अम्बिका खण्ड · अध्याय 51
सुकेश की तपस्या और नारकियों की मुक्ति
श्लोक 1 (skanda.8.51.1)
सनत्कुमार उवाच। । सुकेशस्तु ततो व्यास पितुः श्रुत्वा सुदीनवत्
sanatkumāra uvāca| | sukeśastu tato vyāsa pituḥ śrutvā sudīnavat
सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास, तब सुकेश ने अपने पिता से अत्यंत दीनतापूर्वक सुनकर...
श्लोक 2 (skanda.8.51.2)
दुःखित श्चिन्तयामास जन्तुना तां गतिं तदा
duḥkhita ścintayāmāsa jantunā tāṁ gatiṁ tadā
दुःखी होकर उसने तब प्राणियों की उस दुर्गति के विषय में विचार किया।
श्लोक 3 (skanda.8.51.3)
चिन्तयाभिपरीतात्मा दुःखेन च समाहतः
cintayābhiparītātmā duḥkhena ca samāhataḥ
चिन्ता से व्याकुल-चित्त तथा दुःख से आहत होकर...
श्लोक 4 (skanda.8.51.4)
जन्तूनां मोक्षणोपायं मूढचेता न जज्ञिवान्
jantūnāṁ mokṣaṇopāyaṁ mūḍhacetā na jajñivān
मोहग्रस्त चित्त वाला वह प्राणियों की मुक्ति का कोई उपाय नहीं जान सका।
श्लोक 5 (skanda.8.51.5)
चिन्तापन्नः स तु यदा पितॄँ स्तान्नाभ्यभाषत
cintāpannaḥ sa tu yadā pitṝ~ stānnābhyabhāṣata
जब वह चिन्तामग्न होकर उन पितरों से कुछ नहीं बोला...
श्लोक 6 (skanda.8.51.6)
तदा ते पितरः सर्वे सुकेशमिदमूचिरे
tadā te pitaraḥ sarve sukeśamidamūcire
तब उन सभी पितरों ने सुकेश से यह कहा —
श्लोक 7 (skanda.8.51.7)
पितर ऊचुः। । अतीव किं चिन्तयसि कुतश्चिन्ता तवानघ । ईश्वरस्य सतः पुत्र नेदं तव विधीयते
pitara ūcuḥ| | atīva kiṁ cintayasi kutaścintā tavānagha | īśvarasya sataḥ putra nedaṁ tava vidhīyate
पितरों ने कहा — हे निष्पाप! तुम इतना अधिक चिन्तित क्यों हो? तुम्हें यह चिन्ता किस कारण है? हे ईश्वर के पुत्र, तुम्हारे लिये यह उचित नहीं है।
श्लोक 8 (skanda.8.51.8)
सुकेश उवाच। । जन्तूनां कर्मजं क्लेशं श्रुत्वा युष्माभिरीरितम् । चिन्तयामि कथं तेषां मोक्षोपायो भवेदिति
sukeśa uvāca| | jantūnāṁ karmajaṁ kleśaṁ śrutvā yuṣmābhirīritam | cintayāmi kathaṁ teṣāṁ mokṣopāyo bhavediti
सुकेश ने कहा — आपके द्वारा वर्णित प्राणियों के कर्मजनित क्लेश को सुनकर, मैं यही सोच रहा हूँ कि उनकी मुक्ति का उपाय कैसे हो।
श्लोक 9 (skanda.8.51.9)
पितर ऊचुः। । अनादृत्य क्षयं पुत्र मोक्षस्तेषां न विद्यते । कर्मणः स्वकृतस्येह स च भोगात् क्षयो मतः
pitara ūcuḥ| | anādṛtya kṣayaṁ putra mokṣasteṣāṁ na vidyate | karmaṇaḥ svakṛtasyeha sa ca bhogāt kṣayo mataḥ
पितरों ने कहा — हे पुत्र! बिना कर्म के क्षय हुए उनकी मुक्ति सम्भव नहीं है; और अपने द्वारा किये गये कर्म का क्षय भोग द्वारा ही माना गया है।
श्लोक 10 (skanda.8.51.10)
भोगश्च नरकेवश्यं जन्तुना सं विधीयते । न च ते नारकाः शक्या हर्त्तुं कर्मक्षयं विना
bhogaśca narakevaśyaṁ jantunā saṁ vidhīyate | na ca te nārakāḥ śakyā harttuṁ karmakṣayaṁ vinā
और उस भोग को प्राणी को नरक में अवश्य ही भोगना पड़ता है; और उन नारकी जीवों को कर्म-क्षय के बिना उद्धार करना सम्भव नहीं है।
श्लोक 11 (skanda.8.51.11)
अशक्याः खलु ये ह्यर्था न तान् प्राज्ञस्समारभेत् । अर्णवस्य प्रतरणं यथा त्वां मृत्युमृच्छति
aśakyāḥ khalu ye hyarthā na tān prājñassamārabhet | arṇavasya prataraṇaṁ yathā tvāṁ mṛtyumṛcchati
जो कार्य असम्भव हों, बुद्धिमान् को उन्हें आरम्भ नहीं करना चाहिये — जैसे समुद्र को स्वयं तैरकर पार करने का प्रयास करने पर तुम्हें मृत्यु ही प्राप्त होगी।
श्लोक 12 (skanda.8.51.12)
सनत्कुमार उवाच। । एवमुक्तः स तेजस्वी पितॄँ स्तान् हॄच्छयावृतः
sanatkumāra uvāca| | evamuktaḥ sa tejasvī pitṝ~ stān hṝcchayāvṛtaḥ
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वह तेजस्वी सुकेश, हृदय में शोक से आवृत होकर, उन पितरों से...
श्लोक 13 (skanda.8.51.13)
उवाच प्रणतो भूत्वा मावमध्वं सुतं हि माम्
uvāca praṇato bhūtvā māvamadhvaṁ sutaṁ hi mām
...प्रणाम करके बोला — 'मुझे, अपने पुत्र को, तुच्छ मत समझो।'
श्लोक 14 (skanda.8.51.14)
का शक्तिर्मम तान् जन्तून् बलात् तारयितुं शुभान्
kā śaktirmama tān jantūn balāt tārayituṁ śubhān
मुझमें उन शुभ प्राणियों को बलपूर्वक तारने की क्या शक्ति है?
श्लोक 15 (skanda.8.51.15)
महादेवप्रसादस्तान् तारयिष्यति दुर्गतीन्
mahādevaprasādastān tārayiṣyati durgatīn
महादेव की कृपा ही उन दुर्गतिग्रस्तों को तारेगी।
श्लोक 16 (skanda.8.51.16)
यूयं यथैव तीर्णाः स्थ नरकस्था विचेतसः
yūyaṁ yathaiva tīrṇāḥ stha narakasthā vicetasaḥ
जिस प्रकार आप लोग नरक में पड़े हुए, चेतनाशून्य होकर भी, तर गये हैं...
श्लोक 17 (skanda.8.51.17)
तथा ते जन्तवस्सर्वे तरिष्यन्ति न संशयः
tathā te jantavassarve tariṣyanti na saṁśayaḥ
उसी प्रकार वे सभी प्राणी अवश्य तर जायेंगे, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 18 (skanda.8.51.18)
सनत्कुमार उवाच। । ततस्तान् स तदामन्त्र्य महात्मा गणनायकः । संप्रविश्य समुद्राम्भो ह्यन्तर्जलगतस्तदा
sanatkumāra uvāca| | tatastān sa tadāmantrya mahātmā gaṇanāyakaḥ | saṁpraviśya samudrāmbho hyantarjalagatastadā
सनत्कुमार ने कहा — तब उन गणनायक महात्मा ने उनसे विदा लेकर समुद्र के जल में प्रवेश किया और जल के भीतर चले गये...
श्लोक 19 (skanda.8.51.19)
जजाप रुद्रान् शुद्धात्मा निश्चलः सुसमाहितः । जपतस्तस्य योगेन युक्तस्य च महात्मनः
jajāpa rudrān śuddhātmā niścalaḥ susamāhitaḥ | japatastasya yogena yuktasya ca mahātmanaḥ
शुद्ध अन्तःकरण से, स्थिर तथा सुसमाहित होकर उसने रुद्र-मन्त्रों का जप किया; और योगयुक्त उस महात्मा के जप करने पर...
श्लोक 20 (skanda.8.51.20)
त्रैलोक्यमखिलं व्यास तपसाभूत् प्रतापितम्
trailokyamakhilaṁ vyāsa tapasābhūt pratāpitam
हे व्यास! उसकी तपस्या से समस्त त्रिलोक तप्त हो गया।
श्लोक 21 (skanda.8.51.21)
ततो देवास्तदा सर्वे पितामहमथाब्रुवन्
tato devāstadā sarve pitāmahamathābruvan
तब सभी देवताओं ने पितामह ब्रह्मा से कहा —
श्लोक 22 (skanda.8.51.22)
किमिदं भगवन् सर्वे तप्याम विवशा वयम् । कस्येदं तपसो वीर्यं कस्य योगोयमीदृशः
kimidaṁ bhagavan sarve tapyāma vivaśā vayam | kasyedaṁ tapaso vīryaṁ kasya yogoyamīdṛśaḥ
'हे भगवन्! यह क्या है? हम सब विवश होकर संतप्त हो रहे हैं। यह किसकी तपस्या का प्रभाव है? किसका ऐसा योग है?'
श्लोक 23 (skanda.8.51.23)
क एष सुरशार्दूल तपस्तप्यति दारुणम्
ka eṣa suraśārdūla tapastapyati dāruṇam
'हे सुरश्रेष्ठ! यह कौन है जो इतनी भयंकर तपस्या कर रहा है?'
श्लोक 24 (skanda.8.51.24)
यावदेवं न दहति यावन्नैव न कुप्यते
yāvadevaṁ na dahati yāvannaiva na kupyate
'इससे पहले कि यह हमें और अधिक जला दे, इससे पहले कि वह क्रुद्ध हो जाये...'
श्लोक 25 (skanda.8.51.25)
तावत् सर्वानभिप्रायान् तस्य संपादय प्रभो । स एवमुक्तो देवैस्तैर्भगवान् देवसत्तमः
tāvat sarvānabhiprāyān tasya saṁpādaya prabho | sa evamukto devaistairbhagavān devasattamaḥ
'...उसकी सभी इच्छाओं को अभी पूर्ण कर दीजिये, हे प्रभो!' देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वे देवश्रेष्ठ भगवान् ब्रह्मा...
श्लोक 26 (skanda.8.51.26)
उवाच मा भयं वोस्तु नायं कश्चिदसंमतः । स एष देवदेवस्य महात्मा गणनायकः
uvāca mā bhayaṁ vostu nāyaṁ kaścidasaṁmataḥ | sa eṣa devadevasya mahātmā gaṇanāyakaḥ
...बोले — 'तुम्हें भय नहीं होना चाहिये; यह कोई अनुचित व्यक्ति नहीं है। यह देवों के देव के प्रिय, गणनायक महात्मा हैं।'
श्लोक 27 (skanda.8.51.27)
समुद्रान्तर्जलासीनो रुद्रान् जपति योगवान् । न चास्य दुष्टोभिप्रायो लोकान्प्रति महाबलाः
samudrāntarjalāsīno rudrān japati yogavān | na cāsya duṣṭobhiprāyo lokānprati mahābalāḥ
'समुद्र के जल के भीतर बैठकर योगयुक्त होकर वह रुद्र का जप कर रहा है; और हे महाबलियो! लोकों के प्रति उसका कोई दुष्ट अभिप्राय नहीं है।'
श्लोक 28 (skanda.8.51.28)
नारकानेव नरकादुद्धर्तुमभिमन्यते । तद् यूयं यदि मन्यध्वे गत्वा रुद्रं प्रणम्य च
nārakāneva narakāduddhartumabhimanyate | tad yūyaṁ yadi manyadhve gatvā rudraṁ praṇamya ca
'वह केवल नारकी जीवों को नरक से उबारना चाहता है। अतः यदि तुम सहमत हो तो जाकर रुद्र को प्रणाम करके...'
श्लोक 29 (skanda.8.51.29)
अर्थयामोस्य देवस्य क्रियतामीप्सितो वरः । एवमस्त्विति ते सर्वे ब्रह्मणा सह संगताः
arthayāmosya devasya kriyatāmīpsito varaḥ | evamastviti te sarve brahmaṇā saha saṁgatāḥ
'...हम इस देव से प्रार्थना करें कि उसकी अभीष्ट वर पूर्ण की जाये।' 'ऐसा ही हो' कहकर वे सभी ब्रह्मा के साथ मिलकर...
श्लोक 30 (skanda.8.51.30)
गता मन्दरमव्यग्रा नन्दिना संप्रवेशिताः । ते दृष्टवा देवमीशानं स्तुत्वेदमब्रुवन् विभुम्
gatā mandaramavyagrā nandinā saṁpraveśitāḥ | te dṛṣṭavā devamīśānaṁ stutvedamabruvan vibhum
वे शान्त होकर मन्दराचल गये और नन्दी द्वारा भीतर प्रवेश कराये गये। भगवान् ईशान को देखकर वे उनकी स्तुति करके इस प्रकार बोले —
श्लोक 31 (skanda.8.51.31)
सुकेशो भगवन् तुभ्यं वल्लभो गणनायकः । कारुण्यं प्राणिनां कृत्वा तपस्तप्यति दुश्चरम्
sukeśo bhagavan tubhyaṁ vallabho gaṇanāyakaḥ | kāruṇyaṁ prāṇināṁ kṛtvā tapastapyati duścaram
'हे भगवन्! आपका प्रिय गणनायक सुकेश, प्राणियों पर करुणा करके अत्यंत दुष्कर तपस्या कर रहा है।'
श्लोक 32 (skanda.8.51.32)
तस्य कामं सकामं त्वं कुरुष्व भुवनेश्वर । तेषां विज्ञप्तिमाकर्ण्य देवदेवस्ततो भवः
tasya kāmaṁ sakāmaṁ tvaṁ kuruṣva bhuvaneśvara | teṣāṁ vijñaptimākarṇya devadevastato bhavaḥ
'हे भुवनेश्वर! उसकी इच्छा पूर्ण कीजिये।' उनकी प्रार्थना सुनकर तब देवाधिदेव भव...
श्लोक 33 (skanda.8.51.33)
ब्रह्माद्यैः सहितोभ्यागात् सुकेशस्य तदान्तिकम्
brahmādyaiḥ sahitobhyāgāt sukeśasya tadāntikam
...ब्रह्मा आदि के साथ तब सुकेश के समीप गये।
श्लोक 34 (skanda.8.51.34)
समुद्रस्तत्र ये चान्ये मुनयः शंसितव्रताः
samudrastatra ye cānye munayaḥ śaṁsitavratāḥ
वहाँ समुद्र देवता तथा शुद्ध व्रत वाले अन्य मुनिगण भी उपस्थित हुए...
श्लोक 35 (skanda.8.51.35)
अर्ध्यमादाय शतशो नेमुः शङ्करमागतम् । तमसौ गणपश्रेष्ठं देवदेव इदं वचः
ardhyamādāya śataśo nemuḥ śaṅkaramāgatam | tamasau gaṇapaśreṣṭhaṁ devadeva idaṁ vacaḥ
...अर्घ्य लेकर सैकड़ों की संख्या में आये हुए शंकर को प्रणाम किया। तब देवाधिदेव ने उस गणश्रेष्ठ से यह वचन कहा...
श्लोक 36 (skanda.8.51.36)
प्रोवाच मधुरं व्यास मनःश्रोत्रसुखावहम् । वत्सोत्तिष्ठ सुकेश त्वं प्रार्थयस्व यथेप्सितम्
provāca madhuraṁ vyāsa manaḥśrotrasukhāvaham | vatsottiṣṭha sukeśa tvaṁ prārthayasva yathepsitam
हे व्यास! उन्होंने मन और कान को सुखद, मधुर वचन कहे — 'हे वत्स सुकेश! उठो, जो चाहो वह माँगो।'
श्लोक 37 (skanda.8.51.37)
सर्वं तत् संप्रदास्यामि त्वं हि नन्दिसमो मम । ततः सुकेश उत्थाय स्तुत्वा च वृषभध्वजम्
sarvaṁ tat saṁpradāsyāmi tvaṁ hi nandisamo mama | tataḥ sukeśa utthāya stutvā ca vṛṣabhadhvajam
'मैं वह सब कुछ तुम्हें दूँगा, क्योंकि तुम मुझे नन्दी के समान प्रिय हो।' तब सुकेश उठकर, वृषभध्वज की स्तुति करके...
श्लोक 38 (skanda.8.51.38)
प्रणिपत्य पुनर्वव्रे कामं पूर्वसमीहितम्
praṇipatya punarvavre kāmaṁ pūrvasamīhitam
पुनः प्रणाम करके उसने अपनी पूर्व अभिलषित इच्छा माँगी।
श्लोक 39 (skanda.8.51.39)
नरकेषु नरा देव यात्यन्ते पापकारिणः
narakeṣu narā deva yātyante pāpakāriṇaḥ
'हे देव! पापी मनुष्य नरकों में जाते हैं...'
श्लोक 40 (skanda.8.51.40)
तेषामुपरि चेतो मे दुःखेनार्दितमीश्वर
teṣāmupari ceto me duḥkhenārditamīśvara
'...हे ईश्वर! उनके प्रति मेरा हृदय दुःख से पीड़ित है।'
श्लोक 41 (skanda.8.51.41)
ते यथा प्रतिमुच्यन्ते सर्व एव जगत्प्रभोः
te yathā pratimucyante sarva eva jagatprabhoḥ
'हे जगत्प्रभो! वे सभी किस प्रकार मुक्त हो जायें...'
श्लोक 42 (skanda.8.51.42)
तथा कुरु ममाद्यैव वर एष मयार्थितः
tathā kuru mamādyaiva vara eṣa mayārthitaḥ
'...ऐसा आज ही कीजिये; यही वर मैंने आपसे माँगा है।'
श्लोक 43 (skanda.8.51.43)
ये चाधुना नरा देव यात्यन्ते नरकेषु वै
ye cādhunā narā deva yātyante narakeṣu vai
'और हे देव! जो मनुष्य इस समय नरकों में जा रहे हैं...'
श्लोक 44 (skanda.8.51.44)
तेषान्तु प्रतिमोक्षार्थं याचेहं त्वां सुरेश्वर
teṣāntu pratimokṣārthaṁ yācehaṁ tvāṁ sureśvara
'...उनकी मुक्ति के लिये, हे सुरेश्वर! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ।'
श्लोक 45 (skanda.8.51.45)
ततस्तदर्थितं देवः प्रयच्छन्निदमब्रवीत्
tatastadarthitaṁ devaḥ prayacchannidamabravīt
तब देव ने उसकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए यह कहा —
श्लोक 46 (skanda.8.51.46)
एवं भवतु ते वत्स मुक्ता नारकिणो नराः । अनयापि च भक्त्या त्वं कारुण्येन च वल्लभः
evaṁ bhavatu te vatsa muktā nārakiṇo narāḥ | anayāpi ca bhaktyā tvaṁ kāruṇyena ca vallabhaḥ
'हे वत्स! ऐसा ही हो, नारकी मनुष्य मुक्त हो जायें। इस भक्ति और करुणा के कारण भी तुम मुझे प्रिय हो।'
श्लोक 47 (skanda.8.51.47)
सुतरां भव निर्व्यग्रः परमैश्वर्यसंयुतः । ततस्ते नारकाः सर्वे विमानानि समाश्रिताः
sutarāṁ bhava nirvyagraḥ paramaiśvaryasaṁyutaḥ | tataste nārakāḥ sarve vimānāni samāśritāḥ
'तुम अत्यंत निश्चिन्त होकर परम ऐश्वर्य से युक्त रहो।' तब वे सभी नारकी जीव विमानों पर आरूढ़ होकर...
श्लोक 48 (skanda.8.51.48)
देवदेवं ततोभ्येत्य सुकेशञ्च प्रणेमिरे । तमुवाच पुनर्देवः सुकेशं गणनायकम्
devadevaṁ tatobhyetya sukeśañca praṇemire | tamuvāca punardevaḥ sukeśaṁ gaṇanāyakam
फिर देवाधिदेव के पास जाकर और सुकेश को भी प्रणाम किया। देव ने पुनः गणनायक सुकेश से कहा —
श्लोक 49 (skanda.8.51.49)
यो हि तारयते जन्तूनापदः काँश्चिदेव तु । तेषां धर्मपिता भूत्वा संसारं न स पश्यति
yo hi tārayate jantūnāpadaḥ kā~ścideva tu | teṣāṁ dharmapitā bhūtvā saṁsāraṁ na sa paśyati
'जो कोई भी थोड़े-से प्राणियों को भी विपत्ति से तार देता है, वह उनका धर्म-पिता होकर पुनः संसार को नहीं देखता।'
श्लोक 50 (skanda.8.51.50)
मनसापि हि यः प्राणी क्लेशाज्जन्तून्सदेच्छति
manasāpi hi yaḥ prāṇī kleśājjantūnsadecchati
'जो प्राणी मन से भी सदा प्राणियों को क्लेश से मुक्त करने की इच्छा रखता है...'
श्लोक 51 (skanda.8.51.51)
विमोक्तुं सोपि धर्मात्मा सर्वदुःखैः प्रमुच्यते
vimoktuṁ sopi dharmātmā sarvaduḥkhaiḥ pramucyate
'...वह धर्मात्मा भी सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है।'
श्लोक 52 (skanda.8.51.52)
यश्चोपार्ज्य स्वयं धर्मं जन्तुभ्यः संप्रयच्छति । सुखार्थं सोपि सर्वेभ्यो दुःखेभ्यः संप्रमुच्यते
yaścopārjya svayaṁ dharmaṁ jantubhyaḥ saṁprayacchati | sukhārthaṁ sopi sarvebhyo duḥkhebhyaḥ saṁpramucyate
'और जो स्वयं धर्म अर्जित करके उसे प्राणियों के सुख के लिये प्रदान करता है, वह भी सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है।'
श्लोक 53 (skanda.8.51.53)
स त्वं परेण योगेन ऐश्वर्येण च संयुतः । जन्तूनां तारणे युक्तस्त्वयान्यः कः समो भुवि
sa tvaṁ pareṇa yogena aiśvaryeṇa ca saṁyutaḥ | jantūnāṁ tāraṇe yuktastvayānyaḥ kaḥ samo bhuvi
'तुम परम योग और ऐश्वर्य से युक्त होकर प्राणियों के उद्धार में तत्पर हो — पृथ्वी पर तुम्हारे समान और कौन है?'
श्लोक 54 (skanda.8.51.54)
सुकेश उवाच। । भगवन् त्वत्प्रसादान्मे सर्वमेतद् भविष्यति । शक्तिर्मम कुतो देव त्वयैवैतत् कृतं विभो
sukeśa uvāca| | bhagavan tvatprasādānme sarvametad bhaviṣyati | śaktirmama kuto deva tvayaivaitat kṛtaṁ vibho
सुकेश ने कहा — 'हे भगवन्! यह सब आपकी कृपा से ही होगा; मुझमें शक्ति कहाँ है, हे देव? हे विभो! यह सब आपने ही किया है।'
श्लोक 55 (skanda.8.51.55)
दनचान्यदस्ति कर्त्तव्यं कृत्यं यन्मे मनोगतम् । तवास्मि किङ्करो दासो नाश्चर्यं यन्ममेदृशम्
danacānyadasti karttavyaṁ kṛtyaṁ yanme manogatam | tavāsmi kiṅkaro dāso nāścaryaṁ yanmamedṛśam
'अब मुझे और कुछ नहीं करना है, जो भी मेरे मन में था वह पूर्ण हुआ; मैं आपका सेवक, आपका दास हूँ — मेरे लिये ऐसा होना कोई आश्चर्य नहीं।'
श्लोक 56 (skanda.8.51.56)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स भगवान् देवो विसृज्य गणनायकम् । अभ्यगात् मन्दरं व्यास वृतः सर्वामरैस्तदा
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa bhagavān devo visṛjya gaṇanāyakam | abhyagāt mandaraṁ vyāsa vṛtaḥ sarvāmaraistadā
सनत्कुमार ने कहा — तब वे भगवान् देव, गणनायक से विदा लेकर, हे व्यास, सभी देवताओं से घिरे हुए मन्दराचल को लौट गये।
श्लोक 57 (skanda.8.51.57)
देवा अपि विमानस्थान् नारकान् वीक्ष्य सर्वशः । शान्तं च जगतो दुःखं दृष्ट्वा जग्मुर्यथागतम्
devā api vimānasthān nārakān vīkṣya sarvaśaḥ | śāntaṁ ca jagato duḥkhaṁ dṛṣṭvā jagmuryathāgatam
देवगण भी विमानों में बैठे हुए उन नारकी जीवों को सब ओर देखकर और संसार का दुःख शान्त हुआ देखकर जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार लौट गये।
श्लोक 58 (skanda.8.51.58)
य इमं नारकोत्तारं शृणुयाद्वा पठेत वा । स दुःखं समनुप्राप्य नावसीदति कर्हिचित्
ya imaṁ nārakottāraṁ śṛṇuyādvā paṭheta vā | sa duḥkhaṁ samanuprāpya nāvasīdati karhicit
जो कोई इस नारकोत्तार (नरक-मुक्ति) की कथा को सुनता या पढ़ता है, वह दुःख को प्राप्त होकर भी कभी विषाद को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 59 (skanda.8.51.59)
एतद्योगविधानसर्वसमयं श्रुत्वा नरो नित्यशः पापात्मापि सुनिर्घृणं प्रतिभयं नाभ्येति पापाश्रयम् । किन्त्वेतद् य इहाभ्युपेत्य सततं शौचान्वितः श्रावयेत् देवब्रह्मणवैद्यसंसदि दृढं भक्तः सदा शङ्करम्
etadyogavidhānasarvasamayaṁ śrutvā naro nityaśaḥ pāpātmāpi sunirghṛṇaṁ pratibhayaṁ nābhyeti pāpāśrayam | kintvetad ya ihābhyupetya satataṁ śaucānvitaḥ śrāvayet devabrahmaṇavaidyasaṁsadi dṛḍhaṁ bhaktaḥ sadā śaṅkaram
इस योग-विधि की सम्पूर्ण कथा को सदा सुनकर मनुष्य, पापात्मा होते हुए भी, उस अत्यंत निर्दय, भयंकर पापमय स्थान को प्राप्त नहीं होता। और जो कोई यहाँ आकर, सदा शुद्ध रहकर, देव-ब्राह्मण-वैद्यों की सभा में दृढ़ भक्तिपूर्वक शंकर को सदा सुनाता है...