अम्बिका खण्ड · अध्याय 54
मन्दराचल पर ब्रह्मा का आगमन
श्लोक 1 (skanda.8.54.1)
सनत्कुमार उवाच। । ततस्तेन विमानेन सर्वसृक् चतुराननः
sanatkumāra uvāca| | tatastena vimānena sarvasṛk caturānanaḥ
सनत्कुमार ने कहा — तब उस विमान में बैठकर सर्वसृष्टिकर्ता चतुरानन...
श्लोक 2 (skanda.8.54.2)
जगाम मन्दरं धीमान् विचित्रोपलकन्दरम्
jagāma mandaraṁ dhīmān vicitropalakandaram
बुद्धिमान् ब्रह्मा विचित्र शिलामय कन्दराओं वाले मन्दराचल को गये।
श्लोक 3 (skanda.8.54.3)
स तमासाद्य विस्तीर्णमनौपम्यमतिप्रभम् । दूराद् दृष्टिसुखं दृष्टवा सभास्थानिदमब्रवीत्
sa tamāsādya vistīrṇamanaupamyamatiprabham | dūrād dṛṣṭisukhaṁ dṛṣṭavā sabhāsthānidamabravīt
उस विशाल, अनुपम, अत्यंत तेजस्वी तथा दूर से ही नेत्रों को सुखद उस पर्वत को देखकर, सभा में उपस्थित होकर उन्होंने यह कहा —
श्लोक 4 (skanda.8.54.4)
इदं रुद्रगृहं शुभ्रमदृश्यं सुकृतामपि
idaṁ rudragṛhaṁ śubhramadṛśyaṁ sukṛtāmapi
'यह रुद्र का उज्ज्वल भवन है, जो पुण्यात्माओं के लिये भी अदृश्य है।'
श्लोक 5 (skanda.8.54.5)
देवानामपि पश्यध्वं भास्कराकारवर्चसम्
devānāmapi paśyadhvaṁ bhāskarākāravarcasam
'देखो, इसका तेज देवताओं के लिये भी सूर्य के समान है।'
श्लोक 6 (skanda.8.54.6)
इदं प्रविश्य देवानां यज्ञश्रीर्नापसर्पति । जयश्च नित्यं युद्धेषु धर्मश्च सुमहानपि
idaṁ praviśya devānāṁ yajñaśrīrnāpasarpati | jayaśca nityaṁ yuddheṣu dharmaśca sumahānapi
'यहाँ प्रवेश करने पर देवताओं की यज्ञ-श्री कभी दूर नहीं होती; युद्धों में सदा विजय तथा महान् धर्म भी प्राप्त होता है।'
श्लोक 7 (skanda.8.54.7)
एतत् सृष्टं स्वयं तेन मनसानुपमद्युति । न ह्यस्य सदृशं किञ्चिदण्डेस्मिन् विद्यते गृहम्
etat sṛṣṭaṁ svayaṁ tena manasānupamadyuti | na hyasya sadṛśaṁ kiñcidaṇḍesmin vidyate gṛham
'अनुपम कान्ति वाला यह भवन उन्होंने स्वयं अपने मन से रचा है; इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में इसके समान कोई अन्य भवन नहीं है।'
श्लोक 8 (skanda.8.54.8)
इदं प्रविश्य धर्मात्मा भूयो दुःखं न विन्दति
idaṁ praviśya dharmātmā bhūyo duḥkhaṁ na vindati
'यहाँ प्रवेश करके धर्मात्मा पुरुष पुनः दुःख को नहीं पाता।'
श्लोक 9 (skanda.8.54.9)
न चापि जन्म प्राप्नोति नित्यमैश्वर्यगो हि सः
na cāpi janma prāpnoti nityamaiśvaryago hi saḥ
'और वह पुनर्जन्म भी प्राप्त नहीं करता; क्योंकि वह सदा ऐश्वर्य को प्राप्त रहता है।'
श्लोक 10 (skanda.8.54.10)
अनिर्देश्यमिदं योगाद् योगिनामपि नित्यशः । अन्यस्तु कुत एवेदं वर्णयीत महानपि
anirdeśyamidaṁ yogād yogināmapi nityaśaḥ | anyastu kuta evedaṁ varṇayīta mahānapi
'यह योगियों के लिये भी सदा योग द्वारा अवर्णनीय है; तो फिर कोई अन्य, चाहे वह कितना भी महान् क्यों न हो, इसका वर्णन कैसे कर सकता है?'
श्लोक 11 (skanda.8.54.11)
एतदस्मद्विमानस्य वायुनाभ्याहतं रुषा । वर्धते गिरिणा सार्धं विन्ध्यस्य शिखरं यथा
etadasmadvimānasya vāyunābhyāhataṁ ruṣā | vardhate giriṇā sārdhaṁ vindhyasya śikharaṁ yathā
'हमारे विमान के वायु से क्रोधपूर्वक टकराकर यह पर्वत के साथ ही विन्ध्य के शिखर के समान बढ़ने लगता है।'
श्लोक 12 (skanda.8.54.12)
एतदस्मद्विमानस्य मार्गमावृत्यधिष्ठितम् । ऊर्ध्वं तिर्यगधस्ताच्च देवदेवस्य तेजसा
etadasmadvimānasya mārgamāvṛtyadhiṣṭhitam | ūrdhvaṁ tiryagadhastācca devadevasya tejasā
'यह हमारे विमान के मार्ग को घेरकर, ऊपर, आड़े तथा नीचे, देवाधिदेव के तेज से स्थित हो गया है।'
श्लोक 13 (skanda.8.54.13)
एतदन्धं तमः कृत्वा मेधोसौ जीवनः स्वयम् । वज्रोद्यतकरः स्रग्वी प्रत्युद्यात्यभिनादयन्
etadandhaṁ tamaḥ kṛtvā medhosau jīvanaḥ svayam | vajrodyatakaraḥ sragvī pratyudyātyabhinādayan
'इस अंधकार को उत्पन्न करके वह जीवंत मेघ स्वयं, वज्र के समान उठे हुए हाथ के साथ, माला पहने हुए, गर्जन करता हुआ आगे बढ़ता है।'
श्लोक 14 (skanda.8.54.14)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स भगवान्देवो ब्रह्मा लोकपितामहः । विष्टभ्य तत् विमानाग्य्रमवतस्थे कृताञ्जलिः
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa bhagavāndevo brahmā lokapitāmahaḥ | viṣṭabhya tat vimānāgyramavatasthe kṛtāñjaliḥ
सनत्कुमार ने कहा — तब वे भगवान् देव, लोकपितामह ब्रह्मा, उस श्रेष्ठ विमान को रोककर हाथ जोड़कर स्थिर हो गये।
श्लोक 15 (skanda.8.54.15)
तुष्टाव च तदा देवं शर्वमुग्रं कपर्दिनम् । ते चैव ऋषयः सर्वे विमानस्था सुसंयताः
tuṣṭāva ca tadā devaṁ śarvamugraṁ kapardinam | te caiva ṛṣayaḥ sarve vimānasthā susaṁyatāḥ
उन्होंने तब उग्र, जटाधारी शर्व देव की स्तुति की; तथा विमान में बैठे हुए सभी संयमी ऋषियों ने भी...
श्लोक 16 (skanda.8.54.16)
प्रकाशं चक्रिरे सर्वं जगत् स्थावरजंगमम् । ततस्स मेघः स्वं स्थानमगमद् वृष्टिसर्जनः
prakāśaṁ cakrire sarvaṁ jagat sthāvarajaṁgamam | tatassa meghaḥ svaṁ sthānamagamad vṛṣṭisarjanaḥ
...सम्पूर्ण चराचर जगत् को प्रकाशित कर दिया। तब वह वर्षाकारक मेघ अपने स्थान को चला गया।
श्लोक 17 (skanda.8.54.17)
दिशश्च विमलाः सर्वाः प्रकाशश्चाभवद् भृशम् । तं जपन्तं विदित्वा च भगवान् गोवृषध्वजः
diśaśca vimalāḥ sarvāḥ prakāśaścābhavad bhṛśam | taṁ japantaṁ viditvā ca bhagavān govṛṣadhvajaḥ
सभी दिशाएँ निर्मल हो गयीं और अत्यंत प्रकाश फैल गया। और उसे जपते हुए जानकर वृषभध्वज भगवान् ने...
श्लोक 18 (skanda.8.54.18)
नन्दिनं द्वारदेशस्थमिदमाह सुरेश्वरः
nandinaṁ dvāradeśasthamidamāha sureśvaraḥ
देवेश्वर ने द्वार पर स्थित नन्दी से यह कहा —
श्लोक 19 (skanda.8.54.19)
एष ब्रह्मा विमानेन मामिह द्रष्टुमागतः
eṣa brahmā vimānena māmiha draṣṭumāgataḥ
'यह ब्रह्मा विमान में बैठकर मुझसे मिलने यहाँ आये हैं।'
श्लोक 20 (skanda.8.54.20)
ब्रूहि येनागतोसीह कार्येण विदितोसि मे । कुरु तद् गच्छ शीघ्रं तु कालस्तस्यायमागतः
brūhi yenāgatosīha kāryeṇa viditosi me | kuru tad gaccha śīghraṁ tu kālastasyāyamāgataḥ
'पूछो, वे किस कार्य से यहाँ आये हैं, मुझे बताओ। यह करो और शीघ्र जाओ, क्योंकि उनका समय आ गया है।'
श्लोक 21 (skanda.8.54.21)
सनत्कुमार उवाच। । स एवमुक्तो रुद्रेण नन्दी प्रमथनायकः
sanatkumāra uvāca| | sa evamukto rudreṇa nandī pramathanāyakaḥ
सनत्कुमार ने कहा — रुद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, प्रमथनायक नन्दी...
श्लोक 22 (skanda.8.54.22)
द्वाःस्थ एव विमानस्थं ब्रह्माणमिदमब्रवीत्
dvāḥstha eva vimānasthaṁ brahmāṇamidamabravīt
—द्वार पर ही खड़े होकर विमान में बैठे ब्रह्मा से यह कहा —
श्लोक 23 (skanda.8.54.23)
नन्द्युवाच यूयं ज्ञाता भगवता येन कार्येण चागताः । कुरुध्वं किल तच्छीघ्रं कालोयं तस्य वर्तते
nandyuvāca yūyaṁ jñātā bhagavatā yena kāryeṇa cāgatāḥ | kurudhvaṁ kila tacchīghraṁ kāloyaṁ tasya vartate
नन्दी ने कहा — 'आप भगवान् को ज्ञात हैं कि किस कार्य से आये हैं। शीघ्र वह कार्य कीजिये; यही उसका समय है।'
श्लोक 24 (skanda.8.54.24)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स कृत्वा मनसा नमस्कारं हि शम्भवे । प्रदक्षिणमुपावृत्य मन्दरं प्रजगाम ह
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa kṛtvā manasā namaskāraṁ hi śambhave | pradakṣiṇamupāvṛtya mandaraṁ prajagāma ha
सनत्कुमार ने कहा — तब मन ही मन शम्भु को प्रणाम करके तथा प्रदक्षिणा करके वे मन्दराचल से चले गये।
श्लोक 25 (skanda.8.54.25)
स मन्दरगिरिं सर्वं परिहृत्य महामनाः । शाकद्वीपस्य मध्येन जम्बूद्वीपमुपागमत्
sa mandaragiriṁ sarvaṁ parihṛtya mahāmanāḥ | śākadvīpasya madhyena jambūdvīpamupāgamat
वह महामना समस्त मन्दराचल को पीछे छोड़कर, शाकद्वीप के मध्य से होते हुए जम्बूद्वीप को आये।
श्लोक 26 (skanda.8.54.26)
स दृश्यमानो देवैश्च मुनिभिश्च यतव्रतैः । हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठमुपागम्येदमब्रवीत्
sa dṛśyamāno devaiśca munibhiśca yatavrataiḥ | himavantaṁ giriśreṣṭhamupāgamyedamabravīt
देवताओं तथा संयमी मुनियों द्वारा देखे जाते हुए वे गिरिश्रेष्ठ हिमवान् के समीप पहुँचकर यह बोले —
श्लोक 27 (skanda.8.54.27)
एतद्धिमवतः शृङ्गमुच्छ्रितं कान्तिमत् स्थितम् । युगान्तादित्यसंकाशं दूरात् समभिलक्ष्यते
etaddhimavataḥ śṛṅgamucchritaṁ kāntimat sthitam | yugāntādityasaṁkāśaṁ dūrāt samabhilakṣyate
'यह हिमवान् का शिखर है, ऊँचा तथा कान्तिमान् खड़ा है, प्रलयकालीन सूर्य के समान, दूर से ही दिखाई देता है।'
श्लोक 28 (skanda.8.54.28)
अत्र सा जगतो धात्री धात्री पुत्रमिवौरसम् । पालयन्ती जगत् सर्वं तपस्तप्यति शैलजा
atra sā jagato dhātrī dhātrī putramivaurasam | pālayantī jagat sarvaṁ tapastapyati śailajā
'यहाँ वे जगत् की धात्री, पर्वत-पुत्री, समस्त जगत् की रक्षा करती हुई, जैसे धाय अपने ही पुत्र की रक्षा करे, तप कर रही हैं।'
श्लोक 29 (skanda.8.54.29)
अहो नु शिखरं पुण्यं भाग्यवच्चापि सर्वथा । यदेनं गिरिपुत्र्यर्थे वरैर्योक्ष्यति कामहा
aho nu śikharaṁ puṇyaṁ bhāgyavaccāpi sarvathā | yadenaṁ giriputryarthe varairyokṣyati kāmahā
'अहो! यह शिखर कितना पुण्यशाली और सर्वथा सौभाग्यशाली है, कि कामहन्ता स्वयं पर्वत-पुत्री के लिये इसे वरों से युक्त करेंगे!'
श्लोक 30 (skanda.8.54.30)
पश्यध्वं तपसो वीर्यं देव्याः सुचरितस्य वै । यदेतच्छिखरं दृष्टवा न पश्याम पुनर्भवम्
paśyadhvaṁ tapaso vīryaṁ devyāḥ sucaritasya vai | yadetacchikharaṁ dṛṣṭavā na paśyāma punarbhavam
'देखो, देवी के सुचरित तप की शक्ति — कि इस शिखर को देखकर हम पुनर्जन्म को नहीं देखेंगे।'
श्लोक 31 (skanda.8.54.31)
स एवं कथयन्नेव विमानेन चतुर्मुखः । ऋषिभिः सहितः सर्वैः शिखरद्वारमागतः
sa evaṁ kathayanneva vimānena caturmukhaḥ | ṛṣibhiḥ sahitaḥ sarvaiḥ śikharadvāramāgataḥ
इस प्रकार कहते-कहते ही चतुर्मुख ब्रह्मा विमान में सभी ऋषियों के साथ शिखर के द्वार पर पहुँच गये।
श्लोक 32 (skanda.8.54.32)
तत्रैनं रुद्रसचिवा उद्यतायुधपाणयः
tatrainaṁ rudrasacivā udyatāyudhapāṇayaḥ
वहाँ रुद्र के सचिव, हाथों में शस्त्र उठाये हुए...
श्लोक 33 (skanda.8.54.33)
भर्त्सयन्तोभ्यवर्तन्त तिष्ठतिष्ठेतिवादिनः
bhartsayantobhyavartanta tiṣṭhatiṣṭhetivādinaḥ
उन्हें डाँटते हुए तथा 'रुको, रुको' कहते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 34 (skanda.8.54.34)
तान् ब्रह्मा श्लक्ष्णाया वाचा सान्त्वपूर्वमुवाच ह । प्रशंसमानस्तान्सर्वान् प्राञ्जलिर्मुक्तमानसः
tān brahmā ślakṣṇāyā vācā sāntvapūrvamuvāca ha | praśaṁsamānastānsarvān prāñjalirmuktamānasaḥ
ब्रह्मा ने उन्हें कोमल तथा सान्त्वनापूर्ण वाणी से सम्बोधित किया, हाथ जोड़कर तथा निश्चिंत मन से उन सबकी प्रशंसा करते हुए।
श्लोक 35 (skanda.8.54.35)
ब्रह्मोवाच यूयं सर्वे महात्मनान ऐश्वर्येण समन्विताः । अक्षया ह्यमराश्चैव तथाप्रतिहताश्च ह
brahmovāca yūyaṁ sarve mahātmanāna aiśvaryeṇa samanvitāḥ | akṣayā hyamarāścaiva tathāpratihatāśca ha
ब्रह्मा ने कहा — 'आप सभी महात्मा तथा ऐश्वर्य से युक्त हैं; अक्षय, अमर तथा अप्रतिहत भी हैं।'
श्लोक 36 (skanda.8.54.36)
महायोगबलोपेता अजय्या युधि केनचित् । को युष्मानतिवर्तेत शक्रोपि प्रवरेश्वराः
mahāyogabalopetā ajayyā yudhi kenacit | ko yuṣmānativarteta śakropi pravareśvarāḥ
'महायोगबल से युक्त, युद्ध में किसी के द्वारा भी अजेय — हे श्रेष्ठ ईश्वरो! इन्द्र भी तुम्हें कैसे पराजित कर सकते हैं?'
श्लोक 37 (skanda.8.54.37)
देवदेवाज्ञया योहमागतो मन्दरादिह । देव्या वरप्रदानार्थमनुज्ञा क्रियतां मम
devadevājñayā yohamāgato mandarādiha | devyā varapradānārthamanujñā kriyatāṁ mama
'देवाधिदेव की आज्ञा से मैं यहाँ मन्दराचल से आया हूँ, देवी को वर प्रदान करने के लिये; मुझे अनुमति दीजिये।'
श्लोक 38 (skanda.8.54.38)
गणेश्वरा ऊचुः। । देव्या दाता स्वयं देवो वरानिष्टान् महामनाः । वरं हि देवी त्वन्यस्मान् मनसापि न चिन्तयेत्
gaṇeśvarā ūcuḥ| | devyā dātā svayaṁ devo varāniṣṭān mahāmanāḥ | varaṁ hi devī tvanyasmān manasāpi na cintayet
गणेश्वरों ने कहा — 'महामना देव स्वयं देवी को अभीष्ट वर देने वाले हैं; देवी तो किसी अन्य से वर की कल्पना मन से भी नहीं करतीं।'
श्लोक 39 (skanda.8.54.39)
शक्तो देवोनुग्रहीतुं जगत्सर्वं महेश्वरः
śakto devonugrahītuṁ jagatsarvaṁ maheśvaraḥ
'महेश्वर देव समस्त जगत् पर अनुग्रह करने में समर्थ हैं।'
श्लोक 40 (skanda.8.54.40)
त्वामप्येषोनुगृहणाति किमु देवीं जगत्पतिः
tvāmapyeṣonugṛhaṇāti kimu devīṁ jagatpatiḥ
'वे जगत्पति आपको भी अनुगृहीत करते हैं, तो देवी को क्यों नहीं करेंगे?'
श्लोक 41 (skanda.8.54.41)
पितामह उवाच। । अशक्तो न महादेवो वरं दातुं महामनाः । य एवं चिन्तयेद् देवं न भवेत् स कथञ्चन
pitāmaha uvāca| | aśakto na mahādevo varaṁ dātuṁ mahāmanāḥ | ya evaṁ cintayed devaṁ na bhavet sa kathañcana
पितामह ने कहा — 'ऐसा नहीं कि महामना महादेव वर देने में असमर्थ हैं; जो देव के विषय में ऐसा सोचे, वह कदापि उचित नहीं है।'
श्लोक 42 (skanda.8.54.42)
न देवी भगवत्पार्श्वादिच्छते किल पार्वती
na devī bhagavatpārśvādicchate kila pārvatī
'वास्तव में पार्वती स्वयं भगवान् के पास से वर नहीं चाहतीं...'
श्लोक 43 (skanda.8.54.43)
वरानिष्टाँस्ततो देवो मामिह प्रैषयच्छिवः
varāniṣṭā~stato devo māmiha praiṣayacchivaḥ
'—इसीलिये देव शिव ने अभीष्ट वरों सहित मुझे यहाँ भेजा है।'
श्लोक 44 (skanda.8.54.44)
सनत्कुमार उवाच। । अथ ते युक्तमनसो युक्तं प्रत्यक्षमीश्वराः । महेश्वरमपश्यन्त कृतानुज्ञं च लोकपम्
sanatkumāra uvāca| | atha te yuktamanaso yuktaṁ pratyakṣamīśvarāḥ | maheśvaramapaśyanta kṛtānujñaṁ ca lokapam
सनत्कुमार ने कहा — तब उन ईश्वरों ने मन में समझ लिया, मानो प्रत्यक्ष देख लिया हो, कि लोकपाल महेश्वर ने अनुमति दे दी है।
श्लोक 45 (skanda.8.54.45)
नियुक्ताश्च पुनः सर्वे ब्रह्माणं लोककारणम् । ऊचुर्गणेश्वराँस्तत्र विदितार्था महामुने
niyuktāśca punaḥ sarve brahmāṇaṁ lokakāraṇam | ūcurgaṇeśvarā~statra viditārthā mahāmune
हे महामुने! तब उन गणेश्वरों ने, अपना उद्देश्य जान लेने पर, वहाँ लोककारण ब्रह्मा से यह कहा —
श्लोक 46 (skanda.8.54.46)
प्रेषितो देवदेवेन ज्ञातोस्माभिः पितामह । त्वं विशस्वाधुना देव पार्वत्या वरदित्सया
preṣito devadevena jñātosmābhiḥ pitāmaha | tvaṁ viśasvādhunā deva pārvatyā varaditsayā
'हे पितामह! आप देवाधिदेव द्वारा भेजे गये हैं — यह हमें ज्ञात हो गया है। हे देव! अब पार्वती को वर देने की इच्छा से भीतर प्रवेश कीजिये।'
श्लोक 47 (skanda.8.54.47)
अवतीर्य विमानात्तु ततः शीघ्रं पितामहः । निलिल्ये शिखरे तस्मिन्नानाधातुविचित्रिते
avatīrya vimānāttu tataḥ śīghraṁ pitāmahaḥ | nililye śikhare tasminnānādhātuvicitrite
तब विमान से शीघ्र उतरकर पितामह उस विविध धातुओं से चित्रित शिखर पर छिप गये।
श्लोक 48 (skanda.8.54.48)
अथ सोपलधातुनिर्झरो गिरिराजोतिमहाशिलोच्चयः
atha sopaladhātunirjharo girirājotimahāśiloccayaḥ
तब वह पर्वतराज, जो शिलामय धातुओं तथा झरनों से युक्त, विशाल शिलाओं का महान् संचय था...
श्लोक 49 (skanda.8.54.49)
विनिसृष्टदिवाकरामलो दिदिवे दिव्य इवोदयाचलः
vinisṛṣṭadivākarāmalo didive divya ivodayācalaḥ
—सूर्य की निर्मल किरणों से युक्त होकर, वह दिव्य उदयाचल के समान चमकने लगा।