अम्बिका खण्ड · अध्याय 55
सोमनन्दी तथा देवी को वरप्रदान
श्लोक 1 (skanda.8.55.1)
सनत्कुमार उवाच। । अथ तं सहसायातमपश्यत्साचलात्मजा । ऋषिभिस्तैर्महाभागैस्समन्तात्परिवारितम्
sanatkumāra uvāca| | atha taṁ sahasāyātamapaśyatsācalātmajā | ṛṣibhistairmahābhāgaissamantātparivāritam
सनत्कुमार ने कहा — तब पर्वत-पुत्री ने उन्हें अचानक आया हुआ, उन महाभाग्यशाली ऋषियों से चारों ओर घिरा हुआ देखा...
श्लोक 2 (skanda.8.55.2)
रश्मिभिस्तेजसां योनिं मध्याह्न इव भास्करम् । सा तमर्घेण पाद्येन मधुपर्केण चैव हि
raśmibhistejasāṁ yoniṁ madhyāhna iva bhāskaram | sā tamargheṇa pādyena madhuparkeṇa caiva hi
—किरणों से युक्त, मध्याह्न के सूर्य के समान, तेज के उद्गम स्रोत। उन्होंने अर्घ्य, पाद्य तथा मधुपर्क से...
श्लोक 3 (skanda.8.55.3)
पूजयामास रुद्राणी चतुर्वक्त्रमुपागतम्
pūjayāmāsa rudrāṇī caturvaktramupāgatam
रुद्राणी ने आये हुए चतुर्मुख ब्रह्मा की पूजा की।
श्लोक 4 (skanda.8.55.4)
ब्रह्मोवाच लोकस्य जननी भूत्वा धारयित्वा जगत्तथा । किमिदं तपसा भूयो लोकं दग्धुमिहेच्छसि
brahmovāca lokasya jananī bhūtvā dhārayitvā jagattathā | kimidaṁ tapasā bhūyo lokaṁ dagdhumihecchasi
ब्रह्मा ने कहा — 'लोक की जननी होकर तथा जगत् को धारण करके भी, तुम इस तप से पुनः लोक को जलाना क्यों चाहती हो?'
श्लोक 5 (skanda.8.55.5)
मा सृष्ट्वा जगदेतत्त्वं तपस्यन्ती विनाशय । बुद्ध्वैवं धारयस्वेमं लोकं देवि नमस्तव
mā sṛṣṭvā jagadetattvaṁ tapasyantī vināśaya | buddhvaivaṁ dhārayasvemaṁ lokaṁ devi namastava
'इस जगत् को उत्पन्न करके तप से इसका विनाश मत करो। यह समझकर इस लोक को धारण करो, हे देवी! तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 6 (skanda.8.55.6)
त्वत्तो रुद्रेण लोकोयमहञ्चैव पुरानघे । सृष्टाः स्मो वरदे देवि मा नः कृत्वा विनाशय
tvatto rudreṇa lokoyamahañcaiva purānaghe | sṛṣṭāḥ smo varade devi mā naḥ kṛtvā vināśaya
'हे निष्पापे! तुमसे तथा रुद्र से ही यह लोक और मैं भी पूर्वकाल में उत्पन्न हुए हैं; हे वरदे देवी! हमें बनाकर हमारा विनाश मत करो।'
श्लोक 7 (skanda.8.55.7)
तपसा तव रुद्राणि जगत् स्थावरजङ्गमम् । तप्यते ग्रीष्ममध्याह्ने जलात् पद्ममिवोद्धृतम्
tapasā tava rudrāṇi jagat sthāvarajaṅgamam | tapyate grīṣmamadhyāhne jalāt padmamivoddhṛtam
'हे रुद्राणि! तुम्हारे तप से चराचर जगत् संतप्त हो रहा है — जैसे ग्रीष्म की दोपहरी में जल से निकाला गया कमल सूख जाता है।'
श्लोक 8 (skanda.8.55.8)
किं वा ते हृदये देवि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् । वरं वृणीहि सर्वाणि दातास्मि हिमवत्सुते
kiṁ vā te hṛdaye devi yadyapi syāt suduṣkaram | varaṁ vṛṇīhi sarvāṇi dātāsmi himavatsute
'हे देवी! तुम्हारे हृदय में जो भी हो, चाहे वह कितना भी दुष्कर क्यों न हो — वर माँगो; हे हिमवत्सुते! मैं सब कुछ दूँगा।'
श्लोक 9 (skanda.8.55.9)
देव्युवाच वरदोसि यदीशान मम देव चतुर्मुख । अयं भक्तोनुरक्तश्च मम नित्यं प्रियः प्रभो
devyuvāca varadosi yadīśāna mama deva caturmukha | ayaṁ bhaktonuraktaśca mama nityaṁ priyaḥ prabho
देवी ने कहा — 'हे ईशान! हे चतुर्मुख देव! यदि तुम मुझे वर देने वाले हो, तो यह प्राणी मेरा भक्त, अनुरक्त तथा सदा मुझे प्रिय है, हे प्रभो!'
श्लोक 10 (skanda.8.55.10)
व्याघ्रोस्य तावद्यच्छस्व ततो दास्यसि मे वरम् । अद्य वर्षसहस्रं वै स्थितस्यास्य ममाग्रतः
vyāghrosya tāvadyacchasva tato dāsyasi me varam | adya varṣasahasraṁ vai sthitasyāsya mamāgrataḥ
'पहले इस व्याघ्र को वर दो, तब मुझे वर देना। यह एक हजार वर्षों से मेरे सामने खड़ा है...'
श्लोक 11 (skanda.8.55.11)
ध्यायतो निमिषस्यैव स्तब्धकर्णस्य लोकप । अस्मै धत्स्व वरं देव नास्मि तावद्वरार्थिनी
dhyāyato nimiṣasyaiva stabdhakarṇasya lokapa | asmai dhatsva varaṁ deva nāsmi tāvadvarārthinī
'...ध्यानमग्न, अपलक, कान खड़े किये हुए, हे लोकपाल! इसे वर दो, हे देव! तब तक मैं स्वयं वर की इच्छुक नहीं हूँ।'
श्लोक 12 (skanda.8.55.12)
पितामह उवाच। । एष तिर्यग् दुरात्मा च त्वां भक्षयितुमागतः । नास्य शुद्धं मनो देवि क्रूरोयं पापचेतनः
pitāmaha uvāca| | eṣa tiryag durātmā ca tvāṁ bhakṣayitumāgataḥ | nāsya śuddhaṁ mano devi krūroyaṁ pāpacetanaḥ
पितामह ने कहा — 'यह तो एक तिर्यक् प्राणी है, दुरात्मा, जो तुम्हें खाने के लिये आया है; हे देवी! इसका मन शुद्ध नहीं है, यह क्रूर तथा पापी है।'
श्लोक 13 (skanda.8.55.13)
पश्यैनं दुष्टमनसं नास्य श्रेयो मनस्त्वयि
paśyainaṁ duṣṭamanasaṁ nāsya śreyo manastvayi
'इसके दुष्ट मन को देखो; तुम्हारे प्रति इसका मन कल्याणकारी नहीं है।'
श्लोक 14 (skanda.8.55.14)
सनत्कुमार उवाच। । अथ सा तद्वचः श्रुत्वा रुद्राणी लोकभावनी
sanatkumāra uvāca| | atha sā tadvacaḥ śrutvā rudrāṇī lokabhāvanī
सनत्कुमार ने कहा — तब उस वचन को सुनकर लोकभाविनी रुद्राणी ने...
श्लोक 15 (skanda.8.55.15)
दिव्येन चक्षुषापश्यदज्ञानात् कृतसाहसम्
divyena cakṣuṣāpaśyadajñānāt kṛtasāhasam
—अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि उसने अज्ञानवश ही यह दुःसाहस किया था।
श्लोक 16 (skanda.8.55.16)
अनन्यभक्तः पूर्वञ्च जातिदोषेण दूषितः
ananyabhaktaḥ pūrvañca jātidoṣeṇa dūṣitaḥ
उसने देखा कि वह पूर्वजन्म में अनन्य भक्त था और केवल जाति-दोष से ही दूषित है।
श्लोक 17 (skanda.8.55.17)
विदितार्था ततो भूत्वा उवाच हिमवत्सुता
viditārthā tato bhūtvā uvāca himavatsutā
तब सत्य को जानकर हिमवत्सुता ने कहा —
श्लोक 18 (skanda.8.55.18)
भगवन् को हि लोकेषु तिर्यक्त्वे सति निश्चलः
bhagavan ko hi lokeṣu tiryaktve sati niścalaḥ
'हे भगवन्! संसार में तिर्यक्-योनि में रहते हुए भी ऐसा निश्चल कौन हो सकता है...'
श्लोक 19 (skanda.8.55.19)
स्तब्धकर्णेक्षणो दिव्यमहोप्येकमभोजनः
stabdhakarṇekṣaṇo divyamahopyekamabhojanaḥ
'—कान और आँखें स्थिर किये हुए, एक दिव्य दिन भी बिना भोजन के...'
श्लोक 20 (skanda.8.55.20)
अवतिष्ठेत किं योयं सहस्रमवतिष्ठत । वर्षाणां सुमहातेजा नायं तिर्यक्षु संस्कृतः
avatiṣṭheta kiṁ yoyaṁ sahasramavatiṣṭhata | varṣāṇāṁ sumahātejā nāyaṁ tiryakṣu saṁskṛtaḥ
'—स्थिर रह सके? यह तो एक हजार वर्षों तक स्थिर रहा है! इतने महान् तेज वाला यह प्राणी तिर्यक्-योनि में सुसंस्कृत नहीं है।'
श्लोक 21 (skanda.8.55.21)
भवत्वयं दुष्टचेतास्त्वदुष्टो वा महाबलः
bhavatvayaṁ duṣṭacetāstvaduṣṭo vā mahābalaḥ
'चाहे यह महाबली दुष्टचित्त हो अथवा दुष्ट न हो...'
श्लोक 22 (skanda.8.55.22)
ममानुग्राह्य इत्येव वरो ह्यस्य प्रदीयताम्
mamānugrāhya ityeva varo hyasya pradīyatām
'—यह मेरे द्वारा अनुगृहीत होने योग्य है; इसे वर प्रदान किया जाये।'
श्लोक 23 (skanda.8.55.23)
सनत्कुमार उवाच। । ततः स भगवान् देवश्चतुर्वक्त्रः पितामहः । उवाच वचनं देवीमृषीणां शृण्वतां तदा
sanatkumāra uvāca| | tataḥ sa bhagavān devaścaturvaktraḥ pitāmahaḥ | uvāca vacanaṁ devīmṛṣīṇāṁ śṛṇvatāṁ tadā
सनत्कुमार ने कहा — तब वे भगवान् देव, चतुर्मुख पितामह, ऋषियों के सुनते हुए देवी से यह वचन बोले —
श्लोक 24 (skanda.8.55.24)
आर्याणां दस्यवोपीह संसर्गात् सिद्धिमाप्नुयुः । यथायं क्रूरकर्मापि सिद्धिं प्राप्स्यत्यनुत्तमाम्
āryāṇāṁ dasyavopīha saṁsargāt siddhimāpnuyuḥ | yathāyaṁ krūrakarmāpi siddhiṁ prāpsyatyanuttamām
'सज्जनों के संसर्ग से यहाँ डाकू भी सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं; उसी प्रकार यह क्रूरकर्मा भी परम सिद्धि को प्राप्त करेगा।'
श्लोक 25 (skanda.8.55.25)
तस्मादार्याः सदा सेव्या नित्यं पापकृतापि हि । सिद्धिमेति नरः क्षिप्रमपापानां समीपगः
tasmādāryāḥ sadā sevyā nityaṁ pāpakṛtāpi hi | siddhimeti naraḥ kṣipramapāpānāṁ samīpagaḥ
'अतः पापकर्मी को भी सदा आर्यजनों की सेवा करनी चाहिये; निष्पाप जनों के समीप जाने वाला मनुष्य शीघ्र सिद्धि प्राप्त करता है।'
श्लोक 26 (skanda.8.55.26)
अनुग्राह्यस्तवानिन्द्ये पापोयं दुष्टचेतनः । अतोस्मै ब्रूहि देवेशे वरो यस्तव रोचते
anugrāhyastavānindye pāpoyaṁ duṣṭacetanaḥ | atosmai brūhi deveśe varo yastava rocate
'हे अनिन्द्ये! यह पापी, दुष्टचित्त भी तुम्हारे अनुग्रह के योग्य है। अतः हे देवेशी! जो वर तुम्हें रुचिकर हो, वह इसके लिये बताओ।'
श्लोक 27 (skanda.8.55.27)
देव्युवाच अमरो जरया त्यक्त अक्षयश्चाव्ययस्तथा । महायोगबलोपेतो महदैश्वर्यसंयुतः
devyuvāca amaro jarayā tyakta akṣayaścāvyayastathā | mahāyogabalopeto mahadaiśvaryasaṁyutaḥ
देवी ने कहा — 'यह अमर, वृद्धावस्था से रहित, अक्षय तथा अव्यय हो, महायोगबल से युक्त तथा महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न हो...'
श्लोक 28 (skanda.8.55.28)
गणेश्वरो ममेष्टश्च भवत्वेष यदीच्छसि
gaṇeśvaro mameṣṭaśca bhavatveṣa yadīcchasi
'—यदि तुम्हें अभीष्ट हो तो यह मेरे प्रिय गणेश्वर बन जाये।'
श्लोक 29 (skanda.8.55.29)
पितामह उवाच। । एवं भवतु भद्रं ते सर्वमेतद् भविष्यति । जानासि ब्रह्मबन्धूनां ब्रह्मदत्तस्य मंत्रिणम्
pitāmaha uvāca| | evaṁ bhavatu bhadraṁ te sarvametad bhaviṣyati | jānāsi brahmabandhūnāṁ brahmadattasya maṁtriṇam
पितामह ने कहा — 'ऐसा ही हो; तुम्हारा कल्याण हो — यह सब पूर्ण होगा। क्या तुम जानती हो, यह ब्रह्मबन्धुओं में ब्रह्मदत्त का मन्त्री था?'
श्लोक 30 (skanda.8.55.30)
त्वयि भक्तिः पुराप्यस्य शापाद् व्याघ्रगतिं गतः । पञ्चालस्य च यक्षोयं प्रतीहारोभवत् पुरा
tvayi bhaktiḥ purāpyasya śāpād vyāghragatiṁ gataḥ | pañcālasya ca yakṣoyaṁ pratīhārobhavat purā
'पूर्वजन्म में भी इसकी भक्ति तुम्हारे प्रति थी; शाप से यह व्याघ्र-योनि को प्राप्त हुआ। पहले यह पांचाल देश का एक यक्ष, द्वारपाल था।'
श्लोक 31 (skanda.8.55.31)
त्वया मया यदद्यास्य कृतेयं नन्दिरीदृशी । तस्माद् गमिष्यति ख्यातिं सोमनन्दीति नामतः
tvayā mayā yadadyāsya kṛteyaṁ nandirīdṛśī | tasmād gamiṣyati khyātiṁ somanandīti nāmataḥ
'चूँकि आज तुमने और मैंने इसके लिये यह अनुग्रह किया है, नन्दी के समान, इसलिये यह सोमनन्दी नाम से प्रसिद्ध होगा।'
श्लोक 32 (skanda.8.55.32)
यश्चैनं कीर्तयेद् दुर्गे कान्तारेषु भयेषु च । शार्दूलसिंहद्वीपिभ्यो न भयं तस्य जानते
yaścainaṁ kīrtayed durge kāntāreṣu bhayeṣu ca | śārdūlasiṁhadvīpibhyo na bhayaṁ tasya jānate
'और जो कोई दुर्गम स्थानों में, वनों में तथा भयावह अवसरों पर इसका स्मरण करता है, उसे बाघ, सिंह तथा चीतों से भय नहीं रहता।'
श्लोक 33 (skanda.8.55.33)
वद त्वमपि चेशानि यस्ते प्रियमनोरथः । यावद् ददामि सर्वन्ते नियोगात् पारमेश्वरात्
vada tvamapi ceśāni yaste priyamanorathaḥ | yāvad dadāmi sarvante niyogāt pārameśvarāt
'हे ईशानी! अब तुम भी अपने हृदय की प्रिय अभिलाषा कहो; परमेश्वर की आज्ञा से मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा।'
श्लोक 34 (skanda.8.55.34)
देव्युवाच इच्छामि भगवन् दिव्यं वर्णं कनकसप्रभम् । गौरीति लोके ख्याता च भवेयं कमलोद्भव
devyuvāca icchāmi bhagavan divyaṁ varṇaṁ kanakasaprabham | gaurīti loke khyātā ca bhaveyaṁ kamalodbhava
देवी ने कहा — 'हे भगवन्! मैं स्वर्ण के समान कान्तिमान् दिव्य वर्ण चाहती हूँ; और हे कमलोद्भव! मैं लोक में गौरी नाम से प्रसिद्ध होना चाहती हूँ।'
श्लोक 35 (skanda.8.55.35)
पितामह उवाच। । एवमस्तु जगन्मातर्यदिच्छसि तपोधने
pitāmaha uvāca| | evamastu jaganmātaryadicchasi tapodhane
पितामह ने कहा — 'हे जगन्माता! ऐसा ही हो, हे तपोधने! जो तुम चाहती हो।'
श्लोक 36 (skanda.8.55.36)
अन्यं वरय भद्रन्ते वरं देवि ददामि ते
anyaṁ varaya bhadrante varaṁ devi dadāmi te
'हे कल्याणी! एक और वर भी माँगो, हे देवी! मैं तुम्हें दूँगा।'
श्लोक 37 (skanda.8.55.37)
महद्धीदं तपस्तप्तं भवत्या लोकभावनम् । नानुरूपो वरस्तस्य तस्मादन्योपि मृग्यताम्
mahaddhīdaṁ tapastaptaṁ bhavatyā lokabhāvanam | nānurūpo varastasya tasmādanyopi mṛgyatām
'क्योंकि तुमने जो यह महान् तप किया है, वह लोक-निर्माण करने वाला है; उसके अनुरूप कोई एक वर पर्याप्त नहीं है — अतः कोई अन्य वर भी माँगो।'
श्लोक 38 (skanda.8.55.38)
देव्युवाच इच्छामि भगवन्पुत्रं सर्वधर्मभृतां वरम् । महाबलं महोत्साहं सर्वलोकनमस्कृतम्
devyuvāca icchāmi bhagavanputraṁ sarvadharmabhṛtāṁ varam | mahābalaṁ mahotsāhaṁ sarvalokanamaskṛtam
देवी ने कहा — 'हे भगवन्! मैं एक पुत्र चाहती हूँ, जो समस्त धर्मधारियों में श्रेष्ठ हो, महाबली, महोत्साही तथा समस्त लोकों द्वारा वन्दित हो।'
श्लोक 39 (skanda.8.55.39)
पितामह उवाच। । पुत्रस्ते भविता देवि महायोगबलान्वितः । अजेय स्सर्वभूतानामष्टैश्वर्यगुणान्वितः
pitāmaha uvāca| | putraste bhavitā devi mahāyogabalānvitaḥ | ajeya ssarvabhūtānāmaṣṭaiśvaryaguṇānvitaḥ
पितामह ने कहा — 'हे देवी! तुम्हें एक पुत्र होगा, जो महायोगबल से युक्त, सभी प्राणियों के लिये अजेय तथा आठों ऐश्वर्य-गुणों से सम्पन्न होगा।'
श्लोक 40 (skanda.8.55.40)
जेता हन्ता तथा देष्टा अजरोवध्य एव च । अनादेश्यश्च सततं सर्वेषां प्राणिनां वरः
jetā hantā tathā deṣṭā ajarovadhya eva ca | anādeśyaśca satataṁ sarveṣāṁ prāṇināṁ varaḥ
'—विजेता, संहारक तथा आदेशक; अजर तथा अवध्य; सदा अनादेश्य तथा समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ।'
श्लोक 41 (skanda.8.55.41)
सदा बालोथ सुभगो धर्मज्ञो धर्मवत्सलः । देवब्राह्मणगोप्ता च विद्वान् सर्वज्ञ एव च
sadā bālotha subhago dharmajño dharmavatsalaḥ | devabrāhmaṇagoptā ca vidvān sarvajña eva ca
'—सदा बालक-सा, सुन्दर, धर्मज्ञ, धर्मवत्सल; देव-ब्राह्मणों का रक्षक, विद्वान् तथा सर्वज्ञ।'
श्लोक 42 (skanda.8.55.42)
षण्मुखो द्वादशभुजः शक्तिपाणिस्तथैव च । ब्रह्मण्यश्च शारण्यश्च देवद्विट्संघहा तथा
ṣaṇmukho dvādaśabhujaḥ śaktipāṇistathaiva ca | brahmaṇyaśca śāraṇyaśca devadviṭsaṁghahā tathā
'—छह मुखों वाला, बारह भुजाओं वाला, शक्ति-अस्त्र धारण करने वाला; ब्राह्मणों का हितैषी, शरणागतवत्सल तथा देवद्वेषियों के समूहों का संहारक।'
श्लोक 43 (skanda.8.55.43)
अयोनिजो महातेजा लोकानां सुखकृच्च हि
ayonijo mahātejā lokānāṁ sukhakṛcca hi
'—अयोनिज, महातेजस्वी तथा लोकों के लिये सुखकारक होगा।'
श्लोक 44 (skanda.8.55.44)
शनैरेतदुवाचासौ ततश्च विरराम ह
śanairetaduvācāsau tataśca virarāma ha
उन्होंने यह धीरे-धीरे कहा और फिर मौन हो गये।
श्लोक 45 (skanda.8.55.45)
सनत्कुमार उवाच। । वरान् स दत्त्वा देवेशः कृत्वा चापि प्रदक्षिणाम्
sanatkumāra uvāca| | varān sa dattvā deveśaḥ kṛtvā cāpi pradakṣiṇām
सनत्कुमार ने कहा — वे देवेश, वर देकर तथा प्रदक्षिणा करके भी...
श्लोक 46 (skanda.8.55.46)
विमानं तं समारुह्य स्वं लोकमगमत्तदा
vimānaṁ taṁ samāruhya svaṁ lokamagamattadā
—उस विमान पर आरूढ़ होकर तब अपने लोक को चले गये।
श्लोक 47 (skanda.8.55.47)
रुद्राण्यपि गते तस्मिन् सोमनन्दिपुरःसरा । स्थिताकाशं समास्थाय रोहिणीव बुधानुगा
rudrāṇyapi gate tasmin somanandipuraḥsarā | sthitākāśaṁ samāsthāya rohiṇīva budhānugā
उनके जाने पर रुद्राणी भी, सोमनन्दी को आगे किये हुए, आकाश में स्थित होकर, बुध के पीछे चलने वाली रोहिणी के समान शोभित हुईं।
श्लोक 48 (skanda.8.55.48)
मन्त्रानुगेव गायत्री जयन्तेन शची यथा । तथा सा भाति रुद्राणी सोमनन्दिपुरःसरा
mantrānugeva gāyatrī jayantena śacī yathā | tathā sā bhāti rudrāṇī somanandipuraḥsarā
—जैसे गायत्री मन्त्र के साथ हो, अथवा जैसे शची जयन्त के साथ हों; उसी प्रकार सोमनन्दी को आगे किये हुए रुद्राणी शोभित हुईं।
श्लोक 49 (skanda.8.55.49)
य इमं पठते सदा विपश्चित् पुरुषः प्रातरतन्द्रितो हि कश्चित्
ya imaṁ paṭhate sadā vipaścit puruṣaḥ prātaratandrito hi kaścit
जो भी विद्वान् पुरुष प्रतिदिन प्रातःकाल अनालस्य होकर इसका पाठ करता है...
श्लोक 50 (skanda.8.55.50)
कुरुते न भयं हि सोमनन्दिर्वरदस्तस्य हरश्च सोमनन्दी
kurute na bhayaṁ hi somanandirvaradastasya haraśca somanandī
—उसे सोमनन्दी, वरदाता, भय उत्पन्न नहीं करते; तथा हर और सोमनन्दी उसकी रक्षा करते हैं।