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अम्बिका खण्ड · अध्याय 45

नरकवर्णन: महापद्मकथन

अध्याय 44अध्याय-सूचीअध्याय 46

श्लोक 1 (skanda.8.45.1)

सुशर्मोवाच । महापद्मस्ततश्चान्यो निरयो रोमहर्षणः । यत्र ते किङ्करा घोरा यमस्य यमसंनिभाः

suśarmovāca | mahāpadmastataścānyo nirayo romaharṣaṇaḥ | yatra te kiṅkarā ghorā yamasya yamasaṁnibhāḥ

सुशर्मा ने कहा - महापद्म नामक एक और नरक है, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। वहाँ यम के समान भयंकर, यम के ही किंकर रहते हैं।

श्लोक 2 (skanda.8.45.2)

जन्तूनामायुधैः कुण्ठैर्निघृणाः पापकर्मिणाम् । उत्कृत्योत्कृत्य मांसानि तेभ्यो यच्छन्ति वै पुनः

jantūnāmāyudhaiḥ kuṇṭhairnighṛṇāḥ pāpakarmiṇām | utkṛtyotkṛtya māṁsāni tebhyo yacchanti vai punaḥ

वे निर्दय किंकर, कुंठित अस्त्रों से पापकर्मी प्राणियों के मांस को बार-बार काट-काटकर, उन्हीं को पुनः खिलाते हैं।

श्लोक 3 (skanda.8.45.3)

ते भक्षयित्वा मांसानि स्वानि दुष्कृतकारिणः । पद्मपत्रनिभा जाता धाम्यन्ते ग्नौ दिवानिशम्

te bhakṣayitvā māṁsāni svāni duṣkṛtakāriṇaḥ | padmapatranibhā jātā dhāmyante gnau divāniśam

वे दुष्कर्मी अपने ही मांस को खाकर, कमल-पत्रों के समान वर्ण वाले हो जाते हैं, तथा रात-दिन अग्नि में धधकते रहते हैं।

श्लोक 4 (skanda.8.45.4)

अनलेन च घोरेण द्रवीकृतमयः पुनः । मुखेपावृत्य यच्छन्ति दारुणा यमकिङ्कराः

analena ca ghoreṇa dravīkṛtamayaḥ punaḥ | mukhepāvṛtya yacchanti dāruṇā yamakiṅkarāḥ

भयंकर अग्नि से पुनः पिघलाए गए लोहे को, भयंकर यमदूत उनके मुख में उलटकर डाल देते हैं।

श्लोक 5 (skanda.8.45.5)

अयोमयास्तथा नार्यो नराश्चाग्निसमप्रभाः । समाश्लिष्यन्ति सङ्गत्य द्रवमाणास्ततस्ततः

ayomayāstathā nāryo narāścāgnisamaprabhāḥ | samāśliṣyanti saṅgatya dravamāṇāstatastataḥ

लोहमय स्त्रियाँ तथा अग्नि के समान तेजस्वी पुरुष, इधर-उधर पिघलते हुए, आकर एक-दूसरे को आलिंगन करते हैं।

श्लोक 6 (skanda.8.45.6)

वृक्षाश्च बहवस्तत्र सुपुष्याः फलपत्रिणः । तानाश्रयन्ति दुःखार्त्ता अग्निं वर्षन्ति तेपि च

vṛkṣāśca bahavastatra supuṣyāḥ phalapatriṇaḥ | tānāśrayanti duḥkhārttā agniṁ varṣanti tepi ca

वहाँ बहुत से वृक्ष हैं, जो फूलों और फलों तथा पत्तों से भरे हुए हैं। दुःख से पीड़ित लोग उनका आश्रय लेते हैं, परन्तु वे वृक्ष भी अग्नि की वर्षा करते हैं।

श्लोक 7 (skanda.8.45.7)

शिलाश्च बह्व्यस्तत्रान्यास्ताः श्लिष्यन्ति यदा च ते । तदा ताश्चाग्निवर्णाभा दहन्ते तान्भृशं नरान्

śilāśca bahvyastatrānyāstāḥ śliṣyanti yadā ca te | tadā tāścāgnivarṇābhā dahante tānbhṛśaṁ narān

वहाँ अन्य बहुत सी शिलाएँ भी हैं; जब वे मनुष्य उनका आलिंगन करते हैं, तब वे शिलाएँ भी अग्नि के समान वर्ण वाली होकर उन्हें अत्यन्त जला देती हैं।

श्लोक 8 (skanda.8.45.8)

एवमेष महापद्मो नरकः संप्रकीर्तितः । सुवर्णहारी यश्चैव मातृयायी च यो नरः

evameṣa mahāpadmo narakaḥ saṁprakīrtitaḥ | suvarṇahārī yaścaiva mātṛyāyī ca yo naraḥ

इस प्रकार यह महापद्म नामक नरक कहा गया है। जो सुवर्ण चुराने वाला हो, तथा जो पुरुष माता-तुल्य स्त्री के पास जाने वाला हो।

श्लोक 9 (skanda.8.45.9)

माता पुत्रं च योभ्येति वेददूष्यवकीर्णिकः । मत्सरी यश्च दुर्वृत्तः श्रमणानाञ्च पूजकः

mātā putraṁ ca yobhyeti vedadūṣyavakīrṇikaḥ | matsarī yaśca durvṛttaḥ śramaṇānāñca pūjakaḥ

जो माता अपने ही पुत्र के पास जाती है, जो वेदों को दूषित करने वाला भ्रष्ट हो, जो ईर्ष्यालु तथा दुराचारी हो, तथा जो भ्रष्ट श्रमणों का पूजक हो।

श्लोक 10 (skanda.8.45.10)

वृषलो यः श्रुतिं ब्रूयाच्छृणुयादपि वा पुनः । गृहणीयाद्वापि दुर्बुद्धिर्ब्राह्मणान् वावमन्यते

vṛṣalo yaḥ śrutiṁ brūyācchṛṇuyādapi vā punaḥ | gṛhaṇīyādvāpi durbuddhirbrāhmaṇān vāvamanyate

जो शूद्र श्रुति का उच्चारण करता है या उसे सुनता है, अथवा जो दुर्बुद्धि उसे ग्रहण करता है, अथवा जो ब्राह्मणों का अनादर करता है।

श्लोक 11 (skanda.8.45.11)

ब्राह्मणेभ्यो रहस्यानि आश्रमान्तरजानि च । यस्मिन्नधिकृतो न स्याच्छृणुयाद्वा पठेत वा

brāhmaṇebhyo rahasyāni āśramāntarajāni ca | yasminnadhikṛto na syācchṛṇuyādvā paṭheta vā

ब्राह्मणों के गुप्त रहस्यों तथा अन्य आश्रमों में उत्पन्न रहस्यों को, जिसका उनमें कोई अधिकार न हो, वह जो सुनता या पढ़ता है।

श्लोक 12 (skanda.8.45.12)

दुष्टश्रमणनिर्ग्रन्था तथैवाजीवकाश्च ये । भक्तस्तेभ्यो द्विजो यश्च नरकं स प्रपद्यते

duṣṭaśramaṇanirgranthā tathaivājīvakāśca ye | bhaktastebhyo dvijo yaśca narakaṁ sa prapadyate

दुष्ट श्रमणों, नग्न साधुओं तथा आजीवकों के प्रति जो द्विज भक्ति रखता है, वह भी उस नरक को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (skanda.8.45.13)

योगं परिवदेद्यश्च पितॄनथ पितामहान् । योगेश्वराँश्च दुर्वृत्तो योगधर्ममथापि वा

yogaṁ parivadedyaśca pitṝnatha pitāmahān | yogeśvarāṁśca durvṛtto yogadharmamathāpi vā

जो योग की निन्दा करता है, तथा पितरों और पितामहों की, जो दुराचारी योगेश्वरों की निन्दा करता है, या योग-धर्म की भी।

श्लोक 14 (skanda.8.45.14)

वेदवर्णाश्रमा यज्ञास्तन्निन्दाभिरतः शठः । नास्तिको हेतुवादी च सर्वस्तं प्रतिपद्यते । तथ्यमुक्तं मया सर्वमेवमेतन्न संशयः

vedavarṇāśramā yajñāstannindābhirataḥ śaṭhaḥ | nāstiko hetuvādī ca sarvastaṁ pratipadyate | tathyamuktaṁ mayā sarvamevametanna saṁśayaḥ

वेद, वर्णाश्रम तथा यज्ञों की निन्दा में रत, दुष्ट, नास्तिक, केवल तर्क का सहारा लेने वाला - ये सब उसी नरक को प्राप्त होते हैं। मैंने यह सब सत्य कहा है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 15 (skanda.8.45.15)

एवन्ते यातितास्तत्र स्वकर्मफलबन्धनाः । ततः शेषेण संबद्धा जायन्ते कीटयोनिषु

evante yātitāstatra svakarmaphalabandhanāḥ | tataḥ śeṣeṇa saṁbaddhā jāyante kīṭayoniṣu

इस प्रकार वे अपने ही कर्मफल के बन्धन में बँधकर वहाँ यातना सहते हैं। तत्पश्चात् शेष फल से बँधे हुए वे कीट-योनियों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 16 (skanda.8.45.16)

शृणुयाद् य इमं विचिन्त्य धीमान् मतिमान्नित्यमलोभमोहशोकः । स तु दैवविधिप्रचोदितात्मा दिवमेवैति न याति तं कदाचिद्

śṛṇuyād ya imaṁ vicintya dhīmān matimānnityamalobhamohaśokaḥ | sa tu daivavidhipracoditātmā divamevaiti na yāti taṁ kadācid

जो बुद्धिमान, विचारशील, लोभ-मोह-शोक से सदा रहित व्यक्ति इसे सुनता है, वह दैवी विधान से प्रेरित आत्मा वाला होकर स्वर्ग को ही प्राप्त होता है, उस नरक को कभी नहीं जाता।

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