Skip to main content

अम्बिका खण्ड · अध्याय 46

रौरव नरक

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (skanda.8.46.1)

अतः परं प्रवक्ष्यामि रौरवं नरकं पुनः । यत्र ते विवशा बद्धाः कर्मणा स्वेन जन्तवः

ataḥ paraṁ pravakṣyāmi rauravaṁ narakaṁ punaḥ | yatra te vivaśā baddhāḥ karmaṇā svena jantavaḥ

अब मैं आगे रौरव नामक नरक का वर्णन करूँगा, जहाँ जीव अपने ही कर्मों से बंधे हुए विवश होकर रहते हैं।

श्लोक 2 (skanda.8.46.2)

यात्यन्ते दुःखशोकार्ता महानिरयगामिनः । रु इति प्रोच्यते शब्दस्तत्रासौ श्रूयते यतः

yātyante duḥkhaśokārtā mahānirayagāminaḥ | ru iti procyate śabdastatrāsau śrūyate yataḥ

उस महानरक की ओर जाने वाले शोक और दुःख से पीड़ित होते हैं; वहाँ 'रु' शब्द सुनाई देता है, इसीलिए यह रौरव कहलाता है।

श्लोक 3 (skanda.8.46.3)

पुनः पुनर्वा भीमो हि रौरवस्तेन कथ्यते

punaḥ punarvā bhīmo hi rauravastena kathyate

अथवा वह बार-बार अत्यंत भयंकर होने के कारण रौरव कहलाता है।

श्लोक 4 (skanda.8.46.4)

पूर्णस्तु सर्वः कारीष्याज् ज्ज्वलते सोतिदारुणः

pūrṇastu sarvaḥ kārīṣyāj jjvalate sotidāruṇaḥ

वह सम्पूर्ण रूप से कंडे की अग्नि से प्रज्वलित रहता है और अत्यंत भयंकर है।

श्लोक 5 (skanda.8.46.5)

मध्ये स्तम्भोस्य लौहो वै तप्तकाञ्चनसप्रभः । तत्र जंतुःर्भृशं मग्नः प्रविशन् दह्यतेवशः

madhye stambhosya lauho vai taptakāñcanasaprabhaḥ | tatra jaṁtuḥrbhṛśaṁ magnaḥ praviśan dahyatevaśaḥ

उसके मध्य में तपे हुए सोने के समान चमकता हुआ एक लौह-स्तम्भ है; उसमें प्रवेश करके जीव गहरे धँसकर विवश होकर जलता है।

श्लोक 6 (skanda.8.46.6)

आर्तनादान् प्रकुर्वाणो मूर्च्छितः पतितः पुनः । ततः क्लेशेने महता उद्धृत्यात्मानमात्मना

ārtanādān prakurvāṇo mūrcchitaḥ patitaḥ punaḥ | tataḥ kleśene mahatā uddhṛtyātmānamātmanā

पीड़ा से चीत्कार करता हुआ, मूर्च्छित होकर बार-बार गिरता है, फिर महाक्लेश से स्वयं अपने आप को उठाता है।

श्लोक 7 (skanda.8.46.7)

भूयोन्यं देशमासाद्य तथैव प्रविशेच्च सः । ततस्तस्मादुपोत्पत्य स्तम्भमाश्रयते यदि

bhūyonyaṁ deśamāsādya tathaiva praviśecca saḥ | tatastasmādupotpatya stambhamāśrayate yadi

पुनः किसी अन्य स्थान पर पहुँचकर वह वैसे ही प्रवेश करता है; फिर वहाँ से उछलकर यदि वह उस स्तम्भ का आश्रय लेता है...

श्लोक 8 (skanda.8.46.8)

तेनापि दह्यते भूयो विसृज्य प्रविशेत्पुनः

tenāpi dahyate bhūyo visṛjya praviśetpunaḥ

उससे भी वह पुनः जल जाता है; उसे छोड़कर वह फिर से दूसरे स्थान में प्रवेश करता है।

श्लोक 9 (skanda.8.46.9)

एवं स यात्यते तत्र बहूनब्दान् सुदुःखितः

evaṁ sa yātyate tatra bahūnabdān suduḥkhitaḥ

इस प्रकार वह अत्यंत दुःखी होकर वहाँ अनेक वर्षों तक भटकता रहता है।

श्लोक 10 (skanda.8.46.10)

ततो विसृष्टो भूयश्च उच्छ्रयान्प्रतिपद्यते । तं हि गच्छन्ति पुरुषाः सुरापा धर्मदेशकाः

tato visṛṣṭo bhūyaśca ucchrayānpratipadyate | taṁ hi gacchanti puruṣāḥ surāpā dharmadeśakāḥ

फिर वहाँ से मुक्त होकर वह पुनः उच्छ्रय लोक को प्राप्त होता है; वहाँ वे पुरुष जाते हैं जो मद्यपान करने वाले और धर्म के मिथ्या उपदेशक होते हैं।

श्लोक 11 (skanda.8.46.11)

पितृहा मातृहा चैव भ्रातृहा गुरुहा तथा । वादेभिरतास्तेषामेव च निन्दकाः

pitṛhā mātṛhā caiva bhrātṛhā guruhā tathā | vādebhiratāsteṣāmeva ca nindakāḥ

पिता, माता, भाई और गुरु का घातक — [स्रोत में यहाँ पाठ खण्डित है] — व्यर्थ विवादों में रत रहने वाले तथा उनकी निन्दा करने वाले भी वहीं जाते हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.46.12)

गोघ्नोथ दमकश्चैव जन्तूनां भृशदारुणः । गलकर्ता कूटमानी कर्मणानु करोति यः

goghnotha damakaścaiva jantūnāṁ bhṛśadāruṇaḥ | galakartā kūṭamānī karmaṇānu karoti yaḥ

गोहत्यारा, प्राणियों को अत्यंत क्रूरता से पीड़ित करने वाला, गला काटने वाला, झूठा तौलने वाला, और जो सदा ऐसे ही कर्म करता है...

श्लोक 13 (skanda.8.46.13)

परिवित्तिः परिवेत्ता श्मशानरतिरेव च । पुनर्भूसुतसंयोगी यस्या चोपपतिर्गृहे । एते सर्वेभिगच्छन्ति नरकं रौरवं नराः

parivittiḥ parivettā śmaśānaratireva ca | punarbhūsutasaṁyogī yasyā copapatirgṛhe | ete sarvebhigacchanti narakaṁ rauravaṁ narāḥ

परिवित्ति और परिवेत्ता, श्मशान में रमण करने वाला, पुनर्भू स्त्री से संयोग करने वाला, तथा जिसके घर में उपपति हो — ये सभी पुरुष रौरव नरक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 14 (skanda.8.46.14)

य इमं शृणुयाच्च रौरवं नरकं पापकृतां सुरौरवम् । नियतं प्रयतोतिरौरवं न स गच्छेन्मनसापि रौरवम्

ya imaṁ śṛṇuyācca rauravaṁ narakaṁ pāpakṛtāṁ surauravam | niyataṁ prayatotirauravaṁ na sa gacchenmanasāpi rauravam

जो भी शुद्ध होकर पापियों के इस अत्यंत भीषण रौरव नरक की कथा सुनता है, वह निश्चय ही मन से भी कभी उस रौरव नरक को प्राप्त नहीं होता।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47