अम्बिका खण्ड · अध्याय 48
तम नरक
श्लोक 1 (skanda.8.48.1)
सुशर्मोवाच तमो नामापरो घोरो नरकोति भयंकरः । तत्र सोभिपतन्नैव राक्षसैरभिहन्यते
suśarmovāca tamo nāmāparo ghoro narakoti bhayaṁkaraḥ | tatra sobhipatannaiva rākṣasairabhihanyate
सुशर्मा ने कहा — तम नामक एक और अत्यंत भयंकर घोर नरक है; वहाँ गिरते ही जीव राक्षसों द्वारा मारा जाता है।
श्लोक 2 (skanda.8.48.2)
असिमुद्गरशंक्वग्रै र्गदामुशलपट्टिशैः
asimudgaraśaṁkvagrai rgadāmuśalapaṭṭiśaiḥ
तलवारों, गदाओं, नुकीले शंकुओं, मुशलों और पट्टिशों से...
श्लोक 3 (skanda.8.48.3)
भयदैः परिघैष्टङ्कैर्वज्रैर्ऋष्टिपरश्वधैः
bhayadaiḥ parighaiṣṭaṅkairvajrairṛṣṭiparaśvadhaiḥ
भयंकर परिघों, टाँकियों, वज्रों, भालों और फरसों से...
श्लोक 4 (skanda.8.48.4)
अन्यैश्च विविधाकारैर्हतः क्रुद्धैः सुनिर्दयैः
anyaiśca vividhākārairhataḥ kruddhaiḥ sunirdayaiḥ
तथा अन्य अनेक प्रकार के शस्त्रों से क्रोधित और अत्यंत निर्दय राक्षसों द्वारा वह आहत किया जाता है।
श्लोक 5 (skanda.8.48.5)
मूर्छितस्तमसा ग्रस्तो नरकं तं प्रपद्यते
mūrchitastamasā grasto narakaṁ taṁ prapadyate
मूर्च्छित होकर अंधकार से ग्रस्त हुआ वह उस नरक में प्रवेश करता है।
श्लोक 6 (skanda.8.48.6)
स देहेन विनष्टेन तमसा मूच्छिताकृतिः । दुःखसन्ततिसंनद्धो यातनामश्नुते भृशम्
sa dehena vinaṣṭena tamasā mūcchitākṛtiḥ | duḥkhasantatisaṁnaddho yātanāmaśnute bhṛśam
शरीर के नष्ट हो जाने पर, अंधकार से मूर्च्छित रूप वाला वह, दुःखों की अविरल श्रृंखला में बँधा हुआ अत्यंत यातना भोगता है।
श्लोक 7 (skanda.8.48.7)
यस्मात् स तमसा ग्रस्त अनाश्वस्तोतिदारुणाम्
yasmāt sa tamasā grasta anāśvastotidāruṇām
क्योंकि वह अंधकार से ग्रस्त होकर श्वास तक नहीं ले पाता, अत्यंत भयंकर यातना भोगता है...
श्लोक 8 (skanda.8.48.8)
यातनामश्नुते जन्तुस्तमस्तस्मात् स उच्यते
yātanāmaśnute jantustamastasmāt sa ucyate
...यातना का वह जीव अनुभव करता है, इसीलिये इसे 'तम' कहा जाता है।
श्लोक 9 (skanda.8.48.9)
सर्वा बहुविधाकारा यातना याः प्रकीर्तिताः । तास्तत्र समवाप्नोति स्वेन पापेन दुर्मतिः
sarvā bahuvidhākārā yātanā yāḥ prakīrtitāḥ | tāstatra samavāpnoti svena pāpena durmatiḥ
जितनी भी अनेक प्रकार की यातनाएँ बताई गई हैं, उन सबको वह दुर्बुद्धि अपने ही पाप से वहाँ प्राप्त करता है।
श्लोक 10 (skanda.8.48.10)
समाप्तयातनश्चापि सन्तीर्ण्णस्वेन कर्मणा । उच्छ्रयेषु पुनर्जन्तुर्यात्यते कर्मबन्धनः
samāptayātanaścāpi santīrṇṇasvena karmaṇā | ucchrayeṣu punarjanturyātyate karmabandhanaḥ
यातना समाप्त होने पर तथा अपने कर्म से उसे पार करके, कर्मों से बँधा हुआ वह जीव पुनः उच्छ्रय लोकों में भटकाया जाता है।
श्लोक 11 (skanda.8.48.11)
ब्रह्महा भ्रूणहा चैव सुरापो ब्राह्मणश्च यः । गवां निपाने यश्चैव पिपासूनां नराधमः
brahmahā bhrūṇahā caiva surāpo brāhmaṇaśca yaḥ | gavāṁ nipāne yaścaiva pipāsūnāṁ narādhamaḥ
ब्रह्महत्यारा, भ्रूणहत्यारा तथा मद्यपान करने वाला ब्राह्मण; और वह नराधम जो प्यासी गौओं के जलाशय पर बाधा डालता है...
श्लोक 12 (skanda.8.48.12)
विघ्नं करोति मोहान्ध आहूय भर्त्सयेत्तु यः
vighnaṁ karoti mohāndha āhūya bhartsayettu yaḥ
...मोह से अंधा होकर बाधा उत्पन्न करता है; तथा जो किसी को बुलाकर उसका तिरस्कार करता है...
श्लोक 13 (skanda.8.48.13)
ब्राह्मणान् द्वेष्टि नित्यं य अर्थिनं यश्च दूषयेत्
brāhmaṇān dveṣṭi nityaṁ ya arthinaṁ yaśca dūṣayet
जो सदा ब्राह्मणों से द्वेष करता है तथा जो किसी याचक को हानि पहुँचाता है...
श्लोक 14 (skanda.8.48.14)
शास्त्राणि हरते यश्च गोघ्नो यश्च नरः स्मृतः
śāstrāṇi harate yaśca goghno yaśca naraḥ smṛtaḥ
जो शास्त्रों को चुरा लेता है तथा जो गोहत्यारा कहा जाता है...
श्लोक 15 (skanda.8.48.15)
कापिलश्च वृथादृष्टिर्वेदधर्मार्थदूषकः
kāpilaśca vṛthādṛṣṭirvedadharmārthadūṣakaḥ
कपिल-मतानुयायी, मिथ्यादृष्टि वाला, वेद-धर्म के अर्थ को दूषित करने वाला...
श्लोक 16 (skanda.8.48.16)
ब्राह्मणाक्रोशकश्चैव वेदधर्मार्थदूषकः । नास्तिकाश्च दुरात्मान इत्येते तं प्रयान्ति वै
brāhmaṇākrośakaścaiva vedadharmārthadūṣakaḥ | nāstikāśca durātmāna ityete taṁ prayānti vai
जो ब्राह्मणों को गाली देता है तथा वेद-धर्म के अर्थ को दूषित करता है; और नास्तिक दुरात्मा जन — ये सभी उस नरक को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 17 (skanda.8.48.17)
य इमं शृणुयात्तमोमयं तमसा नित्यमतन्द्रितेन्द्रिय
ya imaṁ śṛṇuyāttamomayaṁ tamasā nityamatandritendriya
जो कोई सदा जागरूक इन्द्रियों वाला होकर इस तमोमय नरक के विषय में सुनता है...
श्लोक 18 (skanda.8.48.18)
न स याति तमोमयं सदा नरकं दारुणजन्तुशोकदम्
na sa yāti tamomayaṁ sadā narakaṁ dāruṇajantuśokadam
वह उस भयंकर तथा प्राणियों को शोक देने वाले तमोमय नरक को कभी प्राप्त नहीं होता।