अम्बिका खण्ड · अध्याय 47
महारौरव नरक
श्लोक 1 (skanda.8.47.1)
सुशर्मोवाच महारौरवमन्यच्च शृणु मे दुष्टयातनम् । यत्र धाराश्च तोयं च तडागानि च पुत्रक
suśarmovāca mahārauravamanyacca śṛṇu me duṣṭayātanam | yatra dhārāśca toyaṁ ca taḍāgāni ca putraka
सुशर्मा ने कहा — हे पुत्र, अब मुझसे दुष्टों को यातना देने वाले एक अन्य नरक 'महारौरव' के विषय में सुनो, जहाँ धाराएँ, जल और तालाब हैं...
श्लोक 2 (skanda.8.47.2)
कारीषी कनकाभाश्च कुल्याश्चाग्निप्रपूरिताः । आयसा बहवः स्तम्भा वृक्षाश्च बहुकण्टकाः
kārīṣī kanakābhāśca kulyāścāgniprapūritāḥ | āyasā bahavaḥ stambhā vṛkṣāśca bahukaṇṭakāḥ
...कंडे की अग्नि के समान स्वर्ण-वर्ण जलधाराएँ तथा अग्नि से भरी हुई नालियाँ, अनेक लौह-स्तम्भ और अत्यंत काँटों वाले वृक्ष हैं।
श्लोक 3 (skanda.8.47.3)
राक्षसा विविधाकारास्तीक्ष्णशस्त्रास्त्रधारिणः । तत्र पापेन बहुना जन्तुः समभिपाशितः
rākṣasā vividhākārāstīkṣṇaśastrāstradhāriṇaḥ | tatra pāpena bahunā jantuḥ samabhipāśitaḥ
अनेक रूपों वाले राक्षस तीक्ष्ण शस्त्र-अस्त्र धारण किए हुए वहाँ रहते हैं; वहाँ प्राणी अपने महापाप से बंधा हुआ रहता है।
श्लोक 4 (skanda.8.47.4)
निपतेद्विकृताकारः क्रन्दमानो मुहुर्मुहुः । स तत्र पतितः क्षिप्रं राक्षसैर्भिन्नमस्तकः
nipatedvikṛtākāraḥ krandamāno muhurmuhuḥ | sa tatra patitaḥ kṣipraṁ rākṣasairbhinnamastakaḥ
वह विकृत रूप धारण करके बार-बार क्रन्दन करता हुआ गिरता है; वहाँ गिरा हुआ वह शीघ्र ही राक्षसों द्वारा सिर फोड़ दिया जाता है।
श्लोक 5 (skanda.8.47.5)
कारीष्यामग्निवर्णायां पच्यते भृशदारुणम् । ततस्स तेन दाहेन दुःखितः परमार्तिमान्
kārīṣyāmagnivarṇāyāṁ pacyate bhṛśadāruṇam | tatassa tena dāhena duḥkhitaḥ paramārtimān
अग्नि के रंग के समान कंडे की अग्नि में वह अत्यंत भयंकर रूप से पकाया जाता है; फिर उस दाह से दुःखी होकर वह परम पीड़ा को प्राप्त होता है।
श्लोक 6 (skanda.8.47.6)
दाहप्रशमनार्थाय तडागे विनिमज्जति
dāhapraśamanārthāya taḍāge vinimajjati
जलन को शान्त करने के लिये वह तालाब में डूब जाता है।
श्लोक 7 (skanda.8.47.7)
तत्र क्षारेण तप्तेन द्विगुणं वेदनार्दितः
tatra kṣāreṇa taptena dviguṇaṁ vedanārditaḥ
वहाँ खौलते हुए क्षार जल से उसकी पीड़ा दुगुनी हो जाती है।
श्लोक 8 (skanda.8.47.8)
वेगेनोत्थाय वृक्षं वा स्तम्भं वाप्यधिरोहति
vegenotthāya vṛkṣaṁ vā stambhaṁ vāpyadhirohati
वेगपूर्वक उठकर वह किसी वृक्ष या स्तम्भ पर चढ़ जाता है।
श्लोक 9 (skanda.8.47.9)
तत्र तैः कण्टकैस्तीक्ष्णैरायसैश्चावतक्षितः
tatra taiḥ kaṇṭakaistīkṣṇairāyasaiścāvatakṣitaḥ
वहाँ वह उन तीक्ष्ण लौह-काँटों से बुरी तरह छिल जाता है।
श्लोक 10 (skanda.8.47.10)
पतते ह्यग्निकुल्यायां करुणं बहुधा नदन् । एवं स यात्यमानस्तु तृषार्त्तो विलपन् बहु
patate hyagnikulyāyāṁ karuṇaṁ bahudhā nadan | evaṁ sa yātyamānastu tṛṣārtto vilapan bahu
वह अग्नि की नाली में गिरता है, अनेक प्रकार से करुण क्रन्दन करता हुआ; इस प्रकार भटकाया जाता हुआ वह प्यास से व्याकुल होकर बहुत विलाप करता है।
श्लोक 11 (skanda.8.47.11)
धारामाश्रयते पातुं सापि तस्यायसं तदा
dhārāmāśrayate pātuṁ sāpi tasyāyasaṁ tadā
वह पीने के लिये किसी जलधारा का सहारा लेता है, परन्तु वह भी उसके लिये उस समय लौह बन जाती है।
श्लोक 12 (skanda.8.47.12)
अग्निवर्णं वहत्यम्भस्ततो मूर्च्छार्दितो म्रियेत्
agnivarṇaṁ vahatyambhastato mūrcchārdito mriyet
वह जल अग्नि के रंग जैसा बहता है; फिर मूर्च्छा से पीड़ित होकर वह मरने जैसा हो जाता है।
श्लोक 13 (skanda.8.47.13)
संपूर्णयातनश्चापि मुक्तस्तस्मान्महाभयात् उच्छ्रयेषु तदा जन्तुर्यात्यते भृशदारुणम्
saṁpūrṇayātanaścāpi muktastasmānmahābhayāt ucchrayeṣu tadā janturyātyate bhṛśadāruṇam
इस प्रकार यातना पूर्ण होने पर उस महाभय से मुक्त होकर वह जीव तब उच्छ्रय लोकों में अत्यंत भयंकर रूप से भटकाया जाता है।
श्लोक 14 (skanda.8.47.14)
तत्र गच्छति राजघ्नो राजभार्यावमानकः
tatra gacchati rājaghno rājabhāryāvamānakaḥ
वहाँ राजा का हत्यारा तथा राजपत्नी का अपमान करने वाला जाता है।
श्लोक 15 (skanda.8.47.15)
आशां दत्त्वा न दद्याद्यो यश्च तीर्थावदूषकः
āśāṁ dattvā na dadyādyo yaśca tīrthāvadūṣakaḥ
जो आशा (वचन) देकर उसे पूरा नहीं करता तथा जो तीर्थ को दूषित करता है...
श्लोक 16 (skanda.8.47.16)
मोषकः सूचकश्चैव स्त्रीभृतो यश्च पापकृत् । अग्नौ गवि च यो दानं ब्राह्मणे चापि वारयेत्
moṣakaḥ sūcakaścaiva strībhṛto yaśca pāpakṛt | agnau gavi ca yo dānaṁ brāhmaṇe cāpi vārayet
चोर, चुगलखोर, स्त्री की कमाई पर जीने वाला और पापकर्मी; तथा जो अग्निहोत्र में, गौ को अथवा ब्राह्मण को दान देने से रोकता है...
श्लोक 17 (skanda.8.47.17)
विक्रीणीयात स्वभार्यां यो ह्यपत्यं वा नराधमः
vikrīṇīyāta svabhāryāṁ yo hyapatyaṁ vā narādhamaḥ
जो नराधम अपनी पत्नी या अपनी सन्तान को बेच देता है...
श्लोक 18 (skanda.8.47.18)
हरते चाग्निभाण्डानि योगिनां चैव किञ्चन
harate cāgnibhāṇḍāni yogināṁ caiva kiñcana
जो अग्निहोत्र के पात्रों को या योगियों की किसी वस्तु को चुरा लेता है...
श्लोक 19 (skanda.8.47.19)
चोरान् वा योनुगृह्णाति मनुष्यास्तस्य ये च ह । ब्राह्मणाधिकृतश्चैव धर्माधिकृत एव च
corān vā yonugṛhṇāti manuṣyāstasya ye ca ha | brāhmaṇādhikṛtaścaiva dharmādhikṛta eva ca
जो चोरों को आश्रय देता है और उसके साथी मनुष्य भी; तथा ब्राह्मणों पर अधिकारी नियुक्त तथा धर्म पर अधिकारी नियुक्त होकर कर्तव्य से च्युत होने वाला...
श्लोक 20 (skanda.8.47.20)
कपिला यस्य गौः स्याच्च अनग्नेर्ब्राह्मणस्य ह
kapilā yasya gauḥ syācca anagnerbrāhmaṇasya ha
तथा जिस अग्निहीन ब्राह्मण की कपिला गौ हो, उसकी हानि करने वाला...
श्लोक 21 (skanda.8.47.21)
मिथ्याग्निहोत्री यश्चैव नैत्यके परिवेषकः
mithyāgnihotrī yaścaiva naityake pariveṣakaḥ
जो मिथ्या रूप से अग्निहोत्र करता है तथा नित्यकर्म में छल से भोजन परोसने वाला...
श्लोक 22 (skanda.8.47.22)
राजपुत्रवधं चैव दुभिक्षं यच्च चिन्तयेत्
rājaputravadhaṁ caiva dubhikṣaṁ yacca cintayet
तथा जो राजपुत्र के वध की या दुर्भिक्ष उत्पन्न करने की योजना बनाता है...
श्लोक 23 (skanda.8.47.23)
राष्ट्रलोपं दारलोपं धनलोपं च यो नरः
rāṣṭralopaṁ dāralopaṁ dhanalopaṁ ca yo naraḥ
जो मनुष्य राष्ट्र का, स्त्री का अथवा धन का नाश करता है...
श्लोक 24 (skanda.8.47.24)
देशविद्रावणं चैव यः कुर्य्याड्डामराणि वा
deśavidrāvaṇaṁ caiva yaḥ kuryyāḍḍāmarāṇi vā
तथा जो देश में विद्रोह उत्पन्न करता है अथवा उपद्रव मचाता है...
श्लोक 25 (skanda.8.47.25)
सर्वे ते नरकं यान्ति महारौरवसंज्ञकम्
sarve te narakaṁ yānti mahārauravasaṁjñakam
ये सभी महारौरव नामक नरक को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 26 (skanda.8.47.26)
य इमं शृणुयादभीक्ष्णशो नियतं धर्ममतिश्च तिष्ठति । न स गच्छति तं भयावहं नरकं रौरवमुग्ररौरवम्
ya imaṁ śṛṇuyādabhīkṣṇaśo niyataṁ dharmamatiśca tiṣṭhati | na sa gacchati taṁ bhayāvahaṁ narakaṁ rauravamugrarauravam
जो इसे बार-बार सुनता है और धर्म में स्थिर बुद्धि वाला बना रहता है, वह उस भयंकर, अत्यंत उग्र रौरव नरक (महारौरव) को प्राप्त नहीं होता।