अम्बिका खण्ड · अध्याय 50
संसार-परिवर्तन का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.8.50.1)
अतः परं प्रवक्ष्यामि संसारपरिवर्तनम् । यथा वै नरकात्तीर्णाः संसरन्ति समासतः
ataḥ paraṁ pravakṣyāmi saṁsāraparivartanam | yathā vai narakāttīrṇāḥ saṁsaranti samāsataḥ
अब मैं आगे संसार-परिवर्तन (जन्म-चक्र) का वर्णन करूँगा — कि किस प्रकार नरक से मुक्त हुए जीव संक्षेप में संसार में भ्रमण करते हैं।
श्लोक 2 (skanda.8.50.2)
प्रथमे नरके प्रोक्ता ये मया पापकर्मिणः । शेषेण कर्मणा ते तु जायन्ते कृमियोनिषु
prathame narake proktā ye mayā pāpakarmiṇaḥ | śeṣeṇa karmaṇā te tu jāyante kṛmiyoniṣu
जिन पापियों के विषय में मैंने पहले नरक में बताया, वे अपने शेष कर्म के कारण कृमि-योनियों में जन्म लेते हैं।
श्लोक 3 (skanda.8.50.3)
कृमियोनौ परावृत्ताः सहस्राणां शतं समाः
kṛmiyonau parāvṛttāḥ sahasrāṇāṁ śataṁ samāḥ
वे कृमि-योनि में एक लाख वर्षों तक परिभ्रमण करते हैं।
श्लोक 4 (skanda.8.50.4)
ततः पुनर्मर्कटास्ते जायन्तेथ तरक्षवः
tataḥ punarmarkaṭāste jāyantetha tarakṣavaḥ
फिर वे बंदर और उसके बाद लकड़बग्घे के रूप में जन्म लेते हैं।
श्लोक 5 (skanda.8.50.5)
तत्र तावत् परावृत्ता जायन्ते गोषु ते यदा
tatra tāvat parāvṛttā jāyante goṣu te yadā
वहाँ उतने ही समय तक भ्रमण करके फिर वे गौओं में जन्म लेते हैं।
श्लोक 6 (skanda.8.50.6)
तदा तत्र शतेनैव जन्मनां शेषतस्ततः
tadā tatra śatenaiva janmanāṁ śeṣatastataḥ
फिर वहाँ शेष कर्म के कारण सौ जन्मों तक...
श्लोक 7 (skanda.8.50.7)
मानुषेषूपजायन्ते तावदेव न संशयः
mānuṣeṣūpajāyante tāvadeva na saṁśayaḥ
...उतने ही समय तक वे मनुष्यों में जन्म लेते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 8 (skanda.8.50.8)
तत्र ते कुर्वते भूयो यदि किंचिन्न किल्बिषम्
tatra te kurvate bhūyo yadi kiṁcinna kilbiṣam
यदि वहाँ वे पुनः कोई पाप नहीं करते...
श्लोक 9 (skanda.8.50.9)
ततो विशुद्धां जातिं ते लभन्ते पुनरेव तु
tato viśuddhāṁ jātiṁ te labhante punareva tu
तो वे पुनः एक विशुद्ध जन्म प्राप्त करते हैं।
श्लोक 10 (skanda.8.50.10)
न च भूयोपि ते घोरं संसारं प्राप्नुवन्ति वै
na ca bhūyopi te ghoraṁ saṁsāraṁ prāpnuvanti vai
और वे पुनः इस भयंकर संसार-चक्र को प्राप्त नहीं होते।
श्लोक 11 (skanda.8.50.11)
द्वितीये ये मया प्रोक्तास्ते मुक्ताः शेषकर्मणा । कृमिकीटेषु जायन्ते सहस्राणां शतानि षट्
dvitīye ye mayā proktāste muktāḥ śeṣakarmaṇā | kṛmikīṭeṣu jāyante sahasrāṇāṁ śatāni ṣaṭ
जिनके विषय में मैंने दूसरे नरक में बताया, वे शेष कर्म से मुक्त होकर छह लाख वर्षों तक कृमि-कीटों में जन्म लेते हैं।
श्लोक 12 (skanda.8.50.12)
तथा शतसहस्रं च शतानां ते पुनर्गताः । मत्स्ययोनौ प्रसूयन्ते तावदेव न संशयः
tathā śatasahasraṁ ca śatānāṁ te punargatāḥ | matsyayonau prasūyante tāvadeva na saṁśayaḥ
तथा फिर उतने ही समय तक वे मत्स्य-योनि में जन्म लेते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 13 (skanda.8.50.13)
ततो व्याघ्राश्च ऋक्षाश्च ततो गोत्वमवाप्यते । मानुषेषूपपद्यन्ते कुत्सिताः स्वेन कर्मणा
tato vyāghrāśca ṛkṣāśca tato gotvamavāpyate | mānuṣeṣūpapadyante kutsitāḥ svena karmaṇā
फिर वे बाघ और भालू बनते हैं, फिर गौ-योनि प्राप्त करते हैं; और अंत में अपने ही कर्म के कारण मनुष्यों में निकृष्ट रूप में जन्म लेते हैं।
श्लोक 14 (skanda.8.50.14)
तृतीये त्वथ ये प्रोक्ता मया दुष्कृतकारिणः । ते मुक्ताः कर्मणस्तस्माच्छेषेण समवेष्टिताः
tṛtīye tvatha ye proktā mayā duṣkṛtakāriṇaḥ | te muktāḥ karmaṇastasmāccheṣeṇa samaveṣṭitāḥ
और जिन दुष्कर्मियों के विषय में मैंने तीसरे नरक में बताया, वे उस कर्म से मुक्त होकर भी शेष कर्म से आवृत्त रहते हैं...
श्लोक 15 (skanda.8.50.15)
कृमिकीटेषु जायन्ते सहस्राणां शतानि षट् । तथैव दश चान्यानि पक्षिणस्तावदेव च
kṛmikīṭeṣu jāyante sahasrāṇāṁ śatāni ṣaṭ | tathaiva daśa cānyāni pakṣiṇastāvadeva ca
...वे छह लाख वर्षों तक कृमि-कीटों में तथा फिर दस लाख वर्षों तक उतने ही समय पक्षियों में जन्म लेते हैं।
श्लोक 16 (skanda.8.50.16)
ततः सिंहाश्च सर्पाश्च गावः पश्चाच्च मानुषाः । चतुर्थे त्वथ ये प्रोक्ता मया दुष्कृतकारिणः
tataḥ siṁhāśca sarpāśca gāvaḥ paścācca mānuṣāḥ | caturthe tvatha ye proktā mayā duṣkṛtakāriṇaḥ
फिर वे सिंह और सर्प, तत्पश्चात् गौ, और फिर मनुष्य बनते हैं। अब चौथे नरक में जिन दुष्कर्मियों के विषय में मैंने बताया...
श्लोक 17 (skanda.8.50.17)
ते सर्वे शेषवन्तस्तु जायन्ते कृमियोनिषु । सहस्राणां शतान्यष्टौ तथा चान्यानि षोडश
te sarve śeṣavantastu jāyante kṛmiyoniṣu | sahasrāṇāṁ śatānyaṣṭau tathā cānyāni ṣoḍaśa
वे सभी शेष कर्म सहित कृमि-योनियों में आठ लाख तथा फिर सोलह लाख वर्षों तक जन्म लेते हैं...
श्लोक 18 (skanda.8.50.18)
योनीनां हि तथा भूयो जायन्ते ते ततो मृगाः । मृगभावाद्विनिर्मुक्ता जायन्ते च पुनः खराः
yonīnāṁ hi tathā bhūyo jāyante te tato mṛgāḥ | mṛgabhāvādvinirmuktā jāyante ca punaḥ kharāḥ
...तथा अन्य योनियों में भी। फिर वे मृग बनते हैं; मृग-भाव से मुक्त होकर वे पुनः गधे बनते हैं।
श्लोक 19 (skanda.8.50.19)
ततोजा गवयाश्चापि गावो मानुषतां ततः । पंचमे ये मया प्रोक्तास्तेपि शेषेण कर्मणा
tatojā gavayāścāpi gāvo mānuṣatāṁ tataḥ | paṁcame ye mayā proktāstepi śeṣeṇa karmaṇā
फिर वे बकरी और गवय (नीलगाय) बनते हैं, फिर गौ, फिर मनुष्य। और जिनके विषय में मैंने पाँचवें नरक में बताया, वे भी शेष कर्म के कारण...
श्लोक 20 (skanda.8.50.20)
कृमिकीटेषु जायन्ते जन्मनां कोटिमेव हि । हस्तियोनौ च तावद्धि उष्ट्रेष्वश्वेषु चैव हि
kṛmikīṭeṣu jāyante janmanāṁ koṭimeva hi | hastiyonau ca tāvaddhi uṣṭreṣvaśveṣu caiva hi
वे एक करोड़ जन्मों तक कृमि-कीटों में तथा उतने ही समय हाथी, ऊँट और घोड़े की योनि में जन्म लेते हैं।
श्लोक 21 (skanda.8.50.21)
ततो गोत्वं समासाद्य मानुष्यं प्राप्नुवन्ति ते । षष्ठाच्चैव विनिर्मुक्तास्ततः शेषेण कर्मणा
tato gotvaṁ samāsādya mānuṣyaṁ prāpnuvanti te | ṣaṣṭhāccaiva vinirmuktāstataḥ śeṣeṇa karmaṇā
फिर गौ-योनि प्राप्त करके वे मनुष्यत्व को प्राप्त होते हैं। और छठे नरक से मुक्त हुए जो शेष कर्म के कारण...
श्लोक 22 (skanda.8.50.22)
जायन्ते कृमिकीटेषु जन्मनां द्विगुणेन हि । कोटिमेकां ततो यूका ततो मत्स्योथ सूकरः
jāyante kṛmikīṭeṣu janmanāṁ dviguṇena hi | koṭimekāṁ tato yūkā tato matsyotha sūkaraḥ
...दुगुने अर्थात् दो करोड़ जन्मों तक कृमि-कीटों में; फिर जूँ, फिर मत्स्य, फिर सूकर बनते हैं।
श्लोक 23 (skanda.8.50.23)
महिषत्वं ततः प्राप्य गोत्वाज्जायेत मानुषः
mahiṣatvaṁ tataḥ prāpya gotvājjāyeta mānuṣaḥ
फिर भैंस बनकर, तथा गौ-योनि से मनुष्य बनता है।
श्लोक 24 (skanda.8.50.24)
मानुषत्वे कुत्सितश्च व्याधितश्चैव जायते
mānuṣatve kutsitaśca vyādhitaścaiva jāyate
मनुष्य-योनि में वह निन्दित और रोगी होकर जन्म लेता है।
श्लोक 25 (skanda.8.50.25)
सप्तमाच्च विनिर्मुक्तः कृमिकीटेषु जायते । कोटीत्रयं तावदेव वृक्षत्वमधिगच्छति
saptamācca vinirmuktaḥ kṛmikīṭeṣu jāyate | koṭītrayaṁ tāvadeva vṛkṣatvamadhigacchati
और सातवें नरक से मुक्त हुआ जीव तीन करोड़ जन्मों तक कृमि-कीटों में तथा उतने ही समय वृक्ष-योनि में जन्म लेता है।
श्लोक 26 (skanda.8.50.26)
ततो लता ततो गुल्मस्ततो हस्ती प्रजायते
tato latā tato gulmastato hastī prajāyate
फिर लता, फिर झाड़ी, फिर वह हाथी बनता है।
श्लोक 27 (skanda.8.50.27)
गोत्वं च समनुप्राप्य जायते मानुषस्ततः
gotvaṁ ca samanuprāpya jāyate mānuṣastataḥ
फिर गौ-योनि प्राप्त करके वह मनुष्य बनता है।
श्लोक 28 (skanda.8.50.28)
अष्टमाच्च विनिर्मुक्तो बद्धः शेषेण कर्मणा । जायते कृमिकीटेषु द्वे कोट्यौ द्विगुणे च सः
aṣṭamācca vinirmukto baddhaḥ śeṣeṇa karmaṇā | jāyate kṛmikīṭeṣu dve koṭyau dviguṇe ca saḥ
और आठवें नरक से मुक्त हुआ, शेष कर्म से बंधा हुआ जीव दो करोड़ तथा फिर उससे दुगुने जन्मों तक कृमि-कीटों में जन्म लेता है।
श्लोक 29 (skanda.8.50.29)
ततश्चोषधिभावेन वीरुत्सु च कुशेषु च । ततो गोत्वाद्विनिर्मुक्तो जायते कुत्सितो नरः
tataścoṣadhibhāvena vīrutsu ca kuśeṣu ca | tato gotvādvinirmukto jāyate kutsito naraḥ
फिर वह औषधि, लता तथा कुश के रूप में जन्म लेता है; फिर गौ-योनि से मुक्त होकर वह निन्दित मनुष्य बनता है।
श्लोक 30 (skanda.8.50.30)
नवमादपि चोत्तीर्णो बद्धः शेषेण कर्मणा । जायते कृमिकीटेषु पञ्चकोटीस्ततः खगः
navamādapi cottīrṇo baddhaḥ śeṣeṇa karmaṇā | jāyate kṛmikīṭeṣu pañcakoṭīstataḥ khagaḥ
और नवें नरक से भी पार होकर, शेष कर्म से बंधा हुआ जीव पाँच करोड़ जन्मों तक कृमि-कीटों में तथा फिर पक्षी के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 31 (skanda.8.50.31)
ततो मत्स्यश्च तावद्वै तावदेव सरीसृपः । श्वा ततस्तावदेवाथ ततो भवति किन्नरः
tato matsyaśca tāvadvai tāvadeva sarīsṛpaḥ | śvā tatastāvadevātha tato bhavati kinnaraḥ
फिर उतने ही समय मत्स्य, फिर सरीसृप, फिर कुत्ता बनता है; और फिर वह किन्नर बनता है।
श्लोक 32 (skanda.8.50.32)
किन्नरत्वाद्विनिर्मुक्तस्ततो गोषूपजायते
kinnaratvādvinirmuktastato goṣūpajāyate
किन्नर-भाव से मुक्त होकर वह फिर गौओं में जन्म लेता है।
श्लोक 33 (skanda.8.50.33)
ततो गोयोनिनिर्मुक्तो मानुषेषूपजायते
tato goyoninirmukto mānuṣeṣūpajāyate
फिर गौ-योनि से मुक्त होकर वह मनुष्यों में जन्म लेता है।
श्लोक 34 (skanda.8.50.34)
दशमादपि चोत्तीर्णः षट् कोटीर्जन्मनां कृमिः । शेषेण कर्मणा जातस्ततो भवति वानरः
daśamādapi cottīrṇaḥ ṣaṭ koṭīrjanmanāṁ kṛmiḥ | śeṣeṇa karmaṇā jātastato bhavati vānaraḥ
और दसवें नरक से भी पार होकर, शेष कर्म से जीव छह करोड़ जन्मों तक कृमि बनता है, फिर वह वानर बनता है।
श्लोक 35 (skanda.8.50.35)
वानरस्तावदेवेह तावदेव च कुक्कुटः । तावदेव च काकस्तु जीवंजीवक एव च
vānarastāvadeveha tāvadeva ca kukkuṭaḥ | tāvadeva ca kākastu jīvaṁjīvaka eva ca
उतने ही समय तक वानर, फिर मुर्गा, फिर कौआ, तथा जीवंजीवक पक्षी बनता है।
श्लोक 36 (skanda.8.50.36)
वृक्षदारकमार्जारपिपिलीकाश्च जायते
vṛkṣadārakamārjārapipilīkāśca jāyate
वह वृक्ष, दारक, बिल्ली और चींटी के रूप में जन्म लेता है।
श्लोक 37 (skanda.8.50.37)
ततो गोषु प्रजातोसौ मानुषेषूपजायते
tato goṣu prajātosau mānuṣeṣūpajāyate
फिर गौओं में जन्म लेकर वह मनुष्यों में जन्म लेता है।
श्लोक 38 (skanda.8.50.38)
महारौरवनिर्मुक्तः सप्तकोटीः सुदुःखितः । जन्मनां कृमिकीटेषु जातो मत्स्यत्वमश्नुते
mahārauravanirmuktaḥ saptakoṭīḥ suduḥkhitaḥ | janmanāṁ kṛmikīṭeṣu jāto matsyatvamaśnute
महारौरव से मुक्त हुआ, अत्यंत दुःखी होकर सात करोड़ जन्मों तक कृमि-कीटों में जन्म लेकर फिर मत्स्य-भाव को प्राप्त होता है।
श्लोक 39 (skanda.8.50.39)
ततः श्वा गर्दभश्चैव भैनाशीशुक एव च । ततो भवति गौश्चापि ततः षण्ढश्च मानुषे
tataḥ śvā gardabhaścaiva bhaināśīśuka eva ca | tato bhavati gauścāpi tataḥ ṣaṇḍhaśca mānuṣe
फिर कुत्ता, गधा, मांसभक्षी पक्षी तथा तोता बनता है; फिर गौ बनता है, फिर मनुष्यों में नपुंसक बनता है।
श्लोक 40 (skanda.8.50.40)
तमोनरकनिर्मुक्तस्त्वष्ष्टकोटीः सुदुःखितः । जन्मनां प्राप्नुते जन्तुर्विष्ठायां कृमियोनिषु
tamonarakanirmuktastvaṣṣṭakoṭīḥ suduḥkhitaḥ | janmanāṁ prāpnute janturviṣṭhāyāṁ kṛmiyoniṣu
तम नरक से मुक्त हुआ जीव, अत्यंत दुःखी होकर, आठ करोड़ जन्मों तक विष्ठा में कृमि-योनियों को प्राप्त होता है।
श्लोक 41 (skanda.8.50.41)
ततः श्वा जायते भूयश्चक्राह्वश्च पुनः पुनः
tataḥ śvā jāyate bhūyaścakrāhvaśca punaḥ punaḥ
फिर वह बार-बार कुत्ता तथा चक्रवाक पक्षी बनता है।
श्लोक 42 (skanda.8.50.42)
ततो मण्डूकतां प्राप्य जायते मृगपक्षिषु
tato maṇḍūkatāṁ prāpya jāyate mṛgapakṣiṣu
फिर मेंढक बनकर वह मृगों और पक्षियों में जन्म लेता है।
श्लोक 43 (skanda.8.50.43)
जायते किन्नरश्चापि द्वीपी शरभ एव च । ततो गोत्वं समासाद्य मानुषत्वमवाप्नुते
jāyate kinnaraścāpi dvīpī śarabha eva ca | tato gotvaṁ samāsādya mānuṣatvamavāpnute
वह किन्नर, चीता तथा शरभ के रूप में भी जन्म लेता है; फिर गौ-योनि प्राप्त करके मनुष्यत्व को प्राप्त होता है।
श्लोक 44 (skanda.8.50.44)
तमोनरकनिर्मुक्तः शेषेणैव हि कर्मणा । जायते कृमिकीटेषु नवकोटिः स जन्मनाम्
tamonarakanirmuktaḥ śeṣeṇaiva hi karmaṇā | jāyate kṛmikīṭeṣu navakoṭiḥ sa janmanām
तम नरक से मुक्त हुआ जीव अपने शेष कर्म के कारण नौ करोड़ जन्मों तक कृमि-कीटों में जन्म लेता है।
श्लोक 45 (skanda.8.50.45)
ततो भवति काकश्च भासश्चैव ततः परम्
tato bhavati kākaśca bhāsaścaiva tataḥ param
फिर वह कौआ बनता है और उसके बाद भास पक्षी।
श्लोक 46 (skanda.8.50.46)
वान्ताशी च ततः पक्षी उलूकश्च ततः पुनः
vāntāśī ca tataḥ pakṣī ulūkaśca tataḥ punaḥ
फिर वमन खाने वाला पक्षी, और फिर उल्लू बनता है।
श्लोक 47 (skanda.8.50.47)
पुनर्वृक्षश्च गुल्मश्च ततो भवति वै मृगः । ततो गौर्मनुजश्चापि गर्भस्थः स विपद्यते
punarvṛkṣaśca gulmaśca tato bhavati vai mṛgaḥ | tato gaurmanujaścāpi garbhasthaḥ sa vipadyate
फिर वृक्ष, झाड़ी, फिर मृग बनता है; फिर गौ और फिर मनुष्य होकर वह गर्भ में ही मर जाता है।
श्लोक 48 (skanda.8.50.48)
पुनःपुनर्जायमानः सहस्राणां शतं समाः
punaḥpunarjāyamānaḥ sahasrāṇāṁ śataṁ samāḥ
बार-बार जन्म लेता हुआ वह एक लाख वर्षों तक...
श्लोक 49 (skanda.8.50.49)
व्याधितः कुत्सितश्चैव जायते च पुनः पुनः
vyādhitaḥ kutsitaścaiva jāyate ca punaḥ punaḥ
...बार-बार रोगी और निन्दित होकर जन्म लेता है।
श्लोक 50 (skanda.8.50.50)
यस्तु सर्वानिमान् प्राप्य नरकानिह जायते । स योनिषु समस्तासु सर्वसंसारमश्नुते
yastu sarvānimān prāpya narakāniha jāyate | sa yoniṣu samastāsu sarvasaṁsāramaśnute
किन्तु जो इन सभी नरकों को भोगकर यहाँ जन्म लेता है, वह समस्त योनियों में सम्पूर्ण संसार-चक्र को भोगता है।
श्लोक 51 (skanda.8.50.51)
यदि मानुषतां याति कदाचित् कालपर्ययात् । तत्रापि कुत्सितां योनिं भूयो भूयः प्रपद्यते
yadi mānuṣatāṁ yāti kadācit kālaparyayāt | tatrāpi kutsitāṁ yoniṁ bhūyo bhūyaḥ prapadyate
यदि कालक्रम से वह कभी मनुष्यत्व को प्राप्त भी होता है, तो भी वहाँ वह बार-बार निन्दित योनि को प्राप्त होता है।
श्लोक 52 (skanda.8.50.52)
अनिष्टः सर्वभूतानां दुःखितो व्याधितस्तथा
aniṣṭaḥ sarvabhūtānāṁ duḥkhito vyādhitastathā
वह सभी प्राणियों को अप्रिय, दुःखी तथा रोगी होता है।
श्लोक 53 (skanda.8.50.53)
विकृतं रूपमाप्नोति कर्मणा स्वेन दूषितः
vikṛtaṁ rūpamāpnoti karmaṇā svena dūṣitaḥ
अपने ही कर्म से दूषित होकर वह विकृत रूप प्राप्त करता है।
श्लोक 54 (skanda.8.50.54)
देवब्राह्मणविद्वेष्टा सर्वव्रतबहिष्कृतः । सर्वधर्मविनिर्मुक्तः साध्वाचारविवर्जितः
devabrāhmaṇavidveṣṭā sarvavratabahiṣkṛtaḥ | sarvadharmavinirmuktaḥ sādhvācāravivarjitaḥ
वह देव और ब्राह्मणों से द्वेष करने वाला, सभी व्रतों से बहिष्कृत, समस्त धर्म से रहित, तथा सदाचार से वर्जित होता है...
श्लोक 55 (skanda.8.50.55)
निर्नमस्कारदुश्शीलः किम्भक्षो ब्रह्मनिन्दकः । न तीर्थदेवायतनः स्वधास्वस्तिविवर्जितः । अकीर्तनीयो लोकानां जायते स्वेन कर्मणा
nirnamaskāraduśśīlaḥ kimbhakṣo brahmanindakaḥ | na tīrthadevāyatanaḥ svadhāsvastivivarjitaḥ | akīrtanīyo lokānāṁ jāyate svena karmaṇā
वह प्रणामरहित, दुश्शील, भिखारी-सा, ब्रह्म-निन्दक, तीर्थ और देवालयों से रहित, स्वधा और मंगल से वंचित तथा लोगों में निन्दनीय होकर अपने ही कर्म से जन्म लेता है।
श्लोक 56 (skanda.8.50.56)
सुशर्मोवाच एतत्ते कथितं सर्वं समासात् पुत्र सर्वशः
suśarmovāca etatte kathitaṁ sarvaṁ samāsāt putra sarvaśaḥ
सुशर्मा ने कहा — हे पुत्र, यह सब मैंने तुम्हें संक्षेप में, सभी प्रकार से बता दिया है।
श्लोक 57 (skanda.8.50.57)
नरकाणां सतत्त्वं च क्रमभेदो यथामति
narakāṇāṁ satattvaṁ ca kramabhedo yathāmati
नरकों का सत्य स्वरूप तथा उनका क्रम-भेद, जैसा मुझे ज्ञात है, वह सब बताया।
श्लोक 58 (skanda.8.50.58)
सनत्कुमार उवाच। । य इमं शृणुयाद् युक्तः सदा पर्वसु पर्वसु । श्रावयेद्वा द्विजान् सम्यक् सर्वपापैः प्रमुच्यते
sanatkumāra uvāca| | ya imaṁ śṛṇuyād yuktaḥ sadā parvasu parvasu | śrāvayedvā dvijān samyak sarvapāpaiḥ pramucyate
सनत्कुमार ने कहा — जो कोई एकाग्रचित्त होकर प्रत्येक पर्व पर सदा इसे सुनता है, अथवा ब्राह्मणों को भलीभाँति सुनाता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 59 (skanda.8.50.59)
धन्यं यश स्यमायुष्यं स्वर्ग्यं सर्वार्थसाधकम् । श्रव्यं च पठितव्यं च सततं भूतिमिच्छता
dhanyaṁ yaśa syamāyuṣyaṁ svargyaṁ sarvārthasādhakam | śravyaṁ ca paṭhitavyaṁ ca satataṁ bhūtimicchatā
यह कथा धन्य, यशस्वी, आयुवर्धक, स्वर्गदायी तथा सभी अर्थों को सिद्ध करने वाली है; ऐश्वर्य की इच्छा रखने वाले को इसे सदा सुनना और पढ़ना चाहिये।
श्लोक 60 (skanda.8.50.60)
इदं तु सर्वार्थसुखावहं ध्रुवं महानुभावं सुगतिप्रदं शुभम् । सदैव विप्रेण समाहितात्मना अधीत्य धार्यं श्रुतिसम्मितं ध्रुवम्
idaṁ tu sarvārthasukhāvahaṁ dhruvaṁ mahānubhāvaṁ sugatipradaṁ śubham | sadaiva vipreṇa samāhitātmanā adhītya dhāryaṁ śrutisammitaṁ dhruvam
यह उपदेश निश्चय ही सभी अर्थों में सुख देने वाला, महान् प्रभाव वाला, शुभ तथा सद्गति प्रदान करने वाला है; ब्राह्मण को सदा एकाग्रचित्त होकर इसका अध्ययन करके इसे धारण करना चाहिये, क्योंकि यह श्रुति के समान निश्चित प्रामाणिक है।