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अम्बिका खण्ड · अध्याय 49

तमोऽतितम नरक तथा कृतघ्न का प्रसंग

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (skanda.8.49.1)

सुशर्मोवाच तमस्तमतरं घोरं नरकं शृण्वतः परम्

suśarmovāca tamastamataraṁ ghoraṁ narakaṁ śṛṇvataḥ param

सुशर्मा ने कहा — अब सुनने वालों के लिए परम भयंकर, अंधकार से भी अधिक अंधकारमय एक घोर नरक के विषय में बताता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.8.49.2)

प्रकाशो यत्र नैवास्ति नैव दृष्टिः प्रवर्तते

prakāśo yatra naivāsti naiva dṛṣṭiḥ pravartate

जहाँ न तो प्रकाश है और न ही दृष्टि कार्य करती है।

श्लोक 3 (skanda.8.49.3)

पतन्नेव नरस्तत्र विसंज्ञः क्रियते तदा

patanneva narastatra visaṁjñaḥ kriyate tadā

वहाँ गिरते ही मनुष्य उसी क्षण बेसुध हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.8.49.4)

राक्षसैर्विकृताकारैस्तमस्तेन स चोच्यते

rākṣasairvikṛtākāraistamastena sa cocyate

विकृत रूप वाले राक्षसों द्वारा वहाँ पीड़ित किया जाता है; उस अंधकार के कारण ही इसे 'तम' कहा जाता है।

श्लोक 5 (skanda.8.49.5)

तत्रासौ पतितो मूढो वह्निना दह्यते भृशम् । ततोपि वेगादुत्थाय दृष्टिहीनो विचेतनः

tatrāsau patito mūḍho vahninā dahyate bhṛśam | tatopi vegādutthāya dṛṣṭihīno vicetanaḥ

वहाँ गिरा हुआ वह मूढ़ अग्नि से अत्यंत जलता है; फिर वेगपूर्वक उठकर भी दृष्टिहीन और अचेत होकर...

श्लोक 6 (skanda.8.49.6)

छिद्यते भिद्यते चैव राक्षसैः क्रूरकर्मभिः । तस्मादपि तथैवार्त्तः सोन्यं देशं प्रपद्यते

chidyate bhidyate caiva rākṣasaiḥ krūrakarmabhiḥ | tasmādapi tathaivārttaḥ sonyaṁ deśaṁ prapadyate

वह क्रूरकर्मा राक्षसों द्वारा काटा और बींधा जाता है; वहाँ से भी उसी प्रकार पीड़ित होकर वह किसी अन्य स्थान पर जाता है।

श्लोक 7 (skanda.8.49.7)

तत्रापि निगृहीतस्तैः पशुमारेण मार्यते

tatrāpi nigṛhītastaiḥ paśumāreṇa māryate

वहाँ भी उनके द्वारा पकड़ा जाकर वह पशु की भाँति मार डाला जाता है।

श्लोक 8 (skanda.8.49.8)

ततो भूयश्च कूपेषु क्षिप्तो दुर्गेष्वचेतनः

tato bhūyaśca kūpeṣu kṣipto durgeṣvacetanaḥ

फिर पुनः अचेत अवस्था में वह गड्ढों में तथा दुर्गम स्थानों में फेंक दिया जाता है।

श्लोक 9 (skanda.8.49.9)

निमग्नश्चाग्निकारीष्यां निष्कूजन् सोभिजायते

nimagnaścāgnikārīṣyāṁ niṣkūjan sobhijāyate

और कंडे की अग्नि में डूबा हुआ, चीत्कार करता हुआ वह वहीं उत्पन्न होता है।

श्लोक 10 (skanda.8.49.10)

एवं स यातना बह्वीस्त्वनुभूय सुदुःखितः

evaṁ sa yātanā bahvīstvanubhūya suduḥkhitaḥ

इस प्रकार अनेक यातनाएँ भोगकर वह अत्यंत दुःखी होकर...

श्लोक 11 (skanda.8.49.11)

नरकान्तमनुप्राप्य उच्छ्रयेष्वभिपात्यते

narakāntamanuprāpya ucchrayeṣvabhipātyate

...नरक का अंत प्राप्त करके वह उच्छ्रय लोकों में डाल दिया जाता है।

श्लोक 12 (skanda.8.49.12)

गर्भपातनकारश्च राज्यकामश्च यो भवेत्

garbhapātanakāraśca rājyakāmaśca yo bhavet

गर्भपात करने वाला तथा जो राज्य की कामना करता है...

श्लोक 13 (skanda.8.49.13)

इहैवानर्हमानोसौभृत्यो राजवधे रतः

ihaivānarhamānosaubhṛtyo rājavadhe rataḥ

यहीं अनुचित सम्मान पाने वाला वह सेवक जो राजा के वध में लगा रहता है...

श्लोक 14 (skanda.8.49.14)

अनाचार्यश्च यः कर्म आचार्याणां प्रपद्यते

anācāryaśca yaḥ karma ācāryāṇāṁ prapadyate

तथा जो आचार्य न होते हुए भी आचार्यों का कार्य करने लगता है...

श्लोक 15 (skanda.8.49.15)

शास्त्रविद्यौषधीनां च गदानामगदैः सह । यो विनाशयिता कश्चिद्यः प्रशंसति दानवान्

śāstravidyauṣadhīnāṁ ca gadānāmagadaiḥ saha | yo vināśayitā kaścidyaḥ praśaṁsati dānavān

जो शास्त्रों, विद्या, औषधियों तथा रोगों के साथ उनकी प्रति-औषधियों का नाश करने वाला हो, और जो दानवों की प्रशंसा करता है...

श्लोक 16 (skanda.8.49.16)

उपदेशं च यो द्वेषादाचार्यो न प्रयच्छति । स याति नरकं घोरं दुस्तरं तं तमोमयम्

upadeśaṁ ca yo dveṣādācāryo na prayacchati | sa yāti narakaṁ ghoraṁ dustaraṁ taṁ tamomayam

और जो आचार्य द्वेषवश उपदेश नहीं देता, वह उस घोर, दुस्तर, तमोमय नरक को प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (skanda.8.49.17)

कृतघ्नं तु समादाय नारकाः सर्व एव ते । यमं प्रणम्य ब्रुवते सह तैर्यमकिङ्करैः

kṛtaghnaṁ tu samādāya nārakāḥ sarva eva te | yamaṁ praṇamya bruvate saha tairyamakiṅkaraiḥ

किन्तु कृतघ्न को पकड़कर वे सभी नरक-रक्षक, यम को प्रणाम करके, यम के किङ्करों के साथ इस प्रकार कहते हैं...

श्लोक 18 (skanda.8.49.18)

भगवन्न वयं शक्ताः पापस्यास्य विनाशने

bhagavanna vayaṁ śaktāḥ pāpasyāsya vināśane

'हे भगवन्! हम इस पाप का विनाश करने में समर्थ नहीं हैं।'

श्लोक 19 (skanda.8.49.19)

उपायमन्यं पश्येह प्रसादं कुरु नः प्रभो

upāyamanyaṁ paśyeha prasādaṁ kuru naḥ prabho

'हे प्रभो! यहाँ कोई अन्य उपाय देखिये, हम पर कृपा कीजिये।'

श्लोक 20 (skanda.8.49.20)

स एवमुक्तो भगवान् यमः प्रेताधिपस्तदा

sa evamukto bhagavān yamaḥ pretādhipastadā

इस प्रकार कहे जाने पर भगवान् यम, प्रेतों के अधिपति, तब...

श्लोक 21 (skanda.8.49.21)

सर्वधर्मार्थकुशलान् पृच्छति स्मर्षिसत्तमान्

sarvadharmārthakuśalān pṛcchati smarṣisattamān

...धर्म के सभी विषयों में कुशल श्रेष्ठ ऋषियों से पूछने लगे।

श्लोक 22 (skanda.8.49.22)

भगवन्तः कथं त्वस्य कृतघ्नस्य दुरात्मनः । निष्कृतिः सुमहाघोराद् भवेत् पापस्य कर्मणः

bhagavantaḥ kathaṁ tvasya kṛtaghnasya durātmanaḥ | niṣkṛtiḥ sumahāghorād bhavet pāpasya karmaṇaḥ

'हे भगवन्तो! इस दुरात्मा कृतघ्न के इस अत्यंत घोर पापकर्म का प्रायश्चित्त किस प्रकार हो सकता है?'

श्लोक 23 (skanda.8.49.23)

ततस्ते ऋषयस्सर्वे दृष्ट्वा दीर्घेण चक्षुषा । यमं धर्मभृतां श्रेष्ठमिदं वै ब्रुवते वचः

tataste ṛṣayassarve dṛṣṭvā dīrgheṇa cakṣuṣā | yamaṁ dharmabhṛtāṁ śreṣṭhamidaṁ vai bruvate vacaḥ

तब वे सभी ऋषि दूरदृष्टि से विचार करके धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ यम से यह वचन बोले...

श्लोक 24 (skanda.8.49.24)

ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चोरे भग्नव्रते तथा । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः

brahmaghne ca surāpe ca core bhagnavrate tathā | niṣkṛtirvihitā sadbhiḥ kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ

'ब्रह्महत्यारे, मद्यपायी, चोर तथा व्रतभंग करने वाले के लिये सज्जनों ने प्रायश्चित्त बताया है; परन्तु कृतघ्न के लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है।'

श्लोक 25 (skanda.8.49.25)

ततः स भगवान्देवो मार्तण्डतनयो वरः । नारकेभ्यो ददात्याज्ञां सर्वे यूयमिमं नरम्

tataḥ sa bhagavāndevo mārtaṇḍatanayo varaḥ | nārakebhyo dadātyājñāṁ sarve yūyamimaṁ naram

तब वे भगवान् मार्तण्ड-नन्दन (यम) नरक-रक्षकों को आज्ञा देते हैं — 'तुम सब इस मनुष्य को...'

श्लोक 26 (skanda.8.49.26)

शोधयिष्यथ गच्छध्वं नैका ह्यस्य गतिः स्मृता

śodhayiṣyatha gacchadhvaṁ naikā hyasya gatiḥ smṛtā

'...शुद्ध करो; जाओ, क्योंकि इसकी कोई एक निश्चित गति नहीं बताई गई है।'

श्लोक 27 (skanda.8.49.27)

ततस्ते तस्य वचनान्नारकाः पापकर्मिणम्

tataste tasya vacanānnārakāḥ pāpakarmiṇam

तब उनके वचन से नरक-रक्षकों ने उस पापी को ग्रहण किया...

श्लोक 28 (skanda.8.49.28)

सर्वेष्वेवानुपूर्व्येण यातयन्त्यतिदारुणाः

sarveṣvevānupūrvyeṇa yātayantyatidāruṇāḥ

...और वे अत्यंत क्रूर रक्षक उसे क्रमशः सभी नरकों में यातना देते हैं।

श्लोक 29 (skanda.8.49.29)

भर्तृपिण्डापहर्ता च पितृपिण्डापहारकः

bhartṛpiṇḍāpahartā ca pitṛpiṇḍāpahārakaḥ

जो अपने स्वामी के अन्न (पिण्ड) का अपहरण करता है तथा जो पितरों के पिण्ड का अपहरण करता है...

श्लोक 30 (skanda.8.49.30)

तस्माद् गृहीत्वा विद्याञ्च दक्षिणां यो न यच्छति

tasmād gṛhītvā vidyāñca dakṣiṇāṁ yo na yacchati

तथा जो किसी से विद्या ग्रहण करके उसे गुरु-दक्षिणा नहीं देता...

श्लोक 31 (skanda.8.49.31)

पुष्टश्च यस्तं नान्वेति यश्च तं घातयेन्नरः । कृतस्य दोषं वदति सकामं न करोति च

puṣṭaśca yastaṁ nānveti yaśca taṁ ghātayennaraḥ | kṛtasya doṣaṁ vadati sakāmaṁ na karoti ca

जो पालित होकर भी अपने आश्रयदाता के प्रति निष्ठा नहीं रखता, जो उसका वध कर देता है, जो किये गये उपकार में दोष निकालता है और जानबूझकर उसका प्रत्युपकार नहीं करता...

श्लोक 32 (skanda.8.49.32)

न स्मरेच्च कृतं यस्तु आश्रमान् यश्च दूषयेत् । न पुष्णाति तथा वाहानाश्रिताँश्चोपकारिणः

na smarecca kṛtaṁ yastu āśramān yaśca dūṣayet | na puṣṇāti tathā vāhānāśritā~ścopakāriṇaḥ

जो किये गये उपकार को याद नहीं रखता, जो आश्रमों को दूषित करता है, तथा जो अपने वाहनों, आश्रितों और उपकारियों का पालन नहीं करता...

श्लोक 33 (skanda.8.49.33)

भृत्यांश्च कर्मनिरताँस्तथैव हितकारिणः । भार्यां कर्मकराणां च नर्माणि वदते च यः

bhṛtyāṁśca karmaniratā~stathaiva hitakāriṇaḥ | bhāryāṁ karmakarāṇāṁ ca narmāṇi vadate ca yaḥ

...तथा कर्मनिरत सेवकों और हितकारी जनों का भी पालन नहीं करता; और जो अपने सेवकों की पत्नी के प्रति उपहासपूर्ण वचन बोलता है...

श्लोक 34 (skanda.8.49.34)

न दत्तं न हुतं किञ्चिदमुष्मिन्निति यो वदेत् । सर्वाँस्तानृषिभिः सार्धं कृतघ्नानब्रवीन्मनुः

na dattaṁ na hutaṁ kiñcidamuṣminniti yo vadet | sarvā~stānṛṣibhiḥ sārdhaṁ kṛtaghnānabravīnmanuḥ

और जो यह कहता है कि 'उस लोक में न तो कुछ दिया गया है और न ही कुछ हवन किया गया है' — इन सभी को मनु ने ऋषियों के साथ मिलकर कृतघ्न कहा है।

श्लोक 35 (skanda.8.49.35)

कृतघ्नश्च शठश्चैव नास्तिकोछिन्नसंशयः । एतान् सर्वेभिगच्छन्ति य एते कीर्तिता मया

kṛtaghnaśca śaṭhaścaiva nāstikochinnasaṁśayaḥ | etān sarvebhigacchanti ya ete kīrtitā mayā

कृतघ्न, धूर्त तथा जिसका संशय समाप्त हो चुका है ऐसा दृढ़ नास्तिक — जिन्हें मैंने बताया, ये सब उसी नरक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 36 (skanda.8.49.36)

जनेता चोपनेता च यश्च विद्यां प्रयच्छति । भयत्रातान्नदाता च पंचैते पितरः स्मृताः

janetā copanetā ca yaśca vidyāṁ prayacchati | bhayatrātānnadātā ca paṁcaite pitaraḥ smṛtāḥ

जन्म देने वाला, उपनयन कराने वाला, विद्या देने वाला, भय से रक्षा करने वाला तथा अन्न देने वाला — ये पाँच 'पिता' कहलाते हैं।

श्लोक 37 (skanda.8.49.37)

यस्तेषान्दोषवक्ता च अभ्यसूयक एव च । तथा द्रोहप्रवृत्तश्च सन्त्यजेत्तान्नराधमान्

yasteṣāndoṣavaktā ca abhyasūyaka eva ca | tathā drohapravṛttaśca santyajettānnarādhamān

जो इनके प्रति दोष बोलता है, जो ईर्ष्या करता है, तथा जो इनके प्रति द्रोह करने में तत्पर रहता है — ऐसे नराधमों का त्याग कर देना चाहिये।

श्लोक 38 (skanda.8.49.38)

मित्रध्रुग् यश्च दुष्टात्मा तस्य रन्ध्रावकीर्तनः । कृतोपकारिणे पूर्वँ न करोति प्रियं च यः

mitradhrug yaśca duṣṭātmā tasya randhrāvakīrtanaḥ | kṛtopakāriṇe pūrva~ na karoti priyaṁ ca yaḥ

जो मित्र के साथ द्रोह करता है, जो दुष्टात्मा दूसरे के छिद्रों को प्रकट करता है, तथा जो पूर्व में उपकार करने वाले के प्रति प्रिय आचरण नहीं करता...

श्लोक 39 (skanda.8.49.39)

एते सर्वे नरा दुष्टाः सर्व एवाशुभे रताः । नरकान् संप्रपद्यन्ते बद्धाः पापेन कर्मणा

ete sarve narā duṣṭāḥ sarva evāśubhe ratāḥ | narakān saṁprapadyante baddhāḥ pāpena karmaṇā

ये सभी दुष्ट मनुष्य सदा अशुभ में रत रहने वाले हैं; अपने पापकर्मों से बँधे हुए ये नरकों को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 40 (skanda.8.49.40)

एते सर्वे मया प्रोक्ता महानिरयगामिनः । उच्छ्रयानेव गच्छन्ति येन्ये पापकृतो जनाः

ete sarve mayā proktā mahānirayagāminaḥ | ucchrayāneva gacchanti yenye pāpakṛto janāḥ

इन सबके विषय में मैंने बताया कि वे महानरक को प्राप्त होते हैं; तथा अन्य पापकर्मी जन केवल उच्छ्रय लोकों को ही प्राप्त होते हैं।

श्लोक 41 (skanda.8.49.41)

य इमं तामसं घोरं शृणुयाद्वा पठेत वा । अधर्मश्च निवर्तेत स गच्छेद् ब्रह्मणः पदम्

ya imaṁ tāmasaṁ ghoraṁ śṛṇuyādvā paṭheta vā | adharmaśca nivarteta sa gacched brahmaṇaḥ padam

जो कोई इस भयंकर तामस नरक का श्रवण अथवा पाठ करता है, उसका अधर्म दूर हो जाता है और वह ब्रह्मा के पद को प्राप्त होता है।

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50