अम्बिका खण्ड · अध्याय 53
देवी को वर देने ब्रह्मा का प्रयाण
श्लोक 1 (skanda.8.53.1)
व्यास उवाच। । देवी भगवती सा हि हिमवत्तनयाव्यया । कियन्तं कालमचरत्तपः परमदुश्चरम्
vyāsa uvāca| | devī bhagavatī sā hi himavattanayāvyayā | kiyantaṁ kālamacarattapaḥ paramaduścaram
व्यास ने कहा — वह भगवती अव्यया, हिमवान् की पुत्री देवी, कितने समय तक उस परम दुष्कर तप का आचरण करती रहीं?
श्लोक 2 (skanda.8.53.2)
कथं लब्धवती चापि वरं वरशतारणिः
kathaṁ labdhavatī cāpi varaṁ varaśatāraṇiḥ
और सैकड़ों वरों की उत्पत्ति-स्थल वह देवी कैसे वर को प्राप्त हुईं?
श्लोक 3 (skanda.8.53.3)
एतदिच्छामि कथितं सर्व वै द्विजसत्तम
etadicchāmi kathitaṁ sarva vai dvijasattama
हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 4 (skanda.8.53.4)
सनत्कुमार उवाच। । शृणु काले व्यतीते हि तपो देव्याः सुदुश्चरम् । प्रयता प्राञ्जलिर्भूत्वा समाधाय मनस्तथा
sanatkumāra uvāca| | śṛṇu kāle vyatīte hi tapo devyāḥ suduścaram | prayatā prāñjalirbhūtvā samādhāya manastathā
सनत्कुमार ने कहा — समय बीतने पर देवी के अत्यंत दुष्कर तप को सुनो। संयमित होकर, हाथ जोड़कर तथा मन को स्थिर करके...
श्लोक 5 (skanda.8.53.5)
दिवाकरेभिसन्धाय चक्षुषी मन एव च । तस्थौ वृक्षावबद्धेव दार्वर्च्चानिमिषेक्षणा
divākarebhisandhāya cakṣuṣī mana eva ca | tasthau vṛkṣāvabaddheva dārvarccānimiṣekṣaṇā
अपनी दोनों आँखों तथा मन को सूर्य पर केन्द्रित करके, वे वृक्ष से बँधी हुई सी, काठ की प्रतिमा के समान अपलक दृष्टि से खड़ी रहीं।
श्लोक 6 (skanda.8.53.6)
सुवर्चलेन सादित्यमीक्षती पर्यवर्तत
suvarcalena sādityamīkṣatī paryavartata
सुवर्चला के सहित सूर्य को निहारती हुई वे उसके साथ घूमती रहीं।
श्लोक 7 (skanda.8.53.7)
एकपादोर्ध्वबाहुश्च निरुच्छ्वासा बभूव ह
ekapādordhvabāhuśca nirucchvāsā babhūva ha
एक पैर पर खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाकर, वे श्वासरहित हो गयीं।
श्लोक 8 (skanda.8.53.8)
दिव्यं वर्षसहस्रं सा निश्चलोपलवत् स्थिता । व्याघ्रद्वितीया रुद्राणी तपोयुक्ता शुभव्रता
divyaṁ varṣasahasraṁ sā niścalopalavat sthitā | vyāghradvitīyā rudrāṇī tapoyuktā śubhavratā
एक हजार दिव्य वर्षों तक वे पत्थर के समान अचल रहीं; व्याघ्र के साथ रहने वाली रुद्राणी तप में लीन, शुभव्रता।
श्लोक 9 (skanda.8.53.9)
न चास्या ग्लानिरभवन्न बलक्षय एव वा । पूर्ववच्च हि सा देवी तपसो वावतिष्ठत
na cāsyā glānirabhavanna balakṣaya eva vā | pūrvavacca hi sā devī tapaso vāvatiṣṭhata
न तो उन्हें थकान हुई और न ही बल की हानि; वह देवी पूर्ववत् तप में स्थिर रहीं।
श्लोक 10 (skanda.8.53.10)
तस्यास्तपःप्रभावेण सर्वं सस्थाणुजंगमम्
tasyāstapaḥprabhāveṇa sarvaṁ sasthāṇujaṁgamam
उनके तप के प्रभाव से समस्त स्थावर-जंगम जगत्...
श्लोक 11 (skanda.8.53.11)
अभावोपहतं यद्वज्जगदार्त्तमतिष्ठत
abhāvopahataṁ yadvajjagadārttamatiṣṭhata
जैसे अभाव से आहत हो, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् पीड़ित हो गया।
श्लोक 12 (skanda.8.53.12)
नातिदीप्तोभवत् सूर्यश्चन्द्रमा न प्रकाशते
nātidīptobhavat sūryaścandramā na prakāśate
सूर्य अत्यंत तेजस्वी नहीं रहा और चन्द्रमा प्रकाशित नहीं हुआ।
श्लोक 13 (skanda.8.53.13)
ज्योतींषि तिमिराण्यासन् व्योम्नि सिद्धा न यान्ति च
jyotīṁṣi timirāṇyāsan vyomni siddhā na yānti ca
ज्योतियाँ अंधकारमय हो गयीं और आकाश में सिद्धगण विचरण नहीं कर सके।
श्लोक 14 (skanda.8.53.14)
मम्लुश्च देवमाल्यानि विमानानि च पेतिरे
mamluśca devamālyāni vimānāni ca petire
देवताओं की मालाएँ मुरझा गयीं और विमान गिर पड़े।
श्लोक 15 (skanda.8.53.15)
स्वर्गेपि न सुखं तेषामौत्सुक्यं चापि जायते
svargepi na sukhaṁ teṣāmautsukyaṁ cāpi jāyate
स्वर्ग में भी उन्हें सुख नहीं मिला और व्याकुलता उत्पन्न हो गयी।
श्लोक 16 (skanda.8.53.16)
धूमायन्ति दिशः सर्वास्त्रैलोक्यञ्चैव कृत्स्नशः । विद्याधृतां गतिर्भग्ना प्रज्वलन्त्यायुधानि च
dhūmāyanti diśaḥ sarvāstrailokyañcaiva kṛtsnaśaḥ | vidyādhṛtāṁ gatirbhagnā prajvalantyāyudhāni ca
सभी दिशाएँ तथा सम्पूर्ण त्रिलोक धूम्रवत् हो गये; विद्याधरों की गति भंग हो गयी और शस्त्र स्वयं प्रज्वलित हो उठे।
श्लोक 17 (skanda.8.53.17)
मृगा व्याघ्राश्च सिंहाश्च विडालोलूकमूषिकाः
mṛgā vyāghrāśca siṁhāśca viḍālolūkamūṣikāḥ
मृग, बाघ, सिंह, बिल्ली, उल्लू और चूहे...
श्लोक 18 (skanda.8.53.18)
पन्नगा नकुलाश्चैव एकस्थाः सञ्चरन्त्युत
pannagā nakulāścaiva ekasthāḥ sañcarantyuta
तथा सर्प और नेवले एक ही स्थान पर साथ-साथ विचरने लगे।
श्लोक 19 (skanda.8.53.19)
ततो देवाः समागत्य ऊचुः सर्वे परस्परम् । विपर्ययोयं नाकस्मात् त्रैलोक्यस्यास्य दृश्यते
tato devāḥ samāgatya ūcuḥ sarve parasparam | viparyayoyaṁ nākasmāt trailokyasyāsya dṛśyate
तब देवगण एकत्र होकर आपस में कहने लगे — 'त्रिलोक की यह विपरीतता अकारण नहीं दिखाई देती।'
श्लोक 20 (skanda.8.53.20)
कारणं महदत्रास्ति नेदं निष्कारणं भवेत् । तस्माद्वयमजानन्त एतं सर्व विपर्ययम्
kāraṇaṁ mahadatrāsti nedaṁ niṣkāraṇaṁ bhavet | tasmādvayamajānanta etaṁ sarva viparyayam
'इसका कोई बड़ा कारण अवश्य है; यह अकारण नहीं हो सकता। अतः इस समस्त विपर्यय को न जानते हुए हम...'
श्लोक 21 (skanda.8.53.21)
किन्तिष्ठामः समुद्विग्ना गच्छाम ब्रह्मणोन्तिकम् । इत्युक्त्वा ते सुराः सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः
kintiṣṭhāmaḥ samudvignā gacchāma brahmaṇontikam | ityuktvā te surāḥ sarve bṛhaspatipurogamāḥ
'—हम व्याकुल होकर क्यों बैठे रहें? चलो, ब्रह्मा के समीप चलें।' ऐसा कहकर बृहस्पति को आगे करके वे सभी देवगण...
श्लोक 22 (skanda.8.53.22)
वैराजभवनं गत्वा ब्रह्माणं संप्रणेमिरे
vairājabhavanaṁ gatvā brahmāṇaṁ saṁpraṇemire
वैराज भवन में जाकर उन्होंने ब्रह्मा को भलीभाँति प्रणाम किया।
श्लोक 23 (skanda.8.53.23)
पूजिता ब्रह्मणा सम्यगुपविष्टा यथार्हतः
pūjitā brahmaṇā samyagupaviṣṭā yathārhataḥ
ब्रह्मा द्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर वे यथायोग्य आसनों पर बैठे।
श्लोक 24 (skanda.8.53.24)
पृष्टास्तेनागमे हेतुमूचु र्हृच्छोकपीडिताः । भगवन् लोकतत्त्वं च सर्वं प्रत्यक्षवद् विभोः
pṛṣṭāstenāgame hetumūcu rhṛcchokapīḍitāḥ | bhagavan lokatattvaṁ ca sarvaṁ pratyakṣavad vibhoḥ
उनके आने का कारण पूछे जाने पर, हृदय में शोक से पीड़ित वे बोले — 'हे भगवन्! हे विभो! समस्त लोकतत्त्व आपके लिये प्रत्यक्ष के समान है।'
श्लोक 25 (skanda.8.53.25)
लोकोयं विपरीतोद्य किमर्थं शंस नः प्रभो
lokoyaṁ viparītodya kimarthaṁ śaṁsa naḥ prabho
'यह लोक आज विपरीत हो गया है; हे प्रभो! हमें बताइये किस कारण से।'
श्लोक 26 (skanda.8.53.26)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भीतानां सर्वयोगवित्
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā bhītānāṁ sarvayogavit
उन भयभीत देवताओं के उस वचन को सुनकर, समस्त योग को जानने वाले ब्रह्मा ने...
श्लोक 27 (skanda.8.53.27)
उवाच मधुरं श्लक्ष्णमिदं गम्भीरवद्वचः । एषा हैमवती देवी रुद्राणी लोकधारणी
uvāca madhuraṁ ślakṣṇamidaṁ gambhīravadvacaḥ | eṣā haimavatī devī rudrāṇī lokadhāraṇī
मधुर, कोमल तथा गम्भीर वचन कहा — 'यह हिमालय-पुत्री देवी रुद्राणी, जो लोकों को धारण करने वाली हैं...'
श्लोक 28 (skanda.8.53.28)
तपश्चरति युक्तात्मा योगमास्थाय निश्चलम्
tapaścarati yuktātmā yogamāsthāya niścalam
'...संयमित आत्मा से, अचल योग में स्थित होकर तप कर रही हैं।'
श्लोक 29 (skanda.8.53.29)
अद्य वर्षसहस्रं हि दिव्यं तस्याः समाधिना । वर्षाणां द्वे शते चैव तथान्यच्छरदां शतम्
adya varṣasahasraṁ hi divyaṁ tasyāḥ samādhinā | varṣāṇāṁ dve śate caiva tathānyaccharadāṁ śatam
'आज उनके समाधि में एक हजार दिव्य वर्ष हो चुके हैं — दो सौ वर्ष तथा अन्य सौ शरद ऋतुएँ...'
श्लोक 30 (skanda.8.53.30)
तपश्चरन्त्या योगेन तस्यैषा तपसः सुराः । प्रभावो येन लोकानां विपरीतत्वमागतम्
tapaścarantyā yogena tasyaiṣā tapasaḥ surāḥ | prabhāvo yena lokānāṁ viparītatvamāgatam
'—इस प्रकार वे योग से तप कर रही हैं; हे सुरो! यह उन्हीं के तप का प्रभाव है, जिससे लोकों में यह विपरीतता आयी है।'
श्लोक 31 (skanda.8.53.31)
देवा ऊचुः। । यदि तस्याः प्रभावेण महोत्पातभयं त्विदम् । अतो भूयो दहेल्लोकाँस्तस्मात्तां सन्निवारय
devā ūcuḥ| | yadi tasyāḥ prabhāveṇa mahotpātabhayaṁ tvidam | ato bhūyo dahellokā~stasmāttāṁ sannivāraya
देवताओं ने कहा — 'यदि उन्हीं के प्रभाव से यह महान् उत्पात-भय उत्पन्न हुआ है, तो वे लोकों को और भी जला सकती हैं; अतः उन्हें रोकिये।'
श्लोक 32 (skanda.8.53.32)
सा हि देवी तपोयुक्ता अतो भूयो विभावरी । लोकानिमान् सहास्माभिर्दहेदपि न संशयः
sā hi devī tapoyuktā ato bhūyo vibhāvarī | lokānimān sahāsmābhirdahedapi na saṁśayaḥ
'क्योंकि वह देवी तप से युक्त, अत्यंत तेजोमयी हैं; वे हम सहित इन लोकों को भी भस्म कर सकती हैं, इसमें संशय नहीं।'
श्लोक 33 (skanda.8.53.33)
तस्माललोकहितार्थाय अस्माकं वचनादपि । तथा कुरु यथा साध्वी विनिवर्त्तेत शोभना
tasmālalokahitārthāya asmākaṁ vacanādapi | tathā kuru yathā sādhvī vinivartteta śobhanā
'अतः लोक-हित के लिये, हमारे कहने से भी, ऐसा उपाय कीजिये कि वह साध्वी, सुन्दरी देवी निवृत्त हो जायें।'
श्लोक 34 (skanda.8.53.34)
पितामह उवाच। । एवं भवतु गच्छध्वं निर्वृता भवता नघाः । वरप्रदानेनेष्टेन रुद्राणीं स्थापयाम्यहम्
pitāmaha uvāca| | evaṁ bhavatu gacchadhvaṁ nirvṛtā bhavatā naghāḥ | varapradāneneṣṭena rudrāṇīṁ sthāpayāmyaham
पितामह ने कहा — 'ऐसा ही हो; हे निष्पापो! तुम शान्त होकर जाओ। मैं रुद्राणी को अभीष्ट वर देकर शान्त करूँगा।'
श्लोक 35 (skanda.8.53.35)
गतेष्वथ तु देवेषु ब्रह्मा लोकपितामहः । विमानं काञ्चनं शुभ्रं वेदिकाशतसंकुलम्
gateṣvatha tu deveṣu brahmā lokapitāmahaḥ | vimānaṁ kāñcanaṁ śubhraṁ vedikāśatasaṁkulam
देवताओं के चले जाने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने एक स्वर्णिम, उज्ज्वल, सैकड़ों वेदिकाओं से युक्त विमान...
श्लोक 36 (skanda.8.53.36)
किङ्किणीजालसन्नद्धं मुक्तादामावभासितम् । इन्द्रनीलमयैः स्तम्भै र्जालैर्जाम्बूनदैस्तथा
kiṅkiṇījālasannaddhaṁ muktādāmāvabhāsitam | indranīlamayaiḥ stambhai rjālairjāmbūnadaistathā
—छोटी घंटियों के जाल से आबद्ध, मोतियों की मालाओं से प्रकाशित, नीलम के स्तम्भों तथा स्वर्ण-जालों से युक्त...
श्लोक 37 (skanda.8.53.37)
घंटाभिर्विश्वरूपाभिः समन्तात् परिवारितम्
ghaṁṭābhirviśvarūpābhiḥ samantāt parivāritam
सब ओर से नाना रूपों वाली घंटियों से घिरा हुआ।
श्लोक 38 (skanda.8.53.38)
वज्रेन्द्रनील वैदूर्यमहानीलादिभासितम्
vajrendranīla vaidūryamahānīlādibhāsitam
हीरे, इन्द्रनील, वैदूर्य, महानील आदि रत्नों से चमकता हुआ।
श्लोक 39 (skanda.8.53.39)
स्तूपिकाभिश्च योग्याभिः स्फाटिकाङ्काभिरावृतम्
stūpikābhiśca yogyābhiḥ sphāṭikāṅkābhirāvṛtam
उपयुक्त कलशों तथा स्फटिक-चिह्नों से आवृत्त।
श्लोक 40 (skanda.8.53.40)
सर्वलोहमयं तद् वै स्वयं देवेन निर्मितम्
sarvalohamayaṁ tad vai svayaṁ devena nirmitam
वह सम्पूर्ण रूप से धातुमय था, स्वयं देव द्वारा निर्मित।
श्लोक 41 (skanda.8.53.41)
पञ्च भूतमयं तद्धि प्रकृतिस्थमथापि च । शब्दाभिजालसम्बद्धं घण्टेन्द्रियसुशब्दवत्
pañca bhūtamayaṁ taddhi prakṛtisthamathāpi ca | śabdābhijālasambaddhaṁ ghaṇṭendriyasuśabdavat
वह पंचभूतमय तथा प्रकृतिस्थ भी था; ध्वनियों के जाल से युक्त, घंटियों की मधुर ध्वनि से इन्द्रियों के समान युक्त।
श्लोक 42 (skanda.8.53.42)
मुक्तादामाष्टकैर्युक्तं किङ्किणीषोडशावृतम् । विंशति र्वेदिकाश्चात्र विमानं तन्महाप्रभम्
muktādāmāṣṭakairyuktaṁ kiṅkiṇīṣoḍaśāvṛtam | viṁśati rvedikāścātra vimānaṁ tanmahāprabham
मोतियों की आठ मालाओं से युक्त, सोलह पंक्तियों की घंटियों से घिरा हुआ; उस महाप्रभावशाली विमान में बीस वेदिकाएँ थीं।
श्लोक 43 (skanda.8.53.43)
शतार्द्धलक्षणै र्दिव्यैर्मणिमूभि स्तथाचितम् । आसनैर्बहुभिर्युक्तं लोकस्थानैः समन्ततः
śatārddhalakṣaṇai rdivyairmaṇimūbhi stathācitam | āsanairbahubhiryuktaṁ lokasthānaiḥ samantataḥ
पचास दिव्य, शुभ लक्षणों वाले मणियों से भी अलंकृत; अनेक आसनों से युक्त तथा चारों ओर लोक-स्थानों सहित।
श्लोक 44 (skanda.8.53.44)
आरुरोह विमानं तद् ब्रह्मा स्वमुनिभि स्सह । वेदैः सह तथा मन्त्रैः शास्त्रैः सर्वै स्तथैव च
āruroha vimānaṁ tad brahmā svamunibhi ssaha | vedaiḥ saha tathā mantraiḥ śāstraiḥ sarvai stathaiva ca
ब्रह्मा अपने मुनियों के साथ, तथा वेदों, मन्त्रों और समस्त शास्त्रों के साथ उस विमान पर आरूढ़ हुए।
श्लोक 45 (skanda.8.53.45)
मध्ये तस्यासनं दिव्यं स्वर्णपद्मोपगं दृढम्
madhye tasyāsanaṁ divyaṁ svarṇapadmopagaṁ dṛḍham
उसके मध्य में स्वर्ण-कमल पर स्थित एक दृढ़ दिव्य आसन था।
श्लोक 46 (skanda.8.53.46)
सुखोपविष्टस्तत्रासौ ब्रह्मा लोकपितामहः
sukhopaviṣṭastatrāsau brahmā lokapitāmahaḥ
वहाँ लोकपितामह ब्रह्मा सुखपूर्वक विराजमान थे।
श्लोक 47 (skanda.8.53.47)
तस्य पार्श्वे तु सावित्री गायत्री चैव सुप्रभा । ऋग्वेदो दक्षिणेनास्य यजुर्वेदश्च पश्चिमे
tasya pārśve tu sāvitrī gāyatrī caiva suprabhā | ṛgvedo dakṣiṇenāsya yajurvedaśca paścime
उनके पास सावित्री तथा तेजस्विनी गायत्री थीं; उनके दाहिनी ओर ऋग्वेद और पश्चिम में यजुर्वेद थे।
श्लोक 48 (skanda.8.53.48)
उत्तरे सामवेदस्तु अग्रतोथर्वणस्तथा । प्रायश्चित्तानि धर्माश्च नियमाश्च तपांसि च
uttare sāmavedastu agratotharvaṇastathā | prāyaścittāni dharmāśca niyamāśca tapāṁsi ca
उत्तर में सामवेद तथा सामने अथर्ववेद थे; प्रायश्चित्त, धर्म, नियम तथा तप भी वहाँ थे...
श्लोक 49 (skanda.8.53.49)
दानानि च विचित्राणि क्रतवः सेष्टयस्तथा
dānāni ca vicitrāṇi kratavaḥ seṣṭayastathā
...विविध प्रकार के दान, यज्ञ तथा इष्टियाँ भी वहाँ थीं।
श्लोक 50 (skanda.8.53.50)
सप्तव्याहृतयः पुण्यास्तथा लोकाश्च सर्वशः
saptavyāhṛtayaḥ puṇyāstathā lokāśca sarvaśaḥ
सात पवित्र व्याहृतियाँ तथा समस्त लोक भी वहाँ थे।
श्लोक 51 (skanda.8.53.51)
पर्वताश्चैव नद्यश्च तथा लोकस्य मातरः । लोकपालाः प्रजाध्यक्षा दक्षो धर्मस्तथैव च
parvatāścaiva nadyaśca tathā lokasya mātaraḥ | lokapālāḥ prajādhyakṣā dakṣo dharmastathaiva ca
पर्वत और नदियाँ, तथा लोकमाताएँ; लोकपाल, प्रजापति, दक्ष तथा धर्म भी...
श्लोक 52 (skanda.8.53.52)
भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । मरीचिरङ्गिराश्चैव रुचिश्चैव महायशाः
bhṛguratrirvasiṣṭhaśca pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ | marīciraṅgirāścaiva ruciścaiva mahāyaśāḥ
भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, अंगिरा तथा महायशस्वी रुचि...
श्लोक 53 (skanda.8.53.53)
ऋभुः सनातनश्चैव विराजश्च महातपाः । पितरश्चैव देवाश्च ब्रह्मणो याः प्रसूतयः
ṛbhuḥ sanātanaścaiva virājaśca mahātapāḥ | pitaraścaiva devāśca brahmaṇo yāḥ prasūtayaḥ
ऋभु, सनातन तथा महातपस्वी विराज; पितरगण, देवगण तथा ब्रह्मा की सभी सन्तानें...
श्लोक 54 (skanda.8.53.54)
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिस्तथैव च
pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotistathaiva ca
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल तथा अग्नि...
श्लोक 55 (skanda.8.53.55)
एते चैव यथोद्दिष्टाः सागरा दिश एव च
ete caiva yathoddiṣṭāḥ sāgarā diśa eva ca
—ये सभी, जैसा वर्णित हुआ, तथा सागर एवं दिशाएँ भी...
श्लोक 56 (skanda.8.53.56)
विद्याश्च धर्मकाराश्च अग्रतस्तेवतस्थिरे । ब्रह्मदण्डश्च दण्डश्च कलशः काञ्चनस्तथा
vidyāśca dharmakārāśca agratastevatasthire | brahmadaṇḍaśca daṇḍaśca kalaśaḥ kāñcanastathā
—विद्याएँ तथा धर्मकर्ता उनके सामने खड़े थे; ब्रह्मदण्ड, दण्ड तथा स्वर्ण-कलश भी...
श्लोक 57 (skanda.8.53.57)
कमण्डलुश्च तस्यासीत् पार्श्वयोरुभयोरपि । यज्ञोपवीतं श्रीमच्च ओङ्कारश्च तथाग्रतः
kamaṇḍaluśca tasyāsīt pārśvayorubhayorapi | yajñopavītaṁ śrīmacca oṅkāraśca tathāgrataḥ
उनके दोनों ओर कमण्डलु था; तथा सामने श्रीमय यज्ञोपवीत और ओंकार भी थे।
श्लोक 58 (skanda.8.53.58)
अक्षसूत्रं च योगश्च जप्यं चैवाग्रतः स्थिताः
akṣasūtraṁ ca yogaśca japyaṁ caivāgrataḥ sthitāḥ
अक्षमाला, योग तथा जप भी सामने विराजमान थे।
श्लोक 59 (skanda.8.53.59)
स्वाहा स्वधा वषट् वौष डग्निश्चैतानि पार्श्वतः
svāhā svadhā vaṣaṭ vauṣa ḍagniścaitāni pārśvataḥ
स्वाहा, स्वधा, वषट्, वौषट् तथा अग्नि — ये उनके पास थे।
श्लोक 60 (skanda.8.53.60)
यमाश्च नियमाश्चैव साधनानि बहूनि च । धर्मस्यैतानि सर्वाणि पार्श्वस्थान्यभवँस्ततः
yamāśca niyamāścaiva sādhanāni bahūni ca | dharmasyaitāni sarvāṇi pārśvasthānyabhava~stataḥ
यम, नियम तथा साधन के अनेक अंग — धर्म से सम्बन्धित ये सभी वहाँ उनके पास उपस्थित हुए।
श्लोक 61 (skanda.8.53.61)
दया कृपाथ दानञ्च श्रद्धा चैव ह्रिया सह । ऋषीणां पार्श्वगाः सर्वा दक्षिणा यज्ञपार्श्वगा
dayā kṛpātha dānañca śraddhā caiva hriyā saha | ṛṣīṇāṁ pārśvagāḥ sarvā dakṣiṇā yajñapārśvagā
दया, करुणा, दान, श्रद्धा तथा लज्जा — ये सब ऋषियों के पास खड़ी थीं; दक्षिणा यज्ञ के पास खड़ी थी।
श्लोक 62 (skanda.8.53.62)
ततो देवाश्च ये केचिद् ब्रह्मलोकनिवासिनः । सर्वे समधिरुह्याशु समन्तादवतस्थिरे
tato devāśca ye kecid brahmalokanivāsinaḥ | sarve samadhiruhyāśu samantādavatasthire
तब ब्रह्मलोक में निवास करने वाले जो भी देवगण थे, वे सब शीघ्र चढ़कर चारों ओर स्थित हो गये।
श्लोक 63 (skanda.8.53.63)
एवं तेषु विमानं तत् समारूढेषु सर्वशः । सुखासीनेषु सर्वेषु ब्रह्मा समनुचोदयत्
evaṁ teṣu vimānaṁ tat samārūḍheṣu sarvaśaḥ | sukhāsīneṣu sarveṣu brahmā samanucodayat
इस प्रकार जब वे सभी उस विमान पर पूर्णतः आरूढ़ हो गये और सुखपूर्वक बैठ गये, तब ब्रह्मा ने उसे गति दी।
श्लोक 64 (skanda.8.53.64)
तच्चोदितं योगविदग्रगामिना महाविमानोत्तमसर्वगामिना
taccoditaṁ yogavidagragāminā mahāvimānottamasarvagāminā
योग के ज्ञाता, अग्रगामी उस महान् तथा सर्वगामी श्रेष्ठ विमान द्वारा वह गतिमान हुआ...
श्लोक 65 (skanda.8.53.65)
ययौ प्रभावेण मनोनुगामिना यथा मनः सर्वसृजेव हेतुना
yayau prabhāveṇa manonugāminā yathā manaḥ sarvasṛjeva hetunā
...और उनके प्रभाव से मन के समान वेगवान् होकर, समस्त सृष्टि के हेतु के समान, वह चल पड़ा।