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अम्बिका खण्ड · अध्याय 44

नरकवर्णन: पद्मकथन

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (skanda.8.44.1)

सुशर्मोवाच । अतः परं पद्ममहं प्रवक्ष्यामि सुदुर्गमम् । सुकृतीनामलभ्यं च दुष्कृतीनां भयावहम्

suśarmovāca | ataḥ paraṁ padmamahaṁ pravakṣyāmi sudurgamam | sukṛtīnāmalabhyaṁ ca duṣkṛtīnāṁ bhayāvaham

सुशर्मा ने कहा - अब इसके बाद मैं अत्यन्त दुर्गम पद्म नामक नरक के विषय में बताता हूँ, जो पुण्यात्माओं के लिए अलभ्य तथा पापियों के लिए भयदायक है।

श्लोक 2 (skanda.8.44.2)

तत्राग्निस्तापनो नाम धम्यमान इव ज्वलन् । जन्तवस्तत्र ताप्यन्ते वह्निवर्णा भवन्ति च

tatrāgnistāpano nāma dhamyamāna iva jvalan | jantavastatra tāpyante vahnivarṇā bhavanti ca

वहाँ 'तापन' नामक अग्नि है, जो धौंकनी से फूँकी हुई-सी प्रज्वलित रहती है। वहाँ प्राणी तप्त होते हैं तथा अग्नि के समान वर्ण वाले हो जाते हैं।

श्लोक 3 (skanda.8.44.3)

पद्मपत्रनिभास्सर्वे धाम्यमानास्ततस्ततः । तस्य मध्ये महास्तम्भो लौहः समवतिष्ठते

padmapatranibhāssarve dhāmyamānāstatastataḥ | tasya madhye mahāstambho lauhaḥ samavatiṣṭhate

वे सब कमल-पत्रों के समान, इधर-उधर धधकते रहते हैं। उसके मध्य में एक विशाल लोहे का स्तम्भ खड़ा है।

श्लोक 4 (skanda.8.44.4)

तं ते गत्वा प्रगूहन्ति सोप्यग्निरतिदारुणः । एवं तत्रानिशं घोरं यातितास्तूच्छ्रयेष्वपि

taṁ te gatvā pragūhanti sopyagniratidāruṇaḥ | evaṁ tatrāniśaṁ ghoraṁ yātitāstūcchrayeṣvapi

उसके पास जाकर वे उसे आलिंगन करते हैं, वह भी अत्यन्त भयंकर अग्नि-स्वरूप है। इस प्रकार वहाँ वे रातदिन घोर यातना सहते हैं, तथा उच्छ्रयों में भी।

श्लोक 5 (skanda.8.44.5)

नरास्तं यान्ति निःसङ्गं ये तान्मे त्वं निशामय । गुरुभार्या च यो गच्छेद् गुरुस्वं वा हरेत यः

narāstaṁ yānti niḥsaṅgaṁ ye tānme tvaṁ niśāmaya | gurubhāryā ca yo gacched gurusvaṁ vā hareta yaḥ

जो पुरुष उस निर्जन नरक को जाते हैं, उनके विषय में अब तुम मुझसे सुनो। जो गुरु-पत्नी के पास जाता है, अथवा जो गुरु के धन का अपहरण करता है।

श्लोक 6 (skanda.8.44.6)

देवद्रव्यं भक्षयेद्यो नाशयेद्वाप्यभीक्ष्णशः । ब्राह्मणस्वं हरेद्यश्च बलाद्धारयतेपि वा

devadravyaṁ bhakṣayedyo nāśayedvāpyabhīkṣṇaśaḥ | brāhmaṇasvaṁ haredyaśca balāddhārayatepi vā

जो देवताओं के धन को खा जाता है या बारम्बार नष्ट करता है, तथा जो ब्राह्मण के धन का हरण करता है, या बलपूर्वक उसे रोक रखता है।

श्लोक 7 (skanda.8.44.7)

बालद्रव्यापहारी च हर्ता वा स्त्रीधनस्य च । क्लीबाँश्च त्यजते यश्च यो हन्याच्छरणागतम्

bāladravyāpahārī ca hartā vā strīdhanasya ca | klībāṁśca tyajate yaśca yo hanyāccharaṇāgatam

जो बालकों के धन का अपहरण करने वाला हो, जो स्त्रीधन का हरण करने वाला हो, जो नपुंसकों को त्याग देता है, तथा जो शरणागत को मार डालता है।

श्लोक 8 (skanda.8.44.8)

धनं चास्याभिमन्येत देवद्रव्यहरश्च यः । सर्वभक्ष यः स्याद् वै यश्च पानीयविक्रयी

dhanaṁ cāsyābhimanyeta devadravyaharaśca yaḥ | sarvabhakṣa yaḥ syād vai yaśca pānīyavikrayī

और उसके धन को हड़प लेता है, जो देवताओं के धन का हरण करने वाला हो, जो सर्वभक्षी हो, तथा जो जल बेचने वाला हो।

श्लोक 9 (skanda.8.44.9)

सोमविक्रयिकश्चैव अग्नयुत्सादक एव च । अग्निप्रहरणो यश्च विषप्रहरणश्च यः

somavikrayikaścaiva agnayutsādaka eva ca | agnipraharaṇo yaśca viṣapraharaṇaśca yaḥ

जो सोम बेचने वाला हो, जो अग्नि को बुझाने वाला हो, जो अग्नि से प्रहार करता हो, तथा जो विष से प्रहार करता हो।

श्लोक 10 (skanda.8.44.10)

अशस्त्रं यश्च संग्रामे हन्याच्छस्त्रेण मानवः । याचमानं तथा चैव उपविष्टमथापि वा

aśastraṁ yaśca saṁgrāme hanyācchastreṇa mānavaḥ | yācamānaṁ tathā caiva upaviṣṭamathāpi vā

जो मनुष्य युद्ध में निःशस्त्र व्यक्ति को शस्त्र से मार डालता है, तथा जो याचना करते हुए अथवा बैठे हुए व्यक्ति को मार डालता है।

श्लोक 11 (skanda.8.44.11)

पराङमुखं च संसक्तमन्येन सह वादिनम् । एते सर्वे नरास्तत्र गच्छन्त्यकृतबुद्धयः

parāṅamukhaṁ ca saṁsaktamanyena saha vādinam | ete sarve narāstatra gacchantyakṛtabuddhayaḥ

जो पीठ फेरे हुए, किसी अन्य के साथ बातचीत में लगे हुए व्यक्ति को मारता है - ये सब अकृतबुद्धि पुरुष वहाँ जाते हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.44.12)

य इदं शृणुयात् कृतान्तसद्म प्रयतो नित्यमनेकदुःखसद्म । स न याति तमुग्रशोकपद्मं नरकं मृत्युमिवाति कालसद्म

ya idaṁ śṛṇuyāt kṛtāntasadma prayato nityamanekaduḥkhasadma | sa na yāti tamugraśokapadmaṁ narakaṁ mṛtyumivāti kālasadma

जो पवित्र व्यक्ति काल के इस निवास, अनेक दुःखों के इस सदा-निवास को सुनता है, वह उस उग्र-शोकमय पद्म-नरक को, मृत्यु के समान अतिकाल-निवास को, कभी नहीं जाता।

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