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अम्बिका खण्ड · अध्याय 57

तीन बन्धु और ब्रह्मधन्व का शाप

अध्याय 56अध्याय-सूचीअध्याय 58

श्लोक 1 (skanda.8.57.1)

सनत्कुमार उवाच। । चत्वारस्ते तु शास्तारः खगाः स्वच्छन्दतः पुनः । यायावरस्यः विप्रस्य सुता जाता महात्मनः

sanatkumāra uvāca| | catvāraste tu śāstāraḥ khagāḥ svacchandataḥ punaḥ | yāyāvarasyaḥ viprasya sutā jātā mahātmanaḥ

सनत्कुमार ने कहा — वे चार संयमी पक्षी पुनः स्वेच्छा से एक यायावर महात्मा ब्राह्मण के पुत्रों के रूप में जन्मे।

श्लोक 2 (skanda.8.57.2)

तेषु जातेषु विप्रोसावक्लेशेन महातपाः । वृत्तिं समानयामास तेषां भाग्यपुरःसरः

teṣu jāteṣu viprosāvakleśena mahātapāḥ | vṛttiṁ samānayāmāsa teṣāṁ bhāgyapuraḥsaraḥ

उनके जन्म लेने पर उन महातपस्वी ब्राह्मण ने बिना किसी कष्ट के, उनके भाग्य के अनुकूल, उनकी जीविका का प्रबन्ध किया।

श्लोक 3 (skanda.8.57.3)

चीर्णवेदव्रतास्ते तु वेदान्साङ्गानधीत्य च । योगमेव न्यषेवन्त तन्निष्ठास्तत्परायणाः

cīrṇavedavratāste tu vedānsāṅgānadhītya ca | yogameva nyaṣevanta tanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ

वेद-व्रतों का पालन करके तथा वेदों को अंगों सहित पढ़कर, वे केवल योग में ही तत्पर हो गये, उसी में निष्ठ तथा उसी के परायण।

श्लोक 4 (skanda.8.57.4)

इतरेपि त्रयो व्यास कर्मणा स्वेन चोदिताः

itarepi trayo vyāsa karmaṇā svena coditāḥ

हे व्यास! शेष तीनों अपने ही कर्म से प्रेरित होकर...

श्लोक 5 (skanda.8.57.5)

प्रत्यपद्यन्त तज्जन्म यत् पुरा तै र्विचिन्तितम्

pratyapadyanta tajjanma yat purā tai rvicintitam

—उसी जन्म को प्राप्त हुए, जिसकी उन्होंने पूर्व में कामना की थी।

श्लोक 6 (skanda.8.57.6)

प्रथमो ह्यणुहाज्जज्ञे ब्रह्मदत्त इति स्मृतः । एकोणुहस्य पुत्रोभूद् द्वितीयस्तत्पुरोधसः

prathamo hyaṇuhājjajñe brahmadatta iti smṛtaḥ | ekoṇuhasya putrobhūd dvitīyastatpurodhasaḥ

पहला अणुह से उत्पन्न हुआ, जो ब्रह्मदत्त कहलाया; एक अणुह का पुत्र बना, दूसरा उसके पुरोहित का पुत्र...

श्लोक 7 (skanda.8.57.7)

तृतीयः सचिवस्याथ त्रयस्ते जन्म तद् गताः । त्रयोग्नय इवासंस्ते लोकास्त्रय इवाथवा । अवर्द्धन्त महात्मान स्त्रयस्ते सागरा इव

tṛtīyaḥ sacivasyātha trayaste janma tad gatāḥ | trayognaya ivāsaṁste lokāstraya ivāthavā | avarddhanta mahātmāna strayaste sāgarā iva

—और तीसरा उसके मन्त्री का पुत्र बना; वे तीनों उस जन्म को प्राप्त हुए। वे मानो तीन अग्नियों के समान, अथवा तीन लोकों के समान थे; वे महात्मा तीनों सागरों के समान बढ़ते गये।

श्लोक 8 (skanda.8.57.8)

तेषामवाप्तविद्यानां योग्यानां च स्वकर्मणि

teṣāmavāptavidyānāṁ yogyānāṁ ca svakarmaṇi

उनकी विद्या पूर्ण होने पर तथा अपने-अपने कर्तव्य के योग्य हो जाने पर...

श्लोक 9 (skanda.8.57.9)

पितरः स्वानि कर्माणि प्रददुर्हृष्टमानसाः

pitaraḥ svāni karmāṇi pradadurhṛṣṭamānasāḥ

—उनके पिताओं ने प्रसन्नचित्त होकर अपने-अपने पद उन्हें सौंप दिये।

श्लोक 10 (skanda.8.57.10)

अणुहः प्रददौ राज्यं ब्रह्मदत्ताय पुष्कलम् । कीर्तिमत्या च सहितस्ततो वनमगाच्य सः

aṇuhaḥ pradadau rājyaṁ brahmadattāya puṣkalam | kīrtimatyā ca sahitastato vanamagācya saḥ

अणुह ने ब्रह्मदत्त को समृद्ध राज्य सौंप दिया, और फिर कीर्तिमती के साथ वन को चले गये।

श्लोक 11 (skanda.8.57.11)

पुरोधा धृतरातस्तु पुत्रं स्वे कर्मणि प्रभुः । स्थापयित्वा जगामाथ पंचालं शंसितव्रतः

purodhā dhṛtarātastu putraṁ sve karmaṇi prabhuḥ | sthāpayitvā jagāmātha paṁcālaṁ śaṁsitavrataḥ

पुरोहित धृतरात ने अपने पुत्र पंचाल को अपने पद पर स्थापित करके, दृढ़व्रत होकर वन को प्रस्थान किया।

श्लोक 12 (skanda.8.57.12)

सचिवोपि सुधन्वा तु ब्रह्मधन्वानमच्युतम्

sacivopi sudhanvā tu brahmadhanvānamacyutam

मन्त्री सुधन्वा ने भी अपने अटल पुत्र ब्रह्मधन्व को...

श्लोक 13 (skanda.8.57.13)

पुत्रं स्वे कर्मणि स्थाप्य जगाम सह भार्यया

putraṁ sve karmaṇi sthāpya jagāma saha bhāryayā

—अपने पद पर स्थापित करके अपनी पत्नी के साथ चले गये।

श्लोक 14 (skanda.8.57.14)

गतेषु तेषु स्वाँल्लोकान् ब्रह्मदत्तः प्रतापवान् । पञ्चालब्रह्मधन्वभ्यां सह राज्यं चकार ह

gateṣu teṣu svā~llokān brahmadattaḥ pratāpavān | pañcālabrahmadhanvabhyāṁ saha rājyaṁ cakāra ha

उनके अपने-अपने लोकों को चले जाने पर, प्रतापी ब्रह्मदत्त ने पंचाल तथा ब्रह्मधन्व के साथ राज्य किया।

श्लोक 15 (skanda.8.57.15)

प्रशासतस्तथा राज्यं यजतो भुञ्जतश्च ह

praśāsatastathā rājyaṁ yajato bhuñjataśca ha

इस प्रकार राज्य करते हुए, यज्ञ करते हुए तथा भोग करते हुए...

श्लोक 16 (skanda.8.57.16)

जग्मुः सुखेन बहुलाः समाः सुकृतिनस्तदा

jagmuḥ sukhena bahulāḥ samāḥ sukṛtinastadā

—उन सुकृती जनों के अनेक वर्ष सुखपूर्वक बीत गये।

श्लोक 17 (skanda.8.57.17)

अथ कालेन महता सभार्यः ससुहृज्जनः । तस्थौ स वेश्मनि सुखं कुबेर इव पुष्पके

atha kālena mahatā sabhāryaḥ sasuhṛjjanaḥ | tasthau sa veśmani sukhaṁ kubera iva puṣpake

फिर बहुत समय बाद, पत्नी तथा मित्रों सहित, वे अपने भवन में सुखपूर्वक निवास करने लगे, जैसे कुबेर पुष्पक विमान में।

श्लोक 18 (skanda.8.57.18)

ततः सर्वरुतज्ञाता पिपीलं कामकारणात्

tataḥ sarvarutajñātā pipīlaṁ kāmakāraṇāt

तब समस्त प्राणियों की बोली जानने वाले उन्होंने संयोगवश एक चींटी को...

श्लोक 19 (skanda.8.57.19)

पिपीलिकायाञ्चाटूनि कुर्वाणं सोन्वपश्यत

pipīlikāyāñcāṭūni kurvāṇaṁ sonvapaśyata

—उन्होंने देखा कि एक चींटी दूसरी चींटी के प्रति चाटुकारिता कर रही है।

श्लोक 20 (skanda.8.57.20)

स तु ज्ञानाद् विनिश्चिन्त्य कृमियोनावपीदृशम् । विवृतं शब्दवच्चैव हासमुत्सृजतानघ

sa tu jñānād viniścintya kṛmiyonāvapīdṛśam | vivṛtaṁ śabdavaccaiva hāsamutsṛjatānagha

अपने ज्ञान से यह समझकर कि कृमि-योनि में भी इस प्रकार की बात होती है, हे निष्पाप! वे खुलकर हँस पड़े।

श्लोक 21 (skanda.8.57.21)

तत्तस्य हसितं दृष्ट्वा पत्नी नीलोत्पलेक्षणा

tattasya hasitaṁ dṛṣṭvā patnī nīlotpalekṣaṇā

उन्हें हँसते देखकर नीलकमल के समान नेत्रों वाली उनकी पत्नी...

श्लोक 22 (skanda.8.57.22)

चुकोप किमिदं मेद्य विकृतं लक्षितं त्वया

cukopa kimidaṁ medya vikṛtaṁ lakṣitaṁ tvayā

—क्रोधित हो गयीं — आज तुमने मुझमें ऐसा क्या विचित्र देख लिया?

श्लोक 23 (skanda.8.57.23)

तां स राजा समाविग्नः प्रियां प्राणैर्गरीयसीम् । प्रसादयन्न चैवास्य प्रसीदत शुभानना

tāṁ sa rājā samāvignaḥ priyāṁ prāṇairgarīyasīm | prasādayanna caivāsya prasīdata śubhānanā

उस राजा ने व्याकुल होकर अपनी प्राणों से भी अधिक प्रिय पत्नी को मनाने का प्रयत्न किया; परन्तु वह सुमुखी प्रसन्न नहीं हुई।

श्लोक 24 (skanda.8.57.24)

सा यदा बहु तथ्यञ्च उच्यमाना न तुष्यति । तदा तस्याः प्रसादार्थे स विष्णुं संप्रसादयत्

sā yadā bahu tathyañca ucyamānā na tuṣyati | tadā tasyāḥ prasādārthe sa viṣṇuṁ saṁprasādayat

जब उन्हें बहुत सत्य बातें बताये जाने पर भी वे संतुष्ट नहीं हुईं, तब उन्हें प्रसन्न करने के लिये उन्होंने विष्णु की आराधना की।

श्लोक 25 (skanda.8.57.25)

देवं सालवनं गत्वा पञ्चालेन सहैव सः । ब्रह्मधन्वपुरोवाहो रथेन महता महान्

devaṁ sālavanaṁ gatvā pañcālena sahaiva saḥ | brahmadhanvapurovāho rathena mahatā mahān

देव के शालवन को पंचाल के साथ जाकर, ब्रह्मधन्व को आगे किये हुए, वह महान् राजा एक विशाल रथ पर गये।

श्लोक 26 (skanda.8.57.26)

तत्रासौ सप्तमे त्वह्नि विष्णुनाभिविसर्जितः । जगाम नरशार्दूलः काम्पिल्यं स्वं पुरोत्तमम्

tatrāsau saptame tvahni viṣṇunābhivisarjitaḥ | jagāma naraśārdūlaḥ kāmpilyaṁ svaṁ purottamam

वहाँ सातवें दिन विष्णु द्वारा विदा किये जाने पर वह नरश्रेष्ठ राजा अपनी श्रेष्ठ राजधानी काम्पिल्य को लौट गया।

श्लोक 27 (skanda.8.57.27)

एतस्मिन्नेव काले तु चत्वारो ब्राह्मणाः शुभाः । योगेन महता युक्ता इदमूचुः परस्परम्

etasminneva kāle tu catvāro brāhmaṇāḥ śubhāḥ | yogena mahatā yuktā idamūcuḥ parasparam

इसी समय वे चारों शुभ ब्राह्मण, महायोग से युक्त होकर, आपस में यह कहने लगे —

श्लोक 28 (skanda.8.57.28)

वयं कृतार्थाः किं कार्यमिह तिष्ठाम मानुषे । गच्छाम ब्रह्मयोनिं स्वां मुच्यामोस्मान्महाभयात्

vayaṁ kṛtārthāḥ kiṁ kāryamiha tiṣṭhāma mānuṣe | gacchāma brahmayoniṁ svāṁ mucyāmosmānmahābhayāt

हम कृतकृत्य हो चुके हैं; अब मनुष्य-योनि में रहने से क्या प्रयोजन? चलो, हम अपने ब्रह्म-स्रोत को चलें; इस महाभय से स्वयं को मुक्त करें।

श्लोक 29 (skanda.8.57.29)

अवसीदन्ति ते चैव त्रयोस्माकं सहव्रताः । बोधयामेह ताँश्चैव यथा नेयुः पराभवम्

avasīdanti te caiva trayosmākaṁ sahavratāḥ | bodhayāmeha tā~ścaiva yathā neyuḥ parābhavam

और हमारे उन तीन सहव्रती भाइयों की स्थिति गिर रही है; आओ, हम यहाँ उन्हें जगायें, जिससे वे पराभव को प्राप्त न हों।

श्लोक 30 (skanda.8.57.30)

ततस्ते पितरं सर्वे प्रणम्योचुर्द्विजातयः । वयं योगेश्वरास्तात सिद्धा वै स्वेन कर्मणा

tataste pitaraṁ sarve praṇamyocurdvijātayaḥ | vayaṁ yogeśvarāstāta siddhā vai svena karmaṇā

तब उन सभी द्विजों ने अपने पिता को प्रणाम करके कहा — हे तात! हम योगेश्वर हैं, अपने ही कर्म से सिद्ध हुए हैं।

श्लोक 31 (skanda.8.57.31)

आपृच्छामो गमिष्यामः स्वां योनिं ब्रह्मनिर्मिताम् । त्यक्त्वेमान् मानुषान् देहान्न विसर्जय नमस्तव

āpṛcchāmo gamiṣyāmaḥ svāṁ yoniṁ brahmanirmitām | tyaktvemān mānuṣān dehānna visarjaya namastava

हम आज्ञा माँगते हैं, हम इन मानव शरीरों को त्यागकर ब्रह्मा द्वारा निर्मित अपने स्रोत को जायेंगे; हमें मत रोकिये — आपको नमस्कार है।

श्लोक 32 (skanda.8.57.32)

पित्रोवाच पुत्रानिच्छन्ति पितरस्तारयिष्यन्ति नो भयात् । भयं तच्चैहिकं पुत्राः परत्र च दुरासदम्

pitrovāca putrānicchanti pitarastārayiṣyanti no bhayāt | bhayaṁ taccaihikaṁ putrāḥ paratra ca durāsadam

पिता ने कहा — पिता पुत्रों की इच्छा इसलिये करते हैं कि वे उन्हें भय से तारेंगे। हे पुत्रो! वह भय इहलौकिक भी है और परलोक में भी दुर्गम है।

श्लोक 33 (skanda.8.57.33)

ते यूयमृणसंयुक्ता अमुक्त्वा स्वं निबन्धनम् । कथं गच्छथ भद्रं वो नाधर्मं परिपश्यथ

te yūyamṛṇasaṁyuktā amuktvā svaṁ nibandhanam | kathaṁ gacchatha bhadraṁ vo nādharmaṁ paripaśyatha

तुम अभी भी ऋण से बँधे हो, अपने दायित्व से मुक्त हुए बिना — कैसे जाओगे? तुम्हारा कल्याण हो — क्या तुम इसमें अधर्म नहीं देखते?

श्लोक 34 (skanda.8.57.34)

सुता ऊचुः। । वयं योगेश्वरास्तात लोकाँस्तुभ्यमनामयान्

sutā ūcuḥ| | vayaṁ yogeśvarāstāta lokā~stubhyamanāmayān

पुत्रों ने कहा — हे तात! हम योगेश्वर हैं; हम आपको रोगरहित लोक...

श्लोक 35 (skanda.8.57.35)

प्रयच्छामो न संदेहो यत्र गत्वा न शोचसि

prayacchāmo na saṁdeho yatra gatvā na śocasi

...निःसंदेह प्रदान करेंगे, जहाँ जाकर आप कभी शोक नहीं करेंगे।

श्लोक 36 (skanda.8.57.36)

अस्माभिस्त्वं कथं पुत्रैर्ब्रह्मत्वं नाप्नुयाः पितः । इहापि लोके द्रव्यं ते विधास्यामस्तथा शृणु

asmābhistvaṁ kathaṁ putrairbrahmatvaṁ nāpnuyāḥ pitaḥ | ihāpi loke dravyaṁ te vidhāsyāmastathā śṛṇu

हे पिता! हमारे द्वारा, अपने पुत्रों के द्वारा आप ब्रह्मत्व को कैसे प्राप्त नहीं करेंगे? इसी लोक में भी हम आपके धन का प्रबन्ध करेंगे — सुनिये कैसे।

श्लोक 37 (skanda.8.57.37)

इदं त्वं पत्रमादाय ब्रह्मदत्तस्य दर्शय । स वाचयन्नेव नृपो वृत्तिं ते संविधास्यति

idaṁ tvaṁ patramādāya brahmadattasya darśaya | sa vācayanneva nṛpo vṛttiṁ te saṁvidhāsyati

आप यह पत्र लेकर ब्रह्मदत्त को दिखाइये। राजा उसे पढ़ते ही आपकी जीविका का प्रबन्ध कर देंगे।

श्लोक 38 (skanda.8.57.38)

सनत्कुमार उवाच। । प्रभावज्ञस्ततस्तेषां पिता स मुनिपुङ्गव

sanatkumāra uvāca| | prabhāvajñastatasteṣāṁ pitā sa munipuṅgava

सनत्कुमार ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! तब उनका पिता उनके प्रभाव को जानकर...

श्लोक 39 (skanda.8.57.39)

मेने तद्वै तथा सर्वमनुमेने च तत्पुनः

mene tadvai tathā sarvamanumene ca tatpunaḥ

—इस सबको सत्य मानकर उन्होंने पुनः इसकी स्वीकृति दी।

श्लोक 40 (skanda.8.57.40)

अथासनानि बद्ध्वा ते युक्ता जग्मुस्तपोधनाः

athāsanāni baddhvā te yuktā jagmustapodhanāḥ

फिर आसन बाँधकर, योगयुक्त होकर वे तपोधन शरीर त्यागकर चले गये।

श्लोक 41 (skanda.8.57.41)

ज्योतिर्भूतानपश्यच्च पिता तेषामतिद्युतिः

jyotirbhūtānapaśyacca pitā teṣāmatidyutiḥ

उनके पिता ने, स्वयं अत्यंत तेजस्वी होकर, उन्हें ज्योति-रूप बनते देखा।

श्लोक 42 (skanda.8.57.42)

स तु लेखं समादाय पुत्रान्स्वानभिचिन्तयन्

sa tu lekhaṁ samādāya putrānsvānabhicintayan

फिर वे पत्र लेकर, अपने पुत्रों का स्मरण करते हुए...

श्लोक 43 (skanda.8.57.43)

काम्पिल्यमगमत्तूर्णं दिदृक्षुर्नृपसत्तमम्

kāmpilyamagamattūrṇaṁ didṛkṣurnṛpasattamam

—शीघ्रता से काम्पिल्य को गये, श्रेष्ठ राजा से मिलने की इच्छा से।

श्लोक 44 (skanda.8.57.44)

स च राजा सालवना दागतः प्राविशत् पुरम् । ब्राह्मणो दूरत श्चास्य तं लेखं समदर्शयत

sa ca rājā sālavanā dāgataḥ prāviśat puram | brāhmaṇo dūrata ścāsya taṁ lekhaṁ samadarśayata

और वह राजा शालवन से आकर नगर में प्रवेश कर रहा था; उस ब्राह्मण ने दूर से ही उसे वह पत्र दिखाया।

श्लोक 45 (skanda.8.57.45)

निमित्तानि च संलक्ष्य शुभानि स नराधिपः । लेखमानयतेत्युक्त्वा धारयामास तं रथम्

nimittāni ca saṁlakṣya śubhāni sa narādhipaḥ | lekhamānayatetyuktvā dhārayāmāsa taṁ ratham

शुभ शकुनों को देखकर उस राजा ने पत्र लाओ कहकर अपना रथ रोक लिया।

श्लोक 46 (skanda.8.57.46)

स पुरद्वारसंस्थस्तु रथेन महता तदा । ब्रह्मधन्व धृतच्छत्रः पञ्चाला वीजिताननः

sa puradvārasaṁsthastu rathena mahatā tadā | brahmadhanva dhṛtacchatraḥ pañcālā vījitānanaḥ

वे नगर-द्वार पर विशाल रथ में खड़े थे, ब्रह्मधन्व छत्र धारण किये हुए तथा पंचाल उनका मुख पंखा झल रहे थे...

श्लोक 47 (skanda.8.57.47)

गृहीत्वा लेखमव्यग्रमवाचयत तं तदा । श्लोकद्वयं चाप्यभवत्तस्मिँल्लेखे शुभप्रदम्

gṛhītvā lekhamavyagramavācayata taṁ tadā | ślokadvayaṁ cāpyabhavattasmi~llekhe śubhapradam

—उन्होंने शान्तिपूर्वक पत्र लेकर उसे पढ़वाया; उस पत्र में दो शुभप्रद श्लोक थे।

श्लोक 48 (skanda.8.57.48)

ये ते गुरुकृताच्छापाद् गोवधेनावपीडिताः । पितृभक्त्या कृतज्ञाना जाताः सर्वे शुभोदयाः

ye te gurukṛtācchāpād govadhenāvapīḍitāḥ | pitṛbhaktyā kṛtajñānā jātāḥ sarve śubhodayāḥ

जो गुरु के शाप से गौ-वध के कारण पीड़ित हुए, वे सभी पितृ-भक्ति तथा कृतज्ञता से शुभोदय को प्राप्त हुए...

श्लोक 49 (skanda.8.57.49)

सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे

saptavyādhā daśārṇeṣu mṛgāḥ kālañjare girau | cakravākāḥ śaradvīpe haṁsāḥ sarasi mānase

—दशार्ण में सात व्याध, कालंजर पर्वत पर मृग, शरद्वीप पर चक्रवाक, मानसरोवर में हंस...

श्लोक 50 (skanda.8.57.50)

तेपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दीर्घमध्वानं यूयं किमवसीदथ

tepi jātāḥ kurukṣetre brāhmaṇā vedapāragāḥ | prasthitā dīrghamadhvānaṁ yūyaṁ kimavasīdatha

—वे कुरुक्षेत्र में वेदपारंगत ब्राह्मण भी हुए, इतनी लम्बी यात्रा तय की; तुम अब क्यों पिछड़े हुए हो?

श्लोक 51 (skanda.8.57.51)

सनत्कुमार उवाच। । श्लोकद्वयं तथा श्रुत्वा त्रयस्ते विषपीतवत् । मोहं तदा तु संप्राप्य लब्धसंज्ञा विशन्पुरम्

sanatkumāra uvāca| | ślokadvayaṁ tathā śrutvā trayaste viṣapītavat | mohaṁ tadā tu saṁprāpya labdhasaṁjñā viśanpuram

सनत्कुमार ने कहा — उन दो श्लोकों को सुनकर वे तीनों मानो विष पीकर मूर्च्छित हो गये; फिर चेतना पाकर उन्होंने नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 52 (skanda.8.57.52)

ते प्रविश्य पुरञ्चैव वेश्म चैवाप्यतन्द्रिताः । इति चेति च संचिन्त्य वनाय दधिरे मनः

te praviśya purañcaiva veśma caivāpyatandritāḥ | iti ceti ca saṁcintya vanāya dadhire manaḥ

नगर तथा भवन में प्रवेश करके, सजग होकर, इस प्रकार विचार करते हुए, उन्होंने अपने मन को वन की ओर लगाया।

श्लोक 53 (skanda.8.57.53)

सा च पत्नी महाभागा अभिगम्य नराधिपम् । इदमाह मुदा युक्ता राजानं ससुहृज्जनम्

sā ca patnī mahābhāgā abhigamya narādhipam | idamāha mudā yuktā rājānaṁ sasuhṛjjanam

और उन महाभागा पत्नी ने राजा के पास जाकर, प्रसन्नतापूर्वक, मित्रों सहित राजा से यह कहा —

श्लोक 54 (skanda.8.57.54)

भवान् योगेश्वरो भूत्वा सक्तो भोगेषु सर्वशः । प्रबोधार्थं ततोहन्ते क्रोधमाहारयन्तदा

bhavān yogeśvaro bhūtvā sakto bhogeṣu sarvaśaḥ | prabodhārthaṁ tatohante krodhamāhārayantadā

आप योगेश्वर होते हुए भी सर्वथा भोगों में आसक्त हो गये थे; इसलिये आपको जगाने के लिये मैंने वह क्रोध धारण किया था।

श्लोक 55 (skanda.8.57.55)

जानामि त्वां रुतज्ञञ्च जानामि त्वां खगन्तथा । अतोहं जानती राजन् प्रतिबोधार्थमुद्यता

jānāmi tvāṁ rutajñañca jānāmi tvāṁ khagantathā | atohaṁ jānatī rājan pratibodhārthamudyatā

मैं जानती हूँ कि आप प्राणियों की बोली समझने वाले हैं, और मैं जानती हूँ कि आप पूर्वजन्म में पक्षी थे। इसीलिये, हे राजन्! यह जानते हुए मैंने आपको जगाने का प्रयत्न किया।

श्लोक 56 (skanda.8.57.56)

तस्माद्विप्रमिमञ्चैव तेषां पितरमव्ययम् । धनेन योजयस्वाद्य पुत्रं राज्येभिषिच्य च

tasmādvipramimañcaiva teṣāṁ pitaramavyayam | dhanena yojayasvādya putraṁ rājyebhiṣicya ca

अतः आज ही इस ब्राह्मण, उन चारों के अविनाशी पिता, को धन से युक्त कीजिये, तथा अपने पुत्र को राज्याभिषेक करके...

श्लोक 57 (skanda.8.57.57)

श्वो गच्छाव वनं राजन मा कालं प्रतिपालय । राजा तत्कृत्यमखिलं कृत्वा पत्न्या सहव्रतः

śvo gacchāva vanaṁ rājana mā kālaṁ pratipālaya | rājā tatkṛtyamakhilaṁ kṛtvā patnyā sahavrataḥ

—हे राजन्! कल ही हम वन को चलें; विलम्ब मत कीजिये। राजा ने वह सारा कार्य पूर्ण करके, अपनी पत्नी के साथ व्रतपूर्वक...

श्लोक 58 (skanda.8.57.58)

जगाम वनमुद्दिश्य योगेन च दिवं ययौ । पंचालोपि गते तस्मिन् तपः कृत्वा सुदुश्चरम्

jagāma vanamuddiśya yogena ca divaṁ yayau | paṁcālopi gate tasmin tapaḥ kṛtvā suduścaram

—वन की ओर प्रस्थान किया और योग द्वारा स्वर्ग को गये। उनके जाने पर पंचाल ने भी अत्यंत दुष्कर तप करके...

श्लोक 59 (skanda.8.57.59)

चकार पारणं चैव यक्षत्वं चाप्यवाप ह । ब्रह्मधन्वा च कालेन सुमहात्मा दृढव्रतः

cakāra pāraṇaṁ caiva yakṣatvaṁ cāpyavāpa ha | brahmadhanvā ca kālena sumahātmā dṛḍhavrataḥ

—पारणा की और यक्ष-पद को भी प्राप्त किया। और महात्मा दृढ़व्रत ब्रह्मधन्व ने समय के साथ...

श्लोक 60 (skanda.8.57.60)

हिमवत्तनयां देवीं तपसा समपश्यत

himavattanayāṁ devīṁ tapasā samapaśyata

—अपने तप से हिमवत्पुत्री देवी का दर्शन किया।

श्लोक 61 (skanda.8.57.61)

वरदां तां तदा दृष्टवा ब्रह्मधन्वाब्रवीच्छुभाम्

varadāṁ tāṁ tadā dṛṣṭavā brahmadhanvābravīcchubhām

उस वरदायिनी शुभा देवी को देखकर ब्रह्मधन्व ने कहा —

श्लोक 62 (skanda.8.57.62)

इच्छामि कामरूपित्वं त्वद्भक्तिं चैव नित्यदा । कृच्छ्रं महच्च प्राप्तस्य त्वयैवोद्धरणं ततः

icchāmi kāmarūpitvaṁ tvadbhaktiṁ caiva nityadā | kṛcchraṁ mahacca prāptasya tvayaivoddharaṇaṁ tataḥ

मैं इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति चाहता हूँ, तथा सदा आपकी भक्ति; और यदि मैं महान् संकट में पड़ूँ, तो आपके द्वारा ही उद्धार चाहता हूँ।

श्लोक 63 (skanda.8.57.63)

एवमस्त्विति सा चोक्त्वा जगामेष्टां गतिं तदा । बह्मधन्वापि मत्तोभून्मदनेन दुरात्मवान्

evamastviti sā coktvā jagāmeṣṭāṁ gatiṁ tadā | bahmadhanvāpi mattobhūnmadanena durātmavān

ऐसा ही हो कहकर वे अपने इष्ट स्थान को चली गयीं। किन्तु ब्रह्मधन्व भी मदन से उन्मत्त होकर दुरात्मा बन गया।

श्लोक 64 (skanda.8.57.64)

स भूत्वा धार्मिकः पूर्वमधर्मेणाभिपीडितः

sa bhūtvā dhārmikaḥ pūrvamadharmeṇābhipīḍitaḥ

वे, जो पहले धार्मिक थे, अब अधर्म से पीड़ित हो गये।

श्लोक 65 (skanda.8.57.65)

अभिमेने स कन्याश्च ऋषीपत्नीश्च सर्वशः

abhimene sa kanyāśca ṛṣīpatnīśca sarvaśaḥ

—उसने कन्याओं तथा ऋषिपत्नियों को, सबको, लालसा से देखा।

श्लोक 66 (skanda.8.57.66)

भर्तृरूपेण गत्वा च कामेन स विमोहितः । न च कश्चिद्विजानाति तथा वर्तन्तमन्तशः

bhartṛrūpeṇa gatvā ca kāmena sa vimohitaḥ | na ca kaścidvijānāti tathā vartantamantaśaḥ

काम से मोहित होकर वह उनके पति का रूप धारण करके उनके पास जाता, और कोई भी उसे इस प्रकार व्यवहार करते हुए पहचान नहीं पाता था।

श्लोक 67 (skanda.8.57.67)

अथ हाल इति ख्यातो मृगचारी महातपाः । तस्य पत्नी सुधर्माभून्नाम्ना रूपवती दृढम्

atha hāla iti khyāto mṛgacārī mahātapāḥ | tasya patnī sudharmābhūnnāmnā rūpavatī dṛḍham

अब हाल नामक विख्यात, मृगचारी महातपस्वी की पत्नी सुधर्मा नामक थी, अत्यंत रूपवती तथा दृढ़ स्वभाव वाली।

श्लोक 68 (skanda.8.57.68)

कथयन्ति हि तां देवाः सिद्धाश्च सह चारणैः । असमा रूपतोन्याभिस्त्रिषु लोकेषु भामिनी

kathayanti hi tāṁ devāḥ siddhāśca saha cāraṇaiḥ | asamā rūpatonyābhistriṣu lokeṣu bhāminī

देवता, सिद्ध तथा चारण उसके विषय में कहते हैं कि रूप में वह भामिनी तीनों लोकों में किसी अन्य के समान नहीं है।

श्लोक 69 (skanda.8.57.69)

न च तस्य सभार्यस्य अन्तरं स बुबोध ह । कस्मिन् काले भवेत्तस्या विरहः पतिना सह

na ca tasya sabhāryasya antaraṁ sa bubodha ha | kasmin kāle bhavettasyā virahaḥ patinā saha

उसकी पत्नी सहित उपस्थिति में उसे कोई अवसर नहीं मिल पाता था; वह इस ताक में रहा कि किस समय वह अपने पति से विलग हो।

श्लोक 70 (skanda.8.57.70)

स ब्रह्मधन्वा तां श्रुत्वा तथा रूपवतीं सतीम् । पत्यास्या विरहाकांक्षी व्याघ्ररूपं चकार ह

sa brahmadhanvā tāṁ śrutvā tathā rūpavatīṁ satīm | patyāsyā virahākāṁkṣī vyāghrarūpaṁ cakāra ha

उस ब्रह्मधन्व ने उस रूपवती, सती स्त्री के विषय में सुनकर, उसे पति से विलग करने की इच्छा से व्याघ्र का रूप धारण किया।

श्लोक 71 (skanda.8.57.71)

कृत्वा च सुमहद्रूपं विकृतं भैरवं तदा । अत्रसयत् मृगान् व्यास दर्शनेन सुबालिशः

kṛtvā ca sumahadrūpaṁ vikṛtaṁ bhairavaṁ tadā | atrasayat mṛgān vyāsa darśanena subāliśaḥ

हे व्यास! अत्यंत विशाल, विकृत तथा भयंकर रूप धारण करके उस अत्यंत मूर्ख ने अपने दर्शन मात्र से मृगों को भयभीत कर दिया।

श्लोक 72 (skanda.8.57.72)

तद् व्याघ्रभयसंत्रस्तमृगयूथं तदा विभो । मनोनिलजवव्यग्रमदृश्यं संप्रपद्यत

tad vyāghrabhayasaṁtrastamṛgayūthaṁ tadā vibho | manonilajavavyagramadṛśyaṁ saṁprapadyata

हे प्रभो! व्याघ्र के भय से त्रस्त वह मृगयूथ मन तथा वायु के समान वेगवान् होकर अदृश्य हो गया।

श्लोक 73 (skanda.8.57.73)

मृगैः सह च हालोपि जीवितैषी तदा गतः । सुधर्मा ब्राह्मणी सापि भयाद् व्याघ्रस्य भामिनी

mṛgaiḥ saha ca hālopi jīvitaiṣī tadā gataḥ | sudharmā brāhmaṇī sāpi bhayād vyāghrasya bhāminī

हाल भी अपने प्राणों की रक्षा के लिये मृगों के साथ ही भाग गये। ब्राह्मणी सुधर्मा भी व्याघ्र के भय से...

श्लोक 74 (skanda.8.57.74)

स्त्रीस्वभावाच्च पतिता नान्वगच्छन्मृगव्रजम् । एकाकिनीञ्च तां दृष्टवा ब्रह्मधन्वा दुरात्मवान्

strīsvabhāvācca patitā nānvagacchanmṛgavrajam | ekākinīñca tāṁ dṛṣṭavā brahmadhanvā durātmavān

—स्त्री-स्वभाव के कारण पिछड़ गयी और मृगों के झुंड के साथ नहीं जा सकी। उसे अकेली देखकर वह दुरात्मा ब्रह्मधन्व...

श्लोक 75 (skanda.8.57.75)

व्याघ्ररूपं समुत्सृज्य तामिदं प्रत्यभाषत । मृदुना सान्त्वयुक्तेन वचसा भयपीडिताम्

vyāghrarūpaṁ samutsṛjya tāmidaṁ pratyabhāṣata | mṛdunā sāntvayuktena vacasā bhayapīḍitām

—व्याघ्र का रूप त्यागकर, भय से पीड़ित उस स्त्री से कोमल, सान्त्वनापूर्ण वचनों में यह कहा —

श्लोक 76 (skanda.8.57.76)

मा भीर्भवतु ते भद्रे पतिस्तेहं सुमध्यमे । मृगराजो गतोसौ च समाश्वस मम प्रिये

mā bhīrbhavatu te bhadre patistehaṁ sumadhyame | mṛgarājo gatosau ca samāśvasa mama priye

हे भद्रे! भय मत करो; मैं ही तुम्हारा पति हूँ, हे सुमध्यमे! वह सिंह चला गया है; हे प्रिये! निश्चिन्त हो जाओ।

श्लोक 77 (skanda.8.57.77)

तं समाश्वस्य सापश्यत् पतिरूपं महायशा । हृदा चाचिन्तयद् दृष्टो मयासौ तैर्मृगैः सह

taṁ samāśvasya sāpaśyat patirūpaṁ mahāyaśā | hṛdā cācintayad dṛṣṭo mayāsau tairmṛgaiḥ saha

आश्वस्त होकर उस महायशस्विनी ने उसे पति के रूप में देखा; और मन में सोचा — मैंने तो अभी उन्हें मृगों के साथ जाते देखा था।

श्लोक 78 (skanda.8.57.78)

जीवितैषी पलायन् वै कुतोयं पुनरागतः । देवेन्द्रो मा दुराचारः सदा धर्षत्यतन्द्रितः

jīvitaiṣī palāyan vai kutoyaṁ punarāgataḥ | devendro mā durācāraḥ sadā dharṣatyatandritaḥ

—जीवन बचाने के लिये भागते हुए, वे पुनः कैसे आ गये? कहीं यह वह दुराचारी इन्द्र तो नहीं, जो सदा जागरूक होकर स्त्रियों को भ्रष्ट करता है?

श्लोक 79 (skanda.8.57.79)

सोयं कामयितुं प्राप्तः किन्न स्यादन्तरैषिवान् । तस्माद् द्रक्ष्याम्यहं सम्यग् दुष्टं दिव्येन चक्षुषा

soyaṁ kāmayituṁ prāptaḥ kinna syādantaraiṣivān | tasmād drakṣyāmyahaṁ samyag duṣṭaṁ divyena cakṣuṣā

क्या यह मुझे भोगने के लिये अवसर खोजता हुआ आया है? अतः मैं अपनी दिव्य दृष्टि से इस दुष्ट को भलीभाँति देख लूँगी।

श्लोक 80 (skanda.8.57.80)

सनत्कुमार उवाच। । एतस्मिन्नन्तरे सोथ ब्रह्मधन्वा करेग्रहीत् । तामिदं चोचिवान् हष्टः किं त्वं चिन्तयसे हृदा

sanatkumāra uvāca| | etasminnantare sotha brahmadhanvā karegrahīt | tāmidaṁ cocivān haṣṭaḥ kiṁ tvaṁ cintayase hṛdā

सनत्कुमार ने कहा — इसी बीच ब्रह्मधन्व ने उसका हाथ पकड़ लिया और हर्षित होकर उससे कहा — तुम मन में क्या सोच रही हो?

श्लोक 81 (skanda.8.57.81)

न मामालिङ्गसेद्य त्वं मृत्योरास्याद्विनिर्गतम्

na māmāliṅgasedya tvaṁ mṛtyorāsyādvinirgatam

आज तुम मुझे, जो मृत्यु के मुख से निकलकर आया हूँ, आलिंगन नहीं करती।

श्लोक 82 (skanda.8.57.82)

ननु तेहं प्रियो भर्ता मा क्रुधो वरवर्णिनि

nanu tehaṁ priyo bhartā mā krudho varavarṇini

क्या मैं तुम्हारा प्रिय पति नहीं हूँ? हे वरवर्णिनी! क्रोध मत करो।

श्लोक 83 (skanda.8.57.83)

ततस्तां स तदा दौष्ट्यात् कपोले समजिघ्रत । परिष्वज्य च दुष्टात्मा गात्रैर्गात्राण्यपीडयत्

tatastāṁ sa tadā dauṣṭyāt kapole samajighrata | pariṣvajya ca duṣṭātmā gātrairgātrāṇyapīḍayat

तब दुष्टतावश उसने उसके कपोल को सूँघा; और उस दुरात्मा ने आलिंगन करके अपने अंगों को उसके अंगों से दबाया।

श्लोक 84 (skanda.8.57.84)

नीवीं व्यस्रं सयच्चैव अधरं चापिबद् बलात् । बुबुधे सा च तं दुष्टं कर्मणा तेन शोभना

nīvīṁ vyasraṁ sayaccaiva adharaṁ cāpibad balāt | bubudhe sā ca taṁ duṣṭaṁ karmaṇā tena śobhanā

उसने उसकी नीवी को खोल दिया और बलपूर्वक उसका अधरोष्ठ चूम लिया। उस कर्म से ही उस सुन्दरी ने उसे दुष्ट पहचान लिया।

श्लोक 85 (skanda.8.57.85)

सुधर्मोवाच न त्वं मम पतिर्मूढ शक्रस्त्वं नात्र संशयः । न भूयो मदनस्यास्मि विषयोहं सुदुर्मते

sudharmovāca na tvaṁ mama patirmūḍha śakrastvaṁ nātra saṁśayaḥ | na bhūyo madanasyāsmi viṣayohaṁ sudurmate

सुधर्मा ने कहा — हे मूढ! तुम मेरे पति नहीं हो, तुम इन्द्र हो, इसमें कोई संशय नहीं। हे दुर्मते! अब मैं तुम्हारी कामवासना का विषय नहीं बनूँगी।

श्लोक 86 (skanda.8.57.86)

स तयाप्येवमुक्तस्तु अवधूतश्च सर्वशः । पपात धरणीपृष्ठे स्वं च रूपं प्रपद्यत

sa tayāpyevamuktastu avadhūtaśca sarvaśaḥ | papāta dharaṇīpṛṣṭhe svaṁ ca rūpaṁ prapadyata

उसके द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर तथा सर्वथा तिरस्कृत होकर, वह पृथ्वी पर गिर पड़ा और अपने वास्तविक रूप को प्राप्त हुआ।

श्लोक 87 (skanda.8.57.87)

ततः सा क्रोधताम्राक्षी धक्ष्यमाणेव चक्षुषा । निरीक्ष्य वदनं सुभ्रूरिदं वचनमब्रवीत्

tataḥ sā krodhatāmrākṣī dhakṣyamāṇeva cakṣuṣā | nirīkṣya vadanaṁ subhrūridaṁ vacanamabravīt

तब क्रोध से लाल नेत्रों वाली, मानो अपनी दृष्टि से जला देने वाली, उस भ्रूयुक्त सुन्दरी ने उसका मुख देखकर यह वचन कहा —

श्लोक 88 (skanda.8.57.88)

ऋषिपत्न्यस्त्वया बह्व्यो व्यंसिताः दुष्टचेतसा

ṛṣipatnyastvayā bahvyo vyaṁsitāḥ duṣṭacetasā

हे दुष्टचित्त! तुमने अनेक ऋषि-पत्नियों को भ्रष्ट किया है।

श्लोक 89 (skanda.8.57.89)

न मादृशी त्वया काचिदन्या ह्यसादिता पुरा

na mādṛśī tvayā kācidanyā hyasāditā purā

किन्तु मेरे जैसी किसी अन्य ने पहले कभी तुम्हें परास्त नहीं किया।

श्लोक 90 (skanda.8.57.90)

इदानीं कर्मणस्तस्य पूर्वमाचरितस्य ते

idānīṁ karmaṇastasya pūrvamācaritasya te

अब तुम्हारे पहले किये गये उस कर्म का...

श्लोक 91 (skanda.8.57.91)

फलं प्राप्तमिदं पश्य मत्सकाशाद् दुरासदम्

phalaṁ prāptamidaṁ paśya matsakāśād durāsadam

—यह फल देख लो, जो मुझसे दुर्धर्ष रूप में प्राप्त हुआ है।

श्लोक 92 (skanda.8.57.92)

यदेव रूपं कृत्वा त्वं मृगानत्रासयो बलात् । विचरिष्यसि तेनैव रूपेण बहुलाः समाः

yadeva rūpaṁ kṛtvā tvaṁ mṛgānatrāsayo balāt | vicariṣyasi tenaiva rūpeṇa bahulāḥ samāḥ

जिस रूप को धारण करके तुमने बलपूर्वक मृगों को भयभीत किया, उसी रूप में तुम अनेक वर्षों तक विचरण करोगे।

श्लोक 93 (skanda.8.57.93)

अशक्तश्चापि हन्तुं त्वं भविता मानुषं क्वचित् । षष्ठे च काले संप्राप्ते मृगं भक्ष्यमवाप्स्यसि

aśaktaścāpi hantuṁ tvaṁ bhavitā mānuṣaṁ kvacit | ṣaṣṭhe ca kāle saṁprāpte mṛgaṁ bhakṣyamavāpsyasi

और तुम किसी मनुष्य को कभी नहीं मार सकोगे; और छठे समय के आने पर तुम्हें मृग भोजन के रूप में प्राप्त होगा।

श्लोक 94 (skanda.8.57.94)

सनत्कुमार उवाच। । अभिव्याहृत्य तं क्रूरं शुभाचारा मनस्विनी । जगाम तान्मृगाँस्त्वेव ततः पतिमपश्यत

sanatkumāra uvāca| | abhivyāhṛtya taṁ krūraṁ śubhācārā manasvinī | jagāma tānmṛgā~stveva tataḥ patimapaśyata

सनत्कुमार ने कहा — उस क्रूर को यह शाप देकर, वह सदाचारिणी मनस्विनी उन मृगों की ओर गयी, और वहाँ उसने अपने पति को देखा।

श्लोक 95 (skanda.8.57.95)

सोपि दुःखेन सन्तप्तो मन्वानस्तां हतेति च । विलपन्नेव तां दृष्टवा परिष्वज्येदमब्रवीत्

sopi duḥkhena santapto manvānastāṁ hateti ca | vilapanneva tāṁ dṛṣṭavā pariṣvajyedamabravīt

वे भी दुःख से संतप्त होकर, उसे मृत मानकर विलाप कर रहे थे; उसे देखकर उन्होंने आलिंगन करके यह कहा —

श्लोक 96 (skanda.8.57.96)

दिष्ट्या त्वमसि संप्राप्ता मृत्योरास्याद्विनिःसृता । कच्चिन्न तेन दृष्टासि मृगराजेन शोभने

diṣṭyā tvamasi saṁprāptā mṛtyorāsyādviniḥsṛtā | kaccinna tena dṛṣṭāsi mṛgarājena śobhane

सौभाग्य से तुम मृत्यु के मुख से निकलकर लौट आयी हो। हे शोभने! आशा है उस सिंह ने तुम्हें नहीं देखा?

श्लोक 97 (skanda.8.57.97)

सुधर्मोवाच नासौ मृगेन्द्रो दुर्बुद्धिः कोप्यसौ कामरूपवान् । मदर्थं समनुप्राप्तो मया दग्धः पतङ्गवत्

sudharmovāca nāsau mṛgendro durbuddhiḥ kopyasau kāmarūpavān | madarthaṁ samanuprāpto mayā dagdhaḥ pataṅgavat

सुधर्मा ने कहा — वह सिंह नहीं था, वह कोई दुर्बुद्धि कामरूपधारी था, जो मेरे लिये आया था; मैंने उसे पतंगे के समान जला दिया।

श्लोक 98 (skanda.8.57.98)

स शापान्मम दुष्टात्मा शार्दूलप्रकृतिं गतः । राजेव शक्तिशापेन सौदासो राक्षसीं तनुम्

sa śāpānmama duṣṭātmā śārdūlaprakṛtiṁ gataḥ | rājeva śaktiśāpena saudāso rākṣasīṁ tanum

मेरे शाप से वह दुरात्मा व्याघ्र-स्वभाव को प्राप्त हो गया, जैसे राजा सौदास शक्ति के शाप से राक्षस-देह को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 99 (skanda.8.57.99)

सनत्कुमार उवाच। । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हालो धर्मार्थतत्त्ववित् । दिव्येन चक्षुषापश्यद् ब्रह्मधन्वानमव्ययम्

sanatkumāra uvāca| | tasyāstadvacanaṁ śrutvā hālo dharmārthatattvavit | divyena cakṣuṣāpaśyad brahmadhanvānamavyayam

सनत्कुमार ने कहा — उसके वचन को सुनकर, धर्मार्थ के तत्त्व को जानने वाले हाल ने अपनी दिव्य दृष्टि से अविनाशी ब्रह्मधन्व को देखा।

श्लोक 100 (skanda.8.57.100)

तामुवाच सतीं भार्यामिदं स करुणात्मकः । कृतं दुष्टं त्वयात्रेयि सद्भिः कर्म विगर्हितम्

tāmuvāca satīṁ bhāryāmidaṁ sa karuṇātmakaḥ | kṛtaṁ duṣṭaṁ tvayātreyi sadbhiḥ karma vigarhitam

उन्होंने करुणाशील होकर अपनी सती पत्नी से यह कहा — हे आत्रेयि! तुमने एक दुष्ट कर्म किया है, जो सज्जनों द्वारा निन्दित है।

श्लोक 101 (skanda.8.57.101)

महतस्तपसस्तेद्य क्षयोयं सुमहान् कृतः । न दुष्यन्ति स्त्रियः साध्वि नद्यो यद्वद् विगाहनैः

mahatastapasastedya kṣayoyaṁ sumahān kṛtaḥ | na duṣyanti striyaḥ sādhvi nadyo yadvad vigāhanaiḥ

आज तुमने अपनी महान् तपस्या का यह अत्यंत बड़ा क्षय कर लिया। हे साध्वि! स्त्रियाँ दूषित नहीं होतीं, जैसे नदियाँ स्नान करने वालों से दूषित नहीं होतीं।

श्लोक 102 (skanda.8.57.102)

न चैव शक्यं धर्मेण संगुप्तां त्वां प्रमर्दितुम्

na caiva śakyaṁ dharmeṇa saṁguptāṁ tvāṁ pramarditum

और धर्म से सुरक्षित तुम्हें वास्तव में भ्रष्ट किया ही नहीं जा सकता था।

श्लोक 103 (skanda.8.57.103)

यथा विषेण संछन्नमन्नं भोक्तुं हि मानवैः

yathā viṣeṇa saṁchannamannaṁ bhoktuṁ hi mānavaiḥ

—जैसे विष से युक्त अन्न को मनुष्य जानते हुए नहीं खा सकते...

श्लोक 104 (skanda.8.57.104)

अत्र ते वर्त्तयिष्यामि पुरावृत्तं महातपे । यत् पतिव्रतया पूर्वं कृतं दीप्तेन तेजसा

atra te varttayiṣyāmi purāvṛttaṁ mahātape | yat pativratayā pūrvaṁ kṛtaṁ dīptena tejasā

हे महातपस्विनी! मैं तुम्हें एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, जो पूर्वकाल में एक पतिव्रता ने अपने प्रज्वलित तेज से किया था।

श्लोक 105 (skanda.8.57.105)

आसीद् भलन्दनो नाम ऋषिः परमधार्मिकः । विद्वाँश्चैव दयावाँश्च पृथिवीवद् व्यवस्थितः

āsīd bhalandano nāma ṛṣiḥ paramadhārmikaḥ | vidvā~ścaiva dayāvā~śca pṛthivīvad vyavasthitaḥ

भलन्दन नामक एक अत्यंत धार्मिक ऋषि थे, विद्वान् तथा दयावान्, पृथ्वी के समान स्थिर।

श्लोक 106 (skanda.8.57.106)

ऋग्नाम्नी तस्य भार्याभूद् वासिष्ठी पुण्यलक्षणा । रूपेणाप्रतिमा साध्वी न तस्याः स्त्रीः समा क्वचित्

ṛgnāmnī tasya bhāryābhūd vāsiṣṭhī puṇyalakṣaṇā | rūpeṇāpratimā sādhvī na tasyāḥ strīḥ samā kvacit

उनकी पत्नी वासिष्ठी-कुल की, ऋक् नामक, पुण्यलक्षणा थीं; रूप में अनुपम तथा साध्वी — कोई भी स्त्री कहीं उनके समान नहीं थी।

श्लोक 107 (skanda.8.57.107)

पतिव्रता महाभागा सर्वधर्मविदुत्तमा । तस्याः पतिमृते नान्यद्दैवतं भुवि विद्यते

pativratā mahābhāgā sarvadharmaviduttamā | tasyāḥ patimṛte nānyaddaivataṁ bhuvi vidyate

—पतिव्रता, महाभागा तथा सर्वधर्मज्ञों में श्रेष्ठ थीं; उनके लिये पति के अतिरिक्त पृथ्वी पर कोई अन्य देवता नहीं था।

श्लोक 108 (skanda.8.57.108)

अपश्यत कदाचिद्वै देवास्तौ कमलेक्षणाम् । तस्या रूपगुणोन्मत्ता लेभुर्न धृतिमेकशः

apaśyata kadācidvai devāstau kamalekṣaṇām | tasyā rūpaguṇonmattā lebhurna dhṛtimekaśaḥ

एक बार कुछ देवताओं ने उस कमलनयना को देखा; उसके रूप-गुणों से उन्मत्त होकर, एक भी उनमें से धैर्य नहीं पा सका।

श्लोक 109 (skanda.8.57.109)

न शक्यते च सा प्राप्तुं न दूतीभिर्न कर्मणा

na śakyate ca sā prāptuṁ na dūtībhirna karmaṇā

फिर भी वह न दूतियों से और न किसी उपाय से प्राप्त की जा सकती थी।

श्लोक 110 (skanda.8.57.110)

न दानेन न संमानै र्न बलेन न सेवया

na dānena na saṁmānai rna balena na sevayā

—न दान से, न सम्मान से, न बल से, न सेवा से।

श्लोक 111 (skanda.8.57.111)

वह्निस्तामग्न्यगारस्थां प्रविष्टामग्रहीच्छुभाम्

vahnistāmagnyagārasthāṁ praviṣṭāmagrahīcchubhām

अग्नि ने उस शुभा को, जब वह अग्निशाला में प्रविष्ट होकर खड़ी थी, पकड़ लिया।

श्लोक 112 (skanda.8.57.112)

न चापि साहमस्मीति न च नास्मीत्यथाब्रवीत्

na cāpi sāhamasmīti na ca nāsmītyathābravīt

और उसने न तो यह कहा — मैं तुम्हारी हूँ, न ही यह कहा — मैं नहीं हूँ।

श्लोक 113 (skanda.8.57.113)

न क्रोधो नापि दर्पोस्या न मानो न च मत्सरः

na krodho nāpi darposyā na māno na ca matsaraḥ

उसमें न क्रोध था, न अभिमान, न मान, न ईर्ष्या।

श्लोक 114 (skanda.8.57.114)

तस्याः प्रियमभून्नान्यत् पतिमेवान्वचिन्तयत्

tasyāḥ priyamabhūnnānyat patimevānvacintayat

उसे और कुछ भी प्रिय नहीं था; वह केवल अपने पति का ही चिन्तन करती थी।

श्लोक 115 (skanda.8.57.115)

विभावसुरपि व्यक्तमियं मामिच्छतीति ह । अभ्युपेत्य न दुष्टेति भावेन सुरसत्तमः

vibhāvasurapi vyaktamiyaṁ māmicchatīti ha | abhyupetya na duṣṭeti bhāvena surasattamaḥ

विभावसु ने भी स्पष्ट रूप से यह सोचकर कि यह मुझे चाहती है, उसके पास पहुँचे; किन्तु उस देवश्रेष्ठ ने उसके भाव से जानकर कि वह दूषित नहीं है...

श्लोक 116 (skanda.8.57.116)

अथ हित्वा स्वकं देहमदेहः समपद्यत । एवं वै भास्करो वायुर्वरुणश्चन्द्र एव च

atha hitvā svakaṁ dehamadehaḥ samapadyata | evaṁ vai bhāskaro vāyurvaruṇaścandra eva ca

—फिर अपनी देह त्यागकर देहरहित हो गये। इसी प्रकार भास्कर, वायु, वरुण तथा चन्द्र भी हुए।

श्लोक 117 (skanda.8.57.117)

सर्वे विदेहाः संवृत्तास्ततस्तां संप्रसादयन् । सापि तान्नावदत् किञ्चित् पुरुषानघशंकया

sarve videhāḥ saṁvṛttāstatastāṁ saṁprasādayan | sāpi tānnāvadat kiñcit puruṣānaghaśaṁkayā

वे सभी देहरहित हो गये और फिर उसे प्रसन्न करने लगे; किन्तु वह पुरुषों के प्रति संदेहवश, निष्पाप होते हुए भी, उनसे कुछ नहीं बोली।

श्लोक 118 (skanda.8.57.118)

भर्तुश्चाकथयत् सर्वं स तानिदमुवाच ह । इयं पत्नी महाभागा मम सर्वाङ्गसुन्दरी

bhartuścākathayat sarvaṁ sa tānidamuvāca ha | iyaṁ patnī mahābhāgā mama sarvāṅgasundarī

उसने अपने पति को सब कुछ बता दिया; तब उन्होंने उनसे यह कहा — यह मेरी महाभागा पत्नी, सर्वांगसुन्दरी है।

श्लोक 119 (skanda.8.57.119)

नेयं कुप्यति युष्माकं जाने ह्यस्या व्रतं शुभम् । मत्तोपि वो भयं नास्ति नाहं कुप्ये कथञ्चन

neyaṁ kupyati yuṣmākaṁ jāne hyasyā vrataṁ śubham | mattopi vo bhayaṁ nāsti nāhaṁ kupye kathañcana

यह तुम पर क्रोधित नहीं है — मैं उसके शुभ व्रत को जानता हूँ। मुझसे भी तुम्हें कोई भय नहीं है; मैं किंचित् भी क्रुद्ध नहीं हूँ।

श्लोक 120 (skanda.8.57.120)

मत्प्रसादाद्विदेहापि देहवन्तो भविष्यथ । ततस्ते देहवन्तो वै तुष्टुवुस्तं भलन्दनम्

matprasādādvidehāpi dehavanto bhaviṣyatha | tataste dehavanto vai tuṣṭuvustaṁ bhalandanam

मेरी कृपा से, देहरहित होते हुए भी, तुम फिर से देहधारी हो जाओगे। तब देह प्राप्त करके उन्होंने भलन्दन की स्तुति की।

श्लोक 121 (skanda.8.57.121)

ऊचुर्वरं वृणीष्वाद्य तुष्टाः स्मस्तव सर्वथा । सोवाच रजसा नार्यः शुद्ध्यन्तु मदनुग्रहात्

ūcurvaraṁ vṛṇīṣvādya tuṣṭāḥ smastava sarvathā | sovāca rajasā nāryaḥ śuddhyantu madanugrahāt

उन्होंने कहा — आज वर माँगो; हम तुमसे सर्वथा प्रसन्न हैं। उन्होंने कहा — मेरी कृपा से स्त्रियाँ रजस्वला होने से शुद्ध हो जायें।

श्लोक 122 (skanda.8.57.122)

कर्मणा च विमुच्यन्तां व्यवहार्या भवन्तु च । सर्वशौचा भवेयुश्च अदुष्टाः सर्वकर्मसु

karmaṇā ca vimucyantāṁ vyavahāryā bhavantu ca | sarvaśaucā bhaveyuśca aduṣṭāḥ sarvakarmasu

—और इस प्रक्रिया से वे कर्म-दोष से मुक्त हों तथा व्यवहार-योग्य बनें; वे सर्वथा शुद्ध तथा सभी कर्मों में निर्दोष हों।

श्लोक 123 (skanda.8.57.123)

हाल उवाच। । ततस्ते तं नमस्कृत्य सभार्यं ब्रह्मवादिनम् । जग्मुर्देवाः प्रशंसन्तः सर्वे वह्निपुरोगमाः

hāla uvāca| | tataste taṁ namaskṛtya sabhāryaṁ brahmavādinam | jagmurdevāḥ praśaṁsantaḥ sarve vahnipurogamāḥ

हाल ने कहा — तब उन ब्रह्मवादी को, उनकी पत्नी सहित, प्रणाम करके, अग्नि को आगे किये हुए सभी देवता उनकी प्रशंसा करते हुए चले गये।

श्लोक 124 (skanda.8.57.124)

एवं त्वमपि धर्मज्ञे नित्यं पतिमनुव्रता । कस्त्वां समर्थो देवोपि स्प्रष्टुमन्ये कुतो जनाः

evaṁ tvamapi dharmajñe nityaṁ patimanuvratā | kastvāṁ samartho devopi spraṣṭumanye kuto janāḥ

हे धर्मज्ञे! उसी प्रकार तुम भी सदा पति की अनुव्रता हो — कौन देव भी तुम्हें स्पर्श करने में समर्थ है, अन्य जनों की तो बात ही क्या?

श्लोक 125 (skanda.8.57.125)

तीर्थभूताः स्त्रियश्चापि न दुष्यन्ति कथञ्चन । मद्रूपं कृतवान् यस्मात्तस्माच्छापं न चार्हति

tīrthabhūtāḥ striyaścāpi na duṣyanti kathañcana | madrūpaṁ kṛtavān yasmāttasmācchāpaṁ na cārhati

तीर्थ के समान पवित्र स्त्रियाँ किसी भी प्रकार से दूषित नहीं होतीं। क्योंकि उसने मेरा ही रूप धारण किया था, इसलिये वह शाप के योग्य नहीं है।

श्लोक 126 (skanda.8.57.126)

तस्मात्करिष्ये तस्याहमदृष्टस्यापि शोभने

tasmātkariṣye tasyāhamadṛṣṭasyāpi śobhane

हे शोभने! अतः मैं, यद्यपि मैंने स्वयं नहीं देखा, फिर भी उसके लिये यह करूँगा।

श्लोक 127 (skanda.8.57.127)

अनुग्रहं धर्मयुक्तं येन श्रेयो ह्यवाप्स्यति

anugrahaṁ dharmayuktaṁ yena śreyo hyavāpsyati

—धर्मयुक्त अनुग्रह, जिससे वह श्रेय को प्राप्त करेगा।

श्लोक 128 (skanda.8.57.128)

व्याघ्रस्यापि प्रिये तस्य स्मृतिर्नित्यं भविष्यति । सर्वकार्येषु धर्मेषु धर्मेण च चरिष्यति

vyāghrasyāpi priye tasya smṛtirnityaṁ bhaviṣyati | sarvakāryeṣu dharmeṣu dharmeṇa ca cariṣyati

—हे प्रिये! व्याघ्र-अवस्था में भी उसकी स्मृति सदा बनी रहेगी; और वह सभी कार्यों तथा धर्मों में धर्मपूर्वक ही आचरण करेगा।

श्लोक 129 (skanda.8.57.129)

यतोस्य कामरूपित्वं येन मत्तः सदा ह्यभूत् । तत एव पुनः श्रेयः प्राप्स्यते मदनुग्रहात्

yatosya kāmarūpitvaṁ yena mattaḥ sadā hyabhūt | tata eva punaḥ śreyaḥ prāpsyate madanugrahāt

चूँकि उसकी इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति मुझसे ही प्राप्त हुई थी, इसलिये उसी के द्वारा वह पुनः मेरी कृपा से श्रेय को प्राप्त करेगा।

श्लोक 130 (skanda.8.57.130)

सनत्कुमार उवाच। । स एष व्यास दुष्टात्मा विश्वामित्राश्रमे रतः । अग्रारण्ये सदा ह्यासीद्देव्या गणापतिः कृतः

sanatkumāra uvāca| | sa eṣa vyāsa duṣṭātmā viśvāmitrāśrame rataḥ | agrāraṇye sadā hyāsīddevyā gaṇāpatiḥ kṛtaḥ

सनत्कुमार ने कहा — हे व्यास! वही दुरात्मा विश्वामित्र के आश्रम में रहते हुए सदा अग्रारण्य में रहता था; देवी ने उसे गणपति बना दिया।

श्लोक 131 (skanda.8.57.131)

य इदं तस्य माहात्म्यं धारयेच्छ्रावयीत वा । सततं ब्राह्मणं व्यास योगैश्वर्यमवाप्नुयात्

ya idaṁ tasya māhātmyaṁ dhārayecchrāvayīta vā | satataṁ brāhmaṇaṁ vyāsa yogaiśvaryamavāpnuyāt

हे व्यास! जो कोई उसकी इस महिमा को स्मरण रखता है अथवा किसी ब्राह्मण को सुनाता है, वह योग-ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 132 (skanda.8.57.132)

योगेश्वरत्वं कांक्षद्भिरेतदध्येयमन्तशः । जन्मान्तरं समासाद्य प्राप्नुवन्ति न संशयः

yogeśvaratvaṁ kāṁkṣadbhiretadadhyeyamantaśaḥ | janmāntaraṁ samāsādya prāpnuvanti na saṁśayaḥ

योगेश्वरत्व की कामना करने वालों को इसका अन्त तक अध्ययन करना चाहिये; अन्य जन्म प्राप्त कर वे इसे अवश्य पा लेते हैं।

श्लोक 133 (skanda.8.57.133)

शृणुयाच्च इमं सततं प्रयतः शुचिरेकमना मनुजः

śṛṇuyācca imaṁ satataṁ prayataḥ śucirekamanā manujaḥ

और जो मनुष्य संयमी, शुद्ध, एकाग्रचित्त होकर इसे सदा सुनता है...

श्लोक 134 (skanda.8.57.134)

प्रियवत्स हि शक्रसमानवपुः सुकृतेन कृतेन पुमान्

priyavatsa hi śakrasamānavapuḥ sukṛtena kṛtena pumān

—हे प्रियवत्स! वह पुरुष अपने किये गये सुकृत के फलस्वरूप इन्द्र के समान शरीर वाला हो जाता है।

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