अम्बिका खण्ड · अध्याय 52
काष्ठकूट का महाभाग्य
श्लोक 1 (skanda.8.52.1)
व्यास उवाच। । के पुनस्तं न गच्छन्ति नरकं शुभकर्मिणः । पापेष्वपि रता ब्रह्मन्नेतदिच्छामि वेदितुम्
vyāsa uvāca| | ke punastaṁ na gacchanti narakaṁ śubhakarmiṇaḥ | pāpeṣvapi ratā brahmannetadicchāmi veditum
व्यास ने कहा — हे ब्रह्मन्! ऐसे कौन-कौन शुभकर्मी हैं, तथा पापों में रत रहने पर भी जो उस नरक को प्राप्त नहीं होते? यह मैं जानना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.8.52.2)
तथा स्त्रीणां च का युक्ता गतिः परमिका शुभा । केन कर्मविपाकेन एतदिच्छामि वेदितुम्
tathā strīṇāṁ ca kā yuktā gatiḥ paramikā śubhā | kena karmavipākena etadicchāmi veditum
तथा स्त्रियों की उपयुक्त, परम शुभ गति क्या है, और किस कर्मफल से वह प्राप्त होती है? यह भी मैं जानना चाहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.8.52.3)
सनत्कुमार उवाच। । न गच्छन्ति नरा येन नरकं तं सुदुःखिताः
sanatkumāra uvāca| | na gacchanti narā yena narakaṁ taṁ suduḥkhitāḥ
सनत्कुमार ने कहा — जिस कारण मनुष्य अत्यंत दुःखी होते हुए भी नरक को नहीं जाते...
श्लोक 4 (skanda.8.52.4)
पापकर्मण्यपि रतास्तानिमान् शृणु मानद
pāpakarmaṇyapi ratāstānimān śṛṇu mānada
...यहाँ तक कि पापकर्मों में रत रहने वाले भी — इन्हें सुनो, हे मानद!
श्लोक 5 (skanda.8.52.5)
नाग्निचिन्नरकं याति न त्रिसूत्री न गोव्रती
nāgnicinnarakaṁ yāti na trisūtrī na govratī
अग्निचयन करने वाला नरक को नहीं जाता, न त्रिसूत्री, न गोव्रती।
श्लोक 6 (skanda.8.52.6)
नाश्वमेधेन यो यष्टा गो सहस्रप्रदो न च
nāśvamedhena yo yaṣṭā go sahasraprado na ca
न अश्वमेध-यज्ञ करने वाला, न सहस्र गौएँ दान करने वाला।
श्लोक 7 (skanda.8.52.7)
न च स्वाध्यायनित्यो यो रुद्रजापी च यो द्विजः
na ca svādhyāyanityo yo rudrajāpī ca yo dvijaḥ
न सदा स्वाध्याय करने वाला ब्राह्मण, न रुद्र-जप करने वाला।
श्लोक 8 (skanda.8.52.8)
ब्राह्मणान् तारयेद्यश्च आपदो मरणान्तिकात्
brāhmaṇān tārayedyaśca āpado maraṇāntikāt
और जो ब्राह्मणों को मृत्युपर्यन्त संकट से बचाता है...
श्लोक 9 (skanda.8.52.9)
ब्राह्मणं व्याधितं दीनमनाथं दुःखपीडितम्
brāhmaṇaṁ vyādhitaṁ dīnamanāthaṁ duḥkhapīḍitam
रोगी, दीन, अनाथ तथा दुःखपीड़ित ब्राह्मण की...
श्लोक 10 (skanda.8.52.10)
शुश्रूषेद्यावदेतेन युक्तो धर्मेण मानवः
śuśrūṣedyāvadetena yukto dharmeṇa mānavaḥ
...जो मनुष्य इस धर्म से युक्त होकर उसकी सेवा करता है...
श्लोक 11 (skanda.8.52.11)
ब्राह्मणं वासयेद्यस्तु गृहवासपरिच्छदैः । निःस्वं स्वाध्यायसंपन्नं नरकं न स पश्यति
brāhmaṇaṁ vāsayedyastu gṛhavāsaparicchadaiḥ | niḥsvaṁ svādhyāyasaṁpannaṁ narakaṁ na sa paśyati
और जो निर्धन किन्तु स्वाध्याय-सम्पन्न ब्राह्मण को घर में आवास और साधन देकर बसाता है, वह उस नरक को नहीं देखता।
श्लोक 12 (skanda.8.52.12)
तथा गाञ्चैव संमग्नां पतितां शक्तिवर्जिताम् । संरक्षति च युक्तात्मा स च तं नैव गच्छति
tathā gāñcaiva saṁmagnāṁ patitāṁ śaktivarjitām | saṁrakṣati ca yuktātmā sa ca taṁ naiva gacchati
तथा जो संयमी पुरुष कीचड़ में फँसी, गिरी हुई तथा शक्तिहीन गौ की रक्षा करता है, वह भी उसे कभी प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 13 (skanda.8.52.13)
महेशं यश्च भावेन परमेण समाधिना । भक्त्या समर्चयेन्नित्यं स च तं नैव गच्छति
maheśaṁ yaśca bhāvena parameṇa samādhinā | bhaktyā samarcayennityaṁ sa ca taṁ naiva gacchati
और जो शुद्ध भाव, परम समाधि तथा भक्ति से सदा महेश की पूजा करता है, वह भी उसे कभी प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 14 (skanda.8.52.14)
इतरेषां तु संसारो भवत्येव न संशयः । ब्राह्मणास्तं न गच्छन्ति वेदवेदाङ्गपारगाः
itareṣāṁ tu saṁsāro bhavatyeva na saṁśayaḥ | brāhmaṇāstaṁ na gacchanti vedavedāṅgapāragāḥ
किन्तु अन्य लोगों के लिये संसार अवश्य होता है, इसमें संशय नहीं। वेद और वेदांगों में पारंगत ब्राह्मण उसे प्राप्त नहीं होते।
श्लोक 15 (skanda.8.52.15)
षट्कर्मनिरता व्यास आत्मधर्मव्यवस्थिताः
ṣaṭkarmaniratā vyāsa ātmadharmavyavasthitāḥ
हे व्यास! जो षट्कर्मों में तत्पर तथा अपने धर्म में स्थित हैं...
श्लोक 16 (skanda.8.52.16)
तपःशौचसमायुक्ता दयावन्तो दृढव्रताः
tapaḥśaucasamāyuktā dayāvanto dṛḍhavratāḥ
तप और शौच से युक्त, दयावान् तथा दृढ़व्रत...
श्लोक 17 (skanda.8.52.17)
प्रतिग्रहनिवृत्ताश्च ईशभक्ताश्च ये द्विजाः । क्षत्रिया ये च रक्षार्थं प्रजानां नित्यमुद्यताः
pratigrahanivṛttāśca īśabhaktāśca ye dvijāḥ | kṣatriyā ye ca rakṣārthaṁ prajānāṁ nityamudyatāḥ
जो ब्राह्मण दान लेने से विरत तथा ईश-भक्त हैं, तथा जो क्षत्रिय सदा प्रजा की रक्षा में तत्पर रहते हैं...
श्लोक 18 (skanda.8.52.18)
त्यजन्ति समरे प्राणान् न ते नरकगामिनः । वैश्या वार्तासमायुक्ता न्यायधर्मव्यवस्थिताः
tyajanti samare prāṇān na te narakagāminaḥ | vaiśyā vārtāsamāyuktā nyāyadharmavyavasthitāḥ
जो युद्ध में प्राण त्याग देते हैं, वे नरकगामी नहीं होते। जो वैश्य न्यायपूर्ण जीविका में तथा धर्म में स्थित रहते हैं...
श्लोक 19 (skanda.8.52.19)
येषां वृत्तिरविच्छिन्ना देवब्राह्मणपूजकाः
yeṣāṁ vṛttiravicchinnā devabrāhmaṇapūjakāḥ
जिनकी जीविका अविच्छिन्न रहती है तथा जो देव-ब्राह्मणों के पूजक हैं...
श्लोक 20 (skanda.8.52.20)
नरकं ते न पश्यन्ति स्वर्गगास्ते प्रकीर्तिताः
narakaṁ te na paśyanti svargagāste prakīrtitāḥ
वे नरक नहीं देखते; वे स्वर्गगामी कहे गये हैं।
श्लोक 21 (skanda.8.52.21)
भक्ता वर्णत्रयं ये च शूद्रा दर्पविवर्जिताः । ब्राह्मणांश्च विशेषेण नित्यं ये समुपासते
bhaktā varṇatrayaṁ ye ca śūdrā darpavivarjitāḥ | brāhmaṇāṁśca viśeṣeṇa nityaṁ ye samupāsate
और जो शूद्र अभिमानरहित होकर तीनों वर्णों के भक्त हैं तथा विशेष रूप से सदा ब्राह्मणों की सेवा करते हैं...
श्लोक 22 (skanda.8.52.22)
ते न पश्यन्ति नरकं सुगतिञ्च मृता ययुः । चतुर्ष्वपि च वर्णेषु मनुजा भावतः शिवम्
te na paśyanti narakaṁ sugatiñca mṛtā yayuḥ | caturṣvapi ca varṇeṣu manujā bhāvataḥ śivam
वे नरक नहीं देखते और मरकर सद्गति को प्राप्त होते हैं। और चारों वर्णों में जो मनुष्य भावपूर्वक शिव की...
श्लोक 23 (skanda.8.52.23)
शर्वार्पितक्रियावस्था भक्ता नित्यमनुव्रताः । न ते प्रयान्ति नरकं प्राप्नुवन्ति परां गतिम्
śarvārpitakriyāvasthā bhaktā nityamanuvratāḥ | na te prayānti narakaṁ prāpnuvanti parāṁ gatim
...अपनी सभी क्रियाएँ शिव को अर्पित करते हैं, भक्त तथा सदा व्रतनिष्ठ रहते हैं, वे नरक को प्राप्त नहीं होते; वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 24 (skanda.8.52.24)
प्रासादं चैव ये कृत्वा देवदेवमुपासते । अन्यानपि पितॄँस्ते तु नरकादुद्धरन्त्युत
prāsādaṁ caiva ye kṛtvā devadevamupāsate | anyānapi pitṝ~ste tu narakāduddharantyuta
और जो मन्दिर बनवाकर देवाधिदेव की उपासना करते हैं, वे अपने अन्य पितरों को भी नरक से उद्धार कर देते हैं।
श्लोक 25 (skanda.8.52.25)
खनिताः पुष्करिण्यो यैस्तडागानि ह्रदानि च । रोपिता वृक्षषण्डाश्च तेपि तान् न प्रयान्ति हि
khanitāḥ puṣkariṇyo yaistaḍāgāni hradāni ca | ropitā vṛkṣaṣaṇḍāśca tepi tān na prayānti hi
जिन्होंने पुष्करिणी, तालाब और सरोवर खुदवाये हैं तथा वृक्षों के झुरमुट लगवाये हैं, वे भी उन नरकों को प्राप्त नहीं होते।
श्लोक 26 (skanda.8.52.26)
परित्राणं द्विजातीनामन्येषां चैव दुःखिनाम् । नित्यं प्रकुर्वते ये च तेपि तान् न व्रजन्ति हि
paritrāṇaṁ dvijātīnāmanyeṣāṁ caiva duḥkhinām | nityaṁ prakurvate ye ca tepi tān na vrajanti hi
और जो द्विजों तथा अन्य दुःखी प्राणियों की सदा रक्षा करते हैं, वे भी उन्हें प्राप्त नहीं होते।
श्लोक 27 (skanda.8.52.27)
अक्रोधनाश्च ये नित्यं देवब्राह्मणपूजकाः । नित्यं दानरताश्चैव न ते गच्छन्त्यधोगतिम्
akrodhanāśca ye nityaṁ devabrāhmaṇapūjakāḥ | nityaṁ dānaratāścaiva na te gacchantyadhogatim
जो सदा क्रोधरहित, देव-ब्राह्मणों के पूजक तथा सदा दानरत रहते हैं, वे अधोगति को प्राप्त नहीं होते।
श्लोक 28 (skanda.8.52.28)
सत्याभिधानसंयुक्ता दु्ष्टारम्भविवर्जिताः
satyābhidhānasaṁyuktā duṣṭārambhavivarjitāḥ
सत्य वचन बोलने वाले, दुष्ट कार्यों से रहित...
श्लोक 29 (skanda.8.52.29)
स्वधर्माचारसंयुक्ताः पश्यन्ति नरकं न ते
svadharmācārasaṁyuktāḥ paśyanti narakaṁ na te
...अपने धर्म के आचरण से युक्त लोग नरक नहीं देखते।
श्लोक 30 (skanda.8.52.30)
लिङ्गार्चनरतस्तस्मात् सर्वस्मात् परिमुच्यते । ध्यानी त सर्वदा यो वै गणाञ्जपति वा शुचिः
liṅgārcanaratastasmāt sarvasmāt parimucyate | dhyānī ta sarvadā yo vai gaṇāñjapati vā śuciḥ
इसलिये लिंगार्चन में रत व्यक्ति उस सबसे मुक्त हो जाता है; तथा जो सदा ध्यानशील रहता है अथवा शुद्ध होकर गणों का जप करता है...
श्लोक 31 (skanda.8.52.31)
योगी तु सर्सर्वपापानि कुर्वन्नपि न लिप्यते । स्त्रीणां तु परमो देवः पतिर्भवति सर्वदा
yogī tu sarsarvapāpāni kurvannapi na lipyate | strīṇāṁ tu paramo devaḥ patirbhavati sarvadā
योगी सभी पाप करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता। और स्त्रियों के लिये पति ही सदा परम देवता है।
श्लोक 32 (skanda.8.52.32)
तस्मान्नान्यं प्रपश्यन्ति याः काश्चिद्धर्मचिन्तिकाः
tasmānnānyaṁ prapaśyanti yāḥ kāściddharmacintikāḥ
इसलिये जो भी स्त्रियाँ धर्म का चिन्तन करने वाली हैं, वे पति के अतिरिक्त और किसी को नहीं देखतीं...
श्लोक 33 (skanda.8.52.33)
कर्मणा मनसा वाचा यद् ददाति जुहोति वा
karmaṇā manasā vācā yad dadāti juhoti vā
वह जो कुछ भी कर्म, मन तथा वाणी से दान अथवा हवन करती है...
श्लोक 34 (skanda.8.52.34)
परित्यज्य पतिं नारी न तस्य फलमश्नुते । पतिशुश्रूषणे रक्ता मनोवाक्कायकर्मभिः
parityajya patiṁ nārī na tasya phalamaśnute | patiśuśrūṣaṇe raktā manovākkāyakarmabhiḥ
— यदि पति को त्यागकर करती है तो उसका फल नहीं पाती। जो मन, वचन और शरीर के कर्मों से पति की सेवा में रत रहती है...
श्लोक 35 (skanda.8.52.35)
पतौ मृतेपि मनसा नान्यमिच्छति या नरम्
patau mṛtepi manasā nānyamicchati yā naram
जो पति के मर जाने पर भी मन से किसी अन्य पुरुष की इच्छा नहीं करती...
श्लोक 36 (skanda.8.52.36)
करोति पुण्यं यच्चापि पत्युः सर्वं प्रयच्छति । सा नारी नरकान् सर्वान् मनसापि न गच्छति
karoti puṇyaṁ yaccāpi patyuḥ sarvaṁ prayacchati | sā nārī narakān sarvān manasāpi na gacchati
और जो भी पुण्य करती है वह सब पति को अर्पित कर देती है — ऐसी नारी मन से भी किसी नरक को प्राप्त नहीं होती।
श्लोक 37 (skanda.8.52.37)
संसारं नैव सा घोरं सर्वं संप्रतिपद्यते
saṁsāraṁ naiva sā ghoraṁ sarvaṁ saṁpratipadyate
वह उस सम्पूर्ण भयंकर संसार-चक्र को नहीं भोगती।
श्लोक 38 (skanda.8.52.38)
अन्यासां तु न संदेहो नरकं प्रति सुव्रत
anyāsāṁ tu na saṁdeho narakaṁ prati suvrata
किन्तु हे सुव्रत! अन्य स्त्रियों के लिये नरक के विषय में कोई संशय नहीं है।
श्लोक 39 (skanda.8.52.39)
सनत्कुमार उवाच। । सुकेशं त्वनुगृह्यैवं देवोपि वृषवाहनः । काष्ठकूटाश्रमं गतः । अनुजग्राह तं विप्रं काष्ठकूटं तपोधनम्
sanatkumāra uvāca| | sukeśaṁ tvanugṛhyaivaṁ devopi vṛṣavāhanaḥ | kāṣṭhakūṭāśramaṁ gataḥ | anujagrāha taṁ vipraṁ kāṣṭhakūṭaṁ tapodhanam
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार सुकेश पर कृपा करके वृषभ-वाहन देव भी काष्ठकूट के आश्रम गये — स्रोत में यहाँ पाठ खण्डित है — उन्होंने तपोधन ब्राह्मण काष्ठकूट पर भी कृपा की।
श्लोक 40 (skanda.8.52.40)
व्यास उवाच। । किं तपस्तस्य भगवन् ब्राह्मणस्य महात्मनः । कियता चैव कालेन वरं लेभे महेश्वरात्
vyāsa uvāca| | kiṁ tapastasya bhagavan brāhmaṇasya mahātmanaḥ | kiyatā caiva kālena varaṁ lebhe maheśvarāt
व्यास ने कहा — हे भगवन्! उस महात्मा ब्राह्मण की तपस्या क्या थी? और कितने समय में उसने महेश्वर से वर प्राप्त किया?
श्लोक 41 (skanda.8.52.41)
कस्य पुत्रः कस्य नप्ता किन्नामा स च सत्तमः । एतदिच्छामि कथितं भगवन् विस्तराच्छुभम्
kasya putraḥ kasya naptā kinnāmā sa ca sattamaḥ | etadicchāmi kathitaṁ bhagavan vistarācchubham
वह श्रेष्ठ पुरुष किसका पुत्र, किसका पौत्र तथा किस नाम वाला था? हे भगवन्! यह सब मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 42 (skanda.8.52.42)
सनत्कुमार उवाच। । गौतमस्यान्वये विप्रो नाम्ना कृष्ण इति प्रभुः
sanatkumāra uvāca| | gautamasyānvaye vipro nāmnā kṛṣṇa iti prabhuḥ
सनत्कुमार ने कहा — गौतम के वंश में कृष्ण नामक एक समर्थ ब्राह्मण थे।
श्लोक 43 (skanda.8.52.43)
तस्य पुत्रोभवत् ख्यातो भूमन्युरिति नामतः
tasya putrobhavat khyāto bhūmanyuriti nāmataḥ
उनके पुत्र का नाम भूमन्यु था, जो विख्यात हुए।
श्लोक 44 (skanda.8.52.44)
तस्य पत्न्यभवत् सुभ्रू रात्रेयी नामतो यशाः । स कदाचित् कृतोद्वाहो भूमन्युर्न्नाम गौतमः
tasya patnyabhavat subhrū rātreyī nāmato yaśāḥ | sa kadācit kṛtodvāho bhūmanyurnnāma gautamaḥ
उनकी पत्नी सुन्दर भौंहों वाली, यशस्विनी रात्रेयी नामक थी। एक बार विवाहित होने पर भी वे भूमन्यु गौतम...
श्लोक 45 (skanda.8.52.45)
नाविन्दत सुतं तस्यां जरया चाभिसंवृतः । स भार्यामाह दुःखार्त इदं वचनकोविदः
nāvindata sutaṁ tasyāṁ jarayā cābhisaṁvṛtaḥ | sa bhāryāmāha duḥkhārta idaṁ vacanakovidaḥ
उससे कोई पुत्र प्राप्त नहीं कर सके और वृद्धावस्था से घिरे हुए, दुःखी होकर, वाक्-कुशल वे अपनी पत्नी से यह कहने लगे...
श्लोक 46 (skanda.8.52.46)
पुत्रेणेच्छन्ति लोकांश्च अनृणाश्च भवन्त्युत । जरां परिगत श्चाहं न च मे दृश्यते सुतः
putreṇecchanti lokāṁśca anṛṇāśca bhavantyuta | jarāṁ parigata ścāhaṁ na ca me dṛśyate sutaḥ
'पुत्र के द्वारा मनुष्य लोकों की कामना करते हैं और ऋणमुक्त होते हैं। मैं वृद्धावस्था को प्राप्त हो गया हूँ, और मुझे कोई पुत्र दिखाई नहीं देता।'
श्लोक 47 (skanda.8.52.47)
सा त्वं कञ्चित् सगोत्रं मे अनुज्ञाता मया शुभे । अभिपद्यस्व पुत्रार्थं याचे त्वां प्राञ्जलिर्न्नतः
sā tvaṁ kañcit sagotraṁ me anujñātā mayā śubhe | abhipadyasva putrārthaṁ yāce tvāṁ prāñjalirnnataḥ
'अतः हे शुभे! मेरी आज्ञा से तुम मेरे किसी सगोत्र बन्धु का आश्रय लो, पुत्र प्राप्ति के लिये — मैं हाथ जोड़कर, झुककर तुमसे यह याचना करता हूँ।'
श्लोक 48 (skanda.8.52.48)
सुयशोवाच न मया श्रुतमेतत्ते तथा नोक्तं त्वयानघ । मादृशी कथमेतद्धि मनसाप्यभिचिन्तयेत्
suyaśovāca na mayā śrutametatte tathā noktaṁ tvayānagha | mādṛśī kathametaddhi manasāpyabhicintayet
सुयशा ने कहा — मैंने आपसे यह पहले कभी नहीं सुना, न ही आपने हे निष्पाप! ऐसा कभी कहा। मुझ जैसी स्त्री ऐसा मन से भी कैसे सोच सकती है?
श्लोक 49 (skanda.8.52.49)
अत्रीणान्तु कुले जाता गौतमं कुलमागता । मद्विधा कथमेतद्धि कुर्यात् सद्भिर्विगर्हितम्
atrīṇāntu kule jātā gautamaṁ kulamāgatā | madvidhā kathametaddhi kuryāt sadbhirvigarhitam
अत्रि के कुल में जन्मी और गौतम के कुल में आयी हुई मुझ जैसी स्त्री, सज्जनों द्वारा निन्दित इस कार्य को कैसे कर सकती है?
श्लोक 50 (skanda.8.52.50)
तपसा धनमन्विच्छेज्जीवितानि सुखानि च । पुत्रान् कुलञ्च लोकांश्च तपः कुरु महामुने
tapasā dhanamanvicchejjīvitāni sukhāni ca | putrān kulañca lokāṁśca tapaḥ kuru mahāmune
तप से ही धन, दीर्घ जीवन, सुख, पुत्र, कुल तथा लोकों की प्राप्ति चाही जाती है — हे महामुने! आप तप कीजिये।
श्लोक 51 (skanda.8.52.51)
तपसा हि सुतो लब्धः शक्तिना स पराशरः । और्वश्च तपसा स्वेन च्यवनेन महामुनिः
tapasā hi suto labdhaḥ śaktinā sa parāśaraḥ | aurvaśca tapasā svena cyavanena mahāmuniḥ
तप से ही शक्ति ने पराशर पुत्र को प्राप्त किया; और्व को भी तप से; तथा महामुनि च्यवन के द्वारा...
श्लोक 52 (skanda.8.52.52)
वसिष्ठेन कपिञ्जल्यामिन्द्रप्रमतिरेव च । शिलादोजनयच्चैव तपसा नन्दिनं सुतम्
vasiṣṭhena kapiñjalyāmindrapramatireva ca | śilādojanayaccaiva tapasā nandinaṁ sutam
वसिष्ठ ने कपिञ्जली से इन्द्रप्रमति को उत्पन्न किया; तथा शिलाद ने भी तप से नन्दी पुत्र को उत्पन्न किया।
श्लोक 53 (skanda.8.52.53)
तथा भवानपि तपः करोतु सुसमाधिना । लप्स्यसे त्वं सुतं श्रेष्ठं महायोगबलान्वितम्
tathā bhavānapi tapaḥ karotu susamādhinā | lapsyase tvaṁ sutaṁ śreṣṭhaṁ mahāyogabalānvitam
उसी प्रकार आप भी गहन समाधि से तप कीजिये; आप महायोगबल से युक्त श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करेंगे।
श्लोक 54 (skanda.8.52.54)
मां हि दृष्ट्वा पुरा प्राह अत्रिर्ब्रह्मसुतः स्वयम् । सत्पुत्रिणी भवित्रीयं न मिथ्या तद् भविष्यति
māṁ hi dṛṣṭvā purā prāha atrirbrahmasutaḥ svayam | satputriṇī bhavitrīyaṁ na mithyā tad bhaviṣyati
क्योंकि एक बार मुझे देखकर स्वयं ब्रह्मपुत्र अत्रि ने कहा था — 'यह स्त्री सत्पुत्रवती होगी'; वह वचन असत्य नहीं होगा।
श्लोक 55 (skanda.8.52.55)
तपोस्ति मयि यत्किञ्चित् त्वत्प्रसादात् समर्जितम्
taposti mayi yatkiñcit tvatprasādāt samarjitam
'मुझमें जो भी तप है, वह आपकी कृपा से ही अर्जित है...'
श्लोक 56 (skanda.8.52.56)
तेन स्वेन च संयुक्तो रुद्रमाराधय प्रभो
tena svena ca saṁyukto rudramārādhaya prabho
'...उसी अपने तप से युक्त होकर, हे स्वामी! रुद्र की आराधना कीजिये।'
श्लोक 57 (skanda.8.52.57)
सनत्कुमार उवाच। । एवमुक्तस्स तेजस्वी ह्रिया परमया युतः । तयैवं समनुज्ञातो रुद्रं शरणमीयिवान्
sanatkumāra uvāca| | evamuktassa tejasvī hriyā paramayā yutaḥ | tayaivaṁ samanujñāto rudraṁ śaraṇamīyivān
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वह तेजस्वी भूमन्यु, परम लज्जा से युक्त होकर, उसकी आज्ञा पाकर रुद्र की शरण में गये।
श्लोक 58 (skanda.8.52.58)
त्वरितं स च समागम्य नर्मदां हर्षसंयुतः । तस्यास्तीरे समुद्विश्य तस्थौ वाय्वाशनः समाः
tvaritaṁ sa ca samāgamya narmadāṁ harṣasaṁyutaḥ | tasyāstīre samudviśya tasthau vāyvāśanaḥ samāḥ
वे शीघ्रता से हर्षपूर्वक नर्मदा नदी के पास पहुँचे और उसके तट पर बैठकर वायु का ही आहार करते हुए वर्षों तक रहे।
श्लोक 59 (skanda.8.52.59)
स तु नैवाभवद्विप्रः कृतार्थस्तेन कर्मणा । ततस्स दुःखितो भूयः प्राणायामेन तस्थिवान्
sa tu naivābhavadvipraḥ kṛtārthastena karmaṇā | tatassa duḥkhito bhūyaḥ prāṇāyāmena tasthivān
किन्तु उस ब्राह्मण को उस साधना से सफलता नहीं मिली; तब और भी दुःखी होकर वे प्राणायाम द्वारा तप करने लगे।
श्लोक 60 (skanda.8.52.60)
वर्षमेकं ततो देवस्तमुवाच तदा विभुः । किमेवं क्लिश्यसे विप्र न तवास्ति सुतः क्वचित्
varṣamekaṁ tato devastamuvāca tadā vibhuḥ | kimevaṁ kliśyase vipra na tavāsti sutaḥ kvacit
एक वर्ष के पश्चात् उन प्रभु देव ने उनसे कहा — 'हे विप्र! तुम इस प्रकार स्वयं को क्यों कष्ट देते हो? तुम्हारे लिये कहीं भी पुत्र नहीं है।'
श्लोक 61 (skanda.8.52.61)
व्यर्थस्तेयं श्चश्रमस्तावन्नास्ति पुत्रस्तवानघ । स एवमुक्तो निर्विण्णो निराशः पुत्रजन्मनि
vyarthasteyaṁ ścaśramastāvannāsti putrastavānagha | sa evamukto nirviṇṇo nirāśaḥ putrajanmani
'तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है; हे निष्पाप! तुम्हारे लिये कोई पुत्र नहीं है।' ऐसा कहे जाने पर वे खिन्न होकर पुत्र-जन्म की आशा खो बैठे...
श्लोक 62 (skanda.8.52.62)
चिन्तयामास मरणं न गन्तुं स्वं गृहं प्रति स काष्ठकूटं संभृत्य गृहीत्वाग्निं सुदुःखितः
cintayāmāsa maraṇaṁ na gantuṁ svaṁ gṛhaṁ prati sa kāṣṭhakūṭaṁ saṁbhṛtya gṛhītvāgniṁ suduḥkhitaḥ
उन्होंने अपने घर न लौटकर मरने का निश्चय किया; अत्यंत दुःखी होकर उन्होंने काष्ठ का ढेर इकट्ठा करके अग्नि ली...
श्लोक 63 (skanda.8.52.63)
विलप्य बहुदुःखार्त्त आत्मानं दग्धुमैच्छत
vilapya bahuduḥkhārtta ātmānaṁ dagdhumaicchata
और विलाप करते हुए, अत्यंत दुःख से पीड़ित होकर, वे स्वयं को जला डालने की इच्छा करने लगे।
श्लोक 64 (skanda.8.52.64)
तस्य रुद्र स्तमालक्ष्य व्यवसायं सुदुष्करम्
tasya rudra stamālakṣya vyavasāyaṁ suduṣkaram
उनके इस अत्यंत कठिन संकल्प को देखकर रुद्र ने...
श्लोक 65 (skanda.8.52.65)
पुत्र पुत्रेति गम्भीरमदृश्य इदमब्रवीत्
putra putreti gambhīramadṛśya idamabravīt
अदृश्य रूप में गम्भीर स्वर में यह कहा — 'हे पुत्र! हे पुत्र!...'
श्लोक 66 (skanda.8.52.66)
पुत्रस्ते भविता गच्छ मा चैवं साहसं कृथाः
putraste bhavitā gaccha mā caivaṁ sāhasaṁ kṛthāḥ
'...तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा; जाओ, ऐसा दुस्साहस मत करो।'
श्लोक 67 (skanda.8.52.67)
काष्ठकूटेति नाम्ना च भविष्यति स ते सुतः । अथ हृष्टमना विप्रो गत्वा पत्न्यां महातपाः
kāṣṭhakūṭeti nāmnā ca bhaviṣyati sa te sutaḥ | atha hṛṣṭamanā vipro gatvā patnyāṁ mahātapāḥ
'और वह तुम्हारा पुत्र काष्ठकूट नाम से होगा।' तब प्रसन्नचित्त होकर वह महातपस्वी ब्राह्मण अपनी पत्नी के पास जाकर...
श्लोक 68 (skanda.8.52.68)
उत्पादयामास सुतं काष्ठकूटं महामुनिम् । संस्कृतस्य तु कालेन तस्य बुद्धिरभूत् ततः
utpādayāmāsa sutaṁ kāṣṭhakūṭaṁ mahāmunim | saṁskṛtasya tu kālena tasya buddhirabhūt tataḥ
काष्ठकूट नामक महामुनि पुत्र को जन्म दिया। समय के साथ जब उसके संस्कार हो चुके, तब उसके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ...
श्लोक 69 (skanda.8.52.69)
अशक्तोयं वृद्धभावान्मामध्यापयितुं पिता । तस्माद् यास्यामि चामत्र्य पितरं वेदकारणात्
aśaktoyaṁ vṛddhabhāvānmāmadhyāpayituṁ pitā | tasmād yāsyāmi cāmatrya pitaraṁ vedakāraṇāt
'वृद्धावस्था के कारण मेरे पिता मुझे पढ़ाने में असमर्थ हैं। अतः पिता से आज्ञा लेकर मैं वेद-अध्ययन के लिये जाऊँगा।'
श्लोक 70 (skanda.8.52.70)
स गत्वा मातरं विप्रः पितरञ्च महायशाः । प्रणम्य शिरसा सम्यगिदं वचनमब्रवीत्
sa gatvā mātaraṁ vipraḥ pitarañca mahāyaśāḥ | praṇamya śirasā samyagidaṁ vacanamabravīt
वह महायशस्वी विप्र-बालक अपने माता-पिता के पास जाकर, भलीभाँति सिर झुकाकर, यह वचन बोला —
श्लोक 71 (skanda.8.52.71)
सुतो युवाभ्यां जातोहं धर्महेतोर्न कामतः
suto yuvābhyāṁ jātohaṁ dharmahetorna kāmataḥ
'मैं आप दोनों से धर्म के हेतु उत्पन्न हुआ हूँ, कामना से नहीं।'
श्लोक 72 (skanda.8.52.72)
आवां तारयिता चायं तथैव च पितामहान्
āvāṁ tārayitā cāyaṁ tathaiva ca pitāmahān
'यह मैं आप दोनों को तथा हमारे पितरों को भी तार दूँगा।'
श्लोक 73 (skanda.8.52.73)
सन्तततिश्चाप्यविच्छिन्ना भविष्यति न संशयः । इष्टाँश्च लोकान् प्राप्स्याव सुपुत्रेणेति सर्वथा
santatatiścāpyavicchinnā bhaviṣyati na saṁśayaḥ | iṣṭā~śca lokān prāpsyāva suputreṇeti sarvathā
'तथा हमारी सन्तति अविच्छिन्न रहेगी, इसमें संशय नहीं; और सुपुत्र के द्वारा हम सभी प्रकार से इष्ट लोकों को प्राप्त करेंगे।'
श्लोक 74 (skanda.8.52.74)
पितॄणाञ्चानृणो स्याव इत्यभीष्टोस्मि वां सुतः । सोहं धर्मेष्वकुशलः श्रुतिस्मृतिबहिष्कृतः
pitṝṇāñcānṛṇo syāva ityabhīṣṭosmi vāṁ sutaḥ | sohaṁ dharmeṣvakuśalaḥ śrutismṛtibahiṣkṛtaḥ
'हम पितरों के ऋण से मुक्त हों — इसी अभिलाषा से आप दोनों ने मुझे पुत्र रूप में चाहा। किन्तु मैं धर्म में अकुशल तथा श्रुति-स्मृति से वंचित हूँ...'
श्लोक 75 (skanda.8.52.75)
कर्त्ताज्ञानेन तत्कर्म पितरो येन दुःखिताः । भवांश्च निरये मग्न श्चिरं वत्स्यति दुष्टवत्
karttājñānena tatkarma pitaro yena duḥkhitāḥ | bhavāṁśca niraye magna ściraṁ vatsyati duṣṭavat
'—जिससे अज्ञानवश किया गया वह कर्म पितरों को दुःख देगा, और आप स्वयं भी दुष्ट के समान चिरकाल तक नरक में डूबे रहेंगे।'
श्लोक 76 (skanda.8.52.76)
भवान्नाध्यापने शक्तः स्थविरत्वाद् दिने दिने । पुत्रस्नेहाच्च कार्याच्च न सम्यग् धारयिष्यासि
bhavānnādhyāpane śaktaḥ sthaviratvād dine dine | putrasnehācca kāryācca na samyag dhārayiṣyāsi
'वृद्धावस्था के कारण आप प्रतिदिन मुझे पढ़ाने में समर्थ नहीं हैं; और पुत्र-स्नेह तथा अन्य कार्यों के कारण आप भलीभाँति अनुशासन नहीं रख पायेंगे।'
श्लोक 77 (skanda.8.52.77)
इयं च जननी नित्यमेकपुत्रोयमित्युत
iyaṁ ca jananī nityamekaputroyamityuta
'और यह माता सदा यही सोचकर कि यह मेरा एकमात्र पुत्र है...'
श्लोक 78 (skanda.8.52.78)
त्वया सम्यक् प्रशास्यन्तं नैव मामनुमंस्यते
tvayā samyak praśāsyantaṁ naiva māmanumaṁsyate
'...आपके द्वारा भलीभाँति अनुशासित किये जाने पर सहमत नहीं होगी।'
श्लोक 79 (skanda.8.52.79)
सोहमन्यं तपो नित्यं निरनुक्रोशमेव च । आचार्यं मतिसंपन्नं संश्रयामीति मे मतिः
sohamanyaṁ tapo nityaṁ niranukrośameva ca | ācāryaṁ matisaṁpannaṁ saṁśrayāmīti me matiḥ
'अतः मेरा यह विचार है कि मैं किसी अन्य ऐसे आचार्य की शरण लूँ, जो तपस्वी, बुद्धिमान् तथा अनावश्यक दया से रहित हो।'
श्लोक 80 (skanda.8.52.80)
न चापि तद् व्यवस्यामि युवयोर्नास्ति कश्चन । कुर्याद्यः पादयोर्नित्यं शुश्रूषामिति चिन्तयन्
na cāpi tad vyavasyāmi yuvayornāsti kaścana | kuryādyaḥ pādayornityaṁ śuśrūṣāmiti cintayan
'और मैं यह निश्चय इसलिये नहीं कर रहा कि आप दोनों की सेवा करने वाला कोई नहीं है — अपितु यह सोचकर कि आपके चरणों की सेवा सदा कौन करेगा...'
श्लोक 81 (skanda.8.52.81)
न च नाख्येयमेतद् वां मया चिन्ता कृता शुभम्
na ca nākhyeyametad vāṁ mayā cintā kṛtā śubham
'और यह बात आप दोनों से छिपाने योग्य नहीं है — यह जो शुभ विचार मैंने किया...'
श्लोक 82 (skanda.8.52.82)
अशुभं वापि यत्किंचिद्युवां मम गतिः परा
aśubhaṁ vāpi yatkiṁcidyuvāṁ mama gatiḥ parā
'या जो भी हो, शुभ अथवा अशुभ — आप दोनों ही मेरी परम गति हैं।'
श्लोक 83 (skanda.8.52.83)
एवमुक्तौ तु पितरौ पुत्रेण सुमहात्मना । अश्रुपूर्णेक्षणौ स्थित्वा मुहूर्तमिदमूचतुः । आघ्रायालिङ्ग्य संमृज्य स्नेहात् प्रियसुतौ तदा
evamuktau tu pitarau putreṇa sumahātmanā | aśrupūrṇekṣaṇau sthitvā muhūrtamidamūcatuḥ | āghrāyāliṅgya saṁmṛjya snehāt priyasutau tadā
इस प्रकार अपने महात्मा पुत्र द्वारा कहे जाने पर, माता-पिता की आँखें आँसुओं से भर गयीं; क्षणभर खड़े रहकर, स्नेहवश अपने प्रिय पुत्र को सूँघकर, आलिंगन करके तथा सहलाकर, वे यह बोले...
श्लोक 84 (skanda.8.52.84)
भूमन्युरुवाच शुश्रूषा द्विविधा पुत्र पितॄणां धर्मसंमिता
bhūmanyuruvāca śuśrūṣā dvividhā putra pitṝṇāṁ dharmasaṁmitā
भूमन्यु ने कहा — 'हे पुत्र! पितरों की सेवा, जो धर्मसम्मत है, दो प्रकार की होती है।'
श्लोक 85 (skanda.8.52.85)
या कर्तव्या प्रयत्नेन सुतेन सुमहात्मना
yā kartavyā prayatnena sutena sumahātmanā
'—जो एक अत्यंत महान् पुत्र द्वारा प्रयत्नपूर्वक की जानी चाहिये।'
श्लोक 86 (skanda.8.52.86)
ऐहिकी चाङ्गशुश्रूषा या परत्र च धर्मदा । यया तरन्ति पितरः कामाँश्चाप्नुवतेक्षयान् । तत्रैहिकं न नो हीष्टं यथा ह्यामुष्मिकं हितम्
aihikī cāṅgaśuśrūṣā yā paratra ca dharmadā | yayā taranti pitaraḥ kāmā~ścāpnuvatekṣayān | tatraihikaṁ na no hīṣṭaṁ yathā hyāmuṣmikaṁ hitam
'एक तो इस लोक में शारीरिक सेवा है, और दूसरी परलोक में धर्म प्रदान करने वाली, जिससे पितर तर जाते हैं तथा अक्षय कामनाओं को प्राप्त करते हैं। इनमें हमें इहलौकिक सेवा उतनी अभीष्ट नहीं जितनी पारलौकिक हित है।'
श्लोक 87 (skanda.8.52.87)
तस्मादामुष्मिकं कर्म यद् भवेत्तत् समाचर
tasmādāmuṣmikaṁ karma yad bhavettat samācara
'अतः जो भी कर्म पारलौकिक हित के लिये हो, वही करो।'
श्लोक 88 (skanda.8.52.88)
गच्छाधीष्व श्रुतिञ्चैव स्मृतिञ्चैव सुकर्मणाम्
gacchādhīṣva śrutiñcaiva smṛtiñcaiva sukarmaṇām
'जाओ, और सत्कर्मों की श्रुति तथा स्मृति का अध्ययन करो।'
श्लोक 89 (skanda.8.52.89)
सुयशोवाच यथा तेयं पिता पुत्र ब्रवीति विदितात्मवान्
suyaśovāca yathā teyaṁ pitā putra bravīti viditātmavān
सुयशा ने कहा — 'हे पुत्र! जैसा तुम्हारे ज्ञानी पिता ने तुमसे कहा है...'
श्लोक 90 (skanda.8.52.90)
तथा कुरु यथा देवो वरदस्ते भवेद् भवः
tathā kuru yathā devo varadaste bhaved bhavaḥ
'...वैसा ही करो; और देव भव तुम्हें वरदाता हों।'
श्लोक 91 (skanda.8.52.91)
उदरेण मया दुःखं धारितस्त्वं महामते
udareṇa mayā duḥkhaṁ dhāritastvaṁ mahāmate
'हे महामते! मैंने अपने गर्भ में तुम्हें अनेक कष्ट सहते हुए धारण किया।'
श्लोक 92 (skanda.8.52.92)
तथा च बहुभिः क्लेशैर्ल्लब्धः सर्वार्थसिद्धये
tathā ca bahubhiḥ kleśairllabdhaḥ sarvārthasiddhaye
'तथा अनेक कष्टों से, सभी अर्थों की सिद्धि के लिये, तुम्हें प्राप्त किया गया।'
श्लोक 93 (skanda.8.52.93)
पित्रा च तपसोग्रेण प्राणाँस्त्यक्त्वातिदुस्त्यजान् । महादेवाद् भवाँल्लव्धस्तस्य युक्तं समाचर
pitrā ca tapasogreṇa prāṇā~styaktvātidustyajān | mahādevād bhavā~llavdhastasya yuktaṁ samācara
'तथा तुम्हारे पिता ने उग्र तप से, अत्यंत त्यागने में कठिन प्राणों को भी त्यागकर, महादेव से तुम्हें प्राप्त किया। अतः उनके योग्य आचरण करो।'
श्लोक 94 (skanda.8.52.94)
यथा तुष्टो त्वया पुत्र जीवौ जीवेन संगतौ
yathā tuṣṭo tvayā putra jīvau jīvena saṁgatau
'ताकि हे पुत्र! तुमसे संतुष्ट होकर हम दोनों तुम्हारे ही जीवन के सहारे जीवित रह सकें...'
श्लोक 95 (skanda.8.52.95)
आवामुभावपि स्याव तथा सम्यक् समाचर
āvāmubhāvapi syāva tathā samyak samācara
'—हम दोनों ऐसे ही रहें; उसी के अनुरूप भलीभाँति आचरण करो।'
श्लोक 96 (skanda.8.52.96)
सनत्कुमार उवाच। । ततस्ताभ्यामनुज्ञात आघ्रातश्चैव मूर्धनि । प्रदक्षिणमुपावृत्य जगाम स कृतात्मवान्
sanatkumāra uvāca| | tatastābhyāmanujñāta āghrātaścaiva mūrdhani | pradakṣiṇamupāvṛtya jagāma sa kṛtātmavān
सनत्कुमार ने कहा — तब उन दोनों की आज्ञा पाकर तथा सिर पर सूँघे जाकर, वह संयमी बालक उनकी प्रदक्षिणा करके चला गया।
श्लोक 97 (skanda.8.52.97)
स जगाम तदा ताभ्यां विसृष्टश्च्यवनं प्रति । ऋग्यजुर्भ्यामिवोत्सृष्टा स्वाहुतिर्वरुणं प्रति
sa jagāma tadā tābhyāṁ visṛṣṭaścyavanaṁ prati | ṛgyajurbhyāmivotsṛṣṭā svāhutirvaruṇaṁ prati
उन दोनों द्वारा विदा किये जाने पर वह च्यवन मुनि की ओर गया — जैसे ऋक् और यजुष् मन्त्रों से दी गयी आहुति वरुण की ओर भेजी जाती है।
श्लोक 98 (skanda.8.52.98)
स तमासाद्य तुष्टेन तेनासौ सफलः कृतः । भागधेयमिव प्राप्य देवैर्मन्त्रः पुरस्सरः
sa tamāsādya tuṣṭena tenāsau saphalaḥ kṛtaḥ | bhāgadheyamiva prāpya devairmantraḥ purassaraḥ
उनके पास पहुँचकर, संतुष्ट हुए उन च्यवन मुनि द्वारा वह सफल किया गया — जैसे विधिपूर्वक उच्चारित मन्त्र देवताओं से अपना भाग पाकर सफल होता है।
श्लोक 99 (skanda.8.52.99)
अथ पुत्रे गते तस्मिन् पिता दिष्टान्त मीयिवान्
atha putre gate tasmin pitā diṣṭānta mīyivān
तत्पश्चात् जब वह पुत्र चला गया, तब पिता का देहान्त हो गया।
श्लोक 100 (skanda.8.52.100)
काष्ठकूटस्ततोभ्येत्य कृतविद्यः सुधार्मिकः
kāṣṭhakūṭastatobhyetya kṛtavidyaḥ sudhārmikaḥ
तब विद्या पूर्ण करके, सुधार्मिक काष्ठकूट लौट आये...
श्लोक 101 (skanda.8.52.101)
अपश्यन्मातरं दीनां वितोयामिव पद्मिनीम्
apaśyanmātaraṁ dīnāṁ vitoyāmiva padminīm
...और अपनी माता को जल-रहित कमलिनी के समान दीन देखा।
श्लोक 102 (skanda.8.52.102)
सोमहीनामिव निशामाज्ञाहीनामिव श्रियम्
somahīnāmiva niśāmājñāhīnāmiva śriyam
चन्द्रविहीन रात्रि के समान, आज्ञाविहीन राजलक्ष्मी के समान...
श्लोक 103 (skanda.8.52.103)
रुदतीमश्रुपूर्णाक्षीं विलपन्तीं सुदुःखिताम्
rudatīmaśrupūrṇākṣīṁ vilapantīṁ suduḥkhitām
रोती हुई, आँसुओं से भरी आँखों वाली, विलाप करती हुई, अत्यंत दुःखी।
श्लोक 104 (skanda.8.52.104)
काष्ठकूटस्तु तां दृष्टवा दुःखेन समभिप्लुताम्
kāṣṭhakūṭastu tāṁ dṛṣṭavā duḥkhena samabhiplutām
और काष्ठकूट उसे दुःख से अभिभूत देखकर...
श्लोक 105 (skanda.8.52.105)
जयंत इव पौलोमीं शक्रे नष्टेब्रवीदिदम्
jayaṁta iva paulomīṁ śakre naṣṭebravīdidam
—जैसे इन्द्र के खो जाने पर जयन्त ने शची से कहा हो — उसने यह कहा:
श्लोक 106 (skanda.8.52.106)
काष्ठकूट उवाच। । श्रुतं मयेदं प्रागेव कृतं चैवोर्ध्वदेहिकम्
kāṣṭhakūṭa uvāca| | śrutaṁ mayedaṁ prāgeva kṛtaṁ caivordhvadehikam
काष्ठकूट ने कहा — 'यह मैंने पहले ही सुन लिया है, और ऊर्ध्वदैहिक कर्म भी सम्पन्न कर दिये गये हैं।'
श्लोक 107 (skanda.8.52.107)
मा शोके मन आधत्स्व एष धर्मः सनातनः
mā śoke mana ādhatsva eṣa dharmaḥ sanātanaḥ
'शोक में मन मत लगाओ; यह सनातन धर्म है।'
श्लोक 108 (skanda.8.52.108)
देवानाञ्च ऋषीणां च योगिनाञ्च महात्मनाम् । मर्त्यानां किं पुनर्मातर्मा शुच स्तं तपोधनम्
devānāñca ṛṣīṇāṁ ca yogināñca mahātmanām | martyānāṁ kiṁ punarmātarmā śuca staṁ tapodhanam
'देवताओं, ऋषियों तथा महात्मा योगियों को भी मृत्यु प्राप्त होती है, मनुष्यों की तो बात ही क्या! हे माता, उस तपोधन के लिये शोक मत करो।'
श्लोक 109 (skanda.8.52.109)
अहं तेनात्मनात्मा वै सृष्टः स्वेनैव तेजसा । पश्य मां कृतकृत्यं त्वं गायत्रीवात्मनः सुतम्
ahaṁ tenātmanātmā vai sṛṣṭaḥ svenaiva tejasā | paśya māṁ kṛtakṛtyaṁ tvaṁ gāyatrīvātmanaḥ sutam
'उन्होंने अपने ही तेज से, अपनी ही आत्मा के रूप में मुझे उत्पन्न किया। मुझे कृतकृत्य होकर देखो, जैसे गायत्री ने अपने पुत्र को देखा था।'
श्लोक 110 (skanda.8.52.110)
वेदाः सर्वे मयाधीताः साङ्गोपाङ्गास्सविस्तराः । तथोपवेदास्सर्वे च अध्यात्मञ्चैव कृत्स्नशः
vedāḥ sarve mayādhītāḥ sāṅgopāṅgāssavistarāḥ | tathopavedāssarve ca adhyātmañcaiva kṛtsnaśaḥ
'मैंने समस्त वेदों को उनके अंगों और उपांगों सहित विस्तारपूर्वक पढ़ लिया है; तथा सभी उपवेदों और सम्पूर्ण अध्यात्म-विद्या को भी।'
श्लोक 111 (skanda.8.52.111)
यत्किंचित् पुरुषैर्ज्ञेयं तत्सर्वं ज्ञानमेव च । श्रोतव्यं च श्रुतं सर्वमुपास्ताश्चापि योगिनः
yatkiṁcit puruṣairjñeyaṁ tatsarvaṁ jñānameva ca | śrotavyaṁ ca śrutaṁ sarvamupāstāścāpi yoginaḥ
'मनुष्यों के लिये जो कुछ भी जानने योग्य है, वह सारा ज्ञान; जो कुछ सुनने योग्य है, वह सब सुना जा चुका है; और योगियों की भी उपासना की गयी है।'
श्लोक 112 (skanda.8.52.112)
अनेनापि प्रकर्षेण हृष्यमाणा मुदान्विता । मां पालय महासत्वे गायत्रीव सदा क्रतुम्
anenāpi prakarṣeṇa hṛṣyamāṇā mudānvitā | māṁ pālaya mahāsatve gāyatrīva sadā kratum
'हे महासत्त्वे! इस श्रेष्ठता से हर्षित तथा प्रसन्न होकर, मेरा पालन करो, जैसे गायत्री सदा यज्ञ का पालन करती है।'
श्लोक 113 (skanda.8.52.113)
सनत्कुमार उवाच। । श्रुत्वा तस्य वच स्तस्तद्वै माता तथ्यं महात्मनः । भूयस्तरेण दुःखेन रुदती तमुवाच ह
sanatkumāra uvāca| | śrutvā tasya vaca stastadvai mātā tathyaṁ mahātmanaḥ | bhūyastareṇa duḥkhena rudatī tamuvāca ha
सनत्कुमार ने कहा — उस महात्मा के उन सत्य वचनों को सुनकर उसकी माता और भी अधिक दुःख से रोती हुई उससे बोली —
श्लोक 114 (skanda.8.52.114)
सुयशोवाच पुत्र नैतद्धि दुःखं मे मृतः स इति संमतः । सर्वेषां प्राणिनामेतद्विहितं मर्त्यधर्मिणाम्
suyaśovāca putra naitaddhi duḥkhaṁ me mṛtaḥ sa iti saṁmataḥ | sarveṣāṁ prāṇināmetadvihitaṁ martyadharmiṇām
सुयशा ने कहा — 'हे पुत्र! यह मेरा दुःख नहीं है कि वे मर गये — यह तो स्वीकृत ही है; यह तो सभी मर्त्यधर्मी प्राणियों के लिये विहित है।'
श्लोक 115 (skanda.8.52.115)
स चापि कृतकृत्यश्च महात्मा तपसान्वितः । न तस्य शोच्यमस्माभिरिह किञ्चिद्धि विद्यते
sa cāpi kṛtakṛtyaśca mahātmā tapasānvitaḥ | na tasya śocyamasmābhiriha kiñciddhi vidyate
'और वे भी कृतकृत्य, महात्मा तथा तपस्या से युक्त थे — उनके लिये हमें कुछ भी शोक करने योग्य नहीं है।'
श्लोक 116 (skanda.8.52.116)
आत्मानं पुत्र शोचामि याहं तेन विना कृता । तमेवानु मृता नास्मि तवागमनकांक्षिणी
ātmānaṁ putra śocāmi yāhaṁ tena vinā kṛtā | tamevānu mṛtā nāsmi tavāgamanakāṁkṣiṇī
'हे पुत्र! मैं स्वयं के लिये शोक करती हूँ, कि मैं उनके बिना रह गयी। मैं उनके पीछे मरी नहीं, केवल तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में।'
श्लोक 117 (skanda.8.52.117)
नार्था न भोगस्वजना न पुत्रा नैव बान्धवाः । योषितां तत्र तिष्ठन्ति पतिर्यत्रावतिष्ठते
nārthā na bhogasvajanā na putrā naiva bāndhavāḥ | yoṣitāṁ tatra tiṣṭhanti patiryatrāvatiṣṭhate
'न धन, न भोग, न स्वजन, न पुत्र, न बान्धव — स्त्रियों के लिये वहीं सब कुछ है जहाँ पति रहता है।'
श्लोक 118 (skanda.8.52.118)
पतिर्यदि ततः सर्वं नास्ति किञ्चित् पतिं विना
patiryadi tataḥ sarvaṁ nāsti kiñcit patiṁ vinā
'यदि पति है तो सब कुछ है; पति के बिना कुछ भी नहीं है।'
श्लोक 119 (skanda.8.52.119)
सर्वं हि दुःखदं तासां यासां नास्ति पतिः सुत
sarvaṁ hi duḥkhadaṁ tāsāṁ yāsāṁ nāsti patiḥ suta
'हे पुत्र! जिन स्त्रियों का पति नहीं होता, उनके लिये सब कुछ दुःखदायी होता है।'
श्लोक 120 (skanda.8.52.120)
इदं च मे पुनर्दुःखं यत्त्वां तेन सहाद्य वै । नाभिनन्दामि संहृष्टा सुतं श्रीरवि विष्णुना
idaṁ ca me punarduḥkhaṁ yattvāṁ tena sahādya vai | nābhinandāmi saṁhṛṣṭā sutaṁ śrīravi viṣṇunā
'और मेरा यह भी दुःख है कि आज मैं उनके साथ मिलकर, प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा स्वागत नहीं कर पा रही — जैसे श्री विष्णु के साथ अपने पुत्र का स्वागत करती हैं।'
श्लोक 121 (skanda.8.52.121)
बहुशः स हि मामाह काष्ठकूट इहैष्यति
bahuśaḥ sa hi māmāha kāṣṭhakūṭa ihaiṣyati
'क्योंकि वे बार-बार मुझसे कहते थे — काष्ठकूट यहाँ आयेगा...'
श्लोक 122 (skanda.8.52.122)
कृतविद्यस्ततस्तस्य वरयिष्ये स्नुषां शुभाम्
kṛtavidyastatastasya varayiṣye snuṣāṁ śubhām
'...और उसकी विद्या पूर्ण होने पर मैं उसके लिये एक सुन्दर पुत्रवधू चुनूँगा।'
श्लोक 123 (skanda.8.52.123)
काश्यपस्योदलस्येयं सुता गुणवती भृशम्
kāśyapasyodalasyeyaṁ sutā guṇavatī bhṛśam
'काश्यप उदल की यह अत्यंत गुणवती पुत्री...'
श्लोक 124 (skanda.8.52.124)
तामहं वरयिष्यामि काष्ठकूटस्य सुव्रताम्
tāmahaṁ varayiṣyāmi kāṣṭhakūṭasya suvratām
'...उसे, सुव्रता को, मैं काष्ठकूट के लिये वरण करूँगा।'
श्लोक 125 (skanda.8.52.125)
तदा द्रक्ष्यामि तं पुत्रं सपत्नीकं दृढव्रतम् । अग्नीँश्चैवाहरिष्यामि पत्नीवन्तं समीक्ष्य वै
tadā drakṣyāmi taṁ putraṁ sapatnīkaṁ dṛḍhavratam | agnī~ścaivāhariṣyāmi patnīvantaṁ samīkṣya vai
'तब मैं उस दृढ़व्रत पुत्र को पत्नी सहित देखूँगा; और उसे पत्नीवान् देखकर मैं फिर से अग्नियों का आधान करूँगा।'
श्लोक 126 (skanda.8.52.126)
पत्न्याः कदाहं पुत्रस्य पाणिग्रहणतोषितः । शुभानि मनसा वाचा विधास्यामि बहून्यपि
patnyāḥ kadāhaṁ putrasya pāṇigrahaṇatoṣitaḥ | śubhāni manasā vācā vidhāsyāmi bahūnyapi
'अपने पुत्र के विवाह से संतुष्ट होकर मैं कब मन और वाणी से अनेक शुभ कार्य करूँगा?'
श्लोक 127 (skanda.8.52.127)
एवं मनोरथवतस्तस्य पुत्रवतस्तथा
evaṁ manorathavatastasya putravatastathā
'—इस प्रकार वे मनोरथों से युक्त तथा पुत्रवान् होने पर गर्वित थे...'
श्लोक 128 (skanda.8.52.128)
प्रियपुत्रस्य नैवाभूदेतद् दहति मां सुत
priyaputrasya naivābhūdetad dahati māṁ suta
'—किन्तु प्रिय पुत्र होते हुए भी उनका यह मनोरथ पूरा नहीं हो सका; हे पुत्र! यही मुझे जला रहा है।'
श्लोक 129 (skanda.8.52.129)
मया त्वमुक्तपूर्वश्च गच्छन्वै तस्य सन्निधौ । जीवौ यथा त्वां पश्यावस्तच्च नैवाभवत्तथा
mayā tvamuktapūrvaśca gacchanvai tasya sannidhau | jīvau yathā tvāṁ paśyāvastacca naivābhavattathā
'और मैंने तुमसे पहले ही कहा था, जब तुम जा रहे थे, कि उनके साथ रहना, ताकि हम दोनों जीवित रहते हुए तुम्हें देख सकें — किन्तु वह भी नहीं हो सका।'
श्लोक 130 (skanda.8.52.130)
वज्रसारमयं मेद्य हृदयं न हि दीर्यते या त्वां पश्यामि पुत्रेह विना तेनासती पुनः
vajrasāramayaṁ medya hṛdayaṁ na hi dīryate yā tvāṁ paśyāmi putreha vinā tenāsatī punaḥ
'हे पुत्र! आज मेरा यह हृदय वज्र के समान कठोर होते हुए भी फटता नहीं, जबकि मैं तुम्हें यहाँ उनके बिना देख रही हूँ, मानो पुनः वैधव्य को प्राप्त हुई हूँ।'
श्लोक 131 (skanda.8.52.131)
सनत्कुमार उवाच। । ततः सा कुररी यद्वद्विना पत्या महायशा । विलप्य बहुदुःखार्त्ता पपात धरणीतले
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sā kurarī yadvadvinā patyā mahāyaśā | vilapya bahuduḥkhārttā papāta dharaṇītale
सनत्कुमार ने कहा — तब वह महायशस्विनी स्त्री, पति-वियोगिनी कुररी पक्षिणी के समान, अत्यंत दुःख से विलाप करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी।
श्लोक 132 (skanda.8.52.132)
तां काष्ठकूटो दुःखार्तां पतितां गतजीविताम् । विसंज्ञामग्निना दग्ध्वा विललाप सुदुःखितः
tāṁ kāṣṭhakūṭo duḥkhārtāṁ patitāṁ gatajīvitām | visaṁjñāmagninā dagdhvā vilalāpa suduḥkhitaḥ
काष्ठकूट ने दुःख से पीड़ित, गिरी हुई, प्राणहीन तथा चेतनाशून्य उस माता को अग्नि से दग्ध करके अत्यंत दुःखी होकर विलाप किया।
श्लोक 133 (skanda.8.52.133)
हा तात मम दुर्बुद्धेरधर्मज्ञस्य चैव हि
hā tāta mama durbuddheradharmajñasya caiva hi
'हाय पिता! मेरी दुर्बुद्धि तथा धर्म के अज्ञान के कारण ही...'
श्लोक 134 (skanda.8.52.134)
क्व गतोसि न मेद्य त्वं सभार्यः संप्रभाषसे । ननु त्वयाहं निर्दिष्टो गच्छाधीष्वेति हृष्टवत्
kva gatosi na medya tvaṁ sabhāryaḥ saṁprabhāṣase | nanu tvayāhaṁ nirdiṣṭo gacchādhīṣveti hṛṣṭavat
'—तुम कहाँ चले गये? आज तुम अपनी पत्नी सहित मुझसे बात नहीं करते। क्या तुमने ही हर्षपूर्वक मुझसे नहीं कहा था — जाओ, अध्ययन करो?'
श्लोक 135 (skanda.8.52.135)
सोहमद्यागतोधीत्य कस्मान्मां नाभिभाषसे । ननु ते तपसा लब्धः परेण च समाधिना
sohamadyāgatodhītya kasmānmāṁ nābhibhāṣase | nanu te tapasā labdhaḥ pareṇa ca samādhinā
'मैं आज अध्ययन पूर्ण करके लौटा हूँ, तो तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते? क्या मुझे तुमने तप और परम समाधि से प्राप्त नहीं किया था?'
श्लोक 136 (skanda.8.52.136)
पुत्रोहं देवदेवाद्वै रुद्रात् किं नाभिभाषसे । किं मयापकृतं तात सहभार्यस्य तेनघ
putrohaṁ devadevādvai rudrāt kiṁ nābhibhāṣase | kiṁ mayāpakṛtaṁ tāta sahabhāryasya tenagha
'मैं तो देवाधिदेव रुद्र से प्राप्त तुम्हारा पुत्र हूँ — तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते? हे तात! हे निष्पाप! मैंने ऐसा क्या अपराध किया कि आप अपनी पत्नी सहित...'
श्लोक 137 (skanda.8.52.137)
यन्मां सहाम्बयागत्य दृढं नैवाभिनन्दसि
yanmāṁ sahāmbayāgatya dṛḍhaṁ naivābhinandasi
'...माता के साथ आकर भी दृढ़तापूर्वक मेरा स्वागत नहीं करते?'
श्लोक 138 (skanda.8.52.138)
हा हतोसि मयैकेन दुष्पुत्रेण दुरात्मना
hā hatosi mayaikena duṣputreṇa durātmanā
'हाय! मुझ अकेले दुष्ट पुत्र, दुरात्मा के कारण ही आप दोनों नष्ट हुए!'
श्लोक 139 (skanda.8.52.139)
अराजकमिदं मन्ये पितृघ्नं मां न हन्ति यत् । एवं स विलपन् व्यास ऋषिभिर्बहुभिस्तथा
arājakamidaṁ manye pitṛghnaṁ māṁ na hanti yat | evaṁ sa vilapan vyāsa ṛṣibhirbahubhistathā
'मुझे लगता है यह राज्य राजाविहीन है, जो मुझ पितृघातक को दण्ड नहीं देता।' हे व्यास! इस प्रकार विलाप करते हुए उसे अनेक ऋषियों ने...
श्लोक 140 (skanda.8.52.140)
संस्थापितः समाश्वस्ते नाकरोदुदकक्रियाम् । इमां प्रतिज्ञां चक्रे च ऋषिमध्ये महातपाः
saṁsthāpitaḥ samāśvaste nākarodudakakriyām | imāṁ pratijñāṁ cakre ca ṛṣimadhye mahātapāḥ
...उसे स्थिर करके समझाया गया; परन्तु उसने जलांजलि नहीं दी। और उस महातपस्वी ने ऋषियों के मध्य यह प्रतिज्ञा की —
श्लोक 141 (skanda.8.52.141)
दुष्करां सर्वभूतानामुपस्पृश्य कृताञ्जलिः
duṣkarāṁ sarvabhūtānāmupaspṛśya kṛtāñjaliḥ
—जल का स्पर्श करके, हाथ जोड़कर, समस्त प्राणियों के लिये दुष्कर ऐसी प्रतिज्ञा की...
श्लोक 142 (skanda.8.52.142)
अद्यप्रभृति नोच्छ्वासं करिष्यामि कथञ्चन
adyaprabhṛti nocchvāsaṁ kariṣyāmi kathañcana
'आज से मैं किसी भी प्रकार श्वास नहीं लूँगा।'
श्लोक 143 (skanda.8.52.143)
वायवो मे शरीरस्था न चरिष्यन्ति कर्हिचित् । निमेषोन्मेषरहित एकपादोर्ध्वबाहुमान्
vāyavo me śarīrasthā na cariṣyanti karhicit | nimeṣonmeṣarahita ekapādordhvabāhumān
'मेरे शरीर में स्थित प्राण-वायु कभी संचरित नहीं होंगे। बिना पलक झपकाये, एक पैर पर, ऊपर उठी भुजाओं के साथ...'
श्लोक 144 (skanda.8.52.144)
काष्ठलोष्ठोपलीभूतो भविष्यामि न संशयः
kāṣṭhaloṣṭhopalībhūto bhaviṣyāmi na saṁśayaḥ
'—मैं निश्चय ही काठ, ढेले तथा पत्थर के समान हो जाऊँगा।'
श्लोक 145 (skanda.8.52.145)
रुद्रं द्रक्ष्यामि यावच्च यावच्च पितरं तथा । सभार्यं सं प्रपश्यामि तावद् व्रतमिदं मम
rudraṁ drakṣyāmi yāvacca yāvacca pitaraṁ tathā | sabhāryaṁ saṁ prapaśyāmi tāvad vratamidaṁ mama
'जब तक मैं रुद्र को नहीं देखता और जब तक अपने पिता को उनकी पत्नी सहित नहीं देखता, तब तक मेरा यह व्रत रहेगा।'
श्लोक 146 (skanda.8.52.146)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स ऋषिभिस्तैस्तु दृश्यमानो महातपाः । महेश्वरं सदा ध्यायन् तत्रैव समतिष्ठत
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa ṛṣibhistaistu dṛśyamāno mahātapāḥ | maheśvaraṁ sadā dhyāyan tatraiva samatiṣṭhata
सनत्कुमार ने कहा — तब वह महातपस्वी उन ऋषियों के देखते हुए, सदा महेश्वर का ध्यान करते हुए, वहीं खड़ा रहा।
श्लोक 147 (skanda.8.52.147)
तस्य देवः स्थितस्यैवं पितृभक्त्या तथापि च । तुष्टो दिनेष्टमे व्यास स्वयमेवाह शङ्करः
tasya devaḥ sthitasyaivaṁ pitṛbhaktyā tathāpi ca | tuṣṭo dineṣṭame vyāsa svayamevāha śaṅkaraḥ
इस प्रकार खड़े रहने वाले तथा पितृभक्ति से युक्त उस पर देव प्रसन्न हुए; और हे व्यास! आठवें दिन शंकर ने स्वयं कहा —
श्लोक 148 (skanda.8.52.148)
देवदेव उवाच। । काष्ठकूट प्रयच्छामि दिव्यं चक्षुस्तवानघ । पश्य मां त्वं सुविश्रब्धमदृश्यं योगिनामपि
devadeva uvāca| | kāṣṭhakūṭa prayacchāmi divyaṁ cakṣustavānagha | paśya māṁ tvaṁ suviśrabdhamadṛśyaṁ yogināmapi
देवाधिदेव ने कहा — 'हे निष्पाप काष्ठकूट! मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ। तुम मुझे निश्शंक होकर देखो — मुझे, जो योगियों के लिये भी अदृश्य हूँ।'
श्लोक 149 (skanda.8.52.149)
ब्रूहि पुत्र वरं चापि यस्ते हृदि समाहितः । प्रदास्यामि न सन्देहः सुनिश्चित्याभिधत्स्व माम्
brūhi putra varaṁ cāpi yaste hṛdi samāhitaḥ | pradāsyāmi na sandehaḥ suniścityābhidhatsva mām
'हे पुत्र! जो भी वर तुम्हारे हृदय में हो, वह कहो; मैं अवश्य दूँगा, इसमें संशय नहीं — भलीभाँति निश्चय करके मुझसे कहो।'
श्लोक 150 (skanda.8.52.150)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स दृष्टवा देवेशमुद्यन्तमिव भास्करम् । पपात पादयोर्हृष्ट इदञ्चोवाच सुस्वरम्
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa dṛṣṭavā deveśamudyantamiva bhāskaram | papāta pādayorhṛṣṭa idañcovāca susvaram
सनत्कुमार ने कहा — तब उदीयमान सूर्य के समान देवेश को देखकर वह हर्षित होकर उनके चरणों में गिर पड़ा और मधुर स्वर में यह बोला —
श्लोक 151 (skanda.8.52.151)
काष्ठकूट उवाच। । भगवन् मृत्युना माता पिता च मम योजितौ । जीवेतां तावुभौ देव एतदिच्छाम्यहं वरम्
kāṣṭhakūṭa uvāca| | bhagavan mṛtyunā mātā pitā ca mama yojitau | jīvetāṁ tāvubhau deva etadicchāmyahaṁ varam
काष्ठकूट ने कहा — 'हे भगवन्! मेरे माता-पिता दोनों मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं; हे देव! वे दोनों जीवित हो जायें — यही वर मैं चाहता हूँ।'
श्लोक 152 (skanda.8.52.152)
देवदेव उवाच। । तावुभौ नरकं घोरं प्रपन्नौ मृत्युनार्दितौ । न तौ शक्यौ पुनर्जीवौ कर्तुमन्यद्वृणीष्व मे
devadeva uvāca| | tāvubhau narakaṁ ghoraṁ prapannau mṛtyunārditau | na tau śakyau punarjīvau kartumanyadvṛṇīṣva me
देवाधिदेव ने कहा — 'मृत्यु से पीड़ित होकर वे दोनों घोर नरक को प्राप्त हो गये हैं। उन्हें पुनः जीवित करना सम्भव नहीं है; मुझसे कोई अन्य वर माँगो।'
श्लोक 153 (skanda.8.52.153)
काष्ठकूट उवाच। । नाहमन्यं वरं देव कथञ्चिदपि कामये । पित्रर्थोयं समारम्भस्तद्विधत्स्व नमस्तव
kāṣṭhakūṭa uvāca| | nāhamanyaṁ varaṁ deva kathañcidapi kāmaye | pitrarthoyaṁ samārambhastadvidhatsva namastava
काष्ठकूट ने कहा — 'हे देव! मैं किसी भी प्रकार अन्य वर नहीं चाहता। यह सारा प्रयास मेरे पिता के लिये ही था; वही प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।'
श्लोक 154 (skanda.8.52.154)
देवदेव उवाच। । शरीरं चेन्मृतस्यास्ति तच्छक्यं जीवितेन हि । सयोजयितुमद्यैव दग्धस्यैतन्न विद्यते
devadeva uvāca| | śarīraṁ cenmṛtasyāsti tacchakyaṁ jīvitena hi | sayojayitumadyaiva dagdhasyaitanna vidyate
देवाधिदेव ने कहा — 'यदि मृत व्यक्ति का शरीर बना हो, तो उसे आज ही जीवन से जोड़ा जा सकता है; परन्तु दग्ध हो चुके शरीर के लिये यह सम्भव नहीं है।'
श्लोक 155 (skanda.8.52.155)
तयोर्नचास्ति वै देहो न चान्यत् करणं तथा । यादृक् च स पिता तुभ्यं भवाँस्तादृक् छरीरतः
tayornacāsti vai deho na cānyat karaṇaṁ tathā | yādṛk ca sa pitā tubhyaṁ bhavā~stādṛk charīrataḥ
'उन दोनों का न तो शरीर बचा है, न ही कोई अन्य उपाय है। और जैसा तुम्हारा पिता था, वैसा ही शरीर से तुम भी हो।'
श्लोक 156 (skanda.8.52.156)
शरीरमेतत्त्वं यच्छ ततो जीवौ भविष्यतः
śarīrametattvaṁ yaccha tato jīvau bhaviṣyataḥ
'तुम अपना यह शरीर दे दो; तब वे दोनों जीवित हो जायेंगे।'
श्लोक 157 (skanda.8.52.157)
काष्ठकूट उवाच। । ताभ्यां वै नास्त्यकर्तव्यं कर्तव्यं चेन्मतं भवेत् । शरीरं च विना दृष्टमुत्थानं वै ध्रुवस्य तु
kāṣṭhakūṭa uvāca| | tābhyāṁ vai nāstyakartavyaṁ kartavyaṁ cenmataṁ bhavet | śarīraṁ ca vinā dṛṣṭamutthānaṁ vai dhruvasya tu
काष्ठकूट ने कहा — 'उनके लिये कुछ भी अकर्तव्य नहीं है, यदि वह कर्तव्य समझा जाये। परन्तु निश्चित रूप से मृत का उत्थान शरीर के बिना कभी नहीं देखा गया।'
श्लोक 158 (skanda.8.52.158)
न चापि मे शरीरेण विना ताभ्यां रतिः प्रभो । तस्माद् गृहाण देवश शरीरं यदि मन्यसे
na cāpi me śarīreṇa vinā tābhyāṁ ratiḥ prabho | tasmād gṛhāṇa devaśa śarīraṁ yadi manyase
'और हे प्रभो! शरीर के बिना मुझे उन दोनों के साथ रहने का कोई सुख नहीं होगा। अतः हे देव! यदि आप उचित समझें तो यह शरीर ग्रहण कीजिये।'
श्लोक 159 (skanda.8.52.159)
तस्यैवेदं तहादेव अङ्गादङ्गः समुत्थितम् । तस्माद्यच्छस्व देवेश न मे कार्यमनेन हि
tasyaivedaṁ tahādeva aṅgādaṅgaḥ samutthitam | tasmādyacchasva deveśa na me kāryamanena hi
'यह मेरा शरीर उन्हीं के अंग-अंग से उत्पन्न हुआ है। अतः हे देवेश! इसे दे दीजिये; मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है।'
श्लोक 160 (skanda.8.52.160)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स भगवान्देवः प्रहस्य ऋषिसत्तम
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa bhagavāndevaḥ prahasya ṛṣisattama
सनत्कुमार ने कहा — हे ऋषिश्रेष्ठ! तब वे भगवान् देव मुस्कराकर...
श्लोक 161 (skanda.8.52.161)
प्रीतात्मा प्रत्युवाचेदं युयुक्षुस्तं शुभेन हि
prītātmā pratyuvācedaṁ yuyukṣustaṁ śubhena hi
...प्रसन्नचित्त होकर, उसे शुभ फल से जोड़ने की इच्छा से यह उत्तर देने लगे —
श्लोक 162 (skanda.8.52.162)
देवदेव उवाच। । परीक्षेयं कृता पुत्र तव धर्मवृतां वर
devadeva uvāca| | parīkṣeyaṁ kṛtā putra tava dharmavṛtāṁ vara
देवाधिदेव ने कहा — 'हे पुत्र! हे धर्मपरायणों में श्रेष्ठ! यह तुम्हारी परीक्षा ली गयी थी।'
श्लोक 163 (skanda.8.52.163)
पितृभक्त्यानया सम्यक् तुष्टोस्मि शृणु मे वचः
pitṛbhaktyānayā samyak tuṣṭosmi śṛṇu me vacaḥ
'तुम्हारी इस पितृभक्ति से मैं भलीभाँति संतुष्ट हूँ; मेरा वचन सुनो।'
श्लोक 164 (skanda.8.52.164)
अक्षयश्चाव्ययश्चापि जरामृत्युविवर्जितः
akṣayaścāvyayaścāpi jarāmṛtyuvivarjitaḥ
'तुम अक्षय, अव्यय तथा जरा-मृत्यु से रहित होगे...'
श्लोक 165 (skanda.8.52.165)
ऐश्वर्येण च संयुक्तः प्रियो मे गणपो भवान्
aiśvaryeṇa ca saṁyuktaḥ priyo me gaṇapo bhavān
'...तथा ऐश्वर्य से युक्त होकर तुम मेरे प्रिय गणपति बनोगे।'
श्लोक 166 (skanda.8.52.166)
काष्ठकूट इति ख्यातः सर्वयोगबलान्वितः । कामगेन विमानेन मत्कृतेन चरिष्यसि
kāṣṭhakūṭa iti khyātaḥ sarvayogabalānvitaḥ | kāmagena vimānena matkṛtena cariṣyasi
'काष्ठकूट नाम से विख्यात, सम्पूर्ण योगबल से युक्त होकर, तुम मेरे द्वारा बनाये गये इच्छानुसार चलने वाले विमान में विचरण करोगे।'
श्लोक 167 (skanda.8.52.167)
इमे च ऋषयः सर्व आश्रमेस्मिन् तपस्विनः । तवैवानुचरा भूत्वा भविष्यन्ति गणेश्वराः
ime ca ṛṣayaḥ sarva āśramesmin tapasvinaḥ | tavaivānucarā bhūtvā bhaviṣyanti gaṇeśvarāḥ
'और इस आश्रम के ये सभी तपस्वी ऋषि तुम्हारे ही अनुचर बनकर गणेश्वर हो जायेंगे।'
श्लोक 168 (skanda.8.52.168)
अक्षयाश्चाव्ययाश्चैव महायोगबलान्विताः
akṣayāścāvyayāścaiva mahāyogabalānvitāḥ
'वे अक्षय, अव्यय तथा महायोगबल से युक्त होंगे।'
श्लोक 169 (skanda.8.52.169)
ऐश्वर्येण च तुल्यास्ते भविष्यन्ति न संशयः
aiśvaryeṇa ca tulyāste bhaviṣyanti na saṁśayaḥ
'और ऐश्वर्य में वे तुम्हारे समान होंगे, इसमें संशय नहीं।'
श्लोक 170 (skanda.8.52.170)
अयञ्च ते पिता पुत्र भूमन्युः सह भार्यया । तवैवानुचरो भूत्वा त्वत्समः समुपस्थितः
ayañca te pitā putra bhūmanyuḥ saha bhāryayā | tavaivānucaro bhūtvā tvatsamaḥ samupasthitaḥ
'और हे पुत्र! यह तुम्हारा पिता भूमन्यु, अपनी पत्नी सहित, तुम्हारा ही अनुचर बनकर, तुम्हारे समान होकर यहाँ उपस्थित है।'
श्लोक 171 (skanda.8.52.171)
श्वेतञ्च पर्वतं दिव्यं विमानैरुपशोभितम् । कामगं सं प्रयच्छामि निवासं स्वर्गसन्निभम्
śvetañca parvataṁ divyaṁ vimānairupaśobhitam | kāmagaṁ saṁ prayacchāmi nivāsaṁ svargasannibham
'और मैं तुम्हें विमानों से सुशोभित, इच्छानुसार गमन करने वाला, स्वर्ग के समान दिव्य श्वेत पर्वत निवास के लिये प्रदान करता हूँ।'
श्लोक 172 (skanda.8.52.172)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स भगवान्देव अनुगृह्य तमूर्ज्जितम् । जगाम मन्दरं भूयः सोपीष्टं देशमाव्रजत्
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa bhagavāndeva anugṛhya tamūrjjitam | jagāma mandaraṁ bhūyaḥ sopīṣṭaṁ deśamāvrajat
सनत्कुमार ने कहा — तब उस बलशाली को इस प्रकार अनुगृहीत करके भगवान् देव पुनः मन्दराचल को लौट गये; और वह भी अपने इष्ट स्थान को चला गया।
श्लोक 173 (skanda.8.52.173)
यावद् देवी तपोयुक्ता पितुः शिखरमास्थिता
yāvad devī tapoyuktā pituḥ śikharamāsthitā
जब तक देवी तपस्या में लीन होकर अपने पिता के शिखर पर स्थित रहीं...
श्लोक 174 (skanda.8.52.174)
तावद् देव इदं सर्वं चकार कथितं हि यत्
tāvad deva idaṁ sarvaṁ cakāra kathitaṁ hi yat
...उसी बीच देव ने यह सब कुछ किया, जो अभी बताया गया।
श्लोक 175 (skanda.8.52.175)
य इदं देवदेवस्य चेष्टितं शृणुयान्नरः । श्रावयीत द्विजान् वापि न स दुर्गतिमाप्नुयात्
ya idaṁ devadevasya ceṣṭitaṁ śṛṇuyānnaraḥ | śrāvayīta dvijān vāpi na sa durgatimāpnuyāt
जो कोई देवाधिदेव की इस लीला को सुनता है, अथवा ब्राह्मणों को सुनाता है, वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 176 (skanda.8.52.176)
नित्यमेतदधीयानः शुचिः प्रयतमानसः । देहभेदं समासाद्य रुद्रलोकं स गच्छति
nityametadadhīyānaḥ śuciḥ prayatamānasaḥ | dehabhedaṁ samāsādya rudralokaṁ sa gacchati
इसे सदा पढ़ने वाला, शुद्ध तथा संयतचित्त पुरुष, शरीर-त्याग के पश्चात् रुद्रलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 177 (skanda.8.52.177)
थ इमं बहुपापनाशनं परमं रुद्रसमीपयोजनम् । पठते च गुणप्रसाधनं स मृतो याति न दीनसंभवम्
tha imaṁ bahupāpanāśanaṁ paramaṁ rudrasamīpayojanam | paṭhate ca guṇaprasādhanaṁ sa mṛto yāti na dīnasaṁbhavam
और जो कोई इस अनेक पापों का नाश करने वाले, रुद्र के सामीप्य को देने वाले तथा गुणों को सिद्ध करने वाले स्तोत्र का पाठ करता है, वह मरने पर दीन जन्म को प्राप्त नहीं होता।