇam | prayatassa na yāti taṁ bhayānakaṁ narakaṁ durgamayodhanāvatānakam

जो पवित्र व्यक्ति अनेक पापों के इस कारणस्वरूप, सदा सुखरहित तथा सर्वथा विदारक वृत्तान्त को सुनता है, वह उस भयंकर, दुर्गम, अयोघन के आघात से युक्त नरक को कभी नहीं जाता।

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