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अम्बिका खण्ड · अध्याय 56

सप्तव्याध-उपाख्यान और कौशिक का शाप

अध्याय 55अध्याय-सूचीअध्याय 57

श्लोक 1 (skanda.8.56.1)

व्यास उवाच। । भगवन् यत्त्वयाख्यातं पूर्वं नरकवर्णने

vyāsa uvāca| | bhagavan yattvayākhyātaṁ pūrvaṁ narakavarṇane

व्यास ने कहा — हे भगवन्! जो आपने पहले नरक-वर्णन में बताया था...

श्लोक 2 (skanda.8.56.2)

दुष्कृतं कर्म कृत्वा तु नरा नरकगामिनः

duṣkṛtaṁ karma kṛtvā tu narā narakagāminaḥ

—कि दुष्कर्म करके मनुष्य नरकगामी होते हैं...

श्लोक 3 (skanda.8.56.3)

भवन्ति सुकृताः सर्वे स्वर्गसौख्यसमायुताः

bhavanti sukṛtāḥ sarve svargasaukhyasamāyutāḥ

और सभी सुकर्मी स्वर्ग के सुख से युक्त होते हैं...

श्लोक 4 (skanda.8.56.4)

ब्राह्मणा दुष्कृतं कृत्वा गत्वा दुर्गतिमापदम्

brāhmaṇā duṣkṛtaṁ kṛtvā gatvā durgatimāpadam

किन्तु ब्राह्मण दुष्कर्म करके उस दुर्गति-रूपी आपत्ति को प्राप्त होकर...

श्लोक 5 (skanda.8.56.5)

कथं भूयः समायन्ति स्वर्गसौख्यफलं महत् । योनीर्वा कथमागम्य बह्वीः संकरजातिषु । भूयः सुकृतिनो भूत्वा प्राप्नुवन्ति शुभां गतिम्

kathaṁ bhūyaḥ samāyanti svargasaukhyaphalaṁ mahat | yonīrvā kathamāgamya bahvīḥ saṁkarajātiṣu | bhūyaḥ sukṛtino bhūtvā prāpnuvanti śubhāṁ gatim

—वे पुनः किस प्रकार स्वर्ग-सुख के महान् फल को प्राप्त करते हैं? अथवा संकर जातियों की अनेक योनियों से गुजरकर, पुनः सुकर्मी बनकर वे कैसे शुभ गति प्राप्त करते हैं?

श्लोक 6 (skanda.8.56.6)

सनत्कुमार उवाच। । शृणु व्यास पुरावृत्तं दशार्णेषु तु यच्छ्रुतम्

sanatkumāra uvāca| | śṛṇu vyāsa purāvṛttaṁ daśārṇeṣu tu yacchrutam

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास! दशार्ण देश में सुनी गयी एक प्राचीन कथा सुनो।

श्लोक 7 (skanda.8.56.7)

सप्तानां द्विजशिप्याणामशुभं शुभमेव च

saptānāṁ dvijaśipyāṇāmaśubhaṁ śubhameva ca

—सात ब्राह्मण शिष्यों के अशुभ तथा शुभ दोनों वृत्तान्त।

श्लोक 8 (skanda.8.56.8)

आसीत् सुपर्वा विख्यातः कौशिको ब्राह्मणः शुचिः । धार्मिकश्च वदान्यश्च विद्वान् विप्रैः सपूजितः

āsīt suparvā vikhyātaḥ kauśiko brāhmaṇaḥ śuciḥ | dhārmikaśca vadānyaśca vidvān vipraiḥ sapūjitaḥ

कौशिक नामक एक विख्यात, पवित्र, सुपर्व ब्राह्मण थे; धार्मिक, उदार, विद्वान् तथा ब्राह्मणों द्वारा पूजित।

श्लोक 9 (skanda.8.56.9)

तस्य शिष्या बभूवुर्हि सप्त दुर्मेधसश्च ते

tasya śiṣyā babhūvurhi sapta durmedhasaśca te

उनके सात शिष्य थे, जो मन्दबुद्धि थे।

श्लोक 10 (skanda.8.56.10)

गुरुशुश्रूषणेसक्ता नामतस्तान्निबोध मे

guruśuśrūṣaṇesaktā nāmatastānnibodha me

गुरु की सेवा में लगे हुए थे; उनके नाम मुझसे सुनो।

श्लोक 11 (skanda.8.56.11)

आत्रेयः कण्डरो नाम उपमन्युश्च दामनः

ātreyaḥ kaṇḍaro nāma upamanyuśca dāmanaḥ

आत्रि-कुल का कण्डर नामक, उपमन्यु तथा दामन...

श्लोक 12 (skanda.8.56.12)

शाण्डिल्यश्चैव हालोभूद् गार्ग्यश्च विदलस्तथा

śāṇḍilyaścaiva hālobhūd gārgyaśca vidalastathā

शाण्डिल्य-कुल का हाल, तथा गार्ग्य-कुल का विदल...

श्लोक 13 (skanda.8.56.13)

शैशिरो गौतमश्चैव दण्डकीलश्च काश्यपः । विदर्भश्चैव हारीत इतीमे सप्त विश्रुताः

śaiśiro gautamaścaiva daṇḍakīlaśca kāśyapaḥ | vidarbhaścaiva hārīta itīme sapta viśrutāḥ

शैशिर-कुल का गौतम, काश्यप-कुल का दण्डकील, तथा हारीत-कुल का विदर्भ — ये सात विख्यात शिष्य थे।

श्लोक 14 (skanda.8.56.14)

उपाध्यायोथ तान्विप्रान् प्रोवाचेदं महातपाः । अचिराद् गामितो गत्वा याज्यदत्तां सुरूपिणीम्

upādhyāyotha tānviprān provācedaṁ mahātapāḥ | acirād gāmito gatvā yājyadattāṁ surūpiṇīm

तब उन महातपस्वी उपाध्याय ने उन ब्राह्मणों से यह कहा — शीघ्र यहाँ से जाकर, यजमान द्वारा दी गयी उस सुरूपा गौ को...

श्लोक 15 (skanda.8.56.15)

गत्वानयत होमार्थे शीघ्रं माहिष्मतीं पुरीम् । त एवमुक्तास्तेनैव माहिष्मत्यास्त्वतन्द्रिताः

gatvānayata homārthe śīghraṁ māhiṣmatīṁ purīm | ta evamuktāstenaiva māhiṣmatyāstvatandritāḥ

—होम के लिये उसे शीघ्र माहिष्मती नगरी से लेकर आओ। उनके द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वे बिना विलम्ब किये माहिष्मती से...

श्लोक 16 (skanda.8.56.16)

गामादाय निवर्तन्तो मृत्तिकावतिमन्तशः

gāmādāya nivartanto mṛttikāvatimantaśaḥ

गौ को लेकर लौटते हुए वे अन्ततः मृत्तिकावती नामक स्थान पर पहुँचे।

श्लोक 17 (skanda.8.56.17)

अनावृष्ट्या ततस्तेतु दुर्भिक्षे परिवर्तति

anāvṛṣṭyā tatastetu durbhikṣe parivartati

तब वहाँ अनावृष्टि के कारण दुर्भिक्ष फैला हुआ था...

श्लोक 18 (skanda.8.56.18)

क्षुधापरिगताः सर्वे किंभक्षाः संबभूविरे । सप्तमेहनि संजाते निराहाराः सुदुःखिताः

kṣudhāparigatāḥ sarve kiṁbhakṣāḥ saṁbabhūvire | saptamehani saṁjāte nirāhārāḥ suduḥkhitāḥ

—भूख से व्याकुल होकर वे सभी सोचने लगे कि क्या खायें। सातवाँ दिन आने पर भोजन के बिना अत्यंत दुःखी होकर...

श्लोक 19 (skanda.8.56.19)

अमन्त्रयन्त गामेतां भक्षयाम किमास्यते । तेषां यः कण्डरो नाम आत्रेयकुलसंभवः

amantrayanta gāmetāṁ bhakṣayāma kimāsyate | teṣāṁ yaḥ kaṇḍaro nāma ātreyakulasaṁbhavaḥ

—उन्होंने आपस में विचार किया — इस गौ को ही खा लें; क्यों बैठे हैं? उनमें से आत्रि-कुल में उत्पन्न कण्डर नामक शिष्य ने...

श्लोक 20 (skanda.8.56.20)

स तानुवाच मा धेनुं भक्षयाम गुरोरिमाम् । गुरोरर्थे हि नः श्लाघ्या मृत्युरप्यविचक्षणाः

sa tānuvāca mā dhenuṁ bhakṣayāma gurorimām | gurorarthe hi naḥ ślāghyā mṛtyurapyavicakṣaṇāḥ

—उनसे कहा — हम अपने गुरु की इस गौ को न खायें। हे अविवेकियो! गुरु के लिये तो मृत्यु भी हमारे लिये प्रशंसनीय है।

श्लोक 21 (skanda.8.56.21)

मा गुरोः क्रोधनिर्दग्धा यास्याम निधनं वयम् । ते यदा तद्वचो नैव जगृहुः क्षुत्प्रपीडिताः

mā guroḥ krodhanirdagdhā yāsyāma nidhanaṁ vayam | te yadā tadvaco naiva jagṛhuḥ kṣutprapīḍitāḥ

हम गुरु के क्रोध से जलकर विनाश को प्राप्त न हों। परन्तु जब भूख से पीड़ित वे उसका वचन नहीं मानने लगे...

श्लोक 22 (skanda.8.56.22)

स तदोवाच भूयस्तानिदं वचनमर्थवत् । यदि वोवधृतं विप्रा भक्षणेस्यास्तपोधनाः

sa tadovāca bhūyastānidaṁ vacanamarthavat | yadi vovadhṛtaṁ viprā bhakṣaṇesyāstapodhanāḥ

—तब उसने उनसे फिर यह सारगर्भित वचन कहा — हे तपोधन विप्रो! यदि तुम्हारा मन खाने पर ही दृढ़ हो गया है...

श्लोक 23 (skanda.8.56.23)

मा वृथा भक्षयामैनां पित्रर्थे प्रोक्षयामहे । मा नो दोषद्वयेनेह लोपो भवतु शोभनाः

mā vṛthā bhakṣayāmaināṁ pitrarthe prokṣayāmahe | mā no doṣadvayeneha lopo bhavatu śobhanāḥ

—व्यर्थ में इसे न खायें, इसे पितरों के निमित्त प्रोक्षित करके खायें। हे शोभनो! दो दोषों से हमारा नाश न हो।

श्लोक 24 (skanda.8.56.24)

एवं ह्यल्पेन दोषेण वयं योक्ष्येम सर्वथा । त एवमुक्ताः सम्यक्तु वचस्तस्यावधार्य च

evaṁ hyalpena doṣeṇa vayaṁ yokṣyema sarvathā | ta evamuktāḥ samyaktu vacastasyāvadhārya ca

इस प्रकार अल्प दोष से ही हम हर तरह से जुड़ेंगे। इस प्रकार कहे जाने पर तथा उसके वचन को भलीभाँति स्वीकार करके...

श्लोक 25 (skanda.8.56.25)

प्रोक्षयामासुरव्यग्रा पित्रर्थे तां पयस्विनीम् । ततः संस्कृत्य विधिवद् निवेद्य च महामुने

prokṣayāmāsuravyagrā pitrarthe tāṁ payasvinīm | tataḥ saṁskṛtya vidhivad nivedya ca mahāmune

—उन्होंने निश्चिन्त होकर उस दुधारू गौ को पितरों के निमित्त प्रोक्षित किया। फिर, हे महामुने! विधिपूर्वक संस्कार करके तथा अर्पित करके...

श्लोक 26 (skanda.8.56.26)

हुताग्नयस्ततो भूत्वा प्रत्येकमुपभुज्य च । वत्समेकं गले बद्ध्वा आनिन्युर्गुरवे तदा

hutāgnayastato bhūtvā pratyekamupabhujya ca | vatsamekaṁ gale baddhvā āninyurgurave tadā

—अग्नि में हवन करके तथा प्रत्येक ने अपना-अपना भाग खाकर, एक बछड़े को गले में बाँधकर वे उसे गुरु के पास ले आये।

श्लोक 27 (skanda.8.56.27)

अथ दृष्टवा स तं वत्सं धेनुं पप्रच्छ तान्द्विजः । त ऊचुः पथि शार्दूलोवधीत्तामिति निर्घृणाः

atha dṛṣṭavā sa taṁ vatsaṁ dhenuṁ papraccha tāndvijaḥ | ta ūcuḥ pathi śārdūlovadhīttāmiti nirghṛṇāḥ

तब उस बछड़े को देखकर ब्राह्मण ने उनसे उस गौ के विषय में पूछा। उन निर्दयी शिष्यों ने कहा — मार्ग में उसे बाघ ने मार डाला।

श्लोक 28 (skanda.8.56.28)

अथ तेषां वचः श्रुत्वा शंकया च दुरात्मनाम् । दिव्येन चक्षुषापश्यद् भक्षितां तैर्महातपाः

atha teṣāṁ vacaḥ śrutvā śaṁkayā ca durātmanām | divyena cakṣuṣāpaśyad bhakṣitāṁ tairmahātapāḥ

तब उनके वचन को सुनकर तथा उन दुरात्माओं पर संदेह करके, उन महातपस्वी ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि उसे उन्होंने ही खा लिया है।

श्लोक 29 (skanda.8.56.29)

सतः स रोषाद् रक्ताक्षो निर्दहन्निव ताँस्तदा

sataḥ sa roṣād raktākṣo nirdahanniva tā~stadā

तब क्रोध से लाल आँखों वाले होकर, मानो उन्हें जलाते हुए से...

श्लोक 30 (skanda.8.56.30)

उवाच वत्सं दृष्टवा च कृपया भृशदुःखितः

uvāca vatsaṁ dṛṣṭavā ca kṛpayā bhṛśaduḥkhitaḥ

—फिर भी बछड़े को देखकर, दया से अत्यंत दुःखी होकर वे बोले —

श्लोक 31 (skanda.8.56.31)

युष्माभिर्भक्षिता सा हि तथ्यं न कथितं च मे । कर्मणा तेन तस्माद्वो गतिः कष्टा भविष्यति

yuṣmābhirbhakṣitā sā hi tathyaṁ na kathitaṁ ca me | karmaṇā tena tasmādvo gatiḥ kaṣṭā bhaviṣyati

उसे तुम लोगों ने ही खाया है, और मुझे सत्य नहीं बताया। अतः उस कर्म के कारण तुम्हारी गति कष्टप्रद होगी।

श्लोक 32 (skanda.8.56.32)

प्रसादितः स तैः शिष्यैर्ब्राह्मणः सुमहाद्युतिः

prasāditaḥ sa taiḥ śiṣyairbrāhmaṇaḥ sumahādyutiḥ

उन शिष्यों द्वारा प्रसन्न किये जाने पर वे अत्यंत तेजस्वी ब्राह्मण...

श्लोक 33 (skanda.8.56.33)

कृपया स च तानाह भूयः सर्वानिदं वचः

kṛpayā sa ca tānāha bhūyaḥ sarvānidaṁ vacaḥ

—दयावश उन सबसे पुनः यह वचन बोले —

श्लोक 34 (skanda.8.56.34)

यदुक्तं तन्मया तथ्यं न तन्मिथ्या भविष्यति । येषां तु कृतवन्तः स्थस्तेध्यवस्यन्ति यच्छुभम्

yaduktaṁ tanmayā tathyaṁ na tanmithyā bhaviṣyati | yeṣāṁ tu kṛtavantaḥ sthastedhyavasyanti yacchubham

जो मैंने कहा है, वह सत्य है; वह मिथ्या नहीं होगा। किन्तु जिन पितरों के लिये तुमने यह किया है, वे ही तुम्हारे लिये जो शुभ हो, उसका निश्चय करेंगे।

श्लोक 35 (skanda.8.56.35)

मत्समीपे च न स्थेयमिदानीं वः कथञ्चन । दृष्टवा वत्समिमं बालं मा वो धक्ष्यामि गच्छत

matsamīpe ca na stheyamidānīṁ vaḥ kathañcana | dṛṣṭavā vatsamimaṁ bālaṁ mā vo dhakṣyāmi gacchata

अब तुम्हें मेरे समीप किसी भी प्रकार नहीं रहना है। इस बालक बछड़े को देखकर मैं तुम्हें भस्म नहीं करूँगा — जाओ।

श्लोक 36 (skanda.8.56.36)

अथ ते सहिताः सर्वे नष्टसंज्ञा विचेतसः

atha te sahitāḥ sarve naṣṭasaṁjñā vicetasaḥ

तब वे सभी मिलकर, चेतनाशून्य तथा व्याकुलचित्त होकर...

श्लोक 37 (skanda.8.56.37)

कालेन समयुज्यन्त चिन्तयन्तो गुरोर्वचः

kālena samayujyanta cintayanto gurorvacaḥ

—समय के साथ, गुरु के वचन पर विचार करते हुए, मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 38 (skanda.8.56.38)

दशार्णा नाम सा व्यास सरित् पुण्यजला शुभा

daśārṇā nāma sā vyāsa sarit puṇyajalā śubhā

हे व्यास! दशार्णा नामक वह नदी पवित्र जल वाली तथा शुभ थी।

श्लोक 39 (skanda.8.56.39)

तस्यास्तीरे वनं दिव्यं विश्रुतं तत् सुभास्वरम्

tasyāstīre vanaṁ divyaṁ viśrutaṁ tat subhāsvaram

उसके तट पर एक दिव्य, विख्यात, अत्यंत प्रकाशमान वन था।

श्लोक 40 (skanda.8.56.40)

तत्र व्याधोभवच्छूरः क्षुपको नाम वीर्यवान् । तस्य पुत्राभवँस्ते वै चितकायां महाबलाः

tatra vyādhobhavacchūraḥ kṣupako nāma vīryavān | tasya putrābhava~ste vai citakāyāṁ mahābalāḥ

वहाँ क्षुपक नामक एक शूर, बलवान् व्याध रहता था। वे सातों उसकी पत्नी चितका से उत्पन्न महाबली पुत्र बने।

श्लोक 41 (skanda.8.56.41)

चितका संप्रसूता तु पुत्राँस्तान् सप्त संमतान् । व्याधाः सर्वेभवंस्ते वै चैतका इति विश्रुताः

citakā saṁprasūtā tu putrā~stān sapta saṁmatān | vyādhāḥ sarvebhavaṁste vai caitakā iti viśrutāḥ

चितका ने उन सम्मानित सातों पुत्रों को जन्म दिया; वे सभी व्याध बने, जो चैतक नाम से विख्यात हुए।

श्लोक 42 (skanda.8.56.42)

चरन्ति सधनुष्कास्ते निघ्नन्तो मृगपक्षिणः । सिंहान् व्याघ्रान् गजाँश्चैव वराहादीँश्च सर्वशः

caranti sadhanuṣkāste nighnanto mṛgapakṣiṇaḥ | siṁhān vyāghrān gajā~ścaiva varāhādī~śca sarvaśaḥ

वे धनुष लेकर विचरते थे, मृगों और पक्षियों को, सिंहों, बाघों, हाथियों तथा शूकरों आदि सभी को मारते हुए।

श्लोक 43 (skanda.8.56.43)

तेषां नामानि यानि स्म व्याधत्वे तानि मे शृणु । काण्डारोर्जुनको नाम दमनः सिंहकोभवत्

teṣāṁ nāmāni yāni sma vyādhatve tāni me śṛṇu | kāṇḍārorjunako nāma damanaḥ siṁhakobhavat

उनके व्याध-रूप में जो नाम थे, वे मुझसे सुनो — कण्डर का नाम अर्जुनक हुआ, दमन सिंहक बना...

श्लोक 44 (skanda.8.56.44)

हालोभूद् व्याघ्रकश्चैव विदलः शरभस्तथा । शैशिरो हिमवाँश्चैव हस्तिको दण्डकीलकः

hālobhūd vyāghrakaścaiva vidalaḥ śarabhastathā | śaiśiro himavā~ścaiva hastiko daṇḍakīlakaḥ

हाल व्याघ्रक बना, विदल शरभ बना; शैशिर हिमवान् बना, तथा दण्डकील हस्तिक बना...

श्लोक 45 (skanda.8.56.45)

विदर्भो वज्रकश्चैव नामान्येतानि तेषु हि

vidarbho vajrakaścaiva nāmānyetāni teṣu hi

और विदर्भ वज्रक बना — ये ही उनके नाम थे।

श्लोक 46 (skanda.8.56.46)

एकश स्तेटवीं घोरां चरन्ति पिशिताशनाः

ekaśa steṭavīṁ ghorāṁ caranti piśitāśanāḥ

वे सब मिलकर उस घोर वन में विचरते थे, मांसाहारी बने हुए।

श्लोक 47 (skanda.8.56.47)

हिंस्राः सत्वान्तकाः सर्वे योनिं दुष्टामुपागताः । कदाचिद्विचरन्तस्ते मृगान् घ्नन्तस्तथैव च

hiṁsrāḥ satvāntakāḥ sarve yoniṁ duṣṭāmupāgatāḥ | kadācidvicarantaste mṛgān ghnantastathaiva ca

—हिंसक, प्राणियों का अन्त करने वाले, सभी दुष्ट योनि को प्राप्त हुए। एक बार वे विचरते हुए मृगों को मारते हुए...

श्लोक 48 (skanda.8.56.48)

उपाध्यायाश्रमं प्राप्ताः कर्मणा सुकृतेन ह । तत्र तेषां भयोद्विग्नाः सर्व एवाभवन् मृगाः

upādhyāyāśramaṁ prāptāḥ karmaṇā sukṛtena ha | tatra teṣāṁ bhayodvignāḥ sarva evābhavan mṛgāḥ

—अपने पूर्वजन्म के सुकृत के कारण वे उसी गुरु के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ उनसे भयभीत होकर सभी मृग व्याकुल हो गये।

श्लोक 49 (skanda.8.56.49)

मृगान् भीतान् समालक्ष्य स विप्रः सुमहातपाः । न्यवैक्षत दिशः सर्वा व्याधाँश्चापश्यदागतान्

mṛgān bhītān samālakṣya sa vipraḥ sumahātapāḥ | nyavaikṣata diśaḥ sarvā vyādhā~ścāpaśyadāgatān

मृगों को भयभीत देखकर उन अत्यंत तपस्वी ब्राह्मण ने सभी दिशाओं में देखा और आये हुए व्याधों को देख लिया।

श्लोक 50 (skanda.8.56.50)

स्वशिष्याँस्तान् परिज्ञाय ध्यानाद् व्याधत्वमागतान्

svaśiṣyā~stān parijñāya dhyānād vyādhatvamāgatān

ध्यान से यह जानकर कि वे अपने ही पूर्व शिष्य हैं, जो अब व्याध-योनि को प्राप्त हुए हैं...

श्लोक 51 (skanda.8.56.51)

प्रोवाच करुणाविष्टस्तेषामेव शुभेप्सया

provāca karuṇāviṣṭasteṣāmeva śubhepsayā

—करुणा से भरकर, उनके ही कल्याण की कामना से वे बोले।

श्लोक 52 (skanda.8.56.52)

शुश्रूषितः पुरा विप्रैर्युष्माभिरहमादरात्

śuśrūṣitaḥ purā viprairyuṣmābhirahamādarāt

पहले तुम ब्राह्मणों ने मेरी आदरपूर्वक सेवा की थी...

श्लोक 53 (skanda.8.56.53)

कर्मणा तेन चेदानीं गोबध्याकृतशापतः

karmaṇā tena cedānīṁ gobadhyākṛtaśāpataḥ

—और अब उसी कर्म के कारण, गौ-हत्या से प्राप्त शाप के फलस्वरूप...

श्लोक 54 (skanda.8.56.54)

व्याधत्वमिह संप्राप्ताः कुत्सितं हिंस्रवृत्ति यत्

vyādhatvamiha saṁprāptāḥ kutsitaṁ hiṁsravṛtti yat

—तुमने यहाँ व्याध-योनि प्राप्त की है, वह निन्दित तथा हिंसक वृत्ति।

श्लोक 55 (skanda.8.56.55)

सा च गौः पितृकार्येण भक्षिता वो न हिंसया

sā ca gauḥ pitṛkāryeṇa bhakṣitā vo na hiṁsayā

फिर भी वह गौ तुमने पितृ-कार्य के लिये खायी थी, हिंसा के लिये नहीं।

श्लोक 56 (skanda.8.56.56)

तस्माद् यूयमितो भ्रष्टा जातिस्मरणसंयुताः । मृगाः कालञ्जरे भूत्वा चक्रवाकाः पुनः सरे

tasmād yūyamito bhraṣṭā jātismaraṇasaṁyutāḥ | mṛgāḥ kālañjare bhūtvā cakravākāḥ punaḥ sare

अतः यहाँ से च्युत होकर, पूर्वजन्म के स्मरण से युक्त होकर, तुम कालंजर पर्वत पर मृग बनोगे, फिर किसी सरोवर पर चक्रवाक बनोगे...

श्लोक 57 (skanda.8.56.57)

द्वीपे ततः पुनर्हंसा भूत्वा वै मानसे ह्रदे । भूयश्च मानुषा भूत्वा जातौ जातौ सचेतनाः

dvīpe tataḥ punarhaṁsā bhūtvā vai mānase hrade | bhūyaśca mānuṣā bhūtvā jātau jātau sacetanāḥ

—फिर द्वीप पर मानसरोवर में हंस बनोगे; तथा पुनः मनुष्य बनकर, प्रत्येक जन्म में सचेत रहते हुए...

श्लोक 58 (skanda.8.56.58)

योगयुक्ता महात्मानो मत्प्रसादादतन्द्रिताः । सर्वकिल्बिषनिर्मुक्ता ब्रह्मलोकमवाप्स्यथ

yogayuktā mahātmāno matprasādādatandritāḥ | sarvakilbiṣanirmuktā brahmalokamavāpsyatha

—योगयुक्त, महात्मा, मेरी कृपा से अनालसी होकर, समस्त पापों से मुक्त होकर तुम ब्रह्मलोक को प्राप्त करोगे।

श्लोक 59 (skanda.8.56.59)

एतच्छ्रुत्वा ततस्तेषां पूर्वा स्मृतिरजायत । उपाध्यायोयमस्माकमिति बुद्धौ तदा भवत्

etacchrutvā tatasteṣāṁ pūrvā smṛtirajāyata | upādhyāyoyamasmākamiti buddhau tadā bhavat

यह सुनकर उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति हो आयी; तब उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ — यह तो हमारे ही गुरु हैं।

श्लोक 60 (skanda.8.56.60)

ततः कर्म जुगुप्सन्तः पूर्वजातिकृतं च यत्

tataḥ karma jugupsantaḥ pūrvajātikṛtaṁ ca yat

तब पूर्वजन्म में किये गये उस कर्म से घृणा करते हुए...

श्लोक 61 (skanda.8.56.61)

प्रदक्षिणमुपावृत्य दशार्णामभितो ययुः

pradakṣiṇamupāvṛtya daśārṇāmabhito yayuḥ

—उनकी प्रदक्षिणा करके वे दशार्णा नदी की ओर चले गये।

श्लोक 62 (skanda.8.56.62)

दशार्णातीरमासाद्य संमन्त्र्य च परस्परम् । जातिं पूर्वां स्मरन्तस्ते मृत्युमेव प्रवव्रिरे

daśārṇātīramāsādya saṁmantrya ca parasparam | jātiṁ pūrvāṁ smarantaste mṛtyumeva pravavrire

दशार्णा के तट पर पहुँचकर तथा आपस में विचार-विमर्श करके, पूर्वजन्म का स्मरण करते हुए उन्होंने मृत्यु का ही वरण किया।

श्लोक 63 (skanda.8.56.63)

निश्चितानां ततस्तेषां काण्डरो योभवद् द्विजः । व्याधोर्जुनकनामा स इदं वचनमब्रवीत्

niścitānāṁ tatasteṣāṁ kāṇḍaro yobhavad dvijaḥ | vyādhorjunakanāmā sa idaṁ vacanamabravīt

जब वे इस प्रकार निश्चय कर चुके, तब जो ब्राह्मण कण्डर था, वह व्याध अर्जुनक नामक, यह वचन बोला —

श्लोक 64 (skanda.8.56.64)

भवन्तो यन्मया पूर्वमुक्तास्तन्न कृतं हि वः । इदानीं समनुप्राप्तं मावमन्यत मे वचः

bhavanto yanmayā pūrvamuktāstanna kṛtaṁ hi vaḥ | idānīṁ samanuprāptaṁ māvamanyata me vacaḥ

जो मैंने पहले तुमसे कहा था, तुमने नहीं माना; अब वह घटित हुआ है। अब मेरे वचन का अनादर मत करो।

श्लोक 65 (skanda.8.56.65)

श्रेयो वोहं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं कुरुतैव च । जातिमेतां विमोक्ष्याम येन हास्याम न स्मृतिम्

śreyo vohaṁ pravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ kurutaiva ca | jātimetāṁ vimokṣyāma yena hāsyāma na smṛtim

मैं तुम्हें कल्याणकारी बात बताता हूँ; सुनो और करो, जिससे हम इस योनि को छोड़ सकें और अपनी स्मृति न खोएँ।

श्लोक 66 (skanda.8.56.66)

पुत्रानिच्छन्ति पितरः पुष्ट्यर्थं तारणाय च । वयं च जनितास्तेन व्याधेन सुमहात्मना

putrānicchanti pitaraḥ puṣṭyarthaṁ tāraṇāya ca | vayaṁ ca janitāstena vyādhena sumahātmanā

पिता पुत्रों को पालन-पोषण तथा तारने के लिये चाहते हैं; और हम उन महामना व्याध द्वारा जन्मे हैं।

श्लोक 67 (skanda.8.56.67)

संवर्द्धिताश्च क्लेशेन मात्रा पित्रा तथैव च । अनापृच्छ्य कथं तौ तु मृत्युमिच्छामहे वयम्

saṁvarddhitāśca kleśena mātrā pitrā tathaiva ca | anāpṛcchya kathaṁ tau tu mṛtyumicchāmahe vayam

माता तथा पिता ने भी हमें अत्यंत कष्ट से पाला-पोसा है; उनसे बिना पूछे हम मृत्यु की इच्छा कैसे करें?

श्लोक 68 (skanda.8.56.68)

ते यूयं यदि मन्यध्वं तावापृच्छ्य विसर्जिताः

te yūyaṁ yadi manyadhvaṁ tāvāpṛcchya visarjitāḥ

यदि तुम सब सहमत हो, तो उनसे पूछकर तथा उनकी अनुमति पाकर...

श्लोक 69 (skanda.8.56.69)

योक्ष्याम श्रेयसात्मानमेतद्वो हितमुत्तमम्

yokṣyāma śreyasātmānametadvo hitamuttamam

—तब हम स्वयं को परम श्रेय से युक्त करेंगे; यही तुम्हारे लिये सर्वोत्तम हितकर है।

श्लोक 70 (skanda.8.56.70)

न चेद्विसर्जयेतां तौ तयोः शुश्रूषणे रताः । ततस्तावद्धि तिष्ठामो यावत् कालेन तौ मृतौ

na cedvisarjayetāṁ tau tayoḥ śuśrūṣaṇe ratāḥ | tatastāvaddhi tiṣṭhāmo yāvat kālena tau mṛtau

और यदि वे दोनों हमें अनुमति न दें, तो उनकी सेवा में लगे रहकर हम तब तक रहेंगे, जब तक समय आने पर वे दोनों नहीं मर जाते।

श्लोक 71 (skanda.8.56.71)

ततो वयं कृतात्मानो ह्यनृणाः सर्वथापि च । गमिष्यामो गतिं पुण्यामेतन्नः श्रेय उत्तमम्

tato vayaṁ kṛtātmāno hyanṛṇāḥ sarvathāpi ca | gamiṣyāmo gatiṁ puṇyāmetannaḥ śreya uttamam

तब हम कृतकृत्य होकर, सर्वथा ऋणमुक्त होकर, पुण्य गति को प्राप्त होंगे; यही हमारे लिये सर्वोत्तम कल्याण है।

श्लोक 72 (skanda.8.56.72)

एवमस्त्विति ते सर्वे गृहीत्वा तस्य तद्वचः । चिन्तयन्तः पुरो जन्म गृहानेवाभिजग्मिरे

evamastviti te sarve gṛhītvā tasya tadvacaḥ | cintayantaḥ puro janma gṛhānevābhijagmire

ऐसा ही हो कहकर उन सबने उसका वचन स्वीकार किया; अपने पूर्वजन्म का चिन्तन करते हुए वे सीधे घर की ओर चल पड़े।

श्लोक 73 (skanda.8.56.73)

तानागतान् पिता दृष्ट्वा माता च चितका तदा । तुष्ट्या परमया युक्ता इदं तानूचतुर्वचः

tānāgatān pitā dṛṣṭvā mātā ca citakā tadā | tuṣṭyā paramayā yuktā idaṁ tānūcaturvacaḥ

उन्हें आया देखकर उनके पिता तथा माता चितका ने, परम प्रसन्नता से युक्त होकर, उनसे यह वचन कहा —

श्लोक 74 (skanda.8.56.74)

पुत्रकाः सुचिरादद्य यूयमभ्यागता गृहम्

putrakāḥ sucirādadya yūyamabhyāgatā gṛham

हे पुत्रो! बहुत समय बाद आज तुम घर आये हो।

श्लोक 75 (skanda.8.56.75)

अद्यावां सुदृढं मूढौ किं चिरं कृतमित्युत

adyāvāṁ sudṛḍhaṁ mūḍhau kiṁ ciraṁ kṛtamityuta

आज हमें बड़ी शान्ति मिली। हे मूढो! तुमने इतनी देर क्यों की?

श्लोक 76 (skanda.8.56.76)

चितकोवाच क्षुधाविष्टः पिता वोद्य पुत्रस्नेहेन पुत्रकाः । नात्ति मांसमिदं पक्बं सुराञ्च न पिबत्ययम्

citakovāca kṣudhāviṣṭaḥ pitā vodya putrasnehena putrakāḥ | nātti māṁsamidaṁ pakbaṁ surāñca na pibatyayam

चितका ने कहा — हे पुत्रो! आज भूख से व्याकुल तुम्हारे पिता ने पुत्र-स्नेहवश यह पका हुआ मांस नहीं खाया और न ही यह सुरा पी है।

श्लोक 77 (skanda.8.56.77)

सनत्कुमार उवाच। । तेपि जातिं जुगुप्सन्तः सर्वे वै पापयोनयः । इदमूचुः क्षुपं चैव चितकाञ्च शुभं वचः

sanatkumāra uvāca| | tepi jātiṁ jugupsantaḥ sarve vai pāpayonayaḥ | idamūcuḥ kṣupaṁ caiva citakāñca śubhaṁ vacaḥ

सनत्कुमार ने कहा — वे भी अपनी उस पाप-योनि से घृणा करते हुए क्षुपक तथा चितका से यह शुभ वचन बोले —

श्लोक 78 (skanda.8.56.78)

भवन्तोश्नन्त्वविघ्नेन पुष्टये शान्तयेपि च । नाश्नीमो वयमद्येह श्वो भोक्ष्यामो न संशयः

bhavantośnantvavighnena puṣṭaye śāntayepi ca | nāśnīmo vayamadyeha śvo bhokṣyāmo na saṁśayaḥ

आप दोनों निःसंकोच होकर पुष्टि तथा शान्ति के लिये भोजन कीजिये; हम आज यहाँ नहीं खायेंगे — कल अवश्य खायेंगे।

श्लोक 79 (skanda.8.56.79)

ततस्तौ वृद्धभावेन न बुभुक्षासहौ तदा । आहारयेतामाहारं सुतुष्टौ च बभूवतुः

tatastau vṛddhabhāvena na bubhukṣāsahau tadā | āhārayetāmāhāraṁ sutuṣṭau ca babhūvatuḥ

तब वे दोनों वृद्धावस्था के कारण भूख सहन न कर सके और भोजन कर लिया, और अत्यंत संतुष्ट हुए।

श्लोक 80 (skanda.8.56.80)

तौ तु तुष्टौ समालक्ष्य सर्वेथ शिरसा नताः । ऊचुः प्रयत्नतो वाक्यमैकमत्येन ते तदा

tau tu tuṣṭau samālakṣya sarvetha śirasā natāḥ | ūcuḥ prayatnato vākyamaikamatyena te tadā

उन दोनों को संतुष्ट देखकर, सभी पुत्रों ने सिर झुकाकर, एकमत होकर, तब यत्नपूर्वक यह वचन कहा —

श्लोक 81 (skanda.8.56.81)

पितरौ परिनिर्विण्णा वयमेतेन जन्मना । इच्छामस्तत् परित्यक्तुं तन्नः संमन्तुमर्हथः

pitarau parinirviṇṇā vayametena janmanā | icchāmastat parityaktuṁ tannaḥ saṁmantumarhathaḥ

हे माता-पिता! हम इस जन्म से अत्यंत विरक्त हो गये हैं; हम इसे त्यागना चाहते हैं — आप हमें इसकी अनुमति दें।

श्लोक 82 (skanda.8.56.82)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा पिता तानिदमब्रवीत्

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā pitā tānidamabravīt

उनके उस वचन को सुनकर उनके पिता ने उनसे यह कहा —

श्लोक 83 (skanda.8.56.83)

परिष्वज्य सुतान् सर्वान् बाष्पपर्याकुलेक्षणः

pariṣvajya sutān sarvān bāṣpaparyākulekṣaṇaḥ

—अपने सभी पुत्रों को गले लगाकर, आँखों में आँसू भरे हुए...

श्लोक 84 (skanda.8.56.84)

अहमासं पुरा पुत्रा ब्राह्मणः शंसितव्रतः

ahamāsaṁ purā putrā brāhmaṇaḥ śaṁsitavrataḥ

हे पुत्रो! मैं पहले एक ब्राह्मण था, दृढ़ व्रतों वाला।

श्लोक 85 (skanda.8.56.85)

दिवोदासस्य राजर्षेः सखा परमसंमतः

divodāsasya rājarṣeḥ sakhā paramasaṁmataḥ

—राजर्षि दिवोदास का अत्यंत सम्मानित मित्र।

श्लोक 86 (skanda.8.56.86)

स कदाचिद्वने रम्ये धनुषा कुरुते भृशम्

sa kadācidvane ramye dhanuṣā kurute bhṛśam

एक बार वे एक रमणीय वन में धनुष का अभ्यास कर रहे थे।

श्लोक 87 (skanda.8.56.87)

योग्यात्तमहमाहेदं न त्वं वेत्सि धनुर्नृप । अजानन् किमिदं क्लेशं व्यर्थमेव करोषि च

yogyāttamahamāhedaṁ na tvaṁ vetsi dhanurnṛpa | ajānan kimidaṁ kleśaṁ vyarthameva karoṣi ca

मैंने उनसे उपयुक्त रूप से कहा — हे राजन्! तुम धनुर्विद्या नहीं जानते; बिना जाने यह व्यर्थ का परिश्रम क्यों करते हो?

श्लोक 88 (skanda.8.56.88)

प्रोवाच राजा विप्राणां मन्त्रज्ञानं विधीयते । आमन्त्रणे भोजने च वाचा च कुशला द्विजाः

provāca rājā viprāṇāṁ mantrajñānaṁ vidhīyate | āmantraṇe bhojane ca vācā ca kuśalā dvijāḥ

राजा ने कहा — ब्राह्मणों के लिये मन्त्र-ज्ञान विहित है; द्विज लोग आमन्त्रण, भोजन तथा वाणी में कुशल होते हैं...

श्लोक 89 (skanda.8.56.89)

स मया हसता प्रोक्त आनयस्व धनुर्मम

sa mayā hasatā prokta ānayasva dhanurmama

...स्रोत में यहाँ पाठ खण्डित है... उन्होंने हँसते हुए मुझसे कहा — मेरा धनुष ले आओ।

श्लोक 90 (skanda.8.56.90)

यावत् क्षिपामि लक्ष्याय शरं यत्र ब्रवीषि माम्

yāvat kṣipāmi lakṣyāya śaraṁ yatra bravīṣi mām

—जिससे मैं उस लक्ष्य पर बाण चलाऊँ, जहाँ तुम मुझसे कहो।

श्लोक 91 (skanda.8.56.91)

स तथोक्तस्तदा मह्यं सशरं धनुरर्पयत्

sa tathoktastadā mahyaṁ saśaraṁ dhanurarpayat

इस प्रकार कहे जाने पर उन्होंने तब मुझे बाण सहित धनुष सौंप दिया।

श्लोक 92 (skanda.8.56.92)

तेनोक्तं लक्ष्यमुद्दिश्य शरः क्षिप्तो मया ततः । तत्राभवत् स्थितो विप्रो मृगचारी दृढव्रतः

tenoktaṁ lakṣyamuddiśya śaraḥ kṣipto mayā tataḥ | tatrābhavat sthito vipro mṛgacārī dṛḍhavrataḥ

उनके द्वारा बताये गये लक्ष्य पर निशाना साधकर मैंने बाण चलाया। वहाँ मृगों के बीच विचरण करने वाला एक दृढ़व्रत ब्राह्मण खड़ा था।

श्लोक 93 (skanda.8.56.93)

स तेन विद्धस्तेजस्वी ममार सहसैव च । सोहं तं मृतमालक्ष्य राज्ञा तेन विसर्जितः

sa tena viddhastejasvī mamāra sahasaiva ca | sohaṁ taṁ mṛtamālakṣya rājñā tena visarjitaḥ

उस बाण से बिंधकर वह तेजस्वी ब्राह्मण तत्काल मर गया। उसे मृत देखकर मुझे उस राजा ने विदा कर दिया।

श्लोक 94 (skanda.8.56.94)

ब्रह्मवध्याभयाद् घोरात् पितरं परिपृष्टवान् । प्रोवाच न भयं तेस्ति ब्रह्मवध्या कुतस्तव

brahmavadhyābhayād ghorāt pitaraṁ paripṛṣṭavān | provāca na bhayaṁ testi brahmavadhyā kutastava

ब्रह्महत्या के घोर भय से मैंने अपने पिता से पूछा। उन्होंने कहा — तुम्हें भय नहीं है; तुम्हें ब्रह्महत्या कैसे लगेगी?

श्लोक 95 (skanda.8.56.95)

जात्यन्तरशतं गत्वा दृष्टमेतत् स्वयंभुवा । ततोहं परया भक्त्या पितृशुश्रूषणे रतः

jātyantaraśataṁ gatvā dṛṣṭametat svayaṁbhuvā | tatohaṁ parayā bhaktyā pitṛśuśrūṣaṇe rataḥ

यह स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा सैकड़ों अन्य जन्मों के परे से ही देखा गया है। तब मैं परम भक्ति से पिता की सेवा में तत्पर रहा।

श्लोक 96 (skanda.8.56.96)

अनया भार्यया सार्धं स्थितो वै बहुलाः समाः । स कदाचित् पिता चापि मम कालेन संयुतः

anayā bhāryayā sārdhaṁ sthito vai bahulāḥ samāḥ | sa kadācit pitā cāpi mama kālena saṁyutaḥ

इस पत्नी के साथ मैं अनेक वर्षों तक रहा। एक बार समय आने पर मेरे पिता भी काल को प्राप्त हुए...

श्लोक 97 (skanda.8.56.97)

अवतस्थे च तत्रैव अनयैव सहानघाः । अथ कालेन महता गवाहं विनिपातितः

avatasthe ca tatraiva anayaiva sahānaghāḥ | atha kālena mahatā gavāhaṁ vinipātitaḥ

—वहीं इसी के साथ रहे। हे निष्पापो! फिर बहुत समय बाद मैं एक गौ के द्वारा गिरा दिया गया।

श्लोक 98 (skanda.8.56.98)

अग्निस्थं चावरूढैषा रुदन्ती मां शुभेक्षणा । सोहं गवा हतश्चेति मृगचारिवधेन च

agnisthaṁ cāvarūḍhaiṣā rudantī māṁ śubhekṣaṇā | sohaṁ gavā hataśceti mṛgacārivadhena ca

यह शुभनयना, रोती हुई, अग्नि के पास पड़े हुए मेरे पास आ गयी। इस प्रकार मैं गौ से आहत हुआ, और मृगचारी ब्राह्मण के वध के साथ...

श्लोक 99 (skanda.8.56.99)

व्याधजन्मनि विप्रत्वाद् भ्रष्टः पापेन जज्ञिवान् । जातोस्मि जन्मनां पुत्राः सहस्रं भृशदारुणम्

vyādhajanmani vipratvād bhraṣṭaḥ pāpena jajñivān | jātosmi janmanāṁ putrāḥ sahasraṁ bhṛśadāruṇam

—पाप के कारण ब्राह्मणत्व से भ्रष्ट होकर मैंने व्याध-जन्म प्राप्त किया। हे पुत्रो! मैं सहस्रों अत्यंत भयंकर जन्मों में जन्मा हूँ।

श्लोक 100 (skanda.8.56.100)

पितृभक्त्या च हि तया सम्यगाराधनेन च । नानशन्मे स्मृतिः पुत्रा ज्ञानं चापि प्रवर्तते

pitṛbhaktyā ca hi tayā samyagārādhanena ca | nānaśanme smṛtiḥ putrā jñānaṁ cāpi pravartate

किन्तु उस पितृ-भक्ति तथा भलीभाँति आराधना के कारण ही, हे पुत्रो! मेरी स्मृति नष्ट नहीं हुई और ज्ञान भी बना रहा।

श्लोक 101 (skanda.8.56.101)

जानामि ब्राह्मणान् भ्रष्टान् सर्वान् वै गोकृतेन वः

jānāmi brāhmaṇān bhraṣṭān sarvān vai gokṛtena vaḥ

मैं जानता हूँ कि तुम सब ब्राह्मण गौ के कारण भ्रष्ट हुए हो।

श्लोक 102 (skanda.8.56.102)

गुरोश्चैवानुशापेन भ्रष्टसज्ञाँस्तथैव च

guroścaivānuśāpena bhraṣṭasajñā~stathaiva ca

—और गुरु के शाप से ही तुम्हारी चेतना भी नष्ट हुई थी।

श्लोक 103 (skanda.8.56.103)

पश्चात्तदाज्ञया पुत्रान् सर्वान्वै मुक्तचेतसः । लब्धसंज्ञाँस्तथा चैव सर्वानद्य महाबलाः

paścāttadājñayā putrān sarvānvai muktacetasaḥ | labdhasaṁjñā~stathā caiva sarvānadya mahābalāḥ

बाद में उनकी ही आज्ञा से तुम सभी पुत्र, मुक्तचित्त होकर, हे महाबलियो! आज पुनः चेतना को प्राप्त हुए हो।

श्लोक 104 (skanda.8.56.104)

माता चेयं हि वो वेत्ति साध्वी नित्यं पतिव्रता । यदहं वो ब्रवीम्यद्य तत्कुरुध्वं मम प्रियम

mātā ceyaṁ hi vo vetti sādhvī nityaṁ pativratā | yadahaṁ vo bravīmyadya tatkurudhvaṁ mama priyama

और तुम्हारी यह माता भी, जो साध्वी तथा सदा पतिव्रता है, यह जानती है। मैं आज तुमसे जो कहता हूँ, वह करो, यह मुझे प्रिय होगा।

श्लोक 105 (skanda.8.56.105)

अवाप्स्यथ ततः श्रेयः सर्वे यूयमतन्द्रिताः

avāpsyatha tataḥ śreyaḥ sarve yūyamatandritāḥ

तब तुम सभी अनालसी होकर श्रेय को प्राप्त करोगे।

श्लोक 106 (skanda.8.56.106)

अनामया विशोकाश्च न च संज्ञां प्रहास्यथ

anāmayā viśokāśca na ca saṁjñāṁ prahāsyatha

—रोग तथा शोक से रहित होकर, तुम अपनी चेतना को नहीं खोओगे।

श्लोक 107 (skanda.8.56.107)

पुत्रा जन्मेदमन्त्यं मे मनुष्येषु न संशयः । इतो मृतेन गन्तव्यं मया ब्रह्मसदः शुभम्

putrā janmedamantyaṁ me manuṣyeṣu na saṁśayaḥ | ito mṛtena gantavyaṁ mayā brahmasadaḥ śubham

हे पुत्रो! मनुष्यों में यह मेरा अन्तिम जन्म है, इसमें संशय नहीं। यहाँ से मरकर मुझे शुभ ब्रह्मसभा में जाना है।

श्लोक 108 (skanda.8.56.108)

ते यूयं मां प्रतीक्षध्वं कंचित्कालमतन्द्रिताः

te yūyaṁ māṁ pratīkṣadhvaṁ kaṁcitkālamatandritāḥ

अतः तुम अनालसी होकर मेरी कुछ समय तक प्रतीक्षा करो।

श्लोक 109 (skanda.8.56.109)

स्वर्गते मयि यच्छ्रेयस्तत्करिष्यथ मा शुचः

svargate mayi yacchreyastatkariṣyatha mā śucaḥ

मेरे स्वर्गवासी होने पर जो श्रेयस्कर हो, वह करना; शोक मत करो।

श्लोक 110 (skanda.8.56.110)

अवश्यञ्च सुतैर्माता पिता चैव सुदुःखितौ

avaśyañca sutairmātā pitā caiva suduḥkhitau

और अत्यंत दुःखी माता-पिता की सेवा पुत्रों द्वारा अवश्य करनी चाहिये...

श्लोक 111 (skanda.8.56.111)

शुश्रूषितव्यौ नान्योस्ति धर्मोस्माद् बलवत्तरः

śuśrūṣitavyau nānyosti dharmosmād balavattaraḥ

—यह अवश्य करना चाहिये; इससे बड़ा कोई अन्य धर्म नहीं है।

श्लोक 112 (skanda.8.56.112)

सनत्कुमार उवाच। । ततस्ते विस्मिता भूत्वा नष्टशोका विमत्सराः । तं कालं पर्युपासन्त यावत्तौ जहतुस्त्वसून्

sanatkumāra uvāca| | tataste vismitā bhūtvā naṣṭaśokā vimatsarāḥ | taṁ kālaṁ paryupāsanta yāvattau jahatustvasūn

सनत्कुमार ने कहा — तब वे विस्मित होकर, शोकरहित तथा ईर्ष्यारहित होकर, उस समय तक प्रतीक्षा करते रहे, जब तक वे दोनों प्राण त्याग नहीं गये।

श्लोक 113 (skanda.8.56.113)

तयोरतीतयोः सम्यक् कृत्वा ते ह्यौर्ध्वदेहिकम्

tayoratītayoḥ samyak kṛtvā te hyaurdhvadehikam

उन दोनों के मरने पर, उनके लिये भलीभाँति ऊर्ध्वदैहिक कर्म करके...

श्लोक 114 (skanda.8.56.114)

दशार्णायां महानद्यां विधिनानशनेन ह

daśārṇāyāṁ mahānadyāṁ vidhinānaśanena ha

—महानदी दशार्णा के तट पर, विधिपूर्वक उपवास द्वारा...

श्लोक 115 (skanda.8.56.115)

असाधयन्त आत्मानं व्याधाः सप्तापि ते तदा

asādhayanta ātmānaṁ vyādhāḥ saptāpi te tadā

—उन सातों व्याधों ने तब स्वयं को सिद्ध किया।

श्लोक 116 (skanda.8.56.116)

कालञ्जरे गिरौ भूयो मृगाः सप्तैव जज्ञिरे

kālañjare girau bhūyo mṛgāḥ saptaiva jajñire

कालंजर पर्वत पर वे पुनः सात मृगों के रूप में उत्पन्न हुए।

श्लोक 117 (skanda.8.56.117)

स्मरन्तस्तत्र ते जातिं मरुत्प्रपतनेन ह । साधयित्वा तदात्मानं चक्रवाकेषु जज्ञिरे

smarantastatra te jātiṁ marutprapatanena ha | sādhayitvā tadātmānaṁ cakravākeṣu jajñire

वहाँ अपने जन्म का स्मरण करते हुए, पर्वत से गिरकर उन्होंने स्वयं को सिद्ध किया और फिर चक्रवाक पक्षियों में जन्म लिया।

श्लोक 118 (skanda.8.56.118)

मृगत्वे यानि नामानि तेषां तानि निबोध मे । दीर्घजीवी ह्यनाधृष्टो वायुवेगोभिकम्पनः

mṛgatve yāni nāmāni teṣāṁ tāni nibodha me | dīrghajīvī hyanādhṛṣṭo vāyuvegobhikampanaḥ

मृग-रूप में उनके जो नाम थे, वे मुझसे सुनो — दीर्घजीवी, अनाधृष्ट, वायुवेग, अभिकम्पन...

श्लोक 119 (skanda.8.56.119)

श्रीपार्श्वः शंखपाच्चैव सोमलक्ष्यश्च सप्तमः । जातिं स्मरन्तस्ते पूर्वामन्योन्यमभिमान्य च

śrīpārśvaḥ śaṁkhapāccaiva somalakṣyaśca saptamaḥ | jātiṁ smarantaste pūrvāmanyonyamabhimānya ca

—श्रीपार्श्व, शंखपा तथा सातवाँ सोमलक्ष्य। अपने पूर्वजन्म का स्मरण करते हुए, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए...

श्लोक 120 (skanda.8.56.120)

सहिताः सहसा प्राणान् मरुत्प्रपतनाज्जहुः । ते सप्तसंख्या व्याधेषु मृगेषु च तथा पुनः

sahitāḥ sahasā prāṇān marutprapatanājjahuḥ | te saptasaṁkhyā vyādheṣu mṛgeṣu ca tathā punaḥ

—साथ मिलकर उन्होंने पर्वत से गिरकर सहसा प्राण त्याग दिये। वे सातों, व्याधों तथा फिर मृगों में जन्म लेकर...

श्लोक 121 (skanda.8.56.121)

जन्म प्राप्य पुनर्जाताः शरद्वीपे खगास्ततः । शरद्वीपमिति ख्यातं काम्पिल्येषु सरः शुभम्

janma prāpya punarjātāḥ śaradvīpe khagāstataḥ | śaradvīpamiti khyātaṁ kāmpilyeṣu saraḥ śubham

—पुनः जन्म प्राप्त कर वे शरद्वीप में पक्षी बने। शरद्वीप काम्पिल्य देश में स्थित एक शुभ, विख्यात सरोवर का नाम है।

श्लोक 122 (skanda.8.56.122)

तत्रापि चक्रवाकास्ते सप्ताजायन्त सोदराः । मरुद्देवः शिखंडी च रथनेमिस्वरस्तथा

tatrāpi cakravākāste saptājāyanta sodarāḥ | maruddevaḥ śikhaṁḍī ca rathanemisvarastathā

वहाँ भी वे सातों भाई चक्रवाक पक्षी के रूप में जन्मे — मरुद्देव, शिखंडी तथा रथनेमिस्वर...

श्लोक 123 (skanda.8.56.123)

शिखी जीवोथ वृक्षश्च ध्वज इत्येव ते स्मृताः

śikhī jīvotha vṛkṣaśca dhvaja ityeva te smṛtāḥ

—शिखी, जीव, वृक्ष तथा ध्वज — इन नामों से वे जाने गये।

श्लोक 124 (skanda.8.56.124)

तेषां तत्रोपपन्नानां कदाचिदणुहः स्वयम् । काम्पिल्यको महातेजा राजा तं देशमागमत्

teṣāṁ tatropapannānāṁ kadācidaṇuhaḥ svayam | kāmpilyako mahātejā rājā taṁ deśamāgamat

जब वे वहाँ रह रहे थे, एक बार स्वयं काम्पिल्य का महातेजस्वी राजा उस प्रदेश में आया।

श्लोक 125 (skanda.8.56.125)

स तत्सरः समासाद्य स्त्रीभिः सहः मुदान्वितः । रेमे मन्दाकिनीं प्राप्य अप्सरोभिरिवामरः

sa tatsaraḥ samāsādya strībhiḥ sahaḥ mudānvitaḥ | reme mandākinīṁ prāpya apsarobhirivāmaraḥ

उस सरोवर पर पहुँचकर वह अपनी स्त्रियों के साथ, आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करने लगा, जैसे कोई देवता मन्दाकिनी में अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करता हो।

श्लोक 126 (skanda.8.56.126)

तं क्रीडमानं संदृश्य मरुद्देवस्य तत्र वै । चक्रवाकस्य तस्यासीत् स्पृहा तान् विषयान् प्रति

taṁ krīḍamānaṁ saṁdṛśya maruddevasya tatra vai | cakravākasya tasyāsīt spṛhā tān viṣayān prati

उसे क्रीड़ा करते हुए देखकर वहाँ चक्रवाक मरुद्देव के मन में उन विषय-सुखों के प्रति लालसा उत्पन्न हो गयी।

श्लोक 127 (skanda.8.56.127)

यद्यस्याहं सुतः स्यां वै प्राप्नुयां राज्यमेव च

yadyasyāhaṁ sutaḥ syāṁ vai prāpnuyāṁ rājyameva ca

यदि मैं इनका पुत्र होता, तो राज्य को प्राप्त कर लेता...

श्लोक 128 (skanda.8.56.128)

ततोहं विषयानेतान् प्राप्नुयां नात्र संशयः

tatohaṁ viṣayānetān prāpnuyāṁ nātra saṁśayaḥ

—तो मैं इन सभी विषय-सुखों को अवश्य प्राप्त कर लेता।

श्लोक 129 (skanda.8.56.129)

तस्य तच्चिन्तितं ज्ञात्वा द्वितीयश्चक्रसाह्वयः । शिखंडीति समाख्यातः स तमाह तदा हसन्

tasya taccintitaṁ jñātvā dvitīyaścakrasāhvayaḥ | śikhaṁḍīti samākhyātaḥ sa tamāha tadā hasan

उसके इस विचार को जानकर दूसरे चक्रवाक भाई, जो शिखंडी कहलाता था, उसने हँसते हुए उससे कहा —

श्लोक 130 (skanda.8.56.130)

भवता राजपुत्रत्वं राज्यं चैव विचिन्तितम् । तत्राहं ते पुरोधाः स्यां ममाप्येष मनोरथः

bhavatā rājaputratvaṁ rājyaṁ caiva vicintitam | tatrāhaṁ te purodhāḥ syāṁ mamāpyeṣa manorathaḥ

तुमने राजपुत्र बनने तथा राज्य पाने की कामना की है; तो मैं तुम्हारा पुरोहित बनूँ — मेरी भी यही अभिलाषा है।

श्लोक 131 (skanda.8.56.131)

ताभ्यां तच्चिन्तितं ज्ञात्वा रथनेमिस्वरस्ततः

tābhyāṁ taccintitaṁ jñātvā rathanemisvarastataḥ

उन दोनों के इस विचार को जानकर रथनेमिस्वर ने तब...

श्लोक 132 (skanda.8.56.132)

अचिन्तयत तत्राहं सचिवः स्यां तव प्रभो

acintayata tatrāhaṁ sacivaḥ syāṁ tava prabho

—यह सोचा — तो मैं तुम्हारा मन्त्री बनूँ, हे प्रभो!

श्लोक 133 (skanda.8.56.133)

सनत्कुमार उवाच। । तेषां तथा चिन्तयतां त्रयाणामितरे ततः

sanatkumāra uvāca| | teṣāṁ tathā cintayatāṁ trayāṇāmitare tataḥ

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार उन तीनों के सोचते रहने पर तब शेष भाइयों ने...

श्लोक 134 (skanda.8.56.134)

चक्राह्वयास्तदा क्रुद्धा इदं तानब्रुवन् वचः

cakrāhvayāstadā kruddhā idaṁ tānabruvan vacaḥ

—वे शेष चक्रवाक भाई क्रोधित होकर उनसे यह वचन बोले —

श्लोक 135 (skanda.8.56.135)

अचिन्तनीयं युष्माभिश्चिन्तितं विषयार्थिभिः । तस्माद् यूयमितो मुक्ता अवाप्स्यथ मनोरथम्

acintanīyaṁ yuṣmābhiścintitaṁ viṣayārthibhiḥ | tasmād yūyamito muktā avāpsyatha manoratham

तुमने विषयों की कामना करते हुए वह सोचा है, जिसे नहीं सोचना चाहिये था। अतः हमसे मुक्त होकर तुम अपनी अभिलाषा प्राप्त करो।

श्लोक 136 (skanda.8.56.136)

ताञ्छप्त्वा दीनमनसः समालक्ष्य पुनश्च ते । येन तद्राजपुत्रत्वं चिन्तितं राज्यमेव च

tāñchaptvā dīnamanasaḥ samālakṣya punaśca te | yena tadrājaputratvaṁ cintitaṁ rājyameva ca

उन्हें शाप देकर, फिर उन्हें दीन-मन देखकर, वे शेष भाई, जिन्होंने राजपुत्रत्व तथा राज्य की कामना नहीं की थी...

श्लोक 137 (skanda.8.56.137)

कृपया तमिदं वाक्यमब्रुवन्नष्टचेतसम् । बहुसान्त्वगुणोपेतं स्वयं दुःखितवद्यथा

kṛpayā tamidaṁ vākyamabruvannaṣṭacetasam | bahusāntvaguṇopetaṁ svayaṁ duḥkhitavadyathā

—दया करके उस चेतनाशून्य भाई से यह वचन कहा, जो अनेक सान्त्वनापूर्ण गुणों से युक्त था, मानो वे स्वयं दुःखी हों।

श्लोक 138 (skanda.8.56.138)

वयं तव प्रभावेण तीर्णाः कृच्छ्रमिदं प्रभो । भवान् मतिप्रदोस्माकं सेतुभूतो मतो हि नः

vayaṁ tava prabhāveṇa tīrṇāḥ kṛcchramidaṁ prabho | bhavān matipradosmākaṁ setubhūto mato hi naḥ

हे प्रभो! तुम्हारे ही प्रभाव से हमने इस कठिनाई को पार किया है; तुम हमारे बुद्धिदाता तथा सेतु के समान माने गये हो।

श्लोक 139 (skanda.8.56.139)

भवान् यदि हि न ब्रूयात् पितॄणां गौर्निवेद्यताम् । शुश्रूषेमश्च न पितॄन् न स्म संज्ञा ततो भवेत्

bhavān yadi hi na brūyāt pitṝṇāṁ gaurnivedyatām | śuśrūṣemaśca na pitṝn na sma saṁjñā tato bhavet

यदि तुमने न कहा होता कि गौ की बात पितरों को बतायी जाये, तो हम पितरों की सेवा न करते, और तब हमें चेतना प्राप्त न होती।

श्लोक 140 (skanda.8.56.140)

तव प्रभावादेतन्नो यौगैश्वर्यप्रवर्तनम् । ततो वयं पुनः श्रेयस्तव ब्रूमः शृणुष्व नः

tava prabhāvādetanno yaugaiśvaryapravartanam | tato vayaṁ punaḥ śreyastava brūmaḥ śṛṇuṣva naḥ

तुम्हारे ही प्रभाव से हमें यह योग-ऐश्वर्य की प्राप्ति हुई है। अतः हम पुनः तुम्हारे लिये कल्याणकारी बात कहते हैं; हमें सुनो।

श्लोक 141 (skanda.8.56.141)

तावत्त्वं सक्तहृदयो भविष्यसि नराधिप । यावदस्मद्वचस्तत्थ्यं न श्रोष्यसि सहायवान् । योगज्ञानमवाप्यैव प्राप्स्यसे च गतिं शुभाम

tāvattvaṁ saktahṛdayo bhaviṣyasi narādhipa | yāvadasmadvacastatthyaṁ na śroṣyasi sahāyavān | yogajñānamavāpyaiva prāpsyase ca gatiṁ śubhāma

हे नराधिप! तुम तब तक आसक्त-हृदय बने रहोगे, जब तक अपने सहायक सहित हमारे इस सत्य वचन को नहीं सुनोगे; योग-ज्ञान प्राप्त करके ही तुम शुभ गति को प्राप्त करोगे।

श्लोक 142 (skanda.8.56.142)

सनत्कुमार उवाच। । ततस्ते सहिताः सर्वे युक्तात्मानो महाखगाः । खगत्वं संपरित्यज्य योनिमन्यां प्रपेदिरे

sanatkumāra uvāca| | tataste sahitāḥ sarve yuktātmāno mahākhagāḥ | khagatvaṁ saṁparityajya yonimanyāṁ prapedire

सनत्कुमार ने कहा — तब वे सभी मिलकर, वे महापक्षी, योगयुक्त आत्मा वाले होकर, पक्षी-भाव को त्यागकर अन्य योनि को प्राप्त हुए।

श्लोक 143 (skanda.8.56.143)

सर्वे ततस्ते मुनिकोपदग्धा व्याधा मृगाश्चक्रसमाह्वयाश्च । जाताः पुनर्मानुषविग्रहेषु योगेश्वरास्ते त्रय एव राज्ये

sarve tataste munikopadagdhā vyādhā mṛgāścakrasamāhvayāśca | jātāḥ punarmānuṣavigraheṣu yogeśvarāste traya eva rājye

इस प्रकार वे सभी, मुनि के शाप से संतप्त होकर — व्याध, मृग तथा चक्रवाक — पुनः मानव शरीरों में जन्म लिये; और वे तीनों राज्य में ही योगेश्वर बन गये।

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